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Friday, January 16, 2026

भ्रष्टाचार के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का विभाजित फैसला!

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (पीसी एक्ट) की धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर एक विभाजित फैसला सुनाया है। 13 जनवरी 2026 को न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय व्यक्त की, जिसके परिणामस्वरूप मामला मुख्य न्यायाधीश को बड़ी पीठ के गठन के लिए संदर्भित कर दिया गया। यह फैसला सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की मंजूरी देने से संबंधित है, जो देश में भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण है। धारा 17ए, जो 2018 के संशोधन के माध्यम से अधिनियम में जोड़ी गई थी, जांच एजेंसियों को किसी भी लोक सेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच, पूछताछ या अन्वेषण शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति प्राप्त करने का आदेश देती है। इस प्रावधान का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को राजनीतिक प्रतिशोध या अनावश्यक उत्पीड़न से बचाना है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह भ्रष्ट तत्वों को संरक्षण प्रदान करता है।

भारत में भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है और ऐसे प्रावधान जो जांच प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं, लोकतंत्र की नींव को प्रभावित कर सकते हैं। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने धारा 17ए को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि यह जांच एजेंसियों के हाथ बांधती है और भ्रष्टाचारियों को पूर्व चेतावनी देकर सबूत नष्ट करने का अवसर प्रदान करती है। उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रावधान ने जांच की 'आकस्मिकता' (element of surprise) को समाप्त कर दिया है, जो भ्रष्टाचार के मामलों में आवश्यक है। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने इसे वैध ठहराते हुए कहा कि यह लोक सेवकों को अनावश्यक जांच से बचाता है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। इस विभाजन ने एक बार फिर भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में संतुलन की आवश्यकता पर बहस छेड़ दी है।

2018 से पहले, पीसी एक्ट में जांच के लिए पूर्व अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं थी, केवल अभियोजन के लिए धारा 19 के तहत मंजूरी जरूरी थी। लेकिन 1990 के दशक में, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर सवाल उठे। ऐतिहासिक रूप से, ‘विनीत नारायण बनाम भारत संघ’ (1998) का फैसला एक मील का पत्थर है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए निर्देश दिया कि उच्च अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने ‘सिंगल डायरेक्टिव’ को असंवैधानिक घोषित किया, जो कैबिनेट सचिव स्तर के अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए सरकारी अनुमति मांगता था। इस फैसले ने भ्रष्टाचार विरोधी जांच को मजबूत किया और राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने का प्रयास किया।

हालांकि, 2003 में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (डीएसपीई एक्ट) में धारा 6ए जोड़ी गई, जो संयुक्त सचिव स्तर से ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य करती थी। यह प्रावधान भी विवादास्पद रहा। 2014 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 6ए को असंवैधानिक घोषित कर दिया, क्योंकि यह अधिकारियों के बीच भेदभाव करता था और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन करता था। कोर्ट ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार जांच में सभी को समान रूप से जवाबदेह होना चाहिए, चाहे उनका पद कितना भी ऊंचा हो। इस फैसले ने जांच एजेंसियों को अधिक स्वायत्तता प्रदान की, लेकिन सरकार ने 2018 में पीसी एक्ट में संशोधन कर धारा 17ए पुनः पेश की, जो सभी लोक सेवकों पर लागू होती है और पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाती है।

हालिया विभाजित फैसले से पहले भी धारा 17ए पर विवाद हुए हैं। 2023 में ‘सीबीआई बनाम आरआर किशोर’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2018 के संशोधन पूर्वव्यापी नहीं हैं, अर्थात 2018 से पहले के अपराधों पर धारा 17ए लागू नहीं होती। लेकिन 2024 में चंद्रबाबू नायडू मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ विभाजित हुई, जहां न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस ने धारा 17ए को प्रक्रियात्मक मानकर पूर्वव्यापी प्रभाव दिया, जबकि न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी ने इसे मूलभूत मानकर अस्वीकार किया। यह मामला भी बड़ी पीठ को संदर्भित किया गया। इन फैसलों से स्पष्ट है कि धारा 17ए ने जांच प्रक्रिया को जटिल बनाया है, जिससे कई भ्रष्टाचार मामले लंबित हो गए हैं। उदाहरणस्वरूप, लोकपाल और सीबीआई जैसी संस्थाओं ने शिकायत की है कि पूर्व अनुमति की प्रक्रिया में देरी से भ्रष्टाचारियों को फायदा होता है।

इस प्रावधान के पक्ष में तर्क केवल यही है कि यह ईमानदार अधिकारियों को बचाता है। भारत में राजनीतिक प्रतिशोध के कई उदाहरण हैं, जहां जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया है। न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने अपने फैसले में कहा कि धारा 17ए निर्णय लेने की प्रक्रिया में साहस प्रदान करती है और अनावश्यक जांच से बचाती है। लेकिन वहीं इसके विपक्ष में, न्यायमूर्ति नागरत्ना का मत मजबूत है। यह प्रावधान भ्रष्टाचारियों को पूर्व सूचना देकर सबूत मिटाने का मौका देता है, जो ‘विनीत नारायण’ फैसले के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। अतीत के मामलों से सीखते हुए, हम देखते हैं कि पूर्व अनुमति जैसे प्रावधान अक्सर राजनीतिक संरक्षण का माध्यम बन जाते हैं। उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक के हवाला कांड में, जांच में देरी ने कई आरोपी को बचा लिया था।

इस विभाजित फैसले के गहरे प्रभाव भी हैं। यदि बड़ी पीठ धारा 17ए को असंवैधानिक घोषित करती है, तो भ्रष्टाचार जांच तेज होगी, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल जैसे संगठनों की मांग के अनुरूप है। लेकिन इससे राजनीतिक दुरुपयोग का खतरा बढ़ सकता है, जैसा कि हाल के ईडी और सीबीआई मामलों में देखा गया। यदि इसे बरकरार रखा जाता है, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर होगी, क्योंकि अनुमति प्रक्रिया में महीनों लग सकते हैं। भारत, जहां भ्रष्टाचार सूचकांक में 85वें स्थान पर है, को ऐसे कानूनों की जरूरत है जो जांच को सुगम बनाएं, न कि बाधित।

गौरतलब है कि यह मुद्दा भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में संतुलन की मांग करता है। ‘विनीत नारायण’ जैसे ऐतिहासिक फैसलों ने जांच की स्वतंत्रता पर जोर दिया है और हालिया विभाजित फैसला इसी दिशा में एक कदम है। सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ को इस पर विचार करते हुए ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा और भ्रष्टाचार की रोकथाम दोनों को सुनिश्चित करना चाहिए। भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए, जांच प्रक्रिया पारदर्शी और त्वरित होनी चाहिए, ताकि न्याय की जीत हो। 

Monday, December 22, 2025

अमेरिकी लोकतंत्र की पारदर्शिता और भारतीय संसद! 

अमेरिकी राजनीति में हाल ही में एक बार फिर एक ऐसी घटना घटी जब एफबीआई निदेशक काश पटेल को कांग्रेस की हाउस ज्यूडिशियरी कमिटी के समक्ष सुनवाई के लिए बुलाया गया। यह सुनवाई दिसंबर 2025 में हुई, जहां पटेल को जेफरी एपस्टीन फाइलों, एफबीआई की पारदर्शिता और अन्य विवादास्पद मुद्दों पर कड़े सवालों का सामना करना पड़ा। सुनवाई के दौरान एक एपस्टीन वीडियो चलाया गया, जिसने सदन में हंगामा मचा दिया। पटेल ने दावा किया कि एपस्टीन की फाइलों में कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है कि उन्होंने अन्य लोगों को ट्रैफिकिंग की गई पीड़िताएं प्रदान की थीं और जांच पुराने गैर-अभियोजन समझौतों से बंधी हुई है। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने ही एपस्टीन के खिलाफ मामले को फिर से खोला था, जबकि पहले के प्रशासन (ओबामा और बाइडेन) ने फाइलें जारी नहीं कीं। डेमोक्रेट सांसदों ने पटेल पर ट्रंप को बचाने का आरोप लगाया, जबकि पटेल ने इनकार किया और कहा कि सभी कानूनी रूप से जारी करने योग्य जानकारी साझा की जा रही है। सुनवाई में एजेंटों की पुनर्नियुक्ति, चार्ली किर्क की हत्या की जांच और एफबीआई के राजनीतिकरण जैसे मुद्दे भी उठे, जहां पटेल ने अपराध दर में कमी और गिरफ्तारियों में वृद्धि का हवाला दिया।


यह सुनवाई अमेरिकी लोकतंत्र की एक प्रमुख विशेषता को दर्शाती है। कांग्रेस द्वारा कार्यकारी अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से जवाबदेह ठहराना एक परंपरा रही है। काश पटेल, जो ट्रंप के करीबी सहयोगी हैं और एफबीआई निदेशक के रूप में नियुक्त हुए, को सितंबर 2025 में भी सीनेट और हाउस कमिटियों के समक्ष पेश होना पड़ा था, लेकिन दिसंबर की सुनवाई अधिक विवादास्पद रही क्योंकि इसमें एपस्टीन स्कैंडल पर फोकस था। सुनवाई के दौरान सांसदों ने पटेल से सीधे सवाल किए, जैसे एपस्टीन फाइलों में ट्रंप का नाम कितनी बार आया और क्यों रेडैक्शन (संशोधन) के लिए लगभग 1,000 एजेंटों को लगाया गया। पटेल ने इनकार किया कि संसाधनों का दुरुपयोग हुआ और कहा कि जांच चल रही है, लेकिन अदालती आदेशों से बंधे हैं। इस तरह की सुनवाई लाइव प्रसारित होती हैं, जो जनता को सीधे देखने का अवसर देती हैं और यह अमेरिकी संविधान की जांच और संतुलन की व्यवस्था का हिस्सा है।


यदि तुलना की जाए तो भारत में भी संसद द्वारा किसी अधिकारी को बुलाने की प्रक्रिया है। लेकिन यह अमेरिकी कांग्रेस की तरह सार्वजनिक और नाटकीय नहीं होती। भारतीय संसद की स्थायी समितियां, जैसे लोक लेखा समिति (पीएसी), अनुमान समिति या संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी), अधिकारियों को बुला सकती हैं और पूछताछ कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जेपीसी ने अधिकारियों को समन किया था, लेकिन ये कार्यवाहियां बंद दरवाजों के पीछे होती हैं, मीडिया को अनुमति नहीं होती और कोई लाइव ब्रॉडकास्ट भी नहीं होता। अमेरिका में जहां सुनवाई टीवी पर लाइव होती है और सांसद अधिकारियों को कड़े सवाल भी कर सकते हैं, भारत में यह गोपनीय रहती है ताकि जांच प्रभावित न हो। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 और 118 के तहत समितियां स्वतंत्र हैं, लेकिन सार्वजनिक सुनवाई की परंपरा नहीं है।


क्या भारत में कभी ऐसी सुनवाई हो सकती है? यह संभव है, लेकिन राजनीतिक घोटालों के बावजूद मुश्किल। भारत संसदीय प्रणाली पर आधारित है, जहां कार्यकारी और विधायिका में फ्यूजन है, जबकि अमेरिका राष्ट्रपति प्रणाली में पृथक्करण है। जबकि यहां प्रधानमंत्री और मंत्री संसद के सदस्य होते हैं, इसलिए अधिकारी को बुलाना मंत्री की जिम्मेदारी पर सवाल उठा सकता है, जो राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकता है। यदि कोई बड़ा घोटाला हो, जैसे राफेल डील या कोयला घोटाला आदि, तो जेपीसी तो अवश्य बन सकती है, लेकिन सार्वजनिक सुनवाई से राजनीतिक पार्टियां डरती हैं क्योंकि इससे संसद में हंगामा, इस्तीफे या सरकार गिरने का खतरा होता है। हालांकि, डिजिटल युग में पारदर्शिता की मांग बढ़ रही है। यदि संसद नियमों में संशोधन करे, जैसे सुनवाई को लाइव प्रसारित करने का प्रावधान, तो यह संभव हो सकता है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक संस्कृति में, जहां विपक्ष और सत्ता पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, ऐसी सुनवाई से घोटाला ही फूट सकता है, जैसे संसद में अवरोध या मीडिया ट्रायल। फिर भी, लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह विचारणीय है।


किसी भी लोकतंत्र में, सत्ता में कोई भी पार्टी क्यों न हो, ऐसे अधिकारियों को बुलाने के कई लाभ हैं। सबसे पहले, यह जवाबदेही सुनिश्चित करता है। चुने हुए प्रतिनिधि कार्यकारी अधिकारियों से सवाल कर सकते हैं, जो जनता की ओर से होता है। इससे भ्रष्टाचार, दुरुपयोग या नीतिगत असफलताओं पर रोशनी पड़ती है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में पटेल की सुनवाई से एपस्टीन फाइलों पर जनता को जानकारी मिली, जो अन्यथा छिपी रह सकती थी। भारत में यदि ऐसा हो, तो सरकारी योजनाओं या जांचों की पारदर्शिता अवश्य बढ़ेगी।

दूसरा, यह जांच और संतुलन की व्यवस्था को मजबूत करता है। लोकतंत्र में कोई भी शाखा निरंकुश नहीं होनी चाहिए। विधायिका द्वारा कार्यकारी को बुलाना सत्ता के दुरुपयोग को रोकता है। सत्ता में चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, यह प्रक्रिया नीतियों को जनहित में रखती है। तीसरा, जनता की भागीदारी बढ़ती है। सार्वजनिक सुनवाई से लोग सूचित होते हैं, जो मतदान और सक्रिय नागरिकता को प्रोत्साहित करता है। चौथा, यह राजनीतिक पार्टियों को पारदर्शी बनाता है, क्योंकि सत्ता पक्ष को अपनी नीतियों का बचाव करना पड़ता है, जबकि विपक्ष को रचनात्मक सवाल करने पड़ते हैं। इससे लोकतंत्र की गुणवत्ता सुधरती है।

हालांकि, इस सब के नुकसान भी हो सकते हैं, जैसे राजनीतिकरण या मीडिया ट्रायल, लेकिन देखा जाए तो लाभ अधिक हैं। पटेल की सुनवाई से अमेरिका में एफबीआई की विश्वसनीयता पर बहस हुई, जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। भारत में यदि ऐसी व्यवस्था आए, तो घोटालों के बावजूद, यह देश को मजबूत बनाएगा और जवाबदेही व पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा।  

Monday, November 17, 2025

क्यों नहीं रुकते आतंकी हमले ?

एक बार फिर आतंकवादी हमलों ने देश की राजधानी दिल्ली को दहला दिया। लाल क़िले के भीड़ भरे इलाक़े में ये जानलेवा विस्फोट उस साज़िश से कहीं कम थे जो पूरी दिल्ली को दहलाने के लिए रची गई थी। इन आतंकी हमलों के पीछे पढ़े लिखे ऐसे लोग शामिल हैं जिनसे ऐसी वैशियाना हरकत की उम्मीद नहीं की जा सकती। प्रश्न है कि जब देश की सुरक्षा एजेंसियां हर समय अपने पंजों पर रहती हैं उसके बावजूद भी देश की राजधानी जो कि सुरक्षा के लिहाज़ से काफ़ी मुस्तैद मानी जाती है, वहाँ पर इतनी भारी मात्रा विस्फोटक सामग्री लेकर एक आतंकी कैसे घूम रहा था? कैसे इन विस्फोटक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पहुंचा? हमारी रक्षा और गृह मंत्रालय की खुफिया एजेंसियां  क्या कर रही थी?

इन हमलों से सारा देश हतप्रभ है पहलगाम में हुई आतंकवादी वारदात के छह महीने बाद ही ये दूसरा बड़ा झटका लगा है। सवाल उठता है कि देश में आतंकवाद पर कैसे काबू पाया जाए? हमारा देश ही नहीं दुनिया के तमाम देशों का आतंकवाद के विरुद्ध इकतरफा साझा जनमत है। ऐसे में सरकार अगर कोई ठोस कदम उठाती है, तो देश उसके साथ खड़ा होगा। उधर तो हम सीमा पर लड़ने और जीतने की तैयारी में जुटे रहें और देश के भीतर आईएसआई के एजेंट आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते रहें तो यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती। मैं पिछले 30 वर्षों से अपने लेखों में लिखता रहा हूं कि देश की खुफिया एजेंसियों को इस बात की पुख्ता जानकारी है कि देश के 350 से ज्यादा शहरों और कस्बों की सघन बस्तियों में आरडीएक्स, मादक द्रव्यों और अवैध हथियारों का जखीरा जमा हुआ है जो आतंकवादियों के लिए रसद पहुँचाने का काम करता है। प्रधान मंत्री को चाहिए कि इसके खिलाफ एक ‘आपरेशन क्लीन स्टार’ या ‘अपराधमुक्त भारत अभियान’ की शुरुआत करें और पुलिस व अर्धसैनिक बलों को इस बात की खुली छूट दें जिससे वे इन बस्तियों में जाकर व्यापक तलाशी अभियान चलाएं और ऐसे सारे जखीरों को बाहर निकालें।



गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में हुए धमाके के बाद अपने बयान में यह साफ कहा कि आतंकियों को ऐसा सबक सिखाया जाएगा कि पूरी दुनिया देखेगी। उल्लेखनीय है कि कश्मीर के खतरनाक आतंकवादी संगठन ‘हिजबुल मुजाईदीन’ को दुबई और लंदन से आ रही अवैध आर्थिक मदद का खुलासा 1993 में मैंने ही अपनी विडियो समाचार पत्रिका ‘कालचक्र’ के 10वें अंक में किया था। इस घोटाले की खास बात यह थी कि आतंकवादियों को मदद देने वाले स्रोत देश के लगभग सभी प्रमुख दलों के बड़े नेताओं और बड़े अफसरों को भी यह अवैध धन मुहैया करा रहे थे। इसलिए सीबीआई ने इस कांड को दबा रखा था। घोटाला उजागर करने के बाद मैंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और आतंकवादियों को आ रही आर्थिक मदद के इस कांड की जांच करवाने को कहा।



सर्वोच्च अदालत ने मेरी मांग का सम्मान किया और भारत के इतिहास में पहली बार अपनी निगरानी में इस कांड की जांच करवाई। बाद में यही कांड ‘जैन हवाला कांड’ के नाम से मशहूर हुआ। जिसने भारत की राजनीति में भूचाल ला दिया। पर मेरी चिंता का विषय यह है कि इतना सब होने पर भी इस कांड की ईमानदारी से जांच आज तक नहीं हुई और यही कारण है कि आतंकवादियों को हवाला के जरिये, पैसा आना जारी रहा और आतंकवाद पनपता रहा।



उन दिनों हॉंगकॉंग से ‘फार ईस्र्टन इकोनोमिक रिव्यू’ के संवाददाता ने ‘हवाला कांड’ पर मेरा इंटरव्यू लेकर कश्मीर में तहकीकात की और फिर जो रिर्पोट छपी, उसका निचोड़ यह था कि आतंकवाद को पनपाए रखने में बहुत से प्रभावशाली लोगों के हित जुड़े हैं। उस पत्रकार ने तो यहां तक लिखा कि कश्मीर में आतंकवाद एक उद्योग की तरह है। जिसमें बहुतों को मुनाफा हो रहा है।


उसके दो वर्ष बाद जम्मू के राजभवन में मेरी वहाँ के तत्कालीन राज्यपाल गिरीश सक्सैना से चाय पर वार्ता हो रही थी। मैंने उनसे आतंकवाद के बारे में पूछा, तो उन्होंने अंग्रेजी में एक व्यग्यात्मक टिप्पणी की जिसका अर्थ था कि मुझे ‘घाटी के आतंकवादियों’ की चिंता नहीं है, मुझे ‘दिल्ली के आतंकवादियों’ से परेशानी है। अब इसके क्या मायने लगाए जाए?



आतंकवाद को रसद पहुंचाने का मुख्य जरिया है हवाला कारोबार। अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के तालिबानी हमले के बाद से अमरीका ने इस तथ्य को समझा और हवाला कारोबार पर कड़ा नियन्त्रण कर लिया। नतीजतन तब से आज तक वहां आतंकवाद की कोई घटना नहीं हुइ। जबकि भारत में हवाला कारोबार बेरोकटोक जारी है। इस पर नियन्त्रण किये बिना आतंकवाद की श्वासनली को काटा नहीं जा सकता। एक कदम संसद को उठाना है, ऐसे कानून बनाकर जिनके तहत आतंकवाद के आरोपित मुजरिमों पर विशेष अदालतों में मुकदमे चला कर 6 महीनों में सजा सुनाई जा सके। जिस दिन मोदी सरकार ये 3 कदम उठा लेगी उस दिन से भारत में आतंकवाद का बहुत हद तक सफाया हो जाएगा।


ये चिंता का विषय है कि तमाम दावों और आश्वासनों के बावजूद पिछले चार दशक में कोई भी सरकार आतंकवाद के खिलाफ कोई कारगर उपाय कर नहीं पायी है। हर देश के नेता आतंकवाद को व्यवस्था के खिलाफ एक अलोकतांत्रिक हमला मानते रहे हैं और बेगुनाह नागरिकों की हत्याओं के बाद यही कहते रहे हैं कि आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। पर कई दशक बीत जाने के बाद भी विश्व में आतंकवाद के कम होने या थमने का कोई लक्षण हमें दिखाई नहीं देता।


नए हालात में जरूरी हो गया है कि आतंकवाद के बदलते स्वरुप पर नए सिरे से समझना शुरू किया जाए। हो सकता है कि आतंकवाद से निपटने के लिए बल प्रयोग ही अकेला उपाय न हो। क्या उपाय हो सकते हैं उनके लिए हमें शोधपरख अध्ययनों की जरूरत पड़ेगी। अगर सिर्फ 70 के दशक से अब तक यानी पिछले 40 साल के अपने सोच विचारदृष्टि अपनी कार्यपद्धति पर नजर डालें तो हमें हमेशा तदर्थ उपायों से ही काम चलाना पड़ा है। इसका उदाहरण कंधार विमान अपहरण के समय का है जब विशेषज्ञों ने हाथ खड़े कर दिए थे कि आतंकवाद से निपटने के लिए हमारे पास कोई सुनियोजित व्यवस्था ही नहीं है।

यदि विश्वभर के शीर्ष नेतृत्त्व एकजुट होकर कुछ ठोस कदम उठाऐं, तो उम्मीद है कि हम आतंकवाद के साथ भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, शोषण और बेरोजगारी जैसी समस्याओं का भी समाधान पा लें। देश इस समय गंभीर हालत से गुजर रहा है। मातम की इस घड़ी में रोने के बजाए सीमा सुरक्षा पर गिद्धदृष्टि और दोषियों को कड़ा जबाब देने की कार्यवाही की जानी चाहिए। पर ये भी याद रहे कि हम जो भी करें, वो दिलों में आग और दिमाग में बर्फ रखकर करें। 

Monday, October 13, 2025

जल संकट की दस्तक: अब दिल्ली से दूर नहीं

इस वर्ष देश भर में हुई भारी बारिशों और जल प्रलय के बावजूद भारत के शहरी क्षेत्रों में जल संकट अब कोई दूर की आशंका नहीं, बल्कि एक कठोर सच्चाई बन चुका है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु जैसे महानगर, जो आर्थिक प्रगति और आधुनिक जीवनशैली के प्रतीक हैं, अब जल प्रबंधन की विफलता के गंभीर परिणाम झेल रहे हैं। हाल ही में दिल्ली के वसंत कुंज क्षेत्र में तीन बड़े मॉल और आसपास की कॉलोनियों में पानी की सप्लाई पूरी तरह ठप हो जाने से यह संकट फिर सुर्ख़ियों में आया। इन प्रतिष्ठानों को बंद करने की नौबत इसलिए आ गई है क्योंकि टैंकरों से इनकी जल आपूर्ति रुक गई, जबकि भूजल दोहन (ग्राउंड वॉटर बोरिंग) पर पहले से ही एनजीटी ने प्रतिबंध लगा रखा है। यह स्थिति केवल अस्थायी तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक गहरे प्रशासनिक और नैतिक संकट की ओर संकेत करती है। पिछले सात दशकों में खरबों रुपया जल प्रबंधन पर खर्च किए जाने के बावजूद ऐसा क्यों है? 


दिल्ली जैसे शहर में जहाँ जनसंख्या 2 करोड़ से अधिक है, जल आपूर्ति व्यवस्था लंबे समय से दबाव में है। दिल्ली जल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, शहर में प्रतिदिन करीब 1,000 मिलियन गैलन पानी की मांग है, जबकि उपलब्धता मुश्किल से 850 मिलियन गैलन तक पहुँच पाती है। वसंत कुंज जैसे पॉश इलाकों में भी पिछले कुछ वर्षों से पानी की टंकियों और निजी टैंकरों पर निर्भरता बढ़ी है। परंतु इस बार स्थिति पहले से कहीं अधिक भयावह हो गई क्योंकि प्रशासन ने सुरक्षा और ट्रैफिक कारणों से टैंकरों की आवाजाही पर रोक लगा दी। इस निर्णय का सबसे बड़ा असर व्यापारिक केंद्रों जैसे मॉल्स, रेस्तरां और दुकानों पर पड़ा है। इन मॉल्स में हज़ारों कर्मचारी काम करते हैं और प्रतिदिन लाखों ग्राहक आते हैं; बिना पानी के ऐसी व्यवस्था एक दिन भी नहीं चल सकती। शौचालय, सफाई, भोजनालय, अग्निशमन प्रणाली, सब कुछ जल आपूर्ति पर निर्भर हैं। जब टैंकरों की आपूर्ति रुकी, तो केवल व्यापार ही नहीं, आसपास के आवासीय समाज भी संकट में पड़ गए।



दिल्ली सरकार ने कुछ वर्ष पहले भूजल दोहन पर सख्त प्रतिबंध लगाया था। उद्देश्य यह था कि गिरते जलस्तर को रोका जाए। यह पहल पर्यावरणीय दृष्टि से आवश्यक थी, क्योंकि लगातार बढ़ते दोहन ने दिल्ली के अधिकांश क्षेत्रों में भूजल को 300 फीट से भी अधिक नीचे पहुँचा दिया था। लेकिन सवाल यह है कि क्या वैकल्पिक व्यवस्था पर्याप्त रूप से विकसित की गई?


जब सरकार ने ग्राउंड वॉटर बोरिंग को गैरकानूनी घोषित किया, तब उसे समानांतर रूप से मजबूत टैंकर नेटवर्क, पुनर्चक्रण संयंत्र और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम विकसित करने चाहिए थे। दुर्भाग्यवश, नीतियाँ बनीं पर उनका कार्यान्वयन अधूरा रह गया। परिणामस्वरूप, लोग न तो कानूनी तरीके से पानी निकाल सकते हैं, न सरकारी वितरण पर भरोसा कर सकते हैं। सोचने वाली बात ये है कि यदि जाड़ों में यह हाल है तो गर्मियों में क्या होगा?



दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में पानी की आपूर्ति से जुड़ा टैंकर कारोबार वर्षों से विवादों में रहा है। कई जगह यह सार्वजनिक सेवा से अधिक निजी व्यवसाय बन चुका है। अधिकारियों और टैंकर ठेकेदारों के बीच मिलीभगत के आरोप नए नहीं हैं। दिल्ली में जल आपूर्ति में आई यह हालिया बाधा भी ऐसे ही भ्रष्टाचार की परतें उजागर करती प्रतीत होती है।


त्योहारों के मौसम में जब पानी की मांग बढ़ जाती है, घरों में सजावट, साफ-सफाई और उत्सव आयोजन अधिक होते हैं।ऐसे समय पर टैंकरों की आवाजाही पर प्रतिबंध या ‘तकनीकी समस्या’ का बहाना बना देना संदेह उत्पन्न करता है। कई स्थानीय निवासियों का कहना है कि कुछ जल एजेंसियों ने टैंकरों की उपलब्धता को कृत्रिम रूप से सीमित कर कीमतें बढ़ाने की कोशिश की है। इससे न केवल आम नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा, बल्कि मॉल्स और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बंद करने की स्थिति आ गई। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन का उदाहरण होगा। जल जैसी बुनियादी संपदा के साथ ऐसा बर्ताव किसी नागरिक समाज में अक्षम्य अपराध है।


भारत में जल नीति के कई स्तर हैं। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और नगरपालिका निकाय सब अपने ढंग से काम करते हैं। लेकिन इन सबमें तालमेल का अभाव है। राष्ट्रीय जल नीति (2012) यह कहती है कि हर नागरिक को पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण जल मिलेगा, पर छोटे शहरों को तो छोड़ें, दिल्ली जैसे शहरों में भी वास्तविकता इसके उलट है। नगर पालिकाएँ रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की अनिवार्यता घोषित तो करती हैं, पर अधिकांश इमारतों में यह प्रणाली केवल कागज़ों पर मौजूद है। जल पुनर्चक्रण संयंत्रों की क्षमता भी इस संकट का सामना करने के लिए अपर्याप्त है। यमुना का प्रदूषण भी दिल्ली की जल आपूर्ति पर सीधा असर डालता है। यदि यमुना से शुद्ध जल नहीं मिलेगा, तो शहर को बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे राजनीतिक टकराव भी बढ़ते हैं।


हालाँकि नीति-निर्माण और कार्यान्वयन की बड़ी जिम्मेदारी सरकार पर है, नागरिक भी पूरी तरह निर्दोष नहीं हैं। शहरी समाज में जल का अनावश्यक उपयोग आम बात है। बागवानी में अत्यधिक पानी, कार धोने में व्यर्थ बहाव, और रिसाव की अनदेखी। स्वच्छ भारत मिशन या हर घर जल जैसे अभियानों की सफलता तभी संभव है जब लोग खुद बदलाव का हिस्सा बनें। रेन वॉटर हार्वेस्टिंग और ग्रे-वॉटर रीसाइक्लिंग जैसे उपाय व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर अपनाए जा सकते हैं। मॉल्स और हाउसिंग सोसाइटीज़ में यह व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए, ताकि टैंकरों पर निर्भरता घटे।


दिल्ली का वर्तमान संकट केवल एक चेतावनी है। आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएँ और बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक़, यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए तो 2030 तक देश के आधे बड़े शहर ‘जल-विहीन’ क्षेत्रों की श्रेणी में आ सकते हैं। इसलिए अब समय है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर दीर्घकालिक रणनीति अपनाएँ। गौरतलब है कि अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी पानी के अभाव के कारण मात्र 15 सालों में ही उजड़ गई थी। महानगरों में वर्षा जल संग्रहण प्रणाली को सख्ती से लागू करना। जल पुनर्चक्रण संयंत्रों की संख्या और क्षमता बढ़ाना। टैंकर संचालन को पारदर्शी और जीपीएस-नियंत्रित बनाना ताकि रिश्वतखोरी पर रोक लगे। यमुना जैसी नदियों की सफाई और पुनर्जीवन को प्राथमिकता देना। पानी की बर्बादी रोकने के लिए सख्त कानून और जनजागरूकता अभियान चलाना। इन कदमों के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जल प्रबंधन केवल संकट आने पर चर्चा का विषय न बने, बल्कि शहरी नियोजन की मूल नीति का हिस्सा हो। 


दिल्ली पर आई जल संकट की दस्तक यह याद दिलाता है कि पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। जब-जब हम इसे समझने में चूक करते हैं, तो सभ्यता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है। यदि सरकार और नागरिक समाज अब भी इस संकट को गंभीरता से नहीं लेते, तो ‘जल युद्ध’ भविष्य का नहीं, वर्तमान का शब्द बन जाएगा। जलसंकट का समाधान केवल योजनाओं से नहीं, ईमानदार नीयत और सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। 

 Corruption

Monday, August 11, 2025

उत्तरकाशी की त्रासदी: एक चेतावनी

भारत के पहाड़ी क्षेत्र, विशेष रूप से हिमालयी राज्यों जैसे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, प्राकृतिक सौंदर्य और जैव-विविधता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। ये क्षेत्र न केवल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं, बल्कि गंगा, यमुना और अन्य प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल भी हैं, जो देश की जीवनरेखा हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता ने गंभीर चिंता पैदा की है। उत्तरकाशी में हाल ही में भीषण बाढ़ और मलबे के प्रवाह ने एक बार फिर से यह सवाल उठाया है कि क्या हम अपने पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहे हैं ? यह आपदा, जो भगीरथी पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र (बीईएसजेड) में हुई, न केवल प्राकृतिक कारणों से बल्कि अवसंरचना परियोजनाओं के कुप्रबंधन और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण और भी विनाशकारी बन गई। यह समय है कि हम इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें और तत्काल कार्रवाई करें।



5 अगस्त 2025 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में एक बादल फटने की घटना ने भारी तबाही मचाई। खीर गंगा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में हुई इस घटना ने गांव के घरों, होटलों, दुकानों और सड़कों को तहस-नहस कर दिया।चार लोगों की मौत हो गई और 50 से 100 लोग लापता हो गए। यह आपदा भगीरथी पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र में हुई, जो 2012 में गंगा नदी की पारिस्थितिकी और जलस्रोतों की सुरक्षा के लिए अधिसूचित किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण कार्य, जैसे कि नदी के बाढ़ क्षेत्रों पर होटल और हेलीपैड का निर्माण, ने इस आपदा को और अधिक गंभीर बना दिया।



उत्तरकाशी की यह घटना कोई अपवाद नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बार-बार बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं सामने आई हैं। 2013 की केदारनाथ बाढ़, जिसमें 5,700 से अधिक लोग मारे गए थे और 2021 की चमोली बाढ़, जिसमें 200 से अधिक लोग मारे गए या लापता हो गए, ऐसी त्रासदियों के उदाहरण हैं। इन आपदाओं का एक प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन है, जो हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने और बादल फटने की घटनाओं को बढ़ा रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ मानवीय गतिविधियां, विशेष रूप से अवसंरचना परियोजनाओं का गलत प्रबंधन, इन आपदाओं की तीव्रता को और बढ़ा रहा है।


हिमालयी क्षेत्र की भूवैज्ञानिक संरचना अत्यंत नाजुक है। यह क्षेत्र टेक्टोनिक गतिविधियों के कारण भूकंपीय रूप से सक्रिय और भूस्खलन के लिए अतिसंवेदनशील है। फिर भी, चारधाम परियोजना जैसे बड़े पैमाने की सड़क निर्माण परियोजनाएं, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और अनियंत्रित पर्यटन ने इस क्षेत्र की स्थिरता को और कमजोर किया है। उत्तरकाशी में चारधाम परियोजना के तहत धरासू-गंगोत्री खंड का चौड़ीकरण और हिना-टेखला के बीच प्रस्तावित बायपास, जिसमें 6,000 देवदार के पेड़ों को काटने की योजना है, पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय रहा है।


चारधाम परियोजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई कानूनी चुनौतियां सामने आई हैं, क्योंकि यह परियोजना पर्यावरणीय खतरों को बढ़ा रही है। विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि सड़क चौड़ीकरण के लिए पहाड़ों की कटाई, वनों की अंधाधुंध कटाई और नदी के किनारों पर निर्माण कार्य इस क्षेत्र को और अधिक अस्थिर बना रहे हैं। 2023 में सिल्क्यारा सुरंग प्रकरण ने भी यही दिखाया कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) के बिना परियोजनाओं को मंजूरी देना कितना खतरनाक हो सकता है।


इसी तरह, हिमाचल प्रदेश में शिमला के शोघी-धल्ली राजमार्ग परियोजना के लिए पहाड़ों की कटाई ने भूस्खलन के खतरे को बढ़ा दिया है। शिमला, जो कभी 30,000 लोगों के लिए बनाया गया था, अब 300,000 लोगों और लाखों पर्यटकों का बोझ सह रहा है। कुल्लू और मनाली जैसे पर्यटन स्थल भी अनियंत्रित निर्माण और पर्यटकों की भीड़ के कारण पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहे हैं।


जलवायु परिवर्तन ने हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता को बढ़ा दिया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार, 1988 से 2023 तक उत्तराखंड में 12,319 भूस्खलन हुए, जिनमें से 1,100 अकेले 2023 में दर्ज किए गए। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और ग्लेशियल झीलों का विस्तार ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) का खतरा बढ़ा रहा है। उत्तरकाशी की हालिया बाढ़ में भी विशेषज्ञों ने जीएलओएफ की संभावना जताई है।


इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ रही है, जिससे बादल फटने और भारी बारिश की घटनाएं अधिक आम हो रही हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, उत्तरकाशी में 43 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो बादल फटने की परिभाषा (100 मिमी/घंटा) से कम थी, लेकिन लगातार तीन दिनों की बारिश ने मिट्टी को संतृप्त कर दिया, जिससे मलबे का प्रवाह और बाढ़ बढ़ गई।


पर्यटन उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा है। 2023 में चारधाम यात्रा में 56 लाख से अधिक पर्यटक आए, जिसके कारण होटल, लॉज और सड़कों का निर्माण तेजी से हुआ। हालांकि, यह अनियंत्रित निर्माण नदी किनारों और अस्थिर ढलानों पर किया गया, जिसने प्राकृतिक प्रतिरोधों को नष्ट कर दिया। जोशीमठ में 2023 में 700 से अधिक घरों में दरारें आ गईं, क्योंकि यह शहर प्राचीन भूस्खलन मलबे पर बना है और वहां टपकेश्वर विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना और चारधाम सड़क परियोजना ने इसके ढलानों को अस्थिर कर दिया।


उत्तरकाशी की त्रासदी और हिमाचल-उत्तराखंड में बार-बार होने वाली आपदाएं यह स्पष्ट करती हैं कि अब केवल चर्चा पर्याप्त नहीं है। हमें तत्काल और ठोस कदम उठाने होंगे। बीईएसजेड जैसे नियमों को सख्ती से लागू करना होगा। अवैध निर्माण पर तत्काल रोक और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है। सड़क और अन्य परियोजनाओं के लिए आधुनिक तकनीकों, जैसे हाफ-टनेल और ढलान स्थिरीकरण संरचनाओं का उपयोग करना होगा। हिमालयी क्षेत्र में स्वचालित मौसम स्टेशनों (एडब्ल्यूएस) की संख्या बढ़ानी होगी और समुदाय-आधारित चेतावनी प्रणालियों को लागू करना होगा। वनों की कटाई को रोकने और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के माध्यम से प्राकृतिक बाधाओं को बहाल करना होगा। पर्यटकों की संख्या को नियंत्रित करने और पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देने की जरूरत है।

उत्तरकाशी की हालिया बाढ़ और हिमाचल-उत्तराखंड में बार-बार होने वाली आपदाएं हमें एक स्पष्ट संदेश दे रही हैं, यदि हमने अभी नहीं चेता, तो हमारी लापरवाही हमें और हमारे पर्यावरण को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह समय है कि हम विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाएं। हिमालय केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर का हिस्सा है। इसे बचाने के लिए सरकार, स्थानीय समुदायों और नागरिकों को एकजुट होकर काम करना होगा। अब समय है कार्रवाई का, क्योंकि देरी का मतलब और अधिक त्रासदियां होंगी। 

Sunday, June 1, 2025

रक्षा परियोजनाओं में देरी क्यों?

भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने 29 मई 2025 को नई दिल्ली में आयोजित एक सभा में रक्षा परियोजनाओं में देरी को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा, टाइमलाइन एक बड़ा मुद्दा है। मेरे विचार में एक भी परियोजना ऐसी नहीं है जो समय पर पूरी हुई हो। कई बार हम कॉन्ट्रैक्ट साइन करते समय जानते हैं कि यह सिस्टम समय पर नहीं आएगा। फिर भी हम कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लेते हैं। यह बयान न केवल रक्षा क्षेत्र में मौजूदा चुनौतियों को उजागर करता है, बल्कि भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में चल रही प्रक्रिया पर भी सवाल उठाता है।


एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने अपने बयान में विशेष रूप से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा तेजस Mk1A फाइटर जेट की डिलीवरी में देरी का उल्लेख किया। यह देरी 2021 में हस्ताक्षरित 48,000 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा है, जिसमें 83 तेजस Mk1A जेट्स की डिलीवरी मार्च 2024 से शुरू होनी थी, लेकिन अभी तक एक भी विमान डिलीवर नहीं हुआ है। इसके अलावा, उन्होंने तेजस Mk2 और उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (AMCA) जैसे अन्य महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में भी प्रोटोटाइप की कमी और देरी का जिक्र किया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ रहा है, विशेष रूप से ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद, जिसे उन्होंने राष्ट्रीय जीत करार दिया।



उनके बयान का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह रक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह पहली बार नहीं है जब HAL की आलोचना हुई है। फरवरी 2025 में, एयरो इंडिया 2025 के दौरान, एयर चीफ मार्शल सिंह ने HAL के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा था, मुझे HAL पर भरोसा नहीं है, जो बहुत गलत बात है। यह बयान एक अनौपचारिक बातचीत में रिकॉर्ड हुआ था, लेकिन इसने रक्षा उद्योग में गहरे मुद्दों को उजागर किया।


रक्षा परियोजनाओं में देरी के कई कारण हैं, जिनमें से कुछ संरचनात्मक और कुछ प्रबंधन से संबंधित हैं। तेजस Mk1A की डिलीवरी में देरी का एक प्रमुख कारण जनरल इलेक्ट्रिक से इंजनों की धीमी आपूर्ति है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में समस्याएं, विशेष रूप से 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर लगे प्रतिबंधों ने HAL की उत्पादन क्षमता को प्रभावित किया है । सिंह ने HAL को मिशन मोड में न होने के लिए आलोचना की। उन्होंने कहा कि HAL के भीतर लोग अपने-अपने साइलो में काम करते हैं, जिससे समग्र तस्वीर पर ध्यान नहीं दिया जाता। यह संगठनात्मक अक्षमता और समन्वय की कमी का संकेत है। सिंह ने इस बात पर भी जोर दिया कि कई बार कॉन्ट्रैक्ट साइन करते समय ही यह स्पष्ट होता है कि समय सीमा अवास्तविक है। फिर भी, कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लिए जाते हैं, जिससे प्रक्रिया शुरू से ही खराब हो जाती है। यह एक गहरी सांस्कृतिक समस्या को दर्शाता है, जहां जवाबदेही की कमी है। हालांकि सरकार ने AMCA जैसे प्रोजेक्ट्स में निजी क्षेत्र की भागीदारी को मंजूरी दी है, लेकिन अभी तक रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भूमिका सीमित रही है। इससे HAL और DRDO जैसे सार्वजनिक उपक्रमों पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ती है, जो अक्सर समय सीमा पूरी करने में विफल रहते हैं। भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली है। इसके अलावा, डिजाइन और विकास में देरी, जैसे कि तेजस Mk2 और AMCA के प्रोटोटाइप की कमी, परियोजनाओं को और पीछे धकेलती है।



रक्षा परियोजनाओं में देरी का भारतीय वायुसेना की परिचालन तत्परता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वर्तमान में, भारतीय वायु सेना के पास 42.5 स्क्वाड्रनों की स्वीकृत ताकत के मुकाबले केवल 30 फाइटर स्क्वाड्रन हैं। तेजस Mk1A जैसे स्वदेशी विमानों की देरी और पुराने मिग-21 स्क्वाड्रनों का डीकमीशनिंग इस कमी को और गंभीर बनाता है।



इसके अलावा, देरी से रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत की प्रगति भी प्रभावित होती है। सिंह ने कहा, हमें केवल भारत में उत्पादन की बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि डिजाइन और विकास भी भारत में करना चाहिए। देरी न केवल IAF की युद्ध क्षमता को कमजोर करती है, बल्कि रक्षा उद्योग में विश्वास को भी प्रभावित करती है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे हालिया सैन्य अभियानों ने यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक युद्ध में हवाई शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है, और इसके लिए समय पर डिलीवरी और तकनीकी उन्नति अनिवार्य है।


एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह के बयान ने रक्षा क्षेत्र में सुधार की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया है। रक्षा कॉन्ट्रैक्ट्स में यथार्थवादी समयसीमाएं निर्धारित की जानी चाहिए। सिंह ने सुझाव दिया कि हमें वही वादा करना चाहिए जो हम हासिल कर सकते हैं। इसके लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन करने से पहले गहन तकनीकी और लॉजिस्टिकल मूल्यांकन की आवश्यकता है। AMCA प्रोजेक्ट में निजी क्षेत्र की भागीदारी एक सकारात्मक कदम है। निजी कंपनियों को रक्षा उत्पादन में और अधिक शामिल करने से HAL और DRDO पर निर्भरता कम होगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। 


HAL और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों को ‘मिशन मोड’ में काम करने के लिए संगठनात्मक सुधार करने चाहिए। इसके लिए समन्वय, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और कर्मचारी प्रशिक्षण में सुधार की आवश्यकता है। इंजन और अन्य महत्वपूर्ण घटकों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता को कम करने के लिए स्वदेशी विकास पर ध्यान देना होगा। रक्षा खरीद प्रक्रिया को सरल और तेज करने की आवश्यकता है ताकि अनावश्यक देरी से बचा जा सके।


एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह का बयान रक्षा क्षेत्र में गहरी जड़ें जमाए बैठी समस्याओं को उजागर करता है। उनकी स्पष्टवादिता न केवल जवाबदेही की मांग करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भारत को आत्मनिर्भर और युद्ध के लिए तैयार रहने के लिए तत्काल सुधारों की आवश्यकता है। तेजस Mk1A, Mk2 और AMCA जैसे प्रोजेक्ट्स भारत की रक्षा क्षमता के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनमें देरी न केवल हमारी फौज की तत्परता को प्रभावित करती है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरे में डालती है। सरकार, रक्षा उद्योग और निजी क्षेत्र को मिलकर इन चुनौतियों का समाधान करना होगा ताकि भारत न केवल उत्पादन में, बल्कि डिजाइन और विकास में भी आत्मनिर्भर बन सके। सिंह का यह बयान एक चेतावनी तो है ही, लेकिन साथ ही यह रक्षा क्षेत्र को ‘सर्वश्रेष्ठ’ करने  की दिशा में एक अवसर भी है।