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Monday, July 15, 2019

क्यों जरूरी है मोदी जी की ‘हृदय योजना’?

अपनी सनातनी आस्था और अंतराष्ट्रीय समझ के सम्मिश्रण से मोदी जी ने 2014 में ‘स्वच्छ भारत’ या ‘हृदय’ जैसी चिरप्रतिक्षित नीतियों को लागू किया। इनके शुभ परिणाम दिखने लगे हैं और भविष्य और भी ज्यादा दिखाई देंगे। हृदय योजना की राष्ट्रीय सलाहकार समिति का मैं भी पांच में से एक सदस्य था। इस योजना के पीछे मोदी जी का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत के प्राचीन नगरों की धरोहरों को सजा-संवाकर इस तरह प्रस्तुत किया जाय कि विकास की प्रक्रिया में कलात्मकता और निरंतरता बनी रहे। ऐसा न हो कि हर आने वाली सरकार या उस नगर में तैनात अधिकारी अपनी सीमित बुद्धि और अनुभहीनता से नये-नये प्रयोग करके ऐतिहासिक नगरों को विद्रुप बना द, जैसा आजतक करते आये हैं ।
जिन बारह प्राचीन नगरों का चयन ‘हृदय योजना’ के तहत भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने किया, उनमें से मथुरा भी एक था। राष्ट्रीय स्तर पर एक पारदर्शी चयन प्रक्रिया के तहत ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को मथुरा का ‘सिटी एंकर’ बनाया गया। जिसकी जिम्मेदारी है मोदी जी की इस सोच को धरातल पर उतारना। इसलिए कार्यदायी संस्थाओं और प्रशासन की यह जिम्मेदारी रखी गई कि वे ‘सिटी एंकर’ के निर्देशन में ही कार्य करेंगे। 
आजादी के बाद पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने योग्यता और अनुभव को इतना सम्मान दिया। ये बात दूसरी है कि इस अनूठी योजना से उन अधिकारियों और कर्मचारियों को भारी उदर पीड़ा हुई, जो विकास के नाम पर आजतक कमीशनखोरी और कागजी योजनाऐं लागू करते आए हैं। उन्हें ‘सिटी एंकर’ की दखलअंदाजी से बहुत चिढ़ मचती है। फिर भी हमने वृंदावन के यमुना घाटों को व मथुरा के पोतरा कुंड जैसे कई पौराणिक स्थलों को मलवे के ढेर से निकालकर अत्यन्त लुभावनी छवि प्रदान की है, ऐसा हर तीर्थयात्रियों व दर्शक का कहना है। 
दुख की बात ये है कि पुराना ढर्रा अभी भी चालू है। ‘ब्रज तीर्थ विकास परिषद्’ से जुडे़ अधिकारी ब्रज विकास के नाम पर एक से एक फूहड़ योजनाऐं लागू करते जा रहे हैं। मोदी सरकार और योगी सरकार द्वारा प्रदत्त शक्ति और अपार धन की सरेआम बर्बादी हो रही है, जिसे देखकर ब्रजवासी और तीर्थयात्री ही नहीं संतगण भी बेहद दुखी हैं। पर कोई सुनने को तैयार नहीं।
कुछ उदाहरणों से स्थिति स्पष्ट हो जाऐगी। वृंदावन में 400 एकड़ में ‘सौभरि ऋषि पार्क’ बनने जा रहा है। जबकि सतयुग के  सौभरि ऋषि का द्वापर  में वृंदावन की श्रीकृष्ण लीला से कोई संबंध नहीं है। वृंदावन तो श्रीराधारानी और भगवान श्रीकृष्ण की नित्यविहार स्थली है, जहां उनकी लीला के अनुरूप कुँज-निकुँज का भाव और उससे संबंधित नामकरण किया जाना चाहिए । 
इतना ही नहीं , पता चला है कि इस पार्क का स्वरूप ‘डिज्नीलैंड’ जैसा होने जा रहा है। पहले जब वृंदावन में प्रवेश करते थे, तो राष्ट्रीय राजमार्ग से मुड़ते ही एक अद्भुत आध्यत्मिक भावना पनपती थी। पर मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने अब वृंदावन का प्रवेश वैसा ही कर दिया, जैसा आज गुडगाँव का है, जहां बहुमंजलीय इमारतें हैं जिनकी वास्तुकला में वृंदावन की कोई छाप नहीं है। जबकि 300 वर्ष पहले मिर्जा इस्माइल ने जयपुर और मैसूर जैसे शहरों को कलात्मकता के साथ योजनाबद्ध किया था। इतना ही नहीं इस कॉलोनी का नाम भी ‘रूकमणि विहार’ रखा गया है। रूकमणि जी द्वारिकाधीश भगवान की रानी थीं। उनका ब्रज ब्रजलीला से कोई नाता नहीं था। जबकि ब्रजलीला में ऐसी सैंकड़ों गोपियां हैं, जिनके नाम पर इस कॉलोनी का नाम रखा जा सकता था। 
इसी हफ्ते गुरू पूर्णिंमा के अवसर पर श्री गोवर्धन पर्वत की हैलीकॉप्टर से परिक्रमा प्रारंभ की गई है। इससे बड़ा अपमान गोवर्धन भगवान का हो नहीं सकता, जिनके चारों ओर राजे-महाराजे तक नंगे पाव चलकर या दंडवती लगाकर परिक्रमा करते आऐ हों, जिन्हें अपनी अंगुली पर धारणकर बालकृष्ण ने देवराज इंद्र का मानमर्दन किया हो, उन गिर्राज जी के ऊपर उड़कर अब ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ गिर्राज जी का मानमर्दन करवा रही है। 
राधारानी के श्रीधाम बरसाना में चार पर्वत शिखर हैं, जिन्हें ब्रह्माजी का मस्तक माना जाता है। इन पर राधारानी की लीलाओं से जुड़े चार मंदिर हैं-भानुगढ़, विलासगढ़, दानगढ़ व मानगढ़ । ज़रूरत इन पर्वतों के प्राकृतिक सौंदर्य को सुधारने और इनकी पवित्रता सुनिश्चित करने कीं है पर ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ इन पर रेस्टोरेंट बना रही है । जहां हर दम हुड़दंग मचेगा, प्लास्टिक की बोतलें व थर्माकोल जैसे जहरीले कूड़े के ढेर जमा होंगे और 5000 साल से यहां की संरक्षित पवित्रता नष्ट हो जायेगी, जो हाल केदारनाथ और बद्रीनाथ का हुआ। जहां की पवित्रता और प्रकृति से विकास के नाम पर विवेकहीन छेड़छाड़ की गई।
एक लंबी सूची है, जो ये सिद्ध करती है कि मोदीजी और योगीजी की श्रद्धायुक्त धामसेवा की उच्च भावना को अनुभवहीन, भावहीन, अहंकारी और आयतित अधिकारी किस तरह से ब्रज में पलीता लगा रहे हैं।
ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ की संरचना करते समय हमने यह प्रावधान रखा था कि ब्रज संस्कृति के विशेषज्ञ और अनुभवी लोगों की सामूहिक व पारदर्शी सलाह के बिना कोई योजना नहीं बनाई जायेगी। पर आज इसका उल्टा हो रहा है। ब्रज संस्कृति के विशेषज्ञ, संतगण, ब्रजवासी और ब्रज को सजाने में अनुभवी लोगों को दरकिनार कर करोड़ों रूपये की ऐसी वाहियात योजनाऐं लागू की गई है, जिनसे न तो धाम सजेगा और न ही संत और भक्त प्रसन्न होंगे। हां ठेकेदारों की और कमीशनखोरों की जेबें जरूर गर्म हो जाऐंगी।
इसलिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की ‘हृदय योजना’ को और प्रभावशाली तरीके से लागू करने की तुरंत आवश्यक्ता है। जिससे सरकार की सद्इच्छा के बॉवजूद तीर्थों में हो रहा विकास के नाम विनाश और धरोहरों की बर्बादी रूक सके। क्या प्रधानमंत्रीजी कुछ पहल करेंगे ?

Monday, December 31, 2018

‘हृदय’ को हृदयाघात


मोदी जी ने ‘हृदय योजना’ इसलिए शुरू की थी कि हेरिटेज सिटी में डिजाइन की एकरूपता बनी रहे। ये न हो कि उस शहर में आने वाला हर नया नेता और नया अफसर अपनी मर्जी से कोई भी डिजाइन थोपकर शहर को चूं-चूं का मुरब्बा बनाता रहे, जैसा मथुरा-वृन्दावन सहित आजतक देश के ऐतिहासिक शहरों में होता रहा है। यह एक अभूतपूर्व सोच थी, जो अगर सफल हो जाती, तो मोदी जी को ऐतिहासिक शहरों की संस्कृति बचाने का भारी यश मिलता। पर दशकों से कमीशन खाने के आदी नेता और अफसरों ने इस योजना को विफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी क्योंकि उन्हें डर था कि अगर ये योजना सफल हो गई, तो फर्जी नक्शे बनाकर, फर्जी प्रोजेक्ट पास कराने और माल खाने के रास्ते बंद हो जाएंगे। चूंकि मथुरा-वृंदावन में ‘हृदय’ के ‘सिटी एंकर’ के रूप में भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को चुना था, इसलिए उसी अनुभव को यहां साझा करूंगा।

दुनिया के खूबसूरत पौराणिक शहर वृन्दावन का मध्युगीन आकर्षक चेहरा एमवीडीए. के अफसरों के भ्रष्टाचार और लापरवाही से आज विद्रूप हो चुका है। आज भी भोंडे अवैध निर्माण धड़ल्ले से चालू हैं। इस विनाश के लिए जिम्मेदार रहे अफसर ही अब योगी राज  में बनाऐ गऐ ‘ब्रज तीर्थ विकास परिषद् के कर्ता-धर्ता बनकर ब्रज का भारी विनाश करने पर तुले हैं।

ऊपर से दुनिया भर के मीडिया में हल्ला ये है कि ब्रज का भारी विकास हो रहा है। योगी जी ने खजाना खोल दिया है। अब ब्रज अपने पुराने वैभव को फिर पा लेगा। जबकि जमीनी हकीकत ये है कि वृन्दावन, गोवर्धन और बरसाना सब विद्रूपता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। ब्रज के संत, भक्त व ब्रज संस्कृति प्रेमी सब भारी दुखी हैं। मोदी सरकार द्वारा इसी वर्ष पद्मश्री से सम्मानित ब्रज संस्कृति के चलते-फिरते ज्ञानकोश डा. मोहन स्वरूप भाटिया भी 'ब्रजतीर्थ विकास परिषद्' के इन कारनामों से भारी दुखी हैं और बार-बार इसका लिखकर विरोध कर रहे हैं, पर कोई सुनने वाला नहीं।

जयपुर व मैसूर दो सर्वाधिक सुन्दर शहरों में ‘मिर्जा इस्माईल रोड’ उस वास्तुकार के नाम पर हैं, जिसने इन शहरों का नक्शा बनाया था। पेरिस की ‘एफिल टावर’ किसी नेता के नाम पर नहीं बल्कि उसका डिजाइन बनाने वाले इंजीनियर श्री एफिल के नाम पर है। पर योगी सरकार को इतनी सी भी समझ नहीं है कि मथुरा, अयोध्या और काशी के विकास के लिए उन लोगों की सलाह लेती जिनका इन प्राचीन नगरों की संस्कृति से गहरा जुड़ाव है, जिनके पास इस काम का ज्ञान और अनुभव है। पर ऐसा नहीं हुआ। हमेशा की तरह नौकरशाही ने घोटालेबाज या फर्जी सलाहकारों को इन प्राचीन शहरों पर थोपकर, इनका आधुनीकरण शुरू करवा दिया। अब इनका रहा-सहा कलात्मक स्वरूप भी नष्ट हो जाऐगा। बंदर को उस्तरा मिले तो वो क्या करेगा ?

उदाहरण के तौर पर मोदी जी की प्रिय ‘हृदय योजना’ में जब व्यवाहरिक, सुंदर व भावानुकूल वृन्दावन परिक्रमा मार्ग 2.5 किमी० बन ही रहा है, तो शेष 8 किमी. परिक्रमा पर एक नया डिजाइन बनाकर लाल पत्थर का भौंडा काम कराने का क्या औचित्य है ? पर ये पूछने वाला कोई नहीं।

योगी जी के मंत्रियों और अफसरों ने अपने अहंकार और मोटे कमीशन के लालच में, ब्रज में ऐतिहासिक जीर्णोद्धार करती आ  रही ‘द ब्रज फाउंडेशन’ की महत्वपूर्ण भूमिका को नकार कर, विकास के नाम पर, पैसे की बर्बादी का तांडव चला रखा है। जबकि ब्रज फाउंडेशन के योगदान को मोदी जी से लेकर हरेक ने आजतक खूब सराहा है।

उल्लेखनीय है कि योगी सरकार के आते ही 9 पौराणिक कुंडों के जीर्णोद्धार का 27 करोड़ रुपये के काम का ठेका 77 करोड़ रुपये में दिया जा रहा था। गोवर्धन क्षेत्र के विकास का काम जयपुर के मशहूर घोटालेबाज अनूप बरतरिया को सौंपा जा रहा था। द ब्रज फाउंडेशन ने जब इसका विरोध किया, तो सब एकजुट होकर गिद्ध की तरह उस पर टूट पड़े । जिससे ये सब मिलकर ब्रज विकास के नाम पर खुली लूट कर सकें।

उधर सभी संतगण व भक्तजन गत 15 वर्षों से द ब्रज फाउंडेशन के कामों को पूरे ब्रज में देखते व सराहते आये हैं। मोदी जी के खास व भारत के  नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत का कहना है कि, ‘जैसा काम बिना सरकारी पैसे के 15 वर्षों में ब्रज में ब्रज फॉउंडेशन ने  किया है वैसा काम 80 प्रतिशत प्रान्तों के पर्यटन विभागों ने पिछले 71 वर्ष में नहीं किया’।

सारी दुनिया के श्री राधाकृष्ण भक्तों, संतगणों व ब्रजवासियों के लिए ये चिंता और शोभ की बात होनी चाहिए कि 71 वर्षों से आश्रम के नाम पर केवल अपने लिए गेस्ट हाउस बनाने वाले राजनैतिक लोग आज ब्रज की सेवा व विकास के नाम हम सबका खुलेआम उल्लू बना रहे हैं । ब्रज विकास के नाम पर इनकी बनाई हर योजना एक धोका है। इससे न तो ब्रज के कुंड, सरोवर, वन सुधरेंगे और न ही आम ब्रजवासियों को कोई लाभ होगा। ब्रज को ‘डिज्नी वर्ल्ड’ बनाकर बाहर के लोग यहां कमाई करेंगे।

गत 4 वर्षों से मैं इन सवालों पर केंद्र और राज्य सरकार का ध्यान इसी कालम के माध्यम से और पत्र लिखकर भी आकर्षित करता रहा हूं, पर किसी ने परवाह नहीं की। अब मैंने प्रधानमंत्री जी से समय मांगा है, ताकि उनको जमीनी हकीकत बताकर आगे की परिस्थितियां सुधारने का प्रयास किया जा सके। बाकी हरि इच्छा।

Monday, July 24, 2017

पुराने तरीकों से नहीं सुधरेंगी धर्मनगरियाँ


योगी सरकार उ.प्र. की धर्मनगरियों को सजाना-संवारना चाहती है। स्वयं मुख्यमंत्री इस मामले में गहरी रूचि रखते हैं। उनकी हार्दिक इच्छा है कि उनके शासनकाल में मथुरा, वाराणसी, अयोध्या और चित्रकूट का विकास इस तरह हो कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सुख मिले। इसके लिए वे सब कुछ करने को तैयार हैं।



धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। लोगों की धार्मिक भावनाएं, पुरोहित समाज के पैतिृक अधिकार, वहां आने वाले आम आदमी से अति धनी लोगों तक की अपेक्षाओं को पूरा करना, सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना।



इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खड़जे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। कारण यह है कि सड़क, खड़जे की मानसिकता से टैंडर निकालने वाले, डीपीआर बनाने वाले और ठेके देने वाले, इस दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते। अगर सोच पात होते तो आज तक इन शहरों में कुछ कर दिखाते। पिछले इतने दशकों में इन धर्मनगरियों में विकास प्राधिकरणों ने क्या एक भी इमारत ऐसी बनाई है, जिसे देखा-दिखाया जा सके? क्या इन प्राधिकरणों ने शहरों की वास्तुकला को आगे बढाया है या इन पुरातन शहरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे भवन खड़े कर दिये हैं। नतीजतन ये सांस्कृतिक स्थल अपनी पहचान तेजी से खोते जा रहे हैं।



माना कि विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। बढ़ती आबादी की मांग को भी पूरा करना होता है। मकान, दुकान, बाजार भी बनाने होते हैं, पर पुरातन नगरों की आत्मा को मारकर नहीं। अंदर से भवन कितना ही आधुनिक क्यों न हो, बाहर से उसका स्वरूप, उस शाहर की वास्तुकला की पहचान को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। भूटान एक ऐसा देश है, जहां एक भी भवन भूटान की बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता। चाहे होटल, दफ्तर या दुकान कुछ भी हो। सबके खिड़की, दरवाजे और छज्जे बुद्ध विहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाते हैं। इससे न सिर्फ कलात्मकता बनीं रहती है, बल्कि ये और भी ज्यादा आकर्षक लगते हैं। दुनिया के तमाम पर्यटन वाले नगर, इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। जबकि उ.प्र. में आज भी पुराने ढर्रे से सोचा और किया जा रहा है। फिर कैसे सुधरेगा इन नगरों का स्वरूप?



पिछले हफ्ते जब मैंने उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को ब्रज के बारे में पावर पाइंट प्रस्तुति दी, तो मैंने उनसे स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाराज! दो तरह का भ्रष्टाचार होता है, ‘करप्शन ऑफ डिजाईनकरप्शन ऑफ इम्पलीमेंटेशन। यानि नक्शे बनाने में भ्रष्टाचार और निर्माण करने में भ्रष्टाचार। निर्माण का भ्रष्टाचार तो भारतव्यापी है। बिना कमीशन लिए कोई सरकारी आदमी कागज बढ़ाना नहीं चाहता। पर डिजाईन का भ्रष्टाचार तो और भी गंभीर है। यानि तीर्थस्थलों के विकास की योजनाऐं बनाने में ही अगर सही समझ और अनुभवी लोगों की मदद नहीं ली जायेगी और उद्देश्य अवैध धन कमाना होगा, तो योजनाऐं ही नाहक महत्वाकांक्षी बनाई जायेंगी। गलत लोगों से नक्शे बनावाये  जायेंगे और सत्ता के मद में डंडे के जोर पर योजनाऐं लागू करवाई जायेंगी। नतीजतन धर्मक्षेत्रों का विनाश  होगा, विकास नहीं।



पिछले तीन दशकों में, इस तरह कितना व्यापक विनाश धर्मक्षेत्रों का किया गया है कि उसके दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फिर भी अनुभव से कुछ सीखा नहीं जा रहा। सारे निर्णय पुराने ढर्रे पर ही लिए जा रहे हैं, तो कैसे सजेंगी हमारी धर्मनगरियां? मैं तो इसी चिंता में घुलता जा रहा हूं। शोर मचाओ तो लोगों को बुरा लगता है और चुप होकर बैठो तो दम घुटता है कि अपनी आंखों के सामने, अपनी धार्मिक विरासत का विनाश कैसे हो जाने दें? योगी जी भले इंसान हैं, संत हैं और पैसे कमाने के लिए सत्ता में नहीं आये हैं। मगर समस्या यह है कि उन्हें सलाह देने वाले तो लोग वही हैं ना, जो इस पुराने ढर्रे के बाहर सोचने का प्रयास भी नहीं करते। ऐसे में भगवान ही मालिक है कि क्या होगा?



चूंकि धर्मक्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उद्देश्य रहा है, इसलिए संघ नेतृत्व को चाहिए कि धर्मक्षेत्रों के विकास पर स्पष्ट नीति निधार्रित करने के लिए अनुभवी और चुने हुए लोगों की गोष्ठी बुलाए और उनकी राय लेकर नीति निर्धारण करवाये। नीतिओं में क्रांतिकारी परिवर्तन किये बिना, वांछित सुधार आना असंभव है। फिर तो वही होगा कि चैबे जी गये छब्बे बनने और दूबे बनके लौटे। यही काम योगी जी को अपने स्तर पर भी करना चाहिए। पर इसमें भी एक खतरा है। जब कभी सरकारी स्तर पर ऐसा विचार-विमर्श करना होना होता है, तो निहित स्वार्थ सार्थक विचारों को दबवाने के लिए या उनका विरोध करवाने के लिए, सत्ता के दलालनुमा लोगों को समाजसेवी बताकर इन बैठकों में बुला लेते हैं और सही बात को आगे नहीं बढ़ने देते। इसलिए ऐसी गोष्ठी में केवल वे लोग ही आऐ, जो स्वयंसिद्ध हैं, ढपोरशंखी नहीं। योगी जी ऐसा कर पायेंगे, ये आसान नहीं। क्योंकि रांड सांड, सीढी संयासी, इनसे बचे तो सेवे काशी

Monday, December 21, 2015

सरकार का काम नहीं मंदिर चलाना

वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर के सरकारी अधिग्रहण की खबर से वृंदावन उबाल पर है। 500 वर्ष पुराने बांकेबिहार मंदिर पर आश्रित गोस्वामियों के परिवार, संतगण और वृंदावन वासी मंदिर का उत्तर प्रदेशा शासन द्वारा अधिग्रहण किए जाने के खिलाफ धरने-प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे हैं। पिछले 3 दर्शकों से यह मंदिर ब्रज का सर्वाधिक लोकप्रिय मंदिर है। जिसके दर्शन करने हर कृष्णभक्त एक-न-एक बार वृंदावन अवश्य आता है। संकरी गलियों और मध्युगीन भवन के कारण मंदिर पहुँचने का मार्ग और इसका प्रांगण हमेशा भीड़ से भरा रहता है। जिसके कारण काफी अव्यवस्थाएं फैली रहती है। यही कारण है कि व्यवस्थित  रूप से सार्वजनिक स्थलों पर जाने के अभ्यस्त लोग यहां की अव्यवस्थाएं देखकर उखड़ जाते हैं। ऐसे ही बहुत से लोगों की मांग पर उ.प्र. शासन ने इस मंदिर को व मिर्जापुर के विन्ध्यावासिनी मंदिर को सरकारी नियंत्रण में लेने का फैसला किया है। जिसका काफी विरोध हो रहा है।

मंदिर की व्यवस्था सुधरे, दर्शनार्थियों को कोई असुविधा न हो व चढ़ावे के पैसे का सदुपयोग हो, ऐसा कौन नहीं चाहेगा ? पर सवाल है कि क्या अव्यवस्थाएं सरकारी उपक्रमों में नहीं होती? जितने भी सरकारी उपक्रम चलाए जा रहे हैं, चाहे वह राज्य सरकार के हों या केन्द्र सरकार के प्रायः घाटे में ही रहते हैं। कारण उनको चलाने वाले सरकारी अधिकारी और नेता भ्रष्ट आचरण कर इन उपक्रमों का जमकर दोहन करते हैं। तो कैसे माना जाए कि मंदिरों का अधिग्रहण होने के बाद वही अधिकारी रातो-रात राजा हरीशचन्द्र के अनुयायी बन जाएंगे ? यह संभव नहीं है। पिछले दिनों आंध्र प्रदेश के राज्यपाल जोकि तिरूपति बालाजी ट्रस्ट के अध्यक्ष थे, अपनी पीड़ा मुझसे हैदराबाद के राजभवन में व्यक्त करते हुए कह रहे थे कि भगवान के काम में भी ये लोग भ्रष्टाचार करते हैं, यह देखकर बहुत दुःख होता है। वे स्वयं बड़े भक्त हैं और राजभवन से कई किलोमीटर दूर नंगे पांव पैदल चल कर दर्शन करने जाते हैं।

हो सकता है कि उ.प्र. सरकार की इच्छा वाकई बिहारी जी मंदिर और बिन्ध्यावासिनी मंदिर की दशा सुधारने की हो पर जनता यह सवाल करती है कि सीवर, सड़क, पानी, बिजली, यातायात और प्रदूषण जैसी विकराल समस्याओं के हल तो कोई सरकार दे नहीं पाती फिर मंदिरों में घुस कर कौन सा करतब दिखाना चाहती है ? लोगों को इस बात पर भी नाराजगी है कि हिन्दुओं के धर्मस्थालों के ही अधिग्रहण की बात क्यों की जाती है? अन्य धर्मों के स्थलों पर सरकार की निगाह क्यों नहीं जाती ? चाहे वह मस्जिद हो या चर्च। दक्षिण भारत में मंदिरों का अधिग्रहण करके सरकारों ने उसके धन का अन्य धर्मावलंबियों के लिए उपयोग किया है, इससे हिन्दू समाज में भारी आक्रोश है।

बेहतर तो यह होगा कि मंदिरों का अधिग्रहण करने की बजाय सभी धर्मों के धर्मस्थलों के प्रबंधन की एक सर्वमान्य रूपरेखा बना दी जाए। जिसमें उस धर्म स्थल के रख-रखाव की बात हो, यात्रियों की सुविधाओं की बात हो, उस धर्म के अन्य धर्मस्थलों के जीर्णोंद्धार की बात हो और उस धर्म के मानने वाले निर्धन लोगों की सेवा करने के व्यवहारिक नियम बनाए जाएं। साथ ही उस मंदिर पर आश्रित सेवायतों के रखरखाव के भी नियम बना दिए जाएं जिससे उनके परिवार भी सुख से जी सकें। इसके साथ ही धर्मस्थलों की आय का एक निर्धारित फीसदी भविष्य निधि के रूप में जमा करा दिए जाएं। इस फार्मूले पर सभी धर्म के लोगों को अमल करना अनिवार्य हो। इसमें कोई अपवाद न रहे। जो धर्म स्थल इस नियम का पालन न करे उसके अधिग्रहण की भूमिका तो बनाई जा सकती हैं पर जो धर्मस्थल इस नियमावली को पालन करने के लिए तैयार हो उसे छेड़ने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि मंदिरों के साथ उनके उत्सवों और सेवापूजा की सदियों पुरानी जो परंपरा है उसे कोई सरकारी मुलाजिम नहीं निभा सकता। इसलिए भी मंदिरों का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए।

आज से 12 वर्ष पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मा. न्यायाधीशों के अनुरोध पर मैं 2 वर्ष तक बांकेबिहार मंदिर वृंदावन का अवैतनिक रिसीवर रहा था। उस दौरान मंदिर की व्यवस्थाओं का गहराई से देखने और समझने का मौका मिला। जितना बन पड़ा उसमें सुधार करने की कोशिश की। जिसे सभी ने सराहा। पर जो सुधार करना चाहता था उस पासंग भी नहीं कर पाया क्योंकि गोस्वामीगणों के बीच यह विवाद, मुकद्दमेबाजी और आक्रामक रवैए ने कोई बड़ा सुधार होने नहीं दिया। हार कर मैंने बिहारीजी और दानघाटी गोवर्द्धन मंदिर के रिसीवर पद से इस्तीफा दे दिया। मेरा मन स्पष्ट था कि मुझे ब्रज में भगवान के लीलास्थालीयों के जीर्णोद्धार का काम करना है और मंदिरों की राजनीति या उनके प्रबंधन मंे नहीं उलझना है। आज भी मैं इसी बात पर कायम हूं। इसलिए बांकेबिहारी मंदिर के इस विवाद में मेरी कोई रूची नहीं है। पर जनता की भावना की हरेक को कद्र करना चाहिए। यह सही है कि मंदिर का अधिग्रहण होने से वृंदावन के समाज को बहुत तकलीफ होगी। पर दूसरी तरफ मंदिर की व्यवस्था में सुधार भी उतना ही जरूरी है। जिस पर संतों, गोस्वामीगणों को मिल-बैठकर समाधान खोजना चाहिए। गोस्वामियों को चाहिए कि मंदिर की व्यवस्थाओं का फार्मूला तैयार करें और उन सुधारों को फौरन लागू करके दिखाएं और तब सरकार को यह सोचने पर मजबूर करें कि मंदिर का अधिग्रहण करके वह क्या हासिल करना चाहती है। तब इस अधिग्रहण विरोधी आंदोलन की धार और भी तेज होगी