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Monday, December 17, 2018

फिरकापरस्तों से बचें हिंदुस्तानी

तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद सोशल मीडिया पर दो बड़े खतरनाक संदेश आये। एक में हरा झंडा लेकर कुछ नौजवान जुलूस निकाल रहे थे कि ‘बाबरी मस्ज़िद’ वहीं बनाऐंगे। दूसरे संदेश में केसरिया झंडा लेकर एक जुलूस निकल रहा था, जिसमें नारे लग रहे थे, ‘एक धक्का और दो, ज़ामा मस्ज़िद तोड़ दो’’। ये बहुत खतरनाक बात है। इससे हिंदू और मुसलमान दोनों बर्बाद हो जाऐंगे और मौज मारेंगे वो सियासतदान जो इस तरह का माहौल बना रहे हैं।
1980 के पहले मुरादाबाद का पीतल उद्योग निर्यात के मामले में आसमान छू रहा था। यूरोप और अमरीका से खूब विदेशी मुद्रा आ रही थी।लोगों की तेजी से आर्थिक उन्नति हो रही थी। तभी किसी सियासतदान ने ईदगाह में सूअर छुड़वाकर ईद की नमाज में विघ्न डाल दिया। उसके बाद जो हिंदू-मुसलमानों के दंगे हुए, तो उसमें सैंकड़ों जाने गईं। महीनों तक कर्फ्यू लगा और पीतल उद्योग से जुड़े हजारों परिवार तबाह हो गऐ। कितने ही लोगों ने तो आत्महत्या तक कर ली। पर इस त्रासदी का ऐसा बढ़िया असर पड़ा कि मुरादाबाद के हिंदू-मुसलमानों ने गांठ बांध ली कि अब चाहे कुछ हो जाऐं, अपने शहर में कौंमी फसाद नहीं होने देंगे। 1990 के दौर में जब अयोध्या विवाद चरम पर था और जगह-जगह साम्प्रदायिकता भड़क रही थी तब भी मुरादाबाद में कोई साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ।
जो राजनेता ये कहते हैं कि मुसलमान पाकिस्तान चले जाऐं, वो मूर्ख हैं। इतनी बड़ी आबादी को धक्के मारकर पाकिस्तान में घुसाया नहीं जा सकता और न ही उनका कत्लेआम किया जा सकता। ठीक इसी तरह मुसलमानों के मजहबी नेता, जो ख्वाब दिखाते हैं कि वे हिंदूओं को बदलकर, भारत में इस्लाम की हुकूमत कायम करेंगे, वो उनसे भी बड़े मूर्ख हैं। ये जानते हुए कि 1000 साल तक भारत पर यवनों की हुकूमत रही  और फिर भी भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं। तो अब ये कैसे संभव है ?
ये तय बात है कि नेता चाहे हिंदू धर्म के हों, चाहे मुसलमान, ईसाई या सिक्ख धर्म के, उनके भड़काऊ भाषण आवाम के हक के लिए नहीं होते, बल्कि आवाम को लड़वाकर अपने राजनैतिक आंकाओं के हित साधने के लिए होते हैं। इन धार्मिक नेताओं के प्रवचनों में अगर आध्यात्म और रूहानियत नहीं है और राजनीति हावी है, तो स्पष्ट है कि वे सत्ता का खेल रहे हैं। उनका मजहब से कोई लेना-देना नहीं है।
कुछ महीनों में लोकसभा के चुनाव आने वाले हैं। हर राजनैतिक दल की ये पुरजोर कोशिश होगी कि वे हिंदू और मुसलमान के बीच खाई पैदा कर दे। जिससे वोटों का ध्रुवीकरण हो जाऐ और ऐसे ध्रुवीकरण के बाद, जिनके हाथों में सत्ता जाऐगी, वे फिर जनता की कोई परवाह नहीं करेंगे। धर्म और संस्कृति के नाम पर छलावे, दिखावे और आडंबर किये जाऐंगे जिनमें हजारों करोड़ रूपया खर्च करके भी आम जनता को कोई लाभ नहीं होगा। न तो उससे गांवों के सरोवरों में जल आएगा, न उजड़े बागों में फल लगेंगे, न उनकी कृषि सुधरेगी, न उसके बच्चों को रोजगार मिलेगा। तब आप किसके आगे रोयेंगे क्योंकि जो भी सत्ता के सिंहासन पर बैठ जाऐंगे, वो केवल अपना और दल का खजाना बढ़ायेंगे और जनता त्राही-त्राही करेगी।
अगर हम ऐसी घुटन भरी जिंदगी से निजात पाना चाहते हैं, तो हमें अपने इर्द-गिर्द के माहौल को देखकर समझना चाहिए कि आजतक इतने वायदे सुने पर क्या हमारी जिंदगी में कोई बदलाव आया या नहीं? ये बदलाव किसी सरकार के कारण आया या आपके अपने कठिन परिश्रम का परिणाम हैं ? आप निराश ही होंगे। अखबारों के विज्ञापनों में सरकारें सैकड़ों करोड़ों रूपया खर्च करके अपनी कामियाबी के जो दावें करती हैं, वो सच्चाई से कितने दूर होते हैं आप जानते हैं। हुक्मरान या जानना नहीं चाहते या उन्हें जमीनी हकीकत बताने वाला कोई नहीं। क्योंकि बीच के लोग सही बात ऊपर जाने नहीं देते। राजा को लगता है कि मेरे राज्य में सब खुशहाल हैं और अमन चैन है।
दुनिया का इतिहास गवाह है कि जहां-जहां साम्प्रदायिक दंगे हुए, वहां संस्कृतियां नष्ट हो गई। कौमें तबाह हो गईं। ये सही है कि मध्य युग के यवन आक्रांताओं ने हिंदूओं के धर्मस्थलों को तोड़ा-फोड़ा। पर ये भी सही है कि यवनों से पहले जो हिंदू राजा देश में थे, वे भी आक्रमण के बाद अपने शत्रु के साम्राज्य में ऐसी ही तबाही मचाते थे। शिव भक्त राजा द्वारा भगवान विष्णु के मंदिर तोड़े जाने के और विष्णु भक्त राजा द्वारा शिवजी के मंदिर तोड़े जाने के अनेक प्रमाण हैं। इतना ही नहीं बाद की सदियों में बौद्धों ने हिंदू मंदिर तोड़े और हिदूंओं ने बौद्ध  विहार। आज भी सत्ता के अहंकार में हिंदूवादी सत्ताएं हिंदुधर्म क्षेत्रो का कैसा वीभत्स औऱ  कितना विनाश करती है इस पर फिर कभी लिखूंगा।
भड़काऊ नारों और भाषणों से   साम्प्रदायिकता फैलती है और  दोनों पक्षों की हानि होती है। इसलिए जो वास्तव में मजहबी लोग हैं, जिनकी अपने धर्म में आस्था है, उन्हें धार्मिक उन्माद फैलाने वाले वक्ताओं से ऐसे परहेज करना चाहिए, जैसे विष मिले दूध से। जिसे कोई पीएगा नहीं।
आज भी देश के करोड़ों लोग  बुनियादी सुविधाओं के लिए तड़़प रहे हैं और बडे़-बड़े उद्योगपति बैंकों का लाखों-करोड़ रूपया कर्ज लेकर फरार हो गऐ हैं। जबकि 5000 रूपये कर्ज लेने वाला किसान आत्महत्या कर रहा है। खेती अब फायदे का सौदा नहीं रही। हवा, पानी, दूध, फल और अनाज सबमें जहर घोला जा रहा है। पर कोई सरकार आज दिन तक इसे रोक नहीं पाई। अगर हम विकास चाहते हैं तो हमारी धार्मिक आस्था हमारे स्वयं के नैतिक उत्थान के लिए हो, दूसरे का विनाश करने के लिए नहीं। यह बात सबको सोचनी है, चाहे वे किसी धर्म के क्यों न हो।

Monday, December 10, 2018

सनातन परंपराओं से छेड़छाड़ ठीक नहीं

सबरी मलाई मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से हम सभी हिंदू उद्वेलित हैं। इसी हफ्ते एक व्याख्यान में सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश श्रीमती ज्ञान सुधा मिश्रा का कहना था कि जहां संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का पंरपराओं से टकराव होगा, वहां अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। उन्होंने सती प्रथा का उदाहरण देकर अपनी बात का समर्थन किया। किंतु पूजा पद्धति और उससे जुड़े कर्मकांड को बदलने का अधिकार अदालत का नहीं होना चाहिए। जैसे- जन जातीय समाजों में जो कानून की व्यवस्था है, उसमें भारत सरकार हस्तक्षेप नहीं करती। अंग्रेज हुकुमत ने भी नहीं किया। अण्डमान के पास सेंटीनल द्वीप में वनवासियों द्वारा तीर-कमान से मारे गऐ, ‘अमरीकी मिशनरी युवा’ के मामले में सरकार कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर रही। क्योंकि गत 60 हजार सालों से यह प्रजाति शेष दुनिया से अलग-थलग रहकर जीवन यापन कर रही है। उसके अपने कानून हैं और भारत सरकार ने उनकी स्वतंत्रता को सम्मान दिया है। ईसाईयत का प्रचार करने के उद्देश्य से इस युवा ने कानून का उल्लंघ्न कर सेंटीनल द्वीप में प्रवेश किया और मारा गया।

ईसाई मिशनरी, अन्य धर्मी लोग या फिर अदालतें अगर हमारी धार्मिक मान्यताओं में हस्तक्षेप करे, तो उसका कारण समझा जा सकता है। क्योंकि उनकी आस्था हमारी परंपराओं में नहीं है। उनकी सोच भारतीय संस्कृति से हटकर अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति से प्रभावित है। पर अगर हिंदू संस्कृति की रक्षा करने का दावा करने वाले संत, संगठन या राजनैतिक दल ऐसा करते हैं, तो ये चिंता की बात है। इलाहाबाद का नाम ‘प्रयागराज’ करना, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी महाराज का प्रशंसनीय कदम है। पर अर्द्ध कुंभ को कुंभ कहना सनातन परंपराओं से खिलवाड़ है। कुंभ की परंपरा हिंदू मान्यताओं के अनुसार हजारों वर्ष पुरानी है। हर 12 वर्ष में कुंभ, हर 6 वर्ष में अर्द्ध कुंभ और हर 144 वर्ष में महाकुंभ होते आऐ हैं। इसके पीछे वैज्ञानिक और शास्त्रीय दोनों आधार हैं। हमारे धार्मिक  ग्रंथों में इन पर्वों का विस्तृत वर्णन आता है। कुंभ पर उठे वाद-विवादों और धर्म ससंदों का भी उल्लेख आता है। पर ऐसा उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि अर्द्ध कुंभ को पूर्णं कुंभ कह दिया जाऐ। योगी महाराज ने अपने अज्ञानी अधिकारियों की चाटुकारिता भरी सलाह से जो यह निर्णंय लिया है, वह संत समाज के गले नहीं उतर रहा। कुछ खुल कर कह रहे हैं और अधिकतर चुपचाप सह रहे हैं। अगर इसी तरह नाम बदले गऐ, तो भविष्य में कोई ऐसी सरकार भी आ सकती है, जो यह कह दे कि 12 वर्ष में ही कुंभ क्यों होगा? हम तो हर मकर संक्राति को कुंभ करेंगे, तब उसे कौन रोक लेगा?

बात यहीं तक नहीं है। पिछले डेढ़ वर्ष में ब्रजभूमि को लेकर योगी महाराज की सरकार ने जो भी कार्यक्रम और योजनाऐं घोषित की हैं, वे सब ब्रज संस्कृति और मान्यताओं के विपरीत हैं। श्रीमदभागवतम् के दशम स्कंध के 24वें अध्याय के 24वें श्लोक में बालकृष्ण नंद बाबा से कहते हैं कि, ‘ये नगर और गांव हमारे घर नहीं। हमारे घर तो वन और पर्वत हैं।’ आज  ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ अपने ही बनाये कानूनों को तोड़कर हजारों करोड़ रूपयों की वाहियात योजनाऐं ब्रज विकास के नाम पर लागू करवा रही है, जो भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन की भावना के सर्वथा विपरीत हैं।  इनसे ब्रज की सेवा नहीं, विनाश होगा। ये बात हम जैसे लोग लगातार कह रहे हैं। पर अपने मद में चूर और बड़े कमीशन पर निगाह रखने वाले इन अधिकारियों को समझ में नहीं आ रहा।

इसी तरह मथुरा और वृंदावन के बीच भावनात्मक दूरी है। अक्रूर जी जब कृष्ण-बलराम को मथुरा ले गऐ और कंस वध करने के बाद भगवान लौटे नहीं, तो वे मथुरा के राजमहल में वृंदावन की याद करके अपने मित्र उद्धव से कहते है, ‘उधौ मोहे ब्रज बिसरत नाहि’। वृंदावनवासी ग्वारिये कृष्ण के प्रति साख्य भाव रखते हैं। जबकि मथुरावासी कृष्ण को द्वारिकाधीश अर्थात् राजा के रूप में पूजते हैं। पर योगी महाराज की सरकार ने वृंदावनवासियों के घोर विरोध की उपेक्षा करके मथुरा-वृंदावन नगर निगम बना दिया। जोकि ब्रज की सनातन परंपरा के पूरी तरह विपरीत है। पूरा ब्रज भक्ति भावना प्रधान है। नंदग्राम वालों के लिए अगर ग्वारिया कृष्ण अधिक महत्वपूर्णं हैं, तो बरसानावासी राधारानी के प्रति स्वयं का सखी भाव रखते हैं। हर गांव का अपना पौराणिक इतिहास है। इसी तरह गोवर्धन, जो प्रकृति पूजा का सर्वोत्तम उदाहरण है। उसके चारों ओर विकास का जो मॉडल ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ लेकर आई है। वह गोवर्धन की भावना का सर्वथा प्रतिकूल है। इससे गोवर्धन ‘न्यूयॉर्क’ शहर की तरह हो जाऐगा। जो इसकी अपूर्णंनीय क्षति होगी।

हमारी सनातन परंपराओं से अगर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी ने ऐसी छेड़छाड़ की होती, तो निश्चय ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उससे जुड़े संगठन तूफान मचा देते। जो सही भी होता। लेकिन जब हिंदू धर्म की सेवा करने का दावा करने वाले दल भाजपा की सरकार में सनातन परंपराओं से खिलवाड़ हो, तो किसका विरोध किया जाऐ? यह हम सब सनातनधर्मियों की बिडंबना है और पीड़ा भी।

योगी महाराज के मुख्यमंत्री बनने पर हम सबसे ज्यादा उत्साहित थे । मैंने टीवी चैनलों पर ऐसा कई बार  कहा भी था। आशा थी कि योगी जी हम सनातनधर्मियों की भावना का सम्मान करते हुए, हमारी सांस्कृति विरासतों की रक्षा में उदारता से सहयोग करेंगे। उनकी मंशा और धर्म के प्रति समर्पण में आज भी कोई संदेह नहीं है। वे सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए भरपूर थैली खोले बैठे हैं। पर बिडंबना यह है कि उनके चारों ओर वे लोग हैं, जो उनसे तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं को निज लाभ के लिए पारित करवा कर सनातन धर्म की परंपराओं और भावनाओं पर कुठाराघात कर रहे हैं। योगी जी को इस मकड़जाल से निकलकर मुक्त हृदय से दूसरे पक्ष की बात को भी गंभीरता से सुनने की सामर्थ्य दिखानी चाहिए। तभी धर्म की सच्ची सेवा होगी अन्यथा धर्म का विनाश होगा और केवल कुछ जेबें भारी जाएंगी। आगे हरि इच्छा।

Monday, November 26, 2018

ब्रजवासियों के साथ धोखा क्यों?

जब से ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ का गठन हुआ है, ये एक भी काम ब्रज में नहीं कर पाई है। जिन दो अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ जी ने इतने महत्वूपर्णं ब्रजमंडल को सजाने की जिम्मेदारी सौंपी हैं, उन्हें इस काम का कोई अनुभव नहीं है। इससे पहले उनमें से एक की भूमिका मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष के नाते तमाम अवैध निर्माण करवाकर ब्रज का विनाश करने में रही है। दूसरा सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी है, जिसने आजतक ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण पर कोई काम नहीं किया। इन दोनों को ही इस महत्वपूर्णं, कलात्मक और ऐतिहासिक काम की कोई समझ नहीं है। इसलिए इन्होंने अपने इर्द-गिर्द फर्जी आर्किटैक्टों, भ्रष्ट जूनियर अधिकारियों और सड़कछाप ठेकेदारों का जमावाड़ा कर लिया है। सब मिलकर नाकारा, निरर्थक और धन बिगाड़़ू योजनाऐं बना रहे हैं। जिससे न तो ब्रज का सौंदर्य सुधरेगा, न ब्रजवासियों को लाभ होगा और न ही संतों और तीर्थयात्रियों को। केवल कमीशन खोरों की जेबें भरी जाऐंगी।
इनकी मूर्खता का ताजा उदाहरण है भगवान श्रीकृष्ण की 40 करोड़ रूपये की विशाल मूर्ती, जिसे ये दिल्ली-आगरा के बीच सुश्री मायावती द्वारा बनावाऐं गये यमुना एक्सप्रेस वे के उस बिंदु पर लगवाने जा रहे हैं, जहां से गाड़ियां वृंदावन के लिए मुड़ती है। 40 करोड़ की मूर्ती में कितना कमीशन खाया जाऐगा, इसका अंदाजा इसी बात से लगा लीजिए, कि ब्रज के 9 कुंडों के जीर्णोंद्धार का ठेका, ये सरकारी लोग 77 करोड़ में पिछले वर्ष दे चुके थे। जिसे ‘द ब्रज फाउंडेशन’ के शोर मचाने और बेहतर कार्य योजना देने के बाद अब मात्र 27 करोड़ रूपये में करवाया जायेगा। इस तरह 50 करोड़ रूपये की बर्बादी रोकी गई है। क्योंकि द ब्रज फाउंडेशन गत 15 वर्षों से अपने तन-मन-धन से भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीलास्थलियां सजा रही है। इसलिए उससे कोई चोरी छिप नहीं सकती। 77 करोड़ रूपये में 50 करोड़ रूपये का घोटाला, यानि 66 फीसदी कमीशन। इस अनुपात से 40 करोड़ रूपये की मूर्ती में 27 करोड़ रूपया कमीशन में जाएगा।
मूर्ति लगवाने के पीछे इनका तर्क है कि वाहन चालकों को दूर से ही पता चल जाएगा कि वृंदावन आ गया। कितनी हास्यास्पद बात है, बिना मूर्ती लगे ही जब हजारों गाड़ियां रोज वृंदावन आ रही है, तो उन्हें  रास्ता कौन बता रहा है? जिसे वृंदावन आना है, उसे सब रास्ते पता हैं। वैसे जो तीर्थयात्री रोज आ रहे हैं, उनसे ही वृंदावन की सारी व्यवस्था चरमरा जाती है। गत दो वर्षों में ब्रज तीर्थ विकास इस स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नही कर पाया। तो अब विशाल मूर्ती लगवाकर और मजमा क्यों जोड़ना चाहता है?
उधर ब्रज में 85 फीसदी भू जल खारा है। प्राचीन कुंडों के जीर्णोंद्धार जल संचयन भी होता है और खारापन भी क्रमशः कम होता है। सर्वोच्च न्यायालय के 2001 के ‘हिंचलाल तिवारी आदेश’ के तहत शासन को ब्रज के उपेक्षित पड़े 800 से भी अधिक कुंडों का जीर्णोंद्धार कराना चाहिए था। जबकि उसने आजतक लगभग 40 करोड़ रूपया खर्च करके 40 कुंडों का जीर्णोंद्धार करवाया है, जिनकी दशा पहले से भी ज्यादा दयनीय हो गई हैं। उनके नऐ बने घाट टूट रहे हैं, कूड़े और मलबे के ढेर जमा हो गऐ हैं और उनमें कुत्ते और सूअर डोलते हैं।
इस मूर्ती को लगवाने से बेहतर होता कि ब्रजतीर्थ विकास परिषद् ब्रज के कुछ कुंडों का जीर्णोंद्धार करवा देता, तो ब्रज में जल की समस्या के समाधान की दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ते। साथ ही इससे ब्रज के गांवों में रहने वाले गोधन, ब्रजवासियों और संतों को प्रसन्नता होती। पर वहां भी इनकी गर्दन फंसी है। क्योंकि द ब्रज फाउंडेशन ने बेहद कम लागत पर वृंदावन के ब्रह्म कुंड, गोवर्धन के ऋणमोचन कुंड, रूद्र कुंड व संकर्षण कुंड, जैंत का जयकुंड, चौमुहा  का ब्रह्म सरोवर आदि दर्जनों पौराणिक कुंडों का मनोहारी जीर्णोंद्धार कर मथुरा जिले की जलधारण क्षमता को 5 लाख क्यूबिक मीटर बढ़ा दिया है। अब अगर ब्रज तीर्थ विकास परिषद् कुंडों का जीर्णोंद्धार करेगी, तो उसे भी द ब्रज फाउंडेशन की लागत के बराबर कीमत पर काम करना पड़ेगा। तिगुने दाम की योजना बनाने वाली ब्रजतीर्थ विकास परिषद् फिर कमीशन कैसे खा पाऐगीा? इसलिए विशाल मूर्ती लगवाने जैसी फालतू परियोजनाऐं बनाई जा रही है, जिससे कोई हिसाब भी न मांग सके और ढ़िढोरा भी पीट दिया जाऐ कि 40 करोड़ रूपये की मूर्ती लगवा दी गई।
योगी जी से उद्घाटन करवाने की जल्दी में ब्रजतीर्थ विकास परिषद् ने सड़कछाप आर्किटैक्टों को पकड़कर बड़े बजट की परियोजनाऐं बनवा ली हैं, जिससे मोटा कमीशन खाया जा सके। इस तरह हर ओर ब्रज का विनाश किया जा रहा है। भाजपा योगी महाराज को हिंदू धर्म का पुरोधा बनाकर चुनावों में घुमा रही है। पर योगी महाराज की सरकार के भ्रष्ट और निकम्मे अधिकारी ब्रज जैसे कृष्ण भक्ति के पौराणिक धाम की महत्ता और संवेदनशीलता को समझे बिना शहरी लोगों के मनोरंजन के लिए बड़ी-बड़ी खर्चीली योजनाऐं बनवा रहे हैं। जिनसे ब्रज का विकास होना तो दूर, विनाश की गति तेजी से बढ़ गई है। चुनाव में वोट मांगे जाऐंगे आम ब्रजवासी से, जो गांवों में रहता है। जिसने कान्हा से संग गाय चराई। जिनके घरों से कान्हा ने माखन चुराया। उन सब ब्रजवासियों की उपेक्षा कर बाहर से आने वाले सैलानियों के मनोरंजन की योजनाऐं बनाकर ब्रजतीर्थ विकास परिषद् क्यों योगी महाराज की छवि खराब करने में जुटी है? ये ब्रजवासियों के साथ सरासर धोखा है।

Monday, November 5, 2018

पटाखों बिना कैसे मनाऐं दीपावली?


सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और सिर्फ दो घंटे का समय दिया गया है, जिसमें पटाखें चलाऐ जा सकते हैं। इस आदेश को लेकर पटाखा व्यवसाय से जुड़े हुए सभी व्यापारी परेशान हैं कि अब उनका व्यापार कैसे चलेगा? कुछ हिंदुओं ने भी यह हल्ला मचाया है कि हिंदू धर्म के पर्वों में ही क्यों पाबंदी लगाई जाती है? मुसलमानों की ‘शब-ए-बारात’, ईसाईयों की ‘क्रिसमस’, या ‘न्यू इयर्स डे’ आदि में पटाखे छुड़ाने पर पाबंदी क्यों नहीं लगाई जाती? जबकि आवश्यक्ता इस बात की है कि भारत में पटाखों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लग जाना चाहिए। क्योंकि देश में पहले से पर्यावरण प्रदूषण की वजह से बुरा हाल हो रहा है और पटाखों से निकलने वाली प्रदूषित गैस पर्यावरण को और अधिक नुकसान पहुंचाएगी।

आतिशबाजी’ सनातन धर्म के शब्दकोश में कोई शब्द नहीं है। यह पश्चिम ऐशिया से आयातित है, क्योंकि गोला-बारूद भी भारत में वहीं से ‘मध्ययुग’ में आया था। इसलिए दीपावली पर पटाखों को प्रतिबंधित करके, सर्वोच्च न्यायालय ने उचित निर्णंय लिया। हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण, स्वास्थ, सुरक्षा व सामाजिक कारणों से पटाखे हमारी जिंदगी में जहर घोलते हैं। इनका निर्माण व प्रयोग सदा के लिए बंद होना चाहिए। यह बात पिछले 30 वर्षों से बार-बार उठती रही है।

हमारी सांस्कृतिक परंपरा में हर उत्सव व त्यौहार, आनंद और पर्यावरण की शुद्धि करने वाला होता है। दीपावली पर तेल या घी के दीपक जलाना, यज्ञ करके उसमें आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां डालकर वातावरण को शुद्ध करना, द्वार पर आम के पत्तों के तोरण बांधना, केले के स्तंभ लगाना, रंगोली बनाना, घर पर शुद्ध पकवान बनाना, मिल बैठकर मंगल गीत गाना, धर्म चर्चा करना, बालकों द्वारा भगवान की लीलाओं का मंचन करना, घर के बहीखातों में परिवार के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर लेकर, समसामयिक अर्थव्यवस्था का रिकार्ड दर्ज करना जैसी गतिविधियों में दशहरा-दीपावली के उत्सव आनंद से संपन्न होते आऐ हैं। जिनसे परिवार और समाज में नई ऊर्जा का संचार होता है।

गनीमत है कि भारत के ग्रामों में अभी बाजारू संस्कृति का वैसा व्यापक दुष्प्रभाव नहीं पड़ा, जैसा शहरों पर पड़ा है। अन्यथा सब चैपट हो जाता। ग्रामीण अंचलों में आज भी त्यौहारों को मनाने में भारत की माटी का सोंधापन दीखता है। यह स्थिति बदल रही है। जिसे ग्रामीण युवाओं को रोकना है।

बाजार के प्रभाव में आज हमने अपने सभी पर्वों को विद्रूप और आक्रामक बना दिया है। अब उनको मनाना, अपनी आर्थिक सत्ता का प्रदर्शन करना और आसपास के वातावरण में हलचल पैदा करने जैसा होता है। इसमें से सामूहिकता, प्रेम-सौहार्द और उत्सव के उत्साह जैसी भावना का लोप हो गया है। रही सही कसर चीनी सामान ने पूरी कर दी। त्यौहार कोई भी हो, उसमें खपने वाली सामग्री साम्यवादी चीन से बनकर आ रही है। उससे हमारे देश के रोजगार पर भारी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।

मिट्टी के बने दीऐ, मिट्टी के खिलौने, मिट्टी की बनी गूजरी व हटरी आदि आज भी हमारे घरों में दीवाली की पूजा का अभिन्न अंग होते हैं, पर शहरीकरण की मार से बड़े शहरों में इनका उपयोग समाप्त होता जा रहा है। अगर हम अपनी इस रीति को जीवित रखें, तो हमारे कुम्हार भाईयों की पेट पर लात नहीं पड़ेगी।

हम अपने बच्चों का जन्मदिन (हैपी बर्थ डे) केक काटकर मनाते हैं। जिसका हमारी मान्यताओं और संस्कृति से कोई नाता नहीं है। जबकि हमें उनका तिलक कर, आरती उतार कर या आर्शीवाद या मंगलाचरण गायन कर उनका जन्मदिन मनाना चाहिए। अगर हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी भारतीय संस्कृति पर गर्व करे, परिवार में प्रेम को बढ़ाने वाली गतिविधियां हों, बच्चे बड़ों का सम्मान करें, तो हमें अपने समाज में पुनः पारंपरिक मूल्यों की स्थापना करनी होगी। वो जीवन मूल्य, जिन्होंने हमारी संस्कृति को हजारों साल तक बचाकर रखा, चाहे कितने ही तूफान आये। पश्चिमी देशों में जाकर बस गए, भारतीय परिवारों से पूछिऐ-जिन्होंने वहां की संस्कृति को अपनाया, उनके परिवारों का क्या हाल है और जिन्होंने वहां रहकर भी भारतीय सामाजिक मूल्यों को अपने परिवार और बच्चों पर लागू किया। वे कितने सधे हुए, सुखी और संगठित है। तनाव, बिखराव तलाक, टूटन ये आधुनिक जीवन पद्धति के ‘प्रसाद’ है। इनसे बचना और अपनी जड़ों से जुड़ना, यह भारत के सनातनधर्मियों का मूलमंत्र होना चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों से टेलीविजन चैनलों पर साम्प्रदायिक मुद्दों को लेकर आऐ दिन तीखी झरपें होती रहती है। जिनका कोई अर्थ नहीं होता। उनसे किसी भी सम्प्रदाय को कोई भी लाभ नहीं मिलता, केवल उत्तेजना बढ़ती है। जबकि हर धर्म और संस्कृति में कुछ ऐसे जीवन मूल्य होते हैं, जिनका यदि अनुपालन किया जाए, तो समाज में सुख, शांति और समरसता का विस्तार होगा। अगर हमारे टीवी एंकर और उनकी शोध टीम ऐसे मुद्दों को चुनकर उन पर गंभीर और सार्थक बहस करवाऐं, तो समाज को दिशा मिलेगी। हर धर्म के मानने वालों को यह स्वीकारना होगा कि दूसरों के धर्म में सब कुछ बुरा नहीं है और उनके धर्म में सब कुछ श्रेष्ठ नहीं है। चूंकि हम हिंदू बहुसंख्यक हैं और सदियों से इस बात से पीड़ित रहे हैं कि सत्ताओं ने कभी हमारे बुनियादी सिद्धांतों को समझने की कोशिश नहीं की। या तो उन्हें दबाया गया या उनका उपहास किया गया या उन्हें अनिच्छा से सह लिया गया। नये माहौल में इन सवालों पर खुलकर बहस होनी चाहिए थी। जो नहीं हो रही। निरर्थक विषयों को उठाकर समाज में विष घोला जा रहा है। इसलिए इस दीपावली सब मिल बैठकर सोचें, कौन थे हम, क्या हो गये और होंगे क्या अभी।

Monday, May 14, 2018

सड़कों पर नमाज क्यों नहीं?

धर्म आस्था और आत्मोत्थान का माध्यम होता है। इसका प्रदर्शन यदि उत्सव के रूप में किया जाए, तो वह एक सामाजिक-सांस्कृतिक घटना मानी जाती है। जिसका सभी आनंद लेते हैं। चाहे विधर्मी ही क्यों न हों। दीपावली, ईद, होली, वैशाखी, क्रिसमस, पोंगल, संक्राति व नवरोज आदि ऐसे उत्सव हैं, जिनमें दूसरे धर्मों के मानने वाले भी उत्साह से भाग लेते हैं। अपने-अपने धर्मों की शोभा यात्राऐं निकालना, पंडाल लगाकर सत्संग या प्रवचन करवाना, नगरकीर्तन करना या मोहर्रम के ताजिये निकालना, कुछ ऐसे धार्मिक कृत्य हैं, जिन पर किसी को आपत्ति नहीं होती या नहीं होनी चाहिए। बशर्ते की इन्हें मयार्दित रूप में, बिना किसी को कष्ट पहुंचाऐ, आयोजित  किया जाए।
किंतु हर शुक्रवार को सड़कों, बगीचों, बाजारों, सरकारी दफ्तरों, हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर मुसल्ला  बिछाकर नमाज पढ़ने की जो प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, उससे आम नागरिकों को बहुत तकलीफ होती है। यातायात अवरूद्ध हो जाता है। पुलिस, एम्बुलेंस और फायर बिग्रेड की गाडियां अटक जाती है। जिससे आपातकालीन सेवाओं में बाधा पहुंचती है। इस तरह बड़ी संख्या में एक साथ बैठकर मस्जिद के बाहर नमाज पढ़ने से रूहानियत नहीं फैलती, बल्कि एक नकारात्मक राजनैतिक संदेश जाता है। जो धर्म का कम और ताकत का प्रदर्शन ज्यादा करता है। जाहिर है कि इससे अन्य धर्मावलंबयों में उत्तेजना फैलती है। ऐसी घटना साल में एक आध  बार किसी पर्व हो, तो शायद किसी को बुरा न लगे। पर हर जुम्मे की नमाज इसी तरह पढ़ना, दूसरे धर्मावलंबियों  को स्वीकार नहीं है।
बहुत वर्ष पहले इस प्रवृत्ति का विरोध मुबंई में शिव सेना ने बड़े तार्किक रूप से किया था। मुबंई एक सीधी लाईन वाला शहर है। जिसे अंग्रेजी में ‘लीनियर सिटी’ कहते हैं। उत्तर से दक्षिण मुबंई तक एक सीधी सड़क के दोनों ओर तमाम उपनगर और नगर बसा है। ऐसे में मुबंई की धमनियों में रक्त बहता रहे, यह तभी संभव है, जब इस सीधी सड़क के यातायात में कोई रूकावट न हो। लगभग दो दशक पहले की बात है, मुबंई के मुसलमान भाईयों ने मस्जिदों के बाहर मुसल्ले बिछाकर हर जुम्मे को नमाज पढ़ना शुरू कर दिया। जाहिर है इससे यातायात अवरूद्ध हो गया। आम जनता में इसका विरोद्ध हुआ। शिव सैनिक इस मामले को लेकर बाला साहिब ठाकरे के पास गये। बाला साहिब ने हिंदुओं को आदेश दिया कि वे हर मंदिर के बाहर तक खड़े होकर प्रतिदिन सुबह और शाम की आरती करें। जुम्मे की नमाज तो हफ्ते में एक दिन होती थी। अब ये आरती तो दिन में दो बार होने लगी। व्यवस्था करने में मुबंई पुलिस के हाथ पांव फूल गये। नतीजतन मुबंई के पुलिस आयुक्त ने दोनों धर्मों के नेताओं की मीटिंग बुलाई। पूरे सद्भाव के साथ ये सामूहिक फैसला हुआ कि न तो मुसलमान सड़क पर नमाज पढेंगे और न हिंदू सड़क पर आरती करेंगे। दोनों धर्मावलंबी आज तक अपने फैसले पर कायम हैं।
अब देश की ताजा स्थिति पर गौर कर लें। गत दिनों भाजपा व सहयोगी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने  देश में कई जगह सड़कों पर नमाज का खुलकर विरोध किया। नतीजा ये हुआ कि हरियाणा सरकार ने मस्जिदों के बाहर नमाज पढ़ने पर पाबंदी लगा दी। इसका असर आसपास के राज्यों में भी हुआ। 11 मई को शुक्रवार था, आमतौर पर दिल्ली की कई मस्जिदों के बाहर दूर तक नमाजी फैल जाया करते थे। पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। लोगों ने राहत की सांस ली।
एक साथी पत्रकार ने मुझसे प्रश्न किया कि आप तो आस्थावान व्यक्ति हैं। क्या आप सड़कों पर नमाज पढ़ने को उचित मानते हैं? मेरा उत्तर था-बिल्कुल नहीं। इस पर वे उछल पड़े और बोले कि जिस हिंदू से भी यह प्रश्न पूछ रहा हूं, उसका उत्तर यही है। इसका मतलब मोदी व अमित शाह का चुनावी ऐजेंडा तय हो गया। मैने पूछा- कैसे? तो उनका उत्तर था- भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों ने सड़कों पर नमाज का विरोध शुरू ही इसलिए किया है कि इससे हिंदू और मुसलमानों का राजनैतिक धु्रवीकरण हो जाए और भाजपा को, विशेषकर उत्तर भारत में, हिंदू मत हासिल करना सुगम हो जाए। अब भाजपा वाले अगले लोक सभा चुनाव तक ऐसे ही मुद्दे उछालते रहेंगे। जैसे तिरंगा ले जाकर मुसलमान के मौहल्लों में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाना, अलीगढ मुस्लिम विद्यालय से जिन्ना का चित्र हटवाना आदि। जिससे लगातार हिंदू मत एकजुट होते जाए। उन पत्रकार महोदय का यह मूल्यांकन सही हो सकता है। राजनीति में चुनाव जीतने के लिए नऐे-नऐ मुद्दे खोजने का काम हर दल करता है। इसमें कुछ गलत नहीं। अब ये तो मतदाता के विवेक पर है कि वह अपना मत प्रयोग करने से पहले किसी राजनैतिक दल का आंकलन किस आधार पर करता है। केवल भावना के आधार पर या उसके द्वारा विकास कर पाने की संभावनाओं के आधार पर।
चुनावी बहस को छोड़ दें, तो भी यह प्रश्न महत्वपूर्णं है कि धर्म का इस तरह राजनैतिक प्रयोग कहां तक उचित है। चाहे वो कोई भी धर्म को मानने वाला कहे। इसमें संदेह नहीं है कि अल्पसंख्यकों ने राजनैतिक दलों का मोहरा बनकर, अपने आचरण से लगातार, दूसरे धर्मावलंबियों को उत्तेजित किया है। चाहे फिर वो समान नागरिक कानून की बात हो, मदरसों में धार्मिक शिक्षा और राजनैतिक प्रवचनों की बात हो या फिर सड़क पर जुम्मे की नमाज पढ़ने की बात हो। कुछ लोग मानते हैं कि हिंदूवादियों का वर्तमान आक्रोश उनकी सदियों की संचित कुंठा का परिणाम है। दूसरे ऐसा मानते हैं कि अपनी राजनीति के लिए भाजपा इसे नाहक तूल दे रही है। पर हमारे जैसे निष्पक्ष नागरिक को फिर वो चाहे हिंदू हो, मुसलमान हो, सिक्ख हो, पारसी हो, जो भी हो, उसे सोचना चाहिए कि धर्म की उसके जीवन में क्या सार्थकता है? अगर धर्म के अनुसार आचरण करने से उसके परिवार में सुख, शांति और रूहानियत आती है, तो धर्म उसके लिए आभूषण है। पर अगर धर्म के ठेकेदारों, चाहे वे किसी धर्म के हो, के ईशारो पर नाचकर हम अविवेकपूर्णं व्यवहार करते हैं, तो वह तथाकथित धर्म हमारे लिए समाजिक वैमनस्य का कारण बन जाता है। जिससे हमें बचना है। भारत में सदियों से सभी धर्म पनपते रहे हैं। अगर हम पारस्परिक सम्मान और सहयोग की भावना नहीं रखेंगे, तो समाज खंड-खंड हो जायेगा, अशांति और वैमनस्य बढ़ेगा और विकास अवरूद्ध हो जाऐगा।

Monday, December 18, 2017

चलो कांग्रेस को समझ में तो आया

        गुजरात चुनाव के फैसले जो भी हो, एक बात स्पष्ट है कि आजादी के बाद, ये पहली बार है कि कांग्रेस को यह बात समझ में आई कि हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किये बिना बहुसंख्यक हिंदू समाज में उसकी स्वीकार्यता नहीं हो सकती। यही कारण है कि राहुल गांधी ने इस बार अपने चुनाव अभियान में गुजरात के हर मंदिर में जाकर भगवान के दर्शन किये। हम प्रभु से ये प्रार्थना करेंगे कि वे कांग्रेस के युवा अध्यक्ष और पूरे दल पर कृपा करें व उन्हें सद्बुद्धि दें कि वे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर साम्प्रदयिकता का दामन छोड़ दें।

आजादी के बाद आज तक कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों ने अल्पसंख्यकों को जरूरत से ज्यादा महत्व देकर हिंदुओं के मन में एक दरार पैदा की है। मैं यह नहीं कहता कि कांग्रेस ने हिंदूओं का ध्यान नहीं रखा। मेरा तो मानना है कि पिछले 70 वर्षों में हिंदू धर्मस्थलों के जीर्णोंद्धार और राम जन्मभूमि जैसे हिंदुओं के बहुत से कामों में कांग्रेस ने भी बहुत अच्छी पहल की है। लेकिन जहां तक सार्वजनिक रूप से हिंदूत्व को स्वीकारने की बात है, कांग्रेस और इसके नेता हमेशा इससे बचते रहे हैं। जबकि अल्पसंख्यकों के लिए वे बहुत उत्साह से सामने आते रहे, चाहे वो इफ्तार की दावत आयोजित करना हो, चाहे हज की सब्सिडी की बात हो, चाहे ईद में जाली की टोपी पहनकर अपना मुस्लिम प्रेम प्रदर्शित करना हो। जो भी क्रियाकलाप रहे, उससे ऐसा लगा, जैसे कि मुसलमान कांग्रेस पार्टी के दामाद हैं।

अब जबकि गुजरात में उनके अध्यक्ष ने खुद भारत में हिंदू धर्म के महत्व को समझा है और मंदिर-मंदिर जाकर व संतो से आर्शीवाद लिया है, तो गुजरात के चुनाव परिणामों से कांग्रेस में ये मंथन होना चाहिए कि आगे की राजनीति में वे सभी धर्मों के प्रति सम्भाव रखें। सम्भाव रखने का ये मतलब नहीं कि बहुसंख्यकों की भावनाओं की उपेक्षा की जाए और उन्हें दबाया जाऐ या उनको सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने से बचा जाऐ। उल्टा होना ये चाहिए की अब भविष्य में प्रायश्चित के रूप में सार्वजनिक मंचों से कांग्रेस को अपनी पुरानी गलती की भरपाई करनी चाहिए।

गुजरात में अपने अनुभव को दोहराते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और विपक्षी दल के नेताओं को भी हिंदू धर्म के त्यौहारों में उत्साह से भाग लेना चाहिए और दिवाली और नवरात्रि जैसे उत्सवों पर भोज आयोजित कर हिंदुओं के प्रति अपने सम्मान को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना चाहिए। इसमें नया कुछ भी नहीं होगा। मध्ययुग से भारत में यह परंपरा रही है कि हिंदू राजाओं ने मुसलमानों के तीज त्यौहारों पर और मुलमान बादशाहों ने हिंदुओं के तीज त्यौहारों पर खुलकर हिस्सा लिया है। सर्वधर्म सम्भाव का भी यही अर्थ होता है।

दूसरी तरफ मुसलमानों के नेताओं को भी सोचना चाहिए कि उनके आचरण में क्या कमी है। एक तरफ तो वे भाजपा को साम्प्रदायिक कहते हैं और दूसरी तरफ अपने समाज को संविधान की भावना के विरूद्ध पारंपरिक कानूनों से नियंत्रित कर उन्हें मुख्यधारा में आने से रोकते हैं। इस वजह से हिंदू और मुसलमानों के बीच हमेशा खाई बनी रहती है। जब तक मुसलमान नेता अपने समाज को मुख्यधारा से नहीं जोड़ेगे, तब तक साम्प्रदायकिता खत्म नहीं होगी।

राहुल गांधी ने अपने पहले अध्यक्षीय भाषण में दावा किया है कि वे समाज को जोड़ने का काम करेंगे, तोड़ने का नहीं। अगर राहुल गांधी और उनका दल वास्तव में इसका प्रयास करता है और सभी धर्मों के लोगों के प्रति समान व्यव्हार करते हुए, सम्मान प्रदर्शित करता है, तो इसके दूरगामी परिणाम आयेंगे। भारतीय समाज में सभी धर्म इतने घुलमिल गये हैं कि किसी एक का आधिपत्य दूसरे पर नहीं हो सकता। लेकिन यह भी सही है कि जब तक बहुसंख्यक हिंदू समाज को यह विश्वास नहीं होगा कि कांगे्रस और विपक्षी दल अल्पसंख्यकों के मोह से मुक्त नहीं हो गये हैं, तब तक विपक्ष मजबूत नहीं हो पायेगा। वैसे भी धर्म और संस्कृति का मामला समाज के विवेक पर छोड़ देना चाहिए और सरकार का ध्यान कानून व्यवस्था, रोजगार सृजन और आधारभूत ढ़ाचे का विस्तार करना होना चाहिए।

किसी भी लोकतंत्र के लिए कम से कम दो प्रमुख दलों का ताकतवर होना अनिवार्य होता है। मेरा हमेशा से ही यह कहना रहा है कि मूल चरित्र में कोई भी राजनैतिक दल अपवाद नहीं है। भ्रष्टाचार व अनैतिकता हर दल के नेताओं का भूषण है। यह बात किसी को अच्छी लगे या बुरी पर इसके सैंकड़ों प्रमाण उपलब्ध है। रही बात विचारधारा की तो शरद पवार, अखिलेश यादव, मायावती, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, प्रकाश सिंह बादल, फारूख अब्दुल्ला जैसे सभी नेता अपने-अपने दल बनाए बैठे हैं। पर क्या कोई बता सकता है कि इनकी घोषित विचारधारा और आचरण में क्या भेद है? सभी एक सा व्यवहार करते हैं और एक से सपने जनता को दिखाते हैं। तो क्यों नहीं एक हो जाते हैं? इस तरह भाजपा और कांग्रेस जब दो प्रमुख दल आमने-सामने होंगे, तब जनता की ज्यादा सुनी जायेगी। संसाधनों की बर्बादी कम होगी और विकास करना इन दलों की मजबूरी होगी। साथ ही एक दूसरे के आचरण पर ‘चैक और बैलेंस’ का काम भी चलता रहेगा। इसलिए गुजरात के चुनाव परिणाम जो भी हो, राहुल गांधी के आगे सबसे बड़ी चुनौती है कि वे उन लक्ष्यों को हासिल करें, जिन्हें उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कांग्रेस की ताकत बताया है। साथ ही मंदिरों में जाना, पूजा अर्चना करना और मस्तक पर तिलक धारण करने की अपनी गुजरात वाली पहल को जारी रखें, तो उन्हें इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे।