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Monday, December 10, 2018

सनातन परंपराओं से छेड़छाड़ ठीक नहीं

सबरी मलाई मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से हम सभी हिंदू उद्वेलित हैं। इसी हफ्ते एक व्याख्यान में सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश श्रीमती ज्ञान सुधा मिश्रा का कहना था कि जहां संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का पंरपराओं से टकराव होगा, वहां अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। उन्होंने सती प्रथा का उदाहरण देकर अपनी बात का समर्थन किया। किंतु पूजा पद्धति और उससे जुड़े कर्मकांड को बदलने का अधिकार अदालत का नहीं होना चाहिए। जैसे- जन जातीय समाजों में जो कानून की व्यवस्था है, उसमें भारत सरकार हस्तक्षेप नहीं करती। अंग्रेज हुकुमत ने भी नहीं किया। अण्डमान के पास सेंटीनल द्वीप में वनवासियों द्वारा तीर-कमान से मारे गऐ, ‘अमरीकी मिशनरी युवा’ के मामले में सरकार कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर रही। क्योंकि गत 60 हजार सालों से यह प्रजाति शेष दुनिया से अलग-थलग रहकर जीवन यापन कर रही है। उसके अपने कानून हैं और भारत सरकार ने उनकी स्वतंत्रता को सम्मान दिया है। ईसाईयत का प्रचार करने के उद्देश्य से इस युवा ने कानून का उल्लंघ्न कर सेंटीनल द्वीप में प्रवेश किया और मारा गया।

ईसाई मिशनरी, अन्य धर्मी लोग या फिर अदालतें अगर हमारी धार्मिक मान्यताओं में हस्तक्षेप करे, तो उसका कारण समझा जा सकता है। क्योंकि उनकी आस्था हमारी परंपराओं में नहीं है। उनकी सोच भारतीय संस्कृति से हटकर अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति से प्रभावित है। पर अगर हिंदू संस्कृति की रक्षा करने का दावा करने वाले संत, संगठन या राजनैतिक दल ऐसा करते हैं, तो ये चिंता की बात है। इलाहाबाद का नाम ‘प्रयागराज’ करना, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी महाराज का प्रशंसनीय कदम है। पर अर्द्ध कुंभ को कुंभ कहना सनातन परंपराओं से खिलवाड़ है। कुंभ की परंपरा हिंदू मान्यताओं के अनुसार हजारों वर्ष पुरानी है। हर 12 वर्ष में कुंभ, हर 6 वर्ष में अर्द्ध कुंभ और हर 144 वर्ष में महाकुंभ होते आऐ हैं। इसके पीछे वैज्ञानिक और शास्त्रीय दोनों आधार हैं। हमारे धार्मिक  ग्रंथों में इन पर्वों का विस्तृत वर्णन आता है। कुंभ पर उठे वाद-विवादों और धर्म ससंदों का भी उल्लेख आता है। पर ऐसा उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि अर्द्ध कुंभ को पूर्णं कुंभ कह दिया जाऐ। योगी महाराज ने अपने अज्ञानी अधिकारियों की चाटुकारिता भरी सलाह से जो यह निर्णंय लिया है, वह संत समाज के गले नहीं उतर रहा। कुछ खुल कर कह रहे हैं और अधिकतर चुपचाप सह रहे हैं। अगर इसी तरह नाम बदले गऐ, तो भविष्य में कोई ऐसी सरकार भी आ सकती है, जो यह कह दे कि 12 वर्ष में ही कुंभ क्यों होगा? हम तो हर मकर संक्राति को कुंभ करेंगे, तब उसे कौन रोक लेगा?

बात यहीं तक नहीं है। पिछले डेढ़ वर्ष में ब्रजभूमि को लेकर योगी महाराज की सरकार ने जो भी कार्यक्रम और योजनाऐं घोषित की हैं, वे सब ब्रज संस्कृति और मान्यताओं के विपरीत हैं। श्रीमदभागवतम् के दशम स्कंध के 24वें अध्याय के 24वें श्लोक में बालकृष्ण नंद बाबा से कहते हैं कि, ‘ये नगर और गांव हमारे घर नहीं। हमारे घर तो वन और पर्वत हैं।’ आज  ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ अपने ही बनाये कानूनों को तोड़कर हजारों करोड़ रूपयों की वाहियात योजनाऐं ब्रज विकास के नाम पर लागू करवा रही है, जो भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन की भावना के सर्वथा विपरीत हैं।  इनसे ब्रज की सेवा नहीं, विनाश होगा। ये बात हम जैसे लोग लगातार कह रहे हैं। पर अपने मद में चूर और बड़े कमीशन पर निगाह रखने वाले इन अधिकारियों को समझ में नहीं आ रहा।

इसी तरह मथुरा और वृंदावन के बीच भावनात्मक दूरी है। अक्रूर जी जब कृष्ण-बलराम को मथुरा ले गऐ और कंस वध करने के बाद भगवान लौटे नहीं, तो वे मथुरा के राजमहल में वृंदावन की याद करके अपने मित्र उद्धव से कहते है, ‘उधौ मोहे ब्रज बिसरत नाहि’। वृंदावनवासी ग्वारिये कृष्ण के प्रति साख्य भाव रखते हैं। जबकि मथुरावासी कृष्ण को द्वारिकाधीश अर्थात् राजा के रूप में पूजते हैं। पर योगी महाराज की सरकार ने वृंदावनवासियों के घोर विरोध की उपेक्षा करके मथुरा-वृंदावन नगर निगम बना दिया। जोकि ब्रज की सनातन परंपरा के पूरी तरह विपरीत है। पूरा ब्रज भक्ति भावना प्रधान है। नंदग्राम वालों के लिए अगर ग्वारिया कृष्ण अधिक महत्वपूर्णं हैं, तो बरसानावासी राधारानी के प्रति स्वयं का सखी भाव रखते हैं। हर गांव का अपना पौराणिक इतिहास है। इसी तरह गोवर्धन, जो प्रकृति पूजा का सर्वोत्तम उदाहरण है। उसके चारों ओर विकास का जो मॉडल ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ लेकर आई है। वह गोवर्धन की भावना का सर्वथा प्रतिकूल है। इससे गोवर्धन ‘न्यूयॉर्क’ शहर की तरह हो जाऐगा। जो इसकी अपूर्णंनीय क्षति होगी।

हमारी सनातन परंपराओं से अगर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी ने ऐसी छेड़छाड़ की होती, तो निश्चय ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उससे जुड़े संगठन तूफान मचा देते। जो सही भी होता। लेकिन जब हिंदू धर्म की सेवा करने का दावा करने वाले दल भाजपा की सरकार में सनातन परंपराओं से खिलवाड़ हो, तो किसका विरोध किया जाऐ? यह हम सब सनातनधर्मियों की बिडंबना है और पीड़ा भी।

योगी महाराज के मुख्यमंत्री बनने पर हम सबसे ज्यादा उत्साहित थे । मैंने टीवी चैनलों पर ऐसा कई बार  कहा भी था। आशा थी कि योगी जी हम सनातनधर्मियों की भावना का सम्मान करते हुए, हमारी सांस्कृति विरासतों की रक्षा में उदारता से सहयोग करेंगे। उनकी मंशा और धर्म के प्रति समर्पण में आज भी कोई संदेह नहीं है। वे सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए भरपूर थैली खोले बैठे हैं। पर बिडंबना यह है कि उनके चारों ओर वे लोग हैं, जो उनसे तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं को निज लाभ के लिए पारित करवा कर सनातन धर्म की परंपराओं और भावनाओं पर कुठाराघात कर रहे हैं। योगी जी को इस मकड़जाल से निकलकर मुक्त हृदय से दूसरे पक्ष की बात को भी गंभीरता से सुनने की सामर्थ्य दिखानी चाहिए। तभी धर्म की सच्ची सेवा होगी अन्यथा धर्म का विनाश होगा और केवल कुछ जेबें भारी जाएंगी। आगे हरि इच्छा।

Monday, November 26, 2018

ब्रजवासियों के साथ धोखा क्यों?

जब से ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ का गठन हुआ है, ये एक भी काम ब्रज में नहीं कर पाई है। जिन दो अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ जी ने इतने महत्वूपर्णं ब्रजमंडल को सजाने की जिम्मेदारी सौंपी हैं, उन्हें इस काम का कोई अनुभव नहीं है। इससे पहले उनमें से एक की भूमिका मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष के नाते तमाम अवैध निर्माण करवाकर ब्रज का विनाश करने में रही है। दूसरा सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी है, जिसने आजतक ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण पर कोई काम नहीं किया। इन दोनों को ही इस महत्वपूर्णं, कलात्मक और ऐतिहासिक काम की कोई समझ नहीं है। इसलिए इन्होंने अपने इर्द-गिर्द फर्जी आर्किटैक्टों, भ्रष्ट जूनियर अधिकारियों और सड़कछाप ठेकेदारों का जमावाड़ा कर लिया है। सब मिलकर नाकारा, निरर्थक और धन बिगाड़़ू योजनाऐं बना रहे हैं। जिससे न तो ब्रज का सौंदर्य सुधरेगा, न ब्रजवासियों को लाभ होगा और न ही संतों और तीर्थयात्रियों को। केवल कमीशन खोरों की जेबें भरी जाऐंगी।
इनकी मूर्खता का ताजा उदाहरण है भगवान श्रीकृष्ण की 40 करोड़ रूपये की विशाल मूर्ती, जिसे ये दिल्ली-आगरा के बीच सुश्री मायावती द्वारा बनावाऐं गये यमुना एक्सप्रेस वे के उस बिंदु पर लगवाने जा रहे हैं, जहां से गाड़ियां वृंदावन के लिए मुड़ती है। 40 करोड़ की मूर्ती में कितना कमीशन खाया जाऐगा, इसका अंदाजा इसी बात से लगा लीजिए, कि ब्रज के 9 कुंडों के जीर्णोंद्धार का ठेका, ये सरकारी लोग 77 करोड़ में पिछले वर्ष दे चुके थे। जिसे ‘द ब्रज फाउंडेशन’ के शोर मचाने और बेहतर कार्य योजना देने के बाद अब मात्र 27 करोड़ रूपये में करवाया जायेगा। इस तरह 50 करोड़ रूपये की बर्बादी रोकी गई है। क्योंकि द ब्रज फाउंडेशन गत 15 वर्षों से अपने तन-मन-धन से भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीलास्थलियां सजा रही है। इसलिए उससे कोई चोरी छिप नहीं सकती। 77 करोड़ रूपये में 50 करोड़ रूपये का घोटाला, यानि 66 फीसदी कमीशन। इस अनुपात से 40 करोड़ रूपये की मूर्ती में 27 करोड़ रूपया कमीशन में जाएगा।
मूर्ति लगवाने के पीछे इनका तर्क है कि वाहन चालकों को दूर से ही पता चल जाएगा कि वृंदावन आ गया। कितनी हास्यास्पद बात है, बिना मूर्ती लगे ही जब हजारों गाड़ियां रोज वृंदावन आ रही है, तो उन्हें  रास्ता कौन बता रहा है? जिसे वृंदावन आना है, उसे सब रास्ते पता हैं। वैसे जो तीर्थयात्री रोज आ रहे हैं, उनसे ही वृंदावन की सारी व्यवस्था चरमरा जाती है। गत दो वर्षों में ब्रज तीर्थ विकास इस स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नही कर पाया। तो अब विशाल मूर्ती लगवाकर और मजमा क्यों जोड़ना चाहता है?
उधर ब्रज में 85 फीसदी भू जल खारा है। प्राचीन कुंडों के जीर्णोंद्धार जल संचयन भी होता है और खारापन भी क्रमशः कम होता है। सर्वोच्च न्यायालय के 2001 के ‘हिंचलाल तिवारी आदेश’ के तहत शासन को ब्रज के उपेक्षित पड़े 800 से भी अधिक कुंडों का जीर्णोंद्धार कराना चाहिए था। जबकि उसने आजतक लगभग 40 करोड़ रूपया खर्च करके 40 कुंडों का जीर्णोंद्धार करवाया है, जिनकी दशा पहले से भी ज्यादा दयनीय हो गई हैं। उनके नऐ बने घाट टूट रहे हैं, कूड़े और मलबे के ढेर जमा हो गऐ हैं और उनमें कुत्ते और सूअर डोलते हैं।
इस मूर्ती को लगवाने से बेहतर होता कि ब्रजतीर्थ विकास परिषद् ब्रज के कुछ कुंडों का जीर्णोंद्धार करवा देता, तो ब्रज में जल की समस्या के समाधान की दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ते। साथ ही इससे ब्रज के गांवों में रहने वाले गोधन, ब्रजवासियों और संतों को प्रसन्नता होती। पर वहां भी इनकी गर्दन फंसी है। क्योंकि द ब्रज फाउंडेशन ने बेहद कम लागत पर वृंदावन के ब्रह्म कुंड, गोवर्धन के ऋणमोचन कुंड, रूद्र कुंड व संकर्षण कुंड, जैंत का जयकुंड, चौमुहा  का ब्रह्म सरोवर आदि दर्जनों पौराणिक कुंडों का मनोहारी जीर्णोंद्धार कर मथुरा जिले की जलधारण क्षमता को 5 लाख क्यूबिक मीटर बढ़ा दिया है। अब अगर ब्रज तीर्थ विकास परिषद् कुंडों का जीर्णोंद्धार करेगी, तो उसे भी द ब्रज फाउंडेशन की लागत के बराबर कीमत पर काम करना पड़ेगा। तिगुने दाम की योजना बनाने वाली ब्रजतीर्थ विकास परिषद् फिर कमीशन कैसे खा पाऐगीा? इसलिए विशाल मूर्ती लगवाने जैसी फालतू परियोजनाऐं बनाई जा रही है, जिससे कोई हिसाब भी न मांग सके और ढ़िढोरा भी पीट दिया जाऐ कि 40 करोड़ रूपये की मूर्ती लगवा दी गई।
योगी जी से उद्घाटन करवाने की जल्दी में ब्रजतीर्थ विकास परिषद् ने सड़कछाप आर्किटैक्टों को पकड़कर बड़े बजट की परियोजनाऐं बनवा ली हैं, जिससे मोटा कमीशन खाया जा सके। इस तरह हर ओर ब्रज का विनाश किया जा रहा है। भाजपा योगी महाराज को हिंदू धर्म का पुरोधा बनाकर चुनावों में घुमा रही है। पर योगी महाराज की सरकार के भ्रष्ट और निकम्मे अधिकारी ब्रज जैसे कृष्ण भक्ति के पौराणिक धाम की महत्ता और संवेदनशीलता को समझे बिना शहरी लोगों के मनोरंजन के लिए बड़ी-बड़ी खर्चीली योजनाऐं बनवा रहे हैं। जिनसे ब्रज का विकास होना तो दूर, विनाश की गति तेजी से बढ़ गई है। चुनाव में वोट मांगे जाऐंगे आम ब्रजवासी से, जो गांवों में रहता है। जिसने कान्हा से संग गाय चराई। जिनके घरों से कान्हा ने माखन चुराया। उन सब ब्रजवासियों की उपेक्षा कर बाहर से आने वाले सैलानियों के मनोरंजन की योजनाऐं बनाकर ब्रजतीर्थ विकास परिषद् क्यों योगी महाराज की छवि खराब करने में जुटी है? ये ब्रजवासियों के साथ सरासर धोखा है।

Monday, April 24, 2017

क्यों घुसना चाहता है वल्र्ड बैंक हमारे धर्मक्षेत्रों में?

Punjab Kesari 24 April 2017
ईसाईयों के विश्व गुरू पोप जब भारत आए थे, तो भारत सरकार ने उनका भव्य स्वागत किया था। परंतु पोप ने इसका उत्तर शिष्टाचार और कृतज्ञता के भाव से नहीं दिया बल्कि भारत के बहुसंख्यकों का अपमान एवं तिरस्कार करते हुए खुलेआम घोषणा की, कि हम 21वीं सदी में समस्त भारत को ईसाई बना डालेंगे। बहुसंख्यकों के धर्म को नष्ट कर डालने की खुलेआम घोषणा करना हमारी धार्मिक भावनाओं पर खुली चोट करना था, जो कानून की नजर में अपराध है। पर सरकार ने कुछ नहीं किया। सरकार की उस कमजोरी का लाभ उठाकर विश्व बैंक व ऐसी अन्य संस्थाओं के ईसाई पदाधिकारी, पोप की उसी घोषणा को क्रियान्वित करने के लिए हर हथकंडे अपना रहे हैं। इसी में से एक है ‘गरीब-परस्त पर्यटन’ (प्रो-पूअर टूरिस्म) के नाम पर हमारे पवित्र तीर्थों जैसे ब्रज या बौद्ध तीर्थ कुशीनगर आदि में पिछले दरवाजे से साजिशन ईसाई हस्तक्षेप। इसी क्रम में ब्रज के कुंडों के जीर्णोंद्धार और श्रीवृंदावन धाम में श्रीबांकेबिहारी मंदिर की गलियों के सौंदर्यींकरण के नाम पर एक कार्य योजना बनवाकर विश्व बैंक चार लक्ष्य साधने जा रहा है।

पहलाः विश्व में यह प्रचार करना कि भारत गरीबों का देश है और हम ईसाई लोग उनके भले के लिए काम कर रहे है। इस प्रकार उभरती आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत की छवि को खराब करना। दूसराः हिंदूओं को नाकारा बताकर यह प्रचारित करना कि हिंदू अपने धर्मस्थलों की भी देखभाल नहीं कर सकते, उन्हें भी हम ईसाई लोग ही संभाल सकते हैं। जैसे कि भारत को संभालने का दावा करके अंगे्रज हुकुमत ने 190 वर्षों में सोने की चिड़ियां भारत को जमकर लूटा। उसके बावजूद भारत आज भी वैभव में पूरे यूरोप से कई गुना आगे है। जबकि उनके पास तो पेट भरने को अन्न भी नहीं है। यूरोप के कितने ही देश दिवालिया हो चुके है और होते जा रहे हैं। क्योंकि अब उनके पास लूटने को औपनिवेशिक साम्राज्य नहीं हैं। इसलिए ‘वल्र्ड बैंक’ जैसी संस्थाओं को सामने खड़ाकर हमारे मंदिरो और धर्मक्षेत्रों को लूटने के नये-नये हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। तीसराः इस प्रक्रिया में हमारे धर्मक्षेत्रों में अपने गुप्तचरों का जाल बिछाना जिससे वो सारी सूचनाऐं एकत्र की जा सकें, जिनका भविष्य में प्रयोग कर हमारे धर्म को नष्ट किया जा सके। 

एक छोटा उदाहरण काफी होगा। इसाई धर्म में पादरी होता है, पुजारी नहीं। चर्च होता है, मंदिर नहीं। ईसा मसीह प्रभु के पुत्र माने जाते हैं, ईश्वर नहीं। इनके पादरी सदियों से सफेद वस्त्र पहनते हैं, केसरिया नहीं। अब इनकी साजिश देखिएः आप बिहार, झारखंड, उड़ीसा जैसे राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों में ये देखकर हैरान रह जायेंगे कि भोली जनता को मूर्ख बनाने के लिए ईसाई धर्म प्रचारक अब भगवा वस्त्र पहनते हैं। स्वयं को पादरी नहीं, पुजारी कहलवाते हैं। गिरजे को प्रभु यीशु का मंदिर कहते हैं। 2000 वर्षों से जिन ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र बताते आए थे, उन्हें अब भारत में  ईश्वर बताने लगे हैं। क्योंकि हमारे भगवान तो श्रीकृष्ण व श्रीराम हैं। भगवान श्रीराम के पुत्र तो लव और कुश हैं। हिंदू समाज भगवान राम की पूजा करता है, लव और कुश का केवल सम्मान करता है। अगर ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र बतायेंगे तो भारतीय जनता उन्हें लव-कुश के समान समझेगी, भगवान नहीं मानेगी। चौथाः हमारे धर्मक्षेत्रों की गरीबी दूर करने के नाम पर जो कर्ज ये देने जा रहे हैं, उसमें से बड़ी मोटी रकम अर्तंराष्ट्रीय सलाहकारों को फीस के रूप में दिलवा रहे हैं। ऐसे सलाहकार जो ब्रज के विकास की योजनाऐं बनाते समय प्रस्तुति देते हुए कहते हैं कि स्वामी हरिदास जी, तानसेन के शिष्य थे।

ऐसी योजनाऐं बनाने के लिए दी जाने वाली करोड़ों रूपये फीस के पीछे हमारी प्रशासनिक व्यवस्था को भ्रष्ट करने के लिए मोटा कमीशन देना और उन्हें विदेश घुमाने का खर्चा शामिल होता है। जबकि इस सब खर्चे का भार भी उत्तर प्रदेश की जनता पर कर्ज के रूप में ही डाला जायेगा। पिछले कई वर्षों से अखबारों में आ रहा है कि विश्व बैंक ब्रज की गरीबी दूर करने के लिए बडी-बड़ी योजनाऐं बना रहा है। शुरू में खबर आई कि वृंदावन में 100 करोड़ रूपये खर्च करके एक बगीचा बनाया जायेगा और एक-एक कुंड के जीर्णोद्धार पर 10-10 करोड़ रूपये खर्च करके 9 कुंडों का जीर्णोद्धार किया जायेगा। 2002 से ब्रज को सजाने में व कुंडों के जीर्णोद्धार में जुटी ब्रज फाउंडेशन की टीम को ये बात गले नहीं उतरी। क्योंकि कूड़े के ढेर पडे़, वृंदावन के ब्रह्मकुंड को ब्रज फाउंडेशन ने मात्र 88 लाख रूपये में सजा-संवाकर, सभी का हृदय जीत लिया। गोवर्धन परिक्रमा पर भी इसी तरह दशाब्दियों से मलबे का ढेर बने रूद्र कुंड को मात्र ढाई करोड़ रूपये में इतना सुंदर बना दिया कि उसका उद्घाटन करने आए उ.प्र. के मुख्यमंत्री को सार्वजनिक मंच पर कहना पड़ा कि ‘रूपया तो हमारी सरकार भी बहुत खर्च करती है, पर इतना सुंदर कार्य क्यों नहीं कर पाती, जितना ब्रज फाउंडेशन करती है।’ ब्रज फाउंडेशन ने विरोध किया तो 2015 में विश्व बैंक को ये योजनाऐं निरस्त करनी पड़ीं। अब जो नई योजनाऐं बनाई हैं वे भी इसी तरह बे-सिर पैर की हैं। ‘कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना’।
हमारे मंदिरों, तीर्थस्थलों, लीलास्थलियों और आश्रमों के संरक्षण, संवर्धन या सौदंर्यीकरण का दायित्व हिंदू धर्मावलम्बियों का है। ईसाई या मुसलमान हमारे धर्मक्षेत्रों में कैसे दखल दे सकते हैं? क्या वे हमें अपने वैटिकन या मक्का मदीने में ऐसा हस्तक्षेप करने देंगे? हमारे धर्मक्षेत्रों में क्या हो, इसका निर्णय, हमारे धर्माचार्य और हम सब भक्तगण करेंगे। ब्रज में इस विनाशकारी हस्तक्षेप के विरूद्ध आवाज उठ रही है। देखना है योगी सरकार क्या निर्णय लेगी।
 

Monday, May 2, 2016

हेमामालिनी ब्रज की अभूतपूर्व सांसद बन सकती है

जब हेमा मालिनी का नाम लोकसभा चुनावों में मथुरा से सांसद के प्रत्याशी के रूप में घोषित हुआ, तो भाजपा के विरोधी खेमों में ही नहीं, बल्कि भाजपा में भी यह सुगबुगाहट थी कि एक फिल्मी अदाकारा ब्रज की क्या सेवा करेगी? लोग ये कहते थे कि वोट लेने के बाद हेमामालिनी के दर्शन अगले पांच वर्ष तक नहीं होंगे। अभी चुनाव हुए 2 वर्ष ही हुए है, लेकिन हर ब्रजवासी की जुबान पर हेमामालिनी का नाम हैं। इसलिए नहीं कि वे आये दिन ब्रज में हर मौके पर उपस्थित रहकर अपने ब्रजप्रेम का प्रदर्शन करती हैं। इसलिए भी नहीं कि उन्होंने ब्रज के गांवों के विकास की अपेक्षाओं को पूरा कर दिया, ऐसा तो वो क्या कोई भी सांसद नहीं कर सकता। बल्कि इसलिए कि उन्होंने ब्रज के लिए जो किया है, वैसा आजतक कोई सांसद नहीं कर पाया था।

यह भ्रान्ति है कि सांसद का काम सड़क और नालियां बनवाना है। झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में फंसने के बाद प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने सांसदों की निधि की घोषणा करने की जो पहल की, उसका हमने तब भी विरोध किया था। सांसदों का काम अपने क्षेत्र की समस्याओं के प्रति संसद और दुनिया का ध्यान आकर्षित करना हैं, कानून बनाने में मदद करना हैं, न कि गली-मौहल्ले में जाकर सड़क और नालियां बनवाना। कोई सांसद अपनी पूरी सांसद निधि भी अगर लगा दे तो एक गांव का विकास नहीं कर सकता। इसलिए सांसद निधि तो बन्द कर देनी चाहिए। यह हर सांसद के गले की हड्डी है और भ्रष्टाचार का कारण बन गई है।

हेमा मलिनी ने ब्रज को न सिर्फ समझा हैं, गले लगाया है बल्कि उसे अपने हृदय में उतार लिया है। पिछले दिनों उन्होंने वृन्दावन में अपनी दो नृत्य नाटिकाएं प्रस्तुत की, ’यशोदा कृष्ण ’व’ राधा-रासबिहारी’। इन प्रस्तुतियों में ब्रज का जो नैसर्गिक और सांस्कृतिक भाव हेमा जी ने प्रस्तुत किया, उसे देखकर हर ब्रजवासी मंत्रमुग्ध हो गया। इसमें आधुनिक तकनीकि का व्यापक इस्तेमाल किया गया। जो इस तरह के नाट्य बैले में उनकी संस्था ’नाट्य विहार कला केन्द्र, मुम्बई’ आज तक करती आई है। पर इसके साथ ही वृन्दावन की ’कान्हा एकेडमी’ के संचालक अनूप शर्मा ने अपना बौद्धिक सहयोग करके इस नृत्य नाटिका में ब्रज की माखन मिसरी घोल दी। दोनों के संयुक्त प्रयास से जो कुछ मंच पर प्रस्तुत किया गया वह काफी है पूरी दुनिया का ध्यान ब्रज की ओर आकर्षिक करने के लिए।

हेमाजी से जब भी ब्रज के विषय में चर्चा होती है, वे अपनी पीड़ा व्यक्त करना नहीं भूलती। उन्हें दुख है कि भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीलास्थलियों वाला ब्रज इतनी दुर्दशा को कैसे प्राप्त हो गया ? यही कारण है जब उन्होंने ’ब्रज फाउण्डेशन’ के जीर्णोंद्धार कार्यों को देखा तो वे दंग रह गई और सार्वजनिक मंच से कहा कि अब मैं ब्रज फाउण्डेशन के साथ मिलकर ब्रज सजाने का काम करूंगी। क्योंकि ब्रज फाउण्डेशन पिछले 15 वर्षों से ब्रज की जीर्ण-शीर्ण हो गई, लीलास्थलियों को ढूंढने, संवारने, सजाने और संरक्षण करने का काम बड़ी तत्परता और कलात्मकता से कर रही है। जिसकी सराहना वर्तमान प्रधानमंत्री व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक सार्वजनिक रूप से करते हैं।

अपनी नृत्य नाटिका के साथ ही अगर हेमामालिनी ब्रज फाउण्डेशन की एक पावर पॉइंट प्रस्तुति भी करवाती हैं तो दर्शकों को पता चलेगा कि जिस कोईलेघाट से वसुदेव जी बालकृष्ण को लेकर यमुना पार गोकुल गये थे, वो कैसा था और अब उसे फाउण्डेशन ने कैसा सुंदर बना दिया। इसी तरह जब हेमाजी की नृत्य नाटिका में कालियामर्दन की लीला का दृश्य आयेगा तो उसके बाद ही दर्शकों को दिखाया जाए कि इस लीला स्थली का स्वरूप कैसा था और अब उसे कितना निखार दिया गया। इस तरह एक तरफ कला व संगीत के साथ सौन्दर्यबोध कराया जायेगा तो दूसरी तरफ लीलास्थलियों की दुर्दशा की वास्तविक स्थिति दिखाकर पूरी दुनिया के कृष्णभक्तों और भारत प्रेमियों को ब्रज को सजाने-संवारने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। यदि हेमामालिनी ऐसा कर पाती हैं तो ब्रज विकास के कामों में गति आयेगी। यही एक सांसद का कार्य भी है कि वह अपने क्षेत्र के प्रति दुनिया का ध्यान आकर्षित करें। ब्रज में वैसे उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के अलावा, राजस्थान का भरतपुर व हरियाणा के पलवल जिले का कुछ क्षेत्र भी आता है। प्रयास ऐसा होना चाहिए कि पूरे ब्रज का सौन्दर्यीकरण साथ हो। चाहे वो किसी भी राज्य के हिस्से में क्यों न हो। क्योंकि कान्हा की लीलास्थलियां पूरे ब्रज में हैं।

इससे पहले जो मथुरा के सांसद बने, वे सद्इच्छा रखते हुए भी राजनीतिज्ञ थे। कोई कलामर्मज्ञ या भक्त नहीं थे। इसलिए उनसे ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। हेमामालिनी कहने को राजनीतिज्ञ हैं। पर वास्तव वे एक उच्चकोटि की कलाकार और उससे भी उच्चकोटि की भक्त है। ऐसी शख्सियत आज ब्रज का संसद में प्रतिनिधित्व कर रही हैं, यह ब्रजवासियों के लिए गर्व की बात होनी चाहिए। हेमामालिनी को भी अपनी शख्सियत के अनुसार ब्रज की ब्रान्ड एम्बेंसडर बनने की भूमिका और जोरदार तरीके से निभानी चाहिए।

पर प्रायः होता यह है कि मशहूर और शक्तिशाली लोगों से निहित स्वार्थ इस तरह चिपक जाते हैं, कि वे उनके चारों ओर एक दीवार खड़ी कर देते हैं। उन्हें गलत सूचनाएं देते हैं, उनकी ऊर्जा का अपव्यय करवाते हैं और उनसे अपने व्यावसायिक हित साधते हैं। हेमा जी को ऐसे लोगों से सावधान रहना होगा और तलाशने होंगे वो लोग जिनका एकमात्र ध्येय ब्रज को सजाना और संवारना है। ऐसे लोगों के साथ जुड़कर वे ब्रज को बहुत कुछ दे सकती है। जो पहले कोई सांसद न दे पाया। कोई वजह नहीं कि ऐसा करने के बाद ब्रज की जनता उन्हें दुबारा संसद में न भेजें।

Monday, March 23, 2015

कैसे आए नदियों में साफ जल

    पूरा ब्रज क्षेत्र यमुना में यमुना की अविरल धारा की मांग लेकर आंदोलित है। सभी संप्रदाय, साधु-संत, किसान और आम नागरिक चाहते हैं कि ब्रज में बहने वाली यमुना देश की राजधानी दिल्ली का सीवर न ढोए, बल्कि उसमें यमुनोत्री से निकला शुद्ध यमुना जल प्रवाहित हो। क्योंकि यही जल देवालयों में अभिषेक के लिए प्रयोग किया जाता है। भक्तों की यमुना के प्रति गहरी आस्था है। इस आंदोलन को चलते हुए आज कई वर्ष हो गए। कई बार पदयात्राएं दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंची और मायूस होकर खाली हाथ लौट आयीं। भावुक भक्त यह समझ नहीं पाते कि उनकी इतनी सहज-सी मांग को पूरा करने में किसी भी सरकार को क्या दिक्कत हो सकती है। विशेषकर हिंदू मानसिकता वाली भाजपा सरकार को। पर यह काम जितना सरल दिखता है, उतना है नहीं।

    यह प्रश्न केवल यमुना का नहीं है। देश के ज्यादातर शहरीकृत भू-भाग पर बहने वाली नदियों का है। पिछले दिनों वाराणसी के ऐतिहासिक घाटों के जीर्णोद्धार की रूपरेखा तैयार करने मैं अपनी तकनीकि टीम के साथ कई बार वाराणसी गया। आप जानते ही होंगे कि वाराणसी का नामकरण उन दो नदियों के नाम पर हुआ है, जो सदियों से अपना जल गंगा में अर्पित करती थीं। इनके नाम हैं वरूणा और असी। पर शहरीकरण की मार में इन नदियों को सुखा दिया। अब यहां केवल गंदा नाला बहता है। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रामगंगा नदी लगभग सूख चुकी है। इसमें गिरने वाली गागन और काली नदी जैसी सभी सहायक नदियां आज शहरों का दूषित जल, कारखानों की गंदगी और सीवर लाइन का मैला ढो रही हैं। पुणे शहर की मूला और मूथा नदियों का भी यही हाल है। मेरे बचपन का एक चित्र है, जब में लगभग 3 वर्ष का पुणे की मूला नदी के तट पर अपनी मां के साथ बैठा हूं। पीछे से नदी का प्रवाह, उसके प्रपात और बड़े-बड़े पत्थरों से टकराती उसकी लहरें ऐसा दृश्य उत्पन्न कर रही थीं, मानो यह किसी पहाड़ की वेगवती नदी हो। पर अभी पिछले दिनों मैं दोबारा जब पुणे गया, तो देखकर धक्क रह गया कि ये नदियां अब शहर का एक गंदा नाला भर रह गई हैं।

    यही हाल जीवनदायिनी मां स्वरूप गंगा का भी है। जिसके प्रदूषण को दूर करने के लिए अरबों रूपया सरकारें खर्च कर चुकी हैं। पर कानपुर हो या वाराणसी या फिर आगे के शहर गंगा के प्रदूषण को लेकर वर्षों से आंदोलित हैं। पर कोई समाधान नहीं निकल रहा है। कारण सबके वही हैं - अंधाधुंध वनों की कटाई, शहरीकरण का विकराल रूप, अनियंत्रित उद्योगों का विस्तार, प्रदूषण कानूनों की खुलेआम उड़ती धज्जियां और हमारी जीवनशैली में आया भारी बदलाव। इस सबने देश की नदियों की कमरतोड़ दी है।

शुद्ध जल का प्रवाह तो दूर अब ये नदियां कहलाने लायक भी नहीं बची। सबकी सब नाला बन चुकी हैं। अब यमुना को लेकर जो मांग आंदोलनकारी कर रहे हैं, अगर उसका हल प्रधानमंत्री केे पास होता तो धर्मपारायण प्रधानमंत्री उसे अपनाने में देर नहीं लगाते। पर हकीकत ये है कि सर्वोच्च न्यायालय, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं ग्रीन ट्यूबनल, सबके सब चाहें जितने आदेश पारित करते रहें, उन्हें व्यवहारिक धरातल पर उतारने में तमाम झंझट हैं। जब पहले ही दिल्ली अपनी आवश्यकता से 70 फीसदी कम जल से काम चला रही हो, जब हरियाणा के किसान सिंचाई के लिए यमुना की एक-एक बूंद खींच लेना चाहते हों, तो कहां से बहेगी अविरल यमुना धारा ? हथिनीकुंड के फाटक खोलने की मांग भावुक ज्यादा है, व्यवहारिक कम। ये शब्द आंदोलनकारियों को कड़वे लगेंगे। पर हम इसी काॅलम में यमुना को लेकर बार-बार बुनियादी तथ्यों की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं। पर ऐसा लगता है कि आंदोलन का पिछला नेतृत्व करने वाला नेता तो फर्जी संत बनने के चक्कर में और ब्रजवासियों को टोपी पहनाने के चक्कर में लगा रहा मगर अब उसका असली रूप सामने आ गया। उसे ब्रजवासियों ने नकार दिया। अब दोबारा जब आन्दोलन फिर खड़ा हुआ है तो ज्यादातर लोग तो क्षेत्र में अपनी नेतागिरि चमकाने के चक्कर में लगे हुए हैं। करोड़ों रूपया बर्बाद कर चुके हैं। भक्तों और साधारण ब्रजवासियों को बार-बार निराश कर चुके हैं और झूठे सपने दिखाकर लोगों को गुमराह करते रहे हैं। पर कुछ लोग ऐसे है जो रात दिन अग्नि में तप कर इस आंदोलन को चला रहे हैं।

सरकार के मौजूदा रवैये से अब एक बार फिर उनकी गाड़ी एक ऐसे मोड़ पर फंस गई है, जहां आगे कुंआ और पीछे खाई है। आगे बढ़ते हैं, तो कुछ मिलने की संभावना नहीं दिखती। विफल होकर लौटते हैं, तो जनता सवाल करेगी, करें तो क्या करें। मौजूदा हालातों में तो कोई हल नजर आता नहीं। पर भौतिक जगत के सिद्धांत आध्यात्मिक जगत पर लागू नहीं होते। इसलिए हमें अब भी विश्वास है कि अगर कभी यमुना में जल आएगा तो केवल रमेश बाबा जैसे विरक्त संतों की संकल्पशक्ति से आएगा, किसी की नेतागिरी चमकाने से नहीं। संत तो असंभव को भी संभव कर सकते हैंै, इसी उम्मीद में हम भी बैठे हैं कि काश एक दिन वृंदावन के घाटों पर यमुना के शुद्ध जल में स्नान कर सकें।