Monday, August 21, 2017

खाद्य पदार्थों में मिलावट पर रोक नहीं

हवा, पानी और भोजन आदमी की जिंदगी की बुनियादी जरूरत हैं। अगर इनमें ही मिलावट होगी, तो जनता कैसे जियेगी? खाद्यान में मिलावट के नियम कितने भी सख्त हों, जब तक उनको ठीक से लागू नहीं किया जायेगा, इस समस्या का हल नहीं निकल सकता। आज मिलावट का कहर सबसे ज्यादा हमारी रोजमर्रा की जरूरत की चीजों पर ही पड़ रहा है। संपूर्ण देश में मिलावटी खाद्य-पदार्थों की भरमार हो गई है । आजकल नकली दूध, नकली घी, नकली तेल, नकली चायपत्ती आदि सब कुछ धड़ल्ले से बिक रहा है। अगर कोई इन्हें खाकर बीमार पड़ जाता है तो हालत और भी खराब है, क्योंकि जीवनरक्षक दवाइयाँ भी नकली ही बिक रही हैं ।
एक अनुमान के अनुसार बाजार में उपलब्ध लगभग 30 से 40 प्रतिशत समान में मिलावट होती है। खाद्य पदार्थों में मिलावट की वस्तुओं पर निगाह डालने पर पता चलता है कि मिलावटी सामानों का निर्माण करने वाले लोग कितनी चालाकी से लोगों की आँखों में धूल झोंक रहे हैं। इन मिलावटी वस्तुओं का प्रयोग करने से लोगों को कितनी कठिनाइयाँ उठानी पड़ रही हैं।
आजकल दूध भी स्वास्थ्यवर्धक द्रव्य न होकर मात्र मिलावटी तत्वों का नमूना होकर रह गया है, जिसके प्रयोग से लाभ कम हानि ज्यादा है। हालत यह है कि लोग दूध के नाम पर यूरिया, डिटर्जेंट, सोडा, पोस्टर कलर और रिफाइंड तेल पी रहे है।
बाजार में उपलब्ध खाद्य तेल और घी की भी हालत बेहद खराब है। सरसों के तेल में सत्यानाशी बीज यानी आर्जीमोन और सस्ता पॉम आयल मिलाया जा रहा है। देशी घी में वनस्पति घी और जानवरों की चर्बी की मिलावट, आम बात हो गई है। मिर्च पाउडर में ईंट का चूरा, सौंफ पर हरा रंग, हल्दी में लेड क्रोमेट व पीली मिट्टी, धनिया और मिर्च में गंधक, काली मिर्च में पपीते के बीज मिलाए जा रहे हैं।
फल और सब्जी में चटक रंग के लिए रासायनिक इंजेक्शन, ताजा दिखने के लिए लेड और कॉपर सोल्युशन का छिड़काव व सफेदी के लिए फूलगोभी पर सिल्वर नाइट्रेट का प्रयोग किया जा रहा है। चना और अरहर की दाल में खेसारी दाल, बेसन में मक्का का आटा मिलाया जा रहा और दाल और चावल पर बनावटी रंगों से पालिश की जा रही है ।
ऐसा अर्से से होता आ रहा है। 50 वर्ष पहले, एक फिल्म में महमूद ने एक गाना गाया था, जो ऊपर लिखे गये सारे पदार्थों का इसी तरह वर्णन करता था। मतलब यह हुआ कि 50 वर्षों में कुछ भी नहीं सुधरा। इसके विपरीत अब तो दूध, फल और सब्जी तक जहरीले हो गये हैं। भारत की पूरी आबादी, इस जहर को खाकर जी रही है। हमारे बच्चे इन मिलावटी सामानों को खाकर बड़े हो रहे हैं। भारत की आने वाली युवा पीढ़ी कैसे ताकतवर बनेगी?
मोदी सरकार के आने के बाद, सबको उम्मीद थी कि खाने के पदार्थों में मिलावट करने वालों पर, सरकार सख्ती करेगी। स्वयं मोदी जी ने अपने भाषणों में इस समस्या की भयावहता को रेखांकित किया था। पर उनके अधीनस्थ अफसरों ने ऐसी नीति बनाई है कि खाद्य पदार्थों में मिलावट का धंधा, दिन-दूना और रात-चैगुना बढ़ गया है। ‘ईज़ आफ बिजनेस’ के नाम पर खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता परखने वाले विभागों को कहा गया है कि वे ऐसी किसी भी अर्जी पर, बिना देर किये, अनापत्ति पत्र जारी कर दिये जायें।
जरा सोचिए कि मलेशिया से ‘पाम आयल’ आया। आयातक ने अनापत्ति पत्र के लिए अर्जी दी। खाद्य नियंत्रण विभाग, अगर यह सुनिश्चित करना चाहे कि यह तेल, खाने योग्य है या नहीं, तो उसे परीक्षा के लिए प्रयोगशाला में भेजना होगा। जहां कैमिस्ट उसकी गुणवत्ता की जांच कर सकें। खाद्य विभाग को यह जांच रिर्पोट 7 दिन में चाहिए। प्रयोगशाला के पास इतने सारे सैंपल जांच के लिए आये हुए हैं कि वो तीन महीने में भी यह रिर्पोट नहीं दे सकती। ऐसे में दो ही विकल्प हैं। पहला कि बिना जांच के, फर्जी अनापत्ति पत्र दे दिये जायें, दूसरा जांच आने तक इंतजार किया जाए। ऐसी स्थिति में खाद्य नियंत्रण विभाग पर लाल फीता शाही और काम में ढीलेपन का आरोप लगाकर, उसके अधिकारियों को शासन द्वारा  प्रताड़ित किया जा सकता है। इसी डर से आज, यह विभाग बिना जांच करावाए ही, अनापत्ति प्रमाण पत्र देने को मजबूर हैं। जबकि ऐसा करने से लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ती है। पर आज हो यही रहा है। खद्यान के नमूनों की बिना जांच कराए ही मजबूरी में, अनापत्ति प्रमाण पत्र देने पड़ रहे हैं। नतीजतन पूरे देश के बाजार में, जहरीले रासायनिक और रंग मिलाकर धड़ल्ले से खाद्यान्न बेचे जा रहे हैं। जिससे हम सबका जीवन खतरे में पड़ रहा है। मोदी सरकार को, इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान देना चाहिए और खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही करनी चाहिए।

Monday, August 14, 2017

ये क्या कह गये हामिद अंसारी ?

10 वर्ष तक भारतीय गणराज्य के उपराष्ट्रपति रहे, डॉ. हामिद अंसारी, अपने विदाई समारोह में भारत के अल्पसंख्यकों की तथाकथित असुरक्षा के विषय में, जो टिप्पणी करके गये, उसे लेकर भारत का बहुसंख्यक समाज बहुत उद्वेलित है। अखबारों में उनके कार्यकाल की ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है, जब उन्होंने स्पष्टतः हिंदू समाज के प्रति, अपने संकोच को सार्वजनिक रूप से प्रकट किया। इसलिए यहां उन्हें दोहराने की आवश्यक्ता नहीं है। सोचने का विषय यह है कि जिस देश में हर बड़े पद पर, अल्पसंख्यक इज्जत के साथ, बैठते रहे हों, वहां उनके असुरक्षित होने की बात कहना, गले नहीं उतरती। भारत का राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त, इंटेलीजेंस ब्यूरो का निदेशक जैसे अत्यंत महत्वपूर्णं व सर्वोच्च पदों पर, अनेक बार अल्पसंख्यक वर्ग के लोग, शानों-शौकत से बैठ चुके हैं।

डॉ. अंसारी से पूछा जाना चाहिए कि जब कश्मीर के हिंदुओं पर वहां के मुसलमान लगातार, हमले कर रहे थे और अंततः उन्हें उनके सदियों पुराने घरों से खदेड़कर, राज्य से बाहर कर दिया, तब क्या उन्होंने ऐसी चिंता व्यक्त की थी? मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी भी हिंदुओं पर होते आ रहे, मुसलमानों के हमलों पर, चिंता व्यक्त की हो। ये पहली बार नहीं है। हमारे देश के वामपंथी इस मामले में सबसे आगे हैं। उन्हें हिंदुओं की साम्प्रदायिकता बर्दाश नहीं होती, लेकिन मुसलमानों की साम्प्रदायिकता और आतंकवाद में उन्हें कुछ भी खोट नजर नहीं आता। तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों और वामपंथियों के ऐसे इकतरफा रवैये से ही, हिंदू समाज ने अब संगठित होना शुरू किया है।  इसलिए इन सबका सीधा हमला, अब हिंदूओं पर हो रहा है। उन्हें लगातार सम्प्रदायिक और धर्माथ कहकर, समाज विरोधी बताया जा रहा है। यही हाल बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भी है, जिन्होंने अपने अधिकारियों को अलिखित निर्देश दे रखे हैं कि उनके प्रांत में मुसलमानों के सौ खून माफ कर दिये जाये, पर अगर कोई हिंदू साईकिल की भी चोरी करते पकडा जाए, तो उसे टांग दिया जाए। इससे पश्चिमी बंगाल के पुलिस महकमे में भारी असंतोष है।

यह सही है कि भाजपा की सरकार केंद्र में आने के बाद से हिंदू युवा कुछ ज्यादा सक्रिय हो गये हैं और कभी-कभी अपने आका्रेश को प्रकट करते रहते हैं। पर इसके पीछे वो उपेक्षा और तिरस्कार है, जिसे उन्होंने पिछले 1000 साल से भोगा है।

डॉ. हामिद अंसारी जैसे लोग, इन दोनों ही वर्गों से अलग हटकर हैं। वे ऐसे कुलीन वर्ग से आते है, जिसने कभी ऐसी उपेक्षा या यात्ना सही नहीं। वे तो हमेशा से अच्छा पढे़, अच्छा खाया-पीया, ताकतवर लोगों की संगत में रहे और पूरे जीवन ऊँचे-ऊँचे पदों पर बैठे। इसलिए ऐसे लोगों से तो कम से कम संतुलित व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। फिर क्यों ये नाटक देखने को मिलते रहते है। होता ये है कि ऐसे कुलीन लोग, आम आदमी के मुकाबले ज्यादा खुदगर्ज होते हैं। जब तक इन्हें मलाई मिलती रहती है, तब तक ये सीधे रस्ते चलते हैं। पर जैसे ही इन्हें लगता है कि अब मलाई उड़ाने का वक्त खत्म हो रहा है, तो ये ऐसे ही बयान देकर, चर्चा में आना चाहते हैं, जिससे और फोरम पर मलाई खाने के रास्ते खुल जायें। इसलिए इनके बयानों में कोई तथ्य नहीं होता। इन्हें गंभीरता से लेना भी नहीं चाहिए।

सोचने की बात ये है कि जब देश की आम जनता, बुनियादी समस्याओं से जूझ रही हो, तब इस तरह के साम्प्रदायिक मुद्दे उठाना, कहां तक जायज है। फिर वो चाहे, कोई भी पक्ष उठाये। आम जनता जानती है कि अचानक साम्प्रदायिक मुद्दे उठाने के पीछे केवल राजनैतिक ऐजेंडा होता है, उस समुदाय विशेष के विकास करने का नहीं। इसलिए ऐसे बयान निजि राजनैतिक लाभ के लिए दिये जाते हैं, समाज के हित के लिए नहीं।

अच्छा होता कि डॉ. अंसारी यह घोषणा करते कि सेवा निवृत्त होकर, वे अल्पसंख्यक समाज में आ रही, कुरीतियों और आतंकवादी सोच के खिलाफ लड़ेंगे, जिससे वे इन भटके हुए युवाओं को राष्ट्र की मुख्य धारा में ला सके। पर ऐसा कुछ भी उन्होंने नहीं कहा और न करेंगे। यह भी चिंता का विषय है कि जिस तरह हिंदू युवा उत्साह के अतिरेक में बिना तथ्यात्मक ज्ञान के भावनात्मक मुद्दों पर, बार-बार उत्तेजित हो रहे हैं, उससे हिंदू समाज की छवि खराब हो रही है। वैदिक संस्कृति की जड़े इतनी गहरी है कि ऐसे हल्के-फुल्के झोंकों से हिलने वाली नहीं। आवश्यक्ता है, उन्हें गहराई से समझने और दुनिया के सामने तार्किक रूप से प्रस्तुत करने की। जिससे विधर्मी भी हमारे ऋषियों की दूर्दृष्टि, वैज्ञानिक सोच और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से प्रभावित होकर, भारत की मुख्यधारा में और भी सक्रिय भूमिका निभायें। डॉ. अंसारी को अभी भी कुछ ऐसा ही करना चाहिए। जिससे समाज को लाभ मिले और इस वकतव्य के बाद उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा, पुनर्स्थापित हो। डॉ. ऐपीजे कलाम उस अखिल भारतीय सनातन सोच की दीप स्तंभ हैं और इसलिए भारतीयों के हृदय में स्थान पा चुके हैं। उन्होंने अपना धर्म नहीं छोड़ा। लेकिन एक सच्चे भारतीय की तरह सामाजिक सद्भाव से जीने का उदाहरण प्रस्तुत किया।

Monday, August 7, 2017

नकलमुक्त शिक्षा व्यवस्था सपना या व्यवस्थित प्रबंधन


प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश का हर युवा, देश के विकास में योगदान करे। इसके लिए उन्होंने ‘कौशल विकास’ का विशेष मंत्रालय भी बनाया है। सर्वविदित है कि सरकार हर नौजवान को नौकरी नहीं दे सकती है। निजी क्षेत्र, कृषि या स्वरोजगार ही वो रास्ते है, जिनके जरिये एक नौजवान अपने जीवन में स्थायित्व ला सकता है। जीवन जीने की चुनौतियां अनेक है। जिनका सामना करने के लिए, हर युवा का संतुलित विकास होना आवश्यक है। व्यक्तित्व विकास का एक महत्वपूर्णं अंग शिक्षा है। अशिक्षित युवा के लिए चुनौतियां और भी बढ़ जाती है। पर समस्या इस बात की है कि जिन्हें शिक्षित या डिग्रीधारी माना जाता है, वे स्वयं ही अंधेरे कुऐं में पड़े हैं। डिग्रियां हाथ में हैं, फिर भी वे शिक्षित नहीं कहे जाते।

वैसे तो संपूर्ण भारत में प्राथमिक, माध्यमिक और स्नातक स्तर की शिक्षा व्यवस्था अपनी आत्मा और आधारभूत संरचनाओं में वर्तमान एवं भावी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। परन्तु विशेषतः उत्तर प्रदेश के परिपेक्ष में इसे सरकारी संरक्षण में नकल माफिया के हाथ सौंपकर इसकी लगभग हत्या ही कर दी गयी है। आश्चर्य जनक है कि समाज, सरकार, प्रशासन और मीडिया, इस न बदली जा सकने वाली सामाजिक और राष्ट्रीय बर्बादी पर चुप्पी साधे है।

सारे साल स्कूल और कॉलेजों में पढाई न के बराबर होती है। शिक्षा व्यवस्था के प्रबंधतंत्र, शिक्षक एवं छात्र सभी भाई-भतीजावाद एवं पैसो के लेनदेन से नकल कराकर प्रमाणपत्र हासिल कर लेने के दुष्चक्र में फंस चुके हैं। इस माफिया का अंग बना युवा, मेधावी बच्चों की सम्भावनाओ का गला काटकर, अपने प्रमाण पत्र लहराकर शिक्षित दिखता है, सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है या फिर बड़े संस्थानों में प्रवेश पा लेता है। जबकि मेधावी छात्र, जो इस फरेब का अंग नहीं बनना चाहते, वे पीछे छूट जाते हैं। इससे उपजी अर्थव्यवस्था से सरकारी अधिकारी परीक्षा करने वाली संस्थाऐं, स्कूल-कॉलेजों के मालिक, शिक्षक, माफिया एवं निकम्मे छात्र लाभान्वित होते हैं और भारत के ताबूत में हर साल कीलें ठोक रहे हैं।

आश्चर्य है कि इस सामूहिक बर्बादी पर सब चुप हैं। सरकार शायद विवश है कि वो निकम्मे और जाल-साज शिक्षकों पर अच्छा काम करने का दबाव डालना नहीं चाहती क्योंकि वह चुनाव तंत्र का महत्वपूर्णं हिस्सा हैं।

प्रदेश में कई बार साधारण स्कूलों के शिक्षक मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच चुके हैं। बावजूद इसके की वो शिक्षा में सुधार लाते, उन्होंने एक ऐसा शिक्षा माफिया खड़ाकर दिया, जिसने विद्यार्थियों की नकल करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया और इससे उपजने वाले धन के संग्रहण के लिए पूरी श्रृंखला खड़ी कर  दी। कोई भी पीढ़ी जिसकी शिक्षा की जड़े हवा में हों, मजबूत भारत के निर्माण में कैसे सहायक होगी? खोखली शिक्षा के आधार पर तैयार ये पीढी, जिसके हाथो में स्मार्ट फोन है, वही इस माफिया तंत्र का हिस्सा बनता है और ये क्रम निरंतर जारी है।

छोटे-छोटे देश अपनी मजबूत शिक्षा व्यवस्था की वजह से विकसित देशो की कतर में आ गए हैं। हमने माफिया को शिक्षा व्यवस्था सौंपकर अपनी कम से कम दो पीढ़ियों को निकम्मा और लाचार बना दिया है। इस बात की ज्यादा संभावना है कि ये पीढ़ी, नक्सलवाद, आतंकवाद और संगठित अपराध की ओर जाये। फिर न समाज के लिए और न ही देश के विकास के लिए कोई योगदान देने में सक्षम हो पायेगी।

यदि हमें एक विकसित समाज और देश की संरचना करनी है, जैसा हमारे नेता भी अपने चुनावी भाषणों में बोलते हैं, तो नेताओं, बुद्धिजीवियों को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था स्थापित करनी ही होगी, जिसमे तकनीक द्वारा संचालित नकल मुक्त शिक्षा पद्धतियों का विकास, मानकीकरण एवं निगरानी अनुभवी व्यक्तियों की समिति या आयोग द्वारा की जाए। नौकरशाही, शिक्षकों एवं पुलिस द्वारा केवल प्रबंधन किया जाए। क्योंकि नौकरशाही, शिक्षक एवं पुलिस इस व्यवस्था को ठीक करने में लगातार नाकाम रहे हैं।

तकनीकी पर आधारित शिक्षा व्यवस्था ही हमें इस मानवीय दुर्गुण से बचा सकती है। अन्यथा हम ऐसे सामूहिक विनाश की तरफ अग्रसर होंगे, जिसे ठीक करने का मौका भी समय हमे नहीं देगा और भावी पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। आशा की जानी चाहिए कि सभी शिक्षाविद् इसकी महत्ता को समझेंगे और वर्तमान नेतागण इस विषय पर गंभीर और महत्त्वपूर्ण निर्णय लेंगे और इस अधोगति को रोकने में सहायक होंगे।

आजादी के बाद से आज तक शिक्षा को सुधारने के लिए दर्जनों आयोग बने और उन्होंने तमाम सुझाव दिये। जिसकी रिर्पोट दशाब्दियों से धूल खा रही है। जब देश में इतना कुछ बदल रहा है, तो  योगी सरकार को उ.प्र. के शिक्षा तंत्र से इस माफिया को दूर करना चाहिए और शिक्षानीति में बड़ा परिवर्तन करना चाहिए। तभी होगा ‘सबका साथ और सबके विकास‘ का नारा सार्थक।

Monday, July 31, 2017

जमीन से जुड़े शहरी विद्यालयों के छात्र

पिछले हफ्ते हमने ब्रज के एक गांव में पौराणिक नाग-पंचमी का मेला आयोजित किया। जिसमें पिछले 3 वर्षों से लगभग बीस हजार ब्रजवासी उत्साह से भाग ले रहे हैं। हमें लगता था कि टी.वी. सीरियलों और यू-ट्यूब के युग में सांस्कृतिक परंपराएं लुप्त हो रही हैं। पर इस तरह के कई मेले, ब्रज में दशाब्दियों बाद दोबारा शुरू करने के बाद, हमें विश्वास हो गया कि लोक संस्कृति की जड़े गहरी हैं। यह सही है कि आज गांवों की शादियों में डी.जे. के कर्कश शोर ने महिलाओं के सारगर्भित लोकगीतों को दबा दिया है। पर अवसर मिलने पर वे स्वयं स्फुरित हो जाते हैं। उनका भाव और शैली मन को छू लेती है। ऐसे मेलों में लोक कलाकारों और ग्रामीण प्रतिभाओं को उभरने का मौका मिलता है। तब पता चलता है कि ‘इंडियन आइडियल’ या ‘डांस इंडिया डांस’ जैसे टीवी शो भी अभी गांवों को प्रदूषित नहीं कर पाऐ हैं। गांव के बच्चे कहीं ज्यादा समझदारी से और सार्थक विषयों पर अपनी बात रखने को उत्साहित रहते हैं।

इस बार हमने एक प्रयोग और किया। गांव के इस लोकप्रिय मेले में मथुरा शहर के प्रमुख विद्यालयों के छात्र-छात्राओं को अपनी-अपनी प्रस्तुतियां देने को आमंत्रित किया। इसका बहुत सुखद अनुभव हुआ और कई लाभ प्राप्त हुए। सुखद अनुभव, इस बात का कि आधुनिक शिक्षा पा रहे, हमारे शहरी बच्चे भी सही प्रशिक्षण और प्रोत्साहन मिलने पर सांस्कृतिक, सामाजिक या पर्यावरण संबंधी विषयों पर कितनी स्पष्ट समझ और सोच रखते हैं। उनकी प्रस्तुतियों ने न सिर्फ हजारों ग्रामवासियों का मन मोहा बल्कि कई सार्थक संदेश भी दिये। जिस आत्मविश्वास के साथ इन शहरी बच्चों ने देहाती माहौल में, बिना संकोच के, अपनी प्रस्तुतियां दीं, उससे ग्रामीण बच्चों को भी बहुत प्रेरणा मिली।

इस दिशा में कई अभिनव प्रयोग देश में चल रहे हैं। ‘प्रदान’, ‘अजय पीरामल फाउंडेशन’, ‘इच वन-टीच वन’ जैसी कई संस्थाऐं मुहिम चलाकर, ग्रामीण विद्यालयों में शहरी स्वयंसेवक भेज रही हैं। जो अपने व्यापक अनुभव को गाँव के सीमित दायरे में रहने वाले, शिक्षकों और विद्यार्थियों से खुलकर बांट रहे हैं। शुरू की हिचक के बाद, उन्हें ग्रामीण विद्यालय स्वीकार कर लेते हैं। फिर देखते ही देखते, पूरे विद्यालय के वातावरण में बहुत बड़ा परिवर्तन आ जाता है। ऐसा परिवर्तन, जो मात्र सरकारी नीतियों से दशाब्दियों में नहीं आता। इसलिए चीन के कामरेड माओ की तरह मोदी जी को ‘मानव संसाधन मंत्रालय’ में एक नीतिगत शुरूआत करवानी चाहिए। जिसके तहत हर शहरी स्कूल के बच्चों तथा अध्यापकों को महीने में एक दिन अपनी गतिविधियां, आसपास के देहातों के विद्यालयों आयोजित करना अनिवार्य हो। इससे दो लाभ होंगे, एक तो ग्रामीण विद्यालय को शहरी विद्यालय के मुकाबले अपने स्तर का पता चलेगा और उसमें भी वैसा कुछ करने की ललक बढ़ेगी। दूसरा हमेशा जमीनी हकीकत से कटे रहने वाले शहरों के मध्यम वर्गीय व उच्च वर्गीय विद्यार्थियों को भारत की असलियत को निकट से देखने और समझने का अवसर मिलेगा। इस विषय में मेरा व्यक्तिगत अनुभव बहुत अनूठा है।

1974 में जब मैं 18 वर्ष का था। शहर के संपन्न परिवार में परवरिश होने के कारण, मैं गांव के जीवन से अनभिज्ञ था। उन्ही दिनों मुरादाबाद के पास, अमरपुरकाशी गांव के ठा. मुकुट सिंह, अपनी आस्ट्रेलियन पत्नी के साथ लंदन से, अपने गांव का विकास करने आए। उनके इस साहसिक और अनूठे कदम ने मुझे उनके गांव जाने के लिए प्रोत्साहित किया। शुरू में मैं ग्रीष्मावकाश के लिए गया। गांव बहुत पिछड़ा और गरीब था। पर वहां के लोगों की सरलता ने मेरा मन मोह लिया। फिर तो मैं लगभग हर हफ्ते वहां जाने लगा और एम.ए. पास करने के बाद, मैंने एक वर्ष, उसी गांव में स्वयंसेवक के रूप में रहने का मन बनाया। वहां देश-विदेश के अन्य युवा भी आकर रहते थे।

अभावों में भी मुकुट सिंह जी और उनकी पत्नी के त्याग, स्नेह और प्रशिक्षण ने, हमें पूरी तरह बदल दिया। अब मुझे पैसे के पीछे भागने की कोई चाहत नहीं थी। क्योंकि जमीनी हकीकत से परिचय हो जाने के बाद, एक ही जुनून था कि जो कुछ करूंगा, समाज के हित के लिए करूंगा। चाहे कितना भी संघर्ष क्यों न करना पड़े। आज उस अनुभव को 40 वर्ष हो गये। पर सोच नहीं बदली। पत्रकारिता की, तो डंके की चोट पर की। किसी को ब्लैकमेल करने या अपना चैनल खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि जनहित के मुद्दों को मजबूती के साथ व्यवस्था के सामने रखने के लिए की। प्रभुकृपा से पत्रकारिता में देश में कई बार इतिहास रचा। गत 15 वर्षों से ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण की नैसर्गिक और सांस्कृतिक लीलास्थलियों को सजाने-संवारने में जुटा हूँ, तो यहां भी प्रभु नित्य नया इतिहास रच रहे हैं। न पत्रकारिता की डगर आसान थी और न ब्रज सेवा की आसान है। पर उनकी ही कृपा से विपरीत परिस्थितियां भी डिगा नहीं पातीं। कुछ पाने की चाहत कभी नहीं रहती। केवल कर्म करने में ही आनंद आता है। इसलिए मैं अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि हर विद्यार्थी को, जिसका जन्म शहरों के संपन्न परिवारों में हुआ हो, नौकरी या व्यवसाय शुरू करने से पहले, कम से कम एक वर्ष किसी पिछड़े गांव में रहने का अनुभव अवश्य करना चाहिए। इससे जीवन के प्रति दृष्टि पूरी तरह बदल जाती है।

Monday, July 24, 2017

पुराने तरीकों से नहीं सुधरेंगी धर्मनगरियाँ


योगी सरकार उ.प्र. की धर्मनगरियों को सजाना-संवारना चाहती है। स्वयं मुख्यमंत्री इस मामले में गहरी रूचि रखते हैं। उनकी हार्दिक इच्छा है कि उनके शासनकाल में मथुरा, वाराणसी, अयोध्या और चित्रकूट का विकास इस तरह हो कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सुख मिले। इसके लिए वे सब कुछ करने को तैयार हैं।



धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। लोगों की धार्मिक भावनाएं, पुरोहित समाज के पैतिृक अधिकार, वहां आने वाले आम आदमी से अति धनी लोगों तक की अपेक्षाओं को पूरा करना, सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना।



इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खड़जे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। कारण यह है कि सड़क, खड़जे की मानसिकता से टैंडर निकालने वाले, डीपीआर बनाने वाले और ठेके देने वाले, इस दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते। अगर सोच पात होते तो आज तक इन शहरों में कुछ कर दिखाते। पिछले इतने दशकों में इन धर्मनगरियों में विकास प्राधिकरणों ने क्या एक भी इमारत ऐसी बनाई है, जिसे देखा-दिखाया जा सके? क्या इन प्राधिकरणों ने शहरों की वास्तुकला को आगे बढाया है या इन पुरातन शहरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे भवन खड़े कर दिये हैं। नतीजतन ये सांस्कृतिक स्थल अपनी पहचान तेजी से खोते जा रहे हैं।



माना कि विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। बढ़ती आबादी की मांग को भी पूरा करना होता है। मकान, दुकान, बाजार भी बनाने होते हैं, पर पुरातन नगरों की आत्मा को मारकर नहीं। अंदर से भवन कितना ही आधुनिक क्यों न हो, बाहर से उसका स्वरूप, उस शाहर की वास्तुकला की पहचान को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। भूटान एक ऐसा देश है, जहां एक भी भवन भूटान की बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता। चाहे होटल, दफ्तर या दुकान कुछ भी हो। सबके खिड़की, दरवाजे और छज्जे बुद्ध विहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाते हैं। इससे न सिर्फ कलात्मकता बनीं रहती है, बल्कि ये और भी ज्यादा आकर्षक लगते हैं। दुनिया के तमाम पर्यटन वाले नगर, इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। जबकि उ.प्र. में आज भी पुराने ढर्रे से सोचा और किया जा रहा है। फिर कैसे सुधरेगा इन नगरों का स्वरूप?



पिछले हफ्ते जब मैंने उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को ब्रज के बारे में पावर पाइंट प्रस्तुति दी, तो मैंने उनसे स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाराज! दो तरह का भ्रष्टाचार होता है, ‘करप्शन ऑफ डिजाईनकरप्शन ऑफ इम्पलीमेंटेशन। यानि नक्शे बनाने में भ्रष्टाचार और निर्माण करने में भ्रष्टाचार। निर्माण का भ्रष्टाचार तो भारतव्यापी है। बिना कमीशन लिए कोई सरकारी आदमी कागज बढ़ाना नहीं चाहता। पर डिजाईन का भ्रष्टाचार तो और भी गंभीर है। यानि तीर्थस्थलों के विकास की योजनाऐं बनाने में ही अगर सही समझ और अनुभवी लोगों की मदद नहीं ली जायेगी और उद्देश्य अवैध धन कमाना होगा, तो योजनाऐं ही नाहक महत्वाकांक्षी बनाई जायेंगी। गलत लोगों से नक्शे बनावाये  जायेंगे और सत्ता के मद में डंडे के जोर पर योजनाऐं लागू करवाई जायेंगी। नतीजतन धर्मक्षेत्रों का विनाश  होगा, विकास नहीं।



पिछले तीन दशकों में, इस तरह कितना व्यापक विनाश धर्मक्षेत्रों का किया गया है कि उसके दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फिर भी अनुभव से कुछ सीखा नहीं जा रहा। सारे निर्णय पुराने ढर्रे पर ही लिए जा रहे हैं, तो कैसे सजेंगी हमारी धर्मनगरियां? मैं तो इसी चिंता में घुलता जा रहा हूं। शोर मचाओ तो लोगों को बुरा लगता है और चुप होकर बैठो तो दम घुटता है कि अपनी आंखों के सामने, अपनी धार्मिक विरासत का विनाश कैसे हो जाने दें? योगी जी भले इंसान हैं, संत हैं और पैसे कमाने के लिए सत्ता में नहीं आये हैं। मगर समस्या यह है कि उन्हें सलाह देने वाले तो लोग वही हैं ना, जो इस पुराने ढर्रे के बाहर सोचने का प्रयास भी नहीं करते। ऐसे में भगवान ही मालिक है कि क्या होगा?



चूंकि धर्मक्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उद्देश्य रहा है, इसलिए संघ नेतृत्व को चाहिए कि धर्मक्षेत्रों के विकास पर स्पष्ट नीति निधार्रित करने के लिए अनुभवी और चुने हुए लोगों की गोष्ठी बुलाए और उनकी राय लेकर नीति निर्धारण करवाये। नीतिओं में क्रांतिकारी परिवर्तन किये बिना, वांछित सुधार आना असंभव है। फिर तो वही होगा कि चैबे जी गये छब्बे बनने और दूबे बनके लौटे। यही काम योगी जी को अपने स्तर पर भी करना चाहिए। पर इसमें भी एक खतरा है। जब कभी सरकारी स्तर पर ऐसा विचार-विमर्श करना होना होता है, तो निहित स्वार्थ सार्थक विचारों को दबवाने के लिए या उनका विरोध करवाने के लिए, सत्ता के दलालनुमा लोगों को समाजसेवी बताकर इन बैठकों में बुला लेते हैं और सही बात को आगे नहीं बढ़ने देते। इसलिए ऐसी गोष्ठी में केवल वे लोग ही आऐ, जो स्वयंसिद्ध हैं, ढपोरशंखी नहीं। योगी जी ऐसा कर पायेंगे, ये आसान नहीं। क्योंकि रांड सांड, सीढी संयासी, इनसे बचे तो सेवे काशी

Monday, July 17, 2017

कहीं महंगाई का बहाना न बन जाए जीएसटी

जीएसटी ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इसके लिए छोटे उद्योग और छोटे व्यापार करने वालों का बड़ा तबका रजिस्टेशन और काम धंधे का हिसाब किताब रखने और हर महीने सरकार को जानकारी देने के लिए कागज पत्तर तैयार करने में लग गया है। इसका तो खैर पहले से अंदाजा था। लेकिन दसियों टैक्स खत्म करके एक टैक्स करने का जो एक फायदा गिनाया गया था कि वस्तु और सेवा पर कुल टैक्स कम हो जाएगा और चीजें सस्ती हो जाएंगी, वह होता नज़र नहीं आया। बल्कि अपनी प्रवृति के अनुसान बाजार ने जीएसटी के बहाने अपनी तरफ से ही ज्यादा बसूली और शुरू कर दी। कानूनी और वैध तरीके अपनी जगह हैं लेकिन देश का ज्यादातर खुदरा व्यापार अभी भी असंगठित क्षेत्र में ही माना जाता है। सो जीएसटी के लक्ष्य हासिल होने में अभी से किंतु परंतु लगने लगे हैं। जीएसटी की आड़ लेकर आम जनता से ज्यादा दाम की अधोषित वसूली पहले दिन से ही शुरू हो गईं। 

जीएसटी लाए जाने का कारण और उसके असर का अंदाजा लगाया जाना जरूरी हो गया है। खासतौर पर इसलिए और जरूरी है क्योंकि नोटबंदी के विस्फोटक फैसले को हम पहले ही सदी का सबसे बड़ा कदम साबित करने में लगे थे। उसका असर का हिसाब अभी लग नहीं पाया। इसीबीच सदी का सबसे बड़ा टैक्स सुधार का धमाका और हो गया। स्वाभाविक रूप् से ऐसे फेसलों का चैतरफा और जबर्दस्त असर होने के कारण इसे चर्चा के बाहर करना मुश्किल होगा। नाकामी की सूरत में तो हायतौबा मचेगी ही लेकिन कामयाबी के बावजूद इसका प्रचार करने में बड़ी दिक्कत आएगी । इसका कारण यह कि जनता सबसे पहले यह देखती है कि उसे सीधे सीधे क्या मिला। जबकि नोटबंदी और जीएसटी में एक समानता यह थी कि इसमें आम जनता के लिए सीधे साीधे पाने का आश्वासन नहीं था। बल्कि अप्रत्यक्ष हासिल यह था कि बड़े लोगों की मौज कम हो जाएगी।

नोटबंदी से बड़े लोगों की मौज कितनी कम हुई इसका अभी  पता नहीं है। भ्रष्टाचार पर क्या असर पड़ा इसका ठीक ठीक आकलन होने में लंबा वक्त लगेगा। सो नोट बंदी के नफे नुकसान का हिसाब अभी नहीं लग सकता। लेकिन जीएसटी ऐसा फेसला था जिसका असर तत्काल होना लाजिमी था। और वह हुआ।
ज्यादा से ज्यादा मुनाफे की चाह में रहने वाले बाजार की प्रवृत्ति ही होती है कि उसे दात बढा़ने के बहाने की तलाश होती है। कभी टकों की हड़ताल कभी पेटोल पंपों की तो कमी खराब  मौसम का बहाना यानी आवश्यक सामान की सप्लाई कम होने के बहाने से दाम हमेशा बढ़ाए जाते हैं। लेकिन दसियों साल बाद जीएसटी से क्रांतिकारी सुधार ने तो बाजार को जैसे सबसे बड़ा बहाना दे दिया। ठंडक में बैठकर साफसुथरे ढंग से खाने वालों को जब बिल में यह देखने को मिलता है कि 18 फीसद यानी दो सौ रूप्ए की थाली लेने में 36 रूप्ए सरकारी खजाने में चले गए तो एक बार वह खुद को यह दिलासा दे लेता है कि चलो साफसुथरी जगह खाना खाना देश के हित में काम आएगा। लेकिन जब वह ये देखता है कि इस बीच सामान के दाम भी बढ़ गए तो उसे समझ में नहीं आता कि सारे टेक्स खुद ही देने के बाद उसे अतिरिक्त पैसे किस बात के देने पड़ रहे हैं।

बड़े गौर करने की बात है कि रोजमर्रा के बहुत से सामान ऐसे हैं कि अगर औसत तबके के खरीददार को महंगे लगते हैं तो वह उसे नहीं भी खरीदता है या कम मात्रा में खरीदकर कर काम चला लेता है। लेकिन पैकेटबंद खाने की चीजें या उम्दा क्लालिटी की चीजें हमेंशा ही बेमौके भी महंगी होती जाती हैं। और उनकी बिक्री पर भी असर नहीं पड़ता। इनका इस्तेमाल करने वाला तबका इतना संपन्न है कि वह कम से कम खाने पीने में किफायत की बात बिल्कुल ही नहीं सोचता। लेकिन वहां बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है जहां तंवाकू, सिगरेट और हल्के नशे की दूसरी चीजों के दाम बढ़ने ने दसियों साल के रिकार्ड तोड़ दिए। जिन्हें लत पड़ चुकी है उनके लिए अव ये चीजें आवश्यक वस्तु की ही श्रेणी में हैं। खुदरा दुकानदार का तर्क होता है कि पैकेट या डिब्बे पर नए रेट आने वाले हैं तब तक थोक में अलग से पैसे देने पड़ रहे हैं। चलिए हफते दो हफते या ज्यादा से ज्यादा महीने दो महीने इस बहाने से ज्यादा दाम वसूली चल भी सकती है। लेकिन देखा यह गया है कि एक बार किसी भी बहाने से महंगाई बढ़ने के बाद उसे नीचे उतारने का कोई तरीका काम नहीं आता। सप्लाई का बहाना बनाकर अरहर की दाल जब चालीस से बढ़कर साठ हुई थी तो सरकार की हरचंद कोशिश के बाद वह नीचे तो आई ही नहीं बल्कि दो सौ रूप्ए तक की महंगाई छू आई।

यहां जीएसटी और महंगाई की बात एक साथ करने की तर्क यह है कि सरकारी एलानों और सरकारी इरादों में जनता से ज्यादा टैक्स की उगाही का मकसद भले न हो लेकिन बाजार में जीएसटी के बहाने अगर ज्यादा मुनाफा वसूली शुरू हो गई तो गली गली में महंगाई की चर्चा शुरू होने में देर नहीं लगेगी। 

Monday, July 10, 2017

योगी आदित्यनाथ जी हकीकत देखिए !

ऑडियो विज्युअल मीडिया ऐसा खिलाड़ी है कि डिटर्जेंट जैसे प्रकृति के दुश्मन जहर को ‘दूध सी सफेदी’ का लालच दिखाकर और शीतल पेय ‘कोला’ जैसे जहर को अमृत बताकर घर-घर बेचता है, पर इनसे सेहत पर पड़ने वाले नुकसान की बात तक नही करता । यही हाल सत्तानशीं होने वाले पीएम या सीएम का भी होता है । उनके इर्द-गिर्द का कॉकस हमेशा ही उन्हें इस तरह जकड़ लेता है कि उन्हें जमीनी हकीकत तब तक पता नहीं चलती, जब तक वो गद्दी से उतर नहीं जाते ।


टीवी चैनलों पर साक्षात्कार, रोज नयी-नयी योजनाओं के उद्घाटन समारोह, भारतीय सनातन पंरपरा के विरूद्ध महंगे-महंगे फूलों के बुके, जो क्षण भर में फेंक दिये जाते हैं, फोटोग्राफरों की फ्लैश लाईट्स की चमक-धमक में योगी आदित्यानाथ जैसा संत और निष्काम राजनेता भी शायद दिग्भ्रमित हो जाता है और इन फ़िज़ूल के कामों में उनका समय बर्बाद हो जाता है । फिर उन्हें अपने आस-पास, लखनऊ के चारबाग स्टेशन के चारों तरफ फैला नारकीय साम्राज्य तक दिखाई नहीं देता, तो फिर प्रदेश में दूर तक नजर कैसे जाएगी? जबकि प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का शोर हर तरफ इतना बढ़-चढ़कर मचाया जा रहा है ।

35 वर्ष केंद्रीय सत्ता की राजनीति को इतने निकट से देखा है और देश की राजनीति में अपनी निडर पत्रकारिता से ऐतिहासिक उपस्थिति भी कई बार दर्ज करवाई है । इसलिए यह सब असमान्य नहीं लगता । पर चिंता ये देखकर होती है कि देश में मोदी जैसे सशक्त नेता और उ.प्र. में योगी जैसे संत नेता को भी किस तरह जमीनी हकीकत से रूबरू नहीं होने दिया जाता ।

हाँ अगर कोई ईमानदार नेता सच्चाई जानना चाहे तो इस मकड़जाल को तोड़ने का एक ही तरीका हैं, जिसे पूरे भारत के सम्राट रहे देवानामप्रियदस्सी मगध सम्राट अशोक मौर्य ने अपने आचरण से स्थापित किया था । सही लोगों को ढू़ंढ-ढू़ंढकर उनसे अकेले सीधा संवाद करना और मदारी के भेष में कभी-कभी घूमकर आम जनता की राय जानना ।

देश के विभिन्न राज्यों में छपने वाले मेरे इस कॉलम के पाठकों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले, मैंने प्रधानमंत्री जी से गोवर्धन पर्वत को बचाने की अपील की थी । मामला यह था कि एक ऐसा हाई-फाई सलाहकार, जिसके खिलाफ सीबीबाई और ई.डी. के सैकड़ों करोड़ों रूपये के घोटाले के अनेक आपराधिक मामले चल रहे हैं, वह बड़ी शान शौकत से ‘रैड कारपेट’ स्वागत के साथ, योगी महाराज और उनकी केबिनेट को गोवर्धन के विकास के साढ़े चार हजार करोड़ रूपये के सपने दिखाकर, टोपी पहना रहा था । मुझसे यह देखा नहीं गया, तो मैंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा, लेख लिखे और उ.प्र. के मीडिया में शोर मचाया । प्रधान मंत्री और मुख्य मंत्री ने लगता है उसे गम्भीरता से लिया । नतीजतन उसे लखनऊ से अपनी दुकान समेटनी पड़ी । वरना क्या पता गोवर्धन महाराज की तलहटी की क्या दुर्दशा होती ।

इसी तरह पिछले कई वर्षों से विश्व बैंक बड़ी-बड़ी घोषाणाऐं ब्रज के लिए कर रहा था । हाई-फाई सलाहकारों से उसके लिए परियोजनाऐं बनवाई गईं, जो झूठे आंकड़ों और अनावश्यक खर्चों से भरी हुई थी । भला हो उ.प्र. पर्यटन मंत्री रीता बहुगुणा और प्रमुख सचिव पर्यटन अवनीश अवस्थी का, कि उन्होंने हमारी शिकायत को गंभीरता से लिया और फौरन इन परियोजनाओं का ठेका रोककर  हमसे उनकी गलती सुधारने को कहा । इस तरह 70 करोड़ की योजनाओं को घटाकर हम 35 करोड़ पर ले आये । इससे निहित स्वार्थों में खलबली मच गई और हमारे मेधावी युवा साथी को अपमानित व  हतोत्साहित करने का प्रयास किया गया । संत और भगवतकृपा से वह षड्यंत्र असफल रहा, पर उसकी गर्माहट अभी भी अनुभव की जा रही है।

हमने तो देश में कई बड़े-बड़े युद्ध लड़े है । एक युद्ध में तो देश का सारा मीडिया, विधायिका, कानूनविद् सबके सब सांस रोके, एक तरफ खड़े होकर तमाशा देख रहे थे, जब सं 2000 में मैंने अकेले भारत के मुख्य न्यायाधीश के 6 जमीन घोटाले उजागर किये । मुझे हर तरह से प्रताड़ित करने की कोशिश की गई। पर कृष्णकृपा मैं से टूटा नहीं और यूरोप और अमेरिका जाकर उनके टीवी चैनलों पर शोर मचा दिया । इस लड़ाई में भी नैतिक विजय मिली ।

मेरा मानना है कि, यदि आपको अपने धन, मान-सम्मान और जीवन को खोने की चिंता न हो और आपका आधार नैतिक हो तो आप सबसे ताकतवर आदमी से भी युद्ध लड़ सकते हैं। पर पिछले 15 वर्षों में मै कुरूक्षेत्र का भाव छोड़कर श्रीराधा-कृष्ण के प्रेम के माधुर्य भाव में जी रहा हूं और इसी भाव में डूबा रहना चाहता हूँ। ब्रज विकास के नाम पर अखबारों में बड़े-बड़े बयान वर्षों से छपते आ रहे हैं। पर धरातल पर क्या बदलाव आता है, इसकी जानकारी हर ब्रजवासी और ब्रज आने वालों को है। फिर भी हम मौन रहते हैं।

लेकिन जब भगवान की लीलास्थलियों को सजाने के नाम पर उनके विनाश की कार्ययोजनाऐं बनाई जाती हैं, तो हमसे चुप नहीं रहा जाता । हमें बोलना पड़ता है । पिछली सरकार में जब पर्यटन विभाग ने मथुरा के 30 कुण्ड बर्बाद कर दिए तब भी हमने शोर मचाया था । जो कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगता । पर ऐसी सरकारों के रहते, जिनका ऐजेंडा ही सनातन धर्म की सेवा करना है, अगर लीलास्थलियों पर खतरा आऐ, तो चिंता होना स्वभाविक है ।
आश्चर्य तो तब होता है, जब तखत पर सोने वाले विरक्त योगी आदित्यनाथ जैसे मुख्यमंत्री को घोटालेबाजों की प्रस्तुति तो ‘रैड कारपेट’ स्वागत करवा कर दिखा दी जाती हो, पर जमीन पर निष्काम ठोस कार्य करने वालों की सही और सार्थक बात सुनने से भी उन्हें बचाया जा रहा हो । तो स्वभाविक प्रश्न उठता है कि इसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाए, उन्हें जो ऐसी दुर्मति सलाह देते हैं या उन्हें, जो अपने मकड़जाल तोड़कर मगध के सम्राट अशोक की तरह सच्चाई जानने की उत्कंठा नहीं दिखाते?

Monday, July 3, 2017

नौकरशाही की बदलती भूमिका

पिछले दिनों उ.प्र. में एक अजीब वाकया हुआ। एक युवा महिला आईएएस अधिकारी ने, जो कि मुख्य विकास अधिकारी के पद पर तैनात है, एक संस्कारवान युवा को अकारण 4 घंटे के लिए अवैध रूप से अपमानित करके थाने में बिठवाया और जब थाने ने बाइज्जत उस युवा को जाने दिया, तो इस महिला अधिकारी ने एक झूठी एफआईआर लिखवाकर मीडिया में बयान दिये कि इस युवा ने उसको धमकाया, उस पर चीखा चिल्लाया, उसे आक्रामक अंगुली दिखाई और सरकारी काम में बाधा पैदा की।

अगले दिन जब अखबारों से उस युवा को यह पता चला कि उसके खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज हो गयी है। तो उसने सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम का ब्यौरा लिखकर उसी जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को ईमेल से अपनी काउंटर एफआईआर भेजी। जिसका एक मुख्य बिंदु यह भी था कि उस अधिकारी के कमरे में उस सुबह के 11 बजे उस वक्त सामान्य वीडियो रिकॉडिंग चल रही थी। युवक ने मांग की पुलिस इस विडियो रिकॉर्डिंग को अपने कब्जे में ले ले, तो दूध का दूध और पानी का पानी समाने आ जायेगा। इस पर वह महिला अधिकारी समझौते की मुद्रा में आ गयी और जिलाधिकारी की पहल पर दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौता हो गया। हालांकि इस प्रक्रिया में उस युवक और उसकी प्रतिष्ठित संस्था को मीडिया में बदनाम करने का असफल प्रयास किया गया, जो तथ्यों के अभाव में टिक नहीं पाया।

उल्लेखनीय है कि वह युवा आईआईटी से बीटैक, एम टैक कम्प्यूटर सांइस से करके, सामाजसेवा के कार्यों में लगा है। उसकी पत्नी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (दिल्ली) से पढ़कर डॉक्टर हैं। उस युवा के श्वसुर 1978 बैच के आईएएस अधिकारी रहे हैं। जिस संस्था के लिए वह युवा कार्य करता है, वह एक अति प्रतिष्ठित संस्था है। जिसकी उपलब्धियों की प्रशंसा स्वयं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री करते हैं। जो भारत सरकार और उ.प्र. सरकार की सलाहकार है। जिसने अपने क्षेत्र में बिना सरकारी व विदेशी आर्थिक मदद के विकास के बड़े-बड़े काम किये हैं।

मुझे जब इस घटना की जानकारी मिली, तो मैंने दोनों पक्षों के बयानों को, अपने हजारों अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्कों को भेज दिया, यह मूल्यांकन करने के लिए कि वे तय करें कि कौन सही है और कौन गलत। चूंकि उस महिला अधिकारी के आरोपों का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है और पुलिस के बार-बार मांगने पर वह अपने कमरे की वीडियो रिकॉर्डिंग देने को तैयार नहीं है। इसी से सिद्ध हो जाता है कि उसने द्वेष की भावना से यह अपराध किया। वैसे भी उसके आचरण की प्रसिद्धि यही है कि वह महिला अपने 5 साल की नौकरी में हर पोस्टिंग पर इसी तरह के नाहक विवाद खड़ी करती रही है और बार-बार उसके तबादले होते रहे हैं।

यहां रोचक बिंदु यह है कि जहां देशभर के 300 से ज्यादा आईएएस अधिकारियों ने इस महिला के अहमकपन की भत्र्सना की, वहीं उ.प्र. के आईएएस अधिकारियों में से कुछ ने अपने व्हाट्एप्प ग्रुप में यह बात उठाई कि इस तरह तो कोई भी युवक हमें धमका कर चला जायेगा। इसलिए हमें एकजुट होकर अपनी साथी महिला का साथ देना चाहिए। पर उस महिला के दुव्र्यवहार की ख्याति पूरे प्रदेश में फैल चुकी है, इसलिए इस प्रस्ताव पर उ.प्र. के आईएएस अधिकारी सहमत नहीं हुए और मामला ठंडा पड़ गया।

चिंता का विषय यह है कि क्या कोई भी आईएएस अधिकारी ऐसे झूठे आरोप लगाकर, ऐसी पृष्ठभूमि के मेधावी युवक को 4 घंटे तक अवैध रूप से थाने में बिठा सकता है? क्या वे बिना सबूत के किसी भी नागरिक पर सरकारी काम में बाधा पहुंचाने का झूठा आरोप लगा सकते हैं? क्या वे खुद ही शुरू करवाई गई, पुलिस की जांच में सहयोग न करके वीडियो रिकाॅर्डिग जैसे प्रमाण दबा सकते हैं ? क्या ऐसा दुराचरण करने वाली महिला आईएएस अधिकारी के आचरण की बिना जांच किये, उसके साथी, उसकी रक्षा में खड़े होकर नैतिकता का परिचय दे रहे थे? अगर इन प्रश्नों के उत्तर ‘नहीं’ में हैं, तो ऐसे अधिकारी के खिलाफ क्या प्रशासनिक कदम उठाये जा सकते है, जो वह ऐसा अपराध दोबारा न करे?

मुख्य विकास अधिकारी का काम कानून व्यवस्था बनाना नहीं, बल्कि क्षेत्र का विकास करना होता है। मुख्य विकास अधिकारियों के कार्यालयों में प्रायः हर प्रोजेक्ट में, हर स्तर पर जो कमीशन खाया जाता है, उसकी जानकारी प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर जिले के छुटभैये ठेकेदार तक को होती है। उसके बाद भी ऐसी सीनाजोरी?

विकास का कार्य कोई सरकार अकेले नहीं कर सकती। इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं और निजी क्षेत्र की भागीदारी जरूरी होती है। पर इस रवैये से तो विकास नहीं किया जा सकता। आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार सवा सौ से ज्यादा उच्च अधिकारियों को कामचोरी के आरोप में जबरन सेवानिवृत्त कर चुकी है और बाकी का मूल्यांकन जारी है, तो क्या ये जरूरी नहीं होगा कि भारत सरकार का कार्मिकी विभाग इस हादसे की पूरी निष्पक्षता से जांच या अध्ययन करवाये और इसे आईएएस की ट्रेनिंग में एक केस स्टडी की तरह पढ़ाया जाए? नागरिकों के अधिकारों का हनन कर, समाज की निष्काम सेवा करने वालों को अपमानित कर और दलालो व रिवश्वत देने वालों को महत्व देकर कोई भी सरकार विकास नहीं करवा सकती। योगी जी को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए, जिससे उनकी प्रजा के साथ ऐसी बदसलूकी करने की कोई हिम्मत न करे। आईएएस अधिकारियों को भी आत्म विश्लेषण करना चाहिए की ऐसी परिस्थिति में वे सच का साथ देंगे या झूठ का?

Monday, June 19, 2017

गोवर्धन का विनाश रोकें मोदी जी


जनवरी 2006 में हैदराबाद के ‘प्रवासी दिवस’ कार्यक्रम में विदेशी प्रतिनिधियों के सामने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी से मेरा रोचक सामना हुआ। मोदी जी गुजरात को भ्रष्टाचार मुक्त करने की बात कर रहे थे, तभी मेरे साथ बैठे मेरे मित्र चंदू पटेल, जो पहले भारतीय हैं, जिन्होंने हिल्टन होटल, लास ऐंजेलस, खरीदा था, खड़े हो गये और बोले, ‘‘नरेन्द्र भाई! आपसे विनीत भाई नारायण खुश नहीं हैं’’। मोदी जी एक क्षण को ठिठक गये। तभी चंदू भाई ने बात पूरी की, ‘‘क्योंकि उन्हें आपके राज्य में कोई घोटाला नहीं मिल रहा‘‘। इस पर मोदी जी और सारा हाल ठहाकों में गूंज गया। इससे पहले मेरा मोदी जी से कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं था।



मुझे आश्चर्य हुआ कि मोदी जी ने तुरंत मेरे बारे में गुजराती में बोलना शुरू कर दिया। वे बोले,‘‘ विनीत भाई नारायण भारत के बड़े पत्रकार हैं। उन्हें भ्रष्टाचार की जड़ में छाछ डालने में मजा आता है। मेरा उन्हें निमंत्रण है कि वे गुजरात आकर मेरे घोटाले खोजें’’।



इस पर मैं खड़ा हो गया और बोला,‘‘ मैं ही विनीत नारायण हूं, पर अब मैं घोटाले नहीं खोजता। अब तो मैं भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीला भूमि ब्रज को सजाने में जुटा हूं। हमारे ठाकुर जी ब्रज छोड़कर आपकी द्वारिका में जा बसे थे। इसलिए आप सब ‘जय श्रीकृष्ण’ बोलते हैं। पुराने जमाने में अनेक राजे-महाराजे ब्रज में आकर कुंड, घाट, वन बनवाते थे। आप आज गुजरात के राजा हो। कहावत है- दुनियां के गुरू सन्यासी, सन्यासियों के गुरू ब्रजवासी। मैं ब्रजवासी होने के नाते, आपको आर्शीवाद देता हूं कि आप भारत के प्रधानमंत्री बनें और ब्रज सजाने में हमारी मदद करें।’’



यह सुनकर नरेन्द्र भाई मोदी भावुक हो गये और बोले, ‘‘जब मैं दिल्ली भाजपा मुख्यालय में था, तब मेरे मन में गोवर्धन की परिक्रमा सजाने का प्रबल भाव आया था। इससे पहले कि मैं कुछ कर पाता, मुझे गुजरात भेज दिया गया। विनीत भाई आप गुजरात आओ, हम आपके प्रयास में पूरा सहयोग करेंगे।’’



2014 में जब मैं नरेन्द्र भाई मोदी को ब्रज विकास की अपनी पावर पाइंट प्रस्तुति दे रहा था। तब उन्हें मैंने ब्रज फाउंडेशन की अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम द्वारा गोवर्धन के सौन्दर्यीकरण के लिए तैयार की गई परिकल्पना की भी प्रस्तुति की थी। जिसे उन्होंने बहुत सराहा।



आजकल गोवर्धन के विकास के नाम पर जो कुछ प्रस्तावित किया जा रहा है, उसे पिछले दिनों अखबारों से जानकर हर कृष्णभक्त और गोवर्धन प्रेमी बहुत विचलित है। गोवर्धन का विकास अमृतसर की तर्ज पर नहीं किया जा सकता। क्योंकि स्वर्ण मंदिर पूरी तरह शहर के बीच स्थित एक शहरीकृत तीर्थस्थल है। जबकि गोवर्धन का अर्थ है-गायों का सवंर्धन करने वाला पर्वत। जहां गायें स्वछन्दता से चरती हों। गोवर्धन महात्म्य के सभी ग्रंथों में रसिक संतों ने गोवर्धन के नैसर्गिक सौन्दर्य का दिव्य वर्णन किया है। जिससे पता चलता है कि यहां सघन वृक्षावली, फलों से लदे वृक्ष, चारों ओर दूध जैसे लगने वाले जलप्रपात और स्वच्छ जल से भरे हुए सरोवर हुआ करते थे और वही यहां की शोभा थी। गोवर्धन की तलहटी की रज में लोट-पोट होकर संत, भजनानंदी और परिक्रमार्थी स्वयं को धन्य मानते थे। कलयुग के प्रभाव से गोवर्धन के इस स्वरूप का तेजी से विनाश किया गया। आजादी के बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल ने यहां कुछ वृक्षारोपण करवाया था। उसके बाद किसी बड़े राजनेता ने गोवर्धन के महात्म्य को जानने और गिर्राज महाराज की यथोचित सेवा करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया।



2003 में जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रयास से मुझे गोवर्धन के दानघाटी मंदिर का मानद रिसीवर बनाया गया, तब से मैंने स्थानीय विशेषज्ञों व जिला प्रशासन के साथ नियमित विचार विर्मशकर गोवर्धन की समस्याओं को समझने का प्रयास किया। उसके बाद देश-विदेश में पढ़े और धर्म में गहरी आस्था रखने वाले आर्किटैक्टों की मदद से गोवर्धन के सौन्दर्यीकरण और यात्रियों के लिए आधुनिक आवश्यक्ताओं को ध्यान में रखते हुए, एक विस्तृत कार्ययोजना की परिकल्पना तैयार की। जिसे तैयार करने में 5 वर्ष लगे।



देखने वाला इसे देखता ही रहा जाता है। यह परियोजना 2008 में हमने उ0प्र0 पर्यटन विभाग को अधिकृत रूप से सौंपी। हमारी चिंता का विषय ये है कि गोवर्धन की मूल भावना को समझे बिना, गोवर्धन के विकास के जिस स्वरूप की बात आज की जा रही है, उससे गोवर्धन का स्वरूप बिगड़ेगा, बनेगा नहीं। प्रधानमंत्रीजी को इस पर ध्यान देना चाहिए और हैदराबाद में हमसे किया वायदा निभाना चाहिए। जिससे गिरिराज महाराज की ऐसी सेवा हो कि संत, भक्त और ब्रजवासी जय-जयकार करें, आहत न हों।



हमें आधुनिक व्यवस्थाओं से कोई परहेज नहीं हैं। समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं। इसलिए दोनो विचार धााराओं के बीच संघर्ष न हो और सौहार्दपूर्णं सामन्जस्य हो, तो बात बन सकती है। इस विषय में प्रधानमंत्री जी के प्रमुख सचिव से लेकर उ.प्र. के मुख्यमंत्री व उनके मंत्रीमंडलीय सहयोगियों तक हमने अपनी चिंता व्यक्त कर दी है। पर सही कदम तो तभी उठेंगे, जब प्रधानमंत्री जी थोड़ी रूचि लें और गोवर्धन का विनाश न होने दें।

Monday, June 12, 2017

एनडीटीवी पर सीबीआई का छापा

जिस दिन एनडीटीवी पर सीबीआई का छापा पड़ा, उसके अगले दिन एक टीवी चैनल पर बहस के दौरान भाजपा के प्रवक्ता का दावा था कि सीबीआई स्वायत्त है। जो करती है, अपने विवेक से करती है। मैं भी उस पैनल पर था, मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। सीबीआई कभी स्वायत्त नही रही या उसे रहने नहीं दिया गया। 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसे अपने अधीन ले लिया था, तब से हर सरकार इसका इस्तेमाल करती आई है। 



रही बात एनडीटीवी के मालिक के यहां छापे की तो मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि डा. प्रणय रॉय एक अच्छे इंसान हैं। मेरा उनका 1986 से साथ है, जब वे दूरदर्शन पर ‘वल्र्ड दिस वीक’ एंकर करते थे और मैं ‘सच की परछाई’। तब देश में निजी चैनल नहीं थे। जैसा मैंने उस शो में बेबाकी से कहा कि 1989 में कालचक्र वीडियो मैग्जी़न के माध्यम से देश में पहली बार स्वतंत्र हिंदी टीवी पत्रकारिता की स्थापना करने के बावजूद, आज मेरा टीवी चैनल नहीं है। इसलिए नहीं कि मुझे पत्रकारिता करनी नहीं आती या चैनल खड़़ा करने का मौका नहीं मिला, बल्कि इसलिए कि चैनल खड़ा करने के लिए बहुत धन चाहिए। जो बिना सम्पादकीय समझौते किये, संभव नहीं था। मैं अपनी पत्रकारिता की स्वतंत्रता खोकर चैनल मालिक नहीं बनना चाहता था। इसलिए ऐसे सभी प्रस्ताव अस्वीकार कर दिये। 



एनडीटीवी के कुछ एंकर बढ़-चढ़कर ये दावा कर रहे हैं कि उनकी स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला हो रहा है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि ‘गोधरा कांड’ के बाद, जैसी रिपोर्टिंग उन्होंने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ की, क्या वैसे ही तेवर से उन्होंने कभी कांग्रेस के खिलाफ भी अभियान चलाया ? जब मैंने हवाला कांड में लगभग हर बड़े दल के अनेकों बड़े नेताओं को चार्जशीट करवाया, तब वे सब चैनलों पर जाकर अपनी सफाई में तमाम झूठे तर्क और स्पष्टीकरण देने लगे। उस समय मैंने उन सब चैनलों के मालिकों और एंकरों को इन मंत्रियों और नेताओं से कुछ तथ्यात्मक प्रश्न पूछने को कहा तो किसी ने नहीं पूछे। क्योंकि वे सब इन राजनेताओं को निकल भागने का रास्ता दे रहे थे। ऐसा करने वालों में एनडीटीवी भी शामिल था। ये कैसी स्वतंत्र पत्रकारिता है? जब आप किसी खास राजनैतिक दल के पक्ष में खड़े होंगे, उसके नेताओं के घोटालों को छिपायेंगे या लोकलाज के डर से उन्हें दिखायेंगे तो पर दबाकर दिखायेंगे। ऐसे में जाहिरन वो दल अगर सत्ता में हैं, तो आपको और आपके चैनल को हर तरह से मदद देकर मालामाल कर देगा। पर जिसके विरूद्ध आप इकतरफा अभियान चलायेंगे, वो भी जब सत्ता में आयेगा, तो बदला लेने से चूकेगा नहीं। तब इसे आप पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हमला नहीं कह सकते।



सोचने वाली बात ये है कि अगर कोई भी सरकार अपनी पर उतर आये और ये ठान ले कि उसे मीडियाकर्मियों के भ्रष्टाचार को उजागर करना है, तो क्या ये उसके लिए कोई मुश्किल काम होगा? क्योंकि काफी पत्रकारों की आर्थिक हैसियत पिछले दो दशकों में जिस अनुपात में बढ़ी है, वैसा केवल मेहनत के पैसे से होना संभव ही न था। जाहिर है कि बहुत कुछ ऐसा किया गया, जो अपराध या अनैतिकता की श्रेणी में आता है। पर उनके स्कूल के साथियों और गली-मौहल्ले के खिलाड़ी मित्रों को खूब पता होगा कि पत्रकार बनने से पहले उनकी माली हालत क्या थी और इतनी अकूत दौलत उनके पास कब से आई। ऐसे में अगर कभी कानून का फंदा उन्हें पकड़ ले तो वे इसेप्रेस की आजादी पर हमला’ कहकर शोर मचायेंगे। पर क्या इसे ‘प्रेस की आजादी पर हमला’ माना जा सकता है?



अगर हमारी पत्रकार बिरादरी इस बात का हिसाब जोड़े कि उसने नेताओं, अफसरों या व्यवसायिक घरानों की कितनी शराब पी, कितनी दावतें उड़ाई, कितने मुर्गे शहीद किये, उनसे कितने मंहगे उपहार लिए, तो इसका भी हिसाब चैकाने वाला होगा। प्रश्न है कि हमें उन लोगों का आतिथ्य स्वीकार ही क्यों करना चाहिए, जिनके आचरण पर निगेबानी करना हमारा धर्म है। मैं पत्रकारिता को कभी एक व्यवसायिक पेशा नहीं मानता, बल्कि समाज को जगाने का और उसके हक के लिए लड़ने का हथियार मानता रहा हूं। प्रलोभनों को स्वीकार कर हम अपनी पत्रकारिता से स्वयं ही समझौता कर लेते हैं। फिर हम प्रेस की आजादी पर सरकार का हमला कहकर शोर क्यों मचाते हैं



सत्ता के विरूद्ध अगर कोई संघर्ष कर रहा हो, तो उसे अपने दामन को साफ रखना होगा। तभी हमारी लड़ाई में नैतिक बल आयेगा। अन्यथा जहां हमारी नस कमजोर होगी, सत्ता उसे दबा देगी। पर ये बातें आज के दौर में खुलकर करना आत्मघाती होता है। मध्य युग के संत अब्दुल रहीम खानखाना कह गये हैं, ‘अब रहीम मुस्किल परी, बिगरे दोऊ काम। सांचे ते तौ जग नहीं, झूंठे मिले न राम’।। जो सच बोलूंगा, तो दुनिया मुझसे रूठेगी और झूंठ बोलूंगा तो भगवान रूठेंगे। फैसला मुझे करना है कि दुनिया को अपनाऊं या भगवान को। लोकतंत्र में प्रेस की आजादी पर सरकार का हमला एक निंदनीय कृत्य है। पर उसे प्रेस का हमला तभी माना जाना चाहिए जबकि हमले का शिकार मीडिया घराना वास्तव में निष्पक्ष सम्पादकीय नीति अपनाता हो और उसकी सफलता के पीछे कोई बड़ा अनैतिक कृत्य न छिपा हो।