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Monday, July 15, 2019

क्यों जरूरी है मोदी जी की ‘हृदय योजना’?

अपनी सनातनी आस्था और अंतराष्ट्रीय समझ के सम्मिश्रण से मोदी जी ने 2014 में ‘स्वच्छ भारत’ या ‘हृदय’ जैसी चिरप्रतिक्षित नीतियों को लागू किया। इनके शुभ परिणाम दिखने लगे हैं और भविष्य और भी ज्यादा दिखाई देंगे। हृदय योजना की राष्ट्रीय सलाहकार समिति का मैं भी पांच में से एक सदस्य था। इस योजना के पीछे मोदी जी का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत के प्राचीन नगरों की धरोहरों को सजा-संवाकर इस तरह प्रस्तुत किया जाय कि विकास की प्रक्रिया में कलात्मकता और निरंतरता बनी रहे। ऐसा न हो कि हर आने वाली सरकार या उस नगर में तैनात अधिकारी अपनी सीमित बुद्धि और अनुभहीनता से नये-नये प्रयोग करके ऐतिहासिक नगरों को विद्रुप बना द, जैसा आजतक करते आये हैं ।
जिन बारह प्राचीन नगरों का चयन ‘हृदय योजना’ के तहत भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने किया, उनमें से मथुरा भी एक था। राष्ट्रीय स्तर पर एक पारदर्शी चयन प्रक्रिया के तहत ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को मथुरा का ‘सिटी एंकर’ बनाया गया। जिसकी जिम्मेदारी है मोदी जी की इस सोच को धरातल पर उतारना। इसलिए कार्यदायी संस्थाओं और प्रशासन की यह जिम्मेदारी रखी गई कि वे ‘सिटी एंकर’ के निर्देशन में ही कार्य करेंगे। 
आजादी के बाद पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने योग्यता और अनुभव को इतना सम्मान दिया। ये बात दूसरी है कि इस अनूठी योजना से उन अधिकारियों और कर्मचारियों को भारी उदर पीड़ा हुई, जो विकास के नाम पर आजतक कमीशनखोरी और कागजी योजनाऐं लागू करते आए हैं। उन्हें ‘सिटी एंकर’ की दखलअंदाजी से बहुत चिढ़ मचती है। फिर भी हमने वृंदावन के यमुना घाटों को व मथुरा के पोतरा कुंड जैसे कई पौराणिक स्थलों को मलवे के ढेर से निकालकर अत्यन्त लुभावनी छवि प्रदान की है, ऐसा हर तीर्थयात्रियों व दर्शक का कहना है। 
दुख की बात ये है कि पुराना ढर्रा अभी भी चालू है। ‘ब्रज तीर्थ विकास परिषद्’ से जुडे़ अधिकारी ब्रज विकास के नाम पर एक से एक फूहड़ योजनाऐं लागू करते जा रहे हैं। मोदी सरकार और योगी सरकार द्वारा प्रदत्त शक्ति और अपार धन की सरेआम बर्बादी हो रही है, जिसे देखकर ब्रजवासी और तीर्थयात्री ही नहीं संतगण भी बेहद दुखी हैं। पर कोई सुनने को तैयार नहीं।
कुछ उदाहरणों से स्थिति स्पष्ट हो जाऐगी। वृंदावन में 400 एकड़ में ‘सौभरि ऋषि पार्क’ बनने जा रहा है। जबकि सतयुग के  सौभरि ऋषि का द्वापर  में वृंदावन की श्रीकृष्ण लीला से कोई संबंध नहीं है। वृंदावन तो श्रीराधारानी और भगवान श्रीकृष्ण की नित्यविहार स्थली है, जहां उनकी लीला के अनुरूप कुँज-निकुँज का भाव और उससे संबंधित नामकरण किया जाना चाहिए । 
इतना ही नहीं , पता चला है कि इस पार्क का स्वरूप ‘डिज्नीलैंड’ जैसा होने जा रहा है। पहले जब वृंदावन में प्रवेश करते थे, तो राष्ट्रीय राजमार्ग से मुड़ते ही एक अद्भुत आध्यत्मिक भावना पनपती थी। पर मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने अब वृंदावन का प्रवेश वैसा ही कर दिया, जैसा आज गुडगाँव का है, जहां बहुमंजलीय इमारतें हैं जिनकी वास्तुकला में वृंदावन की कोई छाप नहीं है। जबकि 300 वर्ष पहले मिर्जा इस्माइल ने जयपुर और मैसूर जैसे शहरों को कलात्मकता के साथ योजनाबद्ध किया था। इतना ही नहीं इस कॉलोनी का नाम भी ‘रूकमणि विहार’ रखा गया है। रूकमणि जी द्वारिकाधीश भगवान की रानी थीं। उनका ब्रज ब्रजलीला से कोई नाता नहीं था। जबकि ब्रजलीला में ऐसी सैंकड़ों गोपियां हैं, जिनके नाम पर इस कॉलोनी का नाम रखा जा सकता था। 
इसी हफ्ते गुरू पूर्णिंमा के अवसर पर श्री गोवर्धन पर्वत की हैलीकॉप्टर से परिक्रमा प्रारंभ की गई है। इससे बड़ा अपमान गोवर्धन भगवान का हो नहीं सकता, जिनके चारों ओर राजे-महाराजे तक नंगे पाव चलकर या दंडवती लगाकर परिक्रमा करते आऐ हों, जिन्हें अपनी अंगुली पर धारणकर बालकृष्ण ने देवराज इंद्र का मानमर्दन किया हो, उन गिर्राज जी के ऊपर उड़कर अब ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ गिर्राज जी का मानमर्दन करवा रही है। 
राधारानी के श्रीधाम बरसाना में चार पर्वत शिखर हैं, जिन्हें ब्रह्माजी का मस्तक माना जाता है। इन पर राधारानी की लीलाओं से जुड़े चार मंदिर हैं-भानुगढ़, विलासगढ़, दानगढ़ व मानगढ़ । ज़रूरत इन पर्वतों के प्राकृतिक सौंदर्य को सुधारने और इनकी पवित्रता सुनिश्चित करने कीं है पर ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ इन पर रेस्टोरेंट बना रही है । जहां हर दम हुड़दंग मचेगा, प्लास्टिक की बोतलें व थर्माकोल जैसे जहरीले कूड़े के ढेर जमा होंगे और 5000 साल से यहां की संरक्षित पवित्रता नष्ट हो जायेगी, जो हाल केदारनाथ और बद्रीनाथ का हुआ। जहां की पवित्रता और प्रकृति से विकास के नाम पर विवेकहीन छेड़छाड़ की गई।
एक लंबी सूची है, जो ये सिद्ध करती है कि मोदीजी और योगीजी की श्रद्धायुक्त धामसेवा की उच्च भावना को अनुभवहीन, भावहीन, अहंकारी और आयतित अधिकारी किस तरह से ब्रज में पलीता लगा रहे हैं।
ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ की संरचना करते समय हमने यह प्रावधान रखा था कि ब्रज संस्कृति के विशेषज्ञ और अनुभवी लोगों की सामूहिक व पारदर्शी सलाह के बिना कोई योजना नहीं बनाई जायेगी। पर आज इसका उल्टा हो रहा है। ब्रज संस्कृति के विशेषज्ञ, संतगण, ब्रजवासी और ब्रज को सजाने में अनुभवी लोगों को दरकिनार कर करोड़ों रूपये की ऐसी वाहियात योजनाऐं लागू की गई है, जिनसे न तो धाम सजेगा और न ही संत और भक्त प्रसन्न होंगे। हां ठेकेदारों की और कमीशनखोरों की जेबें जरूर गर्म हो जाऐंगी।
इसलिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की ‘हृदय योजना’ को और प्रभावशाली तरीके से लागू करने की तुरंत आवश्यक्ता है। जिससे सरकार की सद्इच्छा के बॉवजूद तीर्थों में हो रहा विकास के नाम विनाश और धरोहरों की बर्बादी रूक सके। क्या प्रधानमंत्रीजी कुछ पहल करेंगे ?

Monday, December 31, 2018

‘हृदय’ को हृदयाघात


मोदी जी ने ‘हृदय योजना’ इसलिए शुरू की थी कि हेरिटेज सिटी में डिजाइन की एकरूपता बनी रहे। ये न हो कि उस शहर में आने वाला हर नया नेता और नया अफसर अपनी मर्जी से कोई भी डिजाइन थोपकर शहर को चूं-चूं का मुरब्बा बनाता रहे, जैसा मथुरा-वृन्दावन सहित आजतक देश के ऐतिहासिक शहरों में होता रहा है। यह एक अभूतपूर्व सोच थी, जो अगर सफल हो जाती, तो मोदी जी को ऐतिहासिक शहरों की संस्कृति बचाने का भारी यश मिलता। पर दशकों से कमीशन खाने के आदी नेता और अफसरों ने इस योजना को विफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी क्योंकि उन्हें डर था कि अगर ये योजना सफल हो गई, तो फर्जी नक्शे बनाकर, फर्जी प्रोजेक्ट पास कराने और माल खाने के रास्ते बंद हो जाएंगे। चूंकि मथुरा-वृंदावन में ‘हृदय’ के ‘सिटी एंकर’ के रूप में भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को चुना था, इसलिए उसी अनुभव को यहां साझा करूंगा।

दुनिया के खूबसूरत पौराणिक शहर वृन्दावन का मध्युगीन आकर्षक चेहरा एमवीडीए. के अफसरों के भ्रष्टाचार और लापरवाही से आज विद्रूप हो चुका है। आज भी भोंडे अवैध निर्माण धड़ल्ले से चालू हैं। इस विनाश के लिए जिम्मेदार रहे अफसर ही अब योगी राज  में बनाऐ गऐ ‘ब्रज तीर्थ विकास परिषद् के कर्ता-धर्ता बनकर ब्रज का भारी विनाश करने पर तुले हैं।

ऊपर से दुनिया भर के मीडिया में हल्ला ये है कि ब्रज का भारी विकास हो रहा है। योगी जी ने खजाना खोल दिया है। अब ब्रज अपने पुराने वैभव को फिर पा लेगा। जबकि जमीनी हकीकत ये है कि वृन्दावन, गोवर्धन और बरसाना सब विद्रूपता की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। ब्रज के संत, भक्त व ब्रज संस्कृति प्रेमी सब भारी दुखी हैं। मोदी सरकार द्वारा इसी वर्ष पद्मश्री से सम्मानित ब्रज संस्कृति के चलते-फिरते ज्ञानकोश डा. मोहन स्वरूप भाटिया भी 'ब्रजतीर्थ विकास परिषद्' के इन कारनामों से भारी दुखी हैं और बार-बार इसका लिखकर विरोध कर रहे हैं, पर कोई सुनने वाला नहीं।

जयपुर व मैसूर दो सर्वाधिक सुन्दर शहरों में ‘मिर्जा इस्माईल रोड’ उस वास्तुकार के नाम पर हैं, जिसने इन शहरों का नक्शा बनाया था। पेरिस की ‘एफिल टावर’ किसी नेता के नाम पर नहीं बल्कि उसका डिजाइन बनाने वाले इंजीनियर श्री एफिल के नाम पर है। पर योगी सरकार को इतनी सी भी समझ नहीं है कि मथुरा, अयोध्या और काशी के विकास के लिए उन लोगों की सलाह लेती जिनका इन प्राचीन नगरों की संस्कृति से गहरा जुड़ाव है, जिनके पास इस काम का ज्ञान और अनुभव है। पर ऐसा नहीं हुआ। हमेशा की तरह नौकरशाही ने घोटालेबाज या फर्जी सलाहकारों को इन प्राचीन शहरों पर थोपकर, इनका आधुनीकरण शुरू करवा दिया। अब इनका रहा-सहा कलात्मक स्वरूप भी नष्ट हो जाऐगा। बंदर को उस्तरा मिले तो वो क्या करेगा ?

उदाहरण के तौर पर मोदी जी की प्रिय ‘हृदय योजना’ में जब व्यवाहरिक, सुंदर व भावानुकूल वृन्दावन परिक्रमा मार्ग 2.5 किमी० बन ही रहा है, तो शेष 8 किमी. परिक्रमा पर एक नया डिजाइन बनाकर लाल पत्थर का भौंडा काम कराने का क्या औचित्य है ? पर ये पूछने वाला कोई नहीं।

योगी जी के मंत्रियों और अफसरों ने अपने अहंकार और मोटे कमीशन के लालच में, ब्रज में ऐतिहासिक जीर्णोद्धार करती आ  रही ‘द ब्रज फाउंडेशन’ की महत्वपूर्ण भूमिका को नकार कर, विकास के नाम पर, पैसे की बर्बादी का तांडव चला रखा है। जबकि ब्रज फाउंडेशन के योगदान को मोदी जी से लेकर हरेक ने आजतक खूब सराहा है।

उल्लेखनीय है कि योगी सरकार के आते ही 9 पौराणिक कुंडों के जीर्णोद्धार का 27 करोड़ रुपये के काम का ठेका 77 करोड़ रुपये में दिया जा रहा था। गोवर्धन क्षेत्र के विकास का काम जयपुर के मशहूर घोटालेबाज अनूप बरतरिया को सौंपा जा रहा था। द ब्रज फाउंडेशन ने जब इसका विरोध किया, तो सब एकजुट होकर गिद्ध की तरह उस पर टूट पड़े । जिससे ये सब मिलकर ब्रज विकास के नाम पर खुली लूट कर सकें।

उधर सभी संतगण व भक्तजन गत 15 वर्षों से द ब्रज फाउंडेशन के कामों को पूरे ब्रज में देखते व सराहते आये हैं। मोदी जी के खास व भारत के  नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत का कहना है कि, ‘जैसा काम बिना सरकारी पैसे के 15 वर्षों में ब्रज में ब्रज फॉउंडेशन ने  किया है वैसा काम 80 प्रतिशत प्रान्तों के पर्यटन विभागों ने पिछले 71 वर्ष में नहीं किया’।

सारी दुनिया के श्री राधाकृष्ण भक्तों, संतगणों व ब्रजवासियों के लिए ये चिंता और शोभ की बात होनी चाहिए कि 71 वर्षों से आश्रम के नाम पर केवल अपने लिए गेस्ट हाउस बनाने वाले राजनैतिक लोग आज ब्रज की सेवा व विकास के नाम हम सबका खुलेआम उल्लू बना रहे हैं । ब्रज विकास के नाम पर इनकी बनाई हर योजना एक धोका है। इससे न तो ब्रज के कुंड, सरोवर, वन सुधरेंगे और न ही आम ब्रजवासियों को कोई लाभ होगा। ब्रज को ‘डिज्नी वर्ल्ड’ बनाकर बाहर के लोग यहां कमाई करेंगे।

गत 4 वर्षों से मैं इन सवालों पर केंद्र और राज्य सरकार का ध्यान इसी कालम के माध्यम से और पत्र लिखकर भी आकर्षित करता रहा हूं, पर किसी ने परवाह नहीं की। अब मैंने प्रधानमंत्री जी से समय मांगा है, ताकि उनको जमीनी हकीकत बताकर आगे की परिस्थितियां सुधारने का प्रयास किया जा सके। बाकी हरि इच्छा।

Monday, November 26, 2018

ब्रजवासियों के साथ धोखा क्यों?

जब से ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ का गठन हुआ है, ये एक भी काम ब्रज में नहीं कर पाई है। जिन दो अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ जी ने इतने महत्वूपर्णं ब्रजमंडल को सजाने की जिम्मेदारी सौंपी हैं, उन्हें इस काम का कोई अनुभव नहीं है। इससे पहले उनमें से एक की भूमिका मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष के नाते तमाम अवैध निर्माण करवाकर ब्रज का विनाश करने में रही है। दूसरा सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी है, जिसने आजतक ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण पर कोई काम नहीं किया। इन दोनों को ही इस महत्वपूर्णं, कलात्मक और ऐतिहासिक काम की कोई समझ नहीं है। इसलिए इन्होंने अपने इर्द-गिर्द फर्जी आर्किटैक्टों, भ्रष्ट जूनियर अधिकारियों और सड़कछाप ठेकेदारों का जमावाड़ा कर लिया है। सब मिलकर नाकारा, निरर्थक और धन बिगाड़़ू योजनाऐं बना रहे हैं। जिससे न तो ब्रज का सौंदर्य सुधरेगा, न ब्रजवासियों को लाभ होगा और न ही संतों और तीर्थयात्रियों को। केवल कमीशन खोरों की जेबें भरी जाऐंगी।
इनकी मूर्खता का ताजा उदाहरण है भगवान श्रीकृष्ण की 40 करोड़ रूपये की विशाल मूर्ती, जिसे ये दिल्ली-आगरा के बीच सुश्री मायावती द्वारा बनावाऐं गये यमुना एक्सप्रेस वे के उस बिंदु पर लगवाने जा रहे हैं, जहां से गाड़ियां वृंदावन के लिए मुड़ती है। 40 करोड़ की मूर्ती में कितना कमीशन खाया जाऐगा, इसका अंदाजा इसी बात से लगा लीजिए, कि ब्रज के 9 कुंडों के जीर्णोंद्धार का ठेका, ये सरकारी लोग 77 करोड़ में पिछले वर्ष दे चुके थे। जिसे ‘द ब्रज फाउंडेशन’ के शोर मचाने और बेहतर कार्य योजना देने के बाद अब मात्र 27 करोड़ रूपये में करवाया जायेगा। इस तरह 50 करोड़ रूपये की बर्बादी रोकी गई है। क्योंकि द ब्रज फाउंडेशन गत 15 वर्षों से अपने तन-मन-धन से भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीलास्थलियां सजा रही है। इसलिए उससे कोई चोरी छिप नहीं सकती। 77 करोड़ रूपये में 50 करोड़ रूपये का घोटाला, यानि 66 फीसदी कमीशन। इस अनुपात से 40 करोड़ रूपये की मूर्ती में 27 करोड़ रूपया कमीशन में जाएगा।
मूर्ति लगवाने के पीछे इनका तर्क है कि वाहन चालकों को दूर से ही पता चल जाएगा कि वृंदावन आ गया। कितनी हास्यास्पद बात है, बिना मूर्ती लगे ही जब हजारों गाड़ियां रोज वृंदावन आ रही है, तो उन्हें  रास्ता कौन बता रहा है? जिसे वृंदावन आना है, उसे सब रास्ते पता हैं। वैसे जो तीर्थयात्री रोज आ रहे हैं, उनसे ही वृंदावन की सारी व्यवस्था चरमरा जाती है। गत दो वर्षों में ब्रज तीर्थ विकास इस स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नही कर पाया। तो अब विशाल मूर्ती लगवाकर और मजमा क्यों जोड़ना चाहता है?
उधर ब्रज में 85 फीसदी भू जल खारा है। प्राचीन कुंडों के जीर्णोंद्धार जल संचयन भी होता है और खारापन भी क्रमशः कम होता है। सर्वोच्च न्यायालय के 2001 के ‘हिंचलाल तिवारी आदेश’ के तहत शासन को ब्रज के उपेक्षित पड़े 800 से भी अधिक कुंडों का जीर्णोंद्धार कराना चाहिए था। जबकि उसने आजतक लगभग 40 करोड़ रूपया खर्च करके 40 कुंडों का जीर्णोंद्धार करवाया है, जिनकी दशा पहले से भी ज्यादा दयनीय हो गई हैं। उनके नऐ बने घाट टूट रहे हैं, कूड़े और मलबे के ढेर जमा हो गऐ हैं और उनमें कुत्ते और सूअर डोलते हैं।
इस मूर्ती को लगवाने से बेहतर होता कि ब्रजतीर्थ विकास परिषद् ब्रज के कुछ कुंडों का जीर्णोंद्धार करवा देता, तो ब्रज में जल की समस्या के समाधान की दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ते। साथ ही इससे ब्रज के गांवों में रहने वाले गोधन, ब्रजवासियों और संतों को प्रसन्नता होती। पर वहां भी इनकी गर्दन फंसी है। क्योंकि द ब्रज फाउंडेशन ने बेहद कम लागत पर वृंदावन के ब्रह्म कुंड, गोवर्धन के ऋणमोचन कुंड, रूद्र कुंड व संकर्षण कुंड, जैंत का जयकुंड, चौमुहा  का ब्रह्म सरोवर आदि दर्जनों पौराणिक कुंडों का मनोहारी जीर्णोंद्धार कर मथुरा जिले की जलधारण क्षमता को 5 लाख क्यूबिक मीटर बढ़ा दिया है। अब अगर ब्रज तीर्थ विकास परिषद् कुंडों का जीर्णोंद्धार करेगी, तो उसे भी द ब्रज फाउंडेशन की लागत के बराबर कीमत पर काम करना पड़ेगा। तिगुने दाम की योजना बनाने वाली ब्रजतीर्थ विकास परिषद् फिर कमीशन कैसे खा पाऐगीा? इसलिए विशाल मूर्ती लगवाने जैसी फालतू परियोजनाऐं बनाई जा रही है, जिससे कोई हिसाब भी न मांग सके और ढ़िढोरा भी पीट दिया जाऐ कि 40 करोड़ रूपये की मूर्ती लगवा दी गई।
योगी जी से उद्घाटन करवाने की जल्दी में ब्रजतीर्थ विकास परिषद् ने सड़कछाप आर्किटैक्टों को पकड़कर बड़े बजट की परियोजनाऐं बनवा ली हैं, जिससे मोटा कमीशन खाया जा सके। इस तरह हर ओर ब्रज का विनाश किया जा रहा है। भाजपा योगी महाराज को हिंदू धर्म का पुरोधा बनाकर चुनावों में घुमा रही है। पर योगी महाराज की सरकार के भ्रष्ट और निकम्मे अधिकारी ब्रज जैसे कृष्ण भक्ति के पौराणिक धाम की महत्ता और संवेदनशीलता को समझे बिना शहरी लोगों के मनोरंजन के लिए बड़ी-बड़ी खर्चीली योजनाऐं बनवा रहे हैं। जिनसे ब्रज का विकास होना तो दूर, विनाश की गति तेजी से बढ़ गई है। चुनाव में वोट मांगे जाऐंगे आम ब्रजवासी से, जो गांवों में रहता है। जिसने कान्हा से संग गाय चराई। जिनके घरों से कान्हा ने माखन चुराया। उन सब ब्रजवासियों की उपेक्षा कर बाहर से आने वाले सैलानियों के मनोरंजन की योजनाऐं बनाकर ब्रजतीर्थ विकास परिषद् क्यों योगी महाराज की छवि खराब करने में जुटी है? ये ब्रजवासियों के साथ सरासर धोखा है।

Monday, August 13, 2018

योगी आदित्यानाथ जी ध्यान दें!

पिछले दिनों जब उ.प्र. में निर्माण संबंधी हुई अनेक दुर्घटनाओं के बाद उ.प्र. के सिविल इंजीनियरों ने एक खुला पत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को संबोधित करते हुए लिखा। जिसका मसौदा निम्न प्रकार है-‘‘आज उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे धंस रहे हैं। बनारस में ब्रिज के बीम डिस्प्लेसड हो रहे हैं। सड़कों पर गढ्ढो के कारण दुर्घटनाएं हो रही हैं। नहरें टूट रही हैं। खेतों को समुचित पानी नहीं मिल पा रहा। बाँध पानी से लबालब भर नहीं पा रहे। किसी शहर का भी ड्रेनेज सही नहीं हैं। इन प्रोजेक्ट्स का पूरा फायदा लोगों को नहीं मिल पा रहा। शहरों के सीवर जाम हैं।  आखिर क्यों ? कभी किसी इंजीनयर से पूछा जाएगा या उन्हें केवल दण्डित किया जाएगा ? बच्चा भी 9 माह  पेट में पलता है तभी स्वस्थ पैदा होता है और आगे जीवन में स्वस्थ रहने की संभावना ज्यादा होती है। यहां तो इंजिनीयरों को बस डेट दी जाती है और फिर शुरू होता है समीक्षा - समीक्षा का टी 20 खेल। यह नही पूछा जाता की प्रोजेक्ट कब तक पूरा हो सकता है। दबाव होता है कि फलां तारीख तक प्रोजेक्ट पूरा हो जाए। ना तो मैनपावर मिलेगी ना आवश्यक सुविधाएं।

महाराज जी यह निर्माण का कार्य है। विध्वंस की तरह मत करवाइये। समय दीजिये। डी.पी.आर. बनाने में बहुत समय चाहिए होता है। एस्टीमेट बनाने में बहुत सारी जानकारियां चाहिए। दरों की एनालिसिस करना आसान काम नही है। कोई भी स्ट्रक्चर एक इंजीनयर के लिए उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति है। उसका निर्माण एक सुखद पर पीड़ादायक घटना है। समय पूर्व प्रसव की तरह का व्यवहार किसी भी संरचना के साथ मत कीजिये। इंजिनीयरों ने राष्ट्र के विकास में बहुत योगदान दिया है। उनको पार्टी कार्यकताओं की हठधर्मिता के सहारे मत छोड़िये। नहीं तो कोई भी निर्माण मात्र विध्वंस का कारण ही बनेगा। विकास की आड़ में ठेकेदारी और जेब भरने का उपक्रम नही चलना चाहिए न।  ना तो भारत रत्न विश्वशरैया जी ने ना ही श्रीधरन जी ने दबाव में काम किया था। तभी उन्होंने मेट्रो जैसी धरोहरों का निर्माण किया।

हर राजनैतिक दल सत्तारूढ दल को भ्रष्टाचारी बताकर अपना चुनाव अभियान चलाता है और जनता से भ्रष्टाचारमुक्त शासन देने का वायदा करता है। पर हकीकत यह है कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और। ऐसा कभी नहीं सुना जाता कि किसी निर्माण कंपनी को उसके अनुभव और गुणवत्ता के आधार पर योनजाओं के क्रियान्वयन के लिए चुना जाए। यों चुनने की प्रक्रिया अब काफी पारदर्शी बना दी गई है। जिसमें ऑनलाईन निविदाऐं भरी जाती है और टैक्निकल व फायनेंसियल बिडिंग का तुलनात्मक अध्ययन करके ठेके आवंटित किये जाते हैं। पर ये सब भी एक नौटंकी से ज्यादा कुछ नहीं है। सरकार किसी भी दल की क्यों न हो, उसके मंत्री सत्ता में आते ही मोटी कमाई के तरीके खोजने लगते हैं और नौकरशाही के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से सभी परियोजनाऐं अपने चहेतों को दिलवाते हैं।’’

मंत्री के चहेते का मतलब होता है, जो मंत्री के घर जाकर निविदा दाखिल करने से पहले ही मंत्री को अग्रिम रूप से मोटी रकम देकर, इस बात को सुनिश्चित कर ले कि जो भी ठेका मिलेगा, वो उसे ही मिलेगा। इसके बाद निविदा की सारी प्रक्रिया एक ढकोसला मात्र होती है। और वही होता है जो, ‘जो मंजूरे मंत्री जी होता है’।

योगी जी जब सत्ता में आए थे, तो उन्होंने भी बहुत कोशिश की कि भ्रष्टाचारविहीन शासन दें। पर आज तक कुछ भी नहीं बदला। जो कुछ पहले चल रहा था। उससे और ज्यादा भ्रष्टाचार आज सार्वजनिक निर्माण के क्षेत्र में अनुभव किया जा रहा है। मैंने कई बार इस मुद्दे उठाया है कि भ्रष्टाचार का असली कारण ‘करप्शन इन डिजाईन’ होता है। यानि योजना बनाते समय ही मोटा पैसा खाने की व्यवस्था बना ली जाती है। जैसा उ.प्र. के पर्यटन विभाग में हमें अनुभव हुआ। जब उसने पिछले वर्ष ब्रज के 9 कुंडों के जीर्णोंद्धार का ठेका 77 करोड़ रूपये में उठा दिया। हमने इसका पुरजोर विरोध किया और परियोजना में तकनीकी खामिया उजागर की, तो अब यही काम मात्र 27 करोड़ रूपये में होने जा रहा है। यानि 50 करोड़ रूपया सीधे किसी की जेब में जाने वाले थे। इतना ही नहीं योगी जी ने बड़े प्रचार के साथ जिस ‘ब्रज तीर्थ विकास परिषद्’ की स्थापना की है, उसके मूल संविधान में छेड़छाड़ करके वर्तमान उपाध्यक्ष शैलजाकांत मिश्र ने उसे भारी भ्रष्टाचार करने के लिए सुगम बना दिया है। मूल संविधान में परिषद् में पर्यटन से संबंधित अनेक विशेषज्ञों को लेने का प्राविधान था, जिसे श्री मिश्रा ने बड़े गोपनीय तरीके से हटवाकर, ऐसी व्यवस्था बना ली कि अब किसी भी साधारण सामाजिक कार्यकर्ता या दलालनुमा व्यक्ति को बोर्ड में लाया जा सकता है। इसी तरह ‘सी.ई.ओ’ की ताकत भी इतनी बढ़ा दी कि अब कोई उन्हें ब्रज को बर्बाद करने से नहीं रोक सकता। केवल दो लोगों के अहमकपन से भगवान श्रीकृष्ण के ब्रज का विकास नियंत्रित हो गया है। जिसके निश्चित रूप से घातक परिणाम सामने आऐंगे और तब ये योगी सरकार के लिए ‘ताज कोरिडोर’ जैसा घोटाला खुलेगा।

अभी पिछले दिनों बनारस में निर्माणाधीन पुल की बीम गिरी और 18 लोग मर गऐ। आगरा में ‘रिंग रोड’ धंस गई। मथुरा के गोवर्धन रेलवे स्टेशन का नवनिर्मित चबूतरा बैठ गया। बस्ती जिले में पुल गिर गया। ऐसी दुर्घटनाऐं आए दिन हो रही है, पर सरकार कोई सबक नहीं ले रहीं। इससे उ.प्र. के मतदाताओं की जान जोखिम में पड़ गई है। पता नहीं कब, कहां, क्या हादसा हो जाऐ?

Monday, June 19, 2017

गोवर्धन का विनाश रोकें मोदी जी


जनवरी 2006 में हैदराबाद के ‘प्रवासी दिवस’ कार्यक्रम में विदेशी प्रतिनिधियों के सामने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी से मेरा रोचक सामना हुआ। मोदी जी गुजरात को भ्रष्टाचार मुक्त करने की बात कर रहे थे, तभी मेरे साथ बैठे मेरे मित्र चंदू पटेल, जो पहले भारतीय हैं, जिन्होंने हिल्टन होटल, लास ऐंजेलस, खरीदा था, खड़े हो गये और बोले, ‘‘नरेन्द्र भाई! आपसे विनीत भाई नारायण खुश नहीं हैं’’। मोदी जी एक क्षण को ठिठक गये। तभी चंदू भाई ने बात पूरी की, ‘‘क्योंकि उन्हें आपके राज्य में कोई घोटाला नहीं मिल रहा‘‘। इस पर मोदी जी और सारा हाल ठहाकों में गूंज गया। इससे पहले मेरा मोदी जी से कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं था।



मुझे आश्चर्य हुआ कि मोदी जी ने तुरंत मेरे बारे में गुजराती में बोलना शुरू कर दिया। वे बोले,‘‘ विनीत भाई नारायण भारत के बड़े पत्रकार हैं। उन्हें भ्रष्टाचार की जड़ में छाछ डालने में मजा आता है। मेरा उन्हें निमंत्रण है कि वे गुजरात आकर मेरे घोटाले खोजें’’।



इस पर मैं खड़ा हो गया और बोला,‘‘ मैं ही विनीत नारायण हूं, पर अब मैं घोटाले नहीं खोजता। अब तो मैं भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीला भूमि ब्रज को सजाने में जुटा हूं। हमारे ठाकुर जी ब्रज छोड़कर आपकी द्वारिका में जा बसे थे। इसलिए आप सब ‘जय श्रीकृष्ण’ बोलते हैं। पुराने जमाने में अनेक राजे-महाराजे ब्रज में आकर कुंड, घाट, वन बनवाते थे। आप आज गुजरात के राजा हो। कहावत है- दुनियां के गुरू सन्यासी, सन्यासियों के गुरू ब्रजवासी। मैं ब्रजवासी होने के नाते, आपको आर्शीवाद देता हूं कि आप भारत के प्रधानमंत्री बनें और ब्रज सजाने में हमारी मदद करें।’’



यह सुनकर नरेन्द्र भाई मोदी भावुक हो गये और बोले, ‘‘जब मैं दिल्ली भाजपा मुख्यालय में था, तब मेरे मन में गोवर्धन की परिक्रमा सजाने का प्रबल भाव आया था। इससे पहले कि मैं कुछ कर पाता, मुझे गुजरात भेज दिया गया। विनीत भाई आप गुजरात आओ, हम आपके प्रयास में पूरा सहयोग करेंगे।’’



2014 में जब मैं नरेन्द्र भाई मोदी को ब्रज विकास की अपनी पावर पाइंट प्रस्तुति दे रहा था। तब उन्हें मैंने ब्रज फाउंडेशन की अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम द्वारा गोवर्धन के सौन्दर्यीकरण के लिए तैयार की गई परिकल्पना की भी प्रस्तुति की थी। जिसे उन्होंने बहुत सराहा।



आजकल गोवर्धन के विकास के नाम पर जो कुछ प्रस्तावित किया जा रहा है, उसे पिछले दिनों अखबारों से जानकर हर कृष्णभक्त और गोवर्धन प्रेमी बहुत विचलित है। गोवर्धन का विकास अमृतसर की तर्ज पर नहीं किया जा सकता। क्योंकि स्वर्ण मंदिर पूरी तरह शहर के बीच स्थित एक शहरीकृत तीर्थस्थल है। जबकि गोवर्धन का अर्थ है-गायों का सवंर्धन करने वाला पर्वत। जहां गायें स्वछन्दता से चरती हों। गोवर्धन महात्म्य के सभी ग्रंथों में रसिक संतों ने गोवर्धन के नैसर्गिक सौन्दर्य का दिव्य वर्णन किया है। जिससे पता चलता है कि यहां सघन वृक्षावली, फलों से लदे वृक्ष, चारों ओर दूध जैसे लगने वाले जलप्रपात और स्वच्छ जल से भरे हुए सरोवर हुआ करते थे और वही यहां की शोभा थी। गोवर्धन की तलहटी की रज में लोट-पोट होकर संत, भजनानंदी और परिक्रमार्थी स्वयं को धन्य मानते थे। कलयुग के प्रभाव से गोवर्धन के इस स्वरूप का तेजी से विनाश किया गया। आजादी के बाद सरदार बल्लभ भाई पटेल ने यहां कुछ वृक्षारोपण करवाया था। उसके बाद किसी बड़े राजनेता ने गोवर्धन के महात्म्य को जानने और गिर्राज महाराज की यथोचित सेवा करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया।



2003 में जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रयास से मुझे गोवर्धन के दानघाटी मंदिर का मानद रिसीवर बनाया गया, तब से मैंने स्थानीय विशेषज्ञों व जिला प्रशासन के साथ नियमित विचार विर्मशकर गोवर्धन की समस्याओं को समझने का प्रयास किया। उसके बाद देश-विदेश में पढ़े और धर्म में गहरी आस्था रखने वाले आर्किटैक्टों की मदद से गोवर्धन के सौन्दर्यीकरण और यात्रियों के लिए आधुनिक आवश्यक्ताओं को ध्यान में रखते हुए, एक विस्तृत कार्ययोजना की परिकल्पना तैयार की। जिसे तैयार करने में 5 वर्ष लगे।



देखने वाला इसे देखता ही रहा जाता है। यह परियोजना 2008 में हमने उ0प्र0 पर्यटन विभाग को अधिकृत रूप से सौंपी। हमारी चिंता का विषय ये है कि गोवर्धन की मूल भावना को समझे बिना, गोवर्धन के विकास के जिस स्वरूप की बात आज की जा रही है, उससे गोवर्धन का स्वरूप बिगड़ेगा, बनेगा नहीं। प्रधानमंत्रीजी को इस पर ध्यान देना चाहिए और हैदराबाद में हमसे किया वायदा निभाना चाहिए। जिससे गिरिराज महाराज की ऐसी सेवा हो कि संत, भक्त और ब्रजवासी जय-जयकार करें, आहत न हों।



हमें आधुनिक व्यवस्थाओं से कोई परहेज नहीं हैं। समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं। इसलिए दोनो विचार धााराओं के बीच संघर्ष न हो और सौहार्दपूर्णं सामन्जस्य हो, तो बात बन सकती है। इस विषय में प्रधानमंत्री जी के प्रमुख सचिव से लेकर उ.प्र. के मुख्यमंत्री व उनके मंत्रीमंडलीय सहयोगियों तक हमने अपनी चिंता व्यक्त कर दी है। पर सही कदम तो तभी उठेंगे, जब प्रधानमंत्री जी थोड़ी रूचि लें और गोवर्धन का विनाश न होने दें।

Monday, December 21, 2015

सरकार का काम नहीं मंदिर चलाना

वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर के सरकारी अधिग्रहण की खबर से वृंदावन उबाल पर है। 500 वर्ष पुराने बांकेबिहार मंदिर पर आश्रित गोस्वामियों के परिवार, संतगण और वृंदावन वासी मंदिर का उत्तर प्रदेशा शासन द्वारा अधिग्रहण किए जाने के खिलाफ धरने-प्रदर्शन और आंदोलन कर रहे हैं। पिछले 3 दर्शकों से यह मंदिर ब्रज का सर्वाधिक लोकप्रिय मंदिर है। जिसके दर्शन करने हर कृष्णभक्त एक-न-एक बार वृंदावन अवश्य आता है। संकरी गलियों और मध्युगीन भवन के कारण मंदिर पहुँचने का मार्ग और इसका प्रांगण हमेशा भीड़ से भरा रहता है। जिसके कारण काफी अव्यवस्थाएं फैली रहती है। यही कारण है कि व्यवस्थित  रूप से सार्वजनिक स्थलों पर जाने के अभ्यस्त लोग यहां की अव्यवस्थाएं देखकर उखड़ जाते हैं। ऐसे ही बहुत से लोगों की मांग पर उ.प्र. शासन ने इस मंदिर को व मिर्जापुर के विन्ध्यावासिनी मंदिर को सरकारी नियंत्रण में लेने का फैसला किया है। जिसका काफी विरोध हो रहा है।

मंदिर की व्यवस्था सुधरे, दर्शनार्थियों को कोई असुविधा न हो व चढ़ावे के पैसे का सदुपयोग हो, ऐसा कौन नहीं चाहेगा ? पर सवाल है कि क्या अव्यवस्थाएं सरकारी उपक्रमों में नहीं होती? जितने भी सरकारी उपक्रम चलाए जा रहे हैं, चाहे वह राज्य सरकार के हों या केन्द्र सरकार के प्रायः घाटे में ही रहते हैं। कारण उनको चलाने वाले सरकारी अधिकारी और नेता भ्रष्ट आचरण कर इन उपक्रमों का जमकर दोहन करते हैं। तो कैसे माना जाए कि मंदिरों का अधिग्रहण होने के बाद वही अधिकारी रातो-रात राजा हरीशचन्द्र के अनुयायी बन जाएंगे ? यह संभव नहीं है। पिछले दिनों आंध्र प्रदेश के राज्यपाल जोकि तिरूपति बालाजी ट्रस्ट के अध्यक्ष थे, अपनी पीड़ा मुझसे हैदराबाद के राजभवन में व्यक्त करते हुए कह रहे थे कि भगवान के काम में भी ये लोग भ्रष्टाचार करते हैं, यह देखकर बहुत दुःख होता है। वे स्वयं बड़े भक्त हैं और राजभवन से कई किलोमीटर दूर नंगे पांव पैदल चल कर दर्शन करने जाते हैं।

हो सकता है कि उ.प्र. सरकार की इच्छा वाकई बिहारी जी मंदिर और बिन्ध्यावासिनी मंदिर की दशा सुधारने की हो पर जनता यह सवाल करती है कि सीवर, सड़क, पानी, बिजली, यातायात और प्रदूषण जैसी विकराल समस्याओं के हल तो कोई सरकार दे नहीं पाती फिर मंदिरों में घुस कर कौन सा करतब दिखाना चाहती है ? लोगों को इस बात पर भी नाराजगी है कि हिन्दुओं के धर्मस्थालों के ही अधिग्रहण की बात क्यों की जाती है? अन्य धर्मों के स्थलों पर सरकार की निगाह क्यों नहीं जाती ? चाहे वह मस्जिद हो या चर्च। दक्षिण भारत में मंदिरों का अधिग्रहण करके सरकारों ने उसके धन का अन्य धर्मावलंबियों के लिए उपयोग किया है, इससे हिन्दू समाज में भारी आक्रोश है।

बेहतर तो यह होगा कि मंदिरों का अधिग्रहण करने की बजाय सभी धर्मों के धर्मस्थलों के प्रबंधन की एक सर्वमान्य रूपरेखा बना दी जाए। जिसमें उस धर्म स्थल के रख-रखाव की बात हो, यात्रियों की सुविधाओं की बात हो, उस धर्म के अन्य धर्मस्थलों के जीर्णोंद्धार की बात हो और उस धर्म के मानने वाले निर्धन लोगों की सेवा करने के व्यवहारिक नियम बनाए जाएं। साथ ही उस मंदिर पर आश्रित सेवायतों के रखरखाव के भी नियम बना दिए जाएं जिससे उनके परिवार भी सुख से जी सकें। इसके साथ ही धर्मस्थलों की आय का एक निर्धारित फीसदी भविष्य निधि के रूप में जमा करा दिए जाएं। इस फार्मूले पर सभी धर्म के लोगों को अमल करना अनिवार्य हो। इसमें कोई अपवाद न रहे। जो धर्म स्थल इस नियम का पालन न करे उसके अधिग्रहण की भूमिका तो बनाई जा सकती हैं पर जो धर्मस्थल इस नियमावली को पालन करने के लिए तैयार हो उसे छेड़ने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि मंदिरों के साथ उनके उत्सवों और सेवापूजा की सदियों पुरानी जो परंपरा है उसे कोई सरकारी मुलाजिम नहीं निभा सकता। इसलिए भी मंदिरों का अधिग्रहण नहीं होना चाहिए।

आज से 12 वर्ष पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मा. न्यायाधीशों के अनुरोध पर मैं 2 वर्ष तक बांकेबिहार मंदिर वृंदावन का अवैतनिक रिसीवर रहा था। उस दौरान मंदिर की व्यवस्थाओं का गहराई से देखने और समझने का मौका मिला। जितना बन पड़ा उसमें सुधार करने की कोशिश की। जिसे सभी ने सराहा। पर जो सुधार करना चाहता था उस पासंग भी नहीं कर पाया क्योंकि गोस्वामीगणों के बीच यह विवाद, मुकद्दमेबाजी और आक्रामक रवैए ने कोई बड़ा सुधार होने नहीं दिया। हार कर मैंने बिहारीजी और दानघाटी गोवर्द्धन मंदिर के रिसीवर पद से इस्तीफा दे दिया। मेरा मन स्पष्ट था कि मुझे ब्रज में भगवान के लीलास्थालीयों के जीर्णोद्धार का काम करना है और मंदिरों की राजनीति या उनके प्रबंधन मंे नहीं उलझना है। आज भी मैं इसी बात पर कायम हूं। इसलिए बांकेबिहारी मंदिर के इस विवाद में मेरी कोई रूची नहीं है। पर जनता की भावना की हरेक को कद्र करना चाहिए। यह सही है कि मंदिर का अधिग्रहण होने से वृंदावन के समाज को बहुत तकलीफ होगी। पर दूसरी तरफ मंदिर की व्यवस्था में सुधार भी उतना ही जरूरी है। जिस पर संतों, गोस्वामीगणों को मिल-बैठकर समाधान खोजना चाहिए। गोस्वामियों को चाहिए कि मंदिर की व्यवस्थाओं का फार्मूला तैयार करें और उन सुधारों को फौरन लागू करके दिखाएं और तब सरकार को यह सोचने पर मजबूर करें कि मंदिर का अधिग्रहण करके वह क्या हासिल करना चाहती है। तब इस अधिग्रहण विरोधी आंदोलन की धार और भी तेज होगी
 

Monday, May 11, 2015

‘प्रो पूअर टूरिज्म’ के मायने

अखबारों में बड़ा शोर है कि विश्व बैंक उत्तर प्रदेश में गरीबों के हक में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हजार करोड़ रूपये देने जा रहा है। जिसमें 400 करोड़ रूपया केवल ब्रज (मथुरा) के लिए है। प्रश्न उठता है कि ‘प्रो पूअर’ यानि गरीब के हक में पर्यटन का क्या मतलब है ? क्या ये पर्यटन विकास ब्रज में रहने वाले गरीबों के लिए होगा या ब्रज आने वाले गरीब तीर्थयात्रियों के लिए ? विश्व बैंक को अब जो प्रस्ताव भेजे जाने की बात चल रही है, उनमें ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता। मसलन, वृंदावन के वन चेतना केंद्र को आधुनिक वन बनाने के लिए 100 करोड़ रूपये खर्च करने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। सोचने वाली बात यह है कि वृंदावन में तो पहले से ही सारी दुनिया से अपार धन आ रहा है और तमाम विकास कार्य हो रहे हैं और वृंदावन में ऐसे कोई निर्धन लोग नहीं रहते, जिन्हें वन चेतना केंद्र पर 100 करोड़ रूपया खर्च करके लाभान्वित किया जा सके।
वृंदावन पर अगर खर्च करना ही है, तो सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट होता कि वृंदावन आने वाले हजारों निम्नवर्गीय तीर्थयात्रियों के लिए बुनियादी सुविधाओं का व्यापक इंतजाम। इस परियोजना को मैं पिछले 10 वर्षों से संबंधित अधिकारियों से आगे बढ़ाने को कहता रहा हूं। आज जहां रूक्मिणी बिहार जैसी अट्टालिकाओं वाली कालोनी बन गईं, जिनके 90 फीसदी मकान खाली पड़े हैं और वृंदावन की प्राकृतिक शोभा भी नष्ट हो गई, उनकी जगह यहां विशाल क्षेत्र में सैकड़ों बसों के खड़े होने का, गरीब यात्रियों के भेजन पकाने, शौच जाने का और चबूतरों पर टीन के बरामडों में सोने का इंतजाम किया जाना चाहिए था। आज ये गरीब तीर्थयात्री सड़कों के किनारे खाना पकाने, शौच जाने और सोने को मजबूर हैं, क्योंकि किसी तरह जीवनभर की कमाई में से इतना पैसा तो बचा लिया कि अपने बूढ़े मां-बाप को बंगाल, बिहार, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश जैसे सुदूर राज्यों से बसों में बैठाकर ब्रज घुमाने ले आएं। पर इतना धन इनके पास नहीं होता कि यह होटल में ठहरें या खायें। पर अब तक की बातचीत में कहीं इस विचार को प्रोत्साहन नहीं दिया गया। अभी हाल ही में एक समाचार पढ़ा कि इस विचार पर अब एक छोटा-सा प्रोजेक्ट मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण शुरू करेगा। वृंदावन की लोकप्रियता और यहां आने वालों की निरंतर बढ़ती तादाद को देखकर इस छोटे से प्रोजेक्ट से किसी का भला होने वाला नहीं है। दूरदृष्टि और गहरी समझ की जरूरत है।
इसी तरह ब्रज हाट का एक प्रोजेक्ट ब्रज फाउण्डेशन ने कई वर्ष पहले बनाकर जिलाधिकारी की मार्फत लखनऊ भेजा था, उसका तो पता नहीं क्या हुआ। पर विकास प्रािधकरण ने ब्रज हाट का जो माॅडल बनाया, उसे देखकर किसी भी संवदेनशील व्यक्ति का सिर चकरा जाय। यह नक्शा नीले कांच लगी बहुमंजिलीय इमारत का था। जिसे देखकर दिल्ली के किसी माॅल की याद आती है। गनीमत है कि हमारे शोर मचाने पर यह विचार ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और अब ब्रज के कारीगरों के लिए ब्रज हाट बनाने की बात की जा रही है। दरअसल, हाट की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है। जहां न कोई दुकान होती है, न कोई पक्का ढांचा।  बहुत सारे छोटे-छोटे चबूतरे बनाए जाते हैं और हर चबूतरे से सटा छायाकार वृक्ष होता है। यह दृश्य भारत के किसी भी गांव में देखने को मिल जाएगा। यहां कारीगर कपड़े की चादर फैलाकर अपने हस्तशिल्प का सामान विक्रय के लिए सुबह आकर सजाते हैं और शाम को समेट कर ले जाते हैं। न किसी की कोई दुकान पक्की होती हैं और न किसी मिल्कीयत। इसी विचार को बरसाना, नंदगांव, गोकुल, गोवर्धन, वृंदावन, मथुरा की परिधि में शहर और गांव के जोड़ पर स्थापित करने की जरूरत है। जिसकी लागत बहुत ही कम आएगी। हां उसमें कलात्मकता का ध्यान अवश्य दिया जाना चाहिए, जिससे ब्रज की संस्कृति पर वो भौड़े निर्माण हावी न हों।

इसी तरह ब्रज के गरीबों को अगर लाभ पहुंचाना है, तो ब्रज के ऐतिहासिक छह सौ से अधिक गांव में से सौ गांवों को प्राथमिकता पर चुनकर उनके वन, चारागाह, कुंड और वहां स्थित धरोहर का सुधार किया जाना चाहिए। जिससे वृंदावन व गोवर्धन में टूट पड़ने वाली भीड़ ब्रज के बाकी गांव में तीर्थाटन के लिए जाए, जहां भगवान की सभी बाललीलाएं हुई थीं। इन गांव में तीर्थयात्रियों के जाने से होगा गरीबों का आर्थिक लाभ।

पर आश्चर्य की बात है कि विश्व बैंक को भेजे जा रहे प्रस्ताव में एक प्रस्ताव श्रीबांकेबिहारी मंदिर की गलियों के सुधार का है। यह आश्चर्यजनक बात है कि बिहारीजी का मंदिर, जिसकी जमापूंजी 70-80 करोड़ रूपये से कम नहीं होगी और जिसके दर्शनार्थियों के पास अकूत धन है। उस बिहारीजी के मंदिर की गलियों के लिए विश्व बैंक का पैसा खर्च करने की क्या तुक है ? इससे किस गरीब को लाभ होगा। यह कैसा ‘प्रो पुअर टूरिज्म’ है। बिहारीजी मंदिर तो अपने ही संसाधनों से यह सब करवा सकता है।

गनीमत है कि अभी कोई प्रस्ताव अंतिम रूप से तय नहीं हुआ। पर चिंता की बात यह है कि विश्व बैंक की टीम ने और उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग ने अब तक जिन महंगे सलाहकारों की सलाह से ब्रज के विकास की योजनाएं सोची हैं, उनका ब्रज से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। इन सलाहकारों को ब्रज की वास्तविकता का अंश भी पता नहीं है। विश्व बैंक के अधिकारियों को कुछ वर्ष पहले ये सलाहकार मुझसे मिलाने मेरे दिल्ली कार्यालय लाए थे। उद्देश्य था कि मैं उन्हें ब्रज में पैसा लगाने के लिए प्रेरित करूं। अपनी संस्था के शोध एवं गहरी समझ के आधार पर मैंने यह कार्य सफलतापूर्वक कर दिया। उसके बाद किसी सरकारी विभाग में या विश्व बैंक ने इसकी जरूरत नहीं समझी कि हमसे आगे सलाह लेते। जब हमें अखबारों से ऐसी वाहियात योजनाओं का पता चला, तो हमने विश्व बैंक के सर्वोच्च अधिकारियों व उत्तर प्रदेश शासन के मुख्य सचिव, पर्यटन सचिव व अन्य अधिकारियों से कई बैठकें करके अपना विरोध प्रकट किया। उन्हें यह बताने की कोशिश की कि विश्व बैंक उत्तर प्रदेश की जनता को कर्ज दे रहा हैं, अनुदान नहीं। फिर ऐसी वाहियात योजनाओं में पैसा क्यों बर्बाद किया जाए, जिससे न तो ब्रज में रहने वाले गरीबों का भला होगा और न ही ब्रज में आने वाले गरीबों का।

Monday, October 13, 2014

कैसे सुधरे धर्मस्थलों का स्वरूप

आर्थिक मंदी और तेजी के दौर आते जाते रहते हैं। पर धर्म एक ऐसा क्षेत्र है, जहां कभी आर्थिक मंदी नहीं आती। कड़वी भाषा में बोंले तो धर्म का कारोबार हमेशा बढ़ता ही रहता है। धर्म कोई भी हो, उसकी संस्थाओं को चलाने वालों के पास पैसे की कमी नहीं रहती। भारत की जनता संस्कार से धर्मपारायण है। गरीब भी होगा, तो मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारे में अपनी हैसियत से ज्यादा चढ़ावा चढ़ाएगा। फिर तिरूपति बालाजी में 5 से 10 करोड़ रूपये के मुकुट चढ़ाने वालों की तो एक लंबी कतार है ही। फिर भी क्या कारण है कि भारतीय धर्मनगरियों का बुरा हाल है ?
 
कूड़े के अंबार, तंग गलियां, ट्रैफिक की भीड़, प्रदूषण, लूटपाट, सूचनाओं का अभाव और तमाम दूसरी विसंगतियां। बयान बहुत लोग देते हैं, सुधरना चाहिए ये भी कहते हैं। दर्शन या परिक्रमा को बड़े-बड़े वीआईपी आते हैं और स्थानीय जनता और मीडिया के सामने लंबे-चैड़े वायदे करके चले जाते हैं। न तो कोई प्रयास करते हैं और न पलटकर पूछते हैं कि क्या हुआ? जो कुछ होता है, वो कुछ व्यक्तियों के या संस्थाओं के निजी प्रयासों से होता है। सरकारी तंत्र की रोड़ेबाजी के बावजूद होता है। स्थानीय नागरिकों की भी भूमिका कोई बहुत रचनात्मक नहीं रहती। छोटे-छोटे निहित स्वार्थों के कारण वे सुधार के हर प्रयास का विरोध करते हैं, उसमें अडंगेबाजी करते हैं और सुधार करने वालों को उखाड़ने में कसर नहीं छोड़ते।
जहां तक सरकारी तंत्र की बात है, उसके पास न तो इन धर्मनगरियों के प्रति कोई संवेदनशीलता है और न ही इन्हें सुधारने का कोई भाव। अन्य नगरों की तरह धर्मनगरियों को भी उसी झाडू से बुहारा जाता है। जिससे सुधार की बजाय विनाश ज्यादा हो जाता है। पर कौन किसे समझाए ? कोई समझना चाहे, तब न ? मुख्यमंत्री बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाकर योजनाओं की घोषणा कर देते हैं। पर क्या कभी उन योजनाओं के क्रियान्वयन की सार्थकता, गुणवत्ता और सततता पर कोई जांच की जाती है ? नहीं। की जाती, तो बनते ही कुछ महीनों में इन स्थलों का पुनः इतनी तेजी से विनाश न होता। एक नहीं दर्जनों उदाहरण है। जब केंद्र सरकार, अंतर्राष्ट्रीयों संगठनों या निजी क्षेत्र से करोड़ों-अरबों रूपया वसूल कर स्थानीय प्रशासन धर्मनगरी के सुधार के लंबे-चैड़े दावे करता है, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही होती है। यह क्रम जारी है। किसी राज्य में ज्यादा, किसी में कम। इसे पलटने की जरूरत है। प्रधानमंत्री अकेले कोई धर्मनगरी साफ नहीं कर सकते। इसके लिए तो एक समर्पित टीम चाहिए। जिसे स्थानीय मुद्दों और इतिहास की जानकारी हो। यह टीम कार्यक्रम बनाए और वही उसके क्रियान्वयन का मूल्यांकन करे और फिर कोई समर्पित स्वयंसेवी संस्था उस स्थान की दीर्घकाल तक देखरेख का जिम्मा ले। तभी धरोहरों की रक्षा हो पाएगी, तभी धर्मस्थान सुरक्षित रह पाएंगे। वरना, सैकड़ों-करोड़ों रूपया खर्च करके भी कुछ हासिल नहीं होगा।
मथुरा जिले के बरसाना कस्बे में गहवर वन के पास एक दोहिनी कुण्ड है। जहां राधारानी की गायों का खिरक था। वहां राधारानी अपनी गायों का दूध दोहती थीं। एक दिन वहां कौतुकी कृष्ण आ गए और राधारानी को दूध दोहने की विधि समझाने लगे। उन्होंने ऐसा दूध दोहा कि दोहिनी कुण्ड दूध से भर गया। फिर ये सैकड़ों साल उपेक्षित और खण्डर पड़ा रहा। तब ब्रज फाउण्डेशन ने इसकी गहरी खुदाई करवायी। इसके घाटों का पत्थर से निर्माण करवाया और फिर इसके चहू ओर विकास की योजना बनाकर भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय को भेज दी। वहां से सवा करोड़ रूपया स्वीकृत हुआ। टेण्डर मांगे गए और एक नकली फर्म चलाने वाले धोखेबाज आदमी को एल-वन बताकर उसके क्रियान्वयन का ठेका दे दिया गया। जब इसकी शिकायत की गई, तो भारतीय पर्यटन विकास निगम के कई अधिकारी इस भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए। ठेका निरस्त हो गया। अब यही ठेका उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग ने निकाला और जयपुर के एक ठेकेदार को ठेका मिला। उसने आधे-अधूरे मन से जो काम किया, वह हृदयविदारक था। सवा करोड़ लगने के बाद दोहिनी कुण्ड आज लावारिस और उजड़ा पड़ा है। जो कुछ ढांचे बनाए गए थे, वो सब भी ढहने लगे हैं। जबकि इस कुण्ड का लोकार्पण अभी डेढ़-दो साल पहले ही हुआ है। इसी तरह अन्य धर्मनगरियों के भी उदाहरण मिल जाएंगे।
 
ऐसे में पर्यटन और तीर्थांटन की योजनाओं में अमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। जो संस्था या व्यक्ति पूरी समझ, निष्ठा और समर्पण के साथ इन धर्मनगरियों को समझता हो और जिसने कोई ठोस काम करके दिखाया हो। ऐसे लोगों को योजना बनाने की, उसके क्रियान्वयन की और उन स्थलों की दीर्घकाल तक देखरेख की जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए। जिसके लिए प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी कुछ क्रान्तिकारी निर्णय लेने होंगे। जिससे नए विचारों को खाद, पानी मिल सके और जो नौकरशाही 60 बरस से सत्ता चला रही है, उसे यह पता चले कि उनसे कम संसाधनों में भी कितना बढ़िया, ठोस और स्थाई काम किया जा सकता है।