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Monday, June 22, 2026

पेपर लीक: सही कारण पकड़ें और सफल उदाहरण से सीखें!

भारत में प्रवेश परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में एनईईटी-यूजी 2026 परीक्षा को पेपर लीक के आरोपों के बाद रद्द कर दिया गया। इससे लाख से अधिक छात्र-छात्राओं का भविष्य प्रभावित हुआ। एक 'गेस पेपर' में सैकड़ों सवाल असली पेपर से मैच कर गए, जिसकी जांच सीबीआई कर रही है। राजस्थान, बिहार, हरियाणा आदि राज्यों में कोचिंग माफिया और प्रिंटिंग एजेंसियों तक लीक का सिलसिला पहुंचा। पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। 2024 में भी एनईईटी विवादों में घिरा था। वहीं, आईआईटी-जेईई जैसी परीक्षाओं का रिकॉर्ड आजतक लगभग बेदाग रहा है। एक बार 1997 में लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर से लीक की खबर आई थी, लेकिन उसके बाद सख्त प्रोटोकॉल ने इसे रोका। ऐसा क्यों है कि एक ही देश में कुछ परीक्षाएं दोष रहित रहती हैं और क्यों अन्य परीक्षाएं बार-बार पेपर लीक से निरस्त होती हैं?


एनईईटी जैसी परीक्षाओं में लीक का मुख्य कारण मानवीय हस्तक्षेप और कमजोर सुरक्षा है। पेपर सेटिंग, प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्टेशन और परीक्षा केंद्रों तक पहुंच, हर चरण में भ्रष्टाचार की गुंजाइश है। एनटीए (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) पर बहुत अधिक बोझ है। ऐसे में कई परीक्षाएं आउटसोर्स की जाती हैं, जहां प्राइवेट प्रिंटिंग प्रेस और लॉजिस्टिक्स कंपनियां शामिल होती हैं। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में पेपर लीक की गुंजाइश को नकारा नहीं जा सकता।  


गौरतलब है कि एक पेपर लाखों रुपये में बिकता है। जिसके पीछे छात्रों का दबाव, कोचिंग उद्योग का सैकड़ों करोड़ का कारोबार और राजनीतिक संरक्षण पेपर लीक को बढ़ावा देते हैं। वहीं देश में इस अपराध की कानूनी सजा कमजोर है, आरोपी आसानी से ज़मानत पर बाहर आ जाते हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों में 70-90 से अधिक पेपर लीक के मामले दर्ज हुए हैं। लेकिन किसी भी मामले में किसी बड़े अधिकारी को कोई सज़ा नहीं सुनाई गई। 



वहीं एनटीए की ‘एड-हॉक’ व्यवस्था, संस्थागत स्मृति की कमी और पारदर्शिता की अनुपस्थिति इस समस्या को गहरा बनाती है। ओएमआर शीट्स का इस्तेमाल, डिजिटल ट्रांसिशन में देरी और चेन-ऑफ-कस्टडी की कमी लीक को आसान बनाती है।


गौरतलब है कि हमारे देश में ही आईआईटी-जेईई में लीक लगभग नहीं के बराबर होता। इसका कारण स्पष्ट हैं, बहु-स्तरीय सुरक्षा: पेपर सेटिंग आईआईटी प्रोफेसरों द्वारा कैंपस में होती है। कई सेट तैयार किए जाते हैं, जिसमें सीबीटी (कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट) फॉर्मेट से अंतिम मिनट तक बदलाव संभव होता है। कम आउटसोर्सिंग के कारण ये प्रक्रिया आईआईटी संस्थानों के सीधे नियंत्रण में ही रहती है। जेईई भारत की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा है। इसलिए इसमें शामिल लोग अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। इसके साथ ही तकनीकी का पूरा इस्तेमाल किया जाता है: जिससे  रैंडमाइज्ड प्रश्न, मजबूत एन्क्रिप्शन और सख्त निगरानी की जाती है। जेईई में लाखों छात्र शामिल होते हैं, फिर भी इस पर उनका विश्वास कायम है। यानी कि समस्या परीक्षा के आकार में नहीं, बल्कि प्रबंधन और इरादे में है।



भारत अकेला ही ऐसा देश नहीं है जहाँ बड़े पैमाने पर ऐसी परीक्षाएं होती हैं। चीन का गाओकाओ एक करोड़ तीस लाख छात्र जिसमें बैठते हैं वो दुनिया की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक है । पर इसमें लीक की घटनाएं नगण्य हैं। पेपर को परमाणु हथियारों जैसा ‘टॉप सीक्रेट’ माना जाता है। पेपर सेटर्स एक महीने पहले से ही आइसोलेशन में भेजे जाते हैं। पर्चों की प्रिंटिंग जेलों या विशेष सरकारी सुविधाओं में की जाती है जहाँ फोन/संपर्क प्रतिबंधित रहता है। पर्चों का ट्रांसपोर्ट पुलिस और आर्म्ड फोर्सेस, द्वारा एयरटाइट सुरक्षा में किया जाता है। इसके बाद इन पर्चों को आर्म्ड गार्ड्स, 24x7 कैमरा निगरानी के साथ सुरक्षित रखा जाता है। जहाँ फेशियल रिकग्निशन, ड्रोन, सिग्नल जैमर्स द्वारा ऑनलाइन मॉनिटरिंग की जाती है। इतना ही नहीं चीन में सख्त कानूनों के चलते लीक को देशद्रोह माना जाता है, जिसकी कड़ी सजा दी जाती है। समाज इसे राष्ट्रीय त्योहार की तरह देखता है। परिणाम: लगभग शून्य बड़े लीक।


2026 के नीट परीक्षाओं के ‘री-एग्जाम’ के लिए भारतीय वायुसेना को पेपर ट्रांसपोर्ट के लिए बुलाया गया है। सेना  भी लॉजिस्टिक्स में मदद देगी। ऐसा पहली बार हुआ है। जानकर मानते हैं कि सैन्य अनुशासन और निष्पक्षता से विद्यार्थियों और जनता का विश्वास बढ़ेगा। लेकिन वहीं कुछ लोग इसे सिस्टम की विफलता का स्वीकारोक्ति भी मानते हैं। सैन्य बल देश की सीमा की रक्षा करती है, ऐसे में इन्हें शिक्षा मंत्रालय/एनटीए की जिम्मेदारी नहीं संभालनी चाहिए। यह ‘फायरफाइटिंग’ तो अवश्य है, लेकिन समाधान नहीं। यदि प्रबंधन सही होते तो ऐसे संसाधनों का दुरुपयोग रोका जा सकता था। यह अच्छा अल्पकालिक कदम हो सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। चीन की तरह सिविलियन सिस्टम को मजबूत बनाना चाहिए, न कि सेना पर निर्भर होना।


लीक रोके बिना भारत का मानव संसाधन विकास असंभव है। ऐसे में सरकार को लीक रोकने और प्रभावी प्रबंधन के विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए। जैसे कि पूर्ण डिजिटलीकरण, रैंडम प्रश्न। केंद्रीकृत, आईआईटी/यूपीएससी जैसे मॉडल की तरह स्वायत्त प्राधिकरण। लीक से निपटने के लिए सख्त कानून बनें जहाँ लीक को राष्ट्रीय सुरक्षा अपराध माना जाए और ऐसे मामलों का समयबद्ध ट्रायल हो। इसके साथ ही कोचिंग जैसे बीडी उद्योग का रेगुलेशन किया जाए जो कि पारदर्शी हो।


एनईईटी विवाद छात्रों, परिवारों और राष्ट्र के लिए दर्दनाक है। आत्महत्याएं, आर्थिक नुकसान और विश्वास का ह्रास हो रहा है। आईआईटी-जेईई साबित करता है कि भारत में सक्षम सिस्टम संभव है। वहीं चीन दिखाता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति से बड़े पैमाने पर परीक्षाएं सुरक्षित हो सकती हैं। सशस्त्र बलों की मदद स्वागत योग्य है, लेकिन यह सिस्टम की नाकामी है। सरकार को एनटीए का पुनर्गठन, जवाबदेही और सुधारों पर फोकस करना चाहिए। युवाओं का भविष्य राजनीति या मुनाफे की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए। शिक्षा राष्ट्र की नींव है इसे मजबूत बनाएं, वरना ‘विश्व गुरु’ का सपना अधूरा रहेगा।


Monday, September 22, 2025

स्वच्छ ऊर्जा की दौड़ में चीन का बढ़ता वर्चस्व !

आज की दुनिया में ऊर्जा नीतियां सिर्फ आर्थिक निर्णय नहीं हैं, बल्कि वैश्विक वर्चस्व की कुंजी हैं। जब अमेरिका तेल और गैस पर दांव लगाकर पुरानी राह पर लौट रहा है, वहीं चीन स्वच्छ ऊर्जा क्रांति को गति दे रहा है। यह विरोधाभास न केवल आर्थिक असंतुलन पैदा कर रहा है, बल्कि भविष्य की तकनीकी दिग्गजों—जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)—के लिए बुनियादी ढांचे को भी प्रभावित कर रहा है। साइरस जेन्सेन की हालिया वीडियो ‘अमेरिका जस्ट मेड द ग्रेटेस्ट मिस्टेक ऑफ द 21वीं सेंचुरी’ इस मुद्दे को बेबाकी से उजागर करती है। 



अमेरिका, जो कभी नवाचार का प्रतीक था, अब अपनी ऊर्जा नीतियों में उल्टा चढ़ाव दिखा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में, अमेरिका ने अलास्का में 44 अरब डॉलर का प्राकृतिक गैस प्रोजेक्ट शुरू किया था। जनरल मोटर्स जैसी कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की योजनाओं को रद्द कर रही हैं और वी8 गैस इंजनों पर लौट रही हैं। यहां तक कि ईवी खरीद पर टैक्स क्रेडिट भी समाप्त कर दिए गए हैं। यह सब तब हो रहा है जब दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है और नवीकरणीय ऊर्जा ही भविष्य का रास्ता दिख रही है।


जेन्सेन की वीडियो में साफ कहा गया है कि अमेरिका की यह रणनीति अल्पकालिक लाभ के लिए है। तेल और गैस निर्यात बढ़ाने से तत्काल आर्थिक फायदा तो मिलेगा, लेकिन लंबे समय में यह वैश्विक बाजारों में पीछे धकेल देगा। अमेरिका ने 1950 के दशक में सोलर पैनल विकसित किए थे, 1970 के दशक में लिथियम-आयन बैटरी का आविष्कार किया, लेकिन रोनाल्ड रीगन जैसे नेताओं ने जिमी कार्टर के व्हाइट हाउस सोलर पैनल हटाकर इसकी उपेक्षा की। आज भी वही पुरानी सोच हावी है। परिणामस्वरूप, अमेरिका ईवी निर्यात में मात्र 12 अरब डॉलर और बैटरी निर्यात में 3 अरब डॉलर पर सिमट गया है, जबकि सोलर पैनल निर्यात तो महज 69 मिलियन डॉलर का है।



यह भूल सिर्फ आर्थिक नहीं, भू-राजनीतिक भी है। वैश्विक दक्षिण—जो सौर और पवन ऊर्जा के 70 प्रतिशत स्रोतों और महत्वपूर्ण खनिजों के 50 प्रतिशत का नियंत्रण रखता है—अब नवीकरणीय ऊर्जा की ओर मुड़ रहा है। अमेरिका का जीवाश्म ईंधन पर फोकस इन देशों को अलग-थलग कर देगा, जबकि चीन इनके साथ साझेदारी कर रहा है। वहीं, चीन ने स्वच्छ ऊर्जा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना लिया है। 2024 में चीन ने दुनिया के बाकी देशों से ज्यादा विंड टर्बाइन और सोलर पैनल लगाए। ईवी और बैटरी स्टोरेज में निवेश ने इसे वैश्विक नेता बना दिया है। पिछले साल चीन ने 38 अरब डॉलर के ईवी निर्यात किए, 65 अरब डॉलर की बैटरी बेचीं, और सोलर पैनल के 40 अरब डॉलर के निर्यात किए। स्वच्छ ऊर्जा पेटेंट में चीन के पास 7 लाख से ज्यादा हैं, जो दुनिया के आधे से अधिक हैं।



जेन्सेन उद्धृत करते हुए बताते हैं कि चीन की सफलता का राज समन्वित प्रयास है। सीएल के सह-अध्यक्ष शिएन पैन कहते हैं, चीन को लंबे लक्ष्य पर प्रतिबद्ध करना मुश्किल है, लेकिन जब हम प्रतिबद्ध होते हैं, तो समाज के हर पहलू—सरकार, नीति, निजी क्षेत्र, इंजीनियरिंग—सभी एक ही लक्ष्य की ओर कड़ी मेहनत करते हैं। यह दृष्टिकोण अमेरिका की छिटपुट नीतियों से बिल्कुल अलग है।


चीन अब वैश्विक बाजारों में फैल रहा है। ब्राजील, थाईलैंड, मोरक्को और हंगरी में ईवी और बैटरी फैक्टरियां बना रहा है। हंगरी में 8 अरब डॉलर का कारखाना, इंडोनेशिया में 11 अरब डॉलर का सोलर प्लांट—ये निवेश न केवल आर्थिक, बल्कि भू-राजनीतिक लाभ भी दे रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से जेन्सेन कहते हैं, ईवी बैटरी बनाने वाले देश दशकों तक आर्थिक और भू-राजनीतिक फायदे काटेंगे। अभी तक का एकमात्र विजेता चीन है।



पिछले 15 वर्षों में चीन ने बिजली उत्पादन में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई जैसी उभरती तकनीकें बिजली पर निर्भर हैं। चीन का स्वच्छ ऊर्जा निवेश न केवल पर्यावरण बचाएगा, बल्कि एआई क्रांति में भी नेतृत्व देगा। आरएमआई की ‘पावरिंग अप द ग्लोबल साउथ’ रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक दक्षिण के 70 प्रतिशत सौर-पवन संसाधन चीन की रणनीति से जुड़ रहे हैं।


यह संघर्ष सिर्फ दो महाशक्तियों का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का है। वैश्विक दक्षिण—अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया—अब सस्ती और सतत ऊर्जा की तलाश में है। चीन ने इन देशों में सस्ते सोलर पैनल और ईवी तकनीक पहुंचाई है, जबकि अमेरिका के महंगे गैस प्रोजेक्ट इनके लिए बोझ साबित हो रहे हैं। परिणाम? ये देश चीन की ओर झुक रहे हैं।


भारत के संदर्भ में देखें तो यह चेतावनी स्पष्ट है। हमारी ‘मेक इन इंडिया’ और ‘प्लेड्ज फॉर क्लाइमेट’ पहलें स्वच्छ ऊर्जा पर केंद्रित हैं, लेकिन चीन का वर्चस्व चुनौती है। भारत सोलर और विंड में प्रगति कर रहा है, लेकिन बैटरी और ईवी चिप्स में आयात पर निर्भरता बनी हुई है। यदि हम चीन की तरह समन्वित नीति नहीं अपनाते, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में पीछे रह जाएंगे। अमेरिका की गलती से सबक लेते हुए, भारत को स्वदेशी नवाचार पर जोर देना चाहिए—जैसे लिथियम खनन और बैटरी रिसाइक्लिंग में निवेश।


अमेरिका की यह भूल नई नहीं है। 20वीं सदी में जापान ने इलेक्ट्रॉनिक्स में अमेरिका को पीछे छोड़ा था, क्योंकि अमेरिका ने अल्पकालिक लाभ को प्राथमिकता दी। आज चीन स्वच्छ ऊर्जा में वही कर रहा है। जेन्सेन की वीडियो एक चेतावनी है: जो देश बिजली उत्पादन में आगे होगा, वही एआई और अगली औद्योगिक क्रांति जीतेगा।

अमेरिका को अपनी नीतियां पलटनी होंगी—ईवी सब्सिडी बहाल करनी होंगी, नवीकरणीय अनुसंधान में निवेश बढ़ाना होगा। लेकिन समय कम है। चीन का बढ़त 10 वर्षों का नहीं, बल्कि दशकों का हो सकता है। अमेरिका ने 21वीं सदी की सबसे बड़ी गलती कर दी है—जीवाश्म ईंधन पर दांव लगाकर स्वच्छ ऊर्जा के भविष्य को गंवा दिया। चीन का उदय एक सबक है: समन्वित, दूरदर्शी नीतियां ही विजेता बनाती हैं। भारत जैसे देशों को इस दौड़ में शामिल होना चाहिए, ताकि हम न केवल पर्यावरण बचाएं, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता भी हासिल करें। समय आ गया है कि दुनिया एकजुट होकर स्वच्छ ऊर्जा को अपनाए। अन्यथा, इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। 

Monday, August 25, 2025

निसंदेह गुमनामी बाबा ही थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस

बचपन से हमें पढ़ाया गया की हवाई दुर्घटना में 18 अगस्त 1945 को ताइपे (ताइवान) में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। पर उनकी मौत के विवाद को सुलझाने के लिए बने ‘मुखर्जी आयोग’ ने ताइपे (ताइवान) जाकर उनकी सरकार से संपर्क किया तो पता चला कि उस तारीख को ही नहीं बल्कि उस पूरे महीने ही वहाँ कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ था। यानी नेताजी की विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी। ये झूठी कहानी गढ़ी गई। तो प्रश्न उठता है कि फिर नेताजी गए कहाँ? इस पर बाद में चर्चा करेंगे।


बाद के कई दशकों तक देश में चर्चा चलती रही कि नेताजी अचानक प्रगट होंगे। बाबा जयगुरुदेव ने देश भर की दीवारों पर बड़ा-बड़ा लिखवाया कि नेता जी सुभाष चंद्र बोस जल्दी ही देश के सामने प्रगट होंगे। पर वे नहीं हुए। मेरी माँ बहुत राष्ट्रभक्त थीं और बड़े राजनैतिक परिवारों के बच्चे उनके साथ पढ़ते थे, सो उनकी शुरू से राजनीति में रुचि थी। उन्होंने मुझे 1967 में कहा था कि ‘नेता जी अभी ज़िंदा हैं और गुमनाम रूप से कहीं संत भेष में पूर्वी उत्तर प्रदेश में रहते है।’



पर्दे वाले बाबा नाम से एक संत पचास के दशक में नेपाल के रास्ते भारत आए और गोपनीय रूप से बस्ती, लखनऊ, नैमिषारण्य, फैजाबाद व अयोध्या के मंदिरों या घरों में रहे। इस दौरान उनसे मिलने बहुत से लोग आते थे। पर सबको हिदायत थी कि उनके सामने कोई सुभाष नाम नहीं लेगा। इनमें 13 लोग जो वहीं के थे, जो उनके अंतरंग थे। उनमें से दो परिवारों ने तो उन्हें परदे के पीछे जाकर भी देखा था। बाक़ी अनेक लोग बंगाल से लगातार उनसे मिलने आते थे। उनमें दो लोग नेता जी की ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ की ‘इंटेलिजेंस विंग’ के सदस्य थे। ये लोग हर 23 जनवरी को आते थे और बड़े हर्षोल्लास से पर्दे वाले बाबा का जन्मदिन मना कर लौट जाते थे। गौरतलब है कि 23 जनवरी ही नेताजी का जन्मदिन होता है।जिसे मोदी जी ने ‘शौर्य दिवस’ घोषित किया है। यही लोग हर वर्ष दोबारा दुर्गा पूजा के समय उनके पास आते थे। इसके अलावा बाबा की जरूरत के हिसाब से बीच-बीच में भी लोग आते जाते रहते थे। देश के कई बड़े नामी राजनेता व बड़े सैन्य अधिकारी भी लगातार उनसे मिलने आते थे। पर सब उनसे पर्दे के सामने से ही बात करते और सलाह लेते थे। 


पत्रकार अनुज धर और पर्यावरणवादी चंद्रचूड़ घोष, इन दो लोगों ने अपनी जवानी के बीस वर्ष इसे सिद्ध करने में लगा दिए कि ‘पर्दे वाले बाबा’ जिन्हें बाद में लोग ‘गुमनामी बाबा’कहने लगे, जिन्हें उनके निकट के लोग ‘भगवन जी’ कहते थे, वही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। पिछले हफ़्ते ये दोनों मेरे दिल्ली कार्यालय आए और विस्तार से मुझे इस विषय में जानकारी दी। उन्होंने अपनी लिखी हिंदी व अंग्रेज़ी की कई पुस्तकें भी दीं। जिनमे वो सारे तथ्य, दस्तावेज़ और उन सामानों के चित्र थे जो ‘गुमनामी बाबा’ के कमरे से 16 सितंबर 1985 को उनकी मृत्यु के बाद, उनके दो दर्जन से ज़्यादा बक्सों में से निकले थे । ये सब सामान देखकर कोलकाता से बुलाई गयीं नेताजी की भतीजी ललिता बोस रोने लगी और बेहोश हो गई। क्योंकि उसमें नेता जी और ललिता जी के माता-पिता के बीच हुए पत्राचार के हस्त लिखित प्रमाण भी थे। उनके परिवार के तमाम फोटो थे। जिनमें नेताजी के माता पिता का फ्रेम किया फोटो भी है। तब ललिता बोस ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर के इन सामानों को सरकार की ट्रेज़री में जमा करवाने की माँग की। अदालत ने भी ये माना कि ‘गुमनामी बाबा’ के ये सब सामान राष्ट्रीय महत्व के है। तब फैजाबाद के जिलाधिकारी ने उन 2760 सामानों की सूची बनवाकर ट्रेज़री में जमा करवा दिया। बरसों बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने इन सामानों को ‘राम कथा संग्रहालय’ अयोध्या में जन प्रदर्शन के लिए रखवा दिया। पता नहीं क्यों अब ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ उन्हें वहाँ से हटाने की प्रक्रिया चला रहा है?



इन सामानों में गुमनामी बाबा (नेताजी) के तीन चश्मे, जापानी क्रॉकरी, बहुत मंहगी जर्मन दूरबीन, ब्रिटिश टाइपराइटर, आईएनए की वर्दी जो नेता जी के साइज़ की हैं। लगभग एक हज़ार पुस्तकें जो राजनीति, साहित्य, इतिहास, युद्ध नीति, होम्योपैथी, धार्मिक विषयों आदि पर हैं व मुख्यतः अंग्रेज़ी में हैं। तीन विदेशी सिगार पाइप, पाँच बोरों में देश विदेश के अख़बारों में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में छपी ख़बरों की कतरने, आईएनए के वरिष्ठ अधिकारियों से उनका नियमित पत्राचार व आरएसएस प्रमुख श्री गुरु गोलवलकर का गुमनामी बाबा के नाम लिखा एक पत्र भी मिला है। इसके अलावा एक बड़े गत्ते पर गुमनामी बाबा के रूस से चीन, तिब्बत और नेपाल के रास्ते बस्ती (ऊ प्र) आने के मार्ग का हाथ से बना विस्तृत नक़्शा भी है।



अनुज धर और चंद्रचूड़ घोष के शोध से पता चलता है कि नेता जी विमान दुर्घटना की झूठी कहानी के आवरण में रूस पहुँच गए। जहाँ रूस की सरकार ने उन्हें गुलाग में एक बंगला, दो अंगरक्षक, एक कार और ड्राइवर की सुविधा के साथ महफ़ूज़ रखा। तीन साल गुमनाम रूप से रूस में रहने के बाद वे चीन, तिब्बत और नेपाल के रास्ते एक संत के वेश में भारत आए और 16 सितंबर 1985 को अपनी मृत्यु तक पर्दे के पीछे ही छिप कर रहे। पर्दे के भीतर जा कर उन्हें केवल फैजाबाद का डॉ बनर्जी व मिश्रा जी का परिवार ही देख सकता था। उनकी दबंग आवाज़, बंगाली उच्चारण में हिंदी और फर्राटेदार अंग्रेजी सुन कर पर्दे के सामने बैठा हर व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। फिर भी सबको यह हिदायत थी कि उनके सामने ‘सुभाष’ नाम नहीं लिया जाएगा। सब उन्हें ‘भगवन जी’ कह कर ही बुलाते थे। जिस व्यक्ति की मृत्यु पर 13 लाख लोग जमा होने चाहिए थे, उनके अंतिम संस्कार में मात्र यही 13 लोग थे। उनका अंतिम संस्कार सरयू नदी के किनारे अयोध्या के ‘गुप्तार घाट’ पर किया गया, जहाँ उनकी समाधि है। गुप्तार घाट वही स्थल है, जहाँ भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न ने जल समाधि ली थी। हज़ारों साल में उस पवित्र स्थल पर आजतक केवल गुमनामी बाबा का ही अंतिम संस्कार हुआ है। सारा ज़िला प्रशासन और पुलिस दूर खड़े उनका अंतिम संस्कार देखते रहे।



इतना कुछ प्रमाण उपलब्ध है फिर भी आज तक केंद्र की कोई सरकार गुमनामी बाबा की सही पहचान को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने को तैयार नहीं है। मोदी सरकार तक भी नहीं। जबकि मोदी जी ने इंडिया गेट के सामने की छतरी में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की खड़ी प्रतिमा स्थापित करने का पुण्य कार्य किया है। आरएसएस के दिवंगत सर संघ चालक के एस सुदर्शन जी का एक सार्वजनिक वीडियो वक्तव्य है, जो यूट्यूब पर भी उपलब्ध है, जिसमें उन्होंने साफ़ कहा है कि गुमनामी बाबा ही नेता जी सुभाष चंद्र बोस थे। अनुज धर और चंद्रचूड़ घोष बताते हैं कि पंडित नेहरू से लेकर मोदी जी तक हर प्रधान मंत्री को इसकी जानकारी है और नेताजी से 1945 तक जुड़े रहे उनके सहयोगी नेता उनसे मिलने जाते रहे। पर साधना में लीन गुमनामी बाबा ये नहीं चाहते थे कि कोई उनकी असलियत जाने।  

Sunday, February 9, 2025

विकास ऐसा किया जाता है


हमारे पड़ोसी देश चीन ने पिछले सप्ताह एक बार फिर से सुर्ख़ियाँ बनाई। इस बार भारत में घुसपैठ नहीं बल्कि भारत और दुनिया भर के लिए एक उदाहरण बना। चीन ने अपने नवाचार द्वारा एक रेगिस्तान को न सिर्फ़ रोका बल्कि उसे हरा-भरा भी कर दिया। चीन का यह विकास कार्य आज काफ़ी चर्चा में है।
 


‘मौत का सागर’ के रूप में जाने जाना वाला टकलामकन रेगिस्तान 337,600 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसका आकार लगभग पश्चिमी देश जर्मनी के बराबर का क्षेत्र है। इसके विशाल रेत के टीलों और बार-बार आने वाले रेतीले तूफानों ने लंबे समय तक मौसम के पैटर्न को बाधित किया है। कृषि को खतरे में डाला है और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित किया है। जवाब में, चीन ने एक व्यापक हरित अवरोध लागू किया है, जिसे रेगिस्तान के किनारों को लॉक करने और इसके नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को स्थिर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।


इन प्रयासों ने न केवल रेलवे और राजमार्गों जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की रक्षा की है, बल्कि यह भी प्रदर्शित किया है कि टिकाऊ प्रौद्योगिकियां मरुस्थलीकरण का प्रतिकार कैसे कर सकती हैं। सौर ऊर्जा से संचालित सिंचाई प्रणालियों को एकीकृत करके, चीन पृथ्वी पर सबसे कठिन वातावरणों में से एक में वनस्पति को बनाए रखने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग कर रहा है। 



टकलामकन रेगिस्तान के इस व्यापक पहल पर चार दशकों से काम चलाया गया। ग्रीनबेल्ट का पहला 2,761 किलोमीटर का काम कई वर्षों में पूरा हुआ, अंतिम चरण नवंबर 2022 में शुरू हुआ, जिसमें रेगिस्तानी चिनार, लाल विलो और सैक्सौल पेड़ों जैसी लचीली, रेगिस्तान-अनुकूल प्रजातियों को रोपने के लिए 600,000 श्रमिकों को एक साथ लाया गया - जो शुष्क परिस्थितियों में जीवित रहने की अपनी क्षमता के लिए जाने जाते हैं।


ये पौधे कई उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं: वे खिसकती रेत को सहारा देते हैं, रेगिस्तान के विस्तार को धीमा करते हैं, और स्थानीय समुदायों को आर्थिक लाभ प्रदान करते हैं। यह परियोजना इतिहास में सबसे महत्वाकांक्षी पुनर्वनीकरण प्रयासों में से एक का प्रतिनिधित्व करती है, जो दुनिया भर में भूमि क्षरण से निपटने के लिए एक नई मिसाल कायम करती है। 



उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में ग्रीनबेल्ट का प्राथमिक लक्ष्य मरुस्थलीकरण को रोकना है, यह परियोजना दीर्घकालिक आर्थिक अवसर भी पैदा कर रही है। कुछ नए लगाए गए पेड़, जैसे कि रेगिस्तानी जलकुंभी, में औषधीय गुण होते हैं, जो संभावित रूप से हर्बल चिकित्सा के लिए आकर्षक बाजार खोलते हैं।



इसके अलावा, 2022 में, चीन ने हॉटन-रुओकियांग रेलवे का उद्घाटन किया, जो रेगिस्तान के चारों ओर दुनिया की पहली पूरी तरह से घिरी हुई रेलवे थी। 2,712 किलोमीटर लंबा रेलवे रेगिस्तानी शहरों को जोड़ता है, जिससे अखरोट और लाल खजूर जैसे स्थानीय कृषि उत्पादों को पूरे चीन के बाजारों तक पहुंचाना आसान हो जाता है, जिससे क्षेत्रीय व्यापार और विकास को और बढ़ावा मिलता है।


खबरों के मुताबिक़ चीन पुनर्वनरोपण पर रोक नहीं लगा रहा है बल्कि ताकलामाकन रेगिस्तान में एक विशाल नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना भी चल रही है। चाइना थ्री गोरजेस कॉर्पोरेशन 8.5 गीगावाट सौर ऊर्जा और 4 गीगावाट पवन ऊर्जा स्थापित करने की योजना का नेतृत्व कर रहा है, जिसके अगले चार वर्षों में पूरा होने की उम्मीद है। झिंजियांग पहले से ही चीन की स्वच्छ ऊर्जा रणनीति में एक प्रमुख खिलाड़ी है, और इस पहल का उद्देश्य क्षेत्र के विशाल नवीकरणीय संसाधनों को राष्ट्रीय ग्रिड में एकीकृत करना है। रेगिस्तान की बहाली को टिकाऊ ऊर्जा उत्पादन के साथ जोड़कर, चीन उस चीज़ को हरित विकास के अवसर में बदल रहा है जो कभी एक पारिस्थितिक चुनौती थी।


ग़ौरतलब है कि टकलामकन ग्रीनबेल्ट की सफलता मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण से निपटने के वैश्विक प्रयासों के अनुरूप है। इसी तरह की बड़े पैमाने की परियोजनाएं, जैसे कि अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल, का उद्देश्य पूरे महाद्वीप में 8,000 किलोमीटर लंबे वृक्ष अवरोधक लगाकर सहारा रेगिस्तान के विस्तार को रोकना है।


इस विकास कार्य पर चीन का दृष्टिकोण सौर ऊर्जा, वनीकरण और आर्थिक प्रोत्साहन को एकीकृत करना है। टकलामकन रेगिस्तान का विकास कार्य समान पारिस्थितिक खतरों का सामना करने वाले अन्य देशों के लिए एक खाका के रूप में भी कार्य कर रहा है। अब जब तकलामाकन ग्रीनबेल्ट पूरा हो गया है, तो अगले चरण में इसकी दीर्घकालिक दक्षता बढ़ाने और यह सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा कि यह एक टिकाऊ, आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र बना रहे। 


जानकारों के अनुसार यह अभूतपूर्व उपलब्धि नवीन पर्यावरणीय समाधानों के प्रति चीन की प्रतिबद्धता को उजागर करती है। हरित प्रौद्योगिकियों और बड़े पैमाने पर पुनर्वनीकरण का लाभ उठाकर, राष्ट्र ने न केवल अपने स्वयं के बुनियादी ढांचे और कृषि को सुरक्षित किया है, बल्कि भविष्य की वैश्विक रेगिस्तान बहाली परियोजनाओं के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया है। अत्याधुनिक सौर ऊर्जा संचालित रेत नियंत्रण, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण का संयोजन दर्शाता है कि मरुस्थलीकरण एक अपरिवर्तनीय प्रक्रिया नहीं है। निरंतर अनुसंधान और निवेश के साथ, रेगिस्तानों के अतिक्रमण से जूझ रहे अन्य क्षेत्र जल्द ही चीन के नक्शेकदम पर चल सकते हैं, जिससे यह साबित होगा कि सही तकनीक और रणनीति के साथ, यहां तक ​​कि सबसे कठिन परिदृश्यों को भी संपन्न पारिस्थितिकी तंत्र में बदला जा सकता है।


भारत सहित सभी विकासशील देशों को चीन से सबक़ लेते हुए यह सीखना चाहिए कि विषम परिस्थितियों में भी विकास कार्य किए जा सकते हैं। ओछी राजनीति करने से किसी का भी लाभ नहीं होता। यदि किसी भी प्रदेश में किसी विपक्षी दल ने उस क्षेत्र के विकास के लिए कुछ ठोस कदम उठाए हैं तो उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिए। यदि केंद्र में और राज्य में दो अलग दलों की सरकार भी हो तो विकास कार्यों पर किसी भी तरह की रोक लगाना आम जनता के साथ धोखा है। यदि विपक्षी दल की सरकार के चुनाव हारने के बाद किसी अन्य दल की सरकार भी आती है तो उसे भी पुराने विकास के कार्यों को पूरा करना चाहिए। विकास कार्यों के निष्पादन में अक्सर भ्रष्टाचार का बोल बाला माना जाता है। परंतु कार्यों के निष्पादन में होने वाले भ्रष्टाचार से कहीं बड़ा उस कार्य की योजना में होने वाला भ्रष्टाचार होता है जिसे अनुभवहीन इंजीनियर और आर्किटेक्ट जन्म देते हैं। इसलिए यदि सही सोच वाला नेतृत्व सही योजनाओं को स्वीकृति करे तो ऐसे भ्रष्टाचार से बचा जा सकता है और ताकलामाकन रेगिस्तान जैसे कई विकास कार्य दोहराया जा सकते हैं।   

Monday, January 2, 2023

कैसे हों भारत और चीन के संबंध?

 गलवान घाटी की घटना और कोविड महामारी के पहले तक चीन और भारत के बीच आपसी व्यापार बहुत तेजी से बढ़ा था। पर पलड़ा चीन के पक्ष में भारी रहा। जिसको लेकर भारत के आर्थिक जगत में कुछ चिंता व्यक्त की जा रही थी। विशेषकर कच्चे माल के निर्यात को लेकर भारत में विरोध के स्वर उभरने लगे। तर्क यह है कि जब दोनों ही देशों की तकनीकी क्षमता और श्रमिकों की उपलब्धता एक जैसी है तो भारत भी क्यों नहीं निर्मित माल का ही निर्यात करता? उधर अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय निर्यातकों को चीन से कड़ा मुकाबला करना पड़ता है। उनकी शिकायत है कि चीन की सरकार अपने निर्माता और निर्यातकों को जिस तरह की सहूलियतें देती है और साम्यवादी देश होने के बावजूद चीन में जिस तरह श्रमिकों से जिस तरह काम लिया जाता है, उसके कारण उनके उत्पादनों का मूल्य भारत के उत्पादनों के मूल्य की तुलना में काफी कम रहता है और इसलिए चीन का हिस्सा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में लगातार बढ़ता जा रहा है। जबकि भारत की सरकार तीव्र आर्थिक प्रगति दर की बात तो करती है, पर उत्पादन की वृद्धि के लिए आवश्यक आधारभूत ढांचा नहीं सुधार पा रही है। इसलिए हमारे निर्यातक पिट रहे हैं।


आँकड़ों के अनुसार 2021 में दोनों देशों के बीच आपसी कारोबार 125 अरब डॉलर के पार चला गया था। इस आँकड़े में चीन से होने वाला आयात करीब 100 अरब डॉलर का है। गलवान घाटी की घटना के बाद भारत ने कई दर्जन चीनी ऐप पर रोक लगा दी। इसके साथ ही संवेदनशील कंपनियों और क्षेत्रों में चीन के निवेश को भी सीमित कर दिया गया।



दूसरी तरफ राजनैतिक दायरों में चीन के साथ चले आ रहे सीमा विवाद, उसकी कश्मीर और अरूणाचल नीति और पाकिस्तान के साथ लगातार प्रगाढ़ होते सामरिक सम्बन्ध चिंता का विषय बने हुए हैं। जिसके आधार पर बार-बार ये चेतावनी दी जाती है कि चीन से सम्बन्ध सोच-समझ कर बढ़ाये जायें। कहीं ऐसा न हो ‘चीनी हिंदी भाई-भाई’ का नारा लगाते-लगाते हम 1962 जैसी स्थिति में जा पहुँचें, जब चीन विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति बनकर हम पर हावी हो जाए।


इस तर्क के विरोध में सोचने वालों का कहना है कि चीन 1962 की तुलना में अब बहुत बदल गया है। उसे पता है कि लोकतंत्र की ओर उसे क्रमशः बढ़ना होगा। आर्थिक उदारीकरण, सूचना क्रांति और चीन में धनी होता मध्यम वर्ग, अब साम्यवादी अधिनायकवाद को बहुत दिनों तक बर्दाश्त नहीं करेगा। इसलिए चीन के हुक्मरानों ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोकतंत्र का अध्ययन करने के लिए अपने दल भेजे हैं। वे चाहते हैं कि उनके देश में उनके इतिहास को ध्यान में रखकर ही लोकतंत्र का मॉडल अपनाया जाये। जिसके लिए वे अपना नया मॉडल विकसित करना चाहते हैं। इसी विचारधारा के लोगों का यह भी मानना है कि चीन भारत पर हावी होने की कोशिश इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि उसके दो पड़ोसी रूस और जापान काफी ताकतवर हैं और उसे प्रतिस्पर्धा मानते हैं। साथ ही पिछले दो दशक से चीन की आर्थिक प्रगति में सक्रिय सहयोग देने वाला अमरीका चीन की बढ़ती ताकत से घबराकर अब उससे दूर हट गया है और नई आर्थिक सम्भावनाओं की तलाश भारत में कर रहा है। इसलिए अमरीका भी ऐसी किसी परिस्थिति में भारत का ही साथ देना चाहेगा। जिससे चीन की विस्तारवादी नीति पर लगाम कसी रहेगी।



चीन के आन्तरिक मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन का मौजूदा नेतृत्व काफी संजीदगी भरा है। उसकी रणनीति यह है कि जब तक शिखर पर न पहुँचे, तब तक बर्दाश्त करो, समझौते करो, खून का घूंट भी पीना पड़े तो पी लो और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के इतिहास को एक तरफ कर आर्थिक प्रगति का रास्ता साफ करो।


चीन मामलों के एक विशेषज्ञ श्री किशोर महबूबानी हैं जो सिंगापुर की ली क्वान यूनिवर्सिटी के डीन रह चुके हैं और तीन दशक तक सिंगापुर के विभिन्न देशों में राजदूत भी रह चुके हैं, का भी कुछ ऐसा ही मत है। उनका विचार में भारत और चीन को प्रतिस्पर्धा नहीं करनी चाहिए। हर तरह के पारस्परिक द्वेष को भूलकर एक दूसरे की मदद से अपने आर्थिक विकास के एजेंण्डा पर कार्य करना चाहिए। जिससे दोनों देशों की शक्ति बढ़ेगी। इसलिए किशोर कहते हैं कि चीन और भारत लड़ें नहीं, साथ-साथ बढ़ें।



पर ये होता नहीं दिखता। क्योंकि चीन भारत पर और भारत चीन पर विश्वास नहीं करते। चीन हमेशा हमारी सीमाओं पर एक ख़तरे की तरह ही रहा है और आगे भी रहेगा। इसलिये हमें युद्ध की संभावना को टालते हुए अपनी सैन्य ताक़त बढ़ानी चाहिये। क्योंकि कई दौर की बातचीत के बावजूद परमाणु ताकत से लैस दोनों पड़ोसियों में तनाव घटने का नाम नहीं ले रहा। दोनों पक्षों ने हज़ारों सैनिकों को तैनात कर रखा है। इसके साथ ही सेना के टैंक और लड़ाकू विमानों समेत भारी सैन्य हथियारों का जमावड़ा भी तैनात है। संघ और बीजेपी के कार्यकर्ता तो लगातार चीन के बहिष्कार का नारा बुलंद करते रहते है परंतु मोदी जी तमाम विवादों के बावजूद चीन का नाम लेने से भी बचते आये हैं। वे भारत के अकेले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो सबसे ज्यादा बार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से दोस्ताना अन्दाज़ मी मिले हैं। ये विरोधाभास आम भारतीय की समझ के परे है। 


इसलिये मोदी सरकार को चीन के मामलों के भारतीय विशेषज्ञों के सुझावों का संज्ञान लेना चाहिए। भारत चीन समस्या का कोई ठोस हल निकालना तो निकट भविष्य में संभव नहीं देख रहा। यदि ऐसा हो पाता तो मोदी सरकार द्वारा विश्व भर में एक सकारात्मक संकेत भेजा जा सकता था। दुनिया भर में भारत की सकारात्मक पहल से दो देशों के बीच चली आ रही बरसों की दुश्मनी भी कम हो सकती थी और आपसी सौहार्द की भावना भी बढ़ती। ऐसा होने से भारत-चीन के व्यापार में भी फ़ायदा होता और दोनों देशों की आर्थिक व्यवस्था भी सुधरती। क्योंकि दो देशों के बीच औद्योगिक तरक़्क़ी से मनमुटाव भी सुधरता है और दोनों देशों के बीच शांति भी स्थापित होती है। पर चीन के इतिहास और मौजूदा रवैया देख कर ऐसा होना संभव नहीं लग रहा।इसलिये हमें चीन से उसी भाषा में बात करनी चाहिये जो भाषा वो समझता है।

Monday, December 26, 2022

कोरोना की नई लहर से कितना डर?



पिछले कुछ दिनों से चीन में कोरोना की नई लहर को लेकर काफ़ी भयावह दृश्य सामने आए हैं। कोरोना के नये वेरिअंट ने चीन में अपना आतंक दिखाना शुरू कर दिया है। चीन के अलावा कई और देशों में भी इस नये वेरिअंट के मरीज़ पाए गए हैं। दुनिया भर में डर का माहौल बना हुआ है। भारत समेत कई देशों ने कोरोना के इस नये जिन्न से निपटने के लिए सभी सावधानियाँ बरतनी शुरू कर दी हैं। भारत के सभी राज्यों के मुख्य मंत्री और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जनता से सावधान रहने की अपील कर रहे हैं। सबके मन में प्रश्न है कि हमें इस नए वेरिअंट से कितना डरना चाहिए? 

सोशल मीडिया पर चीन में आई कोरोना की नई लहर से ऐसे आँकड़े सुनने को मिल रहे हैं कि इस लहर में दस लाख से अधिक लोगों की मौत हो सकती है। चीन की 60 प्रतिशत आबादी इसकी चपेट में आ जाएगी। ये भी कि दुनिया भर की 10 प्रतिशत आबादी इस नई लहर का शिकार हो जाएगी। ये सब दावे कितने सच्चे है इस पर कोई भी आधिकारिक बयान किसी सरकार द्वारा अभी तक नहीं दिया गया है। चीन ने तो अब आँकड़े जारी करना ही बंद कर दिया है। 


1995 से अमरीका के पेंसिलवेनिया में डाक्टरी कर रहे, आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ रवींद्र गोडसे के अनुसार भारत को इस नई लहर से घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है। देश भर के कई टीवी चैनलों की चर्चाओं में डॉ गोडसे ने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा है कि न तो भारत में ये नई लहर आएगी और न ही यहाँ इसका कोई भारी असर पड़ेगा। वे कहते हैं कि चीन ने अपने यहाँ पनपे इस ख़तरनाक वायरस से निपटने के लिए अत्यधिक सावधानी बरती, परंतु इस घातक वायरस से छुटकारा नहीं पा सका। उदाहरण के तौर पर चीन में तीन साल तक लॉकडाउन रहा। इक्कीस बार टेस्टिंग की गयी। बावन दिनों का क्वारंटाइन किया गया। लेकिन इस सब से क्या हुआ? फिर भी वहाँ नई लहर आ ही गई। 

डॉ गोडसे अपनी बात दोहराते हुए यह भी कहते हैं कि जैसा दावा उन्होंने कोविड के ओमिक्रोन वेरिअंट को लेकर किया था, जो सच साबित हुआ। ठीक उसी तरह वे इस नये वेरिअंट के लेकर भी आश्वस्त हैं कि भारत पर इसका कोई बहुत बड़ा असर नहीं दिखाई देगा। अब इस वेरिअंट को रोकना किसी के लिए भी संभव नहीं है। 


डॉ गोडसे मानते हैं कि कोविड का ओमिक्रोन वेरिअंट भारत में एक वरदान साबित हुआ क्योंकि उससे देश भर में हर्ड इम्युनिटी हुई। कोविड के ओमिक्रोन ने कोविड के ख़िलाफ़ ही एक वैक्सीन का जैसा काम किया है। वे कहते हैं कि देश में जो भी लोग कोविड के प्रति ‘हाई रिस्क’ की श्रेणी में आते हैं उन्हें संभल कर रहने की ज़रूरत है। वे सभी सावधानियाँ बरतें और सुरक्षित रहें। 

एक शोध से पता चला है कि ओमिक्रोन मॉडीफ़ाइड वैक्सीन लेने से बचाव हो सकता है। भारत में कोरोना की मैसेंजर राइबोज न्यूक्लिक एसिड (mRNA) वैक्सीन को 15 दिसम्बर 2021 तक आना था। परंतु उसका अभी तक कुछ पता नहीं। इस वैक्सीन को पुणे की जेनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स ने बनाया है। डॉ गोडसे पूछते हैं कि जब यह बात शोध से सिद्ध हो चुकी है कि कोरोना अपने रूप बदल कर हमला कर रहा है तो वैक्सीन में भी बदलाव क्यों नहीं किए जा रहे? 

जैसे ही चीन में लंबे लॉकडाउन के बाद जनता को बाहर आने दिया गया तभी से वहाँ कोरोना की नई लहर आई। इसका मतलब यह हुआ कि लॉकडाउन से कोरोना पर लगाम नहीं लगाई जा सकी। इसके साथ ही यह बात भी कही जा रही है कि जिन लोगों के शरीर में रोग से लड़ने की क्षमता कम है या जो लोग ‘हाई रिस्क’ के दायरे में आते हैं पहले उन पर सावधानी बरती जाए । न कि सभी को लॉकडाउन और मास्क जैसे नियम की बेड़ियों जकड़ा जाए। सामान्य तौर पर स्वस्थ व्यक्ति को मास्क लगा लेने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। डॉ गोडसे कहते हैं कि मास्क से कोविड की रोकथाम होती है, ऐसा कोई भी शोध उपलब्ध नहीं है। मास्क केवल डॉक्टर व अस्पताल में काम कर रहे अन्य लोगों को विभिन्न प्रकार के रोगियों के संपर्क में आने से होने वाले इन्फेक्शन से बचाता है।  

इसके साथ ही डॉ गोडसे इस बात पर भी ज़ोर दे रहे हैं कि कोविड के इस नये प्रारूप से पहले की तरह न तो तेज़ बुख़ार आता है और न ही ये हमारे शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने देता है। केवल गले में ख़राश होती है और दो-तीन दिन में मरीज़ ठीक हो जाता है। उनके अनुसार इसलिए कोविड के इस नये अवतार से ज़्यादा डरने के ज़रूरत नहीं है। केवल वो लोग जिन्हें पहले से ही कोई गंभीर बीमारी है वे ज़रूर पूरी सावधानी बरतें। हमें सचेत रहने की ज़रूरत है घबराने कि नहीं। 

चीन में कोविड की नई लहर आने के पीछे वहाँ के बुरे प्रबंधन और वैक्सीन की गुणवत्ता हैं। यदि समय रहते चीन ने इस महामारी का सही से प्रबंधन किया होता तो यह प्रकोप दुनिया भर में नहीं फैलता। भारत जैसी आबादी वाले देश में यदि कोविड पर नियंत्रण पाया गया है तो उसके पीछे यहाँ की आम जानता कि प्रकृति से जुड़ी पारंपरिक दिनचर्या,  वैज्ञानिकों की मेहनत और कुछ हद तक सरकार का सही प्रबंधन भी है। चीन के लंबे लॉकडाउन लगने से यह बात साबित हो चुकी है कि इस महामारी से घर में क़ैद हो कर नहीं बचा जा सकता है। इसके लिए दवा और सावधानी दोनों का प्रयोग करना ही बेहतर होगा। 

डॉ गोडसे के अनुसार कोविड के वायरस से ज़्यादा हमें सोशल मीडिया पर चलाए जा रहे भ्रमित करने वाले मेसेज रूपी वायरस से बचने की ज़रूरत है। 

मिसाल के तौर पर सोशल मीडिया में ऐसा संदेश घूम रहा है कि कोविड का नया वायरस हवा से फैलता है। लेकिन आपके शरीर में कान, नाक और मुँह से नहीं प्रवेश नहीं करता, सीधा आपके फेफड़ों में घुसकर आपको निमोनिया कर देता है। डॉ गोडसे पूछते हैं कि यदि ये वायरस नाक और मुँह के रास्ते शरीर में प्रवेश नहीं करता तो फेफड़ों तक कैसे पहुँच सकता है? इसके साथ ही इस संदेश में यह भी कहा जा रहा है कि ये वायरस टेस्टिंग में नेगेटिव आता है परंतु आपके शरीर में रहता है। इस पर डॉ गोडसे सवाल उठाते हुए पूछते हैं की जो वायरस जाँच में पकड़ा नहीं जा सकता, वो कोविड का नया वायरस है ये कैसे पता चलता है? डॉ गोडसे के अनुसार ऐसे वायरस केवल सोशल मीडिया के माध्यम से ही फैलते हैं। इसलिए सचेत रहने के साथ-साथ ऐसे संदेशों से भी दूरी बनाए रखें और वायरस को फैलने से रोकें।  

Monday, July 11, 2022

अवसादों भरा हफ़्ता



पिछला हफ़्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवसादों से भरा रहा। जो घटनाएँ घटीं उनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष असर भारत पर भी पड़ेगा। इस क्रम में सबसे ज़्यादा दुखद घटना जापान के पूर्व प्रधान मंत्री शिंजो आबे की नृशंस हत्या है। वे न केवल जापान के सशक्त और लोकप्रिय नेता थे बल्कि विश्व राजनीति में भी उनका सर्वमान्य प्रभावशाली व्यक्तित्व था। इस तरह की हिंसा जापान की संस्कृति में अनहोनी घटना है। कुछ लोगों को अंदेशा है कि इसके पीछे चीन का हाथ हो सकता है। जिसने हत्यारे को मनोवैज्ञानिक रूप से इस हाराकिरी के लिए उकसाया होगा। ऐसे षड्यंत्रों का प्रमाण आसानी से जग-ज़ाहिर नहीं होता, इसलिए दावे से कुछ भी नहीं कहा जा सकता। पर ऐसा अंदेशा लगाने वालों का तार्किक आधार यह है कि ‘साउथ एशिया सी’ में चीन की बढ़ती दादागिरी को रोकने की जो पहल शिंजो आबे ने की उससे चीन जाहिरन बहुत विचलित था। 



दुनिया के राजनैतिक पटल पर चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाएं और परोक्ष दादागिरी पर लगाम कसने का साहस अगर किसी में था तो वह शिंजो आबे थे। आबे की आकस्मिक मृत्यु भारत के लिए भी चिंता का विषय है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक ही कहा कि शिंजो आबे की मृत्यु ने भारत का एक सशक्त शुभचिंतक खो दिया। चीन को घेरने की शिंजो आबे की नीति में सक्रिय रह कर श्री मोदी ने भी सहयोग किया था। क्योंकि यह भारत के भी हित में है, वरना चीन का आर्थिक नव-साम्राज्यवाद दक्षिण एशिया को निगलने को तैयार बैठा है। 


उधर श्रीलंका में पिछले कुछ महीनों से जो चल रहा है और विशेषकर पिछले हफ़्ते जो हुआ, वो भी काफ़ी चिंताजनक है। समाज के एक बड़े हिस्से की ओर हिक़ारत से देखना और उसके प्रति घृणा, द्वेष व हिंसा को प्रोत्साहित करके चुनाव जीतने की जो रणनीति श्रीलंका की श्रीलंका पीपुल्स पार्टी और इसके नेताओं महिंदा राजपक्षे और गोटबाया राजपक्षे ने अपनाई थी, उससे वे सत्ता पर तो क़ाबिज़ हो गए, पर विकास के किए वायदे पूरे न कर पाने के कारण  जल्दी ही जनता की नज़र में गिर गए। उस पर भी राजपक्षे परिवार के भारी भ्रष्टाचार ने आग में घी का काम किया। लाखों की तादाद में श्रीलंका की जनता का, फ़ौज की मौजूदगी में, राष्ट्रपति के आधिकारिक निवास पर हमला करना और राष्ट्रपति का छिप कर भाग निकलना, किसी भी देश के लोकतंत्र के लिए बड़ी चेतावनी है। बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी और दैनिक वस्तुओं की भारी कमी जैसी समस्याओं से जूझती श्रीलंका की आम जनता ने अबसे कुछ हफ़्तों पहले इसी तरह प्रधान मंत्री के आवास पर हमला करके उसे जला दिया था। ये वही जनता है जो कल तक इन्हीं नेताओं की दीवानी थी और इनके एक इशारे पर समाज के एक ख़ास हिस्से को समुद्र तक में फेंकने को तैयार थी। 


दुनिया भर के राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि भावनात्मक मुद्दों का जीवनकाल बहुत लम्बा नहीं होता। ये तभी तक सफल होते हैं जब तक आम लोगों को बुनियादी सुविधाएँ, संसाधन और रोज़मर्रा की वस्तुएँ आसानी से उपलब्ध होती रहें। पुरानी कहावत है, ‘भूखे भजन न होय गोपाला। ले लो अपनी कंठी माला।।’, यानी भजन भी भरे पेट के बाद ही हो पाता है। 



भारत के लिए यह एक अच्छी बात है कि हमारा देश कृषि प्रधान है। इसलिए श्रीलंका की तरह भारतवासियों को भूखे सड़कों पर उतरने की नौबत नहीं आएगी। 1994 की बात है मेरे सहपाठी और केंद्र में मंत्री रहे दिवंगत दिग्विजय सिंह से मैंने कहा कि ‘राजनेता इतना भ्रष्टाचार क्यों करते हैं? क्या उन्हें जनक्रांति की संभावना के बारे में सोच कर डर नहीं लगता?’ इस पर दिग्विजय सिंह का उत्तर था, तुम किस दुनिया में रहते हो? भारत के आम लोगों को दो वक्त भरपेट अनाज मिलने में कमी नहीं रहेगी और वे भाग्यवादी हैं, इसलिए अपनी हालत के लिए हमें नहीं, अपने भाग्य को दोष देते हैं। इसलिए यहाँ कभी क्रांति नहीं होगी। उस समय दिग्विजय की ये बात सुन कर मैं सोच में पड़ गया था। पर सब समय एक सा नहीं रहता। हालात बदलने से सोच बदल जाती है। पहले देश के नौजवान भारी मात्रा में अशिक्षित थे। इसलिए परिवार के पास खेती योग्य भूमि सीमित मात्रा में होने पर भी सारा परिवार उसी में जुटा रहता था। जिसे अर्थशास्त्रियों ने ‘प्रच्छन्न बेरोज़गारी’ कहा था। यानी वो बेरोज़गार जो सरकार के रोज़गार कार्यालय में पंजीकरण नहीं कराते। जबकि सही मायने में उनके पास उनकी क्षमता के अनुरूप रोज़गार नहीं होता। 


लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल गयी हैं। भारत की 40 फ़ीसद आबादी युवाओं की है। उनमें शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ है। सूचना क्रांति के चलते गाँव-गाँव तक जागृति फैली है। अब भारत का युवा कुएँ का मेंढक नहीं है। उसकी महत्वाकांक्षाओं को पर लग गए हैं। वो भी आर्थिक प्रगति के आसमान में उड़ना चाहता है। पिछले दिनों ‘अग्निवीर’ योजना को लेकर बरसों से सैन्य और अर्धसैन्य बलों में नौकरी के लिए तैयारी कर रहे करोड़ों युवाओं ने जिस तरह का आक्रोश व्यक्त किया उससे यही संकेत मिलता है कि अब भारत का युवा सपनों की दुनिया में जीना नहीं चाहता। वह अपने सपनों को धरातल पर उतरते देखना चाहता है। 


राष्ट्र का जो नेता युवाओं के और आम लोगों के सपनों को साकार करने की क्षमता का ठोस प्रदर्शन करेगा, वही उनके दिल पर राज करेगा। कोरे आश्वासनों की घुट्टी पिलाने वाला नहीं। भारत के हर राजनैतिक दल के नेताओं को श्रीलंका के घटनाक्रम से सबक़ लेना चाहिए। उन्हें भारी भ्रष्टाचार के मोह जाल से निकल कर, कोरे वायदे और सपने दिखाना बंद करना चाहिए। दुर्भाग्य से आज हम सबके दिमाग़ और मीडिया का सारा समय उन मुद्दों पर बहस में नाहक बर्बाद हो रहा है, जिनसे इन समस्याओं का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। जबकि हमारा क़ीमती समय यह सोचने में लगना चाहिए कि भारत कैसे स्विट्ज़रलैंड जैसा सुंदर बने। कैसे हम तकनीकी शोध में पिद्दी से देश इज़राइल से आगे बढ़ें। कैसे हमारी अर्थव्यवस्था जापान जैसी मज़बूत बने और कैसे हमारे युवा ओलम्पिक खेलों में अमरीका से ज़्यादा मेडल लेकर आएँ। अगर हमने नकारात्मक और विघटनकारी मुद्दों से ध्यान हटा कर विकास के मुद्दों पर केंद्रित नहीं किया तो ‘सोने की चिड़िया’ रहा भारत ‘विश्वगुरु’ नहीं बन पाएगा।