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Monday, December 2, 2019

क्या हिंदू और मुसलमान मिलकर नहीं रह सकते ?

हाल ही में रामजन्मभूमि पर आए निर्णंय के बाद देश के बहुसंख्यक मुसलमानों ने जिस शांति और सदभाव का परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। सारी आकांक्षाओं को निर्मूल करते हुए, अल्पसंख्यक समुदाय ने इस फैसले के विरूद्ध कोई भी उग्र प्रदर्शन या हिंसक वारदात न करके, ये बता दिया है कि साम्प्रदायिक वैमनस्य समाज में नहीं होता बल्कि राजनैतिक दलों के दिमाग की साजिश होती है। कोई भी दल इसका अपवाद नहीं है। इतिहास में इस बात के अनेक प्रमाण हैं कि अगर ‘रामजन्भूमि मुक्ति आन्दोलन’ को राजनैतिक रंग न दिया जाता, तो ये मामला तीन दशक पहले सुलझने की कगार पर था। 
दरअसलआम आदमी को अपनी रोजी, रोटी और रोजगार की चिंता होती है। ये चिंता भारत के बहुसंख्यक लोगों को आजादी के 72 वर्ष बाद भी सता रही है। जब पेट भरे होते हैं, तब धर्म और राजनीति सूझती है। जो राजसत्ताऐं अपनी प्रजा की इन बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं कर पातीं, वही धार्मिक उन्माद का सहारा लेती हैं। जिससे जनता असली मुद्दों से ध्यान हटाकर इन सवालों में उलझ जाऐ।

हिंदुस्तान की संस्कृति में, जब से मुसलमान यहां आऐ, तब से दो धाराऐं साथ साथ चली हैं। एक तो वो जिसमें दो विपरीत विचारधाराओं के धर्मावलंबियों ने एक-दूसरे को आत्मसात कर लिया और एक-दूसरे की जीवनशैली, आचार-विचार और रीति-रिवाजों को प्रभावित किया। भारत की बहुसंख्यक जनता इसी मानसिकता की है। ये आजादी के बाद योजनाबद्ध तरीके से पनपाई गई प्रवृत्ति नहीं है। इसकी जड़े सदियों पुरानी है।

मुगलकाल में ही ऐसे सैंकड़ों मुसलमान हुए, जिन्होंने हिंदू संस्कृति को न केवल सराहा, बल्कि अपने को इसमें आध्यात्मिक रूप से ढाल लिया। एक उदाहरण नजीर अकबरावादी का है। जो कहते हैं, ‘‘क्या-क्या कहूँ मैं तुमसे कन्हैया का बालपन, ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन’’। एक दूसरी रचना जिसका शीर्षक है ‘हरि जी सुमिरन’। इसमें वे लिखते हैं ‘‘श्रीकृष्ण जी की याद दिलों जां से कीजिए, ले नाम वासुदेव का अब ध्यान कीजिए, क्या वादा बेखुमार दिलों जां से पीजिए, सब काम छोड़ नाम चतुर्भुज का लीजिए’‘। आम मुसलमान ही नहीं, खुद मुगलिया खानदान की ताज बेगम जो आगरा के महल छोड़कर मथुरा के गोकुल गाॅव में आ बसीं थीं, वो लिखती हैं, ‘‘ नंद के दुलाल कुर्बान तेरी सूरत पे, हूँ तो मुगलानी, हिंदुआनी ह्वै रहुँगी मैं’’। रसखान को किसने नहीं पढ़ा ? ये ब्रजवासी मुसलमान संत लिखते हैं, ‘‘ रसखान कबौं इन नैंनन सौं, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारूँ।...जो पसु हौं तौ कहा बस मेरौ, बसुँ नित्य नन्द के धेनु मझारन’’। ये धारा आज भी अविचल है।

हमारे ब्रज में भगवान की पोशाक बननी हो या बिहारीजी का फूल बंगला या ठाकुरजी की शोभायात्रा में शहनाई वादन-सब काम मुसलमान बड़ी श्रद्धा और भाव से करते हैं। यहां तक कि यहाँ मुसलमान फलवाला आपका अभिवादन भी, ‘‘राधे-राधे’’ कहकर करता है। भारत रत्न बिसमिल्लाह खाँ नमाजी मुसलमान होते हुए भी मैहर की देवी के उपासक थे और उनके मंदिर में बैठकर साधना किया करते थे। दूर क्यों जाऐं, भारत के राष्ट्रपति रहे डाॅ. ऐपीजे कलाम भगवतगीता का नियमित पाठ करते थे रामेश्वरम् में उनके परिवार को आज भी मंदिर से महाप्रसाद का पत्तल रोज मिलता है, क्योंकि उनके पूर्वजों ने जान जोखिम में डालकर एक गहरे सरोवर में से अभिषेक के समय फिसलकर डूब गई, भारी देवप्रतिमा को निकाला था। ये थी उनकी श्रद्धा। मुझे लगता है कि ऐसी भावना वाले मुसलमानों से अगर उदारमना हिंदू प्रेममयी भाषा में निवेदन करें कि वे काशी और मथुरा से भी मस्जिदों को बिना संघर्ष के हटाने को राजी हो जाऐं, तो इसके सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

जो दूसरी धारा बही, वह थी कट्टरपंथी इस्लाम की थी। जिसके प्रभाव में मुसलमान आक्रंाताओं ने हजारों मंदिर तोड़े और हिंदूओं को जबरन मुसलमान बनाया। इसके पीछे धार्मिक उन्माद कम, राजनैतिक महत्वाकांक्षा ज्यादा थी। शासक अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए या प्रजा में भय उत्पन्न करने के लिए इस तरह के अत्याचार किया करते थे। पर ऐसा केवल मुसलमान शासकों ने किया हो यह सच नहीं है। दक्षिण भारत में शैव राजाओं ने वैष्णवों के और वैष्णव राजाओं ने शैवों के मंदिरों को हमलों के दौरान नष्ट किया। इसी तरह हिंदू राजाओं ने बौद्ध मंदिर और विहार भी तोड़े। रोचक तथ्य ये है कि जिन मराठा शासक शिवाजी महाराज ने मुगलों को चने चबवाये, उनके वफादारों में कई योद्धा मुसलमान थे। ठीक वैसे ही जैसे झांसी की रानी का सेनापति एक मुसलमान था। टीपू सुल्तान के वफादार सेना नायकों में कई  हिंदू थे। 

इसलिए एक हजार वर्ष के मुसलमान शासनकाल में भी भारत की बहुसंख्यक आबादी हिंदू ही बनी रही। पर पिछले कुछ दशकों से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कट्टरपंथी इस्लाम को थोपने की एक गहरी साजिश पश्चिमी ऐशिया के कुछ देशों से की जा रही है। जिसका बुरा असर मलेशिया, इंडोनेशिया और टर्की जैसे सैक्युलर मुलसमान देशों की जनता पर भी पड़ने लगा है। इस मानसिकता को हम तालिबानी मानसिकता कह सकते हैं।

चिंता की बात ये है कि हिंदू समाज में भी कुछ तालिबानी प्रवृत्तियां उदय हो रही हैं। जिससे इस्लाम को खतरा हो न हो, हिंदूओं को बहुत  खतरा है। हिंदू परंपरा से उदारमना होते हैं। सम्प्रदायों को लेकर भिड़ते नहीं, बल्कि एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। हमारे दर्शन में निरीश्वरवाद, निर्गुण से सगुण उपासना तक का विकल्प मौजूद है। आपको एक ही परिवार में कोई सगुण उपासक मिलेगा, कोई ध्यानी-ग्यानी और कोई हठयोगी। इन सबका एक छत के नीचे प्रेम से रहना, बताता है कि हम कितने सहजरूप में विविधता को स्वीकार लेते हैं। क्योंकि हम ईसाईयों और मुसलमानों की तरह एक ही ग्रंथ और एक ही पैगम्बर को मानकर उसे दूसरों पर थोंपते नहीं है। यही कारण है कि इकबाल ने लिखा है, ‘‘यूनान रोम मिस्र सब मिट गऐ जहाँ से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा, सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा’’। हमें ऐसा ही हिंदुस्तान बनाना है, जहाँ हम सब मिलकर प्रेम से रहें और आगे बढें।

Monday, November 11, 2019

श्रीराम मन्दिर आंदोलन के प्रणेता याद आते हैं

आज हम हिन्दुओं के सदियों पुराने ज़ख्मों पर मरहम लगा है इस ऐतिहासिक अवसर पर उन हज़ारों सन्तों   भक्तों को हमारी भावभीनी श्र्द्धांजली जिन्होंने पिछली सदियों में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि की मुक्ति के लिए संघर्ष करते हुए अपने प्राणों का बलिदान किया। 

उल्लास के इस इस अवसर पर राम जन्मभूमि मुक्ति के लिए इस वर्तमान आंदोलन को शुरू करने में तीन प्रमुख हस्तियों के योगदान को विशेष रूप से याद करना आवश्यक है  

इस क़तार में सबसे आगे खड़े हैं ; स्वर्गीय श्री दाऊ दयाल खन्ना जी, जो मुरादाबाद से लम्बे समय तक विधायक और श्री चन्द्रभान गुप्ता की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे। उन्होंने सबसे पहले 1983 में एक विस्तृत तार्किक आलेख तय्यार करके तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी को प्रस्तुत किया। जिसमें अयोध्या, काशी और मथुरा को अवैध रूप से बनी मस्जिदों से मुक्त करके भव्य मंदिर बनाने को  हिंदू समाज को सौंपे जाने की माँग की थी। 

इंदिरा जी ने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया तब खन्ना जी ने श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति समिति बना कर इस आंदोलन की शुरुआत 1983 में की और अपने जीवन के अंत तक  कांग्रेसी रहते हुए ही इस आंदोलन से जुड़े रहे जल्दी ही विहिप और बाद में भाजपा  और संघ भी इस आंदोलन से पूरी ऊर्जा के साथ जुड़ गए  

दूसरे महान व्यक्ति जिनके ऐतिहासिक योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता, वो थे प्रातः स्मरणीय विरक्त संत ‘राम जन्मभूमि मुक्ति समिति’ के ‘मार्गदर्शक मंडलके अध्यक्ष श्रद्धेय स्वामी वामदेव जी महाराज। जिन्होंने साधुओं की अपनी विशाल विरक्त मंडली के साथ पूरे भारत के कोने कोने में जाकर सभी साधु संतों को श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनके संदर्भ में एक हृदय विदारक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा जिसकी जानकारी देश में दो चार संतों के अलावा किसी को नहीं है। 

जब अक्तूबर 30,1990 को कार सेवा करने बड़ी श्रद्धा से देश के कोने कोने से अयोध्या पहुँचे लाखों निहत्थे कारसेवकों पर पुलिस ने फ़ाइरिंग करके सैंकड़ों को शहीद कर दिया था तो उस भयानक रात अयोध्या में मौत का सन्नाटा था। गलियों में जहां तहाँ भक्तों के शव बिखरे पड़े थे। ऐसे आतंक के माहौल में आंदोलन के सभी नेता जहां तहाँ छिपे थे। 

पर एक देवता जो सारी रात अकेला उन लाशों के बीच लाठी लेकर घूमता रहा , वो थे बूढ़े, अशक्त और अस्वस्थ श्रद्धेय स्वामी वामदेव जी महाराज। ब्रहम्मुहूर्त में जब वे आश्रम में नहीं दिखे तो घबराहट में साथ के साधुओं ने उनको खोजना शुरू किया तो स्वामी जी गली में लाठी लिये खड़े मिले चौंककर सबने पूछा महाराज ! आप यहाँ क्या कर रहे हैं ?उनका उत्तर सुनकर निश्चय ही आपके  नेत्र सजल हो जाएँगे। वे बोले , “भगवानमैं रात भर इन शहीदों के शवों की रक्षा करता रहा , जिससे गली के कुत्ते इन भक्तों के पवित्र शवों को अपना ग्रास बना सकें 

तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने स्वामी वामदेव जी से तब कहा था, “आप विहिप को छोड़ दीजिए, मैं कल ही आपको राम जन्मभूमि दे दूंगा! “स्वामी जी ने कहाआप लोकसभा मे आज ये घोषणा कीजिए, मैं कल ही विहिप छोड़ दूंगा।” 

नरसिंह राव जी ने एक बार उनसे कहा “आप सुरक्षा गार्ड ले लें।स्वामी जी बोले “गर्भ मे जिसने परीक्षित की रक्षा की थी, वे ही मेरा रक्षक है“। अयोध्या में ढाँचा गिरने के बाद वे सीधे हरिद्वार आए ,उनका कमरा तैयार नहीं था, तो वे मौनी बाबा के तखत पर ही लेट गए। बाबा ने पूछा महाराजआपका काम  अधूरा रह गया मंदिर कब बनेगा ? “ स्वामी वामदेव जी का उत्तर था, “मेरे तीन संकल्प थे; 1. जन्मभूमि से पराधीनता का चिन्ह मिटे। 2. भगवा वस्त्रधारी और श्वेतवस्त्रधारी संप्रदाय के भेद को भूलकर एक मंच पर  जायँ। 3. देश  का हिंदू जाग जाय। राम कृपा  से तीनों संकल्प पूरे हुए, अब मंदिर कब बनेगा ये रामलला जाने।रामलला ने आज ये भी पूरा कर दिया। स्वामी वामदेव जी का चित्र कार सेवकों के हुए नरसंहार की टीवी रिपोर्ट जो हमने 1990 में अयोध्या में बनाई थी उसे कालचक्र को यूटूब (Kalchakra Vol. 3) पर देखा जा सकता है। 

इस क्रम में तीसरा नाम श्री अशोक सिंघल जी का है। जो श्री दाऊ दयाल खन्ना जी से मिलने मुरादाबाद  में उनके घर गए और उनके इस आंदोलन को समर्थन देने का वायदा किया और फिर जीवन के अंत तक श्रीराम मंदिर के लिए लड़ते रहे। 

आज ये तीनों विभूतियाँ निश्चित रूप से भगवान श्री राम के नित्य निवास ‘साकेतधाम’ के पार्षद हैं और वहीं आकाश से इस निर्णय को एकमत से देने वाले सर्वोच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीशों, विशेषकर न्यायमूर्ति श्री रंजन गोगोई और उनके मुसलमान साथी न्यायमूर्ति श्री अब्दुल नज़ीर साहब को आशीर्वाद दे रहे हैं। इस हर्षोल्लास की घड़ी में हम इन तीनों महान विभूतियों सहित ही उन सभी दिव्य भक्तों के श्रीचरणों में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं, जिन्होंने किसी भी रूप में भगवान श्रीराम की जन्मभूमि मुक्ति के इस आंदोलन में थोड़ा सा भी योगदान किया।