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Monday, July 17, 2017

कहीं महंगाई का बहाना न बन जाए जीएसटी

जीएसटी ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है। इसके लिए छोटे उद्योग और छोटे व्यापार करने वालों का बड़ा तबका रजिस्टेशन और काम धंधे का हिसाब किताब रखने और हर महीने सरकार को जानकारी देने के लिए कागज पत्तर तैयार करने में लग गया है। इसका तो खैर पहले से अंदाजा था। लेकिन दसियों टैक्स खत्म करके एक टैक्स करने का जो एक फायदा गिनाया गया था कि वस्तु और सेवा पर कुल टैक्स कम हो जाएगा और चीजें सस्ती हो जाएंगी, वह होता नज़र नहीं आया। बल्कि अपनी प्रवृति के अनुसान बाजार ने जीएसटी के बहाने अपनी तरफ से ही ज्यादा बसूली और शुरू कर दी। कानूनी और वैध तरीके अपनी जगह हैं लेकिन देश का ज्यादातर खुदरा व्यापार अभी भी असंगठित क्षेत्र में ही माना जाता है। सो जीएसटी के लक्ष्य हासिल होने में अभी से किंतु परंतु लगने लगे हैं। जीएसटी की आड़ लेकर आम जनता से ज्यादा दाम की अधोषित वसूली पहले दिन से ही शुरू हो गईं। 

जीएसटी लाए जाने का कारण और उसके असर का अंदाजा लगाया जाना जरूरी हो गया है। खासतौर पर इसलिए और जरूरी है क्योंकि नोटबंदी के विस्फोटक फैसले को हम पहले ही सदी का सबसे बड़ा कदम साबित करने में लगे थे। उसका असर का हिसाब अभी लग नहीं पाया। इसीबीच सदी का सबसे बड़ा टैक्स सुधार का धमाका और हो गया। स्वाभाविक रूप् से ऐसे फेसलों का चैतरफा और जबर्दस्त असर होने के कारण इसे चर्चा के बाहर करना मुश्किल होगा। नाकामी की सूरत में तो हायतौबा मचेगी ही लेकिन कामयाबी के बावजूद इसका प्रचार करने में बड़ी दिक्कत आएगी । इसका कारण यह कि जनता सबसे पहले यह देखती है कि उसे सीधे सीधे क्या मिला। जबकि नोटबंदी और जीएसटी में एक समानता यह थी कि इसमें आम जनता के लिए सीधे साीधे पाने का आश्वासन नहीं था। बल्कि अप्रत्यक्ष हासिल यह था कि बड़े लोगों की मौज कम हो जाएगी।

नोटबंदी से बड़े लोगों की मौज कितनी कम हुई इसका अभी  पता नहीं है। भ्रष्टाचार पर क्या असर पड़ा इसका ठीक ठीक आकलन होने में लंबा वक्त लगेगा। सो नोट बंदी के नफे नुकसान का हिसाब अभी नहीं लग सकता। लेकिन जीएसटी ऐसा फेसला था जिसका असर तत्काल होना लाजिमी था। और वह हुआ।
ज्यादा से ज्यादा मुनाफे की चाह में रहने वाले बाजार की प्रवृत्ति ही होती है कि उसे दात बढा़ने के बहाने की तलाश होती है। कभी टकों की हड़ताल कभी पेटोल पंपों की तो कमी खराब  मौसम का बहाना यानी आवश्यक सामान की सप्लाई कम होने के बहाने से दाम हमेशा बढ़ाए जाते हैं। लेकिन दसियों साल बाद जीएसटी से क्रांतिकारी सुधार ने तो बाजार को जैसे सबसे बड़ा बहाना दे दिया। ठंडक में बैठकर साफसुथरे ढंग से खाने वालों को जब बिल में यह देखने को मिलता है कि 18 फीसद यानी दो सौ रूप्ए की थाली लेने में 36 रूप्ए सरकारी खजाने में चले गए तो एक बार वह खुद को यह दिलासा दे लेता है कि चलो साफसुथरी जगह खाना खाना देश के हित में काम आएगा। लेकिन जब वह ये देखता है कि इस बीच सामान के दाम भी बढ़ गए तो उसे समझ में नहीं आता कि सारे टेक्स खुद ही देने के बाद उसे अतिरिक्त पैसे किस बात के देने पड़ रहे हैं।

बड़े गौर करने की बात है कि रोजमर्रा के बहुत से सामान ऐसे हैं कि अगर औसत तबके के खरीददार को महंगे लगते हैं तो वह उसे नहीं भी खरीदता है या कम मात्रा में खरीदकर कर काम चला लेता है। लेकिन पैकेटबंद खाने की चीजें या उम्दा क्लालिटी की चीजें हमेंशा ही बेमौके भी महंगी होती जाती हैं। और उनकी बिक्री पर भी असर नहीं पड़ता। इनका इस्तेमाल करने वाला तबका इतना संपन्न है कि वह कम से कम खाने पीने में किफायत की बात बिल्कुल ही नहीं सोचता। लेकिन वहां बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है जहां तंवाकू, सिगरेट और हल्के नशे की दूसरी चीजों के दाम बढ़ने ने दसियों साल के रिकार्ड तोड़ दिए। जिन्हें लत पड़ चुकी है उनके लिए अव ये चीजें आवश्यक वस्तु की ही श्रेणी में हैं। खुदरा दुकानदार का तर्क होता है कि पैकेट या डिब्बे पर नए रेट आने वाले हैं तब तक थोक में अलग से पैसे देने पड़ रहे हैं। चलिए हफते दो हफते या ज्यादा से ज्यादा महीने दो महीने इस बहाने से ज्यादा दाम वसूली चल भी सकती है। लेकिन देखा यह गया है कि एक बार किसी भी बहाने से महंगाई बढ़ने के बाद उसे नीचे उतारने का कोई तरीका काम नहीं आता। सप्लाई का बहाना बनाकर अरहर की दाल जब चालीस से बढ़कर साठ हुई थी तो सरकार की हरचंद कोशिश के बाद वह नीचे तो आई ही नहीं बल्कि दो सौ रूप्ए तक की महंगाई छू आई।

यहां जीएसटी और महंगाई की बात एक साथ करने की तर्क यह है कि सरकारी एलानों और सरकारी इरादों में जनता से ज्यादा टैक्स की उगाही का मकसद भले न हो लेकिन बाजार में जीएसटी के बहाने अगर ज्यादा मुनाफा वसूली शुरू हो गई तो गली गली में महंगाई की चर्चा शुरू होने में देर नहीं लगेगी। 

Monday, April 10, 2017

केवल कर्ज माफी से नहीं होगा किसानो का उद्धार

Punjab Kesari 10 April 2017
यूपीए-2 से शुरू हुआ किसानों की कर्ज माफी का सिलसिला आज तक जारी है। उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी ने चुनावी वायदों को पूरा करते हुए लघु व सीमांत किसानों की कर्ज माफी का एलान कर दिया है। निश्चित रूप से इस कदम से इन किसानों को फौरी राहत मिलेगी। पर  इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उनके दिन बदल जायेंगे। केंद्रीय सरकार ने किसानों की दशा सुधारने के लिए ‘बीज से बाजार तक’ छः सूत्रिय कार्यक्रम की घोषणा की है। जिसका पहला बिंदू है किसानों को दस लाख करोड़ रूपये तक ऋण मुहैया कराना। किसानों को सीधे आनलाईन माध्यम से क्रेता से जोड़ना, जिससे बिचैलियों को खत्म किया जा सके। कम कीमत पर किसानों की फसल का बीमा किया जाना। उन्हें उन्नत कोटि के बीज प्रदान करने। 5.6 करोड़ ‘साईल हैल्थ कार्ड’ जारी कर भूमि की गुणवत्तानुसार फसल का निर्णय करना। किसानों को रासायनिक उर्वरकों के लिए लाईन में न खड़ा होना पड़े, इसकी व्यवस्था सुनिश्चित करना। इसके अलावा उनके लिए सिंचाई की माकूल व्यवस्था करना। विचारणीय विषय यह है कि क्या इन कदमों से भारत के किसानों की विशेषकर सीमांत किसानों की दशा सुधर पाएगी?

सोचने वाली बात यह है कि कृषि को लेकर भारतीय सोच और पश्चिमी सोच में बुनियादी अंतर है। जहां एक ओर भारत की पांरपरिक कृषि किसान को विशेषकर सीमांत किसान को उसके जीवन की संपूर्ण आवश्यक्ताओं को पूरा करते हुए, आत्मनिर्भर बनाने पर जोर देती है, वहीं पश्चिमी मानसिकता में कृषि को भी उद्योग मानकर बाजारवाद से जोड़ा जाता है। जिसके भारत के संदर्भ में लाभ कम और नुकसान ज्यादा हैं। पश्चिमी सोच के अनुसार दूध उत्पादन एक उद्योग है। दुधारू पशुओं को एक कारखानों की तरह इकट्ठा रखकर उन्हें दूध बढ़ाने की दवाऐं पिलाकर और उस दूध को बाजार में बड़े उद्योगों के लिए बेचकर पैसा कमाना ही लक्ष्य होता है। जबकि भारत का सीमांत कृषक, जो गाय पालता है, उसे अपने परिवार का सदस्य मानकर उसकी सेवा करता है। उसके दूध से परिवार का पोषण करता है। उसके गोबर से अपने खेत के लिए खाद् और रसोई के लिए ईंधन तैयार करता है। बाजार की व्यवस्था में यह कैसे संभव है? इसी तरह उसकी खेती भी समग्रता लिए होती है। जिसमें जल, जंगल, जमीन, जन और जानवर का समावेश और पारस्परिक निर्भरता निहित है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानवतावाद इसी भावना को पोषित करता है। बाजारीकरण पूर्णतः इसके विपरीत है।

देश  की जमीनी सोच से जुड़े और वैदिक संस्कृति में आस्था रखने वाले विचारकों की चिंता का विषय यह है कि विकास की दौड़ में कहीं हम व्यक्ति केन्द्रित विकास की जगह बाजार केंद्रित विकास तो नहीं कर रहे। पंजाब जैसे राज्य में भूमि उर्वरकता लगातार कम होते जाना, भू-जल स्तर खतरनाक गति से नीचा होते जाना, देश में जगह-जगह लगातार सूखा पड़ना और किसानों को आत्महत्या करना एक चिंताजनक स्थिति को रेखांकित करता है। ऐसे में कृषि को लेकर जो पांरपरिक ज्ञान और बुनियादी सोच रही है, उसे परखने और प्रयोग करने की आवश्यकता है। गुजरात का ‘पुनरोत्थान ट्रस्ट’ कई दशकों से देशज ज्ञान पर गहरा शोध कर रहा है। इस शोध पर आधारित अनेक ग्रंथ भी प्रकाशित किये गये हैं। जिनको पढ़ने से पता चलता है कि न सिर्फ कृषि बल्कि अपने भोजन, स्वास्थ, शिक्षा व पर्यावरण को लेकर हम कितने अवैज्ञानिक और अदूरदर्शी हो गये हैं। हम देख रहे हैं कि आधुनिक जीवन पद्धति लगातार हमें बीमार और कमजोर बनाती जा रही है। फिर भी हम अपने देशज ज्ञान को अपनाने को तैयार नहीं हैं। वो ज्ञान, जो हमें सदियों से स्वस्थ, सुखी और संपन्न बनाता रहा और भारत सोने की चिड़िया कहलाता रहा। जबसे अंग्रेजी हुकुमत ने आकर हमारे इस ज्ञान को नष्ट किया और हमारे अंदर अपने ही अतीत के प्रति हेय दृष्टि पैदा कर दी, तब से ही हम दरिद्र होते चले गये। कृषि को लेकर जो भी कदम आज उठाये जा रहें हैं, उनकी चकाचैंध में देशी समझ पूरी तरह विलुप्त हो गयी है। यह चिंता का विषय है। कहीं ऐसा न हो कि ‘चैबे जी गये छब्बे बनने और दूबे बनकर लौटे’।

यह सोचना इसलिए भी महत्वपूर्णं है क्योंकि बाजारवाद व भोगवाद पर आधारित पश्चिमी अर्थव्यवस्था का ढ़ाचा भी अब चरमरा गया है। दुनिया का सबसे विकसित देश माना जाने वाला देश अमरिका दुनिया का सबसे कर्जदार है और अब वो अपने पांव समेट रहा है क्योंकि भोगवाद की इस व्यवस्था ने उसकी आर्थिक नींव को हिला दिया है। समूचे यूरोप का आर्थिक संकट भी इसी तथ्य को पुष्ट करता है कि बाजारवाद और भोगवाद की अर्थव्यवस्था समाज को खोखला कर देती है। हमारी चिंता का विषय यह है कि हम इन सारे उदाहरणों के सामने होेते हुए भी पश्चिम की उन अर्थव्यवस्थाओं की विफलता की ओर न देखकर उनके आडंबर से प्रभावित हो रहे हैं।

आज के दौर में जब भारत को एक ऐसा सशक्त नेतृत्व मिला है, जो न सिर्फ भारत की वैदिक संस्कृति को गर्व के साथ विश्व में स्थापित करने सामथ्र्य रखता है और अपने भावनाओं को सार्वजनिक रूप से प्रकट करने में संकोच नहीं करता, फिर क्यों हम भारत के देशज ज्ञान की ओर ध्यान नहीं दे रहे? अगर अब नहीं दिया तो भविष्य में न जाने ऐसा समय फिर कब आये? इसलिए बात केवल किसानों की नहीं, पूरे भारतीय समाज की है, जिसे सोचना है कि हमें किस ओर जाना है?

Monday, December 12, 2016

भारत सुंदर कैसे बने?



नोटबंदी में मीडिया ऐसा उलझा है कि दूसरे मुद्दों पर बात ही नहीं हो रही। प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान बड़े जोर-शोर से शुरू किया था। देश की हर मशहूर हस्ती झाडू लेकर सड़क पर उतर गयी थी। पर आज क्या हो रहा है? क्या देश साफ हुआ ? दूर दराज की छोड़िये देश की राजधानी दिल्ली के हर इलाके में कूड़े के पहाड खड़े हैं, चाहे वह खानपुर-बदरपुर का इलाका हो या नारायण का, रोहिणी का हो, वसंत कुञ्ज का या उत्तरी व पूर्वी दिल्ली के क्षेत्र। जहां चले जाओ सड़कों के  किनारे कूड़े के ढेर लगे पडे हैं। यही हाल बाकी देश का भी है। रेलवे के प्लेटफार्म हों, बस अड्डे हों, बाजार हों या रिहायशी बस्तियां सब ओर कूड़े का साम्राज्य फैला पड़ा है। कौन सुध लेगा इसकी ? कहाँ गयी वो मशहूर हस्तियां जो झाड़ू लेकर फोटो खिंचवा रही थीं ?

प्रधानमंत्री का यह विचार और प्रयास सराहनीय है। क्योंकि सफाई हर गरीब और अमीर के लिए फायदे का सौदा है। गंदगी कहीं भी सबको बीमार करती है। भारतीय समाज में एक बुराई रही कि हमने सफाई का काम एक वर्ण विशेष पर छोड़ दिया। बाकी के तीन वर्ण गंदगी करने के लिए स्वतंत्र जीवन जीते रहे। नतीजा ये कि सफाई करना हम अपनी तौहीन मानते हैं । यही कारण है कि अपना घर तो हम साफ कर लेते हैं, पर दरवाजे के सामने का कूड़ा साफ करने में हमारी नाक कटती है। नतीजतन हमारे बच्चे जिस परिवेश में खेलते हैं, वो उनकी सेहत के लिए अच्छा नहीं होता। हम जब अपने घर, दफ्तर या दुकान पर आते-जाते हैं तो गंदगी से बच-बचकर चलना पड़ता है।  फिर भी हमें अपने कर्तव्य का एहसास क्यों नहीं होता ?

इसका कारण यह है कि हम भेड़ प्रवृत्ति के लोग हैं। अगर कोई डंडा मारे तो हम चल पड़ते है। जिधर हाँके उधर चल पडते हैं। इसलिए स्वच्छ भारत अभियान की विफलता का दोष भी मैं नरेन्द भाई मोदी पर ही थोपना चाहता हूँ। क्योंकि अगर वो चाहें तो उनका यह सुंदर अभियान सफल हो सकता है।

नोट बंदी के मामले में नरेन्द्र भाई ने जिस तरह आम आदमी को समझाया है कि यह उसके फायदे का काम हो रहा है वह बेमिसाल है। आदमी लाइनों में धक्के खा रहा है और उसके काम रूक रहे हैं, फिर भी गीता ज्ञान की तरह यही कहता है कि जो हो रहा है अच्छा हो रहा है और जो आगे होगा वो भी अच्छा ही होगा। अगर नोट बंदी पर मोदी जी इतनी कुशलता से आम आदमी को अपनी बात समझा सकते हैं तो सफाई रखने के लिए क्यों नहीं प्रेरित करते?

मैने पहले भी एक बार लिखा है कि सप्ताह में एक दिन अचानक माननीय प्रधानमंत्री जी को देश के किसी भी हिस्से में, जहां वे उस दिन सफर कर रहे हों, औचक निरीक्षण करना चाहिए। गंदगी रखने वालों को वहीं सजा दें और खुद झाड़ू लेकर सफाई शुरू करवायें। अगर ऐसा वे हफ्ते में एक घंटा भी करते हैं, तो देश में सफाई रखने का एक माहौल बन जायेगा। हर ओर अधिकारियों में डर बना रहेगा कि पता नहीं कब और कहां प्रधानमंत्री आ धमकें ।  जनता में भी उत्साह बना रहेगा कि वो सफाई अभियान में बढ-चढकर भाग ले।

देश में लाखों सरकारी मुलाजिम सेवानिवृत्त होकर पेशन ले रहे हैं। उन्हें अपने -अपने क्षेत्र की सफाई के लिए जिम्मेदार ठहराना चाहिए। इसी तरह सभी स्कूल, कालेजों को अपने परिवेश की सफाई पर ध्यान देने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारों को भी ये आदेश दिये जाने चाहिए कि वे अपने परिवेश को अपने खर्च पर साफ रखें। अन्यथा उनको मिलने वाली आयकर की छूट खत्म कर दी जायेगी। इसी तरह हर संस्थान को चाहे वो वकीलों का संगठन हो, चाहे व्यापार मंडल और चाहे कोई अन्य कामगार संगठन सबको अपनी परिवेश की सफाई के लिए जिम्मेदार ठहराना होगा। सफाई न रखने पर सजा का और साफ रखने पर प्रोत्साहन का प्रावधान भी होना चाहिए। इस तरह शुरू में जब लगातार डंडा चलेगा तब जाकर लोगों की आदत बदलेगी।

इसके साथ ही जरूरी है कचरे के निस्तारण की माकूल व्यवस्था। इसकी आज भारी कमी है। देश-दुनिया में ठोस कचरा निस्तारण के विशेषज्ञों की  भरमार है। जिन्हें इस समस्या के हल पर लगा देना चाहिए। इसके साथ ही प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड-चाहे वो केन्द्र के हों या राज्यों के, उन्हें सक्रिय करने की जरूरत है। आज वे भारी भ्रष्टाचार से ग्रस्त हैं, इसलिए अपने कर्तव्यों का निर्वाहन नहीं करते। नदियों का प्रदूषण उनकी ही लापरवाही के कारण ही हो रहा है। वरना मौजूदा कानूनों में इतना दम है कि कोई नदी, तालाब या धरती को इतनी बेदर्दी से प्रदूषित नहीं कर सकता।

इसलिए प्रधानमंत्री जी हर विभागाध्यक्ष को सफाई के लिए जिम्मेदार ठहरायें और सेवा निवृत्त कर्मचारियों और छात्रों को निगरानी के लिए सक्रिय करें। तभी यह अभियान सिरे चढ सकता है। जिसका लाभ हर भारतवासी को मिलेगा और फिर सुंदर आत्मा वाला ये देश, सुदर शरीर वाला भी बन जायेगा।

Monday, October 24, 2016

अंडमान निकोबार से क्रूड आयल और नेचुरल गैस निकालकर देश को क्यों नहीं दी जाती ?

एक तरफ हमारा देश हजारों करोड़ रूपया पश्चिमी एशियाई देशों को देकर क्रूड आयल और नेचुरल गैस खरीद रहा है। दूसरी ओर अंडमान निकोबार द्वीप समूह में हमारे पास क्रूड आॅयल और नेचुरल गैस के अपार भंडार भरे पड़े हैं। जिन्हें हमारी लापरवाही के कारण इंडोनेशिया अप्रत्यक्ष रूप से दोहन करके दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक बना हुआ है। क्या इसके पीछे कोई निहित स्वार्थ हैं।

अमेरिका के दो वैज्ञानिकों ने मध्य-पूर्व एशिया के तेल के कुंओं का पिछले 20 साल में शोध करके एक शोध पत्र प्रकाशित किया है। जिसमें बताया कि इन कुंओं से रोजाना 10 से 20 मिलियन बैरल तेल निकालकर बेचा जाता है और ये काम पिछले 70-80 वर्ष से चल रहा है। इसके बावजूद हर साल जब मिडिल ईस्ट के तेल के कुंओं का स्तर नापा जाता है, तो वह पहले से भी ऊंचा निकलता है। यानि कि मिडिल ईस्ट के तेल के कुंओं में चमत्कार हो रहा है। वहां पर जितना मर्जी तेल निकाले जाओ, उसके बावजूद तेल का स्तर घटने की बजाय लगातार बढ़ रहा है। दरअसल मिडिलईस्ट के तेल के कुंओं में तेल बढ़ने का कारण वहां का ‘सबडक्शन जोन‘ है। सउदी अरब की ‘क्रस्टल प्लेट‘ ईरान की ‘क्रस्टल प्लेट‘ के नीचे 1200 डिग्री ‘सैल्सियस मैग्मा‘ के अंदर जब प्रवेश करती है, तो उस प्लेट के ऊपर जो कैल्शियम कार्बोनेट होता है, वह टूट जाता है और उससे कार्बन निकलता है। फारस की खाड़ी का पानी जब 1200 डिग्री सैन्टीग्रेड मैग्मा में प्रवेश करता है, तो वह भी टूट जाता है और उसमें से हाइड्रोजन गैस निकलती है। हाड्रोजन और कार्बन दोनों मिलकर तत्काल हाइड्रोकार्बन बना देते हैं। जिसको हम रोजमर्रा की भाषा में क्रूड आयल और नेचुरल गैस कहते हैं। 

वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया है कि बंगाल की खाड़ी में भी यही हो रहा है। वहां पर ‘इंडो-आॅस्टे’ लियन क्रस्टल प्लेट‘ ‘यूरेशियन क्रस्टल प्लेट‘ के नीचे डाइव कर रही हैं और उसके अंदर भी कैल्शियम कार्बोनेट टूट रहा है। साथ ही बंगाल की खाड़ी का पानी भी टूट रहा है और दोनों मिलकर वहां पर भी क्रूड आॅयल और नेचुरल गैस बना रहे हैं।

बंगाल की खाड़ी का जो ‘सबडक्शन जोन‘ है, उसका दक्षिणी हिस्सा इंडोनेशिया के पास है। इससे इंडोनेशिया प्रतिदिन 1 मिलियन बैरल क्रूड आयल निकालता है। इसके अलावा इंडानेशिया की गैस प्रोडेक्शन एशिया-पैसेफिक में नंबर एक है। अंडमान निकोबार के उत्तर में म्यांमार (वर्मा) देश है। वह भी प्रतिदिन 30 हजार बैरल क्रूड आयल निकाल रहा है। इसके अलावा उसका गैस प्रोडेक्शन भी बहुत ज्यादा है। उसने अंडमान बेसिन के पास ‘आफशोर गैस फील्ड्स‘ और ‘आयल फील्ड्स‘ में तेल निकालने और उसके शुद्धीकरण का काम भी शुरू कर दिया है।

प्रश्न ये पैदा होता है कि भारत अपनी कीमती विदेशी मुद्रा मिडिल ईस्ट को दे करके तेल क्यों खरीदता है ? जबकि हमारे पड़ोसी देश इंडानेशिया और म्यांमार उसी बंगाल की खाड़ी से तेल निकाल रहे हैं और हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे हैं। हम अंडमान निकोबार के ‘डीप वाटर ब्लाक्स‘ से तेल और गैस निकालकर देश को क्यों नहीं देते ? हमारी विदेशी मुद्रा नाहक मिडिलईस्ट के शेखों को क्यों लुटाई जा रही है ? 2014 में करीब 10 लाख करोड़ रूपये की विदेशी मुद्रा तेल और गैस की खरीददारी में मिडिलईस्ट के शेखों को दी गई।

2015 में अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल के दाम गिरने से तेल और गैस की खरीददारी में 8.50 लाख करोड़ रूपये की विदेशी मुद्रा खर्च हुई। ये डेढ़ लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा जो बची, उसी से सरकार चल रही है। अगर कहीं तेल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में न गिरे होते, तो महंगाई ने भारत की खाट खड़ी कर दी होती और हमारा भुगतान संतुलन भी गंभीर संकट के दौर में पहुंच जाता। फिर हमें चंद्रशेखर सरकार की तरह रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया का सोना गिरवी रखना पड़ जाता।

सरकार ने 5 ‘डीप वाटर ब्लाक्स‘ अंडमान बेसिन में प्राइवेट कंपनियों को तेल निकालने के लिए आफर किए। जिसमें से 1296 बिलियन बैरल्स तेल होने का प्रलोभन दिया। प्रश्न ये पैदा होता है कि हमारी राष्ट्रीय कंपनियां, जैसे कि ओएनजीसी, ओआईएल, गेल, जीएसपीसी आदि अंडमान निकोबार के 16 डीप वाटर ब्लाक्स में से तेल और गैस निकालकर देश को क्यों नहीं देतीं?  

उल्लेखनीय है कि इस इलाके में 83419 वर्ग किमी. में तेल और गैस फैली हुई है। इतने बड़े क्षेत्र में सरकार ने 22 तेल के कुएं खोदे और उनमें गैस मिली। इसी के आधार पर उन्होंने 5 डीप वाटर ब्लाक्स में से तेल और गैस निकालने के लिए प्राइवेट कंपनियों को न्यौता दिया। पर प्रश्न ये पैदा होता है कि आज 2 साल गुजर गए, जबसे इन कुंओं से गैस मिल रही है। फिर भी कोई प्राइवेट कंपनी ठेका लेने सामने नहीं आई, तो सरकार किस बात का इंतजार कर रही है ? हमारी तेल कंपनियां किस काम के लिए बनाई हैं?  

कहीं ऐसा तो नहीं कि मिडिलईस्ट के शेख अपनी दुकानदारी चलाए रखने के लिए हमारी नेशनल कंपनियां हैं और इनसे जुड़े अधिकारी और मंत्री हैं, उनको मोटी-मोटी रिश्वत देकर अपना कर्तव्य न निभाने का दबाव डाल रहे हैं ? इस विषय में तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुखेंदु शेखर राय ने मानसून सत्र में राज्यसभा में प्रश्न नंबर 1944 उठाया था। जिसके जवाब में पेट्रोलियर मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 3 अगस्त, 2016 को जो कुछ कहा, वह संतुष्टिपूर्ण बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। उनका जवाब लीपापोती से ज्यादा कुछ नहीं था, इसलिए संदेह होना स्वाभाविक है। इसलिए इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे दखल देकर पूछना चाहिए कि इस ‘मल्टी बिलियन डालर‘ के खेल में किस स्तर तक धांधलेबाजी हो रही है ? मुट्ठीभर लोग देश का आधा जीडीपी मिडिलईस्ट के शेखों को देकर 130 करोड़ भारतीयों की जेब क्यों काट रहे हैं ? 2 वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टेलीविजन चैनलों पर यह घोषणा की थी कि मैं अंडमान निकोबार से तेल निकालकर देश को दूंगा। पर अभी तक इस दिशा में क्या हुआ, देश को पता नहीं लगा। यह बहुत गंभीर विषय है, जिसका आम भारतवासी के जीवन से संबंध है। इस पर एक श्वेत पत्र जारी होना चाहिए।