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Monday, January 1, 2018

बरसाना में लठमार होली के सरकारी आयोजन से संत व ब्रजवासी चिंतित

अयोध्या में हाल में मनाई भव्य दीपावली की तर्ज पर योगी सरकार 60 करोड़ रुपया खर्च करके इस बार बरसाना की लठमार होली मनाने जा रही है। जिससे ब्रज के संत और भक्त समाज में काफी चिंता देखी जा रही है। ब्रज में माधुर्य भाव और ऐश्वर्य भाव से रसोपासना होती है। नंदगांव और बरसाने के बीच होली माधुर्य रस की उपासना का अंग है। जिसकी परंपरा 5000 वर्ष प्राचीन है। जिसकी बारीकी से जानकारी शायद उन लोगों को नहीं है, जिन्होंने योगी जी को बरसाना में भव्य होली आयोजन का सुझाव दिया। क्योंकि इस परंपरा में जो रस है, उसे स्थानीय गोस्वामी गण, उनके परिवार, संतगण व ब्रजवासी ही प्रस्तुत कर सकते हैं। बाहर से आने वाले व्यवसायी कलाकार नहीं। जैसी घोषणा हुई है।

इस रसोपासना के अंतर्गत होली एक महीने चलती है और हर दिन उसका स्वरूप और भाव भिन्न होता है। इसके साहित्य का गहरा सागर है। रंगीली होली उसका एक छोटा भाग है। जो पहले ही विश्व प्रसिद्ध है और इसे देखने दूर-दूर से भक्त और अंतराष्ट्रीय मीडिया हर वर्ष यहां आता है। पर इसके स्वरूप से कभी छेड़-छाड़ नहीं की गई। आज से 43 वर्ष पूर्व उ.प्र. के राज्यपाल डा. एम चेन्ना रेड्डी प्रतिवर्ष श्रद्धा से रंगीली होली देखने बरसाना आते थे। तब से सदा ही ऐसे विशिष्ट अतिथि यहां आते रहे हैं। पर जिस तरह का आयोजन इस वर्ष योगी सरकार करने जा रही है, उससे नंदगांव और बरसाना का संत, भक्त व गोस्वामी समाज ही नहीं बल्कि पूरा ब्रजमंडल बहुत चिंतित है।

रमणरेती, गोकुल, के संत काष्र्णि गुरूशरणानंद जी के शिष्य व ब्रज की संस्कृति पर कई दशकों से गहराई से शोध करने वाले, इसके संरक्षण के अंतिम स्तंभ, श्री मोहन स्वरूप भाटिया (मथुरा) का कहना है कि ‘‘इस आयोजन से बरसाना की होली की परंपरा को भारी ठेस  लगेगी और संतो, भक्तों और रसिकाचार्यों की उपेक्षा होगी। किराये के कलाकार और तमाशे बरसाने की होली का रंग-भंग कर देंगें। उ.प्र. सरकार को अगर ऐसा आयोजन करना ही है, तो लखनऊ या दिल्ली में करे। बरसाना की होली का विनाश न करे।’’

उधर पीली पोखर (बरसाना) पर रहने वाले बाबा महाराज भी इस घोषणा से व्यथित हैं। बाबा का कहना है कि, ’’इस पूरे आयोजन से बरसाना की होली का रस भंग हो जायेगा, जो माधुर्य उपासना की एक गहरी परंपरा का अंग है। इस आयोजन से संतों, गोस्वामीगणों, भक्तों और ब्रजवासियों का अपमान होगा और उनको भारी ठेस लगेगी।’’

बरसाना के क्रांतिकारी युवा पद्म फौजी का कहना है कि, ‘‘जितना रूपया इस आयोजन में खर्च किया जायेगा, उतने में तो पूरा बरसाना चमक सकता है, अगर संजीदगी से योजना बनाई जाए तो। पर वैसे नहीं जैसे अभी काम चल रहा है।’’ बरसाना के किसान भी इस आयोजन के विरूद्ध हैं और बार-बार प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं, पर उनकी सुनी नहीं जा रही। उनकी खड़ी फसल पर बुल्डोजर चल रहे हैं।

जब से यह समाचार प्रसारित हुआ है, पूरे ब्रजमंडल के अनेक लोगों ने इसका विरोध प्रगट किया और मुख्यमंत्री तक उनकी पीड़ा पहुंचाने का अनुरोध किया। जब ब्रजसेवा के हमारे प्रेरणा स्त्रोत बरसाना के विरक्त संत श्रद्धेय श्री रमेश बाबा से मैंने पूछा कि इस विषय में उनका क्या विचार है, तो वे बोले-
 "कबिरा तेरी झोपड़ी,
गल कटियन के पास।
जो करेगा सो भरेगा,
तू काहे होत उदास।।"

वैसे भी बाबा कहते हैं कि ब्रज में तो श्री कृष्ण भी ऐश्वर्य त्यागकर गवारिया बनकर रहे। उसी भाव से आना चाहिए। यहां तो हिंदुस्तान का बादशाह अकबर भी राजसी भेष त्यागकर स्वामी हरिदास जी के दर्शन करने आया था।

योगी जी ने सदियों से उपेक्षित अयोध्या में जिस उत्साह से दीपावली मनाई, उसकी प्रशंसा मैंने अपने पिछले लेख में की थी। पर ब्रज तो पहले ही विश्वभर में आकर्षण का केंद्र है और इसकी उपेक्षा अयोध्या की तरह नहीं हुई है। इसलिये ब्रज का भाव समझे बिना, ब्रज के विकास की बड़ी- बड़ी योजनाऐं बनवाना और ऐसे भव्य कार्यक्रम आयोजित करना, यहां की समृद्ध भक्ति परंपराओं का स्थाई विनाश करने से कम नहीं होगा।

अगर बरसाना की मौजूदा सकरी गलियों  में यह विशाल आयोजन किया जाता है, तो भीड़ में दुर्घटना की पूरी संभावना रहेगी। अगर आयोजन के लिए फरमान जारी कर रंगीली गली की तोड-फोड़ की जाती है, तो बरसाना का मौलिक स्वरूप नष्ट हो जायेगा। जिसे देखने दुनिया भर से भक्त यहाँ आते हैं। इसलिये ब्रजवासियो की योगी जी से प्रार्थना है कि होली का प्रस्तावित आयोजन बरसाना के किसी विशाल मैदान में  करें तो उनका उद्देश्य भी पूरा हो जायेगा और संतगणों, भक्तगणों व ब्रजवासियों की भावना भी आहत नहीं होगी।

चिंता की बात है कि जिन लोगों से योगी सरकार ब्रज विकास की योजनाऐं बनवा रही है, वे बिना ब्रज की संस्कृति और भावना को समझे, उत्साह के अतिरेक में, वह सब कर रहे हैं, जिससे ब्रज संस्कृति का संरक्षण नहीं होगा, विनाश ही होगा। इसके अनेक प्रमाण हैं। गोवर्धन परिक्रमा के लिए छह महीने पहले ऐसे ही हजारो-करोड़ रूपये के एक बड़े कुप्रयास के विरूद्ध समय रहते मैंने योगी जी को सावधान किया था। उस पर मेरा यहां लेख भी छपा था। आभारी हूं कि उन्होंने तुरंत  हमारी  चिंता पर ध्यान दिया और उसे वहीं रोक दिया। वरना जयपुर के एक स्थापित घोटालेबाज के हाथों गोवर्धन की परिक्रमा का विनाश हो जाता। आशा है वे अब भी हमारी विनम्र प्रार्थना पर गंभीरता से ध्यान देंगे और इस आयोजन से जुड़े निहित स्वार्थों के प्रभाव में आए बिना ब्रज की हजारों वर्ष प्राचीन संस्कृति का सम्मान करते हुए उचित निर्णय लेंगे।

Monday, December 25, 2017

मोदी जी उत्तर प्रदेश को संभालें

भाजपा के शिखर नेतृत्व के मन में गत तीन महीनों में यह प्रश्न कई बार आया होगा कि गुजरात के चुनाव में इतनी मश्शकत क्यों करनी पड़ी? विपक्ष ने गुजरात मॉडल को लेकर बार-बार पूछा कि इस चुनाव में इसकी बात क्यों नहीं हो रही? विपक्ष का व्यंग था कि जिस गुजरात मॉडल को मोदी जी ने पूरे देश में प्रचारित कर केंद्र की सत्ता हासिल की, उस मॉडल का गुजरात में ही जिक्र करने से भाजपा क्यों बचती रही? क्या उस मॉडल में कुछ खोट है? क्या उस मॉडल को जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया? क्या उस मॉडल का गुजरात की आम जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा? वजह जो भी रही हो भाजपा अध्यक्ष व प्रधानमंत्री को काफी पसीना बहाना पड़ा गुजरात का चुनाव जीतने के लिए। एक और फर्क ये था कि पहले चुनावों में मोदी जी के नाम पर ही वोट मिल जाया करते थे, लेकिन इस बार केंद्र के अनेक मंत्रियों, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, प्रांतों के मंत्रियों और पूरे देश के संघ के कार्यकर्ताओं को लगना पड़ा गुजरात की जनता को राजी करने के लिए, कि वे एक बार फिर भाजपा को सत्ता सौंप दें।
इन स्टार प्रचारकों में सबसे ज्यादा आकर्षक नाम रहा, उ.प्र. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का। जिनके केसरिया बाने और प्रखर संभाषणों ने गुजरात के लोगों को आकर्षित किया। अब चर्चा है कि भाजपा लोकसभा के चुनाव में योगी जी का भरपूर उपयोग करेगी। पर इस सब के बीच मेरी चिंता का विषय उ.प्र. का विकास है।

उ.प्र. में जो तरीका इस वक्त शासन का चल रहा है, उससे कुछ भी ऐसा नजर नहीं आ रहा कि बुनियादी बदलाव आया हो। लोग कहते है कि सुश्री मायावती के शासनकाल में नौकरशाही सबसे अनुशासित रही। अखिलेश यादव  को लोग एक सद्इच्छा रखने वाला ऊर्जावान युवा मानते हैं, जिन्होंने उ.प्र. के विकास के लिए बहुत योजनाऐं चालू की और कुछ को पूरा भी किया। लेकिन पारिवारिक अंतर्कलह और राजनीति पर परिवार के प्रभाव ने उन्हें काफी पीछे धकेल दिया। योगी जी का न तो कई परिवार है और न ही उन्हें आर्थिक असुरक्षा। एक बड़े सम्प्रदाय के महंत होने के नाते उनके पास वैभव की कमी नहीं है। इसलिए यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे अपना शासन पूरी ईमानदारी व निष्ठा से करेंगे। लेकिन केवल निष्ठा और ईमानदारी से लोगों की समस्याऐं हल नहीं होती। उसके लिए प्रशासनिक सूझ-बूझ, योग्य, पारदर्शी और सामथ्र्यवान लोगों की बड़ी टीम चाहिए। जिसे अलग-अलग क्षेत्रों का दायित्व सौंप सकें।

क्रियान्वन पर कड़ी नजर रखनी होती है। जनता से फीडबैक लेने का सीधा मैकेनिज्म होना चाहिए। जिनका आज उ.प्र. शासन में नितांत अभाव है। श्री नरेन्द्र मोदी और श्री अमित शाह को उ.प्र. के विकास पर अभी से ध्यान देना होगा। केवल रैलियां, नारे व आक्रामक प्रचार शैली से चुनाव तो जीता जा सकता है, लेकिन दिल नहीं। उ.प्र. की जनता का यदि दिल जीतना है, तो समस्याओं की जड़ में जाना होगा। लोग किसी भी सरकार से बहुत अपेक्षा नहीं रखते। वे चाहते हैं कि बिजली, सड़के, कानून व्यवस्था ठीक रहे, पेयजल की आपूर्ति हो, सफाई ठीक रहे और लोगों को व्यापार करने करने की छूट हो । किसानों को सिंचाई के लिए जल और फसल का  वाजिव दाम मिले, तो प्रदेश संभल जाता है।

इतना बड़ा सरकारी अमला, छोटे-छोटे अधिकारी के पास गाड़ी, मकान, तन्ख्वाह व पेंशन। फिर भी  रिश्वत का मोह नहीं छूटता। आज कौन सा महकमा है उ.प्र. में जहां काम कराने में नीचे से ऊपर रिश्वत या कमीशन नही चल रहा? और कब नहीं चला? यदि पहले भी चला और आज भी चल रहा है, तो फिर योगी जी के आने का क्या अंतर पड़ा? मोदी जी की इस बात का क्या प्रभाव पड़ा कि ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा’?  मैं बार बार अपने लेखों के माध्यम से कहता आया हूं कि दो तरह का भ्रष्टाचार होता है। एक क्रियान्वन का और दूसरा योजना का। क्रियान्वन का भ्रष्टाचार व्यापक है, कोई भी इंजीनियरिंग विभाग ऐसा नहीं है, जो बिना कमीशन के काम करवाये या बिल पास करे। लेकिन इससे बड़ा भ्रष्टाचार यह होता है कि योजना बनाने में ही आप एक ऐसा खेल खेल जाऐं कि जनता को पता ही न चले और सैंकड़ों करोड़ के वारे-न्यारे हो जाऐं।

मुझे तकलीफ के साथ मोदी जी, योगी जी और अमित शाह जी को कहना है कि  आज उ.प्र. में सीमित साधनों के बीच जो कुछ भी योजनाऐ बन रही है, उनमें पारदर्शिता, सार्थकता और उपयोगिता का नितांत अभाव है। कारण स्पष्ट है कि योजना बनाने वाले वही लोग हैं, जो पिछले 70 साल से योजना बनाने के लिए ही योजना बनाते आऐ हैं। केवल मोटी फीस लेने के लिए योजनाऐं बनाते हैं। बात बार-बार हुई कि जमीन से विकास की परिकल्पना आऐ।  लोगों की भागीदारी हो। गांव और ब्लॉक स्तर पर समझ विकसित की जाए। योजना आयोग का भी नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया गया। लेकिन इसका असर लोगों को जमीन पर नहीं दिखाई दे रहा। फिर भी देश की जनता यह मानती है कि साम्प्रायिकता, पाकिस्तान, चीन और कई ऐसे बड़े सवाल हैं, जिन पर निर्णय लेने के लिए एक सशक्त नेतृत्व की जरूरत है और वो नेतृत्व नरेन्द्र मोदी दे रहे हैं। उन्होंने अपनी छवि भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी बनाई है, जहां इंदिरा गांधी के बाद उन्हीं को सबसे ज्यादा सुना और समझा जा रहा है। परिणाम अभी आने बाकी है। फिर भी उ.प्र. के स्तर पर यदि ठोस काम करना है, तो समस्याओं के हल करने की नीति और योजनाओं को भी ठोस धरातल से जुड़ा होना होगा।

समस्याओं के हल उन लोगों के पास है, जिन्होंने उन समस्याओं को ईमानदारी से हल करने की कोशिश की है। कोशिश ही नहीं की, बिना सरकारी मदद के सफल होकर दिखाया है। क्या कोई भी प्रांत या कोई भी सरकार ऐसे लोगों को बुला कर उनको सुनने को तैयार है ? अगर नही तो फिर वही रहेंगे  ‘ढाक के तीन पात’। उ.प्र. में आने वाला लोकसभा चुनाव तो मोदी जी जीत जाऐंगे। लेकिन उसके लिए गुजरात से कहीं ज्यादा मश्शकत करनी पड़ेगी। अगर अभी से स्थितयां सुधरने लगे, त्वरित परिणाम दिखने लगे तो जनता भी साथ होगी और काम भी साथ होगा। फिर बिना किसी बड़े संघर्ष से वांछित फल प्राप्त किया जा सकता है।

Monday, December 4, 2017

उ. प्र. के निकायों के चुनाव से संदेश

उ.प्र. के नगर निकायों के चुनावों के नतीजे आ गये हैं। लोकतंत्र की ये विशेषता है कि नेता को हर पाँच साल में मतदाता की परीक्षा में खरा उतरना होता है। ऐसा कम ही होता है कि एक व्यक्ति लगातार दो या उससे ज्यादा बार उसी क्षेत्र से चुनाव जीते। अगर ऐसा होता है, तो स्पष्ट है कि उस व्यक्ति ने अपने क्षेत्र में काम किया है और उसकी लोकप्रियता बनी हुई है। अलबत्ता अगर कोई माफिया हो और वो अपने बाहुबल के जोर से चुनाव जीतता हो, तो दूसरी बात है।

उ.प्र. के अधिकतर महापौर भाजपा के टिकट पर जीते हैं। इसके दो कारण है। एक तो केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार होने के नाते मतदाता को ये उम्मीद है कि अगर जिले से केंद्र तक एक ही दल की सत्ता होगी, तो विकास कार्य तेजी से होंगे और साधनों की कमी नहीं आयेगी। दूसरा कारण यह है कि योगी सरकार को बने अभी 6 महीने ही हुए हैं। उ.प्र. के मतदाताओं को अपेक्षा है कि सरकार व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन करेगी। इसलिए उसको इतना भारी समर्थन मिला है।

पर साथ ही जिन सीटों पर कार्यकर्ताओं की छवि और क्षमता को दरकिनार कर किन्हीं अन्य कारणों से सिफारशी उम्मीदवारों को टिकट मिले, वहां उनकी पराजय हुई है। ये चुनावी गणित का एक पेचीदा सवाल होता। दल के नेता का लक्ष्य होता है कि किसी भी तरह चुनाव जीता जाए। इसीलिए अक्सर ऐसे उम्मीदवारों को भी टिकट दे दिये जाते हैं, जिन्हें बाहरी या ऊपर से थोपा हुआ मानकर, कार्यकर्ता गुपचुप असहयोग करते हैं। जबकि इन्हें टिकट इस उम्मीद में दिया जाता है कि वे जीत सुनिश्चित करेंगे। नैतिकता का तकाजा है कि जिसने दल के सामान्य कार्यकर्ता बनकर, लंबे समय तक, समाज और दल के हित में कार्य किया हो, जिसकी छवि साफ हो और जिसमें नेतृत्व की क्षमता हो, उसे ही टिकट दिया जाए। पर अक्सर ऐसा नहीं होता और इससे कार्यकर्ताओं में हताशा फैलती है और वे बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़े होकर, कड़ी चुनौती देते हैं। जो भी हो अब तो चुनाव हो गये। हर दल अपने तरीके से परीणामों की समीक्षा करेगा।

सवाल है कि स्थानीय निकायों की प्रमुख भूमिका क्या है और क्या जीते हुए उम्मीदवार अब जन आकांक्षाओं को पूरा करने में जी जान से जुटेंगे? देखने में तो ये आता है कि चुनाव जीतने के बाद ज्यादातर उम्मीदरवार उन कामों में ही रूचि लेते हैं, जिनमें उन्हें ठेकेदारों से अच्छा कमीशन मिल सके। चूंकि स्थानीय निकायों का काम सड़क, नाली, खड़जे, पार्क, रोशनी आदि की व्यवस्था करना होता है और इन मदों में आजकल केंद्र सरकार अच्छी आर्थिक मदद दे रही है, इसलिए छोटे-छोटे ठेकेदारों के लिए काफी काम निकलते रहते हैं। पर इस कमीशन खोरी की वजह से इन कार्यों की गुणवत्ता संदेहास्पद रहती है। इसीलिए उ.प्र. के ज्यादातर नगरों में आप सार्वजनिक सुविधाओं को भारी दुर्दशा में पाऐंगे। टूटी-फूटी सड़के, अवरूद्ध और उफनती नालियां, बिजली के खम्भों से लटकते तार, हर जगह कूड़े के अंबार और गंदे पानी के पोखर,उ.प्र. के नगरों के चेहरों पर बदनुमा दाग की तरह हर ओर दिखाई देते हैं। फिर वो चाहे प्रदेश की राजधानी लखनऊ हो या प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र बनारस या तीर्थराज प्रयाग हो और या राम और कृष्ण की भूमि अयोध्या व मथुरा। हर ओर आपको इन नगरों की ऐसी दयनीय दशा दिखाई देगी कि आप यहां आसानी से दोबारा आने की हिम्मत न करें।

नगरों की साफ सफाई के लिए एक कुशल ग्रहणी की मानसिकता चाहिए। एक की घर की दो बहुऐं अपने-अपने कमरों को अलग-अलग तरह से रखती हैं। एक का कमरा आपको 24 घंटे सजा-संवरा दिखेगा। जबकि दूसरी के कमरे में जहां-तहां कपड़े और सामान बिखरे मिलेगें। ठीक इसी तरह जिस वार्ड का प्रतिनिधि अपने वार्ड की साफ-सफाई और रख-रखाव को लेकर लगातार सक्रिय रहेगा, उसका वार्ड हमेशा चमकता रहेगा। जो निन्यानवे के फेर में रहेगा, उसका वार्ड दयनीय हालत में पड़ा रहेगाा। अब ये जिम्मेदारी मतदाताओं की भी है कि वो अपने पार्षद पर कड़ी निगाह रखे और उसे वह सब करने के लिए मजबूर करें, जिसके लिए उन्होंने वोट दिया था।

एक समस्या और आती है, वह है विकास के धन का दुरूपयोग। चूंकि अनुदान मिल गया है और पैसा खर्च करना है, चाहे उसकी जरूरत हो या न हो, तो ऐसे-ऐसे काम करवाये जाते, जिनमें सीधे जनता के धन की बरबादी होती है। इसलिए मैने हाल ही अपनी दो बैठकों में मुख्यमंत्री योगी जी से साफ कहा कि महाराज एक तो काम करवाने में भ्रष्टाचार होता ही है और दूसरा योजना बनाने में उससे बड़ा भ्रष्टाचार होता है। उदाहरण के तौर पर आपके वार्ड की सड़क अच्छी-खासी है। अचानक एक दिन आप देखते हैं कि उस कॉन्क्रीट की सड़क को ड्रिल मशीन से काट-काटकर उखाड़ा जा रहा है। फिर कुछ दिन बाद वहां रेत बिछाकर इंटरलॉकिंग के टाइल्स लगावाये जा रहे हैं। जिनको लगवाने का उद्देश्य केवल अनुदान को ठिकाने लगाना होता है। लगने के कुछ ही दिनों बाद ये टाइल्स जगह-जगह से उखड़ने लगते हैं। फिर कभी कोई उन्हें ठीक करने या उनका रखरखाव करने नहीं आता। इस तरह एक अच्छी खासी सड़क बदरंग हो जाती है। मतदाता तो अपनी रोजी-रोटी में मशगूल हो जाता है और प्रतिनिधि पैसे बनाने में। अगर उ.प्र. के नगरों की हालत को सुधारना है, तो इन जीते हुए प्रतिनिधियों, महापौरों और योगी सरकार को कमर कसनी होगी कि कुछ ऐसा करके दिखायें कि संसदीय चुनाव से पहले उ.प्र. के नगर बिना फिजूल खर्चे के दुल्हन की तरह सजे दिखे। हां इस काम में नागरिकों को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। तभी इन चुनावों की उपलब्धि सार्थक हो पायेगी।

Monday, October 23, 2017

अयोध्या में दीपावली: प्रतीकों का भी महत्व होता है

उ.प्र. के मुख्यमंत्री  आदित्यनाथ योगी ने इस बार अयोध्या में भव्य दीपावली का आयोजन किया। पुष्पक विमान के प्रतीक रूप हैलीकाप्टर से, जब भगवान श्रीराम,सीता व लक्षमण जी सरयू के घाट पर उतरे तो, पूरा अयोध्या उल्लासमय हो गया। लाखों दीपों से सरयू के घाट को सजाया गया। हजारों वर्ष बाद अयोध्यावासियों को वही अनुभूति हुई जो त्रेता युग में हुई होगी। इसके साथ ही अयोध्या के सौंदर्यीकरण के लिए योगी जी ने अनेक घोषणाऐं की।

भाजपा के राजनैतिक आलोचक कहते हैं कि जब से भाजपा सरकार आई है, तब से प्रधानमंत्री मोदी और उनके मुख्यमंत्री हिंदू धर्म को अनावश्यक रूप से महत्व देकर, अपना वोट बैंक पक्का कर रहे हैं। हो सकता है कि उनकी इस बात में तथ्य हो। पर प्रश्न उठता है कि क्या इस तरह के भव्य आयोजन पूर्व सरकारें नहीं करती थीं? राजीव गांधी के समय में कई देशों में जाकर भारत के जो उत्सव किये गये, जिसमें करोड़ों रूपया खर्च किया गया, उनका उद्देश्य था भारतीय संस्कृति से विश्व का परिचय कराना, उसमें कुछ गलत नहीं था।

जो लोग योगी जी की निंदा कर रहे हैं क्या उन्होंने पिछले 70 वर्षों में इस बात की निंदा की कि हमारी धर्मनिरपेक्ष सरकारों में रमजान के महीने में रोज क्यों प्रधानमंत्री, राज्यपाल व मुख्यमंत्रियों के यहां इफ्तार दावत होती थी ? उनका जवाब होगा कि शासक को समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करना होता है। तो फिर नवरात्रि पर व्रत के भोज क्यों नहीं अयोजित किये गए ?

पिछले लगभग 1500 वर्ष का इतिहास है कि  हिंदू धर्म के जो प्रतीक थे उनका या तो उपहास किया गया या उन्हें दबाया गया या उनको सह लिया गया। पर प्रोत्साहित नहीं किया गया। कारण स्पष्ट है कि अगर शासक विधर्मी या नास्तिक  होंगे तो उन्हें हिंदू धर्म व संस्कृति में, उसकी आस्थाओं में और  पर्वों में क्यों रूचि होगी ? अब जब पहली बार ऐसी स्थिति बनी है कि केंद्र में पूर्णं बहुमत से और अनेक राज्यों में हिंदू मानसिकता की सरकार हैं, तो अगर हर्षोंल्लास से हिंदू पर्व मनाए जा रहे है, तो इसमें किसी को क्यों तकलीफ होनी चाहिए ?

जिस समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय का अयोध्या पर निर्णय आ रहा था, तो एक टीवी चैनल पर लाइव चर्चा पर मैं भी बैठा हुआ टिप्पणी कर रहा था। उसके तुरंत बाद मैं सीधा अडवाणी जी के घर गया, तभी वहां वैंकेया नायडू, नजमा हैप्दुल्लाह, राजनाथ सिंह व अरूण जेटली भी आ गए। वहां चर्चा चली कि अब राम जन्मभूमि को लेकर आगे क्या किया जाए। सबके अलग-अलग विचार थे। चूंकि ये भाजपा  का राजनैतिक मामला था, इसलिए मैं कुछ देर ही बैठा और उन सबके साथ जलपान कर वहां से निकल लिया। लेकिन एक बात मैंने जरूर उन सबके सामने रखी और वो ये कि पिछले 20 वर्षों से या यूं कहिए जब से राम जन्मभूमि आंदोलन चला में अटल जी, आडवाणी जी और मुरली मनोहर जोशी जी से लगातार कहता रहता था कि मंदिर जब बनेगा बन जायेगा, तब तक अयोध्या का तो कायाकल्प कर लिया जाय। अगर ऐसा किया गया होता तो आज टीवी चैनलों पर अयोध्या की दुर्दशा दिखाकर भाजपा का उपहास नहीं हो रहा होता। जो उस दिन टीवी चैनलों पर जम कर किया गया।

उल्लेखनीय है कि अपनी कालचक्र विडियो पत्रिका में 1990 में राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के कारसेवकों पर हुई बर्बर हिंसा पर मैने बहुत हृदयविदारक प्रभावशाली टीवी रिर्पोट तैयार की थी। उस वक्त देश में कोई प्राइवेट टीवी चैनल नहीं थे, तो अपने किस्म की ये अकेली रिर्पोट दी जिसे भाजपा ने पूरे देश मे खूब दिखाया। तभी से मैं अयोध्या में सरयू के घाटों, वहां के कुंडों- सरोवरों, जीर्ण-शीर्ण पड़े भवनो पर काम किया जाना चाहिए ऐसा भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से लगातार कहता रहा। विनम्रता से कहना चाहूंगा कि बिना सरकारी पैसे के, पिछले 15 वर्षों में जिस निष्ठा से हमारी ब्रज फाउंडेशन ने ब्रज का अध्ययन करने में, ब्रज के सम्पूर्ण विकास का माडल तैयार करने में और भगवान कृष्ण की दर्जनों लीलास्थलीओ का कलात्मक जीर्णोद्धार करने में जो निपुणता हासिल की है, उसकी आज सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। जहां चाह, वहां राह। फिर अयोध्या ही क्यों, काशी हो, जगन्नाथपुरी हो या भारत का कोई भी अन्य तीर्थ स्थल हो, सबका कायाकल्प हो सकता है। बशर्ते हमारे अनुभवों का लाभ लिया जाय और करोड़ो रूपये की मोटी फीस ऐंठने वाले हाई-फाई प्रोफेशनल्स से बचा जाय। जिनके ब्रज में कई घोटाले हम पहले ही उजागर कर चुके हैं।

ऐसा नहीं हैं कि पिछली सरकारें चाहें वह कांग्रेस की हों या समाजवादी या बसपा की हों या किसी अन्य दल की हों, उन्होंने प्रतीको का सहारा लेकर विभिन्न धर्मों को संतुष्ठ करने का प्रयास नहीं किया, जरूर किया। सोमनाथ, तिरूपति बालाजी और वैष्णो देवी का विकास कांग्रेस के शासनकाल में हुआ और बहुत अच्छा हुआ। ऐसे दूसरे बहुत से कार्य अन्य दलों द्वारा भी हुए, जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन जिस भक्ति भावना से या जिस ऐलानियत से यह कार्य किये जाने चाहिए थे, वे नहीं हुए।आज जब इस हो रहा है, तो उसकी निंदा न करें, उनका आंनंद ले, उनका रस लें। हाँ अगर इनसे पर्यावरण का या समाज का कोई अहित हो रहा हो तो उस पर टिप्पणी करने में कोई संकोच न किया जाय। मैं समझता हूं कि योगी जी ने अयोध्या में जो कुछ भी किया, उससे पूरे विश्व में हिंदू समाज को बहुत सुखद अनुभूति हुई है। जिसके लिए वे और उनकी सरकार बधाई के पात्र हैं।

Monday, July 10, 2017

योगी आदित्यनाथ जी हकीकत देखिए !

ऑडियो विज्युअल मीडिया ऐसा खिलाड़ी है कि डिटर्जेंट जैसे प्रकृति के दुश्मन जहर को ‘दूध सी सफेदी’ का लालच दिखाकर और शीतल पेय ‘कोला’ जैसे जहर को अमृत बताकर घर-घर बेचता है, पर इनसे सेहत पर पड़ने वाले नुकसान की बात तक नही करता । यही हाल सत्तानशीं होने वाले पीएम या सीएम का भी होता है । उनके इर्द-गिर्द का कॉकस हमेशा ही उन्हें इस तरह जकड़ लेता है कि उन्हें जमीनी हकीकत तब तक पता नहीं चलती, जब तक वो गद्दी से उतर नहीं जाते ।


टीवी चैनलों पर साक्षात्कार, रोज नयी-नयी योजनाओं के उद्घाटन समारोह, भारतीय सनातन पंरपरा के विरूद्ध महंगे-महंगे फूलों के बुके, जो क्षण भर में फेंक दिये जाते हैं, फोटोग्राफरों की फ्लैश लाईट्स की चमक-धमक में योगी आदित्यानाथ जैसा संत और निष्काम राजनेता भी शायद दिग्भ्रमित हो जाता है और इन फ़िज़ूल के कामों में उनका समय बर्बाद हो जाता है । फिर उन्हें अपने आस-पास, लखनऊ के चारबाग स्टेशन के चारों तरफ फैला नारकीय साम्राज्य तक दिखाई नहीं देता, तो फिर प्रदेश में दूर तक नजर कैसे जाएगी? जबकि प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का शोर हर तरफ इतना बढ़-चढ़कर मचाया जा रहा है ।

35 वर्ष केंद्रीय सत्ता की राजनीति को इतने निकट से देखा है और देश की राजनीति में अपनी निडर पत्रकारिता से ऐतिहासिक उपस्थिति भी कई बार दर्ज करवाई है । इसलिए यह सब असमान्य नहीं लगता । पर चिंता ये देखकर होती है कि देश में मोदी जैसे सशक्त नेता और उ.प्र. में योगी जैसे संत नेता को भी किस तरह जमीनी हकीकत से रूबरू नहीं होने दिया जाता ।

हाँ अगर कोई ईमानदार नेता सच्चाई जानना चाहे तो इस मकड़जाल को तोड़ने का एक ही तरीका हैं, जिसे पूरे भारत के सम्राट रहे देवानामप्रियदस्सी मगध सम्राट अशोक मौर्य ने अपने आचरण से स्थापित किया था । सही लोगों को ढू़ंढ-ढू़ंढकर उनसे अकेले सीधा संवाद करना और मदारी के भेष में कभी-कभी घूमकर आम जनता की राय जानना ।

देश के विभिन्न राज्यों में छपने वाले मेरे इस कॉलम के पाठकों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले, मैंने प्रधानमंत्री जी से गोवर्धन पर्वत को बचाने की अपील की थी । मामला यह था कि एक ऐसा हाई-फाई सलाहकार, जिसके खिलाफ सीबीबाई और ई.डी. के सैकड़ों करोड़ों रूपये के घोटाले के अनेक आपराधिक मामले चल रहे हैं, वह बड़ी शान शौकत से ‘रैड कारपेट’ स्वागत के साथ, योगी महाराज और उनकी केबिनेट को गोवर्धन के विकास के साढ़े चार हजार करोड़ रूपये के सपने दिखाकर, टोपी पहना रहा था । मुझसे यह देखा नहीं गया, तो मैंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा, लेख लिखे और उ.प्र. के मीडिया में शोर मचाया । प्रधान मंत्री और मुख्य मंत्री ने लगता है उसे गम्भीरता से लिया । नतीजतन उसे लखनऊ से अपनी दुकान समेटनी पड़ी । वरना क्या पता गोवर्धन महाराज की तलहटी की क्या दुर्दशा होती ।

इसी तरह पिछले कई वर्षों से विश्व बैंक बड़ी-बड़ी घोषाणाऐं ब्रज के लिए कर रहा था । हाई-फाई सलाहकारों से उसके लिए परियोजनाऐं बनवाई गईं, जो झूठे आंकड़ों और अनावश्यक खर्चों से भरी हुई थी । भला हो उ.प्र. पर्यटन मंत्री रीता बहुगुणा और प्रमुख सचिव पर्यटन अवनीश अवस्थी का, कि उन्होंने हमारी शिकायत को गंभीरता से लिया और फौरन इन परियोजनाओं का ठेका रोककर  हमसे उनकी गलती सुधारने को कहा । इस तरह 70 करोड़ की योजनाओं को घटाकर हम 35 करोड़ पर ले आये । इससे निहित स्वार्थों में खलबली मच गई और हमारे मेधावी युवा साथी को अपमानित व  हतोत्साहित करने का प्रयास किया गया । संत और भगवतकृपा से वह षड्यंत्र असफल रहा, पर उसकी गर्माहट अभी भी अनुभव की जा रही है।

हमने तो देश में कई बड़े-बड़े युद्ध लड़े है । एक युद्ध में तो देश का सारा मीडिया, विधायिका, कानूनविद् सबके सब सांस रोके, एक तरफ खड़े होकर तमाशा देख रहे थे, जब सं 2000 में मैंने अकेले भारत के मुख्य न्यायाधीश के 6 जमीन घोटाले उजागर किये । मुझे हर तरह से प्रताड़ित करने की कोशिश की गई। पर कृष्णकृपा मैं से टूटा नहीं और यूरोप और अमेरिका जाकर उनके टीवी चैनलों पर शोर मचा दिया । इस लड़ाई में भी नैतिक विजय मिली ।

मेरा मानना है कि, यदि आपको अपने धन, मान-सम्मान और जीवन को खोने की चिंता न हो और आपका आधार नैतिक हो तो आप सबसे ताकतवर आदमी से भी युद्ध लड़ सकते हैं। पर पिछले 15 वर्षों में मै कुरूक्षेत्र का भाव छोड़कर श्रीराधा-कृष्ण के प्रेम के माधुर्य भाव में जी रहा हूं और इसी भाव में डूबा रहना चाहता हूँ। ब्रज विकास के नाम पर अखबारों में बड़े-बड़े बयान वर्षों से छपते आ रहे हैं। पर धरातल पर क्या बदलाव आता है, इसकी जानकारी हर ब्रजवासी और ब्रज आने वालों को है। फिर भी हम मौन रहते हैं।

लेकिन जब भगवान की लीलास्थलियों को सजाने के नाम पर उनके विनाश की कार्ययोजनाऐं बनाई जाती हैं, तो हमसे चुप नहीं रहा जाता । हमें बोलना पड़ता है । पिछली सरकार में जब पर्यटन विभाग ने मथुरा के 30 कुण्ड बर्बाद कर दिए तब भी हमने शोर मचाया था । जो कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगता । पर ऐसी सरकारों के रहते, जिनका ऐजेंडा ही सनातन धर्म की सेवा करना है, अगर लीलास्थलियों पर खतरा आऐ, तो चिंता होना स्वभाविक है ।
आश्चर्य तो तब होता है, जब तखत पर सोने वाले विरक्त योगी आदित्यनाथ जैसे मुख्यमंत्री को घोटालेबाजों की प्रस्तुति तो ‘रैड कारपेट’ स्वागत करवा कर दिखा दी जाती हो, पर जमीन पर निष्काम ठोस कार्य करने वालों की सही और सार्थक बात सुनने से भी उन्हें बचाया जा रहा हो । तो स्वभाविक प्रश्न उठता है कि इसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाए, उन्हें जो ऐसी दुर्मति सलाह देते हैं या उन्हें, जो अपने मकड़जाल तोड़कर मगध के सम्राट अशोक की तरह सच्चाई जानने की उत्कंठा नहीं दिखाते?

Monday, July 3, 2017

नौकरशाही की बदलती भूमिका

पिछले दिनों उ.प्र. में एक अजीब वाकया हुआ। एक युवा महिला आईएएस अधिकारी ने, जो कि मुख्य विकास अधिकारी के पद पर तैनात है, एक संस्कारवान युवा को अकारण 4 घंटे के लिए अवैध रूप से अपमानित करके थाने में बिठवाया और जब थाने ने बाइज्जत उस युवा को जाने दिया, तो इस महिला अधिकारी ने एक झूठी एफआईआर लिखवाकर मीडिया में बयान दिये कि इस युवा ने उसको धमकाया, उस पर चीखा चिल्लाया, उसे आक्रामक अंगुली दिखाई और सरकारी काम में बाधा पैदा की।

अगले दिन जब अखबारों से उस युवा को यह पता चला कि उसके खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज हो गयी है। तो उसने सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम का ब्यौरा लिखकर उसी जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को ईमेल से अपनी काउंटर एफआईआर भेजी। जिसका एक मुख्य बिंदु यह भी था कि उस अधिकारी के कमरे में उस सुबह के 11 बजे उस वक्त सामान्य वीडियो रिकॉडिंग चल रही थी। युवक ने मांग की पुलिस इस विडियो रिकॉर्डिंग को अपने कब्जे में ले ले, तो दूध का दूध और पानी का पानी समाने आ जायेगा। इस पर वह महिला अधिकारी समझौते की मुद्रा में आ गयी और जिलाधिकारी की पहल पर दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौता हो गया। हालांकि इस प्रक्रिया में उस युवक और उसकी प्रतिष्ठित संस्था को मीडिया में बदनाम करने का असफल प्रयास किया गया, जो तथ्यों के अभाव में टिक नहीं पाया।

उल्लेखनीय है कि वह युवा आईआईटी से बीटैक, एम टैक कम्प्यूटर सांइस से करके, सामाजसेवा के कार्यों में लगा है। उसकी पत्नी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (दिल्ली) से पढ़कर डॉक्टर हैं। उस युवा के श्वसुर 1978 बैच के आईएएस अधिकारी रहे हैं। जिस संस्था के लिए वह युवा कार्य करता है, वह एक अति प्रतिष्ठित संस्था है। जिसकी उपलब्धियों की प्रशंसा स्वयं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री करते हैं। जो भारत सरकार और उ.प्र. सरकार की सलाहकार है। जिसने अपने क्षेत्र में बिना सरकारी व विदेशी आर्थिक मदद के विकास के बड़े-बड़े काम किये हैं।

मुझे जब इस घटना की जानकारी मिली, तो मैंने दोनों पक्षों के बयानों को, अपने हजारों अंतर्राष्ट्रीय सम्पर्कों को भेज दिया, यह मूल्यांकन करने के लिए कि वे तय करें कि कौन सही है और कौन गलत। चूंकि उस महिला अधिकारी के आरोपों का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है और पुलिस के बार-बार मांगने पर वह अपने कमरे की वीडियो रिकॉर्डिंग देने को तैयार नहीं है। इसी से सिद्ध हो जाता है कि उसने द्वेष की भावना से यह अपराध किया। वैसे भी उसके आचरण की प्रसिद्धि यही है कि वह महिला अपने 5 साल की नौकरी में हर पोस्टिंग पर इसी तरह के नाहक विवाद खड़ी करती रही है और बार-बार उसके तबादले होते रहे हैं।

यहां रोचक बिंदु यह है कि जहां देशभर के 300 से ज्यादा आईएएस अधिकारियों ने इस महिला के अहमकपन की भत्र्सना की, वहीं उ.प्र. के आईएएस अधिकारियों में से कुछ ने अपने व्हाट्एप्प ग्रुप में यह बात उठाई कि इस तरह तो कोई भी युवक हमें धमका कर चला जायेगा। इसलिए हमें एकजुट होकर अपनी साथी महिला का साथ देना चाहिए। पर उस महिला के दुव्र्यवहार की ख्याति पूरे प्रदेश में फैल चुकी है, इसलिए इस प्रस्ताव पर उ.प्र. के आईएएस अधिकारी सहमत नहीं हुए और मामला ठंडा पड़ गया।

चिंता का विषय यह है कि क्या कोई भी आईएएस अधिकारी ऐसे झूठे आरोप लगाकर, ऐसी पृष्ठभूमि के मेधावी युवक को 4 घंटे तक अवैध रूप से थाने में बिठा सकता है? क्या वे बिना सबूत के किसी भी नागरिक पर सरकारी काम में बाधा पहुंचाने का झूठा आरोप लगा सकते हैं? क्या वे खुद ही शुरू करवाई गई, पुलिस की जांच में सहयोग न करके वीडियो रिकाॅर्डिग जैसे प्रमाण दबा सकते हैं ? क्या ऐसा दुराचरण करने वाली महिला आईएएस अधिकारी के आचरण की बिना जांच किये, उसके साथी, उसकी रक्षा में खड़े होकर नैतिकता का परिचय दे रहे थे? अगर इन प्रश्नों के उत्तर ‘नहीं’ में हैं, तो ऐसे अधिकारी के खिलाफ क्या प्रशासनिक कदम उठाये जा सकते है, जो वह ऐसा अपराध दोबारा न करे?

मुख्य विकास अधिकारी का काम कानून व्यवस्था बनाना नहीं, बल्कि क्षेत्र का विकास करना होता है। मुख्य विकास अधिकारियों के कार्यालयों में प्रायः हर प्रोजेक्ट में, हर स्तर पर जो कमीशन खाया जाता है, उसकी जानकारी प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर जिले के छुटभैये ठेकेदार तक को होती है। उसके बाद भी ऐसी सीनाजोरी?

विकास का कार्य कोई सरकार अकेले नहीं कर सकती। इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं और निजी क्षेत्र की भागीदारी जरूरी होती है। पर इस रवैये से तो विकास नहीं किया जा सकता। आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार सवा सौ से ज्यादा उच्च अधिकारियों को कामचोरी के आरोप में जबरन सेवानिवृत्त कर चुकी है और बाकी का मूल्यांकन जारी है, तो क्या ये जरूरी नहीं होगा कि भारत सरकार का कार्मिकी विभाग इस हादसे की पूरी निष्पक्षता से जांच या अध्ययन करवाये और इसे आईएएस की ट्रेनिंग में एक केस स्टडी की तरह पढ़ाया जाए? नागरिकों के अधिकारों का हनन कर, समाज की निष्काम सेवा करने वालों को अपमानित कर और दलालो व रिवश्वत देने वालों को महत्व देकर कोई भी सरकार विकास नहीं करवा सकती। योगी जी को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए, जिससे उनकी प्रजा के साथ ऐसी बदसलूकी करने की कोई हिम्मत न करे। आईएएस अधिकारियों को भी आत्म विश्लेषण करना चाहिए की ऐसी परिस्थिति में वे सच का साथ देंगे या झूठ का?

Monday, June 19, 2017

गोवर्धन का विनाश रोकें मोदी जी


जनवरी 2006 में हैदराबाद के ‘प्रवासी दिवस’ कार्यक्रम में विदेशी प्रतिनिधियों के सामने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी से मेरा रोचक सामना हुआ। मोदी जी गुजरात को भ्रष्टाचार मुक्त करने की बात कर रहे थे, तभी मेरे साथ बैठे मेरे मित्र चंदू पटेल, जो पहले भारतीय हैं, जिन्होंने हिल्टन होटल, लास ऐंजेलस, खरीदा था, खड़े हो गये और बोले, ‘‘नरेन्द्र भाई! आपसे विनीत भाई नारायण खुश नहीं हैं’’। मोदी जी एक क्षण को ठिठक गये। तभी चंदू भाई ने बात पूरी की, ‘‘क्योंकि उन्हें आपके राज्य में कोई घोटाला नहीं मिल रहा‘‘। इस पर मोदी जी और सारा हाल ठहाकों में गूंज गया। इससे पहले मेरा मोदी जी से कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं था।



मुझे आश्चर्य हुआ कि मोदी जी ने तुरंत मेरे बारे में गुजराती में बोलना शुरू कर दिया। वे बोले,‘‘ विनीत भाई नारायण भारत के बड़े पत्रकार हैं। उन्हें भ्रष्टाचार की जड़ में छाछ डालने में मजा आता है। मेरा उन्हें निमंत्रण है कि वे गुजरात आकर मेरे घोटाले खोजें’’।



इस पर मैं खड़ा हो गया और बोला,‘‘ मैं ही विनीत नारायण हूं, पर अब मैं घोटाले नहीं खोजता। अब तो मैं भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीला भूमि ब्रज को सजाने में जुटा हूं। हमारे ठाकुर जी ब्रज छोड़कर आपकी द्वारिका में जा बसे थे। इसलिए आप सब ‘जय श्रीकृष्ण’ बोलते हैं। पुराने जमाने में अनेक राजे-महाराजे ब्रज में आकर कुंड, घाट, वन बनवाते थे। आप आज गुजरात के राजा हो। कहावत है- दुनियां के गुरू सन्यासी, सन्यासियों के गुरू ब्रजवासी। मैं ब्रजवासी होने के नाते, आपको आर्शीवाद देता हूं कि आप भारत के प्रधानमंत्री बनें और ब्रज सजाने में हमारी मदद करें।’’



यह सुनकर नरेन्द्र भाई मोदी भावुक हो गये और बोले, ‘‘जब मैं दिल्ली भाजपा मुख्यालय में था, तब मेरे मन में गोवर्धन की परिक्रमा सजाने का प्रबल भाव आया था। इससे पहले कि मैं कुछ कर पाता, मुझे गुजरात भेज दिया गया। विनीत भाई आप गुजरात आओ, हम आपके प्रयास में पूरा सहयोग करेंगे।’’



2014 में जब मैं नरेन्द्र भाई मोदी को ब्रज विकास की अपनी पावर पाइंट प्रस्तुति दे रहा था। तब उन्हें मैंने ब्रज फाउंडेशन की अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम द्वारा गोवर्धन के सौन्दर्यीकरण के लिए तैयार की गई परिकल्पना की भी प्रस्तुति की थी। जिसे उन्होंने बहुत सराहा।



आजकल गोवर्धन के विकास के नाम पर जो कुछ प्रस्तावित किया जा रहा है, उसे पिछले दिनों अखबारों से जानकर हर कृष्णभक्त और गोवर्धन प्रेमी बहुत विचलित है। गोवर्धन का विकास अमृतसर की तर्ज पर नहीं किया जा सकता। क्योंकि स्वर्ण मंदिर पूरी तरह शहर के बीच स्थित एक शहरीकृत तीर्थस्थल है। जबकि गोवर्धन का अर्थ है-गायों का सवंर्धन करने वाला पर्वत। जहां गायें स्वछन्दता से चरती हों। गोवर्धन महात्म्य के सभी ग्रंथों में रसिक संतों ने गोवर्धन के नैसर्गिक सौन्दर्य का दिव्य वर्णन किया है। जिससे पता चलता है कि यहां सघन वृक्षावली, फलों से लदे वृक्ष, चारों ओर दूध जैसे लगने वाले जलप्रपात और स्वच्छ जल से भरे हुए सरोवर हुआ करते थे और वही यहां की शोभा थी। गोवर्धन की तलहटी की रज में लोट-पोट होकर संत, भजनानंदी और परिक्रमार्थी स्वयं को धन्य मानते थे। कलयुग के प्रभाव से गोवर्धन के इस स्वरूप का तेजी से विनाश किया गया। आजादी के बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल ने यहां कुछ वृक्षारोपण करवाया था। उसके बाद किसी बड़े राजनेता ने गोवर्धन के महात्म्य को जानने और गिर्राज महाराज की यथोचित सेवा करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया।



2003 में जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रयास से मुझे गोवर्धन के दानघाटी मंदिर का मानद रिसीवर बनाया गया, तब से मैंने स्थानीय विशेषज्ञों व जिला प्रशासन के साथ नियमित विचार विर्मशकर गोवर्धन की समस्याओं को समझने का प्रयास किया। उसके बाद देश-विदेश में पढ़े और धर्म में गहरी आस्था रखने वाले आर्किटैक्टों की मदद से गोवर्धन के सौन्दर्यीकरण और यात्रियों के लिए आधुनिक आवश्यक्ताओं को ध्यान में रखते हुए, एक विस्तृत कार्ययोजना की परिकल्पना तैयार की। जिसे तैयार करने में 5 वर्ष लगे।



देखने वाला इसे देखता ही रहा जाता है। यह परियोजना 2008 में हमने उ0प्र0 पर्यटन विभाग को अधिकृत रूप से सौंपी। हमारी चिंता का विषय ये है कि गोवर्धन की मूल भावना को समझे बिना, गोवर्धन के विकास के जिस स्वरूप की बात आज की जा रही है, उससे गोवर्धन का स्वरूप बिगड़ेगा, बनेगा नहीं। प्रधानमंत्रीजी को इस पर ध्यान देना चाहिए और हैदराबाद में हमसे किया वायदा निभाना चाहिए। जिससे गिरिराज महाराज की ऐसी सेवा हो कि संत, भक्त और ब्रजवासी जय-जयकार करें, आहत न हों।



हमें आधुनिक व्यवस्थाओं से कोई परहेज नहीं हैं। समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं। इसलिए दोनो विचार धााराओं के बीच संघर्ष न हो और सौहार्दपूर्णं सामन्जस्य हो, तो बात बन सकती है। इस विषय में प्रधानमंत्री जी के प्रमुख सचिव से लेकर उ.प्र. के मुख्यमंत्री व उनके मंत्रीमंडलीय सहयोगियों तक हमने अपनी चिंता व्यक्त कर दी है। पर सही कदम तो तभी उठेंगे, जब प्रधानमंत्री जी थोड़ी रूचि लें और गोवर्धन का विनाश न होने दें।

Monday, May 15, 2017

उ.प्र. पुलिस की कायापलट

यूं तो बम्बईया फिल्मों में पुलिस को हमेशा से ‘लेट-लतीफ’ और ‘ढीला-ढाला’ ही दिखाया जाता है। आमतौर पर पुलिस की छवि होती भी ऐसी है कि वो घटनास्थल पर फुर्ती से नहीं पहुंचती और बाद में लकीर पीटती रहती है। तब तक अपराधी नौ-दो-ग्यारह हो जाते हैं। पुलिस के मामले में उ.प्र. पुलिस पर ढीलेपन के अलावा जातिवादी होने का भी आरोप लगता रहा है। कभी अल्पसंख्यक आरोप लगाते हैं कि ‘यूपी पुलिस’ साम्प्रदायिक है, कभी बहनजी के राज में आरोप लगता है कि यूपी पुलिस दलित उत्पीड़न के नाम पर अन्य जातियों को परेशान करती है। तो सपा के शासन में आरोप लगता है कि थाने से पुलिस अधीक्षक तक सब जगह यादव भर दिये जाते हैं। यूपी पुलिस का जो भी इतिहास रहा हो, अब उ.प्र. की पुलिस अपनी छवि बदलने को बैचेन है। इसमें सबसे बड़ा परिवर्तन ‘यूपी 100’ योजना शुरू होने से आया है। 

इस योजना के तहत आज उ.प्र. के किसी भी कोने से, कोई भी नागरिक, किसी भी समय अगर 100 नम्बर पर फोन करेगा और अपनी समस्या बतायेगा, तो 3 से 20 मिनट के बीच ‘यूपी 100’ की गाड़ी में बैठे पुलिसकर्मी उसकी मदद को पहुंच जायेंगे। फिर वो चाहे किसी महिला से छेड़खानी का मामला हो, चोरी या डकैती हो, घरेलू मारपीट हो, सड़क दुर्घटना हो या अन्य कोई भी ऐसी समस्या, जिसे पुलिस हल कर सकती है। यह सरकारी दावा नहीं बल्कि हकीकत है। आप चाहें तो यूपी में इसे कभी भी 24 घंटे आजमाकर देख सकते हैं। पिछले साल नवम्बर में शुरू हुई, यह सेवा आज पूरी दुनिया और शेष भारत के लिए एक मिसाल बन गई है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि उ.प्र. के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अनिल अग्रवाल ने अपनी लगन से इसे मात्र एक साल में खड़ा करके दिखा दिया। जोकि लगभग एक असंभव घटना है। अनिल अग्रवाल ने जब यह प्रस्ताव शासन के सम्मुख रखा, तो उनके सहकर्मियों ने इसे मजाक समझा। मगर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तुरंत इस योजना को स्वीकार कर लिया और उस पर तेजी से काम करवाया।

आज इस सेवा में 3200 गाडियां है और 26000 पुलिसकर्मी और सूचना प्रौद्योगिकी के सैकड़ों विशेषज्ञ लगे हैं।
 
जैसे ही आप 100 नम्बर पर फोन करते हैं, आपकी काल सीधे लखनऊ मुख्यालय में सुनी जाती है। सुनने वाला पुलिसकर्मी नहीं बल्कि युवा महिलाऐं हैं। जो आपसे आपका नाम, वारदात की जगह और क्या वारदात हो रही है, यह पूछती है। फिर ये भी पूछती है कि आपके आस पास कोई महत्वर्पूण स्थान, मंदिर, मस्ज्जिद या भवन है और आप अपने निकट के थाने से कितना है दूर हैं। इस सब बातचीत में कुछ सेकंेड लगते हैं और आपका सारा डेटा और आपकी आवाज कम्प्यूटर में रिकार्ड हो जाती है। फिर यह रिकार्डिंग एक दूसरे विभाग को सेकेंडों में ट्रांस्फर हा जाती है। जहां बैठे पुलिसकर्मी फौरन ‘यूपी 100’ की उस गाड़ी को भेज देते हैं, जो उस समय आपके निकटस्थ होती है। क्योंकि उनके पास कम्प्यूटर के पर्दें पर हर गाड़ी की मौजूदगी का चित्र हर वक्त सामने आता रहता है। इस तरह केवल 3 मिनट से लेकर 20 मिनट के बीच ‘यूपी 100’ के पुलिकर्मी मौका-ए-वारदात पर पहंच जाते है। 

अब तक का अनुभव यह बताता है कि 80 फीसदी वारदात आपसी झगड़े की होती हैं। जिन्हें पुलिसकर्मी वहीं निपटा देते हैं या फिर उसे निकटस्थ थाने के सुपुर्द कर देते हैं।

ये सेवा इतनी तेजी से लोकप्रिय हो रही है कि अब उ.प्र. के लोग थाना जाने की बजाय सीधे 100 नम्बर पर फोन करते हैं। इसके तीन लाभ हो रहे हैं। एक तो अब कोई थाना ये बहाना नहीं कर सकता कि उसे सूचना नहीं मिली। क्योंकि पुलिस के हाथ में केस पहुंचने से पहले ही मामला लखनऊ मुख्यालय के एक कम्प्यूटर में दर्ज हो जाता है। दूसरा थानों पर काम का दबाव भी इससे बहुत कम हो गया है। तीसरा लाभ ये हुआ कि ‘यूपी 100’ जिला पुलिस अधीक्षक के अधीन न होकर सीधे प्रदेश के पुलिस महानिदेशक के अधीन है। इस तरह पुलिस फोर्स में ही एक दूसरे पर निगाह रखने की दो ईकाई हो गयी। एक जिला स्तर की पुलिस और एक राज्य स्तर की पुलिस। दोनों में से जो गडबड़ करेगा, वो अफसरों की निगाह में आ जायेगा। 

जब से ये सेवा शुरू हुई है, तब से सड़कों पर लूटपाट की घटनाओं में बहुत तेजी से कमी आई है। आठ महीने में ही 323 लोगों को मौके पर फौरन पहुंचकर आत्महत्या करने से रोका गया है। महिलाओं को छेड़ने वाले मजनुओं की भी इससे शामत आ गयी है। क्योंकि कोई भी लडकी 100 नम्बर पर फोन करके ऐसे मजनुओं के खिलाफ मिनटों में पुलिस बुला सकती है। इसके लिए जरूरत इस बात की है कि उ.प्र. का हर नागरिक अपने मोबाइल फोन पर ‘यूपी 100 एप्प’ को डाउनलोड कर ले और जैसे ही कोई समस्या में फंसे, उस एप्प का बटन दबाये और पुलिस आपकी सेवा में हाजिर हो जायेगी। विदेशी सैलानियों के लिए भी ये रामबाण है। जिन्हें अक्सर ये शिकायत रहती थी कि उ.प्र. की पुलिस उनके साथ जिम्मेदारी से व्यवहार नहीं करती है। इस पूरी व्यवस्था को खड़ी करने के लिए उ.प्र. पुलिस और उसके एडीजी अनिल अग्रवाल की जितनी तारीफ की जाए कम है। जरूरत है इस व्यवस्था को अन्य राज्यों में तेजी से अपनाने की।

Monday, April 10, 2017

केवल कर्ज माफी से नहीं होगा किसानो का उद्धार

Punjab Kesari 10 April 2017
यूपीए-2 से शुरू हुआ किसानों की कर्ज माफी का सिलसिला आज तक जारी है। उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी ने चुनावी वायदों को पूरा करते हुए लघु व सीमांत किसानों की कर्ज माफी का एलान कर दिया है। निश्चित रूप से इस कदम से इन किसानों को फौरी राहत मिलेगी। पर  इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उनके दिन बदल जायेंगे। केंद्रीय सरकार ने किसानों की दशा सुधारने के लिए ‘बीज से बाजार तक’ छः सूत्रिय कार्यक्रम की घोषणा की है। जिसका पहला बिंदू है किसानों को दस लाख करोड़ रूपये तक ऋण मुहैया कराना। किसानों को सीधे आनलाईन माध्यम से क्रेता से जोड़ना, जिससे बिचैलियों को खत्म किया जा सके। कम कीमत पर किसानों की फसल का बीमा किया जाना। उन्हें उन्नत कोटि के बीज प्रदान करने। 5.6 करोड़ ‘साईल हैल्थ कार्ड’ जारी कर भूमि की गुणवत्तानुसार फसल का निर्णय करना। किसानों को रासायनिक उर्वरकों के लिए लाईन में न खड़ा होना पड़े, इसकी व्यवस्था सुनिश्चित करना। इसके अलावा उनके लिए सिंचाई की माकूल व्यवस्था करना। विचारणीय विषय यह है कि क्या इन कदमों से भारत के किसानों की विशेषकर सीमांत किसानों की दशा सुधर पाएगी?

सोचने वाली बात यह है कि कृषि को लेकर भारतीय सोच और पश्चिमी सोच में बुनियादी अंतर है। जहां एक ओर भारत की पांरपरिक कृषि किसान को विशेषकर सीमांत किसान को उसके जीवन की संपूर्ण आवश्यक्ताओं को पूरा करते हुए, आत्मनिर्भर बनाने पर जोर देती है, वहीं पश्चिमी मानसिकता में कृषि को भी उद्योग मानकर बाजारवाद से जोड़ा जाता है। जिसके भारत के संदर्भ में लाभ कम और नुकसान ज्यादा हैं। पश्चिमी सोच के अनुसार दूध उत्पादन एक उद्योग है। दुधारू पशुओं को एक कारखानों की तरह इकट्ठा रखकर उन्हें दूध बढ़ाने की दवाऐं पिलाकर और उस दूध को बाजार में बड़े उद्योगों के लिए बेचकर पैसा कमाना ही लक्ष्य होता है। जबकि भारत का सीमांत कृषक, जो गाय पालता है, उसे अपने परिवार का सदस्य मानकर उसकी सेवा करता है। उसके दूध से परिवार का पोषण करता है। उसके गोबर से अपने खेत के लिए खाद् और रसोई के लिए ईंधन तैयार करता है। बाजार की व्यवस्था में यह कैसे संभव है? इसी तरह उसकी खेती भी समग्रता लिए होती है। जिसमें जल, जंगल, जमीन, जन और जानवर का समावेश और पारस्परिक निर्भरता निहित है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानवतावाद इसी भावना को पोषित करता है। बाजारीकरण पूर्णतः इसके विपरीत है।

देश  की जमीनी सोच से जुड़े और वैदिक संस्कृति में आस्था रखने वाले विचारकों की चिंता का विषय यह है कि विकास की दौड़ में कहीं हम व्यक्ति केन्द्रित विकास की जगह बाजार केंद्रित विकास तो नहीं कर रहे। पंजाब जैसे राज्य में भूमि उर्वरकता लगातार कम होते जाना, भू-जल स्तर खतरनाक गति से नीचा होते जाना, देश में जगह-जगह लगातार सूखा पड़ना और किसानों को आत्महत्या करना एक चिंताजनक स्थिति को रेखांकित करता है। ऐसे में कृषि को लेकर जो पांरपरिक ज्ञान और बुनियादी सोच रही है, उसे परखने और प्रयोग करने की आवश्यकता है। गुजरात का ‘पुनरोत्थान ट्रस्ट’ कई दशकों से देशज ज्ञान पर गहरा शोध कर रहा है। इस शोध पर आधारित अनेक ग्रंथ भी प्रकाशित किये गये हैं। जिनको पढ़ने से पता चलता है कि न सिर्फ कृषि बल्कि अपने भोजन, स्वास्थ, शिक्षा व पर्यावरण को लेकर हम कितने अवैज्ञानिक और अदूरदर्शी हो गये हैं। हम देख रहे हैं कि आधुनिक जीवन पद्धति लगातार हमें बीमार और कमजोर बनाती जा रही है। फिर भी हम अपने देशज ज्ञान को अपनाने को तैयार नहीं हैं। वो ज्ञान, जो हमें सदियों से स्वस्थ, सुखी और संपन्न बनाता रहा और भारत सोने की चिड़िया कहलाता रहा। जबसे अंग्रेजी हुकुमत ने आकर हमारे इस ज्ञान को नष्ट किया और हमारे अंदर अपने ही अतीत के प्रति हेय दृष्टि पैदा कर दी, तब से ही हम दरिद्र होते चले गये। कृषि को लेकर जो भी कदम आज उठाये जा रहें हैं, उनकी चकाचैंध में देशी समझ पूरी तरह विलुप्त हो गयी है। यह चिंता का विषय है। कहीं ऐसा न हो कि ‘चैबे जी गये छब्बे बनने और दूबे बनकर लौटे’।

यह सोचना इसलिए भी महत्वपूर्णं है क्योंकि बाजारवाद व भोगवाद पर आधारित पश्चिमी अर्थव्यवस्था का ढ़ाचा भी अब चरमरा गया है। दुनिया का सबसे विकसित देश माना जाने वाला देश अमरिका दुनिया का सबसे कर्जदार है और अब वो अपने पांव समेट रहा है क्योंकि भोगवाद की इस व्यवस्था ने उसकी आर्थिक नींव को हिला दिया है। समूचे यूरोप का आर्थिक संकट भी इसी तथ्य को पुष्ट करता है कि बाजारवाद और भोगवाद की अर्थव्यवस्था समाज को खोखला कर देती है। हमारी चिंता का विषय यह है कि हम इन सारे उदाहरणों के सामने होेते हुए भी पश्चिम की उन अर्थव्यवस्थाओं की विफलता की ओर न देखकर उनके आडंबर से प्रभावित हो रहे हैं।

आज के दौर में जब भारत को एक ऐसा सशक्त नेतृत्व मिला है, जो न सिर्फ भारत की वैदिक संस्कृति को गर्व के साथ विश्व में स्थापित करने सामथ्र्य रखता है और अपने भावनाओं को सार्वजनिक रूप से प्रकट करने में संकोच नहीं करता, फिर क्यों हम भारत के देशज ज्ञान की ओर ध्यान नहीं दे रहे? अगर अब नहीं दिया तो भविष्य में न जाने ऐसा समय फिर कब आये? इसलिए बात केवल किसानों की नहीं, पूरे भारतीय समाज की है, जिसे सोचना है कि हमें किस ओर जाना है?

Monday, April 3, 2017

योगी को सीएम बनाकर मोदी ने कोई गलती नहीं की

जिस दिन आदित्यनाथ योगी जी की शपथ हुई, उस दिन व्हाट्सएप्प पर एक मजाक चला, जिसमें दिखाया गया कि आडवाणी जी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कंधे पर हाथ रखकर कह रहे हैं कि ‘आज तूने वही गलती कर दी, जो मैने तूझे गुजरात का मुख्यमंत्री बनाकर की थी’। ये एक भद्दा मजाक था। ये उस शैतानी दिमाग की उपज है, जो भारत में सनातनधर्मी मजबूत नेतृत्व को उभरते और सफल होते नहीं देखना चाहता। जबकि सच्चाई ये है कि मोदी जी ने योेगी जी को उ.प्र. की बागडोर सौंपकर तुरूप का पत्ता फैंका है। देश की जनता तभी सुखी हो सकती है, जब प्रदेश की सरकार का नेतृत्व चरित्रवान और योग्य लोग करें। क्योंकि केंद्र की सरकार तो नीति बनाने का और साधन मुहैया करने का काम करती है। योजनाओं का क्रियान्वयन तो प्रदेश की नौकरशाही करती है। अगर वो कोताही बरतें तो जनता तक नीतियों का लाभ नहीं पहुंचता, जिससे जनाक्रोश पनपता है। आज के दौर में जब राजनीतिज्ञों को सफल होने के लिए चाहे-अनचाहे तमाम भ्रष्ट तरीके अपनाने पड़ते हैं, ऐसे में किसी नेता से ये उम्मीद करना कि वो रातों-रात रामराज्य स्थापित कर देगा, काल्पनिक बात है। जैसा कि हमने पहले भी लिखा है कि साधन संपन्न तपस्वी योगी के भ्रष्ट होने का कोई कारण नहीं है। इसलिए वह ईमानदार रह भी सकता है और ईमानदारी को शासन पर कड़ाई से लागू भी कर सकता है। उ.प्र. की जो हालत पिछले दो दशकों से रही है, उसमें जनता को शासन से अपेक्षा के अनुरूप व्यव्हार नहीं मिला। ऐसे में उ.प्र. को योगी जी जैसेे मुख्यमंत्री का इंतजार था।

मोदी जी के इस कदम से उ.प्र. की हालत सुधरने की संभावनाऐं प्रबल हो गयी हैं। लेकिन ये काम 5 साल में भी पूरा होने नहीं जा रहा और जब तक उ.प्र. उत्तम प्रदेश नहीं बनेगा तब तक योगी जी परीक्षा में पास नही होंगें। ऐसे में उन्हें कम से कम अगले 10 साल उत्तर प्रदेश को तेज विकास के रास्ते से ले जाना होगा। उ.प्र. की नौकरशााही का तौर-तरीक बदलना होगा। उसमें जनता के प्रति सेवा का भाव लाना होगा। ये काम एक-दो दिन का नहीं है। आज योगी जी की आयु मात्र 45 वर्ष है। 10 वर्ष बाद, वे मात्र 55 वर्ष के होंगें। जबकि मोदी जी 75 वर्ष के हो जायेंगे। तब वो समय आयेगा, जब योगी जी राष्ट्रीय भूमिका के लिए उपलब्ध हो सकेगें। इस तरह मोदी जी ने आम जनता के मन में जो प्रश्न था कि उनके बाद कौन, उसे भी इस कदम से दूर कर दिया है। क्योंकि यह सवाल उठना स्वभाविक था कि मोदी के बाद भारत को सशक्त नेतृत्व कौन देगा? अब उस प्रश्न का उत्तर मिलने की संभावना प्रबल हो गयी है।

वैसे भी राष्ट्रीय राजनीति में पदार्पण करने से पहले मोदी जी ने 15 वर्ष गुजरात की सेवा की। आज उन्होंने अपनी अंतर्राष्ट्रीय छवि बना ली है जबकि योगी जी के लिए सरकार चलाने का ये पहला अनुभव है। अभी उन्हें बहुत कुछ देखना और समझना है। इसलिए इस तरह के बेतुके मजाक करना, सिर्फ मानसिक दिवालियापन का परिचय देता है। वरना न तो मोदी को योगी से खतरा है और न योगी को मोदी से खतरा है। अगर खतरा होता तो अमित शाह जैसे मझे हुए शतरंज के खिलाड़ी ये मोहरा बिछाते ही नहीं।

1000 साल का मध्य युग, 200 साल का औपनिवेशक शासन और फिर 70 साल आजादी के बाद भारत की बहुसंख्यक हिंदू आबादी ने अपमान के घूंट पीकर गुजारे हैं। हमारी आस्था के तीनों केंद्र मथुरा, काशी और अयोध्या, आज भी हमें उस अपमान की लगातार याद दिलाते हैं। हमारी गौवंश आधारित कृषि, आर्युवेद व गुरूकुल शिक्षा प्रणाली की उपेक्षा करके, जो कुछ हम पर थोपा गया, उसे भारतीय समाज शारिरिक, मानसिक और नैतिक रूप से दुर्बल हुआ है। भैतिकतावाद की इस चकाचैंध में अब तो हमसे शुद्ध अन्न, जल, फल व वायु तक छीन ली गई है। हमारे उद्यमी और कर्मठ युवाओं को थोथी डिग्री के प्रमाण पत्र पकड़ाकर, नाकारा बेरोजगारों की लंबी कतारों में खड़ा कर दिया गया है। न तो वो गांव के काम के लायक रहे और न शहर के। इन सारी समस्याओं का हल हमारी शुद्ध सनातन संस्कृति में था, और आज भी है। जरूरत है उसे आत्मविश्वास के साथ अपनाने की।

जब तक प्रदेशों और राष्ट्र के स्तर पर भारत के सनातन धर्म में आस्था रखने वाला राष्ट्रवादी नेतृत्व पदासीन नहीं होगा, तब तक भारत अपना खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त नहीं कर पायेगा। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अगर कर्नाटक के खानमाफिया रेड्डी बंधुओं या मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले जैसे कांड होंगे तो फिर सत्ता में कोई भी हो, कोई अंतर नहीं पड़ेगा। इसलिए जहां एक तरफ हर राष्ट्रप्रेमी भारत को एक सबल राष्ट्र के रूप देखना चााहता है। वहीं इस बात की सत्तारूढ़ दल की जिम्मेदारी है कि परीक्षा की घडी में सच्चाई से आंख न चुरायें और अपनी गल्तियों को छिपाने की कोशिश न करें।

मैं याद दिलाना चाहता हूं कि जब आतंकवाद और भ्रष्टाचार के विरूद्ध 1993 में मैंने हवाला कांड खोलकर, अपनी जान हथेली पर रखकर, पूरी राजनैतिक व्यव्यस्था से वर्षों अकेले संघर्ष किया था तब राष्ट्रप्रेमी शक्तियों ने केवल इसलिए चुप्पी साध ली क्योंकि हवाला कांड में लालकृष्ण आडवाणी जी भी आरोपित थे। जबकि कांगेस और दूसरे दलों के 53 से अधिक नेता अरोपित हुए थे। फिर भी मुझे कुछ लोगों ने हिन्दू विरोधी कहकर बदनाम करने की नाकाम कोशिश की जबकि मैं भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के लिए हमेशा सीना तानकर खड़ा रहा हूं। यही वजह है कि नरेन्द भाई के प्रधानमंत्री बनने के 5 वर्ष पहले से ही, मैं उनके नेतृत्व का कायल था और उन्हें भारत की गद्दी पर देखना चाहता था। इसलिए हमेशा उनके पक्ष में लिखा और बोला। भारत की वैदिक परंपरा है कि अपने शुभचिंतकों की आलोचना को भगवत्प्रसाद मानकर स्वीकार किया जाए और चाटुकरों की फौज से बचा जाऐ। अगर मोदी जी और योगी जी इस सिद्धांत का पालन करेंगे तो उन्हें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

Monday, March 20, 2017

योगी बदलेंगे यूपी का चेहरा

जैसे ही योगी आदित्यनाथ जी के नाम की घोषणा हुई, टीवी चैनलों पर बैठे कुछ टिप्प्णीकाओं ने इस समाचार पर असंतोष जताया। उनका कहना था कि योगी समाज में विघटन की राजनीति करेंगे और प्रधानमंत्री मोदी के विकास के एजेंडा को दरकिनार कर देंगे। यह सोच सरासर गलत है। विकास का ऐंजेंडा हो या कुशल प्रशासन, उसकी पहली शर्त है कि राजनेता चरित्रवान होना चाहिए। आजकल राजनीति में सबसे बड़ा संकंट चरित्र का हो गया है। चरित्रवान राजनेता ढू़ढ़े से नहीं मिलते। 21 वर्ष की अल्पायु में समाज और धर्म के लिए घर त्यागने वाला कोई युवा कुछ मजबूत इरादे लेकर ही निकलता है। योगी आदित्यनाथ ने अपने शुद्ध सात्विक आचरण और नैष्टिक ब्रह्मचर्य से अपने चरित्रवान होने का समुचित प्रमाण दे दिया है। पांच बार लोकसभा जीतकर उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता को भी स्थापित कर दिया है। गोरखनाथ पंथ की इस गद्दी का इतिहास रहा है कि इस पर बैठने वाले संत चरित्रवान, निष्ठावान और देशभक्त रहें हैं। इतनी बड़ी गद्दी के महंत होकर भी योगी जी पर कभी कोई आरोप नहीं लगे।

आज राजीनिति की दूसरी समस्या है बढ़ता परिवारवाद। कोई दल इससे अछूता नहीं है। दावे कोई कितने ही कर ले, पर हर दल का नेता अपने परिवार को बढ़ाने में ही लगा रहता है और जनता की उपेक्षा कर देता है। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी जैसे विरले ही होते हैं, जो राजनीति के सर्वाेच्च स्तर पर पहुंच कर भी परिवार के लिए कुछ नहीं करते। क्योंकि वे परिवार को पहले ही बहुत पीछे छोड़ आये हैं। उनके लिए समाज, राष्ट्र और धर्म यही प्राथमिकता होती है। उ.प्र को दशाब्दियों बाद एक ऐसा नेतृत्व मिला है, जो चरित्रवान है, विचारवान है, आस्थावान है और जिसके परिवारवाद में फंसने की कोई गुंजाइश नही है। इसलिए ये कहना कि योगी जी के आने से विकास का ऐजेंडा पीछे चला जायेगा, सरासर गलत है।
ये सही है कि उ.प्र. के प्रशासन में चाहे वो पुलिस हो, सामान्य प्रशासन हो या न्यायपालिका तीनों में ही भारी भ्रष्टावार व्याप्त है। बिना आमूल-चूल परिवर्तन किये हालात बदलने वाले नहीं है। यही सबसे बड़ी चुनौती है, योगीजी के समने। उन्हें  औपनिवेशिक मानसिकता वाली प्रशासनिक व्यवस्था को तोड़ना होगा और राजऋषी की भूमिका में आना होगा। चाणक्य पंडित ने कहा है कि जिस देश के राजा महलों में रहते हैं, उनकी प्रजा झोपड़ियों में रहती है और जिसके राजा झोंपड़ियों में रहते है उसकी प्रजा महलों में रहती है। योगी जी ने पहले ही इसके संकेत दिये है कि वे स्वयं और अपने मंत्री मंडल को राजा की तरह नहीं बल्कि प्रजा के सेवक के रूप में देखना चाहेंगे। जहां तक सवाल है प्रशासनिक व्यवस्था को बदलने का उसके लिए कड़े इरादे की जरूरत होती है। योगी जी का इतिहास रहा है कि ‘प्राण जाये पर वचन न जाई’ वे अपने वचन पर अटल रहते हैं। जो ठान लिया सो करके रहेंगे। फिर न तो उन्हें बिकाऊ मीडिया की परवाह होती है और न ही छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों की।

रही बात अल्पसंख्यको की तो ये शब्द ही विघटनकारी है। जब संविधान में सबको समान हक मिला हुआ है, तो कौन बहुसंख्यक और कौन अल्पसंख्यक! उन्हें ऐसे निर्णय लेने होंगे, जिनसे समाज में समरसता आये और ये अल्पसंख्यकवाद की नौटंकी बंद हो। जो बहुसंख्यक मुसलमान अपने कारोबार में जुटे हैं, उन्हें इससे कोई फर्क नही पड़ेगा। क्योंकि वे तो पहले से ही राष्ट्र की मुख्यधारा में हैं। लेकिन जो मुसलमान आतंकवाद की टोपी पहनकर गऊ हत्या, देह व्यापार, तस्करी और नशीली दवाओं के व्यापार में लिप्त हैं, उनकी नकेल जरूर कसी जायेगी। अब उनके लिए बेहतर यही होगा कि वे उ.प्र. छोड़कर भाग जायें।

उ.प्र. को संतुलित और सही विकास की जरूरत है। इसके लिए गहरी समझ, गंभीर सोच, क्रंतिकारी विचारों और ठोस नेतृत्व की आवश्यक्ता है। आवश्यक नहीं की राजा सर्वगुण संपन्न हो। उसकी योग्यता तो इस बात में हैं कि वह एक जौहरी की तरह हो, गुणग्राही हो और उस मेधा को पहचानने की क्षमता रखता हो, जिनसे वह वांछित लक्ष्यों की प्राप्ति करवा सके। योगी जी ने अगर ऐसा रास्ता पकड़ा और सही लोगों को अपनी टीम में शामिल करके उ.प्र के विकास का मार्ग तैयार किया, तो निःसंदेह प्रधानमंत्री मोदी के विकास के ऐंजंडा को बहुत आगे ले जायेंगे। 

उ.प्र. कीे समस्याओं की सूची बहुत लंबी है। जिन्हें एक लेख में समाहित नहीं किया जा सकता। आने वाले सप्ताहों में हम इन मुद्दों पर अपने अनुभव और समझ के अनुसार प्रकाश डालेंगें और उम्मीद करेंगे कि हमारी बात योगीजी तक पहुंचे। 

लगे हाथ पंजाब की भी चर्चा कर लेनी चाहिए। अकाली दल के वंशवाद से त्रस्त होकर पंजाब की जनता ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को गद्दी सौंप दी और राजनीति के बहरूपिया अरविंद केजरीवाल को रिजेक्ट कर दिया। इस काॅलम में हम पिछले पांच वर्ष से बराबर लिखते आये हैं कि अरविंद केजरीवाल की राजीनीति केवल आत्मकेंद्रित है। ‘हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और’ पर इसका मतलब ये नहीं कि कैप्टन साहब को मनमानी हुकुमत चलाने का पट्टा मिल गया हो। वे भी देख रहें है कि देश में राजनीति की दशा और दिशा दोंनो बदल रही है। ऐसे में अगर उन्होंने जनता को सामने रखकर पारदर्शिता से ठोस काम नहीं किया तो अगले लोकसभा चुनाव में उनके दल को भारी पराजय का मुंह देखना पड़ सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मोदी की आंधी  के बीच वे अपना दीया इस तरह जलाकर रखेंगे, जिससे पंजाब कि मतदाता को निराशा न हो।