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Monday, September 28, 2026

भारत में सच्चे संतों की कमी नहीं!

बाबा नीब करौरी के जीवन के पूर्वार्ध पर बनी फ़िल्म ‘हनुमान अंश’ ने देश-विदेश के सनातनधर्मियों के हृदय को स्पर्श किया है। पिछले हफ़्ते जब थिएटर में मैं ये फ़िल्म देख रहा था तो अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाया और आँखे कई बार छलछला गईं। कारण ये कि नीब करौरी बाबा का तो नहीं पर उन जैसे कुछ संतों का सानिध्य पिछले 28 वर्षों में मुझे निरंतर प्राप्त हुआ है। इन संतों की सहजता, दरिद्र नारायण के प्रति करुणा और अमीर-ग़रीब के बीच कोई फ़र्क़ न करने की प्रवृत्ति ने मुझे बहुत प्रभावित किया। 1998 में जब बरसाना के विरक्त संत श्री रमेश बाबा से मिला तो वे मानगढ़ की पहाड़ी पर एक खण्डहर-नुमा कमरे में रहते थे। जिसमें जून की गर्म दोपहरी में आती गर्म हवा के थपेड़ों को रोकने के लिए खिड़कियों पर फटी बोरियों को भिगो कर टांगा हुआ था। जब बाबा ने मुझे ब्रज की सांस्कृतिक धरोहरों को सजाने संवारने का आदेश दिया तो उन्होंने यह भी कहा कि,
“भगवान दीनबंधु दीनानाथ हैं, धनीबंधु वीआईपीनाथ नहीं। पहले फ़क़ीर बनो, तब ब्रज की सेवा करना।” बाबा के सानिध्य में 2002-05 के बीच मैंने भी ऐसा जीवन जीने का प्रयास किया। बोरी बिछा कर सोना, भिक्षा माँग कर रोटी खाना और बेहद साधारण कपड़े पहनना। पर इतना ही काफ़ी नहीं था। अपने स्वभाव में दीनता लाने का भी अभ्यास करना था। इस तरह बाबा ने अनेक प्रकार से ब्रज सेवा के लिए प्रशिक्षित किया। उनके प्रताप से जो कुछ ब्रज में धरोहरों के जीर्णोद्धार के कार्य हुए वो जग-जाहिर हैं।



इसी तरह बरसाना की पीली पोखर पर रहने वाले विरक्त संत विनोद बाबा भी हैं। जिनके तप, सादगी, करुणा और हृदय की विशालता को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मेरी मित्र मीरा बोरवाँकर जो महाराष्ट्र की चर्चित पुलिस अधिकारी रही और जिसके जीवन पर बॉलीवुड की फ़िल्म ‘मर्दानी’ बनी, वो श्री विनोद बाबा के दर्शन को तैयार नहीं थी। पर मैं उसे ले गया। बाबा को देखते ही वो ऐसी स्तब्ध हुई कि वहाँ उनके सामने घंटों बैठने की इच्छा व्यक्त करने लगी। ‘हनुमान अंश’ के अनेक प्रसंग ऐसे हैं जैसे मैंने उपरोक्त दोनों संतों के जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव किए हैं। ‘संत हृदय नवनीत समाना’। जिस तरह बदल रात में चुपचाप किसान के खेत पर बिना बताए वर्षा करके चले जाते हैं, वैसे ही संत भी हमारे जीवन में अपनी कृपा की वृष्टि अनायास ही करते रहते हैं। गोवर्धन के सियाराम बाबा, वृंदावन के कृपाविलास वाले महाराज, पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद जी महाराज और केरल की संत माता अमृतानंदमयी ‘अम्मा’ के सानिध्य में मुझे ऐसे ही अनेक अनुभव हुए हैं। इन सभी संतों ने मुझ पर अपना वात्सल्य खूब उड़ेला है। इसीलिए ‘हनुमान अंश’ फ़िल्म देखते समय मुझे बार-बार ऐसे प्रसंग याद आ रहे थे और आँसूँ थम नहीं रहे थे। 



सच्चे संत हमारी पात्रता को नहीं देखते, वे तो अहैतुकि कृपा करते हैं। नीब करौरी बाबा का जीवन भी ऐसा ही था।  उन्होंने आडंबर और वैभव रहित सादगी भरा जीवन आम जनमानस के लिए समर्पित किया था। उनके क्रियाकलाप ये सिद्ध करने के लिए काफ़ी हैं कि संत को आपके पद, धन, रुतबे और हैसियत से कुछ लेना-देना नहीं होता। दुर्भाग्य की बात यह है कि आज देश में सनातन धर्म के नाम पर शोर मचाने वाले ऐसे हज़ारों धर्मध्वजी, आत्मघोषित ‘संत’ गुरु, कथावाचक आदि सोशल मीडिया और समाज में छा गए हैं, जिनका आचरण दूर-दूर तक संतों जैसा नहीं है। रंगमंच के कलाकारों के जैसे रंगबिरंगे चमकीले-भड़कीले डिज़ाइनर वस्त्र पहन कर सरकारी सुरक्षाकर्मियों के साये में विशाल पंडालों में श्रोताओं के सम्मुख स्वयं को किसी राजाधिराज की तरह प्रस्तुत करना आम हो गया है। मोह-माया त्यागने का उपदेश देना और स्वयं वैभव युक्त जीवन जीना, सत्ताधीशों के आगे-पीछे मंडराना या उनके सानिध्य में गर्वित होना, अपने ही संसाधनों से मीडिया में स्वयं को ‘परम श्रद्धेय गुरुदेव’ जैसे अलंकारों से प्रचारित करवाना और खुलेआम धर्म का व्यापार करना इनके लिए आम बात है। आम जनता अपने जीवन के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए धर्म की शरण लेती है। पर उन्हें मिलता है ‘ऊँची दुकान और फीका पकवान’। पिछले तीस वर्षों में मैंने इस कॉलम में कई बार लिखा है कि जिसके सम्मुख बैठ कर आपकी भौतिक कामनाएँ समाप्त हो जाएँ और आध्यात्मिक जिज्ञासा का वेग प्रबल हो जाए, वही सच्चा संत है। बाक़ी तो सब धार्मिक मनोरंजन हैं। हमें भगवान या सच्चे संत से कुछ कह कर माँगना नहीं होता। नीब करौरी बाबा की तरह वे स्वयं ही जान लेते हैं कि हमें क्या चाहिए या हमारा भला किसमें है। भगवान श्री कृष्ण भगवद्गीता के 18वें अध्याय के 61वें श्लोक में कहते हैं कि, ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥’ अर्थात् हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। तो उनसे कुछ बोल कर मांगने की क्या ज़रूरत है? 

देश के कोने-कोने में ऐसे सच्चे संतों की कमी नहीं है जो हमें तत्वज्ञान भी करा सकते हैं और हमारी व्यग्रता को भी शांत कर सकते हैं। ऐसे संतों को हमसे धन या संसाधन पाने की अपेक्षा नहीं होती। उन्हें जबरन शिष्य बनाने की इच्छा भी नहीं होती। ऐसे संत तो हमारे लाख बार नाक रगड़ने के बाद भी हमारी पात्रता को देख कर अपना शिष्य स्वीकार करते हैं। आजकल तो देश में थोक में शिष्य बनाने का व्यापार चल रहा है। ‘जैसा गुरु वैसा चेला, दोनों मिलकर ठेलमठेला’। लगभग 500 वर्ष पूर्व महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ब्रज चौरासी कोस यात्रा के दौरान एक जंगल में पड़े विशालकाय अजगर को देख कर ठिठक गए। उस अजगर को हज़ारों चींटियां खा रही थीं। वो दर्द से छटपटा रहा था। महाप्रभु ने वहीं ठहर कर श्रीमद् भगवद् के 108 पाठ करने के निर्णय किया। उनके अचंभित शिष्यों ने इसका कारण पूछा। महाप्रभु ने कहा कि ये अजगर पिछले जन्म में आत्मघोषित गुरु था। इसने हज़ारों लोगों को दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया। पर न तो वो अपना उद्धार कर सका और न ही अपने हज़ारों शिष्यों का। वही शिष्य इस जन्म में ये हज़ारों चींटियाँ बन कर उसका शरीर खा रही हैं। इसलिए कहावत है कि, ‘पानी पीजिए छान कर, गुरु कीजिए जान कर।’
 

Wednesday, March 25, 2026

खाड़ी युद्ध और गौ रक्षा!

खाड़ी के देशों में चल रहा भयानक युद्ध, उससे निरंतर बढ़ता ऊर्जा संकट और वायु में घुलता ज़हर पूरी दुनिया के लिए हर दिन चिंता बढ़ा रहा है। इसका बुरा असर अर्थव्यवस्था और रोज़गार पर भी पड़ रहा है। समस्या भयावय होती जा रही है। हर घर में अनिश्चितता और हताशा बढ़ने लगी है। ऐसे माहौल में भारत के गौ वंश की चर्चा करना शायद आपको अटपटा लगेगा। पर यही वो वक़्त है जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि इस जंजाल में फँस कर हमने क्या खोया और क्या पाया? सनातन हिन्दू संस्कृति में गाय को माँ माना जाता है। धर्म शास्त्र कहते हैं कि गाय में 33 करोड़ देवताओं का वास होता है। गाय का दूध, उससे बना दही, छाछ, पनीर व घी स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। देशी गाय के गोबर और मूत्र के गुण वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो चुके हैं। सदियों से हर सनातनी के घर गौ पालन की प्रथा थी। पर शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने इस परंपरा को बहुत तेज़ी से नष्ट किया है। गौ वंश और कृषि आधारित जीवन आम भारतीय को स्वस्थ और सुखी रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ है। गत 79 वर्षों में हमारी सरकारों ने अगर इस अनुभव का लाभ उठाया होता और आर्थिक विकास के मॉडल को इस तरह दिशा दी होती की गाँव का जीवन आत्मनिर्भर बनता तो शहरीकरण और उससे पैदा हुई हज़ारों चुनौतियाँ आज हमारे सामने मुँह बाय न खड़ी होती। गाँव की लक्ष्मी गाँव में रहती और गाँव का युवा गाँव में ही रोज़गार पाता तो करोड़ों भारतवासियों को गंदी बस्तियों में नारकीय जीवन न जीना पड़ता। 


विगत 12 वर्षों से गौ वंश को लेकर बहुत कुछ बोला, कहा और किया गया है। पर उससे न तो गौ वंश की रक्षा हुई और न ही आम भारतीय को कोई लाभ मिला। एक तरफ़ गौ हत्या के लिए अल्पसंख्यकों को ज़िम्मेदार बता कर उनकी मॉब लिंचिंग की जा रही है और दूसरी ओर भारत दुनिया दूसरा सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश बन चुका है। प्रायः ये प्रचारित किया जाता है कि गौ माता का संरक्षण गौशालाओं में बेहतर होता है और इसके लिए गत 100-150 वर्षों में शहरों में हज़ारों गौशालाएं स्थापित हुई हैं। पर इन गौशालाओं का यथार्थ विवादास्पद है। उन गौशालाओं को छोड़ दें जिन्हें उदारमना संपन्न लोग धर्मार्थ चलते हैं और तन, मन, धन से गौ वंश की सेवा करते हैं।  पर अधिकतर गौशालाएं हमेशा से भ्रष्टाचार का केंद्र रही हैं। सार्वजनिक ज़मीनों पर क़ब्ज़े करके गौशालाएँ बनाना, सेवा के नाम पर मोटे चंदे हड़पना और गौ वंश की उपेक्षा करना, इन गौशालाओं में आम बात है। सबसे ज़्यादा भ्रष्टाचार तो वहाँ होता है जहाँ गौशालाओं को ज़मीन और धन सरकारें उपलब्ध कराती हैं। आज देश में करीब 8000 गौशालाएँ हैं। जिनमें से लगभग 2000 गौशालाएँ ही पंजीकृत हैं। इन गौशालाओं का सालना बजट अरबों रुपये का है। पर इसका लाभ जिन्हें मिलना चाहिए, उन्हें नहीं मिलता। 


मुझे लगता है कि अगर गौ रक्षा के मामले में एक नई और समेकित सोच को केंद्र में रखते हुए विकास का मॉडल तैयार किया जाए तो गौ वंश और भूमिहीन परिवारों का बहुत कल्याण हो सकता है। ये कोरी कल्पना नहीं है। इस दिशा में हमने एक छोटा सा प्रयोग 20 बरस पहले मथुरा में करके देखा था। जिसके सकारात्मक परिणाम आए। हम इसे आगे इसलिए नहीं चला पाए क्योंकि हमारी प्राथमिकता ब्रज के कृष्ण कालीन सरोवरों और वनों को बचाने की थी। ये मॉडल बहुत सरल है। देश के हर गांव में चरागाह की काफ़ी भूमि हुआ करती थी। वोटों की राजनीति ने उसकी बंदरबाँट कर दी। फिर भी देश में 10,210,000 हेक्टर भूमि चरागाहों के लिए उपलब्ध है। जो देश के कुल भौगौलिक क्षेत्र की 3-4 फ़ीसद है। हर गाँव में अनेक भूमिहीन परिवार होते हैं। जिन्हें ‘मनरेगा’ जैसी योजनाएं चला कर, साल के कुछ दिन सरकार रोज़गार देती है। हर ज़िले में और उसके गाँवों में ऐसे तमाम पढ़े-लिखे सक्षम नौजवान हैं जो सामाजिक कार्यों में रुचि लेते हैं। होना यह चाहिए कि गाँव के भूमिहीन परिवारों की समिति बना कर उन्हें चरागाहों की भूमि पर चारा उगाने के काम में लगाया जाए। ये चारा फिर हर उस भूमिहीन परिवार को दिया जाए जिसे दानदाता और सरकार नक़द दान की जगह स्वस्थ देशी नस्ल की गाय निशुल्क उपलब्ध कराए। ये परिवार चरागाह में मेहनत करके आय प्राप्त करे और मुफ्त के चारे से अपने गौ वंश की सेवा करके उसके दुग्ध उत्पादन से अपने परिवार का पालन-पोषण करे और स्वस्थ जीवन जी सके। आज गाँव बच्चों के मुँह में दूध नहीं जाता। गाँव की छोड़िये देश के महानगरों तक में नकली दूध, घी, पनीर आदि का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। हम शहरी लोग ही दूध के नाम पर अपने बच्चों को ज़हर पिला रहे हैं। आज देश में जितना दूध पैदा हो रहा है उससे कई गुना उसकी खपत है। ऐसे में ये बकाया दूध कहाँ से आ रहा है? दूध के नाम पर क्या पिलाया जा रहा है, इसकी चिंता किसी भी सरकार को नहीं है। छापे पड़ते हैं, नक़ली माल पकड़ा जाता है, खबर छपती है और मामले दबा दिए जाते हैं। इसलिए इस पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। 


हमने जब ये प्रयोग मथुरा में किया तो हमने दानदाताओं से कहा कि वे एक गाँव की चरागाह पर चारा उगाने में आर्थिक मदद करें और किसी को गौ सेवा के नाम पर धन का दान न करें। अपेक्षा के विपरीत हमें ऐसे अनेक उदारमना दानदाता मिल गए और उस गाँव के समर्पित नौजवान भी। जिन्होंने इस प्रयोग को सफल बनाने में सहयोग किया। हमारा प्रयोग तो बहुत छोटे स्तर का था। पर आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर और अमरीका में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मोटे वेतन की नौकरियां छोड़ कर कुछ नौजवान मध्य भारत में बहुत बड़े पैमाने पर इस मॉडल पर काम कर रहे हैं। उन्होंने हज़ारों ग़रीबों की ज़िंदगी खुशहाल बना दी और इस प्रक्रिया से उत्पन्न गोबर की खाद से बंजर पड़ी ज़मीनों में फलों के बड़े-बड़े बगीचे लगा दिए हैं। शुरू में उनका उपहास करने वाले और उनके रास्ते में रोड़े अटकाने वाले ताक़तवर लोग, नेता और अफसर अब उनके सामने हथियार डाल चुके हैं और उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। इसलिए असंभव कुछ भी नहीं है। आवश्यकता है एक ईमानदार और उदार सोच की।  

Tuesday, February 10, 2026

सनातन धर्म, चारों शंकराचार्य और हम!

आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः। तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः॥


हमारी सनातन सभ्यता संस्कृति में आचरण को प्रथम स्थान दिया है। आचरण के अभाव में बड़े नाम वाले व्यक्ति या संस्थाएं ही नहीं देवराज इंद्र से लेकर रावण की भी सत्ता चली गई। सनातन-सनातन के नाम का नारा लगाने से हिंदू धर्म को कितना लाभ हुआ है इसका सर्वमान्य निष्कर्ष अभी नहीं निकला है। विशेष रूप से जब हम सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को ही न जानते हों और सनातन-सनातन के नारे लगते रहें पर हमारा व्यक्ति, व्यवस्था व सत्ता के आचरण से कोई लेना-देना नहीं हो तो ये थोथी नारेबाजी ही होगी। इसका सनातन धर्म से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होगा।  


सनातन धर्म ही हिंदू धर्म है। इसके मूल सिद्धांत गहन और सार्वभौमिक हैं। ये सिद्धांत वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, मनुस्मृति और अन्य शास्त्रों से निकले हैं। सनातन धर्म कोई एक किताब या संस्थापक पर आधारित नहीं है, बल्कि यह शाश्वत सत्य की खोज के लिए समर्पित वैयक्तिक और सामाजिक उत्कर्ष को प्राप्त करने के लिए जीवन जीने की व्यवस्था है। ये जाति, वर्ण, भौगोलिक परिस्थिति और देशकाल के आधार पर किसी से भेद नहीं करता।  


सनातन धर्म के सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत मुख्य मूल पहला सिद्धांत हैं: ब्रह्म सत्यं यानि केवल एक परम सत्य है – ब्रह्म या परमात्मा जो निराकार रूप में सर्वव्यापी चेतना है और जीवात्मा से अभिन्न है। ये अद्वैत दर्शन है और द्वैतवाद में परमात्मा साकार रूप में है और वह जीव से एक होकर भी भिन्न हैं। जैसे नमी वायु में सर्वत्र व्याप्त है पर दिखायी नहीं देती। ये उसका निराकार स्वरूप है। जब तापक्रम बहुत गिर जाता है तो यही नमी सघन हो कर ओस, वर्षा, धुंध या बर्फ बनकर दिखने लगती है। ये उसका साकार रूप है। भक्त की भावना जब इतनी प्रबल हो जाती है कि उसे अपने आराध्य को देखे बिना चैन नहीं पड़ता, तब निराकार ब्रह्म साकार रूप धारण करके अपने भक्त को दर्शन देते हैं।  


सनातन धर्म का दूसरा सिद्धांत है: आत्मा अजर-अमर अविनाशी, शाश्वत और जन्म-मृत्यु से परे है। शरीर नश्वर है, आत्मा नहीं। “नैनं छिन्दंति शस्त्राणि…” (गीता 2.20) 


तीसरा कर्म का सिद्धांत है: जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा (कारण-कार्य का नियम) अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा जीवन-दर-जीवन चलता है। 


चौथा है पुनर्जन्म का सिद्धांत यानि संसार चक्र। आत्मा कर्मों के अनुसार बार-बार नए शरीरों में आती रहती है। जन्म-मरण का ये चक्र तब तक चलता है जब तक मोक्ष न मिले। 


पाँचवाँ है मोक्ष या मुक्ति का सिद्धांत: जन्म-मृत्यु के चक्र से पूर्ण मुक्ति, ब्रह्म में लीन होना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है। चार पुरुषार्थों में सबसे ऊँचा लक्ष्य: है मोक्ष, शेष हैं धर्म, अर्थ व काम। 


छठा सिद्धांत है अहिंसा परमो धर्म: अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। मन, वचन, कर्म से सभी प्राणियों में एक ही आत्मा को देखना और किसी के प्रति हिंसा न करना। 


सातवां है: सत्यं वद, धर्मं चर यानि सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। ये महावाक्य ‘तैत्तिरीय उपनिषद’ से लिया गया है। 


आठवाँ सिद्धांत है अपने-अपने धर्म का आचरण करना। धर्म क्या है? कर्तव्य, नैतिकता, न्याय सामाजिक व्यवस्था का आधार है: व्यक्ति, परिवार, समाज और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व। 


नवाँ है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानि समस्त विश्व एक परिवार है इसलिए सर्व प्राणियों में एकत्व की भावना।  


दसवाँ सिद्धांत है: ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। इसलिए शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, सौर अथवा स्मार्त आदि एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।

 

सनातन धर्म के अन्य महत्वपूर्ण सहायक सिद्धांत हैं: पंच महायज्ञ– देव, पितृ, भूत, मनुष्य और ब्रह्म यज्ञ ये दैनिक जीवन में कर्तव्य हैं। यम-नियम से जो पतंजलि योग सूत्र के अनुसार हैं: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि। फिर हैं त्रिगुण यानि: सत्व, रज, तम। प्रकृति के ये तीन गुण जो जीवन को प्रभावित करते संक्षेप में कहें तो सनातन धर्म का सार है: एक परम सत्य की खोज, आत्मा की अमरता को समझना, कर्मों के अनुसार जीवन जीना और अंत में उस सत्य में लीन हो जाना या मोक्ष प्राप्त करना।


यह कोई कठोर नियमावली नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है जो व्यक्ति को स्वतंत्रता देता है कि वह अपने स्वभाव, समय और परिस्थिति के अनुसार अपना मार्ग चुन सके। भक्ति, ज्ञान, कर्म या योग कोई भी रास्ता चुना जा सकता है।


सनातन धर्म को मानने वालों को मार्गदर्शन देने के लिए आदि शंकराचार्य जी ने भारत में चार पीठों की स्थापना की थी। यही चारों शंकराचार्य सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य हैं। इन्हें हज़ारों वर्षों से भगवान शंकर के रूप में पूजा जाता है। सभी संप्रदाय के आचार्य व अनुयायी सदियों से इन्हें अपने गुरु के रूप में पूजते हैं। किंतु आज देश में अनेक छ्द्म अराजक तत्व अपने नाम के पहले स्वघोषित शंकराचार्य नाम लगा कर घूम रहे हैं, जिन्हें कोई शास्त्रीय मान्यता प्राप्त नहीं है। आज सनातन धर्म का दुर्भाग्य देखिए कि स्वयं को उसके ध्वजवाहक होने का भ्रम पालने वाले ही आज अपने सर्वोच्च धर्माचार्यों पर सोशल मीडिया में या सार्वजनिक रूप से मर्यादा विहीन अभद्र टीका टिप्पणी करने की धृष्टता करते हैं। अब जरा सोचिए कि जो लोग सनातन धर्म का नारा लगाते हैं क्या वो इन सिद्धांतों पर चल रहे हैं या इनके विरुद्ध आचरण कर रहे हैं?


भारत की जनता ने सदैव आचरण को ही स्वीकार किया है। मुखौटा अधिक समय तक नहीं रहता है। कितना ही कुशल कलाकार या अभिनेता हो, जनता सब देखती-समझती है।  

Monday, November 4, 2024

त्योहारों की तिथियों में विवाद क्यों?

बीते कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि जब भी कोई त्योहार आता है तो उसकी स्थिति को लेकर काफ़ी विवाद पैदा हो जाते हैं। इन विवादों को बढ़ावा देने में सोशल मीडिया की भूमिका को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसी संदर्भ में आज के लेख का विषय कई पाठकों की उत्सुकता के कारण चुना है। इस दीपावली पर मुझे कई फ़ोन आए और सभी ने इस विषय को छेड़ा और मुझे इस मुद्दे पर लिखने को कहा। मैंने शास्त्र आधारित तथ्यों पर वृंदावन में जानकारों से चर्चा की। उन विद्वानों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं। 


कई वर्षों के अनुभवी और ज्योतिष व कर्मकांड के विशेषज्ञ आचार्य राजेश पांडेय जी का कहना है कि, इसका मुख्य कारण है भारत की भौगोलिक स्थिति। सूर्योदय और सूर्यास्त होने के समय में अंतर होने से तिथियों का घटना व बढ़ना हो जाता है। इससे त्योहार मनाने का समय बदल जाता है। कहीं पर वही त्योहार पहले मनाया लिया जाता है और कहीं पर बाद में। इसके साथ ही एक अन्य कारण है पंचांग का गणित भेद। कुछ पंचांगकर्ता ‘सौर पंचांग’ के अनुसार गणित रचना कर त्योहारों को स्थापित करते हैं। लेकिन अधिकतर अनन्य पंचांग द्रिक पद्धति से देखे जाते हैं। इसीलिए त्योहारों में मतेकता नहीं हो पाती है। 



सौर पंचांग एक ऐसा कालदर्शक है जिसकी तिथियां ऋतु या लगभग समतुल्य रूप से तारों के सापेक्ष सूर्य की स्पष्ट स्थिति को दर्शाती हैं। ग्रेगोरी पंचांग, जिसे विश्व में व्यापक रूप से एक मानक के रूप में स्वीकार किया गया है, सौर कैलेंडर का एक उदाहरण है। पंचांग के अन्य मुख्य प्रकार चन्द्र पंचांग और चन्द्रा-सौर पंचांग हैं, जिनके महीने चंद्रकला के चक्रों के अनुरूप होते हैं। ग्रेगोरियन कैलेंडर के महीने चन्द्रमा के चरण चक्र के अनुरूप नहीं होते।


इसके अलावा त्योहारों की तिथि के भेद का एक अन्य कारण संप्रदाय भेद भी है। विभिन्न संप्रदायों में मतभेद के पीछे कई कारण हैं। संप्रदायों में विभिन्नता या ज़िद्द के कारण भी त्योहारों की तिथि में अंतर आने लग गये हैं। एक संप्रदाय दूसरे संप्रदाय की तिथि से अक्सर अलग ही तिथि की घोषणा कर देता है और उस संप्रदाय को मानने वाले आँख मूँद कर उसका पालन करते हैं। इसके साथ ही संप्रदायों में धृष्टता होना भी एक कारण माना गया है। कई मठ-मंदिर आदि के मानने वाले इतने कट्टर होते हैं कि वे अपने मठाधीशों के फ़रमान के अनुसार ही त्योहारों को मनाने की ठान लेते हैं। फिर वो चाहे पंचांग आधारित हो या स्वयंभू सद्गुरुओं या जगद्गुरुओं की सुविधानुसार हो, उसी का पालन किया जाता है।      

 


इन सबसे हट कर एक और अहम कारण है सोशल मीडिया पर चलने वाला अधपका ‘ज्ञान’। ह्वाट्सऐप यूनिवर्सिटी द्वारा बाँटे जा रहे इस ज्ञान ने भी तिथि विवाद की आग में घी डालने का काम किया है। अधपके ज्ञान को इस कदर फॉरवर्ड किया जाता है कि मानो वही वास्तविक और शास्त्र आधारित तथ्य हो। इतना ही नहीं एक घर परिवार में भी इस सोशल मीडिया की महामारी ने ऐसा असर किया है कि बाप-बेटे में ही विवाद उत्पन्न हो चले हैं। जबकि इस विवाद और ऐसे अन्य विषयों पर विवाद पैदा होने के पीछे ‘भेड़-चाल’ प्रवृत्ति एक मूल कारण है। किसी भी स्थिति में अधपके ज्ञान और संदेश को सत्य मन लेना नासमझी ही कहलाती है। वहीं यदि हम तथ्यों पर आधारित प्रमाणों को माने तो अधपके ज्ञान से बच सकते हैं। 



तिथियों के विवाद को लेकर विद्वानों का मानना है कि सौर पंचांग को मानने वाले इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जिस रात्रि में दीपावली मिलती है वे उसी के अनुसार दीपावली मनाएँगे। वहीं द्रिक पद्धति और धर्म शास्त्र के अनुसार जिस तिथि में सूर्योदय हुआ है और उसी तिथि में सूर्यास्त हुआ है तो वह तिथि संपूर्ण मानी जाती है। परंतु जहां पर दो अमावस्या पड़ रहीं हों, तो धर्मशास्त्र के अनुसार परे विग्राहिया का पालन करना चाहिये । यदि दो अमावस्या परदोष को स्थापित हो रही हैं तो प्रथम दिवस की अमावस्या को छोड़ कर दूसरे दिन की अमावस्या को ही मानना चाहिए। 



देखा जाए तो शास्त्रों के अनुसार दीपावली का अर्थ केवल नए कपड़े पहनना, मिठाई बाँटना, दीपोत्सव और आतिशबाजी ही नहीं है। दीपावली पितरों के स्वर्ग प्रस्थान का पर्व है और हम दीपक इसलिए प्रज्ज्वल्लित करते हैं ताकि पितरों का मार्ग प्रकाशित हो सके पद्म-पुराण के उत्तर खण्ड में दीपावली का वर्णन है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में एकादशी से अमावस्या तक दीप जलाने का विशेष उल्लेख किया गया है। इन पाँच दिनों में भी अन्तिम दिन को वहाँ विशेष महत्त्वपूर्ण माना गया है। इसके महात्म्य में इसे पितृ कर्म मानते हुए कहा गया है कि स्वर्ग में पितर इस दीप-दान से प्रसन्न होते हैं। 


ज्वलते यस्यसेनानीरश्वमेधेन तस्य किम् । 

तेनेष्टं क्रतुभिः सर्वैः कृतं तीर्थावगाहनम् ॥ 

पितरश्चैव वाञ्छन्ति सदा पितृगणैर्वृतः। 

भविष्यति कुलेऽस्माकं पितृभक्तः सुपुत्रकः॥ 

कार्तिके दीपदानेन यस्तोषयति केशवम् । 

घृतेन दीपको यस्य तिलतैलेन वा पुनः ॥ 


कार्तिक मास के इन दिनों में सूर्यास्त के बाद रात्रि में घर, गोशाला, देवालय, श्मशान, तालाब, नदी आदि सभी स्थानों पर घी और तिल के तेल से दीप जलाने का महत्व है। ऐसा करने से दीप जलाने वाले के उन पितरों को भी मुक्ति मिलती है जिन्होंने पापाचरण किया हो या जिनका श्राद्ध उचित ढंग से नहीं हुआ हो। 

पापिनः पितरो ये च ये च लुप्तपिण्डोदकक्रियाः

तेऽपि यान्ति परां मुक्तिं दीपदानस्य पुण्यतः ॥


दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली प्रेतचतुर्दशी उत्तर भारत में व्यापक रूप से मनाई जाती है। वर्षक्रियाकौमुदी में उद्धृत एक कथा के अनुसार, एक धार्मिक व्यक्ति को तीर्थ यात्रा के दौरान पाँच प्रेत मिले, जो भयंकर कष्ट में थे। प्रेतों ने उसे बताया कि वे उन घरों में रहते हैं जहां गंदगी फैली हो, सामान बिखरा हो, झूठे  बरतन हों और लोग शोक व गंदगी में डूबे हों। इस कथा का उद्देश्य लोगों को स्वच्छता और सकारात्मक वातावरण बनाए रखने की शिक्षा देना है।


कुल मिलाकर यह कहना सही होगा कि हमारे शास्त्रों में हर त्योहार के पीछे जो आधार हैं स्थापित हैं उन्हें सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर संशोधन करना सही नहीं है। इसलिए फिर वो चाहे पंचांग भेद हो या संप्रदाय भेद हो इनका समाधान निकालना है तो सभी संप्रदायों और विभिन्न पंचांग पद्धति के मानने वालों को एकजुट हो कर ही इसका हल निकालना होगा नहीं तो हर वर्ष इसी तरह के विवाद होते रहेंगे। 

Monday, May 22, 2023

प्रश्न सनातन धर्म का ?


2024 का चुनाव सामने है। आरएसएस व भाजपा हिंदुत्व के एजेंडा पर ज़ोर-शोर से काम कर रही है। पहले ‘तशकान्त फ़ाइल्स’ फिर ‘कश्मीर फ़ाइल्स’ और अब ‘द केरल स्टोरी’ जैसी फ़िल्में योजना बद्ध तरीक़े से जारी की जा रही हैं और प्रधान मंत्री से लेकर मुख्य मंत्रियों तक ने इन फ़िल्मों को प्रचारित करने का जिम्मा ले लिया है। इन फ़िल्मों पर मनोरंजन कर से मुक्ति व प्रायोजित शो करवाकर दर्शकों को ये फ़िल्में दिखलाई जा रही है। जिसका एकमात्र लक्ष्य वोटों का ध्रुवीकरण करना है। आम भावुक दर्शक इन फ़िल्मों की पटकथा से निश्चित रूप से प्रभावित हो रहे हैं। ऐसी अभी कई फ़िल्में 2024 तक और जारी होंगी। इसके साथ ही नया संसद भवन और अयोध्या में श्री राम मंदिर बन कर तैयार होगा, जिसे बहुत आक्रामक मार्केटिंग नीति के तहत पूरी तरह भुनाया जाएगा।
 


बहुत से लोग देश-विदेश से संदेश भेज कर मुझ से मेरी राय पूछ रहे हैं। मैंने सोशल मीडिया पर उत्तर दिया कि, इसमें जो दिखाया है वो सत्य है। पर 32,000 लड़कियाँ बता कर प्रचार खूब किया। जब प्रमाण माँगे गये तो केवल 3 केस सामने आए। उसमें भी हिंदू लड़की केवल एक ही निकली। 



महिलाओं के साथ ऐसे अत्याचार सदियों से हर देश में  हर धर्म के लोग करते आये हैं। बीजेपी के मंत्री या नेताओं के भी किए व्यभिचार, बलात्कार और हत्याओं के मामले प्रायः सामने आते रहते हैं। उन पर कोई द रेप स्टोरी  क्यों नहीं बनती? उन खबरों को क्यों दबवा दिया जाता है? इसी तरह हर राजनीतिक दल के आपराधिक छवि वाले नेता, इस तरह के अपराधों में लिप्त रहते हैं। 


पर जो फ़िल्में आजकल बनवाई जा रही हैं वे एकतरफ़ा हैं, भड़काऊ हैं और अपने वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिये राजनैतिक उद्देश्य से बनवायी गयी हैं। इनमें विषय संबंधी सभी तथ्यों को नहीं दिखाया जाता। जैसे कश्मीर फ़ाइल्स में ये नहीं दिखाया गया कि कश्मीर के आतंकवादियों ने आजतक कितने मुसलमानों की भी उसी तरह हत्याएँ कीं हैं और आज भी कर रहे हैं।


मेरी उपरोक्त टिप्पणी पर अधिकतर प्रतिक्रिया समर्थन में आईं। पर कुछ मशहूर लोगों ने, जो आजकल भाजपा के साथ खड़े हैं, ने मुझे याद दिलाया कि महिलाओं के प्रति अत्याचार के मामलों को कट्टरपंथी अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों द्वारा किए जा रहे सुनियोजित अभियान से तुलना नहीं की जा सकती। उनका यह भी कहना है कि ग़ैर भाजपाई सरकारों में मुसलमानों की आक्रामकता बढ़ जाती है और हिन्दुओं पर अत्याचार भी बढ़ जाते हैं। भाजपा की आई टी सेल 13 तारीख़ से हिंदुओं को कांग्रेस सरकार से डराने में जुट गयी है। ऐसी पोस्ट आ रही हैं, “कर्नाटक में कांग्रेस के जीतने पर हिंदुओं के उपर हमले भी शुरू हो गए। क्योंकि जिहादियों को पता है अब इनकी सरकार है इसलिए अब इन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी । 



फ्री के चक्कर में हिन्दुओं ने जिहादियों की सरकार को जिता दिया। अब आने वाले पूरे 5 वर्षों तक हिन्दूओं के साथ यही सब होने वाला है; पलायन, लव जिहाद, भू जिहाद, धर्मान्तरण, जैसी गंभीर समस्याओं से हिन्दुओं को सामना करना पड़ेगा। कांग्रेस को जिता कर हिन्दुओं ने अपनी आज़ादी, शांति के अवसर खो दिया। अब भुगतो हिंदुओ”। भाजपा की आईटी सेल का ये एजेंडा बहुत ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित किया जा रहा है। पर ऐसा नहीं है कि इन आरोपों में तथ्य नहीं हैं। चुनाव जीतने के लिए सांप्रदायिक या जातिगत तुष्टिकरण करने में कोई राजनैतिक दल पीछे नहीं रहता। भाजपा भी नहीं, और उसी का परिणाम है कि चुनाव जीतने के बाद सत्तारूढ़ दल को अनेक विवादास्पद मामलों में यात ओ अपने आँख और कान बंद करने पड़ते हैं या समझौते करने पड़ते हैं।  जिसका भरपूर प्रचार करके विरोधी दल फ़ायदा उठाते हैं। 



जो लोग अंतर्राष्ट्रीय इस्लामिक आतंकवाद से लड़ने और भारत की सनातन हिन्दू संस्कृति को बचाने के लिए केवल भाजपा और आरएसएस को ही सक्षम विकल्प मानते हैं उनसे मेरा कोई बहुत मतभेद नहीं रहा है। पर विगत वर्षों के अनुभव ने, अनेक घटनाओं व कारणों से भाजपा व संघ की क्षमता के बारे में संदेह पैदा कर दिये हैं। ये दोनों संगठन आजतक इस बात को परिभाषित नहीं कर पाए कि हिंदू राष्ट्र से इनका आश्रय क्या है? ये कैसा हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं? जिस सनातन संस्कृति का हम सब हिंदू दंभ भरते हैं उसके किसी भी सिद्धांत, शास्त्र, परंपराओं व आस्थाओं से संघ और भाजपा का दूर-दूर तक नाता नहीं है। वैदिक शास्त्रों की उपेक्षा, प्राण प्रतिष्ठित  देव विग्रहों व देवालयों पर बुलडोज़र चलाना, गौ मांस के व्यापार को प्रोत्साहित करना, सनातन धर्म के मूलाधार - चारों शंक्राचार्यों की उपेक्षा करना, वेतन दे कर संन्यासी बनाना, करोड़ों रुपये के चढ़ावे वाले मंदिरों पर अपने ट्रस्ट बना कर क़ब्ज़े करना और पारंपरिक सेवायतों को बेदख़ल करना, सनातन धर्म और तीर्थों की निष्ठा से सेवा करने वालों को अपमानित और हतोत्साहित करना क्या उचित है? इन सब धर्म-विरोधी कृत्यों को करने वाले क्या तालिबानियों से भिन्न आचरण कर रहे हैं? फिर हम जैसे आम सनातन धर्मियों से ये अपेक्षा क्यों की जाती है कि हम किसी दल या संगठन की राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए अपने आँख-कान बंद करके भेड़ों की तरह पीछे-पीछे चलें? 


चालीस बरस पहले जब मैंने पत्रकारिता शुरू की थी तब भाजपा के दो ही बड़े नेता होते थे; अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी। तब आरएसएस को एक त्यागी, समाजसेवी व तपस्वियों का संगठन माना जाता था। बाद में श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जब भाजपा कि पकड़ हिंदू मतदाताओं पर बढ़ी तो नारा दिया गया, ‘पार्टी विद् ए डिफरेंस’ यानी मेरी क़मीज़ बाक़ी दलों की क़मीज़ से ज़्यादा साफ़ है। पिछले दशक में हर वो राजनेता जिसके ख़िलाफ़ भाजपा ने भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगाए, वो सब आज उसके साथ मिल कर सरकार चला रहे हैं या भाजपा में शामिल हो गये हैं। इसलिए महंगाई, ग़रीबी, बेरोज़गारी, शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, अपराधियों को राजनैतिक संरक्षण, अपनी कार्यप्रणालियों में पारदर्शिता का अभाव और जनता के प्रति जवाबदेही से बच कर शासन चलाने के कारण सत्तारूढ़ दल को विपक्ष की जो आलोचना झेलनी पड़ती है, उन विषयों को अगर हम न छुएँ तो भी सनातन धर्म को लेकर जो प्रश्न यहाँ उठाए हैं उनका तो उत्तर मिलना चाहिए।     

Monday, February 6, 2023

शालिग्राम शिला तराशी नहीं जाती


अगर आस्था और श्रद्धा के बिना सत्ता पाने के उद्देश्य से व वोट बटोरने के लिए धर्म में राजनीति का प्रवेश हो तो ये कितना घातक हो सकता है इसके उदाहरण पिछले कुछ वर्षों से निरंतर देखने को मिल रहे हैं। जिससे संत और भक्त समाज बहुत व्यथित हैं। पर सत्ता के अहंकार में सत्ताधीश किसी की भावना और आस्था की कोई परवाह नहीं करते। फिर वो चाहे किसी भी धर्म के झंडाबरदार होने का दावा क्यों न करें।
 


ताज़ा विवाद अयोध्या के श्री राम मंदिर के लिए प्रभु श्री राम और सीता माता की मूर्ति निर्माण के लिए नेपाल से लाई गयीं विशाल शिलाओं के कारण पैदा हुआ है। वैदिक शास्त्रों को न मानने वाले राष्ट्रीय स्वयं संघ व भाजपा का नेतृत्व हिंदू भावनाओं का नक़दीकरण करने के लिये अपने मनोधर्म से नई-नई नौटंकियाँ करते रहते हैं। जिन शिलाओं को इतने ताम-झाम, ढोल-ताशे और मीडिया प्रचार के साथ नेपाल से अयोध्या लाया गया है उन शिलाओं को शालिग्राम बता कर उनका सारे रास्ते पूजन करवाया गया। पर अयोध्या पहुँचने पर अयोध्या का संत समाज इसके विरुद्ध खड़ा हो गया है। संत आहत हैं और आक्रोशित हैं। क्योंकि शास्त्रों के अनुसार शालिग्राम की शिला साक्षात विष्णु जी का स्वरूप मानी गई है। देवी भागवत पुराण, शिव पुराण व ब्रह्म वैयवर्त आदि पुराणों में शालिग्राम शिला की विधिवत सेवा व पूजा का विवरण आता है। इसलिए शालिग्राम शिला पर कभी भी छैनी-हथौड़ी नहीं चलाई जा सकती। ये घोर अपराध है। इसलिए अयोध्या के संतों ने घोषणा कर दी है कि वे इन शिलाओं पर छैनी-हथौड़ी नहीं चलने देंगे। 

दूसरी ओर एक विवाद यह है कि ये शिलाएँ शालिग्राम की हैं ही नहीं। क्योंकि शालिग्राम की शिलाओं का आकार प्रायः काफ़ी छोटा होता है। जिन्हें हथेली पर धारण किया जा सकता है। वैसे बड़ी शिलाएँ भी होती हैं। इन शिलाओं पर भगवान विष्णु से संबंधित अनेक चिन्ह अंकित होते हैं। जैसे शंख, चक्र, गदा व पद्म आदि। इसके अलावा इन शिलाओं के रूप, रंग और आकार-प्रकार के अनुरूप इनके विविध नाम भी होते हैं। जैसे दशावतार के नामों पर आधारित दस तरह की शालिग्राम शिलाएँ नेपाल की काली गण्डकी नदी के तल में पाई जाती  हैं। इसके अलावा इन शिलाओं के अन्य नाम व प्रकार भी होते हैं जैसे: केशव, हैयग्रीव, हिरण्यगर्भ, चतुर्भुज, गदाधार, नारायण, लक्ष्मीनारायण, रूपनारायण, माधव, गोविंद, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, श्रीधर, पद्मनाभ, दामोदर, सुदर्शन व वासुदेव आदि। अब जिन विशाल शिलाओं को शालिग्राम बता कर नेपाल से अयोध्या लाया गया है वे शास्त्रों के अनुसार किस श्रेणी के अन्तर्गत आती हैं यह बताने का दायित्व भी श्रीराम मंदिर निर्माण समिति के सदस्यों का है। 

अगर ये शिलाएँ शालिग्राम की नहीं हैं केवल गण्डकी नदी के किनारे उपलब्ध पत्थर मात्र ही हैं तो इन्हें शालिग्राम बता कर हिंदुओं को क्यों मूर्ख बनाया जा रहा है? अगर ये शालिग्राम हैं तो फिर इन्हें तराश कर मूर्ति बनाना घोर पाप कर्म होगा। 

गोवर्धन की तलहटी में पौराणिक संकर्षण कुंड पर संकर्षण भगवान के 34 फुट ऊँचे काले ग्रेनाइट के विशाल विग्रह के निर्माण का निर्णय 2016 में जब द ब्रज फाउंडेशन ने लिया तो उसके वरिष्ठ अधिकारी आंध्र प्रदेश में स्थित तिरूपति देवस्थान गये। वहाँ शास्त्रानुसार प्रशिक्षित 22 योग्य शिल्प-शास्त्रियों के नेतृत्व में तिरुमाला की पहाड़ियों पर विष्णुतत्व की 50 टन की एक विशाल शिला को खोज कर बड़ी-बड़ी क्रेनों की मदद से उसे पहाड़ों से नीचे लाए। वहाँ तिरूपति में उन योग्य शिल्प शास्त्रियों ने संकर्षण भगवान या बलराम जी के दिव्य विग्रह का एक वर्ष तक निर्माण किया। जिन्हें फिर ट्रेलर पर लाद कर तिरूपति से गोवर्धन (मथुरा) लाया गया। 

यहाँ ये  उल्लेख इसलिए आवश्यक है क्योंकि तिरुमाला की पहाड़ियों पर लक्ष्मी तत्व और विष्णु तत्व की विशाल शिलाएँ पाई जाती हैं। उन्हीं को तराश कर लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम या राधा-कृष्ण के विग्रहों का निर्माण किया जाता है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्यों को शायद इस तथ्य की जानकारी नहीं थी। अगर होती तो नाहक ये विवाद न खड़ा होता। क्योंकि तब सही शिलाएँ तिरूपति से आ जाती। 

वृंदावन के 500 वर्ष पुराने सुप्रसिद्ध श्री राधारमण मंदिर में भगवान राधा-रमण जी का जो छोटा सा सुंदर विग्रह है वो श्री चैतन्य महाप्रभु के शिष्य गोपाल भट्ट गोस्वामी जी की अर्चित शालिग्राम शिला से स्वप्रकट विग्रह है। उसे छैनी-हथौड़ी से तराशा नहीं गया है। मंदिर के सेवायत गोस्वामीगण बताते हैं कि शालिग्राम जी की शिला पर अगर छैनी-हथौड़ी चले तो वह फ़ौरन टूट कर बिखर जाती है। अगर ये बात सही है तो फिर नेपाल से आई उन विशाल शिलाओं पर जब छैनी-हथौड़ी चलेगी तो वे टूट कर बिखर जाएँगी। यदि ऐसा नहीं होता तो फिर ये दावा ग़लत सिद्ध होगा कि वे शालिग्राम की शिलाएँ हैं। 

श्री राम मंदिर निर्माण की पूरी यात्रा भाजपा की सत्तालोलुपता से गुथी रही है। पिछले तीन दशकों में भाजपा और संघ परिवार ने नये-नये शगूफ़े छोड़ कर हिंदू भावनाओं को भड़काने और वोट भुनाने का बार-बार काम किया है। चाहे वो शिला पूजन हो और चाहे मंदिर के लिए चंदा उघाने का। 

जबकि दूसरी तरफ़ तेलंगाना के मुख्य मंत्री के चंद्रशेखर राव ने मात्र चार वर्षों में, बिना किसी से चंदा उगाहे, शास्त्रानुसार, यादगिरी गुट्टा में पौराणिक लक्ष्मी-नरसिंह देव गुफा पर तिरूपति बाला जी जैसा विशाल मंदिर और उसके चारों ओर वैदिक नगर बसा दिया। मुख्य मंत्री केसीआर का हर काम चाहे निजी हो या सार्वजनिक बड़े भव्य स्तर पर शास्त्र पारंगत पुरोहितों और आचार्यों के निर्देशन में वैदिक अनुष्ठानों से प्रारंभ होता है। पर इसका वे कोई प्रचार नहीं करते। उनका कहना है कि भगवान के प्रति श्रद्धा और धार्मिक अनुष्ठानों में विश्वास, दिखावे की, प्रचार की या राजनैतिक लाभ लेने की क्रिया नहीं होती। ये तो भगवत कृपा प्राप्त करने और अपनी आध्यात्मिक चेतना को विकसित करने के लिये आस्था होती है। पर संघ और भाजपा ने धर्म का ऐसा राजनीतीकरण किया है कि न तो उन्हें प्राण प्रतिष्ठित देव विग्रहों पर अयोध्या और काशी में बुलडोज़र चलाने में कोई संकोच होता है और न ही गोवर्धन (मथुरा) संकर्षण भगवान के प्राण प्रतिष्ठित विग्रह को पाँच वर्षों से मल-मूत्र से घिरे जलाशय में उपेक्षित खड़ा रखने में। फिर भी दावा यह कि ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’।     

Monday, January 30, 2023

मिस्र की प्राचीन संस्कृति और कट्टरपंथी हमले के नुक़सान


हम भारतीय अपनी प्राचीन संस्कृति पर बहुत गर्व करते हैं। बात-बात पर हम ये बताने कि कोशिश करते हैं कि जितनी महान हमारी संस्कृति है, उतनी महान दुनिया में कोई संस्कृति नहीं है। निःसंदेह भारत का जो दार्शनिक पक्ष है, जो वैदिक ज्ञान है वो हर दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन अगर ऐतिहासिक प्रमाणों की दृष्टि से देखा जाए तो हम पायेंगे कि भारत से कहीं ज़्यादा उन्नत संस्कृति दुनिया के कुछ दूसरे देशों में पायी जाती है।
 

पिछले तीन दशकों में दुनिया के तमाम देशों में घूमने का मौक़ा मिला है। आजकल मैं मिस्र में हूँ। इससे पहले यूनान, इटली व अब मिस्र की प्राचीन धरोहरों को देखकर बहुत अचम्भा हुआ। जब हम जंगलों और गुफ़ाओं में रह रहे थे या हमारा जीवन प्रकृति पर आधारित था। उस वक्त इन देशों की सभ्यता हमसे बहुत ज्यादा विकसित थी। हम सबने बचपन में मिस्र के पिरामिडों के बारे में पढ़ा है।पहाड़ के गर्भ में छिपी तूतनख़ामन की मज़ार के बारे में सबने पढ़ा था। यहाँ के देवी-देवता और मंदिरों के बारे में भी पढ़ा। पर पढ़ना एक बात होती है और मौक़े पर जा कर उस जगह को समझना और गहराई से देखना दूसरी बात होती है।


अभी तक मिस्र में मैंने जो देखा है वो आँखें खोल देने वाला है। क्या आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि आज से 5,500 साल पहले, क़ुतुब मीनार से भी ऊँची इमारतें, वो भी पत्थर पर बारीक नक्काशी करके, मिस्र के रेगिस्तान में बनाई गयीं। उनमें देवी-देवताओं की विशाल मूर्तियाँ स्थापित की गईं। हमारे यहाँ मंदिरों में भगवान की मूर्ति का आकर अधिक से अधिक 4 से 10 फीट तक ऊँचा रहता है। लेकिन इनके मंदिरों में मूर्ति 30-40 फीट से भी ऊँची हैं। वो भी एक ही पत्थर से बनाई गयीं हैं। दीवारों पर तमाम तरह के ज्ञान-विज्ञान की जानकारी उकेरी गई है। फिर वो चाहे आयुर्वेद की बात हो, महिला का प्रसव कैसे करवाया जाए, शल्य चिकित्सा कैसे हो, भोग के लिये तमाम व्यंजन कैसे बनाए जाएँ, फूलों से इत्र कैसे बनें, खेती कैसे की जाए, शिकार कैसे खेला जाए। हर चीज़ की जानकारी यहाँ दीवारों पर अंकित है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इसे सीख सकें। इतना वैभवशाली इतिहास हैं मिस्र का कि इसे देख पूरी दुनिया आज भी अचंभित होती है। 


फ़्रांस, स्वीडन, अमरीका और इंग्लैंड के पुरातत्ववैत्ताओं व इतिहासकारों ने यहाँ आकर पहाड़ों में खुदाई करके ऐसी तमाम बेशुमार चीज़ों को इकट्ठा किया है।सोने के बने हुए कलात्मक फर्नीचर, सुंदर बर्तन, बढ़िया कपड़े, पेंटिंग और एक से एक नक्काशीदार भवन। अगर उस वक्त की तुलना भारत से की जाए तो भारत में हमारे पास अभी तक जो प्राप्त हुआ है वो सिर्फ़ हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की संस्कृति के अवशेष है। हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की संस्कृति में जो हमें मिला है वो केवल मिट्टी के कुछ बर्तन, कुछ सिक्के, कुछ मनके और ईंट से बनी कुछ नींवें, जो भवनों के होने का प्रमाण देती हैं। लेकिन वो तो केवल साधारण ईंट के बने भवन हैं। यहाँ तो विशालकाय पत्थरों पर नक़्क़ाशी करके और उन पर आजतक न मिटने वाली रंगीन चित्रकारी करके सजाया गया है। इनको यहाँ तक ढोकर कैसे लाया गया होगा, जबकि ऐसा पत्थर यहाँ पर नहीं होता था? कैसे उनको जोड़ा गया होगा? कैसे उनको इतना ऊँचा खड़ा किया गया होगा जबकि उस समय कोई क्रेन नहीं होती थी? ये बहुत ही अचंभित करने वाली बात है।

किंतु इस इतिहास का एक नकारात्मक पक्ष भी है। हर देश काल में सत्ताएँ आती-जाती रहती हैं और हर नई आने वाली सत्ता, पुरानी सत्ता के चिन्हों को मिटाना चाहती है। क्योंकि नई सत्ता अपना आधिपत्य जमा सके। यहाँ मिस्र में भी यही हुआ। जब मिस्र पर यूनान का हमला हुआ, रोम का हमला हुआ या जब अरब के मुसलमानों का हमला हुआ तो सभी ने यहाँ आ कर यहाँ के इन भव्य सांस्कृतिक अवशेषों का विध्वंस किया। उसके बावजूद भी इतनी बड़ी मात्रा में अवशेष बचे रह गए या दबे-छिपे रह गये, जो अब निकल रहे हैं। यही अवशेष मिस्र में आज विश्व पर्यटन का आकर्षण बने हुए हैं। दुनिया भर से पर्यटक बारह महीनों यहाँ इन्हें ही देखने आते हैं। इन्हें देख कर दांतों तले उँगली दबा लेते हैं। इसी का नतीजा है कि आज मिस्र की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आधार पर्यटन उद्योग ही है। 

परंतु जो धर्मांध या अतिवादी होते हैं, वो अक्सर अपनी मूर्खता के कारण अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। आपको याद होगा कि 2001 में अफ़ग़ानिस्तान के बामियान क्षेत्र में गौतम बुद्ध की 120 फीट ऊँची मूर्ति को तालिबानियों ने तोप-गोले लगाकर ध्वस्त किया था। विश्व इतिहास में ये बहुत ही दुखद दिन था। आज अफ़ग़ानिस्तान भुखमरी से गुज़र रहा है। वहाँ रोज़गार नहीं है। खाने को आटा तक नहीं है। अगर वो उस मूर्ति को ध्वस्त न करते। उसके आस-पास पर्यटन की सुविधाएँ विकसित करते, तो जापान जैसे कितने ही बौद्ध मान्यताओं वाले देशों के व दूसरे करोड़ों पर्यटक वहाँ साल भर जाते और वहाँ की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान करते। 

जब अरब मिस्र में आए तो उन्होंने सभी मूर्तियों के चेहरों ध्वस्त करना चाहा। क्योंकि इस्लामिक देशों में बुतपरस्ती को बुरा माना जाता है। जहाँ-जहां वे ऐसा कर सकते थे उन्होंने छैनी हथौड़े से ऐसा किया। लेकिन आज उसी इस्लाम को मानने वाले मिस्र के मुसलमान नागरिक उन्हीं मूर्तियों को, उनके इतिहास को, उनके भगवानों को, उनकी पूजा पद्धति को दिखा-बता कर अपनी रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं। फिर वो चाहे लक्सर हो, आसवान हो, अलेक्ज़ेंडेरिया हो या क़ाहिरा हो, सबसे बड़ा उद्योग पर्यटन ही है। आज मिस्र के लोग उन्हीं पेंटिंग और मूर्तियों के हस्तशिल्प में नमूने बनाकर, किताबें छाप कर, उन्हीं चित्रों की अनुकृति वाले कपड़े बनाकर, उन्हीं की कहानी सुना-सुनाकर उससे कमाई कर  रहे हैं। 

अब मथुरा का ही उदाहरण ले लीजिए। मथुरा में काम कर रही संस्था द ब्रज फ़ाउंडेशन ने पिछले बीस वर्षों में पौराणिक व धार्मिक महत्व वाली दर्जनों श्रीकृष्ण लीला स्थलियों का जीर्णोद्धार और संरक्षण किया है। परंतु योगी सरकार ने आते ही द्वेष वश फाउंडेशन द्वारा सजाई गई दो लीलास्थलियों का तालिबानी विनाश करना शुरू कर दिया। ताज़ा उदाहरण तो मथुरा के जैंत ग्राम स्थित पौराणिक कालियामर्दन मंदिर, अजय वन व जय कुंड का है, जहां भाजपा के एक स्थानीय नेता ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से ग्राम सभा के फ़र्ज़ी प्रस्ताव पर एक सार्वजनिक कूड़ेदान का निर्माण करा रहा है। ग्राम सभा के 15 सदस्यों में से 14 निर्वाचित सदस्य मथुरा के ज़िलाधिकारी को व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखित शिकायत दे चुके हैं कि कूड़ेदान के लिए कोई उनकी सभा में कोई प्रस्ताव पास नहीं हुआ। जिस प्रस्ताव के आधार पर ये निर्माण हो रहा है वो फ़र्ज़ी है। इससे पवित्र तीर्थ पर गंदगी का अंबार लग जाएगा। सारा गाँव इसका घोर विरोध कर रहा है। पर अभी तक प्रशासन की तरफ़ से इसे रोकने की कोई कारवाई नहीं हुई। एक ओर तो योगी सरकार हिंदुत्व को बढ़ाने का दावा करती है। दूसरी तरफ़ उसी के राज में मथुरा में तीर्थ स्थलों का विनाश इसलिए किया जा रहा है क्योंकि वो राजनैतिक रूप से उन्हें असुविधाजनक लगते हैं। शायद भाजपा और आरएसएस की मानसिकता यह है कि हिन्दू धर्म का जो भी काम होगा वो यही दो संगठन करेंगे। यदि कोई दूसरा करेगा तो उसका कोई महत्व नहीं और उसे नष्ट करने में किसी तरह की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं होगा। यह बहुत ही दुखद है।

इस लेख के माध्यम से मैं उन सभी लोगों तक ये संदेश भेजना चाहता हूँ कि धरोहर चाहे किसी भी देश, धर्म या समुदाय की हो, वो सबकी साझी धरोहर होती है। वो पूरे विश्व कि धरोहर होती है। सभ्यता का इतिहास इन धरोहरों को संरक्षित रख कर ही अलंकृत होता है। जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता है। चाहे किसी भी धर्म में हमारी आस्था हो हमें कभी भी किसी दूसरे धर्म की धरोहर का विनाश नहीं करना चाहिए। आज नहीं तो कल हम ये समझेंगे कि इन धरोहरों को बनाना और सँभालना कितना मुश्किल होता है और उनका विनाश करना कितना आसान। इसलिए ऐसे आत्मघाती कदमों से बचें और अपने इलाक़े, प्रांत और प्रदेश की सभी धरोहरों कि रक्षा करें। इसी में पूरे मानव समाज की भलाई है।