Showing posts with label BJP Congress Corruption. Show all posts
Showing posts with label BJP Congress Corruption. Show all posts

Monday, January 15, 2018

सर्वोच्च न्यायालय में तूफान: तस्वीर का दूसरा पक्ष


सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में पहली बार 4 वरिष्ठतम् न्यायाधीशों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश की कार्य प्रणाली पर संवाददाता सम्मेलन कर न्यायपालिका में हलचल मचा दी। उनका मुख्य आरोप है कि राजनैतिक रूप से संवेदनशील मामलों में उनकी वरिष्ठता को नजरअंदाज कर, मनचाहे तरीके से केसों का आवंटन किया जा रहा है। इस अभूतपूर्व घटना पर देश की न्याय व्यवस्था से जुड़े लोग, राजनैतिक दल और मीडिया अलग-अलग खेमो में बटे हैं। भारत सरकार ने तो इसे न्यायपालिका का अंदरूनी मामला बताकर पल्ला झाड़ लिया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस पर टिप्पणी की है। उधर सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता इस पर खुली बहस की मांग कर रहे है। जबकि उक्त चार न्यायाधीशों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश पर महाअभियोग चलाने की मांग की है।

जाहिर है कि बिना तिल के ताड़ बनेगा नहीं। कुछ तो ऐसा है , जिसने इन न्यायाधीशों को 70 साल की परंपरा को तोड़कर इतना क्रांतिकारी कदम उठाने के लिए प्रेरित किया। चूंकि हमारी न्याय व्यवस्था में सबकुछ प्रमाण पर आधारित होता है। इसलिए इन न्यायाधीशों के मुख्य न्यायाधीश पर लगाये गये आरोपों की ‘सुप्रीम कोर्ट बार काउंसिल’ को निष्पक्षता से जांच करनी चाहिए। अगर यह सिद्ध हो जाता है कि उनसे जाने-अंजाने कुछ ऐसी गलती हुई है, जो सर्वोच्च न्यायालय की स्थापित परंपराओं और मर्यादा के विरूद्ध है, तो मुख्य न्यायाधीश को बिना प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए, उसका सुधार कर लेना चाहिए।

पर इस तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर मर्यादा के विरूद्ध आचरण करने का यह पहला मौका नहीं है। सन् 2000 में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डा. ए.एस. आनंद के 6 जमीन घोटाले मयसबूत मैंने ‘कालचक्र’ अखबार में प्रकाशित किये थे। उन दिनों भी केंद्र में राजग की सरकार थी। पर सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश ने, किसी राजनैतिक दल के नेता ने और दो-तीन को छोड़कर किसी वकील ने डा. आनंद से सफाई नहीं मांगी। बल्कि अभिषेक सिंघवी व कपिल सिब्बल जैसे वकीलों ने तो टीवी चैनलों पर डा. आनंद का बचाव किया। मजबूरन मैंने भारत के राष्ट्रपति डा. के.आर नारायणन से मामले की जांच करने की अपील की। उन्होंने इसे तत्कालीन कानून मंत्री राम जेठमलानी को सौंप दिया। जब कानून मंत्री ने मुख्य न्यायाधीश से स्पष्टीकरण मांगा, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने जेठमलानी से स्तीफा मांग लिया और उनकी जगह अरूण जेटली को देश का नया कानून मंत्री नियुक्त किया। जेटली ने भी इस मामले में डा. आनंद का ही साथ दिया। क्या अपने पद का दुरूपयोग कर जमीन घोटाले करने वाले मुख्य न्यायाधीश डा. आनंद को यह नैतिक अधिकार था कि वे दूसरों के आचरण पर फैसला करे? क्या उनके ऐसे आचरण से सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा कम नहीं हुई?

इससे पहले जुलाई 1997 में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने भरी अदालत में यह कहकर देश हिला दिया था कि उन पर हवाला कांड को रफा-दफा करने के लिए भारी दबाव है और आरोपियों की तरफ से एक ‘जेंटलमैन’ उनसे बार-बार मिलकर दबाव डाल रहा है। पर न्यायमूर्ति वर्मा ने सर्वोच्च अदालत की इतनी बड़ी अवमानना करने वाले अपराधी का न तो नाम बताया, न उसे सजा दी। जबकि बार काउंसिल, मीडिया और सांसदों ने उनसे ऐसा करने की बार-बार मांग की। चूंकि मुझे इसका पता चल चुका था कि न्यायमूर्ति वर्मा और न्यायमूर्ति एस.सी. सेन, हवाला कांड के आरोपियों से गोपनीय रूप से मिल रहे थे। इसलिए मैंने सीधा पत्र लिखकर सर्वोच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीशों से इस मामले में कार्यवाही करने की मांग की। पर कोई नहीं बोला। उपरोक्त दोनों ही मामलों में अनैतिक आचरण करने वाले ये दोनों मुख्य न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने के बाद भारत के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष बना दिये गये। चूंकि ये नियुक्तियां सत्त पक्ष और विपक्ष की सहमति से होती हैं, इसलिए यह और भी चिंता की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय का कोई भी न्यायाधीश या विभिन्न राजनैतिक दलों के नेता सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा पर लगे इस कलंक को धोने सामने नहीं आये।

इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रामास्वामी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उनके खिलाफ संसद में महाअभियोग प्रस्ताव लाया गया। पर कांग्रेस के सांसदों ने सदन से बाहर जाकर महाअभियोग प्रस्ताव को गिरवा दिया और रामास्वामी को बचा लिया। मौजूदा घटनाक्रम के संदर्भ में ये तीनों उदाहरण बहुत सार्थक है। अगर सर्वोच्च न्यायालय के इन चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने मौजूदा मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाअभियोग चलाने का प्रस्ताव रखा है, तो उन्हें यह भी बताना चाहिए के उपरोक्त दो मामलों में, जो चुप्पी साधी गई, उसके लिए जिम्मेदार लोगों को दोषी ठहराने के लिए, ये चारो न्यायाधीश, कानून के दायरे में, क्या पहल करने को तैयार हैं? अगर वे इसे पुराना मामला कहकर टालते हैं, तो उन्हें ये मालूम ही होगा कि आपराधिक मामले कभी भी खोले जा सकते हैं। यह बात दूसरी है कि श्री वर्मा और डा. आनंद, दोनों ही अब शरीर त्याग चुके हैं। पर जिन जिम्मेदार लोगों ने उनके अवैध कारनामों पर चुप्पी साधी या उन्हें बचाया, वे अभी भी मौजूद हैं। सर्वोच्च न्यायपालिका में सुधार के लिए मैं 1997 से जोखिम उठाकर लड़ता रहा हूं। क्या उम्मीद करूं कि सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को लेकर, जो चिंता आज व्यक्त की गई है, उसे बिना पक्षपात के हर उस न्यायाधीश पर लागू किया जायेगा, जिसका आचरण अनैतिक रहा है? जिससे देश की जनता को यह आश्वासन मिल सके कि उसके आचरण पर फैसला देने वाला न्यायाधीश अनैतिक नहीं है।

Monday, December 25, 2017

मोदी जी उत्तर प्रदेश को संभालें

भाजपा के शिखर नेतृत्व के मन में गत तीन महीनों में यह प्रश्न कई बार आया होगा कि गुजरात के चुनाव में इतनी मश्शकत क्यों करनी पड़ी? विपक्ष ने गुजरात मॉडल को लेकर बार-बार पूछा कि इस चुनाव में इसकी बात क्यों नहीं हो रही? विपक्ष का व्यंग था कि जिस गुजरात मॉडल को मोदी जी ने पूरे देश में प्रचारित कर केंद्र की सत्ता हासिल की, उस मॉडल का गुजरात में ही जिक्र करने से भाजपा क्यों बचती रही? क्या उस मॉडल में कुछ खोट है? क्या उस मॉडल को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया? क्या उस मॉडल का गुजरात की आम जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा? वजह जो भी रही हो भाजपा अध्यक्ष व प्रधानमंत्री को काफी पसीना बहाना पड़ा गुजरात का चुनाव जीतने के लिए। एक और फर्क ये था कि पहले चुनावों में मोदी जी के नाम पर ही वोट मिल जाया करते थे, लेकिन इस बार केंद्र के अनेक मंत्रियों, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, प्रांतों के मंत्रियों और पूरे देश के संघ के कार्यकर्ताओं को लगना पड़ा गुजरात की जनता को राजी करने के लिए, कि वे एक बार फिर भाजपा को सत्ता सौंप दें।
इन स्टार प्रचारकों में सबसे ज्यादा आकर्षक नाम रहा, उ.प्र. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का। जिनके केसरिया बाने और प्रखर संभाषणों ने गुजरात के लोगों को आकर्षित किया। अब चर्चा है कि भाजपा लोकसभा के चुनाव में योगी जी का भरपूर उपयोग करेगी। पर इस सब के बीच मेरी चिंता का विषय उ.प्र. का विकास है।

उ.प्र. में जो तरीका इस वक्त शासन का चल रहा है, उससे कुछ भी ऐसा नजर नहीं आ रहा कि बुनियादी बदलाव आया हो। लोग कहते है कि सुश्री मायावती के शासनकाल में नौकरशाही सबसे अनुशासित रही। अखिलेश यादव  को लोग एक सद्इच्छा रखने वाला ऊर्जावान युवा मानते हैं, जिन्होंने उ.प्र. के विकास के लिए बहुत योजनाऐं चालू की और कुछ को पूरा भी किया। लेकिन पारिवारिक अंतर्कलह और राजनीति पर परिवार के प्रभाव ने उन्हें काफी पीछे धकेल दिया। योगी जी का न तो कई परिवार है और न ही उन्हें आर्थिक असुरक्षा। एक बड़े सम्प्रदाय के महंत होने के नाते उनके पास वैभव की कमी नहीं है। इसलिए यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे अपना शासन पूरी ईमानदारी व निष्ठा से करेंगे। लेकिन केवल निष्ठा और ईमानदारी से लोगों की समस्याऐं हल नहीं होती। उसके लिए प्रशासनिक सूझ-बूझ, योग्य, पारदर्शी और सामथ्र्यवान लोगों की बड़ी टीम चाहिए। जिसे अलग-अलग क्षेत्रों का दायित्व सौंप सकें।

क्रियान्वन पर कड़ी नजर रखनी होती है। जनता से फीडबैक लेने का सीधा मैकेनिज्म होना चाहिए। जिनका आज उ.प्र. शासन में नितांत अभाव है। श्री नरेन्द्र मोदी और श्री अमित शाह को उ.प्र. के विकास पर अभी से ध्यान देना होगा। केवल रैलियां, नारे व आक्रामक प्रचार शैली से चुनाव तो जीता जा सकता है, लेकिन दिल नहीं। उ.प्र. की जनता का यदि दिल जीतना है, तो समस्याओं की जड़ में जाना होगा। लोग किसी भी सरकार से बहुत अपेक्षा नहीं रखते। वे चाहते हैं कि बिजली, सड़के, कानून व्यवस्था ठीक रहे, पेयजल की आपूर्ति हो, सफाई ठीक रहे और लोगों को व्यापार करने करने की छूट हो । किसानों को सिंचाई के लिए जल और फसल का  वाजिव दाम मिले, तो प्रदेश संभल जाता है।

इतना बड़ा सरकारी अमला, छोटे-छोटे अधिकारी के पास गाड़ी, मकान, तन्ख्वाह व पेंशन। फिर भी  रिश्वत का मोह नहीं छूटता। आज कौन सा महकमा है उ.प्र. में जहां काम कराने में नीचे से ऊपर रिश्वत या कमीशन नही चल रहा? और कब नहीं चला? यदि पहले भी चला और आज भी चल रहा है, तो फिर योगी जी के आने का क्या अंतर पड़ा? मोदी जी की इस बात का क्या प्रभाव पड़ा कि ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा’?  मैं बार बार अपने लेखों के माध्यम से कहता आया हूं कि दो तरह का भ्रष्टाचार होता है। एक क्रियान्वन का और दूसरा योजना का। क्रियान्वन का भ्रष्टाचार व्यापक है, कोई भी इंजीनियरिंग विभाग ऐसा नहीं है, जो बिना कमीशन के काम करवाये या बिल पास करे। लेकिन इससे बड़ा भ्रष्टाचार यह होता है कि योजना बनाने में ही आप एक ऐसा खेल खेल जाऐं कि जनता को पता ही न चले और सैंकड़ों करोड़ के वारे-न्यारे हो जाऐं।

मुझे तकलीफ के साथ मोदी जी, योगी जी और अमित शाह जी को कहना है कि  आज उ.प्र. में सीमित साधनों के बीच जो कुछ भी योजनाऐ बन रही है, उनमें पारदर्शिता, सार्थकता और उपयोगिता का नितांत अभाव है। कारण स्पष्ट है कि योजना बनाने वाले वही लोग हैं, जो पिछले 70 साल से योजना बनाने के लिए ही योजना बनाते आऐ हैं। केवल मोटी फीस लेने के लिए योजनाऐं बनाते हैं। बात बार-बार हुई कि जमीन से विकास की परिकल्पना आऐ।  लोगों की भागीदारी हो। गांव और ब्लॉक स्तर पर समझ विकसित की जाए। योजना आयोग का भी नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया गया। लेकिन इसका असर लोगों को जमीन पर नहीं दिखाई दे रहा। फिर भी देश की जनता यह मानती है कि साम्प्रायिकता, पाकिस्तान, चीन और कई ऐसे बड़े सवाल हैं, जिन पर निर्णय लेने के लिए एक सशक्त नेतृत्व की जरूरत है और वो नेतृत्व नरेन्द्र मोदी दे रहे हैं। उन्होंने अपनी छवि भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी बनाई है, जहां इंदिरा गांधी के बाद उन्हीं को सबसे ज्यादा सुना और समझा जा रहा है। परिणाम अभी आने बाकी है। फिर भी उ.प्र. के स्तर पर यदि ठोस काम करना है, तो समस्याओं के हल करने की नीति और योजनाओं को भी ठोस धरातल से जुड़ा होना होगा।

समस्याओं के हल उन लोगों के पास है, जिन्होंने उन समस्याओं को ईमानदारी से हल करने की कोशिश की है। कोशिश ही नहीं की, बिना सरकारी मदद के सफल होकर दिखाया है। क्या कोई भी प्रांत या कोई भी सरकार ऐसे लोगों को बुला कर उनको सुनने को तैयार है ? अगर नही तो फिर वही रहेंगे  ‘ढाक के तीन पात’। उ.प्र. में आने वाला लोकसभा चुनाव तो मोदी जी जीत जाऐंगे। लेकिन उसके लिए गुजरात से कहीं ज्यादा मश्शकत करनी पड़ेगी। अगर अभी से स्थितयां सुधरने लगे, त्वरित परिणाम दिखने लगे तो जनता भी साथ होगी और काम भी साथ होगा। फिर बिना किसी बड़े संघर्ष से वांछित फल प्राप्त किया जा सकता है।

Monday, December 18, 2017

चलो कांग्रेस को समझ में तो आया

        गुजरात चुनाव के फैसले जो भी हो, एक बात स्पष्ट है कि आजादी के बाद, ये पहली बार है कि कांग्रेस को यह बात समझ में आई कि हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किये बिना बहुसंख्यक हिंदू समाज में उसकी स्वीकार्यता नहीं हो सकती। यही कारण है कि राहुल गांधी ने इस बार अपने चुनाव अभियान में गुजरात के हर मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन किये। हम प्रभु से ये प्रार्थना करेंगे कि वे कांग्रेस के युवा अध्यक्ष और पूरे दल पर कृपा करें व उन्हें सद्बुद्धि दें कि वे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर साम्प्रदयिकता का दामन छोड़ दें।

आजादी के बाद आज तक कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों ने अल्पसंख्यकों को जरूरत से ज्यादा महत्व देकर हिंदुओं के मन में एक दरार पैदा की है। मैं यह नहीं कहता कि कांग्रेस ने हिंदूओं का ध्यान नहीं रखा। मेरा तो मानना है कि पिछले 70 वर्षों में हिंदू धर्मस्थलों के जीर्णोंद्धार और राम जन्मभूमि जैसे हिंदुओं के बहुत से कामों में कांग्रेस ने भी बहुत अच्छी पहल की है। लेकिन जहां तक सार्वजनिक रूप से हिंदूत्व को स्वीकारने की बात है, कांग्रेस और इसके नेता हमेशा इससे बचते रहे हैं। जबकि अल्पसंख्यकों के लिए वे बहुत उत्साह से सामने आते रहे, चाहे वो इफ्तार की दावत आयोजित करना हो, चाहे हज की सब्सिडी की बात हो, चाहे ईद में जाली की टोपी पहनकर अपना मुस्लिम प्रेम प्रदर्शित करना हो। जो भी क्रियाकलाप रहे, उससे ऐसा लगा, जैसे कि मुसलमान कांग्रेस पार्टी के दामाद हैं।

अब जबकि गुजरात में उनके अध्यक्ष ने खुद भारत में हिंदू धर्म के महत्व को समझा है और मंदिर-मंदिर जाकर व संतो से आर्शीवाद लिया है, तो गुजरात के चुनाव परिणामों से कांग्रेस में ये मंथन होना चाहिए कि आगे की राजनीति में वे सभी धर्मों के प्रति सम्भाव रखें। सम्भाव रखने का ये मतलब नहीं कि बहुसंख्यकों की भावनाओं की उपेक्षा की जाए और उन्हें दबाया जाऐ या उनको सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने से बचा जाऐ। उल्टा होना ये चाहिए की अब भविष्य में प्रायश्चित के रूप में सार्वजनिक मंचों से कांग्रेस को अपनी पुरानी गलती की भरपाई करनी चाहिए।

गुजरात में अपने अनुभव को दोहराते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और विपक्षी दल के नेताओं को भी हिंदू धर्म के त्यौहारों में उत्साह से भाग लेना चाहिए और दिवाली और नवरात्रि जैसे उत्सवों पर भोज आयोजित कर हिंदुओं के प्रति अपने सम्मान को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना चाहिए। इसमें नया कुछ भी नहीं होगा। मध्ययुग से भारत में यह परंपरा रही है कि हिंदू राजाओं ने मुसलमानों के तीज त्यौहारों पर और मुलमान बादशाहों ने हिंदुओं के तीज त्यौहारों पर खुलकर हिस्सा लिया है। सर्वधर्म सम्भाव का भी यही अर्थ होता है।

दूसरी तरफ मुसलमानों के नेताओं को भी सोचना चाहिए कि उनके आचरण में क्या कमी है। एक तरफ तो वे भाजपा को साम्प्रदायिक कहते हैं और दूसरी तरफ अपने समाज को संविधान की भावना के विरूद्ध पारंपरिक कानूनों से नियंत्रित कर उन्हें मुख्यधारा में आने से रोकते हैं। इस वजह से हिंदू और मुसलमानों के बीच हमेशा खाई बनी रहती है। जब तक मुसलमान नेता अपने समाज को मुख्यधारा से नहीं जोड़ेगे, तब तक साम्प्रदायकिता खत्म नहीं होगी।

राहुल गांधी ने अपने पहले अध्यक्षीय भाषण में दावा किया है कि वे समाज को जोड़ने का काम करेंगे, तोड़ने का नहीं। अगर राहुल गांधी और उनका दल वास्तव में इसका प्रयास करता है और सभी धर्मों के लोगों के प्रति समान व्यव्हार करते हुए, सम्मान प्रदर्शित करता है, तो इसके दूरगामी परिणाम आयेंगे। भारतीय समाज में सभी धर्म इतने घुलमिल गये हैं कि किसी एक का आधिपत्य दूसरे पर नहीं हो सकता। लेकिन यह भी सही है कि जब तक बहुसंख्यक हिंदू समाज को यह विश्वास नहीं होगा कि कांगे्रस और विपक्षी दल अल्पसंख्यकों के मोह से मुक्त नहीं हो गये हैं, तब तक विपक्ष मजबूत नहीं हो पायेगा। वैसे भी धर्म और संस्कृति का मामला समाज के विवेक पर छोड़ देना चाहिए और सरकार का ध्यान कानून व्यवस्था, रोजगार सृजन और आधारभूत ढ़ाचे का विस्तार करना होना चाहिए।

किसी भी लोकतंत्र के लिए कम से कम दो प्रमुख दलों का ताकतवर होना अनिवार्य होता है। मेरा हमेशा से ही यह कहना रहा है कि मूल चरित्र में कोई भी राजनैतिक दल अपवाद नहीं है। भ्रष्टाचार व अनैतिकता हर दल के नेताओं का भूषण है। यह बात किसी को अच्छी लगे या बुरी पर इसके सैंकड़ों प्रमाण उपलब्ध है। रही बात विचारधारा की तो शरद पवार, अखिलेश यादव, मायावती, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, प्रकाश सिंह बादल, फारूख अब्दुल्ला जैसे सभी नेता अपने-अपने दल बनाए बैठे हैं। पर क्या कोई बता सकता है कि इनकी घोषित विचारधारा और आचरण में क्या भेद है? सभी एक सा व्यवहार करते हैं और एक से सपने जनता को दिखाते हैं। तो क्यों नहीं एक हो जाते हैं? इस तरह भाजपा और कांग्रेस जब दो प्रमुख दल आमने-सामने होंगे, तब जनता की ज्यादा सुनी जायेगी। संसाधनों की बर्बादी कम होगी और विकास करना इन दलों की मजबूरी होगी। साथ ही एक दूसरे के आचरण पर ‘चैक और बैलेंस’ का काम भी चलता रहेगा। इसलिए गुजरात के चुनाव परिणाम जो भी हो, राहुल गांधी के आगे सबसे बड़ी चुनौती है कि वे उन लक्ष्यों को हासिल करें, जिन्हें उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कांग्रेस की ताकत बताया है। साथ ही मंदिरों में जाना, पूजा अर्चना करना और मस्तक पर तिलक धारण करने की अपनी गुजरात वाली पहल को जारी रखें, तो उन्हें इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे।

Monday, December 4, 2017

उ. प्र. के निकायों के चुनाव से संदेश

उ.प्र. के नगर निकायों के चुनावों के नतीजे आ गये हैं। लोकतंत्र की ये विशेषता है कि नेता को हर पाँच साल में मतदाता की परीक्षा में खरा उतरना होता है। ऐसा कम ही होता है कि एक व्यक्ति लगातार दो या उससे ज्यादा बार उसी क्षेत्र से चुनाव जीते। अगर ऐसा होता है, तो स्पष्ट है कि उस व्यक्ति ने अपने क्षेत्र में काम किया है और उसकी लोकप्रियता बनी हुई है। अलबत्ता अगर कोई माफिया हो और वो अपने बाहुबल के जोर से चुनाव जीतता हो, तो दूसरी बात है।

उ.प्र. के अधिकतर महापौर भाजपा के टिकट पर जीते हैं। इसके दो कारण है। एक तो केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार होने के नाते मतदाता को ये उम्मीद है कि अगर जिले से केंद्र तक एक ही दल की सत्ता होगी, तो विकास कार्य तेजी से होंगे और साधनों की कमी नहीं आयेगी। दूसरा कारण यह है कि योगी सरकार को बने अभी 6 महीने ही हुए हैं। उ.प्र. के मतदाताओं को अपेक्षा है कि सरकार व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन करेगी। इसलिए उसको इतना भारी समर्थन मिला है।

पर साथ ही जिन सीटों पर कार्यकर्ताओं की छवि और क्षमता को दरकिनार कर किन्हीं अन्य कारणों से सिफारशी उम्मीदवारों को टिकट मिले, वहां उनकी पराजय हुई है। ये चुनावी गणित का एक पेचीदा सवाल होता। दल के नेता का लक्ष्य होता है कि किसी भी तरह चुनाव जीता जाए। इसीलिए अक्सर ऐसे उम्मीदवारों को भी टिकट दे दिये जाते हैं, जिन्हें बाहरी या ऊपर से थोपा हुआ मानकर, कार्यकर्ता गुपचुप असहयोग करते हैं। जबकि इन्हें टिकट इस उम्मीद में दिया जाता है कि वे जीत सुनिश्चित करेंगे। नैतिकता का तकाजा है कि जिसने दल के सामान्य कार्यकर्ता बनकर, लंबे समय तक, समाज और दल के हित में कार्य किया हो, जिसकी छवि साफ हो और जिसमें नेतृत्व की क्षमता हो, उसे ही टिकट दिया जाए। पर अक्सर ऐसा नहीं होता और इससे कार्यकर्ताओं में हताशा फैलती है और वे बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़े होकर, कड़ी चुनौती देते हैं। जो भी हो अब तो चुनाव हो गये। हर दल अपने तरीके से परीणामों की समीक्षा करेगा।

सवाल है कि स्थानीय निकायों की प्रमुख भूमिका क्या है और क्या जीते हुए उम्मीदवार अब जन आकांक्षाओं को पूरा करने में जी जान से जुटेंगे? देखने में तो ये आता है कि चुनाव जीतने के बाद ज्यादातर उम्मीदरवार उन कामों में ही रूचि लेते हैं, जिनमें उन्हें ठेकेदारों से अच्छा कमीशन मिल सके। चूंकि स्थानीय निकायों का काम सड़क, नाली, खड़जे, पार्क, रोशनी आदि की व्यवस्था करना होता है और इन मदों में आजकल केंद्र सरकार अच्छी आर्थिक मदद दे रही है, इसलिए छोटे-छोटे ठेकेदारों के लिए काफी काम निकलते रहते हैं। पर इस कमीशन खोरी की वजह से इन कार्यों की गुणवत्ता संदेहास्पद रहती है। इसीलिए उ.प्र. के ज्यादातर नगरों में आप सार्वजनिक सुविधाओं को भारी दुर्दशा में पाऐंगे। टूटी-फूटी सड़के, अवरूद्ध और उफनती नालियां, बिजली के खम्भों से लटकते तार, हर जगह कूड़े के अंबार और गंदे पानी के पोखर,उ.प्र. के नगरों के चेहरों पर बदनुमा दाग की तरह हर ओर दिखाई देते हैं। फिर वो चाहे प्रदेश की राजधानी लखनऊ हो या प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र बनारस या तीर्थराज प्रयाग हो और या राम और कृष्ण की भूमि अयोध्या व मथुरा। हर ओर आपको इन नगरों की ऐसी दयनीय दशा दिखाई देगी कि आप यहां आसानी से दोबारा आने की हिम्मत न करें।

नगरों की साफ सफाई के लिए एक कुशल ग्रहणी की मानसिकता चाहिए। एक की घर की दो बहुऐं अपने-अपने कमरों को अलग-अलग तरह से रखती हैं। एक का कमरा आपको 24 घंटे सजा-संवरा दिखेगा। जबकि दूसरी के कमरे में जहां-तहां कपड़े और सामान बिखरे मिलेगें। ठीक इसी तरह जिस वार्ड का प्रतिनिधि अपने वार्ड की साफ-सफाई और रख-रखाव को लेकर लगातार सक्रिय रहेगा, उसका वार्ड हमेशा चमकता रहेगा। जो निन्यानवे के फेर में रहेगा, उसका वार्ड दयनीय हालत में पड़ा रहेगाा। अब ये जिम्मेदारी मतदाताओं की भी है कि वो अपने पार्षद पर कड़ी निगाह रखे और उसे वह सब करने के लिए मजबूर करें, जिसके लिए उन्होंने वोट दिया था।

एक समस्या और आती है, वह है विकास के धन का दुरूपयोग। चूंकि अनुदान मिल गया है और पैसा खर्च करना है, चाहे उसकी जरूरत हो या न हो, तो ऐसे-ऐसे काम करवाये जाते, जिनमें सीधे जनता के धन की बरबादी होती है। इसलिए मैने हाल ही अपनी दो बैठकों में मुख्यमंत्री योगी जी से साफ कहा कि महाराज एक तो काम करवाने में भ्रष्टाचार होता ही है और दूसरा योजना बनाने में उससे बड़ा भ्रष्टाचार होता है। उदाहरण के तौर पर आपके वार्ड की सड़क अच्छी-खासी है। अचानक एक दिन आप देखते हैं कि उस कॉन्क्रीट की सड़क को ड्रिल मशीन से काट-काटकर उखाड़ा जा रहा है। फिर कुछ दिन बाद वहां रेत बिछाकर इंटरलॉकिंग के टाइल्स लगावाये जा रहे हैं। जिनको लगवाने का उद्देश्य केवल अनुदान को ठिकाने लगाना होता है। लगने के कुछ ही दिनों बाद ये टाइल्स जगह-जगह से उखड़ने लगते हैं। फिर कभी कोई उन्हें ठीक करने या उनका रखरखाव करने नहीं आता। इस तरह एक अच्छी खासी सड़क बदरंग हो जाती है। मतदाता तो अपनी रोजी-रोटी में मशगूल हो जाता है और प्रतिनिधि पैसे बनाने में। अगर उ.प्र. के नगरों की हालत को सुधारना है, तो इन जीते हुए प्रतिनिधियों, महापौरों और योगी सरकार को कमर कसनी होगी कि कुछ ऐसा करके दिखायें कि संसदीय चुनाव से पहले उ.प्र. के नगर बिना फिजूल खर्चे के दुल्हन की तरह सजे दिखे। हां इस काम में नागरिकों को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। तभी इन चुनावों की उपलब्धि सार्थक हो पायेगी।

Monday, November 13, 2017

न्यायपालिका के पतन के लिए प्र्रशांत भूषण कैसे जिम्मेदार?

उ. प्र. के मेडिकल कॉलेज दाखिले के घोटाले को लेकर चल रहे एक मामले में पिछले हफ्ते सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका के वकील प्रशांत भूषण ने भारत के मुख्य न्यायाधीश पर अनैतिकता का  सीधा आरोप लगाकर हंगामा खड़ा कर दिया। जिसकी देश में काफी चर्चा है। प्रशांत भूषण के इस साहस की मैं भी प्रशंसा करता हूं। क्योंकि मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि अगर कोई व्यक्ति सर्वोच्च न्यायपालिका का सदस्य बन जाता है, तो वह भगवान (मी लॉर्ड) के समान हो जाता है। ये कोई भावनात्मक बयान नहीं है। मैंने स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के तीन मुख्य न्यायाधीशों और एक न्यायाधीश के अनैतिक आचरण की खोज करके 1997-2002 के बीच बार-बार यह सिद्ध किया कि सर्वोच्च न्यायपालिका के भी कुछ सदस्य भ्रष्टाचार से अछूते नहीं है। अपने आरोपों के समर्थन में मैंने तमाम प्रमाण प्रकाशित किये थे और तत्कालीन पदासीन उन न्यायाधीशों के विरूद्ध अकेले वर्षों लंबा संघर्ष किया। विनम्रता से कहना चाहूंगा कि अब तक के भारत के इतिहास में किसी पत्रकार, वकील, आई ए. एस अधिकारी, सांसद व समाजिक कार्यकर्ता ने ऐसा संघर्ष नहीं किया।

अगर उस संघर्ष में प्रशांत भूषण और इनके स्वनामधन्य पिता शांति भूषण मेरे साथ धोका नहीं करते, तो भारत की न्यायपालिका के सुधार की ठोस शुरूआत आज से 20 वर्ष पहले ही हो गई होती। इसलिए मैं प्रशांत भूषण के हर साहसिक कदम का प्रंशसक होते हुए भी उनके पक्षपातपूर्णं व अनैतिक आचरण के कारण इन पिता-पुत्रों को न्यायपालिका के पतन के लिए जिम्मेदार मानता हूं।

इतने से संकेत भर से सरकार, न्यायपालिका और मीडिया से जुडे़ 40 बरस से ऊपर की आयु के हर व्यक्ति को वह दिन याद आ गया होगा। जब 14 जुलाई 1997 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने हमारी याचिका पर सुनवाई करते समय भरी अदालत में कहा था कि, ‘जैन हवाला मामले में हाथ खींचने के लिए हम पर जबरदस्त भारी दबाव है। लेकिन हम में से कोई पीछे नहीं हटेगा। लोग हम तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। एक व्यक्ति ने मुझसे मिलने की कोशिश की। वहीं व्यक्ति मेरे साथी न्यायमूर्ति श्री एस सी सेन से मिला। श्री सेन काफी नर्वस हैं। मैंने उनसे इस बात को भूल जाने को कहा है। हम साफ कर देना चाहते हैं कि हवाला कांड की जांच की निगरानी जारी रहेगी। जिससे निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।’ मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि वह व्यक्ति उस समय अदालत में भी बैठा हुआ था।

मुख्य न्यायाधीश का यह खुलासा देशवासियों को सुनने में काफी बहादुरी भरा लगा। देश के टेलीविजन चैनलों और अखबारों ने इसे मुख्य खबर बनाया। पर जो बात सबको खटकी वो ये कि न्यायमूर्ति वर्मा ने भारत के इतिहास में देश की सर्वोच्च अदालत की सबसे बड़ी अवमानना करने वाले उस व्यक्ति का नाम नहीं बताया और न ही उसे काई सजा दी। यह आश्चर्यजनक ही नही चिंताजनक व्यवहार था। इस प्रकार की स्वीकारोक्ति करने के लिए चूंकि मुख्य न्यायाधीश को मैंने 12 जुलाई 1997 को प्रमाण सहित एक चेतावनी भरा पत्र भेजकर मजबूर किया था, इसलिए मैं हर मंच पर मुख्य न्यायाधीश से उस अपराधी का नाम बताने की मांग करता रहा। बाद में यह मांग संसद से लेकर बार काउंसिल तक में उठाई गई। मीडिया में भी खूब शोर मचा। क्योंकि हवाला मामला आतंकवादियों के अवैध धन की आपूर्ति और भारत के सभी प्रमुख दलों के बड़े राजनेताओं और देश के उच्च अधिकारियों के अनैतिक आचरण से जुड़ा था। इसलिए ये मामला अत्यंत संवेदनशील था। इसलिए मुझे उस व्यक्ति का नाम उजागर करना पड़ा। बाद में न्यायमूर्ति वर्मा और न्यायमूर्ति सेन ने भी यह माना कि मेरा रहस्योद्घाटन सही था। पर फिर भी उस अपराधी को सजा नहीं दी गई। कारण स्पष्ट था कि वह व्यक्ति न्यायमूर्तियों पर दबाव नहीं डाल रहा था। बल्कि हवाला कांड के आरोपियों के हित में इन न्यायधीशों के साथ ‘डील’ कर रहा था।

देश की न्यायपालिका को पहली बार इतनी बुरी तरह झकझोरने वाले मेरे इस विनम्र प्रयास पर मेरा साथ देने की बजाय मेरे सहयाचिकाकर्ता प्रशांत भूषण और इनके पिता ने उन न्यायमूर्तियों का साथ दिया और मेरी पीठ में छुरा भोंक दिया। क्योंकि ये दोनों खुद उस समय राम जेठमलानी के साथ मिलकर लालकृष्ण आडवाणी व कांग्रेस के दर्जनों बड़े नेताओं को हवाला कांड से बरी कराने की साजिश कर रहे थे। 

अगर अपने स्वार्थों को पीछे छोड़कर इन पिता पुत्रों ने उस समय इस लड़ाई में साथ दिया होता, तो इस देश की राजनीति और न्यायपालिका का इतना पतन न हुआ होता। मैंने तो फिर भी हिम्मत नहीं हारी और फिर भारत के अगले मुख्य न्यायधीश बने डा. ए. एस. आनंद के 6 जमीन घोटाले अपने अखबार ‘कालचक्र’ में छापे और तमाम यातनाऐं भोगते हुए, बिना किसी की मदद के, न्यायपालिका में सुधार के लिए एक लंबा संघर्ष किया। तब से मेरा यही अनुभव रहा है कि राम जेठमलानी और उनके खास सहयोगी शांति भूषण और प्रशांत भूषण जो भी करते हैं, उसके पीछे कुछ न कुछ निहित स्वार्थ का ऐजेंडा जरूर होता है। हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और।

मैं आज भी यह मानता हूं कि सवा सौ करोड़ भारतीयों को न्याय की गारंटी देने वाली न्यायपालिका में भारी सुधार की जरूरत है। पर ये सुधार प्रशांत भूषण के पक्षपातपूर्णं रवैये से कभी नहीं आयेगा। अगर वाकई वे न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करना चाहते हैं, तो उन्हें 1997 में मेरे साथ की गई गद्दारी के लिए सार्वजनिक प्रयाश्चित करना होगा। साथ ही उन जैसे तमाम उन बड़े वकीलों को जिन्होंने हवाला कांड के कंधों पर चढ़कर अपनी राजनैतिक हैसियत बना ली, इस कांड की ईमानदार जांच की मांग करनी होगी। क्योंकि आतंकवाद और देशद्रोह से जुड़े, देश के इस सबसे राजनैतिक घोटाले को बिना जांच के ही, इन सब की साजिश से दबा दिया गया था और मैं अकेला अभिमन्यु कौरवों की सेना से लड़ते हुए, जिंदा शहीद करार कर दिया गया। जबकि इस केस के तमाम सबूत सीबीआई, सर्वोच्च न्यायालय और कालचक्र के कार्यालय में आज भी सुरक्षित हैं। क्या प्रशांत भूषण या आतंकवाद और भ्रष्टाचार के विरूद्ध डंका पीटने वाले कोई वकील, सांसद या राजनेता बिल्ली के गले में घंटी बांधने को तैयार हैं? मैं तो 62 वर्ष की उम्र में भी 26 वर्ष के नौजवान की तरह, खम ठोकने को तैयार हूं।

Monday, October 30, 2017

किसानों के साथ धोखाधड़ी


हमारे देश में अगर कोई सबसे अधिक मेहनत करता है, तो वो इस देश के किसान हैं, जो दिन-रात, जाड़ा, गर्मी और बरसात झेलकर फसल उगाते हैं और 125 करोड़ देशवासियों का पेट भरते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा उपेक्षा भी उनकी ही होती है। चुनावों के माहौल में हर राजनैतिक दल किसानों के दुख-दर्द का रोना रोता है और ये जताने की कोशिश करता है कि मौजूदा सरकार के शासन में किसानों का बुरा हाल है और वो आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। जबकि हकीकत यह है कि वही राजनैतिक दल जब सत्ता में होते हैं, तो ऐसी नीतियां बनाते हैं, जिनसे किसान की तरक्की हो ही नहीं सकती। चाहे वह बिजली की आपूर्ति हो या सिंचाई के जल की, चाहे वह समर्थन मूल्य की बात हो या खाद के दाम की। हर नीति की नींव में एक बड़ा घोटाला छिपा होता है। जिसका खामियाजा, इस देश के करोड़ों किसानों को झेलना पड़ता है। जबकि इन नीतियों को बनाने वाले नेता और अफसर, मोटी चांदी काटते हैं।


दरअसल किसानों के प्रति उपेक्षा का ये भाव सत्ताधीशों का ही नहीं होता, हम सब शहरी लोग भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। अब मीडिया को ही ले लीजिए, अखबार हो या टी.वी., कुल खबरों की कितनी फीसदी खबर, किसानों की जिंदगी पर केंद्रित होती हैं? सारी खबरें औद्योगिक जगत, बहुर्राष्ट्रीय कंपनियां, सिनेमा या खेल पर केंद्रित होती है। किसानों पर खबर नहीं होती, किसान खुद खबर बनते हैं, जब वे भूख से तड़प कर मरते हैं या कर्ज में डूबकर आत्महत्या करते है।


ये कैसा समाजवाद है? कहने को श्रीमती गांधी ने भारतीय संविधान में संशोधन करके समाजवाद शब्द को घुसवाया। पर क्या यूपीए सरकार की नीतियां ऐसी थीं कि किसानों की दिन-दूगनी और रात-चैगुनी तरक्की होती? अगर ऐसी हुआ होता, तो किसानों की हालत इतनी खराब कैसे हो गयी कि वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये? ये रातों-रात तो हुआ नहीं, बल्कि वर्षों की गलत नीतियों का परिणाम है। हमारी सरकारों ने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की बजाए, याचक बना दिया। ताकि वो हमेशा सत्ताधीशों के सामने हाथ जोड़े खड़ा रहे। छोटे-छोटे कर्जों में डूबा किसान तो अपनी इज्जत बचाने के लिए आत्महत्या करता आ रहा है, पर क्या किसी उद्योगपति ने बैंकों का कर्जा न लौटाने पर आत्महत्या की? लाखों-करोडों का कर्जा उद्योग जगत पर है। पर उन्हें आत्महत्या करने की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि वे मंहगे वकील खड़े करके, बैंकों को मुकदमों में उलझा देते हैं। जिसमें दशकों का समय यूं ही निकल जाता है।


प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लग रहा है कि उनकी परोक्ष मदद के कारण अंबानी और अडानी की प्रगति दिन-दूनी और रात-चैगुनी हो रही है। पर क्या ये बात किसी से छिपी है कि पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में भी अंबानी समूह की बेइंतहां वृद्धि हुई? सारा औद्योगिक जगत ये तमाशा देखता रहा कि कैसे सरकार से निकटता का लाभ लेकर, धीरूभाई अंबानी ने ये विशाल साम्राज्य खड़ा कर लिया था।  इसमें नया क्या है?


मैं पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हूं। मैं मानता हूं कि व्यक्तिगत पुरूषार्थ के बिना, आर्थिक प्रगति नहीं होती। सरकारों की सहायता पर पलने वाला समाज कभी आत्मविश्वास से नहीं भर सकता। वह हमेशा परजीवि बना रहेगा। साम्यवादी देश इसका स्पष्ट उदाहरण है। जबकि पूंजीपति बुद्धि लगाता है, मेहनत करता है, खतरे मोल लेता है और दिन-रात जुटता है, तब जाकर उसका औद्योगिक साम्राज्य खड़ा होता है। इसलिए पूंजीपतियों की प्रगति का विरोध नहीं है। विरोध है, उनके द्वारा गलत तरीके अपनाकर धन कमाना और टैक्स की चोरी करना। इससे समाज का अहित होता है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ऐसी व्यवस्था लाना चाह रहे हैं, जिससे टैक्स की चोरी भी न हो और लोग अपना आर्थिक विकास भी कर सकें। इस तरह सरकार के पास, सामाजिक कार्यों के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध हो जायेंगे।

 
हर परिवर्तन कुछ आशंका लिए होता है। ढर्रे पर चलने वाले लोग, हर बदलाव का विरोध करते हैं। परंतु बदलाव अगर उनकी भलाई के लिए हो, तो क्रमशः उसे स्वीकार कर लेते हैं। आज देश के समझदार लोगों को किसानों और देश की आर्थिक स्थिति पर मंथन करना चाहिए और ये तय करना चाहिए कि भारत का आर्थिक विकास किस माडल पर होगा? क्या देश का केवल औद्योगिकरण होगा या किसानों मजदूरों के आर्थिक उत्थान को साथ लेकर चलते हुए औद्योगिक विकास होगा? क्योंकि समाज के बहुसंख्यक लोगों को अभावों में रखकर मुट्ठीभर लोग वैभव पर एकाधिकार नहीं कर सकते। उन्हें गांधी जी के ‘ट्रस्टीशिप’ वाले सिद्धांत को मानना होगा। जिसका मूल है कि धन इसलिए कमाना है कि हम समाज का भला कर सकें। ऐसी सोच विकसित होगी, तो किसान भी खुश होगा और शेष समाज भी।



भारत के आर्थिक विकास के माडल पर बहुत कुछ सोचा-लिखा जा चुका है। उसी पर अगर एकबार फिर मंथन कर लिया जाए, तो तस्वीर साफ हो जायेगी। जरूरत है कि हम विकास के पश्चिमी माडल से हटकर देशी माडल को विकसित करें, जिसमें सबका साथ हो-सबका विकास हो।

Monday, October 23, 2017

अयोध्या में दीपावली: प्रतीकों का भी महत्व होता है

उ.प्र. के मुख्यमंत्री  आदित्यनाथ योगी ने इस बार अयोध्या में भव्य दीपावली का आयोजन किया। पुष्पक विमान के प्रतीक रूप हैलीकाप्टर से, जब भगवान श्रीराम,सीता व लक्षमण जी सरयू के घाट पर उतरे तो, पूरा अयोध्या उल्लासमय हो गया। लाखों दीपों से सरयू के घाट को सजाया गया। हजारों वर्ष बाद अयोध्यावासियों को वही अनुभूति हुई जो त्रेता युग में हुई होगी। इसके साथ ही अयोध्या के सौंदर्यीकरण के लिए योगी जी ने अनेक घोषणाऐं की।

भाजपा के राजनैतिक आलोचक कहते हैं कि जब से भाजपा सरकार आई है, तब से प्रधानमंत्री मोदी और उनके मुख्यमंत्री हिंदू धर्म को अनावश्यक रूप से महत्व देकर, अपना वोट बैंक पक्का कर रहे हैं। हो सकता है कि उनकी इस बात में तथ्य हो। पर प्रश्न उठता है कि क्या इस तरह के भव्य आयोजन पूर्व सरकारें नहीं करती थीं? राजीव गांधी के समय में कई देशों में जाकर भारत के जो उत्सव किये गये, जिसमें करोड़ों रूपया खर्च किया गया, उनका उद्देश्य था भारतीय संस्कृति से विश्व का परिचय कराना, उसमें कुछ गलत नहीं था।

जो लोग योगी जी की निंदा कर रहे हैं क्या उन्होंने पिछले 70 वर्षों में इस बात की निंदा की कि हमारी धर्मनिरपेक्ष सरकारों में रमजान के महीने में रोज क्यों प्रधानमंत्री, राज्यपाल व मुख्यमंत्रियों के यहां इफ्तार दावत होती थी ? उनका जवाब होगा कि शासक को समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करना होता है। तो फिर नवरात्रि पर व्रत के भोज क्यों नहीं अयोजित किये गए ?

पिछले लगभग 1500 वर्ष का इतिहास है कि  हिंदू धर्म के जो प्रतीक थे उनका या तो उपहास किया गया या उन्हें दबाया गया या उनको सह लिया गया। पर प्रोत्साहित नहीं किया गया। कारण स्पष्ट है कि अगर शासक विधर्मी या नास्तिक  होंगे तो उन्हें हिंदू धर्म व संस्कृति में, उसकी आस्थाओं में और  पर्वों में क्यों रूचि होगी ? अब जब पहली बार ऐसी स्थिति बनी है कि केंद्र में पूर्णं बहुमत से और अनेक राज्यों में हिंदू मानसिकता की सरकार हैं, तो अगर हर्षोंल्लास से हिंदू पर्व मनाए जा रहे है, तो इसमें किसी को क्यों तकलीफ होनी चाहिए ?

जिस समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय का अयोध्या पर निर्णय आ रहा था, तो एक टीवी चैनल पर लाइव चर्चा पर मैं भी बैठा हुआ टिप्पणी कर रहा था। उसके तुरंत बाद मैं सीधा अडवाणी जी के घर गया, तभी वहां वैंकेया नायडू, नजमा हैप्दुल्लाह, राजनाथ सिंह व अरूण जेटली भी आ गए। वहां चर्चा चली कि अब राम जन्मभूमि को लेकर आगे क्या किया जाए। सबके अलग-अलग विचार थे। चूंकि ये भाजपा  का राजनैतिक मामला था, इसलिए मैं कुछ देर ही बैठा और उन सबके साथ जलपान कर वहां से निकल लिया। लेकिन एक बात मैंने जरूर उन सबके सामने रखी और वो ये कि पिछले 20 वर्षों से या यूं कहिए जब से राम जन्मभूमि आंदोलन चला में अटल जी, आडवाणी जी और मुरली मनोहर जोशी जी से लगातार कहता रहता था कि मंदिर जब बनेगा बन जायेगा, तब तक अयोध्या का तो कायाकल्प कर लिया जाय। अगर ऐसा किया गया होता तो आज टीवी चैनलों पर अयोध्या की दुर्दशा दिखाकर भाजपा का उपहास नहीं हो रहा होता। जो उस दिन टीवी चैनलों पर जम कर किया गया।

उल्लेखनीय है कि अपनी कालचक्र विडियो पत्रिका में 1990 में राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के कारसेवकों पर हुई बर्बर हिंसा पर मैने बहुत हृदयविदारक प्रभावशाली टीवी रिर्पोट तैयार की थी। उस वक्त देश में कोई प्राइवेट टीवी चैनल नहीं थे, तो अपने किस्म की ये अकेली रिर्पोट दी जिसे भाजपा ने पूरे देश मे खूब दिखाया। तभी से मैं अयोध्या में सरयू के घाटों, वहां के कुंडों- सरोवरों, जीर्ण-शीर्ण पड़े भवनो पर काम किया जाना चाहिए ऐसा भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से लगातार कहता रहा। विनम्रता से कहना चाहूंगा कि बिना सरकारी पैसे के, पिछले 15 वर्षों में जिस निष्ठा से हमारी ब्रज फाउंडेशन ने ब्रज का अध्ययन करने में, ब्रज के सम्पूर्ण विकास का माडल तैयार करने में और भगवान कृष्ण की दर्जनों लीलास्थलीओ का कलात्मक जीर्णोद्धार करने में जो निपुणता हासिल की है, उसकी आज सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। जहां चाह, वहां राह। फिर अयोध्या ही क्यों, काशी हो, जगन्नाथपुरी हो या भारत का कोई भी अन्य तीर्थ स्थल हो, सबका कायाकल्प हो सकता है। बशर्ते हमारे अनुभवों का लाभ लिया जाय और करोड़ो रूपये की मोटी फीस ऐंठने वाले हाई-फाई प्रोफेशनल्स से बचा जाय। जिनके ब्रज में कई घोटाले हम पहले ही उजागर कर चुके हैं।

ऐसा नहीं हैं कि पिछली सरकारें चाहें वह कांग्रेस की हों या समाजवादी या बसपा की हों या किसी अन्य दल की हों, उन्होंने प्रतीको का सहारा लेकर विभिन्न धर्मों को संतुष्ठ करने का प्रयास नहीं किया, जरूर किया। सोमनाथ, तिरूपति बालाजी और वैष्णो देवी का विकास कांग्रेस के शासनकाल में हुआ और बहुत अच्छा हुआ। ऐसे दूसरे बहुत से कार्य अन्य दलों द्वारा भी हुए, जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन जिस भक्ति भावना से या जिस ऐलानियत से यह कार्य किये जाने चाहिए थे, वे नहीं हुए।आज जब इस हो रहा है, तो उसकी निंदा न करें, उनका आंनंद ले, उनका रस लें। हाँ अगर इनसे पर्यावरण का या समाज का कोई अहित हो रहा हो तो उस पर टिप्पणी करने में कोई संकोच न किया जाय। मैं समझता हूं कि योगी जी ने अयोध्या में जो कुछ भी किया, उससे पूरे विश्व में हिंदू समाज को बहुत सुखद अनुभूति हुई है। जिसके लिए वे और उनकी सरकार बधाई के पात्र हैं।

Monday, September 4, 2017

युवा पाईलटों के साथ ये बेइंसाफी क्यों?

नागरिक उड्डयन मंत्रालय और निजी एयरलाइन्स की मिली भगत के कई घोटाले हम पहले उजागर कर चुके हैं। हमारी ही खोज के बाद जैट ऐयरवेज को सवा सौ से ज्यादा अकुशल पाइॅलटों को घर बैठाना पड़ा था। ये पाइलेट बिना कुशलता की परीक्षा पास किये, डीजीसीए में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण यात्रियों की जिंदगी के खिलवाड़ कर रहे थे। हवाई जहाज का पाइॅलट बनना एक मंहगा सौदा है। इसके प्रशिक्षण में ही 50 लाख रूपये खर्च हो जाते हैं। एक मध्यम वर्गीय परिवार पेट काटकर अपने बच्चे को पाइॅलेट बनाता है। इस उम्मीद में कि उसे जब अच्छा वेतन मिलेगा, तो वह पढ़ाई का खर्चा पाट लेगा। पाइॅलेटों की भर्ती में लगातार धांधली चल रही है। योग्यता और वरीयता को कोई महत्व नहीं दिया जाता। पिछले दरवाजे से अयोग्य पाइलटों की भर्ती होना आम बात है। पाइॅलटों की नौकरी से पहले ली जाने वाली परीक्षा मे भी खूब रिश्वत चलती है?


ताजा मामला एयर इंडिया का है। 21 अगस्त को एयर इंडिया में पाइॅलट की नौकरी के लिए आवेदन करने का विज्ञापन आया। जिसमें रैटेड और सीपीएल पाइॅलटों के लिए आवेदन मांगे गये हैं, लेकिन केवल रिर्जव कोटा के आवेदनकर्ताओं से ही। देखने से यह प्रतीत होता है कि ये विज्ञापन बहुत जल्दी में निकाला गया है। क्योंकि 31 अगस्त के लखनऊ के एक समाचार पत्र में सरकार का एक वकतव्य आया था कि रिजर्वेशन पाने के लिए परिवार की सालाना आय 8 लाख से कम होनी चाहिए। ये बात समझ के बाहर है कि कोई भी परिवार जिसकी सालाना आय 8 रूपये से लाख से कम होगी वह अपने बच्चे को पाइॅलट बनाने के लिए 35 से 55 लाख रूपये की राशि कैसे खर्च कर सकता है, वह भी एक से दो साल के अंदर?


इस विज्ञापन में पहले की बहुत सी निर्धारित योग्यताओं को ताक पर रखा गया है। आज तक शायद  ही कभी एयर इंडिया का ऐसा कोई विज्ञापन आया हो, जिसमें सीपीएल और हर तरह के रेटेड पाइॅलटों से एक साथ आवेदन मांगे गये हों।
कई सालों से किसी भी वकेंसी में आवेदन के लिए साईकोमैट्रिक पहला चरण हुआ करता था।  पिछले कुछ सालों में रिर्जव कैटेगरी के बहुत से प्रत्याशी इसे सफलतापूर्वक पास नहीं कर पाये। इस बार के विज्ञापन में उसको भी हटा दिया गया है। अब तो और भी नाकारा पाइॅलटो की भर्ती होगी।


अभी तक सरकारी नौकरियों में रिर्जव केटेगरी के लिए 60 प्रतिशत का रिजर्वेंशन आता था। इस वेंकेसी में टोटल सीट ही रिर्जव कैटेगरी के लिए हैं, जनरल कोटे वालों का कहीं कोई जिक्र नहीं है। पिछले साल एयर इंडिया अपनी वेंकेसी में रिजर्व कैटेगरी की सीट उपयुक्त प्रत्याशी के अभाव में नहीं भर पाई थी। उस संदर्भ में ये विज्ञापन अपने आप में ही एक मजाक प्रतीत होता है।

एयर इंडिया के हक में और प्रत्याशियों के भविष्य को देखते हुए, क्या यह उचित नहीं होगा कि रिर्जव कैटेगरी के योग्य आवेदनकर्ताओं के अभाव में रिर्जव कैटेगरी की सीटों को जनरल कैटेगरी से भर लिया जाये।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सीपीएल का लाईसेंस लेने के लिए व्यक्ति को 30 से 35 लाख रूपये खर्च करने पड़ते है। किसी भी विशिष्टि विमान की रेटिंग के लिए उपर से 20 से 25 लाख रूपये और खर्च होते हैं। जब सारी योग्यताऐं लिखित और प्रायोगिक पूरी हो जाती हैं, तभी डीजीसीए लाईसेंस जारी करता है। सारे पेपर्स और रिकौर्ड्स चैक करने के बाद ही यह किया जाता है।  इतना सब होने के बाद किसी भी एयर लाईन को पाइॅलट नियुक्त करने के लिए अलग से लिखित परीक्षा/साक्षात्कार/सिम चैक लेने की क्या आवश्यक्ता है? एक व्यक्ति को लाईसेंस तभी मिलता है, जब वह डीजीसीए की हर कसौटी पर खड़ा उतरता है। नियुक्ति के बाद भी हर एयर लाईन्स अपनी जरूरत और नियमों के अनुसार हर पाईलेट को कड़ी ट्रैनिंग करवाती है। एक बार ‘सिम टैस्ट’ देने में ही पाइलेट को 25 हजार रूपये उस एयर लाईन्स को देने पड़ते है। आना-जाना और अन्य खर्चे अलग। इतना सब होने के बाद भी नौकरी की गांरटी नहीं । किसी भी आम पाइॅलट के लिए ये सब खर्च अनावश्यक भार ही तो है।

जरूरत इस बात की है कि डीजीसीए में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जाये। भाई-भतीजावाद को रोका जाए। डीजीसीए आवेदनकर्ता पाइॅलटों की आनलाईन एक वरिष्ठता सूची तैयार करे। जिसमें हर पाइॅलट को उसके लाईलेंस जारी करने की तारीख और रेंटिंग की तारीख के अनुसार रखा जाए। इसके बाद हर एयर लाईस अपनी जरूरत के अनुसार उसमें से सीनियर्टी के अनुसार प्रत्याशी ले ले और अपनी जरूरत के अनुसार उनको और आगे की ट्रेनिंग दे।

Monday, August 28, 2017

कब मोह भंग होगा हमारा छद्म गुरूओं से

एक ओर आत्मघोषित गुरू का भांडाफोड़ हुआ। कल तक ऐश्वर्य की गोद में रंग-रंगेलिया मनाने वाला ‘भक्तों का भगवान’ अब बाकी की जिंदगी, आसाराम और रामलाल की तरह जेल की सलाखों के पीछे काटेगा। सच्चे भक्तों की पीड़ा, मैं समझ सकता हूँ, क्योंकि मैंने कुछ ऐसा मंजर बहुत करीब से देखा है और उसके खिलाफ देशभर में, आवाज भी बुलंद की थी। जब मुझे पता चला कि अपनी पूजा करवाने गुरूओं का इतिहास व व्यभिचार और दुराचरण से भरा हुआ है।  सन्यास का वेश धारणकर, शिष्यों के पुत्र-पुत्रियों और पत्नियों से नाजायाज संबंध बनाने वाले, ये तथाकथित सन्यासी, अब गृहस्थ जीवन जी रहे हैं। उनमें से एक, पूर्व सन्यासी रहे, व्यक्ति से मैंने पूछा कि क्यों तो तुमने सन्यास लिया और क्यों तुम्हारा पतन हो गया? उसने सीधा उत्तर दिया कि अपने गुरू भाईयों का ऐश्वर्य और उनके सैकड़ों-हजारों चेलों की उनके प्रति अंधभक्ति देख, मेरी भी इच्छा गुरू बनने की हुई और मैंने सन्यास ले लिया। दिनभर तो मैं किसी तरह, अपने पर नियन्त्रण रख लेता, पर रात नहीं कटती थी। रात को कामवासना इतनी प्रबल हो जाती थी कि मुझसे नहीं रहा गया। उसने तो अपना गुनाह कबूल कर लिया। पर शेर की खाल में आज भी हजारों भेड़िये, देशभर में आध्यात्मिक गुरू बने बैठे हैं। जो भोली जनता की भावुकता का नाजायज लाभ उठाकर, उसे हर तरह से लूटते हैं। तन-मन-धन गुरू पर न्यौछावर कर देने वाले भक्तों को, जब पता चलता है कि जिसे गुरू रूपी भगवान माना, वो लंपट धूर्त निकला, तो  वे अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं। वे या तो धर्म विमुख हो जाते हैं या अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं। सिरसा में जो हुआ, उसके पीछे भक्तों की स्वभाविक प्रतिक्रिया कम और बाबा के पाले हुए बदमाशों की हिंसक रणनीति ज्यादा थी।

दरअसल छद्म भेष धरकर इन आत्मघोषित गुरूओं ने धर्म की परिभाषा बदल दी है। कलियुग के इन गुरूओं ने, उस दोहे का भरपूर दुरूपयोग किया है, जिसमें कहा गया, ‘‘गुरू गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पांय। बलिहारी गुरू आपने, जिन गोविंद दियो बताय।’’ ध्यान देने वाली बात ये है कि यहां उस गुरू को भगवान से ज्यादा महत्व देने की बात कही गई है, जो हमें भगवान से मिलाता है। पर आत्मघोषित गुरू तो खुद को ही भगवान बना बैठे हैं। मजे की बात यह है कि जब कभी भगवान धरती पर अवतरित हुए, तो उन्होंने मानव सुलभ लीलाऐं की, किंतु खुद को भगवान नहीं बताया। आज के धनपिपासु, बलात्कारी, हत्यारे और षड्यन्त्रकारी आत्मघोषित गुरू तो बाकायदा खुद को भगवान बताकर, अपना प्रचार करवाते हैं। इन्होंने तो गुरू शब्द की महिमा को ही लज्जित कर रखा है।

इसी कॉलम में जब-जब धर्म की हानि करने वाले ऐसे गुरूओं का पतन होता है, तब-तब मैं इन्हीं बिंदुओं को उठाता हूँ। इस आशा में कुछ पाठक तो ऐसे होंगे, जो इस गंभीर विषय पर सोचेंगे। दरअसल, धर्म का धंधा केवल भारत में चलता हो या केवल हिन्दू कथावाचक या महंत ही इसमें लिप्त हों यह सही नहीं है। तीन दिन तक मैं इटली के रोम नगर में ईसाईयों के सर्वोच्च आध्यात्मिक केन्द्र वेटिकन सिटी में पोप और आर्क बिशपों के आलीशान महल और वैभव के भंडार देखता रहा। एक क्षण को भी न तो आध्यात्मिक स्फूर्ति हुई और न ही कहीं भगवान के पुत्र माने जाने वाले यीशू मसीह के जीवन और आचरण से कोई संबध दिखाई दिया। कहां तो विरक्ति का जीवन जीने वाले यीशू मसीह और कहां उनके नाम पर असीम ऐश्वर्य में जीने वाले ईसाई धर्म गुरू? पैगम्बर साहब हों या गुरू नानक देव, गौतम बुद्ध हो या महावीर स्वामी, गइया चराने वाले ब्रज के गोपाल कृष्ण हो या वनवास झेलने वाले भगवान राम, कैलाश पर्वत पर समाधिस्थ भोले शंकर हो या कुशा के आसन पर भजन करने वाले हनुमान जी सबका जीवन अत्यन्त सादगी और वैराग्य पूर्ण रहा है। पर धर्म के नाम पर धंधा करने वालों ने उनके आदर्शों को ग्रन्थों तक सीमित कर साम्राज्य खड़े कर लिए हैं। कोई धर्म इस रोग से अछूता नहीं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि हर धर्म क्रमशः भौतिकता की ओर पतनशील हो जाता है।

संत वो है जिसके पास बैठने से हम जैसे गृहस्थ विषयी भोगियों की वासनाएं शान्त हो जाए, भौतिकता से विरक्ति होने लगे और प्रभु के श्री चरणों में अनुराग बढ़ने लगे। पर आज स्वंय को ‘संत‘ कहलाने वाले क्या इस मापदंड पर खरे उतरते हैं ? जो वास्तव में संत हैं उन्हें अपने नाम के आगे विशेषण लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। क्या मीराबाई, रैदास, तुलसीदास, नानक देव, कबीरदास जैसे नाम से ही उनके संतत्व का परिचय नहीं मिलता ? इनमें से किसी ने अपने नाम के पहले जगतगुरू, महामंडलेश्वर, परमपूज्य, अवतारी पुरूष, श्री श्री 1008 जैसी उपाधियां नहीं लगाईं। पर इनका स्मरण करते ही स्वतः भक्ति जागृत होने लगती है। ऐसे संतों की हर धर्म में आज भी कमी नहीं है। पर वे टीवी पर अपनी महानता का विज्ञापन चलवाकर या लाखों रूपया देकर अपने प्रवचनों का प्रसारण नहीं करवाते। क्योंकि वे तो वास्तव में प्रभु मिलन के प्रयास में जुटे हैं ? हम सब जानते हैं कि घी का मतलब होता है गाय या किसी अन्य पशु के दूध से निकली चिकनाई । अब अगर किसी कम्पनी को सौ फीसदी शुद्ध घी कहकर अपना माल बेचना पड़े तो साफ जाहिर है कि उसका दावा सच्चाई से कोसों दूर है। क्योंकि जो घी शुद्ध होगा उसकी सुगन्ध ही उसका परिचय दे देगी। सच्चे संत तो भौतिकता से दूर रहकर सच्चे जिज्ञासुओं को आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग बताते हैं। उन्हें तो हम जानते तक नहीं क्योंकि वे चाहते ही नहीं कि कोई उन्हें जाने। पर जो रोजाना टीवी, अखबारों और होर्डिगों पर पेप्सी कोला की तरह विज्ञापन करके अपने को संत, महामंडलेश्वर, जगद्गुरू या राधे मां कहलवाते हैं उनकी सच्चाई उनके साथ रहने से एक दिन में सामने आ जाती है। बशर्ते देखने वाले के पास आंख हों।

जैसे-जैसे आत्मघोषित धर्माचार्यो पर भौतिकता हावी होती जाती है, वैसे-वैसे उन्हें स्वंय पर विश्वास नहीं रहता इसलिए वे भांति-भांति के प्रत्यय और उपसर्ग लगाकर अपने नाम का श्रंगार करते हैं। नाम का ही नहीं तन का भी श्रंगार करते हैं। पोप के जरीदार गाउन हो या रत्न जटित तामझाम, भागवताचार्यो के राजसी वस्त्र और अलंकरण हों या उनके व्यास आसन की साज सज्जा, क्या इसका यीशू मसीह के सादा लिबास या शुकदेव जी के विरक्त स्वरूप से कोई सम्बन्ध है ? अगर नहीं तो ये लोग न तो अपने इष्ट के प्रति सच्चे हैं और न ही उस आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति जिसे बांटने का ये दावा करते हैं ? हमने सच्चे संतों के श्रीमुख से सुना है कि जितने लोग आज हर धर्म के नाम पर विश्वभर में अपना साम्राज्य चला रहे हैं, अगर उनमें दस फीसदी भी ईमानदारी होती तो आज विश्व इतने संकट में न होता।

गुरमीत राम रहीम सिंह का कोई अपवाद नहीं है। वो भी उसी भौतिक चमक दमक के पीछे भागने वाला शब्दों का जादूगर है, जो शरणागत की भावनाओं का दोहन कर दिन दूनी और रात चैगुनी सम्पत्ति बढ़ाने की दौड़ में लगा रहा है। जिसके जिस्म पर लदे करोड़ों रूपए के आभूषण, फिल्मी हीरो की तरह चाल-ढाल, भड़काऊ पाश्चात्य वेशभूषा और शास्त्र विरूद्ध आचरण देखने के बाद भी उसके अनुयायी क्यों हकीकत नहीं जान पाते? जब-जब आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वालों का संबध ऐश्वर्य से जुड़ा है तब-तब उस धर्म का पतन हुआ है। इतिहास इसका साक्षी है। यह तो उस जनता को समझना है जो अपने जीवन के छोटे-छोटे कष्टों के निवारण की आशा में मृग-मरीचिका की तरह रेगिस्तान में दौड़ती है, कि कहीं जल मिल जाए और प्यास बुझ जाए। पर उसे निराशा ही हाथ लगती है। पुरानी कहावत है ‘पानी पीजे छान के, गुरू कीजे जान के‘।

Monday, August 14, 2017

ये क्या कह गये हामिद अंसारी ?

10 वर्ष तक भारतीय गणराज्य के उपराष्ट्रपति रहे, डॉ. हामिद अंसारी, अपने विदाई समारोह में भारत के अल्पसंख्यकों की तथाकथित असुरक्षा के विषय में, जो टिप्पणी करके गये, उसे लेकर भारत का बहुसंख्यक समाज बहुत उद्वेलित है। अखबारों में उनके कार्यकाल की ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है, जब उन्होंने स्पष्टतः हिंदू समाज के प्रति, अपने संकोच को सार्वजनिक रूप से प्रकट किया। इसलिए यहां उन्हें दोहराने की आवश्यक्ता नहीं है। सोचने का विषय यह है कि जिस देश में हर बड़े पद पर, अल्पसंख्यक इज्जत के साथ, बैठते रहे हों, वहां उनके असुरक्षित होने की बात कहना, गले नहीं उतरती। भारत का राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त, इंटेलीजेंस ब्यूरो का निदेशक जैसे अत्यंत महत्वपूर्णं व सर्वोच्च पदों पर, अनेक बार अल्पसंख्यक वर्ग के लोग, शानों-शौकत से बैठ चुके हैं।

डॉ. अंसारी से पूछा जाना चाहिए कि जब कश्मीर के हिंदुओं पर वहां के मुसलमान लगातार, हमले कर रहे थे और अंततः उन्हें उनके सदियों पुराने घरों से खदेड़कर, राज्य से बाहर कर दिया, तब क्या उन्होंने ऐसी चिंता व्यक्त की थी? मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी भी हिंदुओं पर होते आ रहे, मुसलमानों के हमलों पर, चिंता व्यक्त की हो। ये पहली बार नहीं है। हमारे देश के वामपंथी इस मामले में सबसे आगे हैं। उन्हें हिंदुओं की साम्प्रदायिकता बर्दाश नहीं होती, लेकिन मुसलमानों की साम्प्रदायिकता और आतंकवाद में उन्हें कुछ भी खोट नजर नहीं आता। तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों और वामपंथियों के ऐसे इकतरफा रवैये से ही, हिंदू समाज ने अब संगठित होना शुरू किया है।  इसलिए इन सबका सीधा हमला, अब हिंदूओं पर हो रहा है। उन्हें लगातार सम्प्रदायिक और धर्माथ कहकर, समाज विरोधी बताया जा रहा है। यही हाल बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी है, जिन्होंने अपने अधिकारियों को अलिखित निर्देश दे रखे हैं कि उनके प्रांत में मुसलमानों के सौ खून माफ कर दिये जाये, पर अगर कोई हिंदू साईकिल की भी चोरी करते पकडा जाए, तो उसे टांग दिया जाए। इससे पश्चिमी बंगाल के पुलिस महकमे में भारी असंतोष है।

यह सही है कि भाजपा की सरकार केंद्र में आने के बाद से हिंदू युवा कुछ ज्यादा सक्रिय हो गये हैं और कभी-कभी अपने आका्रेश को प्रकट करते रहते हैं। पर इसके पीछे वो उपेक्षा और तिरस्कार है, जिसे उन्होंने पिछले 1000 साल से भोगा है।

डॉ. हामिद अंसारी जैसे लोग, इन दोनों ही वर्गों से अलग हटकर हैं। वे ऐसे कुलीन वर्ग से आते है, जिसने कभी ऐसी उपेक्षा या यात्ना सही नहीं। वे तो हमेशा से अच्छा पढे़, अच्छा खाया-पीया, ताकतवर लोगों की संगत में रहे और पूरे जीवन ऊँचे-ऊँचे पदों पर बैठे। इसलिए ऐसे लोगों से तो कम से कम संतुलित व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। फिर क्यों ये नाटक देखने को मिलते रहते है। होता ये है कि ऐसे कुलीन लोग, आम आदमी के मुकाबले ज्यादा खुदगर्ज होते हैं। जब तक इन्हें मलाई मिलती रहती है, तब तक ये सीधे रस्ते चलते हैं। पर जैसे ही इन्हें लगता है कि अब मलाई उड़ाने का वक्त खत्म हो रहा है, तो ये ऐसे ही बयान देकर, चर्चा में आना चाहते हैं, जिससे और फोरम पर मलाई खाने के रास्ते खुल जायें। इसलिए इनके बयानों में कोई तथ्य नहीं होता। इन्हें गंभीरता से लेना भी नहीं चाहिए।

सोचने की बात ये है कि जब देश की आम जनता, बुनियादी समस्याओं से जूझ रही हो, तब इस तरह के साम्प्रदायिक मुद्दे उठाना, कहां तक जायज है। फिर वो चाहे, कोई भी पक्ष उठाये। आम जनता जानती है कि अचानक साम्प्रदायिक मुद्दे उठाने के पीछे केवल राजनैतिक ऐजेंडा होता है, उस समुदाय विशेष के विकास करने का नहीं। इसलिए ऐसे बयान निजि राजनैतिक लाभ के लिए दिये जाते हैं, समाज के हित के लिए नहीं।

अच्छा होता कि डॉ. अंसारी यह घोषणा करते कि सेवा निवृत्त होकर, वे अल्पसंख्यक समाज में आ रही, कुरीतियों और आतंकवादी सोच के खिलाफ लड़ेंगे, जिससे वे इन भटके हुए युवाओं को राष्ट्र की मुख्य धारा में ला सके। पर ऐसा कुछ भी उन्होंने नहीं कहा और न करेंगे। यह भी चिंता का विषय है कि जिस तरह हिंदू युवा उत्साह के अतिरेक में बिना तथ्यात्मक ज्ञान के भावनात्मक मुद्दों पर, बार-बार उत्तेजित हो रहे हैं, उससे हिंदू समाज की छवि खराब हो रही है। वैदिक संस्कृति की जड़े इतनी गहरी है कि ऐसे हल्के-फुल्के झोंकों से हिलने वाली नहीं। आवश्यक्ता है, उन्हें गहराई से समझने और दुनिया के सामने तार्किक रूप से प्रस्तुत करने की। जिससे विधर्मी भी हमारे ऋषियों की दूर्दृष्टि, वैज्ञानिक सोच और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से प्रभावित होकर, भारत की मुख्यधारा में और भी सक्रिय भूमिका निभायें। डॉ. अंसारी को अभी भी कुछ ऐसा ही करना चाहिए। जिससे समाज को लाभ मिले और इस वकतव्य के बाद उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा, पुनर्स्थापित हो। डॉ. ऐपीजे कलाम उस अखिल भारतीय सनातन सोच की दीप स्तंभ हैं और इसलिए भारतीयों के हृदय में स्थान पा चुके हैं। उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। लेकिन एक सच्चे भारतीय की तरह सामाजिक सद्भाव से जीने का उदाहरण प्रस्तुत किया।

Monday, August 7, 2017

नकलमुक्त शिक्षा व्यवस्था सपना या व्यवस्थित प्रबंधन


प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश का हर युवा, देश के विकास में योगदान करे। इसके लिए उन्होंने ‘कौशल विकास’ का विशेष मंत्रालय भी बनाया है। सर्वविदित है कि सरकार हर नौजवान को नौकरी नहीं दे सकती है। निजी क्षेत्र, कृषि या स्वरोजगार ही वो रास्ते है, जिनके जरिये एक नौजवान अपने जीवन में स्थायित्व ला सकता है। जीवन जीने की चुनौतियां अनेक है। जिनका सामना करने के लिए, हर युवा का संतुलित विकास होना आवश्यक है। व्यक्तित्व विकास का एक महत्वपूर्णं अंग शिक्षा है। अशिक्षित युवा के लिए चुनौतियां और भी बढ़ जाती है। पर समस्या इस बात की है कि जिन्हें शिक्षित या डिग्रीधारी माना जाता है, वे स्वयं ही अंधेरे कुऐं में पड़े हैं। डिग्रियां हाथ में हैं, फिर भी वे शिक्षित नहीं कहे जाते।

वैसे तो संपूर्ण भारत में प्राथमिक, माध्यमिक और स्नातक स्तर की शिक्षा व्यवस्था अपनी आत्मा और आधारभूत संरचनाओं में वर्तमान एवं भावी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। परन्तु विशेषतः उत्तर प्रदेश के परिपेक्ष में इसे सरकारी संरक्षण में नकल माफिया के हाथ सौंपकर इसकी लगभग हत्या ही कर दी गयी है। आश्चर्य जनक है कि समाज, सरकार, प्रशासन और मीडिया, इस न बदली जा सकने वाली सामाजिक और राष्ट्रीय बर्बादी पर चुप्पी साधे है।

सारे साल स्कूल और कॉलेजों में पढाई न के बराबर होती है। शिक्षा व्यवस्था के प्रबंधतंत्र, शिक्षक एवं छात्र सभी भाई-भतीजावाद एवं पैसो के लेनदेन से नकल कराकर प्रमाणपत्र हासिल कर लेने के दुष्चक्र में फंस चुके हैं। इस माफिया का अंग बना युवा, मेधावी बच्चों की सम्भावनाओ का गला काटकर, अपने प्रमाण पत्र लहराकर शिक्षित दिखता है, सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है या फिर बड़े संस्थानों में प्रवेश पा लेता है। जबकि मेधावी छात्र, जो इस फरेब का अंग नहीं बनना चाहते, वे पीछे छूट जाते हैं। इससे उपजी अर्थव्यवस्था से सरकारी अधिकारी परीक्षा करने वाली संस्थाऐं, स्कूल-कॉलेजों के मालिक, शिक्षक, माफिया एवं निकम्मे छात्र लाभान्वित होते हैं और भारत के ताबूत में हर साल कीलें ठोक रहे हैं।

आश्चर्य है कि इस सामूहिक बर्बादी पर सब चुप हैं। सरकार शायद विवश है कि वो निकम्मे और जाल-साज शिक्षकों पर अच्छा काम करने का दबाव डालना नहीं चाहती क्योंकि वह चुनाव तंत्र का महत्वपूर्णं हिस्सा हैं।

प्रदेश में कई बार साधारण स्कूलों के शिक्षक मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच चुके हैं। बावजूद इसके की वो शिक्षा में सुधार लाते, उन्होंने एक ऐसा शिक्षा माफिया खड़ाकर दिया, जिसने विद्यार्थियों की नकल करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया और इससे उपजने वाले धन के संग्रहण के लिए पूरी श्रृंखला खड़ी कर  दी। कोई भी पीढ़ी जिसकी शिक्षा की जड़े हवा में हों, मजबूत भारत के निर्माण में कैसे सहायक होगी? खोखली शिक्षा के आधार पर तैयार ये पीढी, जिसके हाथो में स्मार्ट फोन है, वही इस माफिया तंत्र का हिस्सा बनता है और ये क्रम निरंतर जारी है।

छोटे-छोटे देश अपनी मजबूत शिक्षा व्यवस्था की वजह से विकसित देशो की कतर में आ गए हैं। हमने माफिया को शिक्षा व्यवस्था सौंपकर अपनी कम से कम दो पीढ़ियों को निकम्मा और लाचार बना दिया है। इस बात की ज्यादा संभावना है कि ये पीढ़ी, नक्सलवाद, आतंकवाद और संगठित अपराध की ओर जाये। फिर न समाज के लिए और न ही देश के विकास के लिए कोई योगदान देने में सक्षम हो पायेगी।

यदि हमें एक विकसित समाज और देश की संरचना करनी है, जैसा हमारे नेता भी अपने चुनावी भाषणों में बोलते हैं, तो नेताओं, बुद्धिजीवियों को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था स्थापित करनी ही होगी, जिसमे तकनीक द्वारा संचालित नकल मुक्त शिक्षा पद्धतियों का विकास, मानकीकरण एवं निगरानी अनुभवी व्यक्तियों की समिति या आयोग द्वारा की जाए। नौकरशाही, शिक्षकों एवं पुलिस द्वारा केवल प्रबंधन किया जाए। क्योंकि नौकरशाही, शिक्षक एवं पुलिस इस व्यवस्था को ठीक करने में लगातार नाकाम रहे हैं।

तकनीकी पर आधारित शिक्षा व्यवस्था ही हमें इस मानवीय दुर्गुण से बचा सकती है। अन्यथा हम ऐसे सामूहिक विनाश की तरफ अग्रसर होंगे, जिसे ठीक करने का मौका भी समय हमे नहीं देगा और भावी पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। आशा की जानी चाहिए कि सभी शिक्षाविद् इसकी महत्ता को समझेंगे और वर्तमान नेतागण इस विषय पर गंभीर और महत्त्वपूर्ण निर्णय लेंगे और इस अधोगति को रोकने में सहायक होंगे।

आजादी के बाद से आज तक शिक्षा को सुधारने के लिए दर्जनों आयोग बने और उन्होंने तमाम सुझाव दिये। जिसकी रिर्पोट दशाब्दियों से धूल खा रही है। जब देश में इतना कुछ बदल रहा है, तो  योगी सरकार को उ.प्र. के शिक्षा तंत्र से इस माफिया को दूर करना चाहिए और शिक्षानीति में बड़ा परिवर्तन करना चाहिए। तभी होगा ‘सबका साथ और सबके विकास‘ का नारा सार्थक।

Monday, July 24, 2017

पुराने तरीकों से नहीं सुधरेंगी धर्मनगरियाँ


योगी सरकार उ.प्र. की धर्मनगरियों को सजाना-संवारना चाहती है। स्वयं मुख्यमंत्री इस मामले में गहरी रूचि रखते हैं। उनकी हार्दिक इच्छा है कि उनके शासनकाल में मथुरा, वाराणसी, अयोध्या और चित्रकूट का विकास इस तरह हो कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सुख मिले। इसके लिए वे सब कुछ करने को तैयार हैं।



धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। लोगों की धार्मिक भावनाएं, पुरोहित समाज के पैतिृक अधिकार, वहां आने वाले आम आदमी से अति धनी लोगों तक की अपेक्षाओं को पूरा करना, सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना।



इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खड़जे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। कारण यह है कि सड़क, खड़जे की मानसिकता से टैंडर निकालने वाले, डीपीआर बनाने वाले और ठेके देने वाले, इस दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते। अगर सोच पात होते तो आज तक इन शहरों में कुछ कर दिखाते। पिछले इतने दशकों में इन धर्मनगरियों में विकास प्राधिकरणों ने क्या एक भी इमारत ऐसी बनाई है, जिसे देखा-दिखाया जा सके? क्या इन प्राधिकरणों ने शहरों की वास्तुकला को आगे बढाया है या इन पुरातन शहरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे भवन खड़े कर दिये हैं। नतीजतन ये सांस्कृतिक स्थल अपनी पहचान तेजी से खोते जा रहे हैं।



माना कि विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। बढ़ती आबादी की मांग को भी पूरा करना होता है। मकान, दुकान, बाजार भी बनाने होते हैं, पर पुरातन नगरों की आत्मा को मारकर नहीं। अंदर से भवन कितना ही आधुनिक क्यों न हो, बाहर से उसका स्वरूप, उस शाहर की वास्तुकला की पहचान को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। भूटान एक ऐसा देश है, जहां एक भी भवन भूटान की बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता। चाहे होटल, दफ्तर या दुकान कुछ भी हो। सबके खिड़की, दरवाजे और छज्जे बुद्ध विहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाते हैं। इससे न सिर्फ कलात्मकता बनीं रहती है, बल्कि ये और भी ज्यादा आकर्षक लगते हैं। दुनिया के तमाम पर्यटन वाले नगर, इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। जबकि उ.प्र. में आज भी पुराने ढर्रे से सोचा और किया जा रहा है। फिर कैसे सुधरेगा इन नगरों का स्वरूप?



पिछले हफ्ते जब मैंने उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को ब्रज के बारे में पावर पाइंट प्रस्तुति दी, तो मैंने उनसे स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाराज! दो तरह का भ्रष्टाचार होता है, ‘करप्शन ऑफ डिजाईनकरप्शन ऑफ इम्पलीमेंटेशन। यानि नक्शे बनाने में भ्रष्टाचार और निर्माण करने में भ्रष्टाचार। निर्माण का भ्रष्टाचार तो भारतव्यापी है। बिना कमीशन लिए कोई सरकारी आदमी कागज बढ़ाना नहीं चाहता। पर डिजाईन का भ्रष्टाचार तो और भी गंभीर है। यानि तीर्थस्थलों के विकास की योजनाऐं बनाने में ही अगर सही समझ और अनुभवी लोगों की मदद नहीं ली जायेगी और उद्देश्य अवैध धन कमाना होगा, तो योजनाऐं ही नाहक महत्वाकांक्षी बनाई जायेंगी। गलत लोगों से नक्शे बनावाये  जायेंगे और सत्ता के मद में डंडे के जोर पर योजनाऐं लागू करवाई जायेंगी। नतीजतन धर्मक्षेत्रों का विनाश  होगा, विकास नहीं।



पिछले तीन दशकों में, इस तरह कितना व्यापक विनाश धर्मक्षेत्रों का किया गया है कि उसके दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फिर भी अनुभव से कुछ सीखा नहीं जा रहा। सारे निर्णय पुराने ढर्रे पर ही लिए जा रहे हैं, तो कैसे सजेंगी हमारी धर्मनगरियां? मैं तो इसी चिंता में घुलता जा रहा हूं। शोर मचाओ तो लोगों को बुरा लगता है और चुप होकर बैठो तो दम घुटता है कि अपनी आंखों के सामने, अपनी धार्मिक विरासत का विनाश कैसे हो जाने दें? योगी जी भले इंसान हैं, संत हैं और पैसे कमाने के लिए सत्ता में नहीं आये हैं। मगर समस्या यह है कि उन्हें सलाह देने वाले तो लोग वही हैं ना, जो इस पुराने ढर्रे के बाहर सोचने का प्रयास भी नहीं करते। ऐसे में भगवान ही मालिक है कि क्या होगा?



चूंकि धर्मक्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उद्देश्य रहा है, इसलिए संघ नेतृत्व को चाहिए कि धर्मक्षेत्रों के विकास पर स्पष्ट नीति निधार्रित करने के लिए अनुभवी और चुने हुए लोगों की गोष्ठी बुलाए और उनकी राय लेकर नीति निर्धारण करवाये। नीतिओं में क्रांतिकारी परिवर्तन किये बिना, वांछित सुधार आना असंभव है। फिर तो वही होगा कि चैबे जी गये छब्बे बनने और दूबे बनके लौटे। यही काम योगी जी को अपने स्तर पर भी करना चाहिए। पर इसमें भी एक खतरा है। जब कभी सरकारी स्तर पर ऐसा विचार-विमर्श करना होना होता है, तो निहित स्वार्थ सार्थक विचारों को दबवाने के लिए या उनका विरोध करवाने के लिए, सत्ता के दलालनुमा लोगों को समाजसेवी बताकर इन बैठकों में बुला लेते हैं और सही बात को आगे नहीं बढ़ने देते। इसलिए ऐसी गोष्ठी में केवल वे लोग ही आऐ, जो स्वयंसिद्ध हैं, ढपोरशंखी नहीं। योगी जी ऐसा कर पायेंगे, ये आसान नहीं। क्योंकि रांड सांड, सीढी संयासी, इनसे बचे तो सेवे काशी