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Monday, October 29, 2018

सीबीआई में घमासान क्यों?

पिछले एक हफ्ते से सभी टीवी चैनलों, अखबारों, सर्वोच्च आदालत और चर्चाओं में सीबीआई के निदेशक और विशेष निदेशक के बीच चल रहे घमासान की चर्चा है। लोग इसकी वजह जानने को बैचेन हैं। सरकार ने आधी रात को सीबीआई भवन को सीलबंद कर इन दोनों को छुट्टी पर भेज दिया। तब से हल्ला मच रहा है कि सरकार को सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने का कोई हक नहीं है। क्योंकि 1997 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ‘विनीत नारायण बनाम भारत सरकार’ में सीबीआई निदेशक और प्रवर्तन निदेशालय निदेशक के कार्यकाल को दो वर्ष की सीमा में निर्धारित कर दिया गया था, चाहे उनकी सेवा निवृत्ति की तारीख निकल चुकी हो। ऐसा करने के पीछे मंशा यह थी कि महत्वपूर्णं मामलों में सरकार दखलअंदाजी करके अचानक किसी निदेशक का तबादला न कर दे। 
पर इस बार मामला फर्क है। यह दोनों सर्वोच्च अधिकारी आपस में लड़ रहे थे। दोनों एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे थे और दोनों पर अपने-अपने आंकाओं के इशारों पर काम करने का आरोप लग रहा था। स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि अगर सख्त कदम न उठाऐ जाते, तो सीबीआई की और भी दुर्गति हो जाती। हालांकि इसके लिए सरकार का ढीलापन भी कम जिम्मेदार नहीं।

एक अंग्रेजी टीवी चैनल पर बोलते हुए सरकारी फैसले से कई दिन पहले मैंने ही यह सुझाव दिया था कि इन दोनों को फौरन छुट्टी पर भेजकर, इनके खिलाफ जांच करवानी चाहिए। तब उसी पैनल में प्रशांत भूषण मेरी बात से सहमत नहीं थे। इसलिए जब ये फैसला आया, तो प्रशांत भूषण और आलोक वर्मा दोनों ने इसे चुनौती देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की शरण ली। भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश और उनके सहयोगी जजों ने जो फैसला दिया, वो सर्वोत्तम है। दोनों के खिलाफ दो हफ्तों में जांच होगी और नागेश्वर राव, जिन्हें सरकार ने अंतरिम निदेशक नियुक्त किया है, वो कोई नीतिगत निर्णंय नहीं लेंगे। अब अगली सुनवाई 12 नवंबर को होगी।

दरअसल 1993 में जब ‘जैन हवाला कांड’ की जांच की मांग लेकर मैं सर्वोच्च न्यायालय गया था, तो मेरी शिकायत थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा के इस आंतकवाद से जुड़े घोटाले को राजनैतिक दबाब में सीबीआई 1991 से दबाये बैठी है। पर 1997 में जब हवाला केस प्रगति कर रहा था, तब प्रशांत भूषण और इनके साथियों ने, अपने चहेते कुछ नेताओं को बचाने के लिए, अदालत को गुमराह कर दिया। मूल केस की जांच तो ठंडी कर दी गई और सीबीआई को स्वायतता सौंप दी गई और सीवीसी का विस्तार कर दिया। इस उम्मीद में कि इस व्यवस्था से सरकार का हस्तक्षेप खत्म हो जाऐगा।

आज उस निर्णय को आए इक्कीस बरस हो गए। क्या हम दावे से कह सकते हैं कि केंद्र में सत्तारूढ़ दल अपने राजनैतिक लाभ के लिए सीबीआई का दुरूपयोग नहीं करते? क्या सीबीआई के कई निदेशकों पर भारी भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे? क्या सीबीआई में ‘विनीत नारायण फैसले’ या ‘सीवीसी अधिनियम’ की अवहेलना करके पिछले दरवाजे से बडे़ पदों अधिकारियों की नियुक्ति नहीं की? अगर इन प्रश्नों के उत्तर हाँ में हैं, तो यह स्पष्ट है कि जो अपेक्षा थी, वैसी पारदर्शिता और ईमानदारी सीबीआई का नेतृत्व नहीं दिखा पाया। इसलिए मेरा मानना है कि इस पूरे फैसले को पिछले 21 वर्षों के अनुभव के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पुनः परखा जाना चाहिए और जो विसंगतियां आ गईं हैं, उन्हें दूर करने के लिए एक संवैधानिक बैंच का गठन कर ‘विनीत नारायण फैसले’ पर पुर्नविचार करना चाहिए । ऐसे नये निर्देश देने चाहिए, जिनसे ये विसंगतियां दूर हो सके।

मैं स्वयं इस मामले में पहल कर रहा हूं और एक जनहित याचिका लेकर जल्दी ही सर्वोच्च अदालत में जाऊंगा। पर उससे पहले मैंने भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा व भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारियों, जागरूक वकीलों और चिंतकों को संदेश भेजा है कि सीबीआई और प्रर्वतन निदेशालय के सुधार के लिए वे मुझे mail@vineetnarain.net पर अपने सुझावों को ईमेल से भेजें। जिन्हें इस याचिका में शामिल किया जा सके। मुझे उम्मीद है कि माननीय न्यायालय राष्ट्रहित में और सीबीआई की साख को बचाने के उद्देश्य से इस याचिका पर ध्यान देगा।

वैसे भारत के इतिहास को जानने वाले अपराध शास्त्र के विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा कोई समय नहीं हुआ, जब पूरा प्रशासन और शासन पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त हो गया हो। भगवत् गीता के अनुसार भी समाज में सतोगुण, रजोगुण व तमोगुण का हिस्सा विद्यमान रहता है। जो गुण विद्यमान रहता है, उसी हिसाब से समाज आचरण करता है। प्रयास यह होना चाहिए कि प्रशासन में ही नहीं, बल्कि न्यायपालिका, मीडिया, धर्मसंस्थानों, शिक्षा संस्थानों व निजी उद्यमों में ज्यादा से ज्यादा सतोगुण बढ़े और तमोगुण कम से कम होता जाऐ। इसलिए केवल कानून बना देने से काम नहीं चलता, ये सोच तो शुरू से विकसित करनी होगी। सीबीआई भी समाज का एक अंग है और उसके अधिकारी इसी समाज से आते हैं। तो उनसे साधु-संतों से जैसे व्यवहार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
पर लोकतंत्र की रक्षा के लिए और आम नागरिक का सरकार में विश्वास कायम रखने के लिए सीबीआई जैसी संस्थाओं को ज्यादा से ज्यादा पारदर्शी होना पड़ेगा। अन्यथा इनसे सबका विश्वास उठ जाऐगा।

Monday, July 24, 2017

पुराने तरीकों से नहीं सुधरेंगी धर्मनगरियाँ


योगी सरकार उ.प्र. की धर्मनगरियों को सजाना-संवारना चाहती है। स्वयं मुख्यमंत्री इस मामले में गहरी रूचि रखते हैं। उनकी हार्दिक इच्छा है कि उनके शासनकाल में मथुरा, वाराणसी, अयोध्या और चित्रकूट का विकास इस तरह हो कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सुख मिले। इसके लिए वे सब कुछ करने को तैयार हैं।



धर्मनगरियों व ऐतिहासिक भवनों का जीर्णोंद्धार या सौन्दर्यीकरण एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जटिल इसलिए कि चुनौतियां अनंत है। लोगों की धार्मिक भावनाएं, पुरोहित समाज के पैतिृक अधिकार, वहां आने वाले आम आदमी से अति धनी लोगों तक की अपेक्षाओं को पूरा करना, सीमित स्थान और संसाधनों के बीच व्यापक व्यवस्थाऐं करना, इन नगरों की कानून व्यवस्था और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चति करना।



इस सबके लिए जिस अनुभव, कलात्मक अभिरूचि व आध्यात्मिक चेतना की आवश्यक्ता होती है, प्रायः उसका प्रशासनिक व्यवस्था में अभाव होता है। सड़क, खड़जे, नालियां, फ्लाई ओवर जैसी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का अनुभव रखने वाला प्रशासन तंत्र इन नगरों के जीर्णोंद्धार और सौन्दर्यीकरण में वो बात नहीं ला सकता, जो इन्हें विश्वस्तरीय तीर्थस्थल बना दे। कारण यह है कि सड़क, खड़जे की मानसिकता से टैंडर निकालने वाले, डीपीआर बनाने वाले और ठेके देने वाले, इस दायरे के बाहर सोच ही नहीं पाते। अगर सोच पात होते तो आज तक इन शहरों में कुछ कर दिखाते। पिछले इतने दशकों में इन धर्मनगरियों में विकास प्राधिकरणों ने क्या एक भी इमारत ऐसी बनाई है, जिसे देखा-दिखाया जा सके? क्या इन प्राधिकरणों ने शहरों की वास्तुकला को आगे बढाया है या इन पुरातन शहरों में दियासलाई के डिब्बों जैसे भवन खड़े कर दिये हैं। नतीजतन ये सांस्कृतिक स्थल अपनी पहचान तेजी से खोते जा रहे हैं।



माना कि विकास की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। बढ़ती आबादी की मांग को भी पूरा करना होता है। मकान, दुकान, बाजार भी बनाने होते हैं, पर पुरातन नगरों की आत्मा को मारकर नहीं। अंदर से भवन कितना ही आधुनिक क्यों न हो, बाहर से उसका स्वरूप, उस शाहर की वास्तुकला की पहचान को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। भूटान एक ऐसा देश है, जहां एक भी भवन भूटान की बौद्ध संस्कृति के विपरीत नहीं बनाया जा सकता। चाहे होटल, दफ्तर या दुकान कुछ भी हो। सबके खिड़की, दरवाजे और छज्जे बुद्ध विहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को दर्शाते हैं। इससे न सिर्फ कलात्मकता बनीं रहती है, बल्कि ये और भी ज्यादा आकर्षक लगते हैं। दुनिया के तमाम पर्यटन वाले नगर, इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। जबकि उ.प्र. में आज भी पुराने ढर्रे से सोचा और किया जा रहा है। फिर कैसे सुधरेगा इन नगरों का स्वरूप?



पिछले हफ्ते जब मैंने उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को ब्रज के बारे में पावर पाइंट प्रस्तुति दी, तो मैंने उनसे स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाराज! दो तरह का भ्रष्टाचार होता है, ‘करप्शन ऑफ डिजाईनकरप्शन ऑफ इम्पलीमेंटेशन। यानि नक्शे बनाने में भ्रष्टाचार और निर्माण करने में भ्रष्टाचार। निर्माण का भ्रष्टाचार तो भारतव्यापी है। बिना कमीशन लिए कोई सरकारी आदमी कागज बढ़ाना नहीं चाहता। पर डिजाईन का भ्रष्टाचार तो और भी गंभीर है। यानि तीर्थस्थलों के विकास की योजनाऐं बनाने में ही अगर सही समझ और अनुभवी लोगों की मदद नहीं ली जायेगी और उद्देश्य अवैध धन कमाना होगा, तो योजनाऐं ही नाहक महत्वाकांक्षी बनाई जायेंगी। गलत लोगों से नक्शे बनावाये  जायेंगे और सत्ता के मद में डंडे के जोर पर योजनाऐं लागू करवाई जायेंगी। नतीजतन धर्मक्षेत्रों का विनाश  होगा, विकास नहीं।



पिछले तीन दशकों में, इस तरह कितना व्यापक विनाश धर्मक्षेत्रों का किया गया है कि उसके दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते हैं। फिर भी अनुभव से कुछ सीखा नहीं जा रहा। सारे निर्णय पुराने ढर्रे पर ही लिए जा रहे हैं, तो कैसे सजेंगी हमारी धर्मनगरियां? मैं तो इसी चिंता में घुलता जा रहा हूं। शोर मचाओ तो लोगों को बुरा लगता है और चुप होकर बैठो तो दम घुटता है कि अपनी आंखों के सामने, अपनी धार्मिक विरासत का विनाश कैसे हो जाने दें? योगी जी भले इंसान हैं, संत हैं और पैसे कमाने के लिए सत्ता में नहीं आये हैं। मगर समस्या यह है कि उन्हें सलाह देने वाले तो लोग वही हैं ना, जो इस पुराने ढर्रे के बाहर सोचने का प्रयास भी नहीं करते। ऐसे में भगवान ही मालिक है कि क्या होगा?



चूंकि धर्मक्षेत्रों का विकास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उद्देश्य रहा है, इसलिए संघ नेतृत्व को चाहिए कि धर्मक्षेत्रों के विकास पर स्पष्ट नीति निधार्रित करने के लिए अनुभवी और चुने हुए लोगों की गोष्ठी बुलाए और उनकी राय लेकर नीति निर्धारण करवाये। नीतिओं में क्रांतिकारी परिवर्तन किये बिना, वांछित सुधार आना असंभव है। फिर तो वही होगा कि चैबे जी गये छब्बे बनने और दूबे बनके लौटे। यही काम योगी जी को अपने स्तर पर भी करना चाहिए। पर इसमें भी एक खतरा है। जब कभी सरकारी स्तर पर ऐसा विचार-विमर्श करना होना होता है, तो निहित स्वार्थ सार्थक विचारों को दबवाने के लिए या उनका विरोध करवाने के लिए, सत्ता के दलालनुमा लोगों को समाजसेवी बताकर इन बैठकों में बुला लेते हैं और सही बात को आगे नहीं बढ़ने देते। इसलिए ऐसी गोष्ठी में केवल वे लोग ही आऐ, जो स्वयंसिद्ध हैं, ढपोरशंखी नहीं। योगी जी ऐसा कर पायेंगे, ये आसान नहीं। क्योंकि रांड सांड, सीढी संयासी, इनसे बचे तो सेवे काशी

Monday, July 15, 2013

राजनीति के लिए देश की सुरक्षा से खिलवाड़ क्यों ?

पिछले कुछ दिनों से देश में सम्भावित लोकसभा चुनावों की तैयारी का माहौल बनने लगा है। जब से भाजपा के गोवा अधिवेशन में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को भाजपा ने इस चुनाव की बागडोर थमायी हैं तब से भाजपा के अन्दर और बाहर भारी उथल-पुथल का माहौल है। इसके साथ ही देश में एक बार फिर राजनैतिक धुव्रीकरण होने लगा है। एक तरफ कांग्रेस व उसके सहयोगी दल हैं जो धर्मनिरपेक्षता के झंडे तले लामबंद हो रहे है। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी ने अमित शाह को उ.प्र. का प्रभारी बनाकर हिन्दु धुव्रीकरण का आगाज किया है। इसी माहौल में केन्द्र में सत्तारूढ़ दल नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध माहौल बनाने में जुट गया है। उधर सीबीआई ने भी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ पुराने मामले निकालकर हमला शुरू कर दिया है। इस सब के बीच इशरत जंहा का मामला तेजी से उछला है। सीबीआई का कहना है कि इशरत जंहा को गुजरात पुलिस ने एक फर्जी मुठभेड में मारा। जिसमें आईबी के विशेष निदेशक रहे राजेन्द्र कुमार की भूमिका को लेकर सीबीआई उनको आरोपित करने की तैयारी कर रही है। अन्दाजा है कि श्री कुमार जब 25 जुलाई को सेवा निवृत्त होंगे तो उन्हें सीबीआई गिरफ्तार कर लेगी। उन पर आरोप है कि उन्होंने इशरत जंहा व उसके साथियों के लश्कर-ए-तायबा के साथ संबन्धों की जानकारी गुजरात पुलिस को दी और इन तथाकथित आतंकवादियों की फर्जी मुठभेड में भूमिका निभायी।

सीबीआई का यह कदम पूरे देश में बहस का विषय बना हुआ है। सभी निष्पक्ष और समझदार लोगों का मानना है कि सीबीआई के इस कदम की कड़ी भत्र्सना की जानी चाहिए। ऐसा करके सीबीआई और सत्तारुढ़ दल आईबी संस्था का कभी न भरा जाने वाला नुकसान कर रहे हैं। राजेन्द्र कुमार ने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था। आईबी के अधिकारी स्थानीय पुलिस को निर्देश नहीं देते पर जनहित में उनसे सूचनाएं जरुर साझा करते हैं। उल्लेखनीय है कि 2004 में इशरत जहां की मौत पर लश्कर-ए-तायबा ने अपने अखबार ‘गाजवा टाइम्स‘ में इशरत जंहा के प्रति श्रद्धांजली का संदेश प्रसारित किया था और उसे शहीद घोषित किया था। उधर डेविड हेडली ने अमरीकी अधिकारियों को बताया था कि लश्कर-ए-तायबा के अध्यक्ष मुज्जमिल ने 26/11 के आतंकी हमले के आॅपरेशन कमांडर जाकिर-उर-रहमान को बताया था कि इशरत उनकी ऐजेन्ट थी। अब यह ऐसे तथ्य हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। इनसे इशरत जंहा के आतंकवादी होने का भी प्रमाण मिलता है। पर आश्चर्य की बात है कि ये तथ्य उन सभी लोगों द्वारा बड़ी आसानी से अनदेखा किए जा रहे हैं जो इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का राजनैतिक लाभ उठाना चाहते हैं। इससे भी ज्यादा आश्चर्य की बात तो यह है कि इन तथ्यों पर मीडिया का भी ध्यान नहीं जा रहा। सीबीआई के इस एक कदम से पूरी आईबी की टीम हतोत्साहित होगी। क्योंकि भविष्य में देशभर में तैनात आईबी अधिकारी कोई भी ऐसी संवेदनशील सूचना स्थानीय पुलिस से साझा करने में हिचकेंगे क्योंकि उन्हें राजेन्द्र कुमार की हो रही दुर्गति का नजारा याद आ जायेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि आईबी खुफिया रहकर सूचनाएं एकत्र करती है। उसके पास कोई पुलिसिया अधिकार तो होते नहीं। अगर वह अपनी सूचनाएं केवल केन्द्र को भेजें और स्थानीय पुलिस से साझा न करे तो हो सकता है कि स्थानीय स्तर पर स्थिति बिगड़ जाये। क्योंकि जब तक सूचना केन्द्र को मिलेगी और केन्द्रीय गृह मंत्रालय उसे सम्बन्धित राज्य सरकार तक भेजेगा, तब तक काफी समय निकल सकता है। ऐसे में आतंकवादी तो आराम से अपना काम करके निकल जायेंगे पर सरकार हरकत में भी नहीं आ पायेगी। जबकि स्थानीय पुलिस से संवेदनशील सूचनाएं साझा करके आईबी अधिकारी प्रान्तीय सरकार को त्वरित कार्यवाही करने का अवसर देते हैं। अब अगर इस ‘अपराध‘ के लिए गुजरात में आईबी के विशेष निदेशक रहे राजेन्द्र कुमार को जेल भेजा जाता है तो फिर आईबी का कोई अधिकारी भविष्य में ऐसा क्यों करेगा ? परिणाम यह होगा कि आतंकवादी भारत में अपने कारनामों को खुलेआम अंजाम देकर फरार हो जायेंगे और केन्द्र और प्रान्तीय सरकारें लकीर ही पीटती रह जायेंगी। इसलिए यह बहुत खतरनाक खेल खेला जा रहा है। आईबी के मौजूदा निदेशक आसिफ इब्राहिम ने प्रधानमंत्री से मिलकर अपना विरोध दर्ज कराया है और सीबीआई को इस मामले में संयम बरतने का निर्देश देने को कहा है। प्रधानमंत्री शायद यह कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं कि इशरत जंहा का मामला न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए सरकार दखल नहीं दे पायेगी।

उधर सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा आईबी के विशेष निदेशक राजेन्द्र कुमार के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल करने पर आमदा हैं। शायद वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि सीबीआई पिंजड़े में कैद तोता नहीं है और अपराध के मामले में किसी को भी बख्शती नहीं है। तो मैं उन्हें याद दिलाना चाहता हूँ कि जैन हवाला कांड में अपराधियों को बचाकर निकलने की आपराधिक साजिश करने वाले सीबीआई के तमाम वरिष्ठ अधिकारियों को आज तक सजा नहीं दी गयी है। सर्वोच्च न्यायालय में ‘विनीत नारायण केस‘ में उनके विरुद्ध प्रमाण सहित मेरे कई शपथपत्र जमा हैं। श्री सिन्हा को चाहिए कि वे पहले अपने विभाग के ऐसे अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही करें। वे तर्क दे सकते हैं कि यह मामला तो काफी पुराना पड गया। पर यह तर्क स्वीकार्य नहीं है क्योंकि आपराधिक मामलों में कोई भी केस कभी भी खत्म नहीं होता। नए तथ्य सामने आते ही उसे कभी भी खोला जा सकता है। हवाला मामले में जिन तथ्यों को मैंने सर्वोच्च अदालत में अपने शपथ पत्रों के माध्यम से दाखिल किया था उन पर सीबीआई ने बड़ी आसानी से चुप्पी साध ली। वह भी आतंकवाद से जुडा एक बडा मामला था। सीबीआई की इस बेईमानी का नतीजा यह हुआ कि कश्मीर के आतंकवादी संगठन हिज्बुल मुजाहिद्दीन को हवाला के जरिये दुबई और लंदन से आ रही अवैध आर्थिक मदद का 20 वर्ष पहले पर्दाफाश करने के बावजूद मैं अपराधियों को सजा नहीं दिलवा सका और देश में आतंकवाद और हवाला कारोबार बढ़ता चला गया। इसलिए सीबीआई को दूसरों पर उंगली उठाने से पहले अपने दामन के दाग देखने चाहिए।    

हमें भारत सरकार से अपील करनी चाहिए कि वह राजेन्द्र कुमार के मामले में दखल देकर उनकी प्रताड़ना पर फौरन रोक लगाये। समय आ गया है कि आईबी की संवैधानिक स्थिति स्पष्ट की जाये और उसके काम के नियम तय किये जाये जिससे भविष्य में ऐसी दुःखद परिस्थिति पैदा न हो। इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आपसी राजनैतिक लड़ाई में आगे बढ़ने के लिए देश की सुरक्षा से खिलवाड़ ना किया जाये। 

Friday, May 3, 2013

Widening the role of CVC and insulating CBI from extraneous pressures


May 3rd 2013
To
Hon’ble Chief Justice of India & his brother Judges
Supreme Court of India
New Delhi

Through
Registrar General
Supreme Court of India
New Delhi

Written Submissions in the matter titled
Manohar Lal Sharma Vs. The Principle Secretary & Others
Writ Petition (Criminal) 120 / 2012


Widening the role of CVC and insulating CBI from extraneous pressures

Your Lordships !

Your observations in the above matter regarding the functioning of CBI in reference to the 1997 judgement (Vineet Narain Vs. Union of India) of this Hon’ble Court has encouraged me to submit this written submission for your kind perusal and for consideration.

Your Lordships ! twenty years ago, when I petitioned in this Court, against the criminal negligence of CBI in a militancy and corruption related Jain Hawala Case, my expectation was that under the monitoring of the Apex Court, CBI, DRI and Income Tax agencies will do their duties to ensure proper investigations and will take the case to its logical conclusions. This was the time when there were no 24x7 TV channels, email and SMS facilities to mobilize public opinion on issue of corruption and militancy. Hence in 1993 it was a difficult fight against the 115 most powerful people of this country.

Due to the initiative of this Court, the matter did progress to some extent, but for various reasons, could not reach to its logical conclusions. For example 22 names mentioned in the Jain Diary have not been de-coded / deciphered, by the CBI till this date, when the author of the same is easily available to decode the same. Who knows that these payees could be hardened militants, narcotic operators or powerful people? Two affidavits filed by the petitioner (Vineet Narain Vs. Union of India case no. 340-43 of 1993) dated 08.04.1995 & 09.01.1996 were never answered by the CBI with the result the concerned file of the CBI was concealed from this Court. The evidence regarding the dilution of investigation and the manner in which the beneficiaries in the diary were saved is available in black & white but not a single delinquent official of the CBI responsible for inaction from June 1991 to March 1995 was even asked to explain his conduct which was adversely commented by the Apex Court in very strong words. In other words all the delinquents were saved rather rewarded. Inspite of intervention of this Hon’ble Court, the CBI, who kept the investigation in cold storage for more than 40 months ultimately succeeded in their original plan when all the accused persons were saved. However, the ‘famous’ judgement was pronounced, which gave the hope to the nation that things will change in future.

As Your Lordships have rightly observed that even after 15 years, nothing substantial has happened to make the investigating agencies free from the political interference. As pointed out above had the delinquents been punished, the misconduct could not have been repeated. In the absence of any deterrence the agency would continue to disregard the directions of the Apex Court with impunity. Inputs in the present Coalgate Case clearly establish that the law officers appearing for CBI tow the line of the investigating agency, forgetting that they are required to assist the Hon’ble Court in arriving at the truth. As pointed out above, the role of the law officers in the Hawala Case certainly helped the CBI in concealing the truth from the Apex Court. Therefore the appointment of law officers in the CBI also deserves to be reviewed.
The famous judgement has been sidelined by creating a toothless CVC. Hence, it is very important for the nation that Your Lordships’ review the situation and issue further guidelines to ensure effective implementation of the 1997 judgement. However, based on my experience of fighting corruption at the highest levels of governance, I would like to submit some suggestions and observations, which may assist this Hon’ble Court.
1.    The CVC Act should be amended providing for a 5/7 member Central Vigilance Commission which could broadly assume the role visualized for the Lokpal. The selection process of the CVC members could be made more broad based to prevent favorites or controversial persons from being appointed. Presently, three members are drawn from IAS, IPS and Banking services. However, it should include one retired judge of the Supreme Court appointed by the CJI in consultation with next four senior most judges. Since, legislative wing of our democracy is very important for the matters of governance, it would be worthwhile to include one Member of Parliament, selected from those, who have been the members of the either house for the longest duration. In addition to this two to three members should be of engineering expertise, to assess the scams like commonwealth games and one from the background of Chartered Accountancy to examine the financial scams. These selections should be made as transparent as possible. Co-opting a representative of Civil Societies will create unnecessary controversy because of their diverse backgrounds and agendas, hence, the role of Civil Society should be to generate awareness and act as a pressure group only.

2.    The CVC should constitute an Advisory Committee of at least 11 members drawn from the Criminologists and Forensic Science experts. This will augment the professional input in their functioning. Furthermore, to reduce the burden on CVC, it should be given the power to outsource any expert or professional to assist it in screening the loads of complaints.

3.    The jurisdiction of CVC, which presently covers all employees of the Central Govt. and the CPSUs, should remain unchanged. Already there is an administrative arrangement to delegate the vigilance administration over class II and lower formations to the ministries/departments concerned. However, if the lower formations are involved with the class I officers in a composite case, the CVC exercises a natural jurisdiction over all of them. To make this arrangement more effective, it would be important that the CVC exercises complete control over the selection, appointment and functioning of the CVOs.

4.    The CVC should have adequately experienced team to technically examine and assess the gravity of a complaint, which can then be assigned to CBI for investigation or can be investigated by this team. After assessing a complaint by this broad-based CVC, there should be no necessity to seek prior permission from the govt.

5.  In the cases assigned to it by the CVC, the CBI should be made functionally and financially independent of the controls of any Govt. Ministry/Department. The professional supervision over the investigations of CBI should rest only with the CVC and its nature should be decisively improved from what exists today.

6.    The methodology of appointment of the Director CBI should be similarly broad based as in the case of the CVC members, whereas the other inductions/appointments in the CBI should be brought under the overarching supervision of the CVC.

7.    For achieving better synergy between the Anti Corruption Laws and grievance handling, the laws relating to the whistleblowers and grievance redressal should be placed within the jurisdiction of the CVC.

8.  Effective administration of anti corruption laws at the grass roots level is the key to responsible governance. The state and their anti corruption agencies would therefore require to be equally insulated from the State Government’s interference on similar patterns.

Vineet Narain
Sr. Journalist and Petitioner in case titled WP340-43/93 in the Supreme Court of India
C-6/28, SDA, Hauz Khas, New Delhi – 110016

Sunday, February 5, 2012

अब सूरत बदलनी चाहिए

ट्रायल कोर्ट ने डा. सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका निरस्त कर दी। गृह मंत्री पी. चिदम्बरम को बड़ी राहत मिली। पर क्या सर्वोंच्च न्यायालय के फैसले के बाद यूपीए सरकार के दामन से टू जी घोटाले का दाग मिट गया ? इस पर दो मत हैं। विपक्ष सरकार की इस दलील से सहमत नहीं कि इस घोटाले के लिये प्रधानमंत्री और उनका मंत्रिमंडल जिम्मेदार नहीं है। जबकि संचार मंत्री कपिल सिब्बल का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल को दोषी नहीं माना। केवल आवंटन की नीति को गलत माना है जो राजग ने बनाई थी और ए राजा के तौर-तरीकों को गलत माना है। इसलिए प्रधानमंत्री की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है। श्री सिब्बल का यह भी कहना है कि यह फैसले आने के बावजूद सेंसेक्स गिरने की बजाय बढ़ गया। यानि उद्योग जगत को इस फैसले से कोई झटका नहीं लगा। काँग्रेस ने यह भी दावा किया है कि इस फैसले से गठबन्धन की सरकार में आने वाली दिक्कतों से बचने का रास्ता प्रधानमंत्री के लिये साफ हो गया है। उधर डा. स्वामी चुप बैठने वाले नहीं है। वे उच्च न्यायालय में अपील दायर करेंगे। वहाँ से भी राहत न मिली तो सर्वोच्च न्यायालय जायेंगे। इस फैसले से निराश हुई भाजपा अब इसे चुनाव प्रचार में ज्यादा नहीं भुना पायेगी।
पर यहीं मेरा विरोध है। कब तक राजनैतिक दल एक-दूसरे पर इसी तरह भ्रष्टाचार के मामलों में हल्ला बोल कर देश को उलझाये रखेंगे। आज यूपीए पर हमला है, कल एनडीए पर ऐसा ही होगा। गठबन्धन की सरकार में शामिल होने वाले क्षेत्रीय दल जिस तरह मंत्रिमंडल में अपने दल के नेताओं को मंत्री बनावाते हैं और उनके लिये महत्वपूर्ण मंत्रालयों की माँग करते हैं, उससे गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री की दशा बड़ी दयनीय हो जाती है। ए राजा जैसे मंत्री डा. मनमोहन सिंह के निर्देशों की उपेक्षा करते हैं और करूणानिधि से निर्देश लेते हैं। पर विपक्ष इस भेद को अनदेखा कर सीधा प्रधानमंत्री पर तोप दागता है। जो कि स्वाभाविक है। पर क्या तोप दागने से कुछ हासिल होता है ? क्या भ्रष्टाचार रूकता है ? क्या आरोपियों को सजा मिल पाती है ? बोफोर्स, हवाला घोटाला, स्टाम्प ड्यूटी घोटाला, बैंक घोटाला, चारा घोटाला, तहलका काण्ड जैसे कितने ही घोटाले जोर-शोर से सामने आये। पर अन्त में क्या हुआ ? किसी को सजा नहीं मिली।
राजनीति का मकसद है आम आदमी की सम्पन्नता और खुशहाली बढ़ाना। पहले ‘सकल घरेलू उत्पाद‘ (जीडीपी) की बात होती थी, अब जी एन एच(ग्रास नैचुरल हैप्पीनेस) की बात हो रही है यानि लोगों की खुशहाली बढ़ायी जाये। अब खुशहाली बढ़ाने के लिये सरकार कोई निर्णय लेना चाहती हो और गठबन्धन के सहयोगी दल सहमत न हों  तो सरकार क्या करेगी ? अगर गठबन्धन के सहयोगी दल भ्रष्ट आचरण करें और रोकने पर सरकार गिराने की धमकी दें तो प्रधानमंत्री क्या करे ? आँखें मींचे, जैसा टू जी में हुआ या नैतिकता की दुहाई देकर सरकार गिर जाने दे। अगर ऐसे सरकारें गिरेंगी तो इटली की तरह एक-एक साल में कई-कई प्रधानमंत्री शपथ लेंगे। देश की प्रगति रूक जायेगी। निवेशकों का विश्वास हिल जायेगा। देश में अराजकता बढ़ेगी।
समय आ गया है कि सरकारों के घोटालों से आजिज आ रहे देशवासियों को राहत मिले। सभी दलों और जागरूक लोगों को मिल कर कुछ ठोस फैसले लेने होंगे। जैसे गठबंधन की शर्तें क्या हों ? सहयोगी दलों को ब्लैकमेल करने से कैसे रोका जाये ? सरकारें अपने संसाधनों का आवंटन किस तरह करें कि पारदर्शिता भी बनी रहे और देश को लाभ भी हो ? यानि घोटालों की गुंजाइश खत्म की जाये।
दुख की बात यह है कि घोटाले सामने आने पर शोर तो खूब मचता है। पर इस बात पर कभी सहमति नहीं होती कि घोटालों को रोकने के लिये व्यवस्था को पारदर्शी और जिम्मेदार कैसे बनाया जाये ? केन्द्रीय सतर्कता आयोग को स्वायत्तता देने की बात हो या ठेके, आवंटन और लीज में पारदर्शिता लाने की बात हो। ये सब मामले ऐसे हैं जिन्हें ठोस और क्रान्तिकारी परिवर्तनों के बिना सुलझाया नहीं जा सकता। घोटाले का उबाल उतरते ही मीडिया भी ढीला पड़ जाता है। जबकि आवश्यकता इस बात की है कि घोटालों के कारणों को दूर करने के काम में भी मीडिया, विशेषकर टी वी मीडिया वैसी ही उत्तेजना और तत्परता दिखाये, जैसी घोटालों के उजागर होने के कुछ दिन बात तक दिखाता है। अगर परिवर्तत के तमाम बिन्दुओं पर गंभीर और लंबी बहसें चलेंगी तो जनता भी शिक्षित होगी और व्यवस्था पर भी दवाब बनेगा। पिछले वर्ष भ्रष्टाचार के विरूद्ध चले लम्बे आन्दोलन के बावजूद समाधान के बिन्दुओं पर कोई गहरी चर्चायें नहीं हुईं। बस एक ही बात उठती रही कि ‘आप लोकपाल के साथ है या खिलाफ‘ नतीजन सब ठंडा पड़ गया। अगर सुधार लाने का यह प्रयास राजनैतिक जमात, न्यायविद्, मीडिया व सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर प्राथमिकता से नहीं करते हैं तो रोज नये घोटाले होते रहेंगे। न तो आरोपियों को सजा मिलेगी और न भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं’, जैसी भावना दिवगंत कवि दुष्यंत ने अभिव्यक्त की थी वैसा ही जज्बा आज हमारे देश के राजनैतिक नेतृत्व के मन में उठना चाहिये।