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Monday, December 31, 2018

‘हृदय’ को हृदयाघात


मोदी जी ने ‘हृदय योजना’ इसलिए शुरू की थी कि हेरिटेज सिटी में डिजाइन की एकरूपता बनी रहे। ये न हो कि उस शहर में आने वाला हर नया नेता और नया अफसर अपनी मर्जी से कोई भी डिजाइन थोपकर शहर को चूं-चूं का मुरब्बा बनाता रहे, जैसा मथुरा-वृन्दावन सहित आजतक देश के ऐतिहासिक शहरों में होता रहा है। यह एक अभूतपूर्व सोच थी, जो अगर सफल हो जाती, तो मोदी जी को ऐतिहासिक शहरों की संस्कृति बचाने का भारी यश मिलता। पर दशकों से कमीशन खाने के आदी नेता और अफसरों ने इस योजना को विफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी क्योंकि उन्हें डर था कि अगर ये योजना सफल हो गई, तो फर्जी नक्शे बनाकर, फर्जी प्रोजेक्ट पास कराने और माल खाने के रास्ते बंद हो जाएंगे। चूंकि मथुरा-वृंदावन में ‘हृदय’ के ‘सिटी एंकर’ के रूप में भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को चुना था, इसलिए उसी अनुभव को यहां साझा करूंगा।

दुनिया के खूबसूरत पौराणिक शहर वृन्दावन का मध्युगीन आकर्षक चेहरा एमवीडीए. के अफसरों के भ्रष्टाचार और लापरवाही से आज विद्रूप हो चुका है। आज भी भोंडे अवैध निर्माण धड़ल्ले से चालू हैं। इस विनाश के लिए जिम्मेदार रहे अफसर ही अब योगी राज  में बनाऐ गऐ ‘ब्रज तीर्थ विकास परिषद् के कर्ता-धर्ता बनकर ब्रज का भारी विनाश करने पर तुले हैं।

ऊपर से दुनिया भर के मीडिया में हल्ला ये है कि ब्रज का भारी विकास हो रहा है। योगी जी ने खजाना खोल दिया है। अब ब्रज अपने पुराने वैभव को फिर पा लेगा। जबकि जमीनी हकीकत ये है कि वृन्दावन, गोवर्धन और बरसाना सब विद्रूपता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। ब्रज के संत, भक्त व ब्रज संस्कृति प्रेमी सब भारी दुखी हैं। मोदी सरकार द्वारा इसी वर्ष पद्मश्री से सम्मानित ब्रज संस्कृति के चलते-फिरते ज्ञानकोश डा. मोहन स्वरूप भाटिया भी 'ब्रजतीर्थ विकास परिषद्' के इन कारनामों से भारी दुखी हैं और बार-बार इसका लिखकर विरोध कर रहे हैं, पर कोई सुनने वाला नहीं।

जयपुर व मैसूर दो सर्वाधिक सुन्दर शहरों में ‘मिर्जा इस्माईल रोड’ उस वास्तुकार के नाम पर हैं, जिसने इन शहरों का नक्शा बनाया था। पेरिस की ‘एफिल टावर’ किसी नेता के नाम पर नहीं बल्कि उसका डिजाइन बनाने वाले इंजीनियर श्री एफिल के नाम पर है। पर योगी सरकार को इतनी सी भी समझ नहीं है कि मथुरा, अयोध्या और काशी के विकास के लिए उन लोगों की सलाह लेती जिनका इन प्राचीन नगरों की संस्कृति से गहरा जुड़ाव है, जिनके पास इस काम का ज्ञान और अनुभव है। पर ऐसा नहीं हुआ। हमेशा की तरह नौकरशाही ने घोटालेबाज या फर्जी सलाहकारों को इन प्राचीन शहरों पर थोपकर, इनका आधुनीकरण शुरू करवा दिया। अब इनका रहा-सहा कलात्मक स्वरूप भी नष्ट हो जाऐगा। बंदर को उस्तरा मिले तो वो क्या करेगा ?

उदाहरण के तौर पर मोदी जी की प्रिय ‘हृदय योजना’ में जब व्यवाहरिक, सुंदर व भावानुकूल वृन्दावन परिक्रमा मार्ग 2.5 किमी० बन ही रहा है, तो शेष 8 किमी. परिक्रमा पर एक नया डिजाइन बनाकर लाल पत्थर का भौंडा काम कराने का क्या औचित्य है ? पर ये पूछने वाला कोई नहीं।

योगी जी के मंत्रियों और अफसरों ने अपने अहंकार और मोटे कमीशन के लालच में, ब्रज में ऐतिहासिक जीर्णोद्धार करती आ  रही ‘द ब्रज फाउंडेशन’ की महत्वपूर्ण भूमिका को नकार कर, विकास के नाम पर, पैसे की बर्बादी का तांडव चला रखा है। जबकि ब्रज फाउंडेशन के योगदान को मोदी जी से लेकर हरेक ने आजतक खूब सराहा है।

उल्लेखनीय है कि योगी सरकार के आते ही 9 पौराणिक कुंडों के जीर्णोद्धार का 27 करोड़ रुपये के काम का ठेका 77 करोड़ रुपये में दिया जा रहा था। गोवर्धन क्षेत्र के विकास का काम जयपुर के मशहूर घोटालेबाज अनूप बरतरिया को सौंपा जा रहा था। द ब्रज फाउंडेशन ने जब इसका विरोध किया, तो सब एकजुट होकर गिद्ध की तरह उस पर टूट पड़े । जिससे ये सब मिलकर ब्रज विकास के नाम पर खुली लूट कर सकें।

उधर सभी संतगण व भक्तजन गत 15 वर्षों से द ब्रज फाउंडेशन के कामों को पूरे ब्रज में देखते व सराहते आये हैं। मोदी जी के खास व भारत के  नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत का कहना है कि, ‘जैसा काम बिना सरकारी पैसे के 15 वर्षों में ब्रज में ब्रज फॉउंडेशन ने  किया है वैसा काम 80 प्रतिशत प्रान्तों के पर्यटन विभागों ने पिछले 71 वर्ष में नहीं किया’।

सारी दुनिया के श्री राधाकृष्ण भक्तों, संतगणों व ब्रजवासियों के लिए ये चिंता और शोभ की बात होनी चाहिए कि 71 वर्षों से आश्रम के नाम पर केवल अपने लिए गेस्ट हाउस बनाने वाले राजनैतिक लोग आज ब्रज की सेवा व विकास के नाम हम सबका खुलेआम उल्लू बना रहे हैं । ब्रज विकास के नाम पर इनकी बनाई हर योजना एक धोका है। इससे न तो ब्रज के कुंड, सरोवर, वन सुधरेंगे और न ही आम ब्रजवासियों को कोई लाभ होगा। ब्रज को ‘डिज्नी वर्ल्ड’ बनाकर बाहर के लोग यहां कमाई करेंगे।

गत 4 वर्षों से मैं इन सवालों पर केंद्र और राज्य सरकार का ध्यान इसी कालम के माध्यम से और पत्र लिखकर भी आकर्षित करता रहा हूं, पर किसी ने परवाह नहीं की। अब मैंने प्रधानमंत्री जी से समय मांगा है, ताकि उनको जमीनी हकीकत बताकर आगे की परिस्थितियां सुधारने का प्रयास किया जा सके। बाकी हरि इच्छा।

Monday, August 29, 2016

गौरक्षक आहत क्यों ?


जिस तरह मीडिया ने गौरक्षकों के खिलाफ शोर मचाया था, उसे यह साफ हो गया था कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लॉबी भारत में गौमाता की रक्षा नहीं होने देगी। इस लॉबी ने प्रधानमंत्री को इस तरह घेर लिया कि उन्हें मजबूरन गौरक्षकों को चेतावनी देनी पड़ी। इसका अर्थ यह नहीं कि गौरक्षा के नाम पर जातीय संघर्ष या खून-खराबे को होने दिया जाए। जिन लोगों ने इस तरह की हिंसा इस देश में कहीं भी की, उन्होंने उत्साह के अतिरेक में गौवंश को हानि पहुंचाई।

दरअसल गौरक्षा का मुद्दा बिल्कुल धार्मिक नहीं है। यह तो शुद्धतम रूप में लोगों की कृषि, अर्थव्यवस्था और उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है। हजारों साल पहले भारत के ऋषियो ने गौवंश के असीमित लाभ जान लिए थे। इसलिए उन्होंने भारतीय समाज में गौवंश को इतना महत्व दिया।

मध्ययुग में मुस्लिम आक्रांताओं और फिर औपनिवेशिक शासकों ने बाकायदा रणनीति बनाकर भारतीय गौवंश को पूरी तरह नष्ट करने का अभियान चलाया, जो आज तक चल रहा है। क्योंकि वह जानते थे कि हजारों साल से भारत की आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत गौ आधारित कृषि रहा था। बिना गौवंश की हत्या किए भारत और भारतीयों को कमजोर नहीं किया जा सकता था। आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इसमें बड़ी होशियारी से पर्दे के पीछे से भूमिका निभाई। उन्होंने इस तरह की मानसिकता तैयार की कि घर-घर में पलने वाली गाय हमारी उपेक्षा और हीनभावना का शिकार हो गयी। जिससे गाय का दूध, दही, मक्खन, घी और छाछ सेवन करके हर भारतीय परिवार स्वस्थ, सुखी और संस्कारवान रहता था। आज आम भारतीयों को जीवन के लिए पोषक तत्व प्राप्त नहीं हैं। दूध, दही, घी के नाम पर जो बड़े ब्रांडो के नाम से बेचा जा रहा है, उसमें कितने कीटनाशक, रासायनिक खाद्य और नकली तत्व मिले हैं, इसका अब हिसाब रखना भी मुश्किल है। नतीजा सामने है कि मेडीकल का व्यवसाय हर गली व शहर में तेजी से पनप रहा है।

चिंता और दुख की बात ये है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन पर जीने वाले कैसे देश के हित में सोच सकते हैं ? वह तो वही लिखेंगे और बोलेंगे, जो उनके कॉरपोरेट आका उन्हें लिखने को कहेंगे। इस लॉबी के खिलाफ देशभक्तो को संगठित होकर आवाज उठानी होगी। पर हिंसा से नहीं तर्क और प्रमाण के साथ। भारतीय गौवंश की श्रेष्ठता को भारतीय जनमानस के सामने लगातार हर मंच पर इस तरह रखना होगा कि एक बार फिर भारतीय परिवार गौवंश को अपने आंगन में स्थान दे।

गांवों में तो यह आसानी से संभव है, पर दुख की बात है कि वहां भी आज गौवंश की उपेक्षा हो रही है। हमने हमेशा कहा है कि गाय गौशाला में नहीं, बल्कि जब हर घर के आंगन में पलेंगी, तब गौवंश की रक्षा होगी। जिनके पास स्थान का अभाव है, उनकी तो मजबूरी है। पर वह भी भारतीय गौवंश के उत्पादों को सामूहिक रूप से प्रोत्साहन देकर अपने परिवार और समाज का भला कर सकते है।

गौरक्षकों के आक्रोश का भी कारण समझना होगा। सदियों से हिंदू समाज गौवंश के ऊपर हो रहे अत्याार को सहता आ रहा है। क्योंकि उसकी पकड़ सत्ताधीशों पर नहीं रही। नरेंद्र भाई मोदी के सत्ता में आने से हर हिंदू को लगा कि एक हजार वर्ष बाद भारत की सनातन संस्कृति को संरक्षक मिला है। जिसे अपने को हिंदू कहने में कोई झिझक नहीं है। ऐसे में जब मोदीजी लाल मांस के निर्यात को बढ़ाने की बात करते है, तो जाहिर है कि हिंदू समाज आहत महसूस करता है।

मोदीजी भूटान में देखकर आए है कि उस देश में हर व्यक्ति सुखी है, क्योंकि उनका जीवन गौ और कृषि आधारित है। उन्हें दुनिया के साथ दौड़ने की इच्छा नहीं है। क्योंकि वह तीव्र औद्योगीकरण के दुष्परिणामों से परिचित हैं।

फिर भारत क्यों उस अंधी दौड़ में भागना चाहता है, जिसका फल भौतिक प्रगति तो हो सकता है, पर उससे समाज सुखी नहीं होता। बल्कि समाज और ज्यादा असुरक्षित होकर तनाव में आ जाता है। भारत की सनातन संस्कृति सादा जीवन और उच्च विचार को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देती है। इन्हीं मूल्यों के कारण भारतीय समाज हजारों साल से निरंतर जिंदा रहा है। जबकि पश्चिमी समाज ने एक शताब्दी के अंदर ही औद्योगीकरण के नफे और नुकसान, दोनों का अनुभव कर लिया है। अब वह भारतीय जीवन मूल्यों की ओर आकर्षित हो रहा है। ऐसे में भारत को फिर से विश्वगुरू बनना होगा। जो गौ आधारित जीवन और वेद आधारित ज्ञान से ही संभव है। इसमें न तो कोई अतिश्योक्ति है और न ही कोई धर्मांधता। कहीं ऐसा न हो कि ‘सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या किया।’

Monday, July 25, 2016

दुनिया का सुखी देश कैसे बने

    पिछले हफ्ते मैं भूटान में था। चीन और भारत से घिरा ये हिमालय का राजतंत्र दुनिया का सबसे सुखी देश है। जैसे दुनिया के बाकी देश अपनी प्रगति का प्रमाण सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) को मानते हैं, वैसे ही भूटान की सरकार अपने देश में खुशहाली के स्तर को विकास का पैमाना मानती है। सुना ही था कि भूटान दुनिया का सबसे सुखी देश है। पर जाकर देखने में यह सिद्ध हो गया कि वाकई भूटान की जनता बहुत सुखी और संतुष्ट है। पूरे भूटान में कानून और व्यवस्था की समस्या नगण्य है। न कोई अपराध करता है, न कोई केस दर्ज होता है और न ही कोई मुकद्मे चलते हैं। निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक वकील और जज अधिकतम समय खाली बैठे रहते हैं। 

ऐसा नहीं है कि भूटान का हर नागरिक बहुत संपन्न हो। पर बुनियादी सुविधाएं सबको उपलब्ध हैं। यहां आपको एक भी भिखारी नहीं मिलेगा। अधिकतम लोग कृषि व्यवसाय जुड़े हैं और जो थोड़े बहुत सर्विस सैक्टर में है, वे भी अपनी आमदनी और जीवनस्तर से पूरी तरह संतुष्ट हैं। 

    लोगों की कोई महत्वाकांक्षाएं नहीं हैं। वे अपने राजा से बेहद प्यार करते हैं। राजा भी कमाल का है। 33 वर्ष की अल्पायु में उसे हर वक्त अपनी जनता की चिंता रहती है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों पर, जहां कार जाने का कोई रास्ता न हो, उन पहाड़ों पर चढ़कर युवा राजा दूर-दूर के गांवों में जनता का हाल जानने निकलता है। लोगों को रियायती दर या बिना ब्याज के आर्थिक मदद करवाता है। 

    भूटान में कोई औद्योगिक उत्पादन नहीं होता। हर चीज भारत, चीन या थाईलैंड से वहां जाती है। वहां की सरकार प्रदूषण को लेकर बहुत गंभीर है। इसलिए कड़े कानून बनाए गए हैं। नतीजतन वहां का पर्यावरण स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभप्रद है। लोगों का खानापीना भी बहुत सादा है। दिन में तीन बार चावल और उसके साथ पनीर और मक्खन में छुकीं हुई बड़ी-बड़ी हरी मिर्च, ये वहां का मुख्य खाना है। पूरा देश बुद्ध भगवान का अनुयायी है। हर ओर एक से एक सुंदर बौद्ध विहार में हैं। जिनमें हजारों साल की परंपराएं और कलाकृतियां संरक्षित हैं। किसी दूसरे धर्म को यहां प्रचार करने की छूट नहीं है, इसलिए न तो यहां मंदिर हैं, न मस्जिद, न चर्च। 

विदेशी नागरिकों को 3 वर्ष से ज्यादा भूटान में रहकर काम करने का परमिट नहीं मिलता। इतना ही नहीं, पर्यटन के लिए आने वाले विदेशियों को इस बात का प्रमाण देना होता है कि वे प्रतिदिन लगभग 17.5 हजार रूपया खर्च करेंगे, तब उन्हें वीजा मिलता है। इसलिए बहुत विदेशी नहीं आते। दक्षिण एशिया के देशों पर खर्चे का ये नियम लागू नहीं होता, इसलिए भारत, बांग्लादेश आदि के पर्यटक यहां सबसे ज्यादा मात्रा में आते हैं। भूटान की जनता इस बात से चिंतित है कि आने वाले पर्यटकों को भूटान के परिवेश की चिंता नहीं होती। जहां भूटान एक साफ-सुथरा देश है, वहीं बाहर से आने वाले पर्यटक जहां मन होता है कूड़ा फेंककर चले जाते हैं। इससे जगह-जगह प्राकृतिक सुंदरता खतरे में पड़ जाती है। 

    एक और बड़ी रोचक बात यह है कि मकान बनाने के लिए किसी को खुली छूट नहीं है। हर मकान का नक्शा सरकार से पास कराना होता है। सरकार का नियम है कि हर मकान का बाहरी स्वरूप भूटान की सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप हो, यानि खिड़कियां दरवाजे और छज्जे, सब पर बुद्ध धर्म के चित्र अंकित होने चाहिए। इस तरह हर मकान अपने आपमें एक कलाकृति जैसा दिखाई देता है। जब हम अपने अनुभवों को याद करते हैं, तो पाते हैं कि नक्शे पास करने की बाध्यता विकास प्राधिकरणों ने भारत में भी कर रखी है। पर रिश्वत खिलाकर हर तरह का नक्शा पास करवाया जा सकता है। यही कारण है कि भारत के पारंपरिक शहरों में भी बेढंगे और मनमाने निर्माण धड़ल्ले से हो रहे हैं। जिससे इन शहरों का कलात्मक स्वरूप तेजी से नष्ट होता जा रहा है। 

    भूटान की 7 दिन की यात्रा से यह बात स्पष्ट हुई कि अगर राजा ईमानदार हो, दूरदर्शी हो, कलाप्रेमी हो, धर्मभीरू हो और समाज के प्रति संवेदनशील हो, तो प्रजा निश्चित रूप से सुखी होती है। पुरानी कहावत है ‘यथा राजा तथा प्रजा’। यह भी समझ में आया कि अगर कानून का पालन अक्षरशः किया जाए, तो समाज में बहुत तरह की समस्याएं पैदा नहीं होती। जबकि अपने देश में राजा के रूप में जो विधायक, सांसद या मंत्री हैं, उनमें से अधिकतर का चरित्र और आचरण कैसा है, यह बताने की जरूरत नहीं। जहां अपराधी और लुटेरे राजा बन जाते हों, वहां की प्रजा दुखी क्यों न होगी ? 

एक बात यह भी समझ में आयी कि बड़ी-बड़ी गाड़ियां, बड़े-बड़े मकान और आधुनिकता के तमाम साजो-सामान जोड़कर खुशी नहीं हासिल की जा सकती। जो खुशी एक किसान को अपना खेत जोतकर या अपने पशुओं की सेवा करके सहजता से प्राप्त होती है, उसका अंशभर भी उन लोगों को नहीं मिलता, जो अरबों-खरबों का व्यापार करते हैं और कृत्रिम जीवन जीते हैं। कुल मिलाकर माना जाए, तो सादा जीवन उच्च विचार और धर्म आधारित जीवन ही भूटान की पहचान है। जबकि यह सिद्धांत भारत के वैदिक ऋषियों ने प्रतिपादित किए थे, पर हम उन्हें भूल गए हैं। आज विकास की अंधी दौड़ में अपनी जल, जंगल, जमीन, हवा, पानी और खाद्यान्न सबको जहरीला बनाते जा रहे हैं। भूटान से हमें बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।

Monday, May 16, 2016

साम्यवादी निष्पक्ष चिंतन करें

क्षिप्रा नदी के तट पर सिंहस्थ कुंभ में दुनियाभर के आस्थावान लोगों का सागर उमड़ पड़ा है। इतने विशाल जनसमूह की आवश्यकताओं को देखते हुए मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने प्रशंसनीय व्यवस्थाएं की हैं, जिसके लिए वो बधाई की पात्र है। यहां आए सभी संतों को केंद्र सरकार से दो अपेक्षाएं हैं, एक तो यथाशीघ्र राम मंदिर का निर्माण हो और दूसरा गौ-हत्या प्रतिबंधित हो। दोनों ही मांगें सर्वथा उचित और चिरअपेक्षित हैं। पर अब तक केंद्र में ऐसी कोई सरकार नहीं रही, जो संवेदनशीलता से इन मांगों पर कुछ करती। पहली बार संतों को लग रहा है कि इरादे के पक्के और आस्थावान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रहते अगर यह काम नहीं हुआ, तो फिर भविष्य में न जाने कितने दिन टले। 

भारत के लोकतंत्र का यह दुर्भाग्य है कि यहां बहुमत सरकार लेकर भी नरेंद्र मोदी वह सब नहीं कर सकते, जो एक राजतंत्र में करना बहुत सरल होता है। राजा प्रजा की भावना को समझकर तुरंत निर्णय ले सकता है, लेकिन लोकतंत्र का चुना हुआ प्रधानमंत्री अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दबावों के तहत काम करता है। इसलिए कई बार चाहते हुए भी वो सब नहीं कर पाता, जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है। 

इन दोनों ही सवालों पर मेरा गत 30 वर्षों से पूरा समर्थन रहा है। पर मुझे लगता है कि ये मुद्दे राजनैतिक नहीं हैं। चुनावी भी नहीं हैं, क्योंकि जब इनको राजनीति से जोड़ा जाता है, तब ये और उलझ जाते हैं। ये बात सही है कि राम जन्मभूमि आंदोलन से भाजपा को भारत में बड़ा जनाधार मिला, लेकिन उसके बाद इस मुद्दे की राजनैतिक सार्थकता समाप्त हो गई। प्रमाण सामने है कि जब-जब इस मुद्दे को लेकर भाजपा ने राजनीति करनी चाही, तब-तब परिणाम अपेक्षित नहीं रहे। इसलिए चाहे उत्तर प्रदेश का भावी चुनाव हो या अन्य किसी राज्य में, इन मुद्दों को अगर चुनाव से हटकर भारत के सांस्कृतिक उत्थान के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाए, तो इनके सफल होने की ज्यादा संभावना है। 

देशी गाय की सार्थकता, उसका वैज्ञानिक महत्व, उससे किसान को आर्थिक लाभ और बिना किसी धर्म के भेद के हर किसी व्यक्ति को होने वाले स्वास्थ्य लाभ, कुछ ऐसे स्वयंसिद्ध तथ्य हैं, जिनके कारण देशी गाय की हत्या पर प्रतिबंध अविलंब लगना चाहिए। मुसलमान हों, कम्युनिस्ट हों या गैर-भाजपाई राजनैतिक दल हों, किसी को भी इस मुद्दे पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जो ऐसी राजनीति कर रहे हैं, वे या तो देशी गाय के इन गुणों से परिचित नहीं हैं या फिर परिचित होकर भी वे अपनी राजनीति के कारण गौहत्या प्रतिबंध को समर्थन नहीं देना चाहते। अगर यह वृत्ति है, तो मेरी दृष्टि में यह समाजद्रोह ही नहीं, देशद्रोह से कम नहीं है। मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अपने सहपाठी रहे कम्युनिस्ट नेता सीताराम येचुरी से एक प्रश्न पूछना चाहता हूं, क्या तुमने देशी गाय के मूत्र के रोगों में उपयोग पर कोई जानकारी हासिल की है ? क्या तुमने देशी गाय के गोबर की खाद की कृषि के लिए उपयोगिता पर उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों को देखा है ? क्या तुमने गोरस के फायदों को जाना है ? अगर नहीं, तो खुले दिमाग से जान लो। अगर जानते हो, तो फिर तुम किस मुंह से गौहत्या का समर्थन करते हो ? कम्युनिस्ट हों या मुसलमान, जब तक वे अपनी राजनीति और धर्मांधता के चलते इन तथ्यों से मुंह मोड़ते रहेंगे, तब तक भारत का बहुसंख्यक समाज दारिद्र में जीता रहेगा। क्योंकि भारत सोने की चिड़िया था, जब इन मूल्यों का समाज में सम्मान था। जब से हमने भारत के इस ऋषिजन्य ज्ञान को तिलांजलि देकर औपनिवेशिक शासकों का थोपा हुआ पश्चिमी ज्ञान और जीवनशैली को अपनाया है, तब से हमारा समाज गरीब, बीमार, दुखी और त्रस्त होता चला गया है। 

कार्ल माक्र्स की तरह अगर आपको सर्वहारा की चिंता है, तो सर्वहारा के हित में आप लोगों को चाहिए कि गौवंश आधारित जीवनशैली अपनाने का संदेश सर्वहारा को दें। कार्ल माक्र्स ने अपना सिद्धांत प्रतिपादित करने के लिए जवानी के दो दशक पुस्तकों के ढेर में बिता दिए। उन्हें भारत की इस सार्वभौमिक संस्कृति को जानने का समय ही नहीं मिला। अगर मिलता तो वे अपने ग्रंथ ‘कैपिटल’ में एक अध्याय लिखते कि, ‘दुनिया के मजदूरो  अगर सुख से जीना चाहते हो, तो भारत की देशी गाय को जीवन में अपना लो।’ 

रही बात राम मंदिर की, तो हमने पिछले 30 वर्षों में बार-बार में यह लिखा और बोला है कि काशी, मथुरा और अयोध्या में भगवान शिव, भगवान राम और भगवान कृष्ण के मंदिरों का निर्माण होने से मुसलमानों का अहित नहीं होगा, बल्कि लाभ ही होगा। क्योंकि 500 वर्ष पहले जो खाई हिंदू-मुसलमानों के बीच बन गई, वह इस एक कदम से पट जाएगी। तब मुसलमान और हिंदू एक साथ खड़े होकर अपना और देश का जीवनस्तर उठाने की तरफ आगे बढ़ेंगे। आज पूरे विश्व का मुसलमान समाज पश्चिम की दादागिरी से दुखी है और नाराज है। भारत की सनातन संस्कृति में आस्था रखने वाला हिंदू समाज भी पश्चिमी संस्कृति से आहत और नाराज है। इस तरह हम हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि हम दोनों संस्कृतियों की दुश्मन पश्चिमी संस्कृति है, जिसे अपने जीवन से जितनी जल्दी हो और जितना ज्यादा निकाल दिया जाए, हमारा समाज सुखी और संपन्न हो जाएगा। यह बात दोनों धर्मों के धर्माचार्यों को भी समझनी चाहिए। सिंहस्थ कुंभ में स्नान करने के बाद बड़े पवित्र मन से मैं यह याचना दोनों धर्मों के धर्माचार्यों से कर रहा हूं, आगे हरि इच्छा। 

Monday, February 29, 2016

पूरी शिक्षा पद्धति बदलनी चाहिए

    एक तरफ जेएनयू के वामपंथी छात्र वैचारिक स्वतंत्रता के नाम पर मां दुर्गा पर अश्लील टिप्पणियांे वाले पर्चे बांटकर भारत की पारंपरिक आस्थाओं पर आघात करना अपना धर्म समझते हैं। दूसरी तरफ देश की शिक्षा व्यवस्था में निरंतर आ रहे ऐसे पतन से चिंतित मौलिक विचारक और चिंतक इस पूरी शिक्षा व्यवस्था को ही भारत के लिए अभिशाप मानते हैं। क्योंकि पिछले साठ वर्षों में जो शिक्षा इस देश में दी जा रही है, वो अपने मूल उद्देश्य से ही भटक गई है। आजादी के बाद पिछले 70 वर्षों में किसी राजनैतिक दल ये नहीं कहा कि वे चरित्रवान, मूल्यवान, नैतिक युवाओं का निर्माण करेंगे। वे कहते रहे कि विकास करेंगे और नौकरी देंगे। नौकरी दे नहीं पाते और विकास का मतलब क्या है? कैसा विकास, जिसमे चरित्र का विकास ही न हो ऐसी शिक्षा किस काम की? पर इसकी कोई बात कभी नहीं करता। आज देश में ज्यादातर विश्वविद्यालयों में नकल करके या रट्टा लगाकर केवल डिग्रियां बटोरी जा रही है। नाकारा युवाओं की फौज तैयार की जा रही है। जो न खेत के मतलब के हैं और न शहर के मतलब के हैं।

    गत दिनों हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला में पुनरुत्थान विद्यापीठ के साझे प्रयास से देशभर के 500 से अधिक विद्वान अहमदाबाद में इकट्ठा हुए और शिक्षा व शोध की दिशा व दशा पर गहन चिंतन किया। इस सम्मेलन में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि शिक्षा में ऐसा बदलाव हो कि शिक्षा न सिर्फ लोगों को ज्ञानवान बनाये बल्कि चरित्रवान बनाये। उनकी कला उनके व्यक्तिव का विकास हो। उन्हें समाज के प्रति सम्वेदनशील बनाये और वे बिना किसी नौकरी की अपेक्षा के स्वावलम्भी हो कर भी जीवन जी सकें। समाज को दिशा दे सकें। समाज को सही रास्ते पर ले जा सकें। ऐसी शिक्षा का स्वरूप कैसा हो, इस बात पर गहन चिंतन हुआ। भारत में शिक्षा, राष्ट्र, संस्कृति, सभ्यता व धर्म कोई अलग-अलग विषय नहीं रहा। शिक्षा का मूल उद्देश्य आत्मबोध के लिए सुपात्र बनाना था। जो ब्रह्म विद्या का ही अंश था। जिसके लिए ऋषियों ने तप किया। ऐसे ज्ञान से मिली शिक्षा तप, आत्मबोध व राष्ट्र कल्याण की भावना से ओतप्रोत होती थी। आज की तरह केवल व्यवसाय पाने का और भौतिक सुख प्राप्त करने का कोई लक्ष्य ही नहीं था। पर आज शिक्षा को व्यवसाय बनाकर और रोजगार के लिए परिचय पत्र बनाकर हमने देश की कई पीढ़ियों को बर्बाद कर दिया।

    उधर हर वर्ग को समान शिक्षा की बात कर हमने भारत की सांस्कृतिक विरासत को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। एकलव्य का उदाहरण देकर भारत के इतिहास का मजाक उड़ाने वाले ये भूल जाते हैं कि जहां योग्य छात्रों को ऋषि परंपरा से शिक्षा मिलती थी, वहीं लोक जीवन में भी शिक्षा की समानांतर प्रक्रिया चलती रहती थी। रैदास, कबीर और नानक इस दूसरी परंपरा के शिक्षक थे, जो जूता गांठने, कपड़ा बुनने व खेती करने के साथ जीवन मूल्य की शिक्षा देते थे। आज दोनों ही परंपरा लुप्त हो गई।

जब तक राज्य, समाज और शिक्षा तीनों की तासीर एक जैसी नहीं होगी देश का उत्थान नहीं हो सकता। हम पूर्व और पश्चिम का समन्वय करके भारत के लिए उपयोगी शिक्षा पद्धति नहीं बना सकते। ये तो ऐसा होगा कि मानो बेर और केले के पेड़ को साथ-साथ लगाकर उनसे कहें कि आप दोनों आपसी प्रेम से रहो। ये कैसे संभव है ? बेर का पेड़ जब झूमेगा तो केले के पत्ते फाड़ेगा ही। कहां भोगवादी पश्चिमी शिक्षा और कहां आत्मबोध वाली तपनिष्ठ भारतीय शिक्षा।

    वैसे भी शिक्षा के स्वरूप को लेकर भारत से ज्यादा संकट आज पश्चिम में है। पश्चिम भौतिकता की दौड़ में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचकर दिशाहीन हो गया है। इसलिए पश्चिम के विद्वान विज्ञान से ज्ञान की ओर व भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर रूख कर रहे हैं। जबकि हम अपनी ज्ञान की परंपरा छोड़कर विज्ञान के मोह में दौड़ रहे हैं। इस दौड़ में अब तक तो हम विफल रहे हैं। न तो हमने पश्चिम जैसी भौतिक उन्नति प्राप्त की, न प्राप्त करने की संभावना हैं और न उस्से समाज से सुखी होने वाला है। इस शिक्षा से हम सामथ्र्यवान पीढ़ी का निर्माण भी नहीं कर पाए। पूरी शिक्षा हमारे समाज पर अभिशाप बनकर रह गई है। एक ही उदाहरण काफी होगा। आजतक देश में कितने अरब रूपये पीएचडी के नाम खर्च किए गए ? पर इस तथाकथित शोध से देश की कितनी समस्याओं का हल हुआ ? उत्तर होगा नगण्य। यानि शोध के नाम पर ढकोसला हो रहा है या पश्चिम के शोध को नाम बदलकर पेश किया जा रहा है।

    आजकल अखबार इन खबरों से भरे पड़े हैं कि हर परीक्षा केंद्र में ठेके पर नकल कराई जा रही है। प्रांतों की छोड़ो राजधानी दिल्ली के कालेजों तक में कक्षा में पढ़ाई नहीं होती। छात्र दाखिला लेने और फिर परीक्षा देने आते हैं। ऐसी शिक्षा को देश का करदाता कब तक और क्यों ढ़ोए ? इसलिए इस पूरी शिक्षा व्यवस्था के अमूल-चूल परिवर्तन का समय आ गया है। शिक्षा के उद्देश्य, उसकी सार्थकता, उसकी समाज के प्रति उपयोगिता व उसमें वर्तमान समस्याओं के समाधान की क्षमता पर स्पष्ट दृष्टि की जरूरत है। जिसके लिए देश में आज पर्याप्त योग्य चिंतक और अनुभवी शिक्षा शास्त्री मौजूद हैं। जिन्होंने अपने स्तर पर देशभर में गत दशकों में नूतन प्रयोग करके सार्थक समाधान खोजे हैं। आवश्यकता है राजनैतिक इच्छाशक्ति की और क्रांतिकारी सोच के लिए हिम्मत की। एक तरफ तो यह कार्य मानव संसाधन मंत्रालय को करना है। बिना इस बात की परवाह किए उस पर भगवाकरण का आरोप लगेगा। दूसरी तरफ यह कार्य उन लोगों को करना है, जो शिक्षा में बदलाव की बात करते हैं, पर औपनिवेशिक्षक सोच के दायरे से बाहर नहीं निकल पाते।

    उधर आजकल बाबा रामदेव पूरे देश में एक हजार स्कूल आचार्य कुल के नाम से स्थापित करने की तैयारी में है। उनमें जैसी ऊर्जा व जीवटता है, वे ये करके भी दिखा देंगे। पर क्या उस शिक्षा से भारत का आध्यात्मिक और नैतिक उत्थान हो पाएगा ? कहीं ऐसा तो नहीं कि जैसे गोरे साहब की जगह काले साहब आ गये, वैसे ही अंग्रेजी शिक्षा की जगह गुरूकुल शिक्षा के नाम पर खानापूर्ति होकर रह जाए। क्योंकि भारत की शिक्षा पद्धति में मुनाफे का कोई खाना हो ही नहीं सकता। यह सोचना गलत है कि बिना मुनाफे की शिक्षा का माॅडल संभव नहीं है। संभव है अगर शिक्षा में गुणवत्ता है। केवल जोखिम उठाने के लिए आत्मविश्वास की जरूरत है।

Monday, December 14, 2015

गोडसे ने नहीं की महात्मा गांधी की हत्या

 दुनिया यही मानती है कि नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या की। पर भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि आत्मा अजर अमर है। इसे शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती। इस दृष्टि से महात्मा गांधी की आत्मा भी अजर अमर है। असली हत्या तो उनके विचारों की की गई और ये काम आजादी मिलते ही शुरू हो गया।
 
 जिस अखबार में आप यह लेख पढ़ रहे हैं, वो अखबार आपकी मात्र भाषा का है। अगर ये अंग्रेजी में होता तो क्या आप इसे पढ़ते ? भारत के कितने लोग अंग्रेजी लिख-पढ़ सकते हैं। पर विड़बना देखिए कि हमारी शिक्षा से लेकर न्याय पालिका तक, प्रशासन से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं तक सब ओर अंग्रेजी का बोलबाला है। जबकि इस भाषा को समझने वाले देश में 2 फीसदी लोग भी नहीं हैं और यही 2 फीसदी लोग भारत के संसाधनों पर सबसे ज्यादा कब्जा जमाकर बैठे हैं, सबसे ज्यादा मौज भी इन्हीं को मिल रही है। शेष भारतवासियों का हक छीनकर ये पनप रहे हैं। पर आम भारतवासियों की आवाज इनके कानों तक नहीं पहुंचती। उनका दर्द इनके सीने में नहीं उठता। इन्हंे तो हर वक्त अपनी और अपने कुनबे की तरक्की की चिंता रहती है और हर तिगड़म लगाकर ये विकास का सारा फल हजम कर जाते हैं। इसका एक मात्र कारण यह है कि हमने गांधीजी के विचारों की हत्या कर दी। वे नहीं चाहते थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद अंग्रेजी एक दिन भी हिंदुस्तानियों पर हावी हो, क्योंकि वे इसे गुलाम बनाने की भाषा मानते थे।
 
 इस लेख में आगे कुछ और बताने से ज्यादा जरूरी होगा कि हम जानें कि मातृभाषा के लिए और अंग्रेजी के विरूद्ध गांधीजी के क्या विचार थे और फिर देखें कि क्या आज उनकी भविष्यवाणी सच साबित हो रही है ? अगर हां तो फिर उस गलती को दूर करने की तरफ सोचना होगा।
 
अंग्रेजी शिक्षा के खिलाफ गांधीजी ने कहा, ‘‘करोड़ों लोगों को अंग्रेजी शिक्षण देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने जिस शिक्षण की नींव डाली, वह सचमुच गुलामी की नींव थी। ....अंग्रेजी शिक्षण स्वीकार करके हमने जनता को गुलाम बनाया है। अंग्रेजी शिक्षण से दंभ, द्वेष, अत्याचार आदि बड़े हैं। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों ने जनता को ठगने और परेशान करने में कोई कसर नहीं रखी। भारत को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी जानने वाले लोग ही हैं।’’ वे आगे कहते हैं कि “यदि मैं तानाशाह होता तो आज ही विदेशी भाषा में शिक्षा देना बंद कर देता। सारे अध्यापकों को स्वदेशी भाषाएं अपनाने को मजबूर कर देता। जो आनाकानी करते उन्हें बर्खास्त कर देता।”
 
भागलपुर शहर में छात्रों के एक सम्मेलन में भाषण करते हुए उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है ‘‘मातृभाषा का अनादर मां के अनादर के बराबर है। जो मातृभाषा का अपमान करता है, वह स्वदेश भक्त कहलाने लायक नहीं है। बहुत से लोग ऐसा कहते सुने जाते हैं कि ‘हमारी भाषा में ऐसे शब्द नहीं जिनमें हमारे ऊंचे विचार प्रकट किये जा सकें। किन्तु यह कोई भाषा का दोष नहीं। भाषा को बनाना और बढ़ाना हमारा अपना ही कर्तव्य है। एक समय ऐसा था जब अंग्रेजी भाषा की भी यही हालत थी। अंग्रेजी का विकास इसलिए हुआ कि अंग्रेज आगे बढ़े और उन्होंने भाषा की उन्नति की। यदि हम मातृभाषा की उन्नति नहीं कर सके और हमारा यह सिद्धान्त रहे कि अंग्रेजी के जरिये ही हम अपने ऊँचे विचार प्रकट कर सकते हैं और उनका विकास कर सकते हैं, तो इसमें जरा भी शक नहीं कि हम सदा के लिए गुलाम बने रहेंगे। जब तक हमारी मातृभाषा में हमारे सारे विचार प्रकट करने की शक्ति नहीं आ जाती और जब तक वैज्ञानिक विषय मातृभाषा में नहीं समझाये जा सकते, तब तक राष्ट्र को नया ज्ञान नहीं मिल सकेगा।’’
 
एक अवसर पर गांधीजी ने विदेशी भाषा द्वारा दी जाने वाली शिक्षा से होने वाली हानियों का उल्लेख करते हुए कहा है ‘‘माँ के दूध के साथ जो संस्कार और मीठे शब्द मिलते हैं, उनके और पाठशाला के बीच जो मेल होना चाहिए, वह विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने में टूट जाता है। इसके अतिरिक्त विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा देने से अन्य हानियां भी होती है। शिक्षित वर्ग और सामान्य जनता के बीच में अन्तर पड़ गया है। हम जनसाधरण को नहीं पहचानते, जनसाधरण हमें नहीं जानता। वे हमें साहब समझते हैं और हमसे डरते हैं। यदि यही स्थिति अधिक समय तक रही तो एक दिन लार्ड कर्जन का यह आरोप सही हो जाएगा कि शिक्षित वर्ग जनसाधारण का प्रतिनिधि नहीं है।’’
 
उन्होंने यह भी कहा कि, “मुझे लगता है कि जब हमारी संसद बनेगी तब हमें फौजदारी कानून में एक धारा जुड़वाने का आन्दोलन करना पड़ेगा। यदि दो व्यक्ति भारत की एक भाषा जानते हों और इस पर भी उनमें से कोई दूसरे को अंग्रेजी में पत्र लिखे या एक-दुसरे से अंग्रेजी में बोले तो उसे कम से कम छः महीने की सख्त सजा दी जायेगी।’’
 
साफ जाहिर है कि गांधीजी को भारत की असलियत की गहरी समझ थी। वे जानते थे कि अगर भारत में आर्थिक विकास और शिक्षा का काम गांवों की बहुसंख्यक आबादी को केंद्र में रखकर किया जाए, तभी भारत का सही विकास हो पाएगा। अन्यथा चंद लोग तो मजे करेंगे और बहुसंख्यक आबादी बर्बाद होगी। यही आज हो रहा है। असहिष्णुता हिंदू और मुसलमान के बीच में नहीं, बल्कि 2 फीसदी अंग्रेजीदां वर्ग और 98 फीसदी आम हिंदुस्तानी के बीच है। जिसे दूर करने के लिए अपनी भाषा नीति को बदलना होगा। क्या संसद इस पर विचार करेगी ?

Monday, August 18, 2014

आयुर्वेद से ही होगी स्वास्थ्य की क्रांति

आज मेडीकल साइंस ने चिकित्सा और स्वास्थ्य की दुनिया में बेशक पैर पसार लिए हों, लेकिन मेडीकल साइंस के विस्तार के बाद से लोग और अधिक बीमार पड़ने लगे हैं। इस बात को हमें नहीं भूलना चाहिए। भारत की अपनी पारंपरिक आयुर्वेद शास्त्र की पद्धति खत्म सी ही हो गई। ऐसे में मोदी सरकार ने एक बार फिर हमें आयुर्वेद पद्धति की ओर बढ़ने को प्रेरित किया है। वैसे निजीस्तर पर गांव से लेकर देश के स्तर तक अनेक वैद्यों ने बिना सरकारी संरक्षण के आयुर्वेद को आजतक जीवित रखा। इसी श्रृंखला में एक युवा वैद्य आचार्य बालकृष्ण ने तो अपनी मेधा शक्ति से आयुर्वेद का एक अंतराष्ट्रीय तंत्र खड़ा कर दिया है। भारत के तो हर गांव, कस्बे व शहर में आपको पतंजलि योग पीठ के आयुर्वेद केंद्र मिल जाएंगे। कुछ लोग इसकी निंदा भी करते हैं। उन्हें लगता है कि इस तरह पारंपरिक ज्ञान का व्यवसायिककरण करना ठीक नहीं है। पर यथार्थ यह है कि राजाश्रय के अभाव में हमारी वैदिक परंपराएं लुप्त न हों, इसलिए ऐसे आधुनिक प्रयोग करना बाध्यता हो जाती है। आज आचार्य बालकृष्ण न सिर्फ आयुर्वेद का औषधियों के रूप में विस्तार कर रहे हैं, बल्कि ऋषियों की इस ज्ञान परंपरा को सरल शब्दों में पुस्तकों में आबद्ध कर उन्होंने समाज की बड़ी सेवा की है।

हाल ही में उनकी एक पुस्तक ‘आयुर्वेद सिद्धांत रहस्य’ नाम से प्रकाशित हुई है। पुस्तक के प्राक्कथन में उन्होंने लिखा है कि ‘‘भारतीय संस्कृति में मनुष्य जीवन का सर्वोपरि उद्देश्य चार पुरुषार्थ-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति कर आत्मोन्नति करना और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर प्रभु से मिलना है। इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि व उपलब्धि का वास्तविक साधन और आधार है - पूर्ण रूप से स्वस्थ शरीर,  क्योंकि ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ के अनुसार धर्म का पालन करने का साधन स्वस्थ शरीर ही है। शरीर स्वस्थ और निरोग हो तभी व्यक्ति दिनचर्या का पालन विधिवत् कर सकता है, दैनिक कार्य और श्रम कर सकता है, किसी सुख-साधन का उपभोग कर सकता है, कोई उद्यम या उद्योग करके धनोपार्जन कर सकता है, अपने परिवार, समाज और राष्ट्र की सेवा कर सकता है, आत्मकल्याण के लिए साधना और ईश्वर की आराधना कर सकता है। इसीलिए जो सात सुख बतलाए गए हैं, उनमें पहला सुख निरोगी काया-यानी स्वस्थ शरीर होना कहा गया है।’’

अगर हम इस बात से सहमत हैं, तो  हमारे लिए यह पुस्तक एक ‘हेल्थ इनसाइक्लोपीडिया’ की तरह उपयोगी हो सकती है। इसमें आचार्यजी ने आयुर्वेद का परिचय, आयुर्वेद के सिद्धांत, मानव शरीर की संरचना और उसमें स्थित शक्तियों का वर्णन बड़े सरल शब्दों में किया है। जिसे एक आम पाठक  भी पढ़कर समझ सकता है। आयुर्वेद के अनुसार द्रव्य कौन से हैं और उनका हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ? ऋतुचक्र क्या है और ऋतुओं के अनुसार हमारी दिनचर्या कैसी होनी चाहिए, इसका भी बहुत रोचक वर्णन है। आज हम 12 महीने एक सा भोजन खाकर अपने शरीर का  नाश कर रहे हैं। जबकि भारत षड ऋतुओं का देश है और यहां हर ऋतु के अनुकूल भोजन की एक वैज्ञानिक व्यवस्था पूर्व निर्धारित है।

भोजन कैसा लें, कितना लें और क्यों लें ? इसकी समझ देश के आधुनिक डॉक्टरों को भी प्रायः नहीं होती। आपको कुशल डॉक्टर रोगी मिलेंगे। ‘आयुर्वेद सिद्धांत रहस्य’ पुस्तक में भोजन संबंधी जानकारी बड़े विस्तार से दी गई है। इसके साथ ही जल, दूध, घी, मक्खन, तेल, शहद आदि का भी प्रयोग विवेकपूर्ण तरीके  से कैसे किया जाए, इस पर विवेचना की  गई है। भारत के लोगों में पाए जाने वाले मुख्य सभी रोगों का वर्गीकरण कर उनके कारणों पर इस पुस्तक में बड़ा सुंदर प्रकाश डाला गया है। इस सबके बावजूद भी अगर हम बीमार पड़ते हैं, तो चिकित्सा कैसी हो, इसका वर्णन अंतिम अध्यायों में किया गया है। आयुर्वेद को लेकर  यूं तो देश में एक से एक सारगर्भित ग्रंथ प्रकाशित होते रहे हैं और आगे भी होंगे। पर बाबा रामदेव के स्नेही एक युवा वैद्य ने जड़ी-बूटियों को हिमालय और देश में खोजने और आयुर्वेद को घर-घर पहुंचाने का छोटी-सी उम्र में जो एतिहासिक प्रयास किया है, उसे भविष्य में भी सराहा जाएगा।