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Monday, January 8, 2018

शिक्षा में क्रांतिः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की क्रन्तिकारी पहल

भगवान श्रीकृष्ण के गुरू संदीपनि मुनि के गुरूकुल की छत्रछाया में आगामी 28 अप्रैल से ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ उज्जैन से विद्यालयी शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक क्रांति का शंखनाद् करने जा रहा है। मैकाले की ‘गुलाम बनाने वाली शिक्षा’ ने गत 200 वर्षों से भारत को इतनी बुरी तरह जकड़ रखा है कि हम उससे आज तक मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा के बोर्ड शिक्षा व्यवस्था में कोई नवीनता लाने को तैयार नहीं है। सब लकीर के फकीर बने हैं। पिछले 70 साल में हर शिक्षाविद् ने ये बात दोहराई कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली के कारण हमारी युवा पीढ़ी परजीवी बन रही है। उसमें जोखिम उठाने, हाथ से काम करने, उत्पादक व्यवसाय खड़ा करने, अपने शरीर और परिवेश को स्वस्थ रखने व अपने अतीत पर गर्व करने के संस्कार नहीं हैं। उस अतीत पर, जिसने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था। वे आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त होकर, सरकार की बाबूगिरी को जीवन का लक्ष्य मानते हैं। ये बात दूसरी है कि सरकारी नौकरियाँ नगण्य है और आवेदकों की संख्या करोड़ों में। इससे युवाओं में हताशा, कुंठा, हीन भावना और हिंसा पनप रही हैं।
संघ से जुड़े बुद्धिजीवियों का लंबे समय से यह मानना रहा है कि जब तक भारत की शिक्षा व्यवस्था भारतीय परिवेश और मानदंडों के अनुकूल नहीं होगी, तब तक माँ भारती अपना खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त नहीं कर पायेंगी। इसके लिए एक समानान्तर शिक्षा व्यवस्था खड़ी करने की आवश्यक्ता है। जो आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी, उत्पादक, संस्कारवान व प्रखर प्रज्ञा के युवाओं को तैयार करे।
इस दिशा में अहमदाबाद के उत्तम भाई ने अभूतपूर्व कार्य किया है। हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला, साबरमती में विशुद्ध गुरूकुल शिक्षा प्रणाली से शिक्षण और विद्यार्थियों का पालन पोषण कर उत्तम भाई ने विश्व स्तर की योग्यता वाले मेधावी छात्रों को तैयार किया है। जिसके विषय में इस कालम में गत वर्षों में मैं दो लेख पहले लिख चुका हूं। जिन्हें पढ़कर, देशभर से अनेक शिक्षाशास्त्री और अभिाभावक साबरमती पहुंचते रहे हैं।
उज्जैन के सम्मेलन में इस गुरूकुल के प्रभावशाली अनुभवों और उपलब्धियों के अलावा देश के अन्य हिस्सों में चल रहे, ऐसे ही दूसरे गुरूकुलों के साझे अनुभव से प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पूरे देश में लाखों गुरूकुलों की स्थापना की तैयारी कर रहा है। जिसका एक अलग शिक्षा बोर्ड सरकारी स्तर पर भी बने, ऐसा लक्ष्य रखा गया है। जिससे इस गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था में औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था के घालमेल की संभावना न रहे। इस अनुष्ठान में वेद विज्ञान गुरूकुलम् (बंगलुरू), प्रबोधिनी गुरूकुलम्, हरिहरपुर (कर्नाटक), मैत्रेयी गुरूकुलम् (मंगलुरू), सिद्धगिरि ज्ञानपीठ (महाराष्ट्र), आदिनाथ संस्कार विद्यापीठ (चेन्नई), श्री वीर लोकशाह संस्कृत ज्ञानपीठ गुरूकुल (जोधपुर), महर्षियाज्ञवल्क्यज्ञानपीठ (गुजरात) व नेपाल के 6 गुरूकुल भी भाग ले रहे हैं। उज्जैन में इस सागर मंथन के बाद, जो अमृत कलश निकलेगा, वह पुनः स्थापित होने जा रही, भारत की गुरूकुल शिक्षा प्रणाली का आधार बनेगा।
अनादिकाल से भारतीय शिक्षा पद्धति नालंदा, तक्षशिला, वल्लभी व विक्रमशिला जैसे गुरूकुलों के कारण विश्वविख्यात रही हैं। जहां सहस्त्रों छात्र और सैकड़ों आचार्य एक साथ रहकर, अध्ययन व शिक्षण करते थे। वैदिक सनातन परंपरा के साथ ही बौद्ध और जैन मतों के गुरूकुलों का भी प्रचलन रहा। 1823 तक देश के प्रत्येक ग्राम में बड़ी संख्या में पाठशालाऐं होती थीं, जिनमें सभी वर्गों के लोगों को जीवनोपयी शिक्षा दी जाती थी। आवासीय व्यवस्था व समग्र शिक्षा से मजे हुए युवा तैयार होते थे। जो जीवन के हर क्षेत्र में अपना श्रेष्ठ योगदान करते थे।
बाद में लार्ड मैकाले ने यह अनुभव किया कि भारत की इस सशक्त शिक्षा व्यवस्था को नष्ट किये बिना भारतीयों को गुलाम नहीं बनाया जा सकता। इसलिए उसने एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था हम पर थोपी, जिसने हमें हर तरह से अंग्रेज़ियत का गुलाम बना दिया और हम आज तक उस गुलामी से मुक्त नहीं हुए।
'भारतीय शिक्षण मंडल' शिक्षा के भारतीय प्रारूप को पुनर्स्थापित करने का कार्य कर रहा है। जिससे एक बार फिर भारत के गांवों में ही नहीं, नगरों में भी, गुरूकुल शिक्षा पद्धति स्थापित हो जाऐ। जिससे बालकों का सर्वांगीर्णं विकास हो। उज्जैन में होने जा रहे गुरूकुल शिक्षा के इस कुंभ में देशभर से शिक्षाविद् और आचार्यगण भाग लेंगे। अगर इस मंथन में गुरूकुल शिक्षा व्यवस्था के प्रारूप पर आम सहमति बनती है, तो भारतीय शिक्षण मंडल इस प्रस्ताव को माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के पास लेकर जायेगा और उनसे गुरूकुल शिक्षा का एक अलग निदेशालय या बोर्ड गठित करने को कहेगा।
चूंकि मैंने स्वयं कई बार साबरमती में हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला की गतिविधियों को वहां रहकर निकट से देखा है और उसके छात्रों के प्रदर्शन को भी देखा है, इसलिए मुझे इस सम्मेलन से बहुत आशा है। काश इसमें सहमति बने, जो शायद वहां सरसंघाचलक डा. मोहन भागवत जी की उपस्थिति और सदिच्छा  के कारण संभव होगी। इससे भारत की किशोर आबादी को बहुत लाभ होने वाला है। क्योंकि आज शिक्षा का इतना व्यवसायीकरण हो गया है कि अब शिक्षा संस्थानों में छात्रों का भविष्य नहीं बनता बल्कि उनका वर्तमान भी उनसे छीन लिया जाता है। बिरले ही हैं, जो अपनी मेधा और पुरूषार्थ से आगे बढ़ पाते हैं। जो शिक्षा संस्थान आज भी देश में अच्छी शिक्षा देने का दावा करते हैं, उनके  छात्र भी  भौतिक दृष्टि से भले ही सफल हो जाऐं, पर उनके व्यक्तित्व का विकास समग्रता में नहीं होता।

Monday, July 24, 2017

पुराने तरीकों से नहीं सुधरेंगी धर्मनगरियाँ


योगी सरकार उ.प्र. की धर्मनगरियों को सजाना-संवारना चाहती है। स्वयं मुख्यमंत्री इस मामले में गहरी रूचि रखते हैं। उनकी हार्दिक इच्छा है कि उनके शासनकाल में मथुरा, वाराणसी, अयोध्या और चित्रकूट का विकास इस तरह हो कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सुख मिले। इसके लिए वे सब कुछ करने को तैयार हैं।



धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। लोगों की धार्मिक भावनाएं, पुरोहित समाज के पैतिृक अधिकार, वहां आने वाले आम आदमी से अति धनी लोगों तक की अपेक्षाओं को पूरा करना, सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना।



इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खड़जे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। कारण यह है कि सड़क, खड़जे की मानसिकता से टैंडर निकालने वाले, डीपीआर बनाने वाले और ठेके देने वाले, इस दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते। अगर सोच पात होते तो आज तक इन शहरों में कुछ कर दिखाते। पिछले इतने दशकों में इन धर्मनगरियों में विकास प्राधिकरणों ने क्या एक भी इमारत ऐसी बनाई है, जिसे देखा-दिखाया जा सके? क्या इन प्राधिकरणों ने शहरों की वास्तुकला को आगे बढाया है या इन पुरातन शहरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे भवन खड़े कर दिये हैं। नतीजतन ये सांस्कृतिक स्थल अपनी पहचान तेजी से खोते जा रहे हैं।



माना कि विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। बढ़ती आबादी की मांग को भी पूरा करना होता है। मकान, दुकान, बाजार भी बनाने होते हैं, पर पुरातन नगरों की आत्मा को मारकर नहीं। अंदर से भवन कितना ही आधुनिक क्यों न हो, बाहर से उसका स्वरूप, उस शाहर की वास्तुकला की पहचान को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। भूटान एक ऐसा देश है, जहां एक भी भवन भूटान की बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता। चाहे होटल, दफ्तर या दुकान कुछ भी हो। सबके खिड़की, दरवाजे और छज्जे बुद्ध विहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाते हैं। इससे न सिर्फ कलात्मकता बनीं रहती है, बल्कि ये और भी ज्यादा आकर्षक लगते हैं। दुनिया के तमाम पर्यटन वाले नगर, इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। जबकि उ.प्र. में आज भी पुराने ढर्रे से सोचा और किया जा रहा है। फिर कैसे सुधरेगा इन नगरों का स्वरूप?



पिछले हफ्ते जब मैंने उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को ब्रज के बारे में पावर पाइंट प्रस्तुति दी, तो मैंने उनसे स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाराज! दो तरह का भ्रष्टाचार होता है, ‘करप्शन ऑफ डिजाईनकरप्शन ऑफ इम्पलीमेंटेशन। यानि नक्शे बनाने में भ्रष्टाचार और निर्माण करने में भ्रष्टाचार। निर्माण का भ्रष्टाचार तो भारतव्यापी है। बिना कमीशन लिए कोई सरकारी आदमी कागज बढ़ाना नहीं चाहता। पर डिजाईन का भ्रष्टाचार तो और भी गंभीर है। यानि तीर्थस्थलों के विकास की योजनाऐं बनाने में ही अगर सही समझ और अनुभवी लोगों की मदद नहीं ली जायेगी और उद्देश्य अवैध धन कमाना होगा, तो योजनाऐं ही नाहक महत्वाकांक्षी बनाई जायेंगी। गलत लोगों से नक्शे बनावाये  जायेंगे और सत्ता के मद में डंडे के जोर पर योजनाऐं लागू करवाई जायेंगी। नतीजतन धर्मक्षेत्रों का विनाश  होगा, विकास नहीं।



पिछले तीन दशकों में, इस तरह कितना व्यापक विनाश धर्मक्षेत्रों का किया गया है कि उसके दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फिर भी अनुभव से कुछ सीखा नहीं जा रहा। सारे निर्णय पुराने ढर्रे पर ही लिए जा रहे हैं, तो कैसे सजेंगी हमारी धर्मनगरियां? मैं तो इसी चिंता में घुलता जा रहा हूं। शोर मचाओ तो लोगों को बुरा लगता है और चुप होकर बैठो तो दम घुटता है कि अपनी आंखों के सामने, अपनी धार्मिक विरासत का विनाश कैसे हो जाने दें? योगी जी भले इंसान हैं, संत हैं और पैसे कमाने के लिए सत्ता में नहीं आये हैं। मगर समस्या यह है कि उन्हें सलाह देने वाले तो लोग वही हैं ना, जो इस पुराने ढर्रे के बाहर सोचने का प्रयास भी नहीं करते। ऐसे में भगवान ही मालिक है कि क्या होगा?



चूंकि धर्मक्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उद्देश्य रहा है, इसलिए संघ नेतृत्व को चाहिए कि धर्मक्षेत्रों के विकास पर स्पष्ट नीति निधार्रित करने के लिए अनुभवी और चुने हुए लोगों की गोष्ठी बुलाए और उनकी राय लेकर नीति निर्धारण करवाये। नीतिओं में क्रांतिकारी परिवर्तन किये बिना, वांछित सुधार आना असंभव है। फिर तो वही होगा कि चैबे जी गये छब्बे बनने और दूबे बनके लौटे। यही काम योगी जी को अपने स्तर पर भी करना चाहिए। पर इसमें भी एक खतरा है। जब कभी सरकारी स्तर पर ऐसा विचार-विमर्श करना होना होता है, तो निहित स्वार्थ सार्थक विचारों को दबवाने के लिए या उनका विरोध करवाने के लिए, सत्ता के दलालनुमा लोगों को समाजसेवी बताकर इन बैठकों में बुला लेते हैं और सही बात को आगे नहीं बढ़ने देते। इसलिए ऐसी गोष्ठी में केवल वे लोग ही आऐ, जो स्वयंसिद्ध हैं, ढपोरशंखी नहीं। योगी जी ऐसा कर पायेंगे, ये आसान नहीं। क्योंकि रांड सांड, सीढी संयासी, इनसे बचे तो सेवे काशी

Monday, March 21, 2016

संघ का एजेण्डा बम-बम

 बिहार चुनाव के बाद औधे मुंह गिरी भाजपा को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के घटनाक्रम से एक नई लीज मिल गई है। राष्ट्रवाद और देशद्रोह के सवाल पर मतदाताओं को लामबंद करने की योजना पर काम हो रहा है। इस उम्मीद में कि देशभक्ति एक ऐसा मुद्दा है कि जिस पर कोई बहस की गुंजाइश नहीं बचती। कौन होगा जो खुद को देशद्रोहियों की कतार में खड़ा करना चाहेगा। जवाब है मुट्ठीभर माओवादियों को छोड़कर कोई नहीं। वे भी खुलकर तो अपने को देशद्रोही मानने को तैयार नहीं होंगे। पर हकीकत यह है कि उनकी विचारधारा किसी देश की सीमाओं में बंधी नहीं होती। वे तो दुनिया के शोषित पीड़ितों के मसीहा बनने का दावा करते हैं।
 

भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सोचना यह है कि आने वाले दिनों में बंगाल, असम, पंजाब, केरल, तमिलनाडु, पांडुचेरी, उत्तर प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव में देशभक्ति और देशद्रोह के मुद्दे को जमकर भुनाया जा सकता है। ऐसा सोचने के पीछे आधार यह है कि जेएनयू के मुद्दे पर जिस आक्रामक तरीके से सोशल मीडिया, प्रिंट व टीवी मीडिया मुखर हुआ, उससे लगा कि यह मुद्दा घर-घर छा गया है और इसी मुद्दे को लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है। यह सही है कि भारत के मध्यमवर्ग का बहुसंख्यक हिस्सा देशभक्ति और देशद्रोह की इस बहस में उलझ गया है और अपने को देशभक्तों की जमात के साथ खड़ा देख रहा है। पर ध्यान देने वाली बात यह है कि ये भावना केवल मध्यमवर्गीय समाज तक सीमित है। इसका असर फिलहाल गांवों में देखने को नहीं मिलता।
 
 वैसे भी भारत के मतदाता का मिजाज कोई बहुत छिपा हुआ नहीं है। चुनाव के पहले अगर मोदी जैसी आंधी चले या इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर चले, तो मतदाता भावुक होकर जरूर बह जाता है। पर ऐसी लहर हमेशा नहीं बनती। इसलिए ये मानना कि केवल देशभक्ति के मुद्दे पर देश का मतदाता भारी मात्रा में भाजपा के पक्ष में मतदान करेगा, शायद कुछ ज्यादा महत्वाकांक्षी बात है। जमीनी हकीकत यह है कि चुनाव में अहम भूमिका किसान, मजदूर और गांवों के मतदाताओं की होती है और इतिहास बताता है कि अपवादों को छोड़कर देश का आम समाज और मध्यमवर्गीय समाज अलग-अलग सोच रखता है।
 
 आज जहां शहर के मध्यमवर्गीय समाज में देशभक्ति व देशद्रोह की चर्चा हो रही है। पर गांवों में इस चर्चा में कोई रूचि नहीं है। मैं लगातार देश में भ्रमण और व्याख्यान करने जाता रहता हूं और प्रयास करके उन राज्यों के देहाती इलाके में भी जाता हूं, ताकि आमआदमी की नब्ज पकड़ सकूं। पिछले कुछ दिनों में जब से जेएनयू विवाद उछला है, तब से जिन राज्यों के गांवों का मैंने दौरा किया वहां कहीं भी इस मुद्दे पर कोई बहस या चर्चा होते नहीं सुनी। गांवों के लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को लेकर ही चिंतित रहते हैं। उन्हें आज भी नरेंद्र भाई मोदी से भारी उम्मीद है कि वे बिना देरी किए उनके खातों में 15-15 लाख रूपया जमा करवा देंगे, जो उन्होंने चुनाव के दौरान विदेशों से निकलवाने का वायदा किया था, पर अभी तक ऐसा नहीं हुआ। ये लोग अपनी पासबुक लेकर मुंबई जैसे बड़े शहर तक में बैंकों के पास जाते हैं और पूछते हैं कि हमारे खाते में 15 लाख रूपए आए या नहीं। प्रायः बैंक मैनेजर उनसे मजाक में कह देते हैं कि खाते में तो नहीं आए, आप जाकर मोदीजी से मांग लो। इससे ग्रामीणों को बहुत निराशा होती है। 2 साल के बाद भी जब कालेधन का हिस्सा उन्हें नहीं मिला, तब उन्हें लगता है कि उनके साथ धोखा हुआ है।
 
 प्रधानमंत्री के लिए ये संभव ही नहीं है कि वह अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों को धता-बताकर विदेशी बैंकों में जमा भारत के कालेधन को एक झटके में देश में ले आएं। खुदा न खास्ता अगर वे ऐसा करने में सफल हो भी जाते हैं, तो भी पैसा नागरिकों के बैंक खाते में तो जाएगा नहीं। वो तो राजकोश में जाएगा, जिसका उपयोग विकास योजनाओं में किया जा सकता है। इसलिए आवश्यक है कि प्रधानमंत्री ग्रामीण जनता को यह स्पष्टतः समझा दे कि विदेशों में जमा कालाधन जनता के बैंक खातों में आने वाला नहीं है। अगर ये धन देश में आ भी गया, तो विकास कार्यों में तो भले ही खर्च हो जाए। पर उसे निजी हाथों में नहीं सौंपा जा सकता। ऐसा करने से जो उनकी नकारात्मक छवि बन रही है, वो नहीं बनेगी।
 
 गांवों की समस्याएं उनके जीवन और अस्तित्व से जुड़ी हैं। जिनके समाधान हुए बिना ग्रामीण मतदाता प्रभावित होता नहीं दिख रहा। इसीलिए हर चुनाव में वो विपक्षी दल को समर्थन देता है। इस उम्मीद में कि, ‘तू नहीं तो और सही और नहीं तो और सही’। यह सही है कि देशभक्ति का मुद्दा बहुत अहम है। पर उससे भी ज्यादा अहम है गांवों की दशा सुधारना और रोजगार उपलब्ध कराना। जो बिना भारत की वैदिक ग्रामीण व्यवस्था की पुर्नस्थापना के कभी किया नहीं जा सकता। गांधीजी के ग्राम स्वराज का भी यही सपना था। विकास के आयातित मॉडल आजतक विफल रहे हैं। जिनसे देश की बहुसंख्यक आबादी का दुख दूर नहीं किया जा सका है। ऐसा किए बिना केवल देशभक्ति के नारे से विधानसभा चुनावों में वैतरणी पार हो पाएगी, उसमें हमें संदेह लगता है।