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Monday, July 20, 2026

आयुर्वेदिक दवाओं पर गहन वैज्ञानिक शोध

बीस बरस पहले वामपंथी नेता वृंदा कारत ने बाबा रामदेव के पतंजलि योग संस्थान की औषधियों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे। तब ये बहस मीडिया में छाई रही थी। वृंदा कारत की मानसिकता जिस पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित रही है उसमें ऐसे विवाद खड़ा करना आम बात थी। आश्चर्य की बात यह है कि आयुर्वेद की विश्वसनीयता और गुणवत्ता पर सवाल खड़े करने वाले लोग कभी एलोपैथिक दवाइयों के बारे में ऐसे शंकाएँ प्रदर्शित नहीं करते। जबकि हकीकत यह है कि विकासशील देशों को छोड़ विकसित देशों में भी बहुराष्ट्रीय फ़ार्मासिटिकल कंपनियों के मायाजाल पर अनेक घोटाले सामने आते रहे हैं, जिन्हें पैसे, मीडिया और सत्ता की ताक़त से दबा दिया जाता है। ये अंग्रेज़ी दवा कंपनिया हमारे जीवन में कितना ज़हर घोल रही हैं इस पर कभी कोई बहस नहीं होती। जबकि पुरानी कहावत है कि ‘हर जो चीज़ चमकती है उसे सोना नहीं कहते’। 

खैर ये बात तो पुरानी हो गई। नई बात तो यह है कि बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने पश्चिमी जगत की इस चुनौती को बड़ी मजबूती से स्वीकार कर लिया है। अब वे अपने शोध और शास्त्रीय ग्रंथों पर आधारित आयुर्वेदिक दवाओं को सीधे बाज़ार में नहीं उतार रहे। अब उन्होंने हरिद्वार में ही, ‘पतंजलि रिसर्च इंस्टिट्यूट’ की स्थापना की है। जहाँ दुनिया की आधुनिकतम मशीनों से दवाओं को बाज़ार में लाने से पहले उन पर वैज्ञानिक शोध किए जा रहे हैं। उनकी यह पहल उन लोगों को करारा जवाब है जो आयुर्वेदिक दवाओं की वैज्ञानिकता को चुनौती देते आए हैं। 



पिछले हफ़्ते हरिद्वार यात्रा के दौरान मुझे इस शोध संस्थान को देखने का अवसर मिला। वहाँ के एक वैज्ञानिक ने मुझे पूरे संस्थान का भ्रमण करवाया। इस संस्थान में कैंसर, डायबटीज़, सूजन, हृदय रोग, छूत के रोग और चर्म रोगों पर विशेष शोध किया जा रहा है। इस संस्थान की केमिस्ट्री लैब में आयुर्वेदिक दवाओं को ‘फाइटो केमिस्ट्री’ और ‘एनालिटिकल केमिस्ट्री’ की दृष्टि से परखा जा रहा है। इसी संस्थान के जीव विज्ञान विभाग में आयुर्वेदिक उत्पादनों को उनके स्रोत, औषधियों के पौधे और उनसे निकाले जाने वाले तत्वों को विभिन्न प्रजातियों पर प्रयोग करके उनका गहन वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है। संस्थान के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में आयुर्वेदिक दवाओं के माइक्रोबायोलॉजिकल प्रोफाइल का गहनता से अध्ययन किया जा रहा है। इन दवाओं के बैक्टीरिया या फंगस संबंधित गुण दोषों को आधुनिकतम मशीनों से परखा जा रहा है। इसी तरह संस्थान के नैनो-टेक्नोलॉजी विभाग में दवाओं की मात्रा को घटाने और उनके साइड-इफ़ेक्ट्स को कम करने जैसे विषयों पर भी काम किया जा रहा है। इस शोध की सफलता कैंसर जैसी घातक बीमारी को रोकने में प्रभावी हो सकती है ऐसा यहाँ शोध कर रहे वैज्ञानिकों का विश्वास है। 


इस तरह के प्रयोगों के लिए आमतौर पर प्रयोगशाला में रखे जाने वाले काफ़ी तादाद में जीव-जंतु जैसे चूहे, खरगोश, जूँ और ग्यूनापिग आदि को नियंत्रित वातावरण में रखें गए हैं। जिन पर दवाओं के प्रयोग कर उनके प्रभाव का  अनुसंधान किए जा रहे हैं। यह सब भारत सरकार के ‘वन एवम् पर्यावरण मंत्रालय’ द्वारा स्थापित मानदंडों के अंतर्गत किया जा रहा है। संस्थान के भ्रमण के दौरान मैंने अलग-अलग प्रयोगशालाओं के वैज्ञानिकों से बहुत सारे ऐसे प्रश्न किये जो एक आम व्यक्ति के दिमाग में उठते हैं। क्योंकि आज देश का माहौल ऐसा है कि विज्ञापनों के सहारे तमाम हानिकारक पदार्थ और दवाएं बाज़ारों में धड़ल्ले से बिक रही हैं। इसलिए हर जागरूक उपभोक्ता गहन छान-बीन के बाद ही इन उत्पादनों पर भरोसा कर पता है। पतंजलि शोध संस्थान की यह पहल आम उपभोक्ता के विश्वास को सुदृढ़ करेगी। क्योंकि इस प्रक्रिया से गुज़रने के बाद जो दवा उसे प्राप्त होगी उसकी गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगेंगे। शोध संस्थान के भ्रमण के बाद मैंने बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। आयुर्वेद की दवाओं के विषय में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जो ग़लत जानकारी प्रचारित की जाती है उनसे निपटने में इस संस्थान का शोध एक कारगर हथियार सिद्ध होगा। 


इसी चर्चा के दौरान मैंने बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को एक सुझाव और दिया। इस सुझाव की पृष्ठभूमि में वो ग्रंथ था, ‘आहार शास्त्र’ जो मैंने ‘पुनर्त्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट’, अहमदाबाद से कुछ वर्ष पूर्व प्राप्त किया था। इस ग्रंथ में गहन शोध के बाद यह बताया गया है कि भारत के किस प्रांत में, किस मौसम में, किस धातु में और कैसे भोजन पकाया जाए जो वहाँ की भौगोलिक परिस्थिति के अनुकूल हो। इससे शरीर स्वस्थ रहेगा और बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधी क्षमता भी बढ़ेगी। मेरा सुझाव है कि ‘पतंजलि योग संस्थान’ ऐसे युवा तैयार करे जो गाँव-गाँव में घूम कर गृहणियों को स्वास्थ्य वर्धक पारंपरिक भोजन बनाने की शिक्षा दें। आज मोमो, नूडल्स, बर्गर, पिज़्ज़ा जैसे न जाने कितने उत्पाद हैं जो अब भारत की धमनियों में प्रवेश कर चुके हैं और सबके स्वास्थ्य का सत्यानाश कर रहे हैं। यही है बाज़ारू संस्कृति। पहले अखाद्य पदार्थ खाओ। फिर बीमार पड़ो और फिर महंगे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज करवाओ। इस विषम चक्र से बचने का एक ही तरीका है कि हम अपनी खानपान और दिनचर्या को बदलें। बाबा रामदेव ने पिछले दो दशकों में दुनिया के कोने-कोने में योग की उपयोगिता को स्थापित किया है। अब यह चुनौती उनके सामने है कि वे हम भारतीयों का खानपान पहले जैसा करने का व्यापक अभियान चलाएँ। उनके पास मीडिया की, संगठन की और आर्थिक शक्ति है कि वे व्यापक जनहित में इस अनूठे अभियान को दिशा दे सकते हैं। मुझे प्रसन्नता हुई कि मेरे इस सुझाव पर आचार्य बालकृष्ण ने तुरंत अपने लोगों को निर्देश दिया कि इस मॉडल की संभावना तलाशें। बाबा ने भी भारतीय संस्कृति, पुरातन धरोहरों और सनातन धर्मों के केंद्रों की सेवा में किए जा रहे ऐसे सभी सद्प्रयासों में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।  

Monday, May 30, 2022

संतशिरोमणि स्वामी वामदेव जी महाराज की आदमकद मूर्ति कहाँ गई?


सारे भारत के संत समाज, भक्तसमाज व हिन्दुओं के लिए अत्यंत क्षोभ व आक्रोश का विषय है कि उत्तराखण्ड सरकार के अधीन हरिद्वार प्रशासन व पुलिस की घोर लापरवाही से स्वामी वामदेव जी महाराज की आदमकद प्रतिमा जो सितम्बर 2021 को चोरी हो गई थी उसका आज तक पता नहीं लगा है।
   

श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के सूत्रधार, विरक्त संत श्रद्धेय वामदेव जी महाराज की यह प्रतिमा खड़ी मुद्रा में थी व अष्टधातु की बनी थी और लाखों रुपए मूल्य की थी। जिसे 2007 में देशभर के संतों ने हरिद्वार के मुख्य स्थान ‘स्वामी वामदेव मार्ग’ पर बड़े उत्साह व वैदिक ऋचाओं के साथ विधि-विधान के साथ स्थापित किया था। जो हरिद्वार के मुख्य चौराहे पर स्थापित थी। बाद में उसे सड़क चौड़ीकरण के लिए हरिद्वार प्रशासन द्वारा अस्थायी रूप से हटाया गया था। संतों को यह अश्वासन दिया गया था कि सड़क का चौड़ीकरण कार्य पूर्ण होते ही इसे पुनः वहीं स्थापित कर दिया जायेगा। पर ऐसा नहीं हुआ। 


स्वामी वामदेव मार्ग की जगह प्रशासन ने उसे फिर एक नये स्थान ‘आस्था मार्ग’ पर ऊँचा चबूतरा बनवाकर स्थापित किया। किंतु उसी रात वो मूर्ति वहाँ से चोरी हो गयी। उसकी जगह उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वामी वामदेव जी की छोटी सी पत्थर की मूर्ति रखवाकर उसका सितम्बर 2021 में अनावरण कर दिया। जिससे संत समाज बहुत आहत हुआ और इस कार्यक्रम का बहिष्कार किया। वैसे भी यह कार्यक्रम पितृपक्ष में किया गया था जबकि कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता।

अगली सुबह हरिद्वार में हड़कम्प मच गया। संतों का प्रतिनिधि मण्डल हरिद्वार के जिलाधिकारी से मिला तो उन्होनें कोई मदद नहीं की। चूंकि इस आयोजन में विहिप के नेता दिनेश जी सक्रिय थे इसलिये संतों ने उनसे भी गुहार लगाई। आश्चर्य है कि प्रशासन की देखरेख में ये चोरी क्यों और किसने की, इसका आजतक पुलिस पता क्यों नहीं लगाया पायी? आम अनुभव है कि यदि चोरी का समय और स्थान बता दिया जाये तो पुलिस चोर को कुछ घंटों में ही पकड़ लेती है। स्वामी वामदेव जी की मूर्ति कोई सुईं नहीं है, जो एक ही रात में लापता हो जाये। वह भी तब जब वह सारे प्रशासन, मुख्यमंत्री, मीडिया व पुलिस की मौजूदगी में कांक्रीट से वहाँ दिन में ही ये स्थापित की गई थी। उल्लेखनीय है कि वहाँ आस्था मार्ग पर सीसीटीवी कैमरे भी लगे थे। फिर चोर आज तक क्यों नहीं पकड़े गये? क्या यह उत्तराखण्ड पुलिस की अकर्मण्यता का प्रमाण नहीं है ? ये लापरवाही हिन्दुओं के इतने श्रद्धेय संत के प्रति उपेक्षा व अपमान का भी परिचायक है।

राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन में स्वामी वामदेव जी के ऐतिहासिक योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। वे ‘राम जन्मभूमि मुक्ति समिति’ के ‘मार्गदर्शक मंडल’ के अध्यक्ष थे। जब विहिप अध्यक्ष श्री अशोक सिंघल के प्रयास से संत समाज, राजनैतिक कारणों से संकोच कर इस अभियान से जुड़ने को तैयार नहीं था तब श्री सिंघल ने स्वामी वामदेव जी से निवेदन किया कि वे इस अभियान को अपना आशीर्वाद प्रदान करें। तब हिन्दू संस्कृति की रक्षार्थ स्वामी जी ने साधुओं की अपनी विशाल विरक्त मंडली के साथ पूरे भारत के कोने-कोने में जाकर सभी साधु संतों को श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया।

जब अक्तूबर 30,1990 को कार सेवा करने बड़ी श्रद्धा से देश के कोने-कोने से अयोध्या पहुँचे लाखों निहत्थे कारसेवकों पर पुलिस ने फ़ाइरिंग करके सैंकड़ों को शहीद कर दिया था, तो उस भयानक रात अयोध्या की गलियों में मौत का सन्नाटा था। गलियों में जहां-तहाँ भक्तों के शव बिखरे पड़े थे। ऐसे आतंक के माहौल में आंदोलन के सभी नेता जहां-तहाँ छिपे थे। पर एक देवता जो सारी रात अकेला उन लाशों के बीच लाठी लेकर घूमता रहा, वो थे बूढ़े, अशक्त और अस्वस्थ श्रद्धेय स्वामी वामदेव जी महाराज। 

ब्रहम्मुहूर्त में जब वे आश्रम में नहीं दिखे तो घबराहट में उनके साथ के साधुओं ने उनको खोजना शुरू किया। तो स्वामी जी गली में लाठी लिये खड़े मिले। चौंककर सबने पूछा महाराज! आप यहाँ क्या कर रहे हैं? उनका उत्तर सुनकर निश्चय ही आपके नेत्र सजल हो जाएँगे। वे बोले, भगवान! मैं रात भर इन शहीदों के शवों की रक्षा करता रहा, जिससे गली के कुत्ते इन भक्तों के पवित्र शवों को अपना ग्रास न बना सकें

तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने स्वामी वामदेव जी से तब कहा था, आप विहिप का साथ छोड़ दीजिए, मैं कल ही आपको राम जन्मभूमि दे दूंगा। स्वामी जी ने कहा आप लोकसभा मे आज ये घोषणा कीजिए, मैं कल ही विहिप का साथ छोड़ दूंगा।

नरसिंह राव जी ने एक बार उनसे कहा आप सुरक्षा गार्ड ले लें। स्वामी जी बोले गर्भ मे जिसने परीक्षित की रक्षा की थी, वे ही मेरा रक्षक है। अयोध्या में ढाँचा गिरने के बाद वे सीधे हरिद्वार आए, उनका कमरा तैयार नहीं था, तो वे मौनी बाबा के तखत पर ही लेट गए। बाबा ने पूछा महाराज आपका काम अधूरा रह गया। मंदिर कब बनेगा? स्वामी वामदेव जी का उत्तर था, मेरे तीन संकल्प थे; 1.जन्मभूमि से पराधीनता का चिन्ह मिटे। 2. भगवा वस्त्रधारी और श्वेतवस्त्रधारी संप्रदाय के भेद को भूलकर एक मंच पर आ जाएं। 3. देश का हिंदू जाग जाए। राम कृपा से तीनों संकल्प पूरे हुए, अब मंदिर कब बनेगा ये रामलला जाने। रामलला ने आज मोदी जी व योगी जी के प्रयास से ये भी पूरा कर दिया।

चूंकि स्वामी वामदेव जी का वृन्दावन के आनंदवन (श्री अखंडानंद आश्रम) से गहरा नाता था। वे भारत की धरोहर तो थे ही वृन्दावनवासियों को भी प्राणों से अधिक प्रिय थे। इसलिये वृन्दावनवासी, सभी संतगण, भागवताचार्य व गोस्वामीगण, इस समाचार को सुनकर अत्यंत व्यथित हैं। उन्होने भी उत्तराखण के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी से मांग की है कि स्वामी जी की उस मूर्ति को अविलम्ब खोजकर ‘आस्था मार्ग’, हरिद्वार पर वहीँ स्थापित किया जाए जहाँ से ये चोरी हुई। अब देखना ये होगा की उत्तराखण्ड की पुलिस कब तक स्वामी वामदेव जी की मूर्ति को खोज कर लाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो इसका बहुत गलत सन्देश देशभर के संतगणों व हिन्दू समाज में जाएगा।

Monday, March 15, 2021

कुंभ का बदलता स्वरूप


हरिद्वार में कुम्भ शुरू हो चुका है। वृंदावन में कुम्भ पूर्व वैष्णव बैठक पूरा महीना चली पर आज कुम्भ का स्वरूप कितना बदल गया है इस पर मंथन करने की ज़रूरत है। भगवत गीता में भगवान अर्जुन को बताते हैं कि उनकी शरण में 4 तरह के लोग आते हैं, आर्त, अर्थारतु, जिज्ञासु व ज्ञानी। यह सिद्धांत हर कुम्भ में लागू होता है। एक तरफ उन लोगों का समूह उमड़ता है, जो अपने जीवन में कुछ भौतिक उपलब्धि हासिल करना चाहते हैं। कुंभ में आकर उन्हें लगता है कि उनके पुण्य की मात्रा इतनी बढ़ जाएगी कि उनके कष्ट स्वतः दूर हो जाएंगे।


दूसरी भीड़ उन साधन संपन्न सेठ और व्यापारियों की होती है, जो अपने व्यापार की वृद्धि की कामना लेकर कुंभ में विराजे हुए संतों के अखाड़ों में नतमस्तक होते हैं। तीसरी भीड़ उन लोगों की होती है, जो वहां इस उद्देश्य से आते हैं  कि उन्हें संतों का सानिध्य मिले और वे भगवान के विषय में कुछ जानें और अंतिम श्रेणी में वे लोग होते हैं, जिन्हें संसार से कुछ खास लेना-देना नहीं। उनको तो धुन लगी है, केवल भगवत् प्राप्ति की। स्पष्ट है कि चारों श्रेणी के लोगों को अपनी मनोकामना पूर्ण होती दिखाई देती  होगी, तभी तो वे ऐसे हर कुंभ या उत्सव में कष्ट उठाकर भी शामिल होते हैं।



पर जो बात आजकल होने वाले कुंभ के आयोजनों में दिखाई देती है उससे तो यह लगता है कि हमारी सनातन परम्परा के सशक्त स्तंभ कुंभ अपने मूल उद्देश्य से भटक गये हैं। पहले कुंभ एक अवसर होता था, जहां सारे देश के संत-महात्मा और विद्वतजन बैठकर उन प्रश्नों के समाधान खोजते थे, जिनमें प्रांतीय स्तर पर हिंदू समाज उद्वेलित रहता था। कुंभ से जो समाधान मिलता था, वह सारा देश अपना लेता था। अब शायद ऐसा कुछ नहीं होता और अगर होता भी है, तो उसका स्वरूप आध्यात्मिक कम और राजनैतिक ज्यादा होता है। यही बात अखाड़ों पर भी लागू होती है। शुद्ध मन से कुंभ आने वाले संत अपनी साधना में जुटे रहते हैं, उनके अखाड़ों में वैभव की छाया भी नहीं रहती। पर दूसरी तरफ इतने विशाल और वैभवशाली अखाड़े बनते हैं कि पांच सितारा होटल के निर्माता भी शरमा जाएं। इस प्रकार की आर्थिक असमानता कुंभ के सामाजिक ताने-बाने को असंतुलित कर देती है, जिसकी टीस कई संतों के मन में देखी जाती है।


कलियुग का प्रभाव कहकर हम भले ही अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लें, पर हकीकत यह है कि अपने सभी तीज-त्यौहारों का स्वरूप अब व्यवसायिक होता जा रहा है। कुंभ में इसका प्रभाव व्यापक रूप से देखने को मिलता है। यह स्वस्थ लक्षण नहीं है। इस पर सरकार को या धर्माचार्यों को विचार करके पूरे कुंभ का स्वरूप आध्यात्मिक बनाना चाहिए। अन्यथा कुंभ और शहरों में लगने वाली आम नुमाइशों में कोई भेद नहीं रह जाएगा। जैसे नुमाइशों में तरह-तरह के विशाल बिजली के झूले, अनेक तरह के उत्पादों की दुकानें और दूसरे मनोरंजन के साधन उपलब्ध होते हैं वही सब अब कुम्भ में भी होने लगा है। इसके कारण कुम्भ में आने वाली भीड़ का अधिकतर हिस्सा वहाँ केवल मौज मस्ती और चाट पकौड़ी के लिए आता है। सरकारें कह सकती हैं कि जनता का मनोरंजन करना कोई अपराध नहीं है। पर सोचने वाली बात यह है कि आज मनोरंजन के संसाधन इतनी भारी मात्रा में हर जगह उपलब्ध हैं कि जनता के पास काफ़ी विकल्प मौजूद हैं। इसलिए इस मानसिकता से बचना चाहिए। कुम्भ में इन सबके प्रवेश से उसका उद्देश्य और आध्यात्मिक स्वरूप दोनों नष्ट हो रहे हैं। इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पहले कुम्भ में सरकार के कुछ मंत्रालयों के प्रचार के लिए कुछ पंडाल लगते थे। जैसे स्वास्थ्य मंत्रालय, कृषि मंत्रालय या सूचना विभाग वहाँ तक तो ठीक था। पर अब तो हर कुम्भ में हर तीसरा होर्डिंग सरकार की योजनाओं को प्रचारित करने वाला लगाया जाने लगा है। जिसमें सत्तारूढ दल के नेताओं के बड़े-बड़े चित्र भी लगे होते हैं। ज़रा सोचिए जिन चेहरों को रात दिन टीवी पे देखते हैं उन्हें ही अगर कुम्भ में आकर भी देखना पड़े तो इसका मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? वहाँ तो संतों की वाणी, वैदिक साहित्य, भारत के तीर्थ स्थलों और विभिन सम्प्रदायों की सूचना देने वाले होर्डिंग होने चाहिए जिससे वहाँ आने वालों की आध्यात्मिक चेतना बढ़े। राजनैतिक होर्डिंग तो कुम्भ को चुनावी माहौल में रंग देते हैं। इसलिए सरकारों और नेताओं को इस लोभ से बचना चाहिए।   


यह सही है कि हम सब इतने सुविधाभोगी हो गए हैं कि सरलता का जीवन अब हमसे कोसों दूर हो गया है। जबकि तीर्थ जाना या कुंभ में जाना तपश्चर्या का एक भाग होना चाहिए, तभी हमारी आध्यात्मिकता चेतना और सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह पाएगी।


हमेशा से कुंभ के बारे में अंतिम निर्णय अखाड़ा परिषद् का रहता है। यह बात सही है कि सरकारें हजारों करोड़ रूपया कुंभ के आयोजन में खर्च करती हैं, पर वह तो उनका कर्तव्य है।


यही बात व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को भी सोचनी चाहिए कि हर चीज बिकाऊ माल नहीं होती। कम से कम धर्म का क्षेत्र तो व्यापार से अलग रखें। कुंभ ही क्या, आज तो हर तीर्थस्थल पर भवन निर्माताओं से लेकर अनेक उपभोक्ता सामिग्री बेचने वालों ने कब्जा कर लिया है। जो अपने विशाल होर्डिंग लगाकर उस स्थान की गरिमा को ही समाप्त कर देते हैं। इसका विरोध समाज की तरफ से भी होना चाहिए। तीर्थस्थलों व कुंभ-स्थलों पर जो भी विज्ञापन हों, वो धर्म से जुड़े हों। उसके प्रायोजक के रूप में कोई कंपनी अपना नाम भले ही दे दे, पर अपने उत्पादनों के प्रचार का काम बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इससे आने वाले श्रद्धालुओं का मन भटकता है और उनके आने का उद्देश्य कमजोर पड़ता है।


दरअसल धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कार हमारी चेतना का अभिन्न अंग हैं। समाज कितना भी बदल जाए, राजनैतिक उठापटक कितनी भी हो ले, व्यक्तिगत जीवन में भी उतार-चढ़ाव क्यों न आ जाएं, पर यह चेतना मरती नहीं, जीवित रहती है। यही कारण है कि तमाम विसंगतियों के बावजूद मानव सागर सा ऐसे अवसरों पर उमड़ पड़ता है, जो भारत की सनातन संस्कृति की जीवंतता को सिद्ध करता है।


आवश्यकता इस बात की है कि सभी धर्मप्रेमी और हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले राजनैतिक लोग अपने उत्सवों, पर्वों और तीर्थस्थलों के परिवेश के विषय में सामूहिक सहमति से ऐसे मापदंड स्थापित करें कि इन स्थलों का आध्यात्मिक वैभव उभरकर आए। क्योंकि भारत का तो वही सच्चा खजाना है। अगर भारत को फिर से विश्वगुरू बनना है, तो उपभोक्तावाद के शिकंजे से अपनी धार्मिक विरासत को बचाना होगा। वरना हम अगली पीढ़ियों को कुछ भी शुद्ध देकर नहीं जाएंगे। वह एक हृदयविदारक स्थिति होगी।