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Monday, November 26, 2018

ब्रजवासियों के साथ धोखा क्यों?

जब से ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ का गठन हुआ है, ये एक भी काम ब्रज में नहीं कर पाई है। जिन दो अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ जी ने इतने महत्वूपर्णं ब्रजमंडल को सजाने की जिम्मेदारी सौंपी हैं, उन्हें इस काम का कोई अनुभव नहीं है। इससे पहले उनमें से एक की भूमिका मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष के नाते तमाम अवैध निर्माण करवाकर ब्रज का विनाश करने में रही है। दूसरा सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी है, जिसने आजतक ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण पर कोई काम नहीं किया। इन दोनों को ही इस महत्वपूर्णं, कलात्मक और ऐतिहासिक काम की कोई समझ नहीं है। इसलिए इन्होंने अपने इर्द-गिर्द फर्जी आर्किटैक्टों, भ्रष्ट जूनियर अधिकारियों और सड़कछाप ठेकेदारों का जमावाड़ा कर लिया है। सब मिलकर नाकारा, निरर्थक और धन बिगाड़़ू योजनाऐं बना रहे हैं। जिससे न तो ब्रज का सौंदर्य सुधरेगा, न ब्रजवासियों को लाभ होगा और न ही संतों और तीर्थयात्रियों को। केवल कमीशन खोरों की जेबें भरी जाऐंगी।
इनकी मूर्खता का ताजा उदाहरण है भगवान श्रीकृष्ण की 40 करोड़ रूपये की विशाल मूर्ती, जिसे ये दिल्ली-आगरा के बीच सुश्री मायावती द्वारा बनावाऐं गये यमुना एक्सप्रेस वे के उस बिंदु पर लगवाने जा रहे हैं, जहां से गाड़ियां वृंदावन के लिए मुड़ती है। 40 करोड़ की मूर्ती में कितना कमीशन खाया जाऐगा, इसका अंदाजा इसी बात से लगा लीजिए, कि ब्रज के 9 कुंडों के जीर्णोंद्धार का ठेका, ये सरकारी लोग 77 करोड़ में पिछले वर्ष दे चुके थे। जिसे ‘द ब्रज फाउंडेशन’ के शोर मचाने और बेहतर कार्य योजना देने के बाद अब मात्र 27 करोड़ रूपये में करवाया जायेगा। इस तरह 50 करोड़ रूपये की बर्बादी रोकी गई है। क्योंकि द ब्रज फाउंडेशन गत 15 वर्षों से अपने तन-मन-धन से भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीलास्थलियां सजा रही है। इसलिए उससे कोई चोरी छिप नहीं सकती। 77 करोड़ रूपये में 50 करोड़ रूपये का घोटाला, यानि 66 फीसदी कमीशन। इस अनुपात से 40 करोड़ रूपये की मूर्ती में 27 करोड़ रूपया कमीशन में जाएगा।
मूर्ति लगवाने के पीछे इनका तर्क है कि वाहन चालकों को दूर से ही पता चल जाएगा कि वृंदावन आ गया। कितनी हास्यास्पद बात है, बिना मूर्ती लगे ही जब हजारों गाड़ियां रोज वृंदावन आ रही है, तो उन्हें  रास्ता कौन बता रहा है? जिसे वृंदावन आना है, उसे सब रास्ते पता हैं। वैसे जो तीर्थयात्री रोज आ रहे हैं, उनसे ही वृंदावन की सारी व्यवस्था चरमरा जाती है। गत दो वर्षों में ब्रज तीर्थ विकास इस स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नही कर पाया। तो अब विशाल मूर्ती लगवाकर और मजमा क्यों जोड़ना चाहता है?
उधर ब्रज में 85 फीसदी भू जल खारा है। प्राचीन कुंडों के जीर्णोंद्धार जल संचयन भी होता है और खारापन भी क्रमशः कम होता है। सर्वोच्च न्यायालय के 2001 के ‘हिंचलाल तिवारी आदेश’ के तहत शासन को ब्रज के उपेक्षित पड़े 800 से भी अधिक कुंडों का जीर्णोंद्धार कराना चाहिए था। जबकि उसने आजतक लगभग 40 करोड़ रूपया खर्च करके 40 कुंडों का जीर्णोंद्धार करवाया है, जिनकी दशा पहले से भी ज्यादा दयनीय हो गई हैं। उनके नऐ बने घाट टूट रहे हैं, कूड़े और मलबे के ढेर जमा हो गऐ हैं और उनमें कुत्ते और सूअर डोलते हैं।
इस मूर्ती को लगवाने से बेहतर होता कि ब्रजतीर्थ विकास परिषद् ब्रज के कुछ कुंडों का जीर्णोंद्धार करवा देता, तो ब्रज में जल की समस्या के समाधान की दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ते। साथ ही इससे ब्रज के गांवों में रहने वाले गोधन, ब्रजवासियों और संतों को प्रसन्नता होती। पर वहां भी इनकी गर्दन फंसी है। क्योंकि द ब्रज फाउंडेशन ने बेहद कम लागत पर वृंदावन के ब्रह्म कुंड, गोवर्धन के ऋणमोचन कुंड, रूद्र कुंड व संकर्षण कुंड, जैंत का जयकुंड, चौमुहा  का ब्रह्म सरोवर आदि दर्जनों पौराणिक कुंडों का मनोहारी जीर्णोंद्धार कर मथुरा जिले की जलधारण क्षमता को 5 लाख क्यूबिक मीटर बढ़ा दिया है। अब अगर ब्रज तीर्थ विकास परिषद् कुंडों का जीर्णोंद्धार करेगी, तो उसे भी द ब्रज फाउंडेशन की लागत के बराबर कीमत पर काम करना पड़ेगा। तिगुने दाम की योजना बनाने वाली ब्रजतीर्थ विकास परिषद् फिर कमीशन कैसे खा पाऐगीा? इसलिए विशाल मूर्ती लगवाने जैसी फालतू परियोजनाऐं बनाई जा रही है, जिससे कोई हिसाब भी न मांग सके और ढ़िढोरा भी पीट दिया जाऐ कि 40 करोड़ रूपये की मूर्ती लगवा दी गई।
योगी जी से उद्घाटन करवाने की जल्दी में ब्रजतीर्थ विकास परिषद् ने सड़कछाप आर्किटैक्टों को पकड़कर बड़े बजट की परियोजनाऐं बनवा ली हैं, जिससे मोटा कमीशन खाया जा सके। इस तरह हर ओर ब्रज का विनाश किया जा रहा है। भाजपा योगी महाराज को हिंदू धर्म का पुरोधा बनाकर चुनावों में घुमा रही है। पर योगी महाराज की सरकार के भ्रष्ट और निकम्मे अधिकारी ब्रज जैसे कृष्ण भक्ति के पौराणिक धाम की महत्ता और संवेदनशीलता को समझे बिना शहरी लोगों के मनोरंजन के लिए बड़ी-बड़ी खर्चीली योजनाऐं बनवा रहे हैं। जिनसे ब्रज का विकास होना तो दूर, विनाश की गति तेजी से बढ़ गई है। चुनाव में वोट मांगे जाऐंगे आम ब्रजवासी से, जो गांवों में रहता है। जिसने कान्हा से संग गाय चराई। जिनके घरों से कान्हा ने माखन चुराया। उन सब ब्रजवासियों की उपेक्षा कर बाहर से आने वाले सैलानियों के मनोरंजन की योजनाऐं बनाकर ब्रजतीर्थ विकास परिषद् क्यों योगी महाराज की छवि खराब करने में जुटी है? ये ब्रजवासियों के साथ सरासर धोखा है।

Monday, August 13, 2018

योगी आदित्यानाथ जी ध्यान दें!

पिछले दिनों जब उ.प्र. में निर्माण संबंधी हुई अनेक दुर्घटनाओं के बाद उ.प्र. के सिविल इंजीनियरों ने एक खुला पत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को संबोधित करते हुए लिखा। जिसका मसौदा निम्न प्रकार है-‘‘आज उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे धंस रहे हैं। बनारस में ब्रिज के बीम डिस्प्लेसड हो रहे हैं। सड़कों पर गढ्ढो के कारण दुर्घटनाएं हो रही हैं। नहरें टूट रही हैं। खेतों को समुचित पानी नहीं मिल पा रहा। बाँध पानी से लबालब भर नहीं पा रहे। किसी शहर का भी ड्रेनेज सही नहीं हैं। इन प्रोजेक्ट्स का पूरा फायदा लोगों को नहीं मिल पा रहा। शहरों के सीवर जाम हैं।  आखिर क्यों ? कभी किसी इंजीनयर से पूछा जाएगा या उन्हें केवल दण्डित किया जाएगा ? बच्चा भी 9 माह  पेट में पलता है तभी स्वस्थ पैदा होता है और आगे जीवन में स्वस्थ रहने की संभावना ज्यादा होती है। यहां तो इंजिनीयरों को बस डेट दी जाती है और फिर शुरू होता है समीक्षा - समीक्षा का टी 20 खेल। यह नही पूछा जाता की प्रोजेक्ट कब तक पूरा हो सकता है। दबाव होता है कि फलां तारीख तक प्रोजेक्ट पूरा हो जाए। ना तो मैनपावर मिलेगी ना आवश्यक सुविधाएं।

महाराज जी यह निर्माण का कार्य है। विध्वंस की तरह मत करवाइये। समय दीजिये। डी.पी.आर. बनाने में बहुत समय चाहिए होता है। एस्टीमेट बनाने में बहुत सारी जानकारियां चाहिए। दरों की एनालिसिस करना आसान काम नही है। कोई भी स्ट्रक्चर एक इंजीनयर के लिए उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति है। उसका निर्माण एक सुखद पर पीड़ादायक घटना है। समय पूर्व प्रसव की तरह का व्यवहार किसी भी संरचना के साथ मत कीजिये। इंजिनीयरों ने राष्ट्र के विकास में बहुत योगदान दिया है। उनको पार्टी कार्यकताओं की हठधर्मिता के सहारे मत छोड़िये। नहीं तो कोई भी निर्माण मात्र विध्वंस का कारण ही बनेगा। विकास की आड़ में ठेकेदारी और जेब भरने का उपक्रम नही चलना चाहिए न।  ना तो भारत रत्न विश्वशरैया जी ने ना ही श्रीधरन जी ने दबाव में काम किया था। तभी उन्होंने मेट्रो जैसी धरोहरों का निर्माण किया।

हर राजनैतिक दल सत्तारूढ दल को भ्रष्टाचारी बताकर अपना चुनाव अभियान चलाता है और जनता से भ्रष्टाचारमुक्त शासन देने का वायदा करता है। पर हकीकत यह है कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और। ऐसा कभी नहीं सुना जाता कि किसी निर्माण कंपनी को उसके अनुभव और गुणवत्ता के आधार पर योनजाओं के क्रियान्वयन के लिए चुना जाए। यों चुनने की प्रक्रिया अब काफी पारदर्शी बना दी गई है। जिसमें ऑनलाईन निविदाऐं भरी जाती है और टैक्निकल व फायनेंसियल बिडिंग का तुलनात्मक अध्ययन करके ठेके आवंटित किये जाते हैं। पर ये सब भी एक नौटंकी से ज्यादा कुछ नहीं है। सरकार किसी भी दल की क्यों न हो, उसके मंत्री सत्ता में आते ही मोटी कमाई के तरीके खोजने लगते हैं और नौकरशाही के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से सभी परियोजनाऐं अपने चहेतों को दिलवाते हैं।’’

मंत्री के चहेते का मतलब होता है, जो मंत्री के घर जाकर निविदा दाखिल करने से पहले ही मंत्री को अग्रिम रूप से मोटी रकम देकर, इस बात को सुनिश्चित कर ले कि जो भी ठेका मिलेगा, वो उसे ही मिलेगा। इसके बाद निविदा की सारी प्रक्रिया एक ढकोसला मात्र होती है। और वही होता है जो, ‘जो मंजूरे मंत्री जी होता है’।

योगी जी जब सत्ता में आए थे, तो उन्होंने भी बहुत कोशिश की कि भ्रष्टाचारविहीन शासन दें। पर आज तक कुछ भी नहीं बदला। जो कुछ पहले चल रहा था। उससे और ज्यादा भ्रष्टाचार आज सार्वजनिक निर्माण के क्षेत्र में अनुभव किया जा रहा है। मैंने कई बार इस मुद्दे उठाया है कि भ्रष्टाचार का असली कारण ‘करप्शन इन डिजाईन’ होता है। यानि योजना बनाते समय ही मोटा पैसा खाने की व्यवस्था बना ली जाती है। जैसा उ.प्र. के पर्यटन विभाग में हमें अनुभव हुआ। जब उसने पिछले वर्ष ब्रज के 9 कुंडों के जीर्णोंद्धार का ठेका 77 करोड़ रूपये में उठा दिया। हमने इसका पुरजोर विरोध किया और परियोजना में तकनीकी खामिया उजागर की, तो अब यही काम मात्र 27 करोड़ रूपये में होने जा रहा है। यानि 50 करोड़ रूपया सीधे किसी की जेब में जाने वाले थे। इतना ही नहीं योगी जी ने बड़े प्रचार के साथ जिस ‘ब्रज तीर्थ विकास परिषद्’ की स्थापना की है, उसके मूल संविधान में छेड़छाड़ करके वर्तमान उपाध्यक्ष शैलजाकांत मिश्र ने उसे भारी भ्रष्टाचार करने के लिए सुगम बना दिया है। मूल संविधान में परिषद् में पर्यटन से संबंधित अनेक विशेषज्ञों को लेने का प्राविधान था, जिसे श्री मिश्रा ने बड़े गोपनीय तरीके से हटवाकर, ऐसी व्यवस्था बना ली कि अब किसी भी साधारण सामाजिक कार्यकर्ता या दलालनुमा व्यक्ति को बोर्ड में लाया जा सकता है। इसी तरह ‘सी.ई.ओ’ की ताकत भी इतनी बढ़ा दी कि अब कोई उन्हें ब्रज को बर्बाद करने से नहीं रोक सकता। केवल दो लोगों के अहमकपन से भगवान श्रीकृष्ण के ब्रज का विकास नियंत्रित हो गया है। जिसके निश्चित रूप से घातक परिणाम सामने आऐंगे और तब ये योगी सरकार के लिए ‘ताज कोरिडोर’ जैसा घोटाला खुलेगा।

अभी पिछले दिनों बनारस में निर्माणाधीन पुल की बीम गिरी और 18 लोग मर गऐ। आगरा में ‘रिंग रोड’ धंस गई। मथुरा के गोवर्धन रेलवे स्टेशन का नवनिर्मित चबूतरा बैठ गया। बस्ती जिले में पुल गिर गया। ऐसी दुर्घटनाऐं आए दिन हो रही है, पर सरकार कोई सबक नहीं ले रहीं। इससे उ.प्र. के मतदाताओं की जान जोखिम में पड़ गई है। पता नहीं कब, कहां, क्या हादसा हो जाऐ?

Monday, August 6, 2018

डॉ. सुब्रमनियन स्वामी से झगड़ा क्यों?

अपने राजनैतिक जीवन में अनेक बार दल बदल चुके, राज्यसभा के विवादास्पद सांसद, जो मोदी सरकार में वित्त मंत्री न बनाये जाने से बेहद खफा हैं, ने मेरे ऊपर हमला करते हुए आरोप लगाये कि मैं 21वीं सदी का सबसे बड़ा ‘नटवरलाल’ हूँ और मेरे विरूद्ध उन्होंने 8 पेज की शिकायत उ0प्र0 के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजकर, सीबीआई से जांच करवाने की मांग की।

उनका आरोप पत्र लेकर उनके दो सहयोगी वकील हवाई जहाज से पिछले हफ्ते लखनऊ गये और मुख्यमंत्री योगी जी को शिकायत का हर बिंदु समझाया। इसके साथ ही डॉ. स्वामी ने अपने शिकायत पत्र को सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।

इस शिकायत पत्र में लगाये गए आरोपों को पढ़कर हर उस व्यक्ति को डॉ. स्वामी की बुद्धि पर तरस आया, जो मुझे पत्रकार के नाते या भगवान श्रीकृष्ण की धरोहरों के संरक्षणकर्ता के रूप में जानते हैं। किसी को डॉ. स्वामी के लगाये आरोपों पर यकीन नहीं हुआ। हमने भी बिना देरी करे सभी आरोपों का जवाब, मय प्रमाणों के साथ प्रस्तुत कर दिये।

जबकि डॉ. स्वामी से हमने दो महीने पहले पूछा था कि आज तक उन्होंने भ्रष्टाचार के कितने मुद्दे उठाये और उनमें से कितनों में सजा दिलवाई। क्योंकि उनकी ख्याति ये है कि वू धूमधाम से ऐसे मुद्दे उठाते हैं और फिर परदे के पीछे आरोपी से डील करके अपने ही मुकदमों को ढीला करवा देते हैं। जैसे जैट एयरवेज-एतिहाद डील के खिलाफ उन्होंने खूब शोर मचाया और सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की और फिर आरोपियों से डील करके धीरे धीरे अपनी याचिका को कई बार बदलकर ठंडा कर दिया। हमने पूछा था कि अय्याश और बैंकों के हजारो करोड़ों रूपया लूटकर विदेश भागने वाले, शराब निर्माता विजय माल्या से बेहतर चरित्र का क्या कोई व्यक्ति डॉ. स्वामी को जीवन में अपने दल के लिए नहीं मिला? उल्लेखनीय है कि डॉ. स्वामी ने 2003 से 2010 के बीच विजय माल्या को अपनी जनता पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था। हैं न दोनों मौसेरे भाई।

हमने पूछा कि क्या डॉ. स्वामी भाजपा के प्राथमिक सदस्य हैं? अगर नही तो उन्हें भाजपा का वरिष्ठ नेता क्यों कहा जाता है? हमने पूछा कि अगर वे इतने ही पाक-साफ हैं, तो अंतर्राष्ट्रीय दलाल, हथियारों के सौदागरों के ऐजेंट, कुख्यात तांत्रिक चंद्रा स्वामी और अदनान खशोगी  से डॉ. सुब्रमनियम स्वामी के इतने घनिष्ठ संबंध क्यों थे? गूगल पर इनके काले कारनामे भरे पड़े हैं।

डॉ. स्वामी लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निकटस्थ लोगों पर हमले करते रहते हैं। हमने पूछा कि क्या उन्हें मोदी जी की योग्यता पर शक है और वे स्वयं को मोदी से बेहतर प्रशासक मानते हैं? पिछले दिनों डॉ. स्वामी ने खुलेआम कहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था को सुधारने की क्षमता केवल उनमें है। इसलिए उन्हें भारत का वित मंत्री बनाना चाहिए। हमने पूछा कि कहीं ये विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह इतिहास तो नहीं दोहरायेंगे? पहले वित मंत्री बनाओं, फिर प्रधानमंत्री और अमित शाह के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे और फिर खुद प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पेश करेंगे। हमारी जानकारी के अनुसार डॉ. स्वामी का दावा है कि इन्हें संघ और भाजपा के एक बड़े वर्ग का समर्थन प्राप्त है। ये बात दूसरी है कि वे सार्वजनिक जीवन में ज्यादातर समय ऐसे ही  झूठ बोलते हैं।

हमने पूछा कि वे भ्रष्टाचार के सब मुद्दे ट्वीटर और मीडिया पर ही क्यों उछालते है? जबकि उनके पास राज्यसभा में बोलने का सशक्त माध्यम है। कारण स्पष्ट है कि राज्यसभा में उठाये मुद्दों के प्रति उनकी जवाबदेही बन हो जाऐगी। तब उन्हें डील करके ठंडा करना आसानी से संभव नहीं होगा।

इधर मुझ पर डॉ. स्वामी का पहला आरोप है कि मैंने ब्रज वृंदावन में सैकड़ों करोड़ की सार्वजनिक भूमि पर कब्जा कर लिया। मेरा उन्हें जवाब है कि  वृंदावन में मेरे पैतृक निवास के अतिरिक्त मेरे नाम या मेरी संस्था ब्रज फाउंडेशन के नाम मथुरा के राजस्व रिकॉर्ड में वे एक इंच जमीन भी सिद्ध करके दिखा दें, तो मैं कड़ी से कड़ी सजा भुगतने को तैयार हूं। अगर न सिद्ध कर पाऐ, तो बतायें उनकी सजा क्या होगी?

उनका दूसरा आरोप यह है कि मेरे सहयोगी आईआईटी के मेधावी छात्र राघव मित्तल ने मथुरा की युवा सीडीओ से बदतमीजी की। हमारा उत्तर यह है कि हमने योगी सरकार को दो बड़े घोटालों में फंसने से बचाया। जिसके प्रमाण मौजूद हैं।  जिससे मथुरा के कुछ भ्रष्ट नेता बैचेन हो गऐ, जो इन घोटालों में मोटा कमीशन खाते। इसलिए पिछले वर्ष से ब्रज फाउंडेशन पर तरह-तरह के झूठे आरोप लगाये जा रहे हैं। जिसमें हम उनकी भविष्य की योजना पर पलीता न लगा सकें।

हमपर उनका तीसरा आरोप यह था कि ब्रज का पर्यटन मास्टर प्लान बनाने के लिए हमने उ0प्र0 शासन से 57 लाख रूपये फीस ली, काम बिगाड़ दिया और झगड़ा कर लिया।हमारा उत्तर है कि पैसा ब्रज फाउंडेशन को नहीं ‘आईएलएफएस’ को मिला। जो हमारा लीड पार्टनर थे। फीस 2 करोड़ 17 लाख मिलनी थी। पर पर्यटन विभाग और एमवीडीए एक दूसरे पर टालते रहे और 1.5 करोड़ रूपया फीस उन पर आज भी बकाया है। जबकि ब्रज फाउंडेशन के बनाये मास्टर प्लान की तत्कालीन पर्यटन सचिव सुशील कुमार और भारत के योजना आयोग के सचिव डॉ. सुभाष पाणि ने लिखकर भारी प्रशंसा की और इसे बेमिसाल बताया था। पाठकों आप खुद ही मूल्यांकन कर लें कि असली ‘नटवरलाल’ कौन है?

Monday, July 2, 2018

मगहर में प्रधानमंत्री मोदी का मजाक क्यों?

पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, संत कबीर दास जी की समाधि दर्शन के लिए उ.प्र. के मगहर नामक स्थान पर गऐ थे। जहां उनके भाषण के कुछ अंशों के लेकर सोशल मीडिया में धर्मनिरपेक्ष लोग उनका मजाक उड़ा रहे हैं। इनका कहना है कि मोदी जी को इतिहास का ज्ञान नहीं है। इसीलिए उन्होंने अपने भाषण में कहा कि गुरुनानक देव  जी, बाबा गोरखनाथ जी और संत कबीरदास जी यहां साथ बैठकर धर्म पर चर्चा किया करते थे। मोदी आलोचक सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि ‘बाबा गोरखनाथ का जन्म 10 वी शताब्दी में हुआ था। संत कबीर दास का जन्म 1398 में हुआ था और गुरुनानक जी का जन्म 1469 में हुआ था। उनका प्रश्न है? फिर कैसे ये सब साथ बैठकर धर्म चर्चा करते थे? मजाक के तौर पर ये लोग लिख रहे हैं कि ‘माना कि अंधेरा घना है, पर बेवकूफ बनाना कहाँ मना है’।

बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद’? अध्यात्म जगत की बातें अध्यात्म में रूचि रखने वाले और संतों के कृपा पात्र ही समझ सकते हैं। धर्म को अफीम बताने वाले नहीं। इस संदर्भ में मैं श्री नाभा जी कृत व भक्त समाज में अति आदरणीय ग्रंथ ‘भक्तमाल’ के प्रथम खंड से एक उदाहरण देकर ये बताने जा रहा हूं कि कैसे जो मोदी जी ने जो कहा, वह उनकी अज्ञानता नहीं बल्कि गहरी धार्मिक आस्था और ज्ञान का परिचायक है।

झांसी के पास ओरछा राज्य के नरेश के राजगुरू, शास्त्रों के प्रकांड पंडित पंडित श्री हरिराम व्यास जी का जन्म 16वीं सदी में हुआ था। बाद में ये ओरछा छोड़कर वृंदावन चले आए और श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य श्रीहित हरिवंश जी महाराज से प्रभावित होकर उसी सम्प्रदाय में दीक्षित हुए। जिसमें भगवान श्रीराधाकृष्ण की निभृत निकुंज लीलाओं का गायन और साधना प्रमुख मानी गई है। इस सम्प्रदाय की मान्यतानुसार वृंदावन में भगवान श्रीराधाकृष्ण और गोपियों की रसमयी लीलाऐं आठोप्रहर निरंतर चलती रहती है। गहन साधना और तपश्चर्या के बाद रसिक संतजनों को इन रसमयी लीलाओं का दर्शन ऐसे ही होता है, जैसे भौतिक जगत का प्राणी टेलीवीजन के पर्दे पर फिल्म देखता है। इसे ‘अष्टायाम लीला दर्शन’ कहते हैं।

श्री हरिराम व्यास जी ने वृंदावन में रहकर घोर वैराग्य और तपश्चर्या से इस स्थिति को प्राप्त कर लिया था कि उन्हें समाधि में बैठकर आठों प्रहर की लीलाओं के दर्शन सहज ही हो जाया करते थे। इसलिए श्री हरिराम व्यास जी का स्थान राधावल्लभ सम्प्रदाय के महान रसिक संतों में अग्रणी माना जाता है।

भक्तमाल’ में वर्णन आया है कि एकबार श्री हरिराम व्यास जी यमुना तट पर समाधिस्थ होकर ‘अष्टायाम लीलाओं’ का दर्शन कर रहेे थे। तभी उनके मन में अचानक यह भाव आया कि जिस लीला रस का आस्वादन मैं सहजता से कर रहा हूं, वह रस संत कबीर दास जी को प्राप्त नहीं हुआ। ये विचार मन में आते ही उन्हें लीला दर्शन होना बंद हो गया। एक रसिक संत के लिए यह मरणासन्न जैसी स्थिति होती है। उनकी समाधि टूट गई, नेत्र खुल गये, अश्रु धारा प्रवाहित होने लगी और उनकी स्थिति जल बिन मछली जैसी हो गई। इस व्याकुलता में अधीर होकर, वे हित हरिवंश जी महाराज के पास गऐ और उनसे लीला दर्शन न होने का कारण पूछा। हित हरिवंश जी महाराज ने कहा कि अवश्य ही तुमसे कोई वैष्णव अपराध हुआ है। जाओ जाकर उसका चिंतन करो और जिसके प्रति अपराध हुआ है, उससे क्षमा याचना करो।

हरिराम व्यास जी पुनः यमुना तट पर आऐ और समाधिस्थ होकर अपराध बोध से चिंतन करने लगे कि उनसे किस संत के प्रति अपराध हुआ है। तब उन्हें ध्यान आया कि चूंकि कबीर दास जी ज्ञानमार्गीय संत थे, इसलिए व्यास जी के मन में ये भाव आ गया था कि कबीरदास जी को भगवान श्री राधाकृष्ण की अष्टायाम लीला के दर्शन का रस प्राप्त नहीं हुआ होगा। जो कि भक्ति मार्ग के रसिक संतों सहज ही हो जाता है। जैसे ही ये विचार आया, हरिराम व्यास जी ने अश्रुपूरित कातर नेत्रों से, दीनहीन भाव से संत कबीरदास जी के श्री चरणों में अपने अपराध की क्षमा याचना की।

व्यास जी यह देखकर आश्चर्यचकित हो गऐ कि संत कबीरदास जी उनके सामने ही यमुना जी से स्नान करके बाहर निकले और हरिराम व्यास जी से ‘राधे-राधे’ कहकर सत्संग करने बैठ गऐ। जबकि कबीरदास जी को पूर्णं समाधि लिए लगभग 150 वर्ष हो चुके थे। फिर ये कैसे संभव हुआ? हरिराम व्यास जी ने पुनः अपने अपराध की क्षमा मांगी और तब शायद उन्होंने ही यह पद रचा, ‘मैं तो जानी हरिपद रति नाहिं’। आज मैंने जाना कि मेरे हृदय में आज तक भगवान के श्रीचरणों के प्रति अनुराग ही उत्पन्न नहीं हुआ है। आज तक तो मैं यही मानता था कि हमारा ही सम्प्रदाय सर्वश्रेष्ठ है और हमारे जैसे ही रसिक संतों को निकुंज लीला के दर्शनों का सौभाग्य मिल पाता है। आज मेरा वह भ्रम टूट गया। आज पता चला कि प्रभु की सत्ता का विस्तार सम्प्रदायों में सीमाबद्ध नहीं है।

इसी तरह महावतार बाबाजी के शिष्य पूरी दुनिया में हैं और उनका विश्वास है और दावा है कि वे जब भी पुकारते हैं, बाबा आकर उन्हें दर्शन और निर्देश देते हैं। ऐसा हजारों वर्षों से उनके शिष्यों के साथ हो रहा है।

अब अगर नरेन्द्र भाई मोदी ने अपने इसी आध्यात्मिक ज्ञान और अनुभव को दृष्टिगत रखते हुए, यह कह दिया कि बाबा गोरखनाथ, संत कबीरदास और श्री गुरूनानक देव जी मगहर में एक साथ बैठकर धर्म चर्चा किया करते थे, तो इसमें गलत क्या है? हमारे देश का यही दुर्भाग्य है कि यवन और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में हम अपनी सनातन संस्कृति को भूल गऐ हैं। उसमें हमारा विश्वास नहीं रह गया है और यही भारत के पतन का कारण है।

Monday, January 1, 2018

बरसाना में लठमार होली के सरकारी आयोजन से संत व ब्रजवासी चिंतित

अयोध्या में हाल में मनाई भव्य दीपावली की तर्ज पर योगी सरकार 60 करोड़ रुपया खर्च करके इस बार बरसाना की लठमार होली मनाने जा रही है। जिससे ब्रज के संत और भक्त समाज में काफी चिंता देखी जा रही है। ब्रज में माधुर्य भाव और ऐश्वर्य भाव से रसोपासना होती है। नंदगांव और बरसाने के बीच होली माधुर्य रस की उपासना का अंग है। जिसकी परंपरा 5000 वर्ष प्राचीन है। जिसकी बारीकी से जानकारी शायद उन लोगों को नहीं है, जिन्होंने योगी जी को बरसाना में भव्य होली आयोजन का सुझाव दिया। क्योंकि इस परंपरा में जो रस है, उसे स्थानीय गोस्वामी गण, उनके परिवार, संतगण व ब्रजवासी ही प्रस्तुत कर सकते हैं। बाहर से आने वाले व्यवसायी कलाकार नहीं। जैसी घोषणा हुई है।

इस रसोपासना के अंतर्गत होली एक महीने चलती है और हर दिन उसका स्वरूप और भाव भिन्न होता है। इसके साहित्य का गहरा सागर है। रंगीली होली उसका एक छोटा भाग है। जो पहले ही विश्व प्रसिद्ध है और इसे देखने दूर-दूर से भक्त और अंतराष्ट्रीय मीडिया हर वर्ष यहां आता है। पर इसके स्वरूप से कभी छेड़-छाड़ नहीं की गई। आज से 43 वर्ष पूर्व उ.प्र. के राज्यपाल डा. एम चेन्ना रेड्डी प्रतिवर्ष श्रद्धा से रंगीली होली देखने बरसाना आते थे। तब से सदा ही ऐसे विशिष्ट अतिथि यहां आते रहे हैं। पर जिस तरह का आयोजन इस वर्ष योगी सरकार करने जा रही है, उससे नंदगांव और बरसाना का संत, भक्त व गोस्वामी समाज ही नहीं बल्कि पूरा ब्रजमंडल बहुत चिंतित है।

रमणरेती, गोकुल, के संत काष्र्णि गुरूशरणानंद जी के शिष्य व ब्रज की संस्कृति पर कई दशकों से गहराई से शोध करने वाले, इसके संरक्षण के अंतिम स्तंभ, श्री मोहन स्वरूप भाटिया (मथुरा) का कहना है कि ‘‘इस आयोजन से बरसाना की होली की परंपरा को भारी ठेस  लगेगी और संतो, भक्तों और रसिकाचार्यों की उपेक्षा होगी। किराये के कलाकार और तमाशे बरसाने की होली का रंग-भंग कर देंगें। उ.प्र. सरकार को अगर ऐसा आयोजन करना ही है, तो लखनऊ या दिल्ली में करे। बरसाना की होली का विनाश न करे।’’

उधर पीली पोखर (बरसाना) पर रहने वाले बाबा महाराज भी इस घोषणा से व्यथित हैं। बाबा का कहना है कि, ’’इस पूरे आयोजन से बरसाना की होली का रस भंग हो जायेगा, जो माधुर्य उपासना की एक गहरी परंपरा का अंग है। इस आयोजन से संतों, गोस्वामीगणों, भक्तों और ब्रजवासियों का अपमान होगा और उनको भारी ठेस लगेगी।’’

बरसाना के क्रांतिकारी युवा पद्म फौजी का कहना है कि, ‘‘जितना रूपया इस आयोजन में खर्च किया जायेगा, उतने में तो पूरा बरसाना चमक सकता है, अगर संजीदगी से योजना बनाई जाए तो। पर वैसे नहीं जैसे अभी काम चल रहा है।’’ बरसाना के किसान भी इस आयोजन के विरूद्ध हैं और बार-बार प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं, पर उनकी सुनी नहीं जा रही। उनकी खड़ी फसल पर बुल्डोजर चल रहे हैं।

जब से यह समाचार प्रसारित हुआ है, पूरे ब्रजमंडल के अनेक लोगों ने इसका विरोध प्रगट किया और मुख्यमंत्री तक उनकी पीड़ा पहुंचाने का अनुरोध किया। जब ब्रजसेवा के हमारे प्रेरणा स्त्रोत बरसाना के विरक्त संत श्रद्धेय श्री रमेश बाबा से मैंने पूछा कि इस विषय में उनका क्या विचार है, तो वे बोले-
 "कबिरा तेरी झोपड़ी,
गल कटियन के पास।
जो करेगा सो भरेगा,
तू काहे होत उदास।।"

वैसे भी बाबा कहते हैं कि ब्रज में तो श्री कृष्ण भी ऐश्वर्य त्यागकर गवारिया बनकर रहे। उसी भाव से आना चाहिए। यहां तो हिंदुस्तान का बादशाह अकबर भी राजसी भेष त्यागकर स्वामी हरिदास जी के दर्शन करने आया था।

योगी जी ने सदियों से उपेक्षित अयोध्या में जिस उत्साह से दीपावली मनाई, उसकी प्रशंसा मैंने अपने पिछले लेख में की थी। पर ब्रज तो पहले ही विश्वभर में आकर्षण का केंद्र है और इसकी उपेक्षा अयोध्या की तरह नहीं हुई है। इसलिये ब्रज का भाव समझे बिना, ब्रज के विकास की बड़ी- बड़ी योजनाऐं बनवाना और ऐसे भव्य कार्यक्रम आयोजित करना, यहां की समृद्ध भक्ति परंपराओं का स्थाई विनाश करने से कम नहीं होगा।

अगर बरसाना की मौजूदा सकरी गलियों  में यह विशाल आयोजन किया जाता है, तो भीड़ में दुर्घटना की पूरी संभावना रहेगी। अगर आयोजन के लिए फरमान जारी कर रंगीली गली की तोड-फोड़ की जाती है, तो बरसाना का मौलिक स्वरूप नष्ट हो जायेगा। जिसे देखने दुनिया भर से भक्त यहाँ आते हैं। इसलिये ब्रजवासियो की योगी जी से प्रार्थना है कि होली का प्रस्तावित आयोजन बरसाना के किसी विशाल मैदान में  करें तो उनका उद्देश्य भी पूरा हो जायेगा और संतगणों, भक्तगणों व ब्रजवासियों की भावना भी आहत नहीं होगी।

चिंता की बात है कि जिन लोगों से योगी सरकार ब्रज विकास की योजनाऐं बनवा रही है, वे बिना ब्रज की संस्कृति और भावना को समझे, उत्साह के अतिरेक में, वह सब कर रहे हैं, जिससे ब्रज संस्कृति का संरक्षण नहीं होगा, विनाश ही होगा। इसके अनेक प्रमाण हैं। गोवर्धन परिक्रमा के लिए छह महीने पहले ऐसे ही हजारो-करोड़ रूपये के एक बड़े कुप्रयास के विरूद्ध समय रहते मैंने योगी जी को सावधान किया था। उस पर मेरा यहां लेख भी छपा था। आभारी हूं कि उन्होंने तुरंत  हमारी  चिंता पर ध्यान दिया और उसे वहीं रोक दिया। वरना जयपुर के एक स्थापित घोटालेबाज के हाथों गोवर्धन की परिक्रमा का विनाश हो जाता। आशा है वे अब भी हमारी विनम्र प्रार्थना पर गंभीरता से ध्यान देंगे और इस आयोजन से जुड़े निहित स्वार्थों के प्रभाव में आए बिना ब्रज की हजारों वर्ष प्राचीन संस्कृति का सम्मान करते हुए उचित निर्णय लेंगे।

Monday, December 25, 2017

मोदी जी उत्तर प्रदेश को संभालें

भाजपा के शिखर नेतृत्व के मन में गत तीन महीनों में यह प्रश्न कई बार आया होगा कि गुजरात के चुनाव में इतनी मश्शकत क्यों करनी पड़ी? विपक्ष ने गुजरात मॉडल को लेकर बार-बार पूछा कि इस चुनाव में इसकी बात क्यों नहीं हो रही? विपक्ष का व्यंग था कि जिस गुजरात मॉडल को मोदी जी ने पूरे देश में प्रचारित कर केंद्र की सत्ता हासिल की, उस मॉडल का गुजरात में ही जिक्र करने से भाजपा क्यों बचती रही? क्या उस मॉडल में कुछ खोट है? क्या उस मॉडल को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया? क्या उस मॉडल का गुजरात की आम जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा? वजह जो भी रही हो भाजपा अध्यक्ष व प्रधानमंत्री को काफी पसीना बहाना पड़ा गुजरात का चुनाव जीतने के लिए। एक और फर्क ये था कि पहले चुनावों में मोदी जी के नाम पर ही वोट मिल जाया करते थे, लेकिन इस बार केंद्र के अनेक मंत्रियों, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, प्रांतों के मंत्रियों और पूरे देश के संघ के कार्यकर्ताओं को लगना पड़ा गुजरात की जनता को राजी करने के लिए, कि वे एक बार फिर भाजपा को सत्ता सौंप दें।
इन स्टार प्रचारकों में सबसे ज्यादा आकर्षक नाम रहा, उ.प्र. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का। जिनके केसरिया बाने और प्रखर संभाषणों ने गुजरात के लोगों को आकर्षित किया। अब चर्चा है कि भाजपा लोकसभा के चुनाव में योगी जी का भरपूर उपयोग करेगी। पर इस सब के बीच मेरी चिंता का विषय उ.प्र. का विकास है।

उ.प्र. में जो तरीका इस वक्त शासन का चल रहा है, उससे कुछ भी ऐसा नजर नहीं आ रहा कि बुनियादी बदलाव आया हो। लोग कहते है कि सुश्री मायावती के शासनकाल में नौकरशाही सबसे अनुशासित रही। अखिलेश यादव  को लोग एक सद्इच्छा रखने वाला ऊर्जावान युवा मानते हैं, जिन्होंने उ.प्र. के विकास के लिए बहुत योजनाऐं चालू की और कुछ को पूरा भी किया। लेकिन पारिवारिक अंतर्कलह और राजनीति पर परिवार के प्रभाव ने उन्हें काफी पीछे धकेल दिया। योगी जी का न तो कई परिवार है और न ही उन्हें आर्थिक असुरक्षा। एक बड़े सम्प्रदाय के महंत होने के नाते उनके पास वैभव की कमी नहीं है। इसलिए यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे अपना शासन पूरी ईमानदारी व निष्ठा से करेंगे। लेकिन केवल निष्ठा और ईमानदारी से लोगों की समस्याऐं हल नहीं होती। उसके लिए प्रशासनिक सूझ-बूझ, योग्य, पारदर्शी और सामथ्र्यवान लोगों की बड़ी टीम चाहिए। जिसे अलग-अलग क्षेत्रों का दायित्व सौंप सकें।

क्रियान्वन पर कड़ी नजर रखनी होती है। जनता से फीडबैक लेने का सीधा मैकेनिज्म होना चाहिए। जिनका आज उ.प्र. शासन में नितांत अभाव है। श्री नरेन्द्र मोदी और श्री अमित शाह को उ.प्र. के विकास पर अभी से ध्यान देना होगा। केवल रैलियां, नारे व आक्रामक प्रचार शैली से चुनाव तो जीता जा सकता है, लेकिन दिल नहीं। उ.प्र. की जनता का यदि दिल जीतना है, तो समस्याओं की जड़ में जाना होगा। लोग किसी भी सरकार से बहुत अपेक्षा नहीं रखते। वे चाहते हैं कि बिजली, सड़के, कानून व्यवस्था ठीक रहे, पेयजल की आपूर्ति हो, सफाई ठीक रहे और लोगों को व्यापार करने करने की छूट हो । किसानों को सिंचाई के लिए जल और फसल का  वाजिव दाम मिले, तो प्रदेश संभल जाता है।

इतना बड़ा सरकारी अमला, छोटे-छोटे अधिकारी के पास गाड़ी, मकान, तन्ख्वाह व पेंशन। फिर भी  रिश्वत का मोह नहीं छूटता। आज कौन सा महकमा है उ.प्र. में जहां काम कराने में नीचे से ऊपर रिश्वत या कमीशन नही चल रहा? और कब नहीं चला? यदि पहले भी चला और आज भी चल रहा है, तो फिर योगी जी के आने का क्या अंतर पड़ा? मोदी जी की इस बात का क्या प्रभाव पड़ा कि ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा’?  मैं बार बार अपने लेखों के माध्यम से कहता आया हूं कि दो तरह का भ्रष्टाचार होता है। एक क्रियान्वन का और दूसरा योजना का। क्रियान्वन का भ्रष्टाचार व्यापक है, कोई भी इंजीनियरिंग विभाग ऐसा नहीं है, जो बिना कमीशन के काम करवाये या बिल पास करे। लेकिन इससे बड़ा भ्रष्टाचार यह होता है कि योजना बनाने में ही आप एक ऐसा खेल खेल जाऐं कि जनता को पता ही न चले और सैंकड़ों करोड़ के वारे-न्यारे हो जाऐं।

मुझे तकलीफ के साथ मोदी जी, योगी जी और अमित शाह जी को कहना है कि  आज उ.प्र. में सीमित साधनों के बीच जो कुछ भी योजनाऐ बन रही है, उनमें पारदर्शिता, सार्थकता और उपयोगिता का नितांत अभाव है। कारण स्पष्ट है कि योजना बनाने वाले वही लोग हैं, जो पिछले 70 साल से योजना बनाने के लिए ही योजना बनाते आऐ हैं। केवल मोटी फीस लेने के लिए योजनाऐं बनाते हैं। बात बार-बार हुई कि जमीन से विकास की परिकल्पना आऐ।  लोगों की भागीदारी हो। गांव और ब्लॉक स्तर पर समझ विकसित की जाए। योजना आयोग का भी नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया गया। लेकिन इसका असर लोगों को जमीन पर नहीं दिखाई दे रहा। फिर भी देश की जनता यह मानती है कि साम्प्रायिकता, पाकिस्तान, चीन और कई ऐसे बड़े सवाल हैं, जिन पर निर्णय लेने के लिए एक सशक्त नेतृत्व की जरूरत है और वो नेतृत्व नरेन्द्र मोदी दे रहे हैं। उन्होंने अपनी छवि भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी बनाई है, जहां इंदिरा गांधी के बाद उन्हीं को सबसे ज्यादा सुना और समझा जा रहा है। परिणाम अभी आने बाकी है। फिर भी उ.प्र. के स्तर पर यदि ठोस काम करना है, तो समस्याओं के हल करने की नीति और योजनाओं को भी ठोस धरातल से जुड़ा होना होगा।

समस्याओं के हल उन लोगों के पास है, जिन्होंने उन समस्याओं को ईमानदारी से हल करने की कोशिश की है। कोशिश ही नहीं की, बिना सरकारी मदद के सफल होकर दिखाया है। क्या कोई भी प्रांत या कोई भी सरकार ऐसे लोगों को बुला कर उनको सुनने को तैयार है ? अगर नही तो फिर वही रहेंगे  ‘ढाक के तीन पात’। उ.प्र. में आने वाला लोकसभा चुनाव तो मोदी जी जीत जाऐंगे। लेकिन उसके लिए गुजरात से कहीं ज्यादा मश्शकत करनी पड़ेगी। अगर अभी से स्थितयां सुधरने लगे, त्वरित परिणाम दिखने लगे तो जनता भी साथ होगी और काम भी साथ होगा। फिर बिना किसी बड़े संघर्ष से वांछित फल प्राप्त किया जा सकता है।

Monday, December 4, 2017

उ. प्र. के निकायों के चुनाव से संदेश

उ.प्र. के नगर निकायों के चुनावों के नतीजे आ गये हैं। लोकतंत्र की ये विशेषता है कि नेता को हर पाँच साल में मतदाता की परीक्षा में खरा उतरना होता है। ऐसा कम ही होता है कि एक व्यक्ति लगातार दो या उससे ज्यादा बार उसी क्षेत्र से चुनाव जीते। अगर ऐसा होता है, तो स्पष्ट है कि उस व्यक्ति ने अपने क्षेत्र में काम किया है और उसकी लोकप्रियता बनी हुई है। अलबत्ता अगर कोई माफिया हो और वो अपने बाहुबल के जोर से चुनाव जीतता हो, तो दूसरी बात है।

उ.प्र. के अधिकतर महापौर भाजपा के टिकट पर जीते हैं। इसके दो कारण है। एक तो केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार होने के नाते मतदाता को ये उम्मीद है कि अगर जिले से केंद्र तक एक ही दल की सत्ता होगी, तो विकास कार्य तेजी से होंगे और साधनों की कमी नहीं आयेगी। दूसरा कारण यह है कि योगी सरकार को बने अभी 6 महीने ही हुए हैं। उ.प्र. के मतदाताओं को अपेक्षा है कि सरकार व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन करेगी। इसलिए उसको इतना भारी समर्थन मिला है।

पर साथ ही जिन सीटों पर कार्यकर्ताओं की छवि और क्षमता को दरकिनार कर किन्हीं अन्य कारणों से सिफारशी उम्मीदवारों को टिकट मिले, वहां उनकी पराजय हुई है। ये चुनावी गणित का एक पेचीदा सवाल होता। दल के नेता का लक्ष्य होता है कि किसी भी तरह चुनाव जीता जाए। इसीलिए अक्सर ऐसे उम्मीदवारों को भी टिकट दे दिये जाते हैं, जिन्हें बाहरी या ऊपर से थोपा हुआ मानकर, कार्यकर्ता गुपचुप असहयोग करते हैं। जबकि इन्हें टिकट इस उम्मीद में दिया जाता है कि वे जीत सुनिश्चित करेंगे। नैतिकता का तकाजा है कि जिसने दल के सामान्य कार्यकर्ता बनकर, लंबे समय तक, समाज और दल के हित में कार्य किया हो, जिसकी छवि साफ हो और जिसमें नेतृत्व की क्षमता हो, उसे ही टिकट दिया जाए। पर अक्सर ऐसा नहीं होता और इससे कार्यकर्ताओं में हताशा फैलती है और वे बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़े होकर, कड़ी चुनौती देते हैं। जो भी हो अब तो चुनाव हो गये। हर दल अपने तरीके से परीणामों की समीक्षा करेगा।

सवाल है कि स्थानीय निकायों की प्रमुख भूमिका क्या है और क्या जीते हुए उम्मीदवार अब जन आकांक्षाओं को पूरा करने में जी जान से जुटेंगे? देखने में तो ये आता है कि चुनाव जीतने के बाद ज्यादातर उम्मीदरवार उन कामों में ही रूचि लेते हैं, जिनमें उन्हें ठेकेदारों से अच्छा कमीशन मिल सके। चूंकि स्थानीय निकायों का काम सड़क, नाली, खड़जे, पार्क, रोशनी आदि की व्यवस्था करना होता है और इन मदों में आजकल केंद्र सरकार अच्छी आर्थिक मदद दे रही है, इसलिए छोटे-छोटे ठेकेदारों के लिए काफी काम निकलते रहते हैं। पर इस कमीशन खोरी की वजह से इन कार्यों की गुणवत्ता संदेहास्पद रहती है। इसीलिए उ.प्र. के ज्यादातर नगरों में आप सार्वजनिक सुविधाओं को भारी दुर्दशा में पाऐंगे। टूटी-फूटी सड़के, अवरूद्ध और उफनती नालियां, बिजली के खम्भों से लटकते तार, हर जगह कूड़े के अंबार और गंदे पानी के पोखर,उ.प्र. के नगरों के चेहरों पर बदनुमा दाग की तरह हर ओर दिखाई देते हैं। फिर वो चाहे प्रदेश की राजधानी लखनऊ हो या प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र बनारस या तीर्थराज प्रयाग हो और या राम और कृष्ण की भूमि अयोध्या व मथुरा। हर ओर आपको इन नगरों की ऐसी दयनीय दशा दिखाई देगी कि आप यहां आसानी से दोबारा आने की हिम्मत न करें।

नगरों की साफ सफाई के लिए एक कुशल ग्रहणी की मानसिकता चाहिए। एक की घर की दो बहुऐं अपने-अपने कमरों को अलग-अलग तरह से रखती हैं। एक का कमरा आपको 24 घंटे सजा-संवरा दिखेगा। जबकि दूसरी के कमरे में जहां-तहां कपड़े और सामान बिखरे मिलेगें। ठीक इसी तरह जिस वार्ड का प्रतिनिधि अपने वार्ड की साफ-सफाई और रख-रखाव को लेकर लगातार सक्रिय रहेगा, उसका वार्ड हमेशा चमकता रहेगा। जो निन्यानवे के फेर में रहेगा, उसका वार्ड दयनीय हालत में पड़ा रहेगाा। अब ये जिम्मेदारी मतदाताओं की भी है कि वो अपने पार्षद पर कड़ी निगाह रखे और उसे वह सब करने के लिए मजबूर करें, जिसके लिए उन्होंने वोट दिया था।

एक समस्या और आती है, वह है विकास के धन का दुरूपयोग। चूंकि अनुदान मिल गया है और पैसा खर्च करना है, चाहे उसकी जरूरत हो या न हो, तो ऐसे-ऐसे काम करवाये जाते, जिनमें सीधे जनता के धन की बरबादी होती है। इसलिए मैने हाल ही अपनी दो बैठकों में मुख्यमंत्री योगी जी से साफ कहा कि महाराज एक तो काम करवाने में भ्रष्टाचार होता ही है और दूसरा योजना बनाने में उससे बड़ा भ्रष्टाचार होता है। उदाहरण के तौर पर आपके वार्ड की सड़क अच्छी-खासी है। अचानक एक दिन आप देखते हैं कि उस कॉन्क्रीट की सड़क को ड्रिल मशीन से काट-काटकर उखाड़ा जा रहा है। फिर कुछ दिन बाद वहां रेत बिछाकर इंटरलॉकिंग के टाइल्स लगावाये जा रहे हैं। जिनको लगवाने का उद्देश्य केवल अनुदान को ठिकाने लगाना होता है। लगने के कुछ ही दिनों बाद ये टाइल्स जगह-जगह से उखड़ने लगते हैं। फिर कभी कोई उन्हें ठीक करने या उनका रखरखाव करने नहीं आता। इस तरह एक अच्छी खासी सड़क बदरंग हो जाती है। मतदाता तो अपनी रोजी-रोटी में मशगूल हो जाता है और प्रतिनिधि पैसे बनाने में। अगर उ.प्र. के नगरों की हालत को सुधारना है, तो इन जीते हुए प्रतिनिधियों, महापौरों और योगी सरकार को कमर कसनी होगी कि कुछ ऐसा करके दिखायें कि संसदीय चुनाव से पहले उ.प्र. के नगर बिना फिजूल खर्चे के दुल्हन की तरह सजे दिखे। हां इस काम में नागरिकों को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। तभी इन चुनावों की उपलब्धि सार्थक हो पायेगी।