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Monday, May 11, 2026

जनता की जान की क़ीमत पर वीआईपी सुरक्षा क्यों?

नर्मदा नदी के बरगी बाँध के दुखद हादसे के बाद सोशल मीडिया पर एक आम नागरिक की टिप्पणी ने मुझे कुछ सोचने पर मजबूर किया। उसका कहना था कि जब देश में ऊर्जा संकट बढ़ रहा है और अनावश्यक दुर्घटनाओं में कीमती जीवन समाप्त हो रहे हैं, तो वीआईपी सुरक्षा के नाम पर हज़ारों गाड़ियाँ और सुरक्षा कर्मी क्यों रात-दिन भागते रहते हैं? जबकि यही सुरक्षा कर्मी अगर यातायात, भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा नियमों के कड़े अनुपालन और  आपदा प्रबंधन के लिए तैनात रहे तो आम जनता को कितनी राहत मिलेगी? भारतीय मूल का 38 वर्षीय हिमांशु गुलाटी नॉर्वे का तीसरी बार सांसद है और वहाँ का उप-कानून मंत्री भी। उसे कोई वीआईपी सुरक्षा नहीं मिली हुई। उसने मुझे बताया कि नॉर्वे की पिछली प्रधान मंत्री एर्ना सोलबर्ग जब एक बार उसके घर रात्रि भोज पर आईं तो वे बिना किसी सुरक्षा बंदोबस्त के स्वयं कार चला कर आईं और सीधे रसोई में जा कर रसोइए से हाल चाल पूछने लगीं। सिडनी से मेरी मित्र विमला ने पिछला लेख पढ़ कर फ़ोन पर बताया कि कुछ दिन पहले वो सिनेमा घर में फ़िल्म देख रही थीं। अचानक उसकी निगाह पड़ी ऑस्ट्रेलिया के प्रधान मंत्री पर जो उसी पंक्ति में बिना किसी सुरक्षा के फ़िल्म देख रहे थे। अमरीका और यूरोप के देशों में अक्सर आपको वर्तमान व निवर्तमान राष्ट्राध्यक्ष आम आदमी की तरह बाज़ारों में घूमते हुए दिख जाते हैं। जिनके आगे पीछे कोई सुरक्षा घेरा नहीं होता। नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधान मंत्री बालेंद्र शाह ने नेपाल में वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने के लिए कई कड़े निर्णय लिए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे अपने फैसलों पर टिके रहेंगे। 


यहाँ मेरा आशय भारत के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री व प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों आदि की आवश्यक सुरक्षा को लेकर कोई टिप्पणी करने का नहीं है। पर इनके अलावा देश में लगभग 19,000 ऐसे लोग हैं जिन्हें सरकारी सुरक्षा प्रदान की गई है। जिस पर 66,000 सुरक्षा कर्मी तैनात हैं। अकेले दिल्ली में 500 लोगों को वीआईपी सुरक्षा मिली है जिस पर लगभग 750 करोड़ रुपया सालना खर्च होता है। अंदाज़ा लगाइए कि बाक़ी 18,500 लोगों की सुरक्षा पर कितने हज़ार करोड़ रुपया खर्च होता होगा? ये पैसा उस मतदाता की मेहनत की कमाई पर टैक्स लगाकर वसूला जाता है जिसे नर्मदा या वृंदावन की यमुना में सुरक्षा नियमों की लापरवाही के कारण बार-बार जान गवानी पड़ती है। 


मुझे याद है कि 2003-05 में जब मैं वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर का अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर था तो मैंने वहाँ वीआईपी गाड़ियों के प्रवेश को रोकने के लिए दो मुख्य रास्तों के शुरू में ही लोहे की चेन लगवा दी थी जो आजतक लगी हैं। ऐसा मैंने तब किया जब संकरे प्रवेश मार्ग में मंदिर तक जाने को आमदा एक एसडीएम की गाड़ी ने एक वृद्ध महिला को कुचल दिया। गली के बाहर मैंने एक बोर्ड भी टंगवा दिया था। जिस पर लिखा था, ‘बिहारी जी धनीनाथ या वीआईपीनाथ नहीं हैं - वे दीनबंधु दीनानाथ हैं। उनके द्वार पर दिन बनकर आओगे तभी उनकी कृपा पाओगे।’ मुझे खुशी है कि न सिर्फ़ केंद्रीय मंत्रियों ने बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक ने इस नियम का पालन किया।


पिछले कई दशकों से हालत यह है कि हर चंगू-मंगू, ऐरा-गैरा अपने राजनैतिक संपर्कों का लाभ उठा कर सरकारी सुरक्षा ले लेता है और फिर जनता के बीच दबंगई से घूमता है। इनमें से 99 फ़ीसदी लोग ऐसे होते हैं जिन्हें कोई ख़तरा नहीं होता। पर अपनी ताक़त और रुतबे का प्रदर्शन करने के लिए उन्हें सरकारी सुरक्षा पाने की लालसा रहती है। अगर पाठकों को ये आत्मश्लाघा न लगे तो विनम्रता से यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा कि 1993-98 के बीच अलग-अलग जगहों पर मुझ पर कई बार जानलेवा हमले हुए। क्योंकि ‘जैन हवाला कांड’ को उजागर करके मैंने देश के सबसे ताकतवर लोगों और हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों के विरुद्ध अकेले ही युद्ध छेड़ दिया था। पर प्रभु कृपा से मैं न तो डरा, न झुका और न बिका। उस दौर में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी एन शेषन और मैं देश भर में जनसभाओं को संबोधित करने जाते थे तो अक्सर मुझसे यह प्रश्न पूछा जाता था कि ‘आप इतना ख़तरनाक युद्ध लड़ रहे हैं, आपको डर नहीं लगता?’ मेरा श्रोताओं को उत्तर होता था, ‘मारे कृष्णा राखे के, राखे कृष्णा मारे के’, श्री चैतन्य महाप्रभु के उक्त वचन से मुझे नैतिक बल मिलता था। इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि बड़े-बड़े मंचों से धार्मिक प्रवचन करने वाले केसरिया वेश धारी भी कमांडो और पुलिस के घेरे में रह कर गर्व का अनुभव करते हैं। माया मोह त्यागने का उपदेश देने वालों की कथनी और करनी में इस भेद के कारण ही देश की आध्यात्मिक चेतना का विकास नहीं हो पा रहा है। धर्म भी एक शान-शौकत की चीज़ बनता जा रहा है।  


समय की माँग है कि प्रधान मंत्री मोदी जी सभी राज्यों के मुख्य मंत्रियों के साथ इस विषय पर गंभीर चिंतन करें और एक ऐसी नीति बनाएँ जिसमें सरकार की ओर से केवल राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को छोड़ कर बाक़ी किसी को तब तक सुरक्षा न मिले जबतक की वास्तव में उनके जीवन को गंभीर ख़तरा न हो। इसमें उन राजनेताओं को भी अनावश्यक सुरक्षा न दी जाए जो इन पदों पर रह चुके हों, पर अब किसी पद पर न हों। इसके बावजूद अगर कुछ नेता, उद्योगपति या अन्य लोग सरकारी सुरक्षा पाने के लिए आवेदन करें तो उन्हें यह सुरक्षा इस शर्त पर दी जाए कि वे इसका खर्चा स्वयं वहन करेंगे। यहाँ कोई सवाल खड़ा कर सकता है कि इन लोगों को सुरक्षा देना सरकार की ज़िम्मेदारी है। उसका उत्तर है कि जो लोग शासन प्रशासन की लापरवाही से आए दिन दुर्घटनाओं में जान गंवा रहे हैं उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किसकी है?  

Monday, April 13, 2026

जनसेवा की नई मिसाल देता नेपाल का युवा मंत्रिमंडल !

नेपाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव आया जब 27 मार्च 2026 को राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के नेतृत्व में बालेन शाह (बलेंद्र शाह) ने 36 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और 15 सदस्यीय कैबिनेट का गठन किया। यह मंत्रिमंडल न सिर्फ नेपाल का सबसे युवा कैबिनेट है, बल्कि दक्षिण एशिया में अपनी उच्च शैक्षणिक योग्यता के लिए वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन रहा है। इस मंत्रिमंडल के सदस्यों की औसत आयु मात्र 38.21 वर्ष है, दस मंत्री 40 वर्ष से कम उम्र के, पांच महिला मंत्री और 80 प्रतिशत से अधिक सदस्यों के पास स्नातकोत्तर या डॉक्टरेट की डिग्री। यह आंकड़े नेपाल की राजनीति के पारंपरिक चेहरे को पूरी तरह बदल रहे हैं। 


यह कैबिनेट 'जेन-ज़ी आंदोलन' के परिणामस्वरूप सत्ता में आई है। भ्रष्टाचार, पुरानी पार्टियों की नाकामी और युवाओं की मांगों को लेकर हुए आंदोलन ने आरएसपी को भारी बहुमत दिलाया। अब यह युवा टीम न सिर्फ नेपाल में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में 'दुनिया का सबसे युवा कैबिनेट' और 'सबसे शिक्षित मंत्रिमंडल' के रूप में प्रसिद्ध हो रही है। कई भारतीय अखबारों ने इसे 'जनरेशनल शिफ्ट' करार दिया है। विश्व स्तर पर इसकी सराहना हो रही है क्योंकि यह पारंपरिक राजनीति से हटकर योग्यता, तकनीकी विशेषज्ञता और समावेशिता पर आधारित है। यह दक्षिण एशिया का चमकता उदाहरण है, जहां भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों के कैबिनेट अक्सर वरिष्ठ नेताओं पर निर्भर रहते हैं।


इस कैबिनेट की सबसे बड़ी ताकत इसकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि है। प्रधानमंत्री बालेन शाह स्वयं सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक (पूर्वांचल विश्वविद्यालय) और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में एम.टेक (निट्टे मीनाक्षी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बेंगलुरु, भारत) हैं। वे काठमांडू के पूर्व मेयर और लोकप्रिय रैपर भी हैं। उनकी टीम में दो डॉक्टरेट धारक और दस स्नातकोत्तर सदस्य हैं। वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले (41 वर्ष, कैबिनेट के सबसे वरिष्ठ) अर्थशास्त्र में पीएचडी (ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी), हार्वर्ड से एमपीए/आईडी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से स्नातक हैं। वे पूर्व में यूएनडीपी के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय आर्थिक सलाहकार और नेपाल की राष्ट्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी विशेषज्ञता आर्थिक सुधार, गरीबी उन्मूलन और सतत विकास में है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल (47 वर्ष) अमेरिका के विस्कॉन्सिन-मैडिसन से पब्लिक पॉलिसी में मास्टर्स और यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिजपोर्ट से पॉलिटिकल इकोनॉमी में स्नातक हैं। वे 'टीच फॉर नेपाल' के सह-संस्थापक हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा सुधार का प्रमुख अभियान है।


शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा युवा एवं खेल मंत्री सस्मित पोखरेल (29 वर्ष) कैबिनेट के सबसे युवा सदस्य हैं। वे काठमांडू विश्वविद्यालय से बिजनेस मैनेजमेंट एवं कानून में स्नातक हैं और पॉलिसी, गवर्नेंस एवं भ्रष्टाचार-निरोध पर मास्टर्स कर रहे हैं। वे बालेन के मेयर काल में शहरी नियोजन सलाहकार रह चुके हैं। स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता (38 वर्ष) भारत के ग्वालियर से नर्सिंग में मास्टर्स और दिल्ली के एम्स से प्रशिक्षित हैं। सामान्य प्रशासन मंत्री प्रतिभा रावल (32 वर्ष) एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (चेन्नई) से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा रखती हैं। श्रम मंत्री दीपक कुमार साह (34 वर्ष) लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन से पीएचडी स्कॉलर, एलएसई से हेल्थ पॉलिसी में मास्टर्स और आईओएम से पब्लिक हेल्थ में मास्टर्स रखते हैं।


महिला, बाल-बालिका एवं ज्येष्ठ नागरिक मंत्री सीता बादी (30 वर्ष) राजनीति विज्ञान में मास्टर्स हैं और बादी समुदाय की प्रतिनिधि के रूप में समावेशिता का प्रतीक हैं। कानून मंत्री सोबिता गौतम (30 वर्ष) राष्ट्रीय विधि महाविद्यालय से बीए एलएलबी हैं और संसदीय समितियों में सक्रिय रहीं हैं। भौतिक पूर्वाधार मंत्री सुनील लाम्सल (35 वर्ष) भी भारत से एम.टेक (स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग) हैं।


गौरतलब है कि ये योग्यताएं महज डिग्रियां नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुभव से जुड़ी हैं। यूएनडीपी, टीच फॉर नेपाल, आपदा राहत संगठन 'हामी नेपाल' और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में इन सभी की अहम भूमिका रही है। पांच महिला मंत्रियों का प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी (जैसे सीता बादी) समावेशिता को मजबूत करती है।


देखा जाए तो नेपाल का यह कैबिनेट अपने पड़ोसियों से अलग दिखता है। भारत के वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल में 71 सदस्य है, जिसमें 57 सदस्य स्नातक या उससे ऊपर हैं, लेकिन 11 सदस्य मात्र 12वीं पास हैं। कई मंत्री राजनीतिक अनुभव पर निर्भर हैं, जबकि युवा चेहरे कम हैं। वहीं चीन का मंत्रिमंडल अत्यधिक शिक्षित तकनीकी विशेषज्ञों (इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र) से भरा है, लेकिन उनकी औसत आयु 55-60 वर्ष के आसपास है और निर्णय प्रक्रिया केंद्रीकृत पार्टी संरचना पर आधारित है। बांग्लादेश के हालिया कैबिनेट में 46/50 सदस्य उच्च शिक्षा वाले हैं (तीन पीएचडी), लेकिन वहां भी वरिष्ठता और राजनीतिक वफादारी प्रमुख है।


नेपाल का कैबिनेट इन सभी से युवा, अधिक समावेशी और योग्यता-आधारित है। भारत और चीन की तुलना में यहां भ्रष्टाचार-विरोधी 'डिलीवरी बेस्ड गवर्नेंस' पर जोर है, जो पड़ोसियों में अक्सर कम देखा जाता है। हालांकि, कुछ विश्लेषक चेताते हैं कि इस मंत्रिमंडल के पास अनुभव की कमी एक चुनौती है। भारत की तरह बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था या चीन की तरह दीर्घकालिक नियोजन यहां अभी संभव नहीं, लेकिन पारदर्शिता और तेज निर्णय लेने की क्षमता नेपाल को लाभ दे सकती है।


केवल दो सप्ताह पुरानी यह सरकार पहले ही '100 सूत्री शासन सुधार एजेंडा' लागू कर चुकी है। पहली कैबिनेट बैठक में मंत्रालयों का पुनर्गठन, दक्षिण एशिया संघर्ष के प्रभाव से नेपाली प्रवासियों की सुरक्षा, ‘कार्की आयोग’ रिपोर्ट पर कार्रवाई और संविधान संशोधन पर चर्चा पत्र तैयार करने जैसे कदम उठाए गए। शिक्षा मंत्री सस्मित पोखरेल ने पार्टी-आधारित छात्र संगठनों को समाप्त करने और स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता ने निजी अस्पतालों में 10 प्रतिशत मुफ्त बेड सुनिश्चित करने की घोषणा की है।


वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले आर्थिक स्थिरता, पर्यटन विकास और बुनियादी ढांचे पर ध्यान दे रहे हैं। श्रम और स्वास्थ्य मंत्रियों की स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञता गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन में मदद करेगी। विदेश मंत्री शिशिर खनाल की पॉलिसी विशेषज्ञता नेपाल की कूटनीति को मजबूत करेगी। युवा बेरोजगारी घटाने, शिक्षा गुणवत्ता सुधारने, स्वास्थ्य पहुंच बढ़ाने और भ्रष्टाचार रोकने के प्रयास पहले ही दिख रहे हैं। दैनिक प्रगति निगरानी प्रणाली लागू कर सरकार जवाबदेही सुनिश्चित कर रही है। हालांकि, चुनौतियां यहाँ भी हैं, जैसे कि पहाड़ी इलाकों में पहुंच, संसाधन सीमाएं और पुरानी पार्टियों का विरोध। फिर भी, यह कैबिनेट जनता की उम्मीदें पूरी करने की राह पर है।


कुल मिलाकर देखा जाए तो नेपाल का यह ‘जेन-ज़ी’ कैबिनेट न सिर्फ दक्षिण एशिया के लिए मिसाल है, बल्कि विकासशील देशों को सिखाता है कि योग्यता और युवा ऊर्जा राजनीति को बदल सकती है। यदि यह टीम अपने 100 सूत्री एजेंडा को ईमानदारी से लागू कर पाई, तो नेपाल आर्थिक समृद्धि, सामाजिक न्याय और सुशासन का नया मॉडल बन सकता है। 

Monday, March 30, 2026

आ अब लौट चलें !

जो लोग एक्स (ट्विटर) पर गंभीर विषयों को तलाशते रहते हैं उन्हें पता है कि किस तरह बाजारू शक्तियां हमारे दैनिक जीवन पर शिकंजा कसती जा रही हैं। हमारे खाद्यान, सब्ज़ियाँ, फल व दूध ही नहीं, हमारी दवाईयां और वैक्सीन तक सब पर इन ताकतों का क़ब्ज़ा है। इनका उद्देश्य ना तो हमें स्वस्थ रखना है और ना ही सुखी। अरबों खरबों रुपये का मुनाफा कमाना ही इनका उद्देश्य होता है। इनके लिए हम सब प्रयोगशाला के जानवर हैं, जिनपर ये लगातार खतरनाक परीक्षण करते रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का ताना-बना इस तरह बुना जाता है कि दुनिया के तमाम देशों का नेतृत्व इन ताकतों के चंगुल में फसा रहे और अपनी प्रजा के हितों का बलिदान करके भी इनके मुनाफ़े बढ़ाने में मदद करे। इन ताकतों का मुख्य केंद्र है अमरीका। ये सर्वविदित है कि अमरीका की शस्त्र उद्योग लॉबी अमरीकी शासकों को मोहरा बना कर दुनिया भर में युद्ध करवाती रहती है। जिससे उसका माल बिकता रहे। इन ताकतों के आगे अमरीका का सभ्य और सुसंस्कृत समाज भी लाचार है। ‘एपस्टीन फाइल्स’ में जिस क्रूर, पाशविक प्रवृत्तियों का खुलासा हुआ है उसके बाद अमरीका के तमाम मशहूर बड़े लोग जेल के सीखचों के पीछे होने चाहिए थे, पर वहाँ ऐसा नहीं हो रहा। गोस्वामी तुलसीदास जी लिख गए हैं कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं। 



जिस तरह के संकट और महामारियां अब लगातार हमारे जनजीवन पर बार-बार हमला करने लगी हैं, उससे यह स्पष्ट है कि हमारा और हमारी अगली पीढ़ियों का भविष्य अंधकार मय है। राष्ट्र का ‘सकल घरेलू उत्पादन’ या आर्थिक वृद्धि की दर उस राष्ट्र के लोगों के सुखी और स्वस्थ होने का पैमाना नहीं होते। ये आंकड़े उन्हें मुट्ठी भर लोगों को हर्षित करते हैं जो देश के तीन चौथाई संसाधनों पर क़ब्ज़ा किए बैठे हैं। अगर लोगों की खुशहाली देखना है तो हमें पड़ोसी देश भूटान की ओर रूख करना पड़ेगा। जो अपनी प्रगति को ‘सकल घरेलू उत्पादन’ के पैमाने पर नहीं बल्कि ‘सकल घरेलू उल्लास’ (हैप्पीनेस इंडेक्स) के पैमाने पर नापता है। हमें अपने विकास की दिशा और दशा बदलनी चाहिए। देश के 5.5 लाख गांवों को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। जिससे आम भारतीय बाजारू शक्तियों के मकड़ जाल से बच कर सुखी और स्वस्थ जीवन जी सके।  



खाड़ी के देशों में चल रहा भयानक युद्ध, उससे निरंतर बढ़ता ऊर्जा संकट और वायु में घुलता ज़हर पूरी दुनिया के लिए हर दिन चिंता बढ़ा रहा है। इसका बुरा असर अर्थव्यवस्था और रोज़गार पर भी पड़ रहा है। समस्या भयावय होती जा रही है। हर घर में अनिश्चितता और हताशा बढ़ने लगी है। कुकिंग गैस पर से निर्भरता हटा कर गोबर के कंडों और लकड़ी पर लौटना पड़ सकता है। क्यों न इस दिशा में एक नई पहल की जाए। सनातन हिन्दू संस्कृति में गाय को माँ माना जाता है। धर्म शास्त्र कहते हैं कि गाय में 33 करोड़ देवताओं का वास होता है। गाय का दूध, उससे बना दही, छाछ, पनीर व घी स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। देशी गाय के गोबर और मूत्र के गुण वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो चुके हैं। सदियों से हर सनातनी के घर गौ पालन की प्रथा थी। पर शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने इस परंपरा को बहुत तेज़ी से नष्ट किया है। गौ वंश और कृषि आधारित जीवन आम भारतीय को स्वस्थ और सुखी रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ है। गत 79 वर्षों में हमारी सरकारों ने अगर इस अनुभव का लाभ उठाया होता और आर्थिक विकास के मॉडल को इस तरह दिशा दी होती की गाँव का जीवन आत्मनिर्भर बनता तो शहरीकरण और उससे पैदा हुई हज़ारों चुनौतियाँ आज हमारे सामने मुँह बाय न खड़ी होती। गाँव की लक्ष्मी गाँव में रहती और गाँव का युवा गाँव में ही रोज़गार पाता तो करोड़ों भारतवासियों को गंदी बस्तियों में नारकीय जीवन न जीना पड़ता। 



मुझे लगता है कि अगर गौ रक्षा के मामले में एक नई और समेकित सोच को केंद्र में रखते हुए विकास का मॉडल तैयार किया जाए तो गौ वंश और भूमिहीन परिवारों का बहुत कल्याण हो सकता है। ये कोरी कल्पना नहीं है। इस दिशा में हमने एक छोटा सा प्रयोग 20 बरस पहले मथुरा में करके देखा था। जिसके सकारात्मक परिणाम आए। हम इसे आगे इसलिए नहीं चला पाए क्योंकि हमारी प्राथमिकता ब्रज के कृष्ण कालीन सरोवरों और वनों को बचाने की थी। ये मॉडल बहुत सरल है। देश के हर गांव में चरागाह की काफ़ी भूमि हुआ करती थी। वोटों की राजनीति ने उसकी बंदरबाँट कर दी। फिर भी देश में 10,210,000 हेक्टर भूमि चरागाहों के लिए उपलब्ध है। जो देश के कुल भौगौलिक क्षेत्र की 3-4 फ़ीसद है। हर गाँव में अनेक भूमिहीन परिवार होते हैं। जिन्हें ‘मनरेगा’ जैसी योजनाएं चला कर, साल के कुछ दिन सरकार रोज़गार देती है। हर ज़िले में और उसके गाँवों में ऐसे तमाम पढ़े-लिखे सक्षम नौजवान हैं जो सामाजिक कार्यों में रुचि लेते हैं। होना यह चाहिए कि गाँव के भूमिहीन परिवारों की समिति बना कर उन्हें चरागाहों की भूमि पर चारा उगाने के काम में लगाया जाए। ये चारा फिर हर उस भूमिहीन परिवार को दिया जाए जिसे दानदाता और सरकार नक़द दान की जगह स्वस्थ देशी नस्ल की गाय निशुल्क उपलब्ध कराए। ये परिवार चरागाह में मेहनत करके आय प्राप्त करे और मुफ्त के चारे से अपने गौ वंश की सेवा करके उसके दुग्ध उत्पादन से अपने परिवार का पालन-पोषण करे और स्वस्थ जीवन जी सके। आज गाँव बच्चों के मुँह में दूध नहीं जाता। गाँव की छोड़िये देश के महानगरों तक में नकली दूध, घी, पनीर आदि का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। हम शहरी लोग ही दूध के नाम पर अपने बच्चों को ज़हर पिला रहे हैं। आज देश में जितना दूध पैदा हो रहा है उससे कई गुना उसकी खपत है। ऐसे में ये बकाया दूध कहाँ से आ रहा है? 



दूध के नाम पर क्या पिलाया जा रहा है, इसकी चिंता किसी भी सरकार को नहीं है। छापे पड़ते हैं, नक़ली माल पकड़ा जाता है, खबर छपती है और मामले दबा दिए जाते हैं। इसलिए इस पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। हमने जब ये प्रयोग मथुरा में किया तो हमने दानदाताओं से कहा कि वे एक गाँव की चरागाह पर चारा उगाने में आर्थिक मदद करें और किसी को गौ सेवा के नाम पर धन का दान न करें। अपेक्षा के विपरीत हमें ऐसे अनेक उदारमना दानदाता मिल गए और उस गाँव के समर्पित नौजवान भी। जिन्होंने इस प्रयोग को सफल बनाने में सहयोग किया। हमारा प्रयोग तो बहुत छोटे स्तर का था। पर आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर और अमरीका में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मोटे वेतन की नौकरियां छोड़ कर कुछ नौजवान मध्य भारत में बहुत बड़े पैमाने पर इस मॉडल पर काम कर रहे हैं। उन्होंने हज़ारों ग़रीबों की ज़िंदगी खुशहाल बना दी और इस प्रक्रिया से उत्पन्न गोबर की खाद से बंजर पड़ी ज़मीनों में फलों के बड़े-बड़े बगीचे लगा दिए हैं। शुरू में उनका उपहास करने वाले और उनके रास्ते में रोड़े अटकाने वाले ताक़तवर लोग, नेता और अफसर अब उनके सामने हथियार डाल चुके हैं और उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। इसलिए असंभव कुछ भी नहीं है। आवश्यकता है एक ईमानदार और उदार सोच की।
  

Wednesday, March 25, 2026

खाड़ी युद्ध और गौ रक्षा!

खाड़ी के देशों में चल रहा भयानक युद्ध, उससे निरंतर बढ़ता ऊर्जा संकट और वायु में घुलता ज़हर पूरी दुनिया के लिए हर दिन चिंता बढ़ा रहा है। इसका बुरा असर अर्थव्यवस्था और रोज़गार पर भी पड़ रहा है। समस्या भयावय होती जा रही है। हर घर में अनिश्चितता और हताशा बढ़ने लगी है। ऐसे माहौल में भारत के गौ वंश की चर्चा करना शायद आपको अटपटा लगेगा। पर यही वो वक़्त है जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि इस जंजाल में फँस कर हमने क्या खोया और क्या पाया? सनातन हिन्दू संस्कृति में गाय को माँ माना जाता है। धर्म शास्त्र कहते हैं कि गाय में 33 करोड़ देवताओं का वास होता है। गाय का दूध, उससे बना दही, छाछ, पनीर व घी स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। देशी गाय के गोबर और मूत्र के गुण वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो चुके हैं। सदियों से हर सनातनी के घर गौ पालन की प्रथा थी। पर शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने इस परंपरा को बहुत तेज़ी से नष्ट किया है। गौ वंश और कृषि आधारित जीवन आम भारतीय को स्वस्थ और सुखी रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ है। गत 79 वर्षों में हमारी सरकारों ने अगर इस अनुभव का लाभ उठाया होता और आर्थिक विकास के मॉडल को इस तरह दिशा दी होती की गाँव का जीवन आत्मनिर्भर बनता तो शहरीकरण और उससे पैदा हुई हज़ारों चुनौतियाँ आज हमारे सामने मुँह बाय न खड़ी होती। गाँव की लक्ष्मी गाँव में रहती और गाँव का युवा गाँव में ही रोज़गार पाता तो करोड़ों भारतवासियों को गंदी बस्तियों में नारकीय जीवन न जीना पड़ता। 


विगत 12 वर्षों से गौ वंश को लेकर बहुत कुछ बोला, कहा और किया गया है। पर उससे न तो गौ वंश की रक्षा हुई और न ही आम भारतीय को कोई लाभ मिला। एक तरफ़ गौ हत्या के लिए अल्पसंख्यकों को ज़िम्मेदार बता कर उनकी मॉब लिंचिंग की जा रही है और दूसरी ओर भारत दुनिया दूसरा सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश बन चुका है। प्रायः ये प्रचारित किया जाता है कि गौ माता का संरक्षण गौशालाओं में बेहतर होता है और इसके लिए गत 100-150 वर्षों में शहरों में हज़ारों गौशालाएं स्थापित हुई हैं। पर इन गौशालाओं का यथार्थ विवादास्पद है। उन गौशालाओं को छोड़ दें जिन्हें उदारमना संपन्न लोग धर्मार्थ चलते हैं और तन, मन, धन से गौ वंश की सेवा करते हैं।  पर अधिकतर गौशालाएं हमेशा से भ्रष्टाचार का केंद्र रही हैं। सार्वजनिक ज़मीनों पर क़ब्ज़े करके गौशालाएँ बनाना, सेवा के नाम पर मोटे चंदे हड़पना और गौ वंश की उपेक्षा करना, इन गौशालाओं में आम बात है। सबसे ज़्यादा भ्रष्टाचार तो वहाँ होता है जहाँ गौशालाओं को ज़मीन और धन सरकारें उपलब्ध कराती हैं। आज देश में करीब 8000 गौशालाएँ हैं। जिनमें से लगभग 2000 गौशालाएँ ही पंजीकृत हैं। इन गौशालाओं का सालना बजट अरबों रुपये का है। पर इसका लाभ जिन्हें मिलना चाहिए, उन्हें नहीं मिलता। 


मुझे लगता है कि अगर गौ रक्षा के मामले में एक नई और समेकित सोच को केंद्र में रखते हुए विकास का मॉडल तैयार किया जाए तो गौ वंश और भूमिहीन परिवारों का बहुत कल्याण हो सकता है। ये कोरी कल्पना नहीं है। इस दिशा में हमने एक छोटा सा प्रयोग 20 बरस पहले मथुरा में करके देखा था। जिसके सकारात्मक परिणाम आए। हम इसे आगे इसलिए नहीं चला पाए क्योंकि हमारी प्राथमिकता ब्रज के कृष्ण कालीन सरोवरों और वनों को बचाने की थी। ये मॉडल बहुत सरल है। देश के हर गांव में चरागाह की काफ़ी भूमि हुआ करती थी। वोटों की राजनीति ने उसकी बंदरबाँट कर दी। फिर भी देश में 10,210,000 हेक्टर भूमि चरागाहों के लिए उपलब्ध है। जो देश के कुल भौगौलिक क्षेत्र की 3-4 फ़ीसद है। हर गाँव में अनेक भूमिहीन परिवार होते हैं। जिन्हें ‘मनरेगा’ जैसी योजनाएं चला कर, साल के कुछ दिन सरकार रोज़गार देती है। हर ज़िले में और उसके गाँवों में ऐसे तमाम पढ़े-लिखे सक्षम नौजवान हैं जो सामाजिक कार्यों में रुचि लेते हैं। होना यह चाहिए कि गाँव के भूमिहीन परिवारों की समिति बना कर उन्हें चरागाहों की भूमि पर चारा उगाने के काम में लगाया जाए। ये चारा फिर हर उस भूमिहीन परिवार को दिया जाए जिसे दानदाता और सरकार नक़द दान की जगह स्वस्थ देशी नस्ल की गाय निशुल्क उपलब्ध कराए। ये परिवार चरागाह में मेहनत करके आय प्राप्त करे और मुफ्त के चारे से अपने गौ वंश की सेवा करके उसके दुग्ध उत्पादन से अपने परिवार का पालन-पोषण करे और स्वस्थ जीवन जी सके। आज गाँव बच्चों के मुँह में दूध नहीं जाता। गाँव की छोड़िये देश के महानगरों तक में नकली दूध, घी, पनीर आदि का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। हम शहरी लोग ही दूध के नाम पर अपने बच्चों को ज़हर पिला रहे हैं। आज देश में जितना दूध पैदा हो रहा है उससे कई गुना उसकी खपत है। ऐसे में ये बकाया दूध कहाँ से आ रहा है? दूध के नाम पर क्या पिलाया जा रहा है, इसकी चिंता किसी भी सरकार को नहीं है। छापे पड़ते हैं, नक़ली माल पकड़ा जाता है, खबर छपती है और मामले दबा दिए जाते हैं। इसलिए इस पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। 


हमने जब ये प्रयोग मथुरा में किया तो हमने दानदाताओं से कहा कि वे एक गाँव की चरागाह पर चारा उगाने में आर्थिक मदद करें और किसी को गौ सेवा के नाम पर धन का दान न करें। अपेक्षा के विपरीत हमें ऐसे अनेक उदारमना दानदाता मिल गए और उस गाँव के समर्पित नौजवान भी। जिन्होंने इस प्रयोग को सफल बनाने में सहयोग किया। हमारा प्रयोग तो बहुत छोटे स्तर का था। पर आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर और अमरीका में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मोटे वेतन की नौकरियां छोड़ कर कुछ नौजवान मध्य भारत में बहुत बड़े पैमाने पर इस मॉडल पर काम कर रहे हैं। उन्होंने हज़ारों ग़रीबों की ज़िंदगी खुशहाल बना दी और इस प्रक्रिया से उत्पन्न गोबर की खाद से बंजर पड़ी ज़मीनों में फलों के बड़े-बड़े बगीचे लगा दिए हैं। शुरू में उनका उपहास करने वाले और उनके रास्ते में रोड़े अटकाने वाले ताक़तवर लोग, नेता और अफसर अब उनके सामने हथियार डाल चुके हैं और उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। इसलिए असंभव कुछ भी नहीं है। आवश्यकता है एक ईमानदार और उदार सोच की।  

Monday, March 23, 2026

एचपीवी वैक्सीन के दुष्प्रभावों को क्यों छिपाया गया?

कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक पोस्ट काफ़ी चर्चा में छाई हुई है। इसमें पीटर गोट्शे नामक एक प्रसिद्ध चिकित्सक, शोधकर्ता और लेखक, ने ‘हाउ मर्क एंड ड्रग रेगुलेटर्स हिड सीरियस हार्म्स ऑफ एचपीवी वैक्सीन’ नाम की पुस्तक का विश्लेषण कर कुछ गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इस पोस्ट में पीटर द्वारा किए गए दावा ज़िक्र किया गया है कि कैसे महिलाओं में होने वाले सर्वाइकल कैंसर को रोकने वाली एक वैक्सीन के दुष्प्रभावों को दुनिया से छिपाया गया है।   

पोस्ट के अनुसार पीटर गोट्शे की पुस्तक में वे बताते हैं कि कैसे ‘एचपीवी क्सीन’ को ‘लाइफ-सेविंग’ बताकर बेचा गया, लेकिन इसके ट्रायल्स में गंभीर कमियां थीं और नुकसान छुपाए गए। यह मर्क की वैज्ञानिक दुराचार की कहानी है, जो कभी-कभी फ्रॉड के स्तर तक पहुंचती है। गोट्शे के अनुसार, मर्क ने कई तरीकों से गार्डासिल के नुकसानों को छुपाया। ज्यादातर ट्रायल्स में सच्चा प्लेसिबो (सलाइन) नहीं इस्तेमाल किया गया। इसके बजाय एल्यूमिनियम एडजुवेंट या दूसरी वैक्सीन को ‘प्लेसिबो’ बताया गया। ये दोनों खुद नुकसान पहुंचा सकते हैं (न्यूरोटॉक्सिक), इसलिए वैक्सीन और ‘प्लेसिबो’ के साइड इफेक्ट्स समान दिखे और नुकसान ‘सुरक्षित’ साबित हुआ। लेखक कहते हैं कि इससे मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन हुआ। 



वहीं दूसरी ओर गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याएं जैसे POTS (Postural Orthostatic Tachycardia Syndrome—खड़े होते ही चक्कर और दिल की धड़कन तेज होना) और CRPS (Complex Regional Pain Syndrome—तीव्र दर्द और सूजन) को रिपोर्ट नहीं किया गया। केवल 14 दिनों के अंदर की घटनाएं गिनी गईं, जबकि 90% नुकसान इससे बाहर थे। कई केसों को ‘कोई संबंध नहीं’ बता दिया गया या बाहर कर दिया गया। गोट्शे इसे ‘आउटराइट फ्रॉड’ कहते हैं।


उल्लेखनीय है कि वैक्सीन को सर्वाइकल कैंसर रोकने वाला बताया गया, लेकिन गोट्शे दावा करते हैं कि ट्रायल्स में असली कैंसर केस शून्य थे। लंबे समय के डेटा में एंटीबॉडी स्तर तेजी से गिरता है और पहले से एचपीवी संक्रमित महिलाओं में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया या डेनमार्क में ऑब्जर्वेशनल स्टडीज में कैंसर घाटे को वैक्सीन का श्रेय दिया जाता है, लेकिन स्क्रीनिंग और अन्य फैक्टर्स को नजरअंदाज किया जाता है। पुस्तक के अनुसार मर्क ने ऐसा डर फैलाया कि कैंसर हजारों महिलाओं को मारता है, हर राज्य में लॉबिंग की और स्कूल मैंडेट के लिए दबाव डाला। इस वैक्सीन को ‘फास्ट-ट्रैक अप्रूवल’ मिला, जबकि FDA ने बाद में माना कि सेफ्टी मॉनिटरिंग की क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया था। 



इसके साथ ही FDA, EMA जैसे नियामकों की भूमिका भी संदेहास्पद रही। पुस्तक में ये आरोप भी लगाया गया है कि इन नियामकों ने मर्क के एकतरफा रिपोर्ट्स को बिना सवाल स्वीकार किया। EMA की 2015 जांच में भी कंपनियों के डेटा पर भरोसा किया गया। गोट्शे कहते हैं कि रेगुलेटर्स इंडस्ट्री द्के क़ब्ज़े में हैं। पुस्तक में Vioxx घोटाले की तुलना भी की गई है। लेखक अन्य देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों के भ्रामक बयानों के उदाहरण भी देते हैं।


दुनिया भर के विश्लेषक इस पुस्तक की ताकत का वर्णन करते हुए इसे गोपनीय आंतरिक दस्तावेजों पर आधारित मानकर जर्नल पेपर्स से ज्यादा विस्तृत मानते हैं। इस पुस्तक के छपने का सबसे प्रभावी असर यह है कि यह पारदर्शिता की मांग करता है और कानूनी मुकदमों (जैसे Robi केस, जो 2025 में चल रहा था) में सच्चाई उजागर होने का उदाहरण भी देता है। ब्राउनस्टोन इंस्टीट्यूट जैसे समीक्षक इसे ‘फियरलेस इंडिक्टमेंट’ कहते हैं।



गौरतलब है कि गोट्शे को ब्रिटिश मेडिकल शोध संस्थान कोक्रेन से निकाला गया था क्योंकि उन्होंने 2018 में एचपीवी वैक्सीन रिव्यू पर इसी तरह की आलोचना की थी। वहीं WHO, CDC, Cochrane जैसे मुख्यधारा के शोध संस्थान का मानना है कि वैक्सीन प्री-कैंसरस लेशन्स 80-90% तक कम करती है, असरदार है और गंभीर साइड इफेक्ट्स बहुत दुर्लभ हैं। विश्व स्वास्थ संगठन के VigiBase में 667 मौतें रिपोर्ट हुई हैं, लेकिन कारण संबंध साबित नहीं। गोट्शे की व्याख्या को ‘anti-vax’ माना जाता है, हालांकि वे खुद वैक्सीन के खिलाफ नहीं बल्कि ‘ट्रांसपेरेंसी’ के पक्षधर हैं।


भारत में इस पुस्तक का सीधा और व्यापक प्रभाव अभी तक दिखाई नहीं देता। 2026 तक के उपलब्ध डेटा में कोई बड़ा मीडिया बहस या सरकारी प्रतिक्रिया नहीं मिली। लेकिन यह अप्रत्यक्ष रूप से प्रासंगिक है क्योंकि 2009-2010 में PATH (बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन) के साथ मर्क के गार्डासिल और GSK के Cervarix ट्रायल्स आंध्र प्रदेश और गुजरात में चले जहाँ 7 लड़कियों की मौत हुई, जिसके बाद संसदीय समिति ने नैतिक उल्लंघन (इनफॉर्म्ड कंसेंट के बिना गरीब लड़कियों पर प्रयोग) का आरोप लगाया। ट्रायल्स रोके गए। यह विवाद आज भी HPV वैक्सीन पर शक पैदा करता है।


उल्लेखनीय है कि भारत सर्वाइकल कैंसर खत्म करने के लिए HPV वैक्सीन को स्कूल प्रोग्राम में ला रहा है, जिसकी शुरुआत सिक्किम, पंजाब आदि में राष्ट्रीय रोलआउट की योजना के तहत की जा सकती है। इंडिजिनस Cervavac भी उपलब्ध है, लेकिन क्वाड्रिवेलेंट वैक्सीन (मर्क जैसी) भी इस्तेमाल होती है। भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय इसे सुरक्षित और जरूरी बताती है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो पुस्तक के दावे के अनुसार वैक्सीन के छुपे नुकसान सोशल मीडिया या एंटी-वैक्सीन ग्रुप्स में फैल सकते हैं, जिससे हिचकिचाहट बढ़ सकती है। खासकर 2010 के ट्रायल विवाद के बाद। लेकिन भारत में मुख्यधारा मीडिया और स्वास्थ्य विभाग इसे ‘मिथ’ बताते हुए प्रमोशन जारी रखते हैं। अगर अमरीका में हुए मुकदमे को केंद्र में रखा जाए तो ज्यादा सुर्खियां बन सकती हैं जिससे इस पर प्रभाव बढ़ सकता है। परंतु, पुस्तक भारत में सतर्कता अवश्य बढ़ा सकती है लेकिन कार्यक्रम को नहीं रोक पाएगी, क्योंकि कैंसर का बोझ बहुत बड़ा है।


यह पुस्तक दवा उद्योग और नियामकों पर गंभीर सवाल उठाती है। गोट्शे के दस्तावेजी सबूत मजबूत हैं, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय में यह अल्पमत है। भारत जैसे देश में जहां एचपीवी वैक्सीन सार्वजनिक स्वास्थ्य का बड़ा हथियार है, ऐसे में पुस्तक याद दिलाती है कि माता-पिता को स्वतंत्र शोध करना चाहिए, स्क्रीनिंग के साथ वैक्सीनेशन बैलेंस करें। अगर आप वैक्सीन के पक्ष में हैं, तो डॉक्टर से चर्चा करें और आधिकारिक डेटा भी देखें।

Monday, March 16, 2026

अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर प्रभाव

दुनिया एक नए युद्ध की चपेट में है जो न केवल मध्य पूर्व को हिला रहा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति को भी प्रभावित कर रहा है। 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हवाई हमलों ने इस संघर्ष को एक पूर्ण युद्ध का रूप दे दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों और नौसेना को नष्ट करने का ऐलान किया है, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी ठिकानों और इज़राइल पर मिसाइलें दागी हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने से तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है। 


सवाल उठता है कि क्या यह युद्ध केवल अमेरिका की अहंकारपूर्ण कूटनीति का परिणाम है, जहां वह वैश्विक प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है और तेल तथा खनिज बाजार पर कब्जा जमाना चाहता है? या यह एक आवश्यक रक्षात्मक कदम है जो ईरान के परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए उठाया गया है? एक स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखें तो यह युद्ध अमेरिकी कूटनीति की विफलता का प्रतीक है, जहां वार्ता के बजाय सैन्य शक्ति पर जोर दिया गया। ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर अधिकतम दबाव की नीति अपनाई, लेकिन इससे ईरान और अधिक आक्रामक हो गया। रक्षा विशेषज्ञ जो कोस्टा का कहना है कि यह युद्ध अमेरिकी सैन्य तैयारियों को कमजोर कर रहा है, खासकर चीन के खिलाफ। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह तेल बाजार पर कब्जे की लड़ाई है, लेकिन इससे अमेरिका की वैश्विक स्थिति कमजोर हो सकती है।


भारत, जो अपनी 90% से अधिक कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, इस युद्ध से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल की आपूर्ति बाधित हो गई है, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ गया है। टीएस लोम्बार्ड की अर्थशास्त्री शुमिता देवेश्वर कहती हैं कि लंबे समय तक चलने वाला युद्ध भारत की रसद लागत और प्रेषण को प्रभावित करेगा। ऐसे में भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है, और मुद्रास्फीति बढ़ने से आम आदमी पर बोझ पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें पहले ही बढ़ी हुई हैं, जिससे परिवहन और कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।



रणनीतिक रूप से यह युद्ध भारत की विदेश नीति को जटिल बना रहा है। भारत ने ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह परियोजना में निवेश किया है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है। लेकिन युद्ध से यह परियोजना खतरे में आ गई है। वहीं, भारत-अरब-इज़राइल-यूरोप गलियारा (आईएमईसी) अब अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि ईरान की अस्थिरता से चाबहार का विकल्प सीमित हो गया है। रैंड के अर्थशास्त्री रफीक दोसानी कहते हैं कि अगर अमेरिका और इज़राइल जीतते हैं, तो आईएमईसी इज़राइल की प्राथमिकता बनेगा। 


इसके अलावा, मध्य पूर्व में रहने वाले लाखों प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ गई है। प्रेषण, जो भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, प्रभावित हो सकता है। हाल ही में ‘द हिंदू’ के एक संपादकीय में कहा गया है कि यह युद्ध भारत पर अपेक्षा से अधिक प्रभाव डालेगा और पड़ोसी क्षेत्र को और जटिल बनाएगा। भारत को अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते हुए ईरान के साथ संतुलन बनाना होगा, जो एक कूटनीतिक चुनौती है।


यह युद्ध अमेरिका की वैश्विक स्थिति को दोधारी तलवार की तरह प्रभावित कर रहा है। एक ओर, अमेरिका ने ईरान की नौसेना और मिसाइल क्षमताओं को काफी नुकसान पहुंचाया है, जो उसके सैन्य प्रभुत्व को दर्शाता है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि हमलों ने ईरान की नौसेना को ‘लड़ाई अक्षम’ बना दिया है। लेकिन लंबे समय में, यह युद्ध अमेरिकी संसाधनों को खींच सकता है। चैथम हाउस के विशेषज्ञों के अनुसार, लंबा युद्ध वैश्विक जीडीपी पर सीमित प्रभाव डालेगा, लेकिन उभरती अर्थव्यवस्थाओं को ऊर्जा कीमतों से नुकसान होगा। 


वैश्विक स्तर पर, यह युद्ध अमेरिका की कूटनीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है। यूरोप और एशिया में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जैसे एथेंस में हजारों लोगों का अमेरिकी दूतावास की ओर मार्च। चीन और रूस ईरान का समर्थन कर रहे हैं, जो बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत कर रहा है। अटलांटिक काउंसिल के विशेषज्ञों का कहना है कि चीन इस संघर्ष से फायदा उठा रहा है, क्योंकि ईरान उसका रणनीतिक साझेदार है। 


आर्थिक रूप से, अमेरिका ऊर्जा निर्यातक होने से कम प्रभावित है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान से मंदी का खतरा है। जेपी मॉर्गन के अर्थशास्त्री जोसेफ लुप्टन कहते हैं कि यह संघर्ष व्यापार युद्ध पर और दबाव डालेगा। अगर युद्ध क्षेत्रीय हो गया, तो तेल कीमतें 120 डॉलर तक पहुंच सकती हैं, जिससे अमेरिकी विकास दर नकारात्मक हो सकती है।


दुनिया भर के अधिकतर जानकारों का यह मत है कि यह युद्ध मुख्य रूप से अमेरिकी कूटनीति की विफलता है। ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते से बाहर निकालकर दबाव बढ़ाया, लेकिन इससे ईरान की आक्रामकता बढ़ी। तेल और खनिज बाजार पर कब्जे की महत्वाकांक्षा साफ दिखती है, क्योंकि होर्मुज का नियंत्रण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को नियंत्रित करता है। लेकिन यह अहंकारपूर्ण दृष्टिकोण है, क्योंकि हवाई हमले सरकार नहीं गिरा सकते। रक्षा विशेषज्ञ रॉब जॉनसन कहते हैं कि अमेरिका ईरान की वायु रक्षा को नष्ट कर सकता है, लेकिन लंबी अवधि में वैश्विक ऊर्जा स्थिरता प्रभावित होगी। 


कूटनीतिक विशेषज्ञ जेफरी फेल्टमैन और माइकल ओ'हैनलॉन का मानना है कि इस युद्ध के प्रभाव ईरान, मध्य पूर्व और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ेंगे। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुश्ताक हामी ने होर्मुज को बंद रखने की धमकी दी है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकती है। 

यह युद्ध न केवल ईरान की संप्रभुता का मुद्दा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का भी। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी चाहिए, जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान देना। अमेरिका को वार्ता की ओर लौटना चाहिए, वरना यह संघर्ष विश्व युद्ध का रूप ले सकता है। स्वतंत्र रूप से देखा जय तो, यह युद्ध अनावश्यक है और इससे सभी पक्ष हारेंगे। वैश्विक नेताओं को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि शांति बहाल हो सके।