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Monday, August 19, 2019

अचानक क्यों बढ़ रही हैं देश की आर्थिक हालत की चर्चाएँ

देश की आर्थिक स्थिति को लेकर मीडिया में चर्चाएं अचानक बढ़ गई हैं। पिछली तिमाहीं में कार और दो पहिया वाहनों की माँग में तेज़ी से आयी गिरावट के बाद तो कुछ ज्यादा ही चिंता जताई जाने लगी है। उधर विश्व में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत का ओहदा घट जाने की खबर ने भी ऐसी चर्चाओं को और हवा दे दी। अंदरूनी तौर पर वास्तविक स्थिति क्या है, इसका पता फ़ौरन नहीं चलता। हकीकत बाद में पता चलेगी। लेकिन फिलहाल सरकार उतनी चिंतित नहीं दिखाई देती। उसके पास कुछ तर्क भी हैं। मसलन जीएसटी से कर संग्रह पर असर पड़ा नहीं दिख रहा है। दूसरा तर्क यह कि अपने देश में उत्पादन में सुस्ती का एक कारण वैश्विक मंदी है। बहरहाल, आर्थिक हालत अभी उतनी बुरी न सही लेकिन आगे के लिए सतर्कता बरतना हमेशा ही जरूरी माना जाता है।
सकल घरेलू उत्पाद में आधा पौन फीसद की घटबढ़ एक रूझान तो हो सकता है लेकिन यह किसी आफत का लक्षण नहीं कहा जा सकता। इसी आंकड़े से देश की अर्थव्यवस्था का आकार तय होता है। हाल ही में हम विश्व में पांचवे से खिसककर सातवें पर भले ही आ गए हों लेकिन यह उतनी चिंताजनक बात है नहीं। बल्कि यह आंकड़ा हमें उत्पादक कामकाज में सुधार के लिए प्रेरित कर सकता है। 
पिछली तिमाही में वाहनों की बिक्री में फिलहाल कमी ही दिखी है, ये उघोग खत्म नहीं हो गया है। विशेष प्रयासों से देश में आर्थिक गतिविधियाँ कभी भी बढ़ाई जा सकती हैं। देश में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ाने के कई उपाय किए जा सकते है और स्थिति को सुधारा जा सकता है। खबरें हैं कि वित्तमंत्री इस काम पर लग भी गई हैं। फिर भी सावधानी के तौर पर  यह समय देश की माली हालत के कई पहलुओं पर गौर करने का जरूर है।
आर्थिक मामलों के जानकार बताते रहते हैं कि अपने देश की अर्थव्यवस्था तीन क्षेत्रों में वृद्धि से तय होती है। ये क्षेत्र हैं विनिर्माण, सेवा और कृषि। मौजूदा चिंता विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में सुस्ती से उपजी है। कृषि को कोई लेखे में नही ले रहा है। भले ही जीडीपी में कृषि का योगदान थोड़ा सा ही बचा हो लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि कृषि ही वह क्षेत्र है जो देश में आधी से ज्यादा आबादी को उत्पादक काम में लगाए हुए है। और यही वह क्षेत्र है जिसमें बेरोजगारी की समस्या ज्यादा बढ़ गई है। इसी क्षेत्र के लोगों को उत्पादक कार्यो में लगाने की गुंजाइश भी है और मौजूदा हालात से निपटने का मौका भी इसी क्षेत्र में बन सकता है।
कई विद्वानों की तरफ से सुझाव मिल रहा है कि देश में किसी भी तरह से मांग बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए। लेकिन मांग बढ़ाने के लिए क्या यह जरूरी नहीं कि लोगों की जेब में ज्यादा पैसा हो। सरकार ने किसानों के बैंक खातों में हर महीने पांच सौ रूप्ए डालने का फैसला किया था। इस योजना में  सरकारी खजाने से हर साल 90 हजार करोड़ निकल कर किसानों की जेब में जाना है। कुछ विश्लेषकों ने अंदाजा लगाया था कि यह रकम देश में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ा देगी और उत्पादन में सुस्ती कम होगी। लेकिन पिछले छह महीनों का अनुभव यह है कि इस योेजना का ऐसा असर अभी दिखा नहीं है। हो सकता है कि इस कारण से न दिखा हो क्योंकि अभी यह रकम सभी किसानों के खातों में पहुंच नहीं पाई है। अगर वाकई देश में मांग घटने की समस्या बड़ी होती जा रही है तो किसानों को रकम भेजने का काम फौरन तेज किया जाना चाहिए। लोगों की जेबों में पैसा डालने के तरीके अपनाए जाने चाहिए।
सरकार के स्तर पर सतर्कता बरतने के लिए एक क्षेत्र और है। यह मामला भी कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। वह ये है कि देश में बारिश के आंकड़े सामान्य नहीं हैं। बारिश के दो महीने से ज्यादा गुजरने के बाद भी देश में नौ फीसद वर्षा कम हुई है। आने वाले समय में अगर देश में औसम वर्षा की भरपाई न हुई तो कृषि उत्पादन पर भारी असर पड़ सकता है। वैसे यह अभी उतनी चिंता की बात नहीं है। फिर भी किसी ख़तरे की आशंका पर नज़र तो रखनी ही पड़ेगी।
आर्थिक मंदी की सबसे ज़्यादा मार रोजगार पर पड़ती है। हम पहले से ही बेरोेजगारी से परेशान हैं। इस तरह से वर्तमान परिस्थितियों में अगर सबसे ज्यादा सतर्कता की जरूरत है तो वह बेरोज़गारी के मोर्चे पर चैकस रहने की है।
एक तबका महंगाई को लेकर परेशानी जता रहा है। हालांकि यह शिकायत खाने पीने की कुछ चीजों को लेकर है। लेकिन देश में महंगाई की चिंता का तुक बैठता नहीं है। जहां मंदी के लक्षण हो वहां शुरूआती तौर पर माल बिकने की ही परेशानी खड़ी होती है और दाम गिरते हैं। विद्वानों ने इस बात पर ज्यादा गौर नहीे किया है कि पिछला एक साल खाद्य महंगाई की दर ज्यादा नहीं बढ़ने का रहा है। कृषि उत्पाद के दाम न बढ़ने से किसान बहुत परेशान रहे हैं। देश में मौसम की गड़बड़ी उनको और ज्यादा चिंता में डाले है। 

कुल मिलाकर मंदी की आहट के इस दौर में सरकार को अगर किसी की चिंता करने की जरूरत है तो सबसे ज्यादा किसानों की चिंता करने की है।

Monday, August 12, 2019

अब कश्मीर में क्या होगा?


जहाँ सारा देश मोदी सरकार के कश्मीर कदम से बमबम है वहीं अलगाववादी तत्वों के समर्थक अभी भी मानते हैं कि घाटी के आतंकवादी फिलिस्तानियों की तरह लंबे समय तक आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते रहेंगे। जिसके कारण अमरीका जैसे-शस्त्र निर्माता देश भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को बढ़ाकर हथियारों बिक्री करेंगे। उनका ये भी मानना है कि केंद्र के निर्देश पर जो पूंजी निवेश कश्मीर में करवाया जाएगा, उसका सीधा लाभ आम आदमी को नहीं मिलेगा और इसलिए कश्मीर के हालात सामान्य नहीं होंगे। पर ये नकारात्मक सोच है।

इतिहास गवाह है कि मजबूत इरादों से किसी शासक ने जब कभी इस तरह के चुनौतीपूर्णं कदम उठाये हैं, तो उन्हें अंजाम तक ले जाने की नीति भी पहले से ही बना ली होती है।

कश्मीर में जो कुछ मोदी और शाह जोड़ी ने किया, वो अप्रत्याशित और ऐतिहासिक तो है ही, चिरप्रतिक्षित कदम भी है। हम इसी कॉलम में कई बार लिखते आए हैं, कि जब कश्मीरी सारे देश में सम्पत्ति खरीद सकते हैं, व्यापार और नौकरी भी कर सकते हैं, तो शेष भारतवासियों को कश्मीर में ये हक क्यों नहीं मिले?

मोदी है, तो मुमकिन है। आज ये हो गया। जिस तरह का प्रशासनिक, फौजी और पुलिस बंदोबस्त करके गृहमंत्री अमित शाह ने अपनी नीति को अंजाम दिया है, उसमें अलगावादी नेताओं और आतंकवादियों के समर्थकों के लिए बच निकलने का अब कोई रास्ता नहीं बचा। अब अगर उन्होंने कुछ भी हरकत की, तो उन्हें बुरे अंजाम भोगने होंगे। जहां तक  कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी का प्रश्न है, वो तो हमेशा ही आर्थिक प्रगति चाहती है। जो बिना अमन-चैन कायम हुए संभव नहीं है। इसलिए भी अब कश्मीर में अराजकता के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची।

कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर, गृहमंत्री ने वहंा की कानून व्यवस्था पर अपना सीधा नियंत्रण स्थापित कर लिया है। अब जम्मू-कश्मीर पुलिस की जबावदेही वहां के मुख्यमंत्रियों के प्रति नहीं, बल्कि केंद्रीय गृहमंत्री के प्रति होगी। ऐसे में अलगाववादी शक्तियों से निपटना और भी सरल होगा।

जहां तक स्थानीय नेतृत्व का सवाल है। कश्मीर की राजनीति में मुफ्ती मोहम्मद सईद और मेहबूबा मुफ्ती ने सबसे ज्यादा नकारात्मक भूमिका निभाई है। अब ऐसे नेताओं को कश्मीर में अपनी जमीन तलाशना मुश्किल होगा। इससे घाटी में से नये नेतृत्व के उभरने की संभावनाऐं बढ़ गई हैं। जो नेतृत्व पाकिस्तान के इशारे पर चलने के बजाय अपने आवाम के फायदे को सामने रखकर आगे बढ़ेगा, तभी कामयाब हो पाऐगा।

जहां तक कश्मीर की तरक्की की बात है। आजादी के बाद से आज तक कश्मीर के साथ केंद्र की सरकार ने दामाद जैसा व्यवहार किया है। उन्हें सस्ता राशन, सस्ती बिजली, आयकर में छूट जैसी तमाम सुविधाऐं दी गई और विकास के लिए अरबों रूपया झोंका गया। इसलिए ये कहना कि अब कश्मीर का विकास तेजी से करने की जरूरत है, सही नहीं होगा। भारत के अनेक राज्यों की तुलना में कश्मीरीयों का जीवन स्तर आज भी बहुत बेहतर है।

जरूरत इस बात है कि कश्मीर के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना वहाँ पर्यटन, फल-फूल और सब्जी से जुड़े उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए और देशभर के लोगों को वहां ऐसे उद्योग व्यापार स्थापित करने में मदद दी जाऐ। ताकि कश्मीर की जनता शेष भारत की जनता के प्रति द्वेष की भावना से निकलकर सहयोग की भावना की तरफ आगे बढ़े।
आज तक सबसे ज्यादा प्रहार तो कश्मीर में हिंदू संस्कृति पर किया गया। जब से वहां मुसलमानों का शासन आया, तब से हजारों साल की हिंदू संस्कृति को नृशंस तरीके से नष्ट किया गया। आज उस सबके पुनरोद्धार की जरूरत है। जिससे दुनिया को एक बार फिर पता चल सके कि भारत सरकार कश्मीर में ज्यात्ती नहीं कर रही थी, जैसा कि आज तक दुष्प्रचार किया गया, बल्कि मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदूओं पर अत्याचार किये, उनके शास्त्र और धम्रस्थल नष्ट किये और उन्हें खदेड़कर कश्मीर से बाहर कर दिया। जिसे देखकर सारी दुनिया मौन रही। श्रीनगर के सरकारी संग्रहालय में वहाँ की हिंदू संस्कृति और इतिहास के अनेक प्रमाण मौजूद हैं पर वहाँ की सरकारों ने उनको उपेक्षित तरीकों से पटका हुआ है। जब हमने संग्रहालय के धूप सेंकते कर्मचारियों से संग्रहालय की इन धरोहरों के बारे में बताने को कहा तो उन्होंने हमारी ओर उपेक्षा से देखकर कहा कि वहाँ पड़ी हैं, जाकर देख लो। वो तो गनीमत है कि प्रभु कृपा से ये प्रमाण बचे रह गए, वरना आतंकवादी तो इस संग्रहालय को ध्वस्त करना चाहते थे। जिससे कश्मीर के हिंदू इतिहास के सबूत ही नष्ट हो जाएँ। अब इस सबको बदलने का समय आ गया है। देशभर के लोगों को उम्मीद है कि मोदी और शाह की जोड़ी के द्वारा लिए गए इस ऐतहासिक फैसले से ऐसा मुमकिन हो पायेगा।

Monday, July 29, 2019

कर्नाटक में गिरती सरकारों का इतिहास

चार दशक पहले भारत में आयाराम-गयाराम का खेल शुरू हुआ था। जब हरियाणा में रातो-रात सरकार गिराकर विपक्ष ने इसी तरह सरकार बना ली थी। तब से आज तक देशभर में सैकडों बार विधायकों की खरीद-फरोख्त करके हर सत्तारूढ़ केंद्रीय दल ने प्रांतों की उन सरकरों को गिराया है, जहां उनके विरोधी दल की सरकारें थीं। इसमें कोई दल अपवाद नहीं है।
फिलहाल बैंगलूरू में जो हुआ, उसका भी एक लंबा इतिहास है। जिस समय रामकृष्णन हेगड़े ने कर्नाटक में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व किया था, उस समय उनके शासन की समस्त देशवासियों ने प्रशंसा की थी। श्री हेगड़े एक सुलझे हुए, काबिल और सद्व्यवहार वाले नेता थे। उन्हीं की कैबिनेट के एक मंत्री थे एच डी देवगौड़ा। जिन्होंने अपने ऐजेंडे को पूरा करने के लिए, विधायकों की एक समूह के साथ विद्रोह कर दिया और हेगड़े सरकार को गिराने में मुख्य भूमिका निभाई।
अबकी बार एस आर बोम्मई ने हेगड़े की जगह ली और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने भी सुचारू रूप से व प्रभावी ढंग से राज्य पर शासन किया। श्री देवगौड़ा जोकि 20 विधायकों के नेता थे, उनके बल पर पुनः मंत्री मंडल में शामिल कर लिये गए। एक बार फिर बिना किसी कारण के उन्होंने असंतुष्ट गतिविधियां शुरू कर दीं और श्री बोम्मई की सरकार गिरा दी।
हवाला कांड के परिणामस्वरूप जब देश की जनता ने किसी भी एक राष्ट्रीय दल को बहुमत देना उचित नहीं समझा, तब देश में दर्जनों छोटे-बड़े दलों की मिलीजुली सरकार बनी। जिसका नेतृत्व उस समय श्री देवगौड़ा ने किया। वे भारत के प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री तो वे बन गए, पर कर्नाटक का मोह नहीं छोड़ सके। वे चाहते थे कि उनकी अनुपस्थिति में कर्नाटक मुख्यमंत्री उनका ही कोई व्यक्ति बने। पर ऐसा हो न सका। उस समय जे.पी. पटेल कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने। पर यह श्री देवगौड़ा को रास नहीं आया। नतीजतन बतौर प्रधानमंत्री के भी उन्होंने अपने अनुयायियों के माध्यम से श्री पटेल की सरकार को गिराने का भरसक प्रयास किया, लेकिन असफल रहे। क्योंकि श्री पटेल ने श्री देवगौड़ा की हर चाल को मात दे दी।
बाद के दौर में जब धरम सिंह कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने तो श्री सिद्दारमैया उनके उप मुख्यमंत्री बने। श्री देवगौड़ा के सुपुत्र कुमार स्वामी, जो पहली बार विधायक चुने गये थे, बीते दिनों की याद में बेचैन हो गये। उन्हें रातदिन यही उधेड़बुन रहती थी कि कैसे में धरम सिंह की सरका गिराऊ और स्वयं मुख्यमंत्री बनूं। कर्नाटक की राजनीति से जुड़े जानकारों का कहना है कि सत्ता की चाह के लिए कुमार स्वामी, धरम सिंह और सिद्दारमैया को लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित करते रहे। फिर वे ‘जेडीएस’ से अलग हो गये और फर्जी बहाना बनाकर धरम सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापिस ले लिया और सरकार गिरा दी।
इसके बाद कुमार स्वामी ने अपने कट्टर प्रतिद्वंदियों के साथ हाथ मिला लिया। अब वे भाजपा के मात्र 30 विधायकों को साथ मिलाकर, सरकार बनाने में सफल हो गए। यह सरकार केवल 40 महीने तक ही काम कर पाई। समझौता यह हुआ था कि पहले 20 महीनों में कुमार स्वामी मुख्यमंत्री रहेंगे और बाद के 20 महीनों में भाजपा के येड्डीउरप्पा मुख्यमंत्री रहेंगे। श्री स्वामी ने कई बार जनता और धर्म गुरूओ के सामने यह वायदा भी किया था कि अपने 20 महीने के कार्यकाल को पूरा करके वे बिना शर्त भाजपा को कर्नाटक की कुर्सी सौप देंगे और भाजपा की सरकार समर्थन करेंगे। लेकिन सत्ता में अपने कार्यकाल का आंनद लेने के बाद कुमार स्वामी ने येड्डीउरप्पा को सत्ता सौंपने से इंकार कर दिया और सरकार गिरा दी।
अंततः, हर कोई यह इतिहास जानता है कि कुमार स्वामी एक बार फिर कर्नाटक के मुख्यमंत्री कैसे बने और किसी भी समय स्वेच्छा से अपना इस्तीफा देने की सार्वजनिक घोषणा करने के बावजूद उन्होंने क्या किया? पुरानी कहवत है कि, ‘जैसी करनी, वैसी भरनी’। अब अगर भाजपा ने कुमार स्वामी की सरकार, उनके विधायकों को लुभाकर या खरीदकर, गिरा दी, तो कुमार स्वामी को भाजपा से कोई शिकवा नहीं होना चाहिए। ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय’।
कहते हैं कि राजनीति, युद्ध और प्रेम में कुछ भी गलत या सही नहीं होता। इन परिस्थितियों में फंसे हुए पात्रों को साम, दाम, दंड व भेद जैसे सब हथकंडे अपनाकर अपना लक्ष्य हासिल करना जायज माना जाता है। पर लोकतंत्र के लिए यह बहुत ही कष्टप्रद स्थिति है। इससे स्पष्ट है कि जो भी विधायक, सांसद इस तरह सत्ता के लालच में दल बदल करते हैं या जो राष्ट्रीय दल इसे अंजाम देते हैं, वे सब मतदाताओं की निगाह में गुनहगार है। पर जब कुएं में ही भांग पड़ी हो, तो किसे दोष दें।
अब जब नये भारत के निर्माण का मोदी जी ने बीड़ा उठाया है, तो उन्हें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए। सभी दलों की राय लेकर कानून में कुछ ऐसी व्यवस्थाऐं करें, जिससे ये आयाराम-गयाराम की सृंस्कृति पर हमेशा के लिए विराम लग सके। एक नियम तो अवश्य ही बनना चाहिए कि जो भी विधायक या सांसद जिस राजनैतिक दल की टिकट पर चुनाव जीते, यदि उसे छोड़े, तो उसके लिए विधानसभा या संसद से इस्तीफा देना अनिवार्य हो। इससे विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त पर विराम लग जायेगा। क्योंकि कोई भी जीता हुआ प्रत्याशी इतना बड़ा जोखिम मोल नहीं लेगा। क्योंकि उसे इस बात की कोई गारंटी नहीं होगी कि वह इतनी जल्दी दल बदलकर, फिर से चुनाव जीत जाएगा।

Monday, July 8, 2019

संघ के स्वयंसेवकों से इतना परहेज क्यों?

पिछले दिनों विदेश में तैनात भारत के एक राजदूत से मोदी सरकार के अनुभवों पर बात हो रही थी। उनका कहना था कि मोदी सरकार से पहले विदेशों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि का आयोजन दूतावास के अधिकारी ही किया करते थे। लेकिन जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, तब से अप्रवासी भारतीयों के बीच सक्रिय संघ व भाजपा के कार्यकर्ता इन कार्यक्रमों के आयोजन में काफी हस्तक्षेप करते हैं और इन पर अपनी छाप दिखाना चाहते हैं। कभी-कभी उनका हस्तक्षेप असहनीय हो जाता है। सत्तारूढ़ दल आते-जाते रहते हैं। इसलिए दूतावास अपनी निष्पक्षता बनाए रखते हैं और जो भी कार्यक्रम आयोजित करते हैं, उनका स्वरूप राष्ट्रीय होता है, न कि दलीय।
इस विषय में क्या सही है और क्या गलत, इसका निर्णंय करने में भारत के नये विदेश मंत्री जयशंकर सबसे ज्यादा सक्षम हैं। क्योकि वे किसी राजनैतिक दल के न होकर, एक कैरियर डिप्लोमेट रहे हैं। कुछ ऐसी ही शिकायत देश के शिक्षा संस्थानों, अन्य संस्थाओं व प्रशासनिक ईकाईयों से भी सुनने में आ रही हैं। इन सबका कहना है कि संघ और भाजपा के कार्यकर्ता अचानक बहुत आक्रामक हो गए हैं और अनुचित हस्तक्षेप कर रहे हैं।
किसी भी शैक्षिक संस्थान, अन्य संस्थाओं या प्रशासनिक ईकाईयों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप गैर अधिकृत व्यक्तियों द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। इसके दूरगामी परिणामी बहुत घातक होते हैं। क्योंकि ऐसे हस्तक्षेप के कारण उस संस्थान की कार्यक्षमता और गुणवत्ता नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।
पर प्रश्न है कि क्या ऐसा पहली बार हो रहा? क्या पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में केंद्र या राज्यों में सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं का इसी तरह का हस्तक्षेप नहीं होता था? ये हमेशा होता आया है। सरकारी अतिथिगृहों, सरकारी गाड़ियों व विदेश यात्राओं का दुरूपयोग व सरकारी खर्च पर अपने प्रचार के लिए बड़े-बड़े आयोजन और भोज करना आम बात होती थी। यहां तक कि कई राजनैतिक दल तो ऐेसे हैं, जिनके विधायक, सांसद और कार्यकर्ता अपने क्षेत्र में पूरी दबंगाई करते रहे हैं। पर तब ऐसी आपत्ति किसी ने क्यों नहीं की? इसलिए कि कौन सत्तारूढ़ दल का बुरा बने और अपनी अच्छी पोस्टिंग खो दे? इसके लालच में वे सब कुछ सहते आऐ हैं।
आज जो लोग दखल दे रहे हैं, उनका गुंडई और दबंगई का इतिहास नहीं है, बल्कि हिंदू विचारधारा के प्रति समर्पण और संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। सदियों से दबी इन भावनाओं को सत्ता के माध्यम से समाज के आगे लाने की उनकी प्रबल इच्छा उन्हें ऐसा करने पर विवश कर रही है। लेकिन इसके पीछे उनका अध्ययन, आस्था, देशप्रेम व भारत की श्रेष्ठता को प्रदर्शित करने का मूलभाव है।
ये सही है कि उत्साह के अतिरेक में संघ और भाजपा के कार्यकर्ता कभी-कभी रूखा व्यवहार कर बैठते हैं। इस पर उन्हें ध्यान देना चाहिए। मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि संघ के कार्यकर्ताओं के त्याग, देश और धर्म के प्रति निष्ठा पर कोई प्रश्न चिह्न नहीं लगा सकता। पर उनमें से कुछ में व्याप्त आत्मसंमोहन और अंहकार विधर्मियों को ही नहीं, स्वधर्मियों को भी विचलित कर देता है। जिसका नुकसान वृह्द हिंदू समाज को सहना पड़ता है। उनके इस व्यवहार से संघ की विचारधारा के प्रति सहानुभूति न होकर एक उदासीनता की भावना पनपने लगती है।
भारत में करोड़ों लोग भारतमाता और सनातन धर्म के प्रति गहरी आस्था रखते हैं और अपना जीवन इनके लिए समर्पित कर देते हैं। पर वे जीवनभर किसी भी राजनैतिक दल या विचारधारा से नहीं जुड़ते। तो क्या उनका तिरस्कार किया जाए या उनके काम में हस्तक्षेप किया जाए अथवा उनके कार्य की प्रशंसा कर, उनका सहयोग कर, उनका दिल जीता जाए?
अभी कुछ समय पहले की बात है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत जी ने यह कहा था कि जो लोग भी, जिस रूप में, हिंदू संस्कृति के संरक्षण या उत्थान के लिए कार्य कर रहे हैं, उनका संघ के हर स्वयंसेवक को सम्मान और सहयोग करना चाहिए।
मेरा स्वयं का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है भारत माता, सनातन धर्म, गोवंश आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था और वैदिक संस्कृति में मेरी गहरी आस्था है और इन विषयों पर गत 35 वर्षों से मैं प्रिंट और टेलीवीजन पर अपने विचार पूरी ताकत के साथ बिना संकोच के रखता रहा हूं और शायद यही कारण है कि 20 वर्ष पहले ‘अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी’ के मुख्यालय में बैठे हुए गुलाम नवी आजाद ने राजीव शुक्ला से एकबार पूछा कि ‘‘क्या विनीत नारायण संघी है?’’ राजीव ने उत्तर दिया कि ‘न वो संघी हैं, न कांग्रेसी हैं। वो सही मायने में निष्पक्ष पत्रकार हैं और जो उन्हें ठीक लगता है, उसका समर्थन करते हैं और जो गलत लगता है, उसका विरोध करते हैं।’ विचारने की बात है कि हिंदू धर्म के लिए समर्पित किसी व्यक्ति को  नीचा दिखाकर, अपमानित करके, उनके अच्छे कार्यों में हस्तक्षेप करके संघ और भाजपा के कार्यकर्ता हिंदू धर्म का अहित ही करेंगे। भगवान राधाकृष्ण की लीलाभूमि ब्रज क्षेत्र में गत 17 वर्षों से हिंदू सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और सौंदर्यीकरण में जुटी ‘द ब्रज फाउंडेशन’ की टीम का गत 2 वर्षों का अनुभव बहुत दुखद रहा है। जब ईष्र्या और द्वेषवश इस टीम पर अनर्गल आरोप लगाये गये और उनके काम में बाधाऐं खड़ी की गई। जबकि इस स्वयंसेवी संस्था के कार्यों की प्रशंसा प्रधानमंत्री श्री मोदी से लेकर हर हिंदू संत और ब्रजवासी करता है। संघ व भाजपा नेतृत्व को इस पर विचार करना चाहिए कि ब्रज में ऐसा क्यों हो रहा है?

Monday, July 1, 2019

आतंकवाद और गृहमंत्री अमित शाह

संसद में राष्ट्रपति अभिभाषण पर धन्यवाद  देते हुए, भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने जितना दमदार भाषण दिया, उससे आतंकवादियों के हौसले जरूर पस्त हुए होंगे। श्री शाह ने बिना लागलपेट के दो टूक शब्दों में आतंकवादियों, विघटनकारियों और देशद्रोहियों को चेतावनी दी कि वे सुधर जाऐं, वरना उनसे सख्ती से निपटा जाऐगा।


अब
तक देश ने अमित शाह को भाजपा के अध्यक्ष रूप में देश ने देखा है इस पद रहते हुए उन्होंने एक सेनापति के रूप में अनेक चुनावी महाभारत जिस कुशलता से लड़े और जीते, उससे देश की राजीनीति में उनकी कड़ी धमक बनी है। उनके विरोधी भी यह मानते हैं कि इरादे के पक्के, जुझारू और रातदिन जुटकर काम करने वाले अमित शाह जो चाहते हैं, उसे हासिल कर लेते हैं। इसलिए दिल्ली की सत्ता के गलियारों और मीडिया के बीच यह चर्चा होने लगी है कि अमित शाह शायद कश्मीर समस्या का हल निकालने में सफल हो जाऐं। हालांकि इस रास्तें में चुनौतियाँ बहुत हैं।

गृहमंत्री श्री शाह ने अपने भाषण में यह साफ कहा कि आतंकवादियों को मदद पहुँचाने वालों या शरण देने वालों को भी बख्शा नहीं जाएगा। उल्लेखनीय है कि कश्मीर के खतरनाक आतंकवादी संगठनहिजबुल मुजाईदीनको दुबई और लंदन से रही अवैध आर्थिक मदद का खुलासा 1993 में मैंने ही अपनी विडियो समाचार पत्रिकाकालचक्रके 10वें अंक में किया था। इस घोटाले की खास बात यह थी कि आतंकवादियों को मदद देने वाले स्रोत देश के लगभग सभी प्रमुख दलों के बड़े नेताओं और बड़े अफसरों को भी यह अवैध धन मुहैया करा रहे थे। इसलिए सीबीआई ने इस कांड को दबा रखा था। घोटाला उजागर करने के बाद मैंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और आतंकवादियों को रही आर्थिक मदद के इस कांड की जांच करवाने को कहा।

सर्वोच्च अदालत ने मेरी मांग का सम्मान किया और भारत के इतिहास में पहली बार अपनी निगरानी में इस कांड की जांच करवाई। बाद में यही कांडजैन हवाला कांडके नाम से मशहूर हुआ। जिसने भारत की राजनीति में भूचाल ला दिया। पर मेरी चिंता का विषय यह है कि इतना सब होने पर भी इस कांड की ईमानदारी से जांच आज तक नहीं हुई और यही कारण है कि आतंकवादियों को हवाला के जरिये, पैसा आना जारी रहा और आतंकवाद पनपता रहा।

उन दिनों हॉंगकॉंग सेफार ईस्र्टन इकोनोमिक रिव्यूके संवाददाता नेहवाला कांडपर मेरा इंटरव्यू लेकर कश्मीर में तहकीकात की और  फिर जो रिर्पोट छपी, उसका निचोड़ यह था कि आतंकवाद को पनपाए रखने में बहुत से प्रभावशाली लोगों के हित जुड़े हैं। उस पत्रकार ने तो यहां तक लिखा कि कश्मीर में आतंकवाद एक उद्योग की तरह है। जिसमें बहुतों को मुनाफा हो रहा है।

उसके दो वर्ष बाद जम्मू के राजभवन में मेरी वहाँ के तत्कालीन राज्यपाल गिरीश सक्सैना से चाय पर वार्ता हो रही थी। मैंने उनसे आतंकवाद के बारे में पूछा, तो उन्होंने अंग्रेजी में एक व्यग्यात्मक टिप्पणी की जिसका अर्थ था किमुझे ‘‘घाटी के आतंकवादियों’’ की चिंता नहीं है, मुझे ‘‘दिल्ली के आतंकवादियों’’ से परेशानी है अब इसके क्या मायने लगाए जाए?

कल ही मैंने इस सारे मुद्दे पर चर टिप्पणियाँ ट्वीटर पर की है। जिसमें मैंने गृहमंत्री को आतंकवाद के विरूद्ध युद्ध में सफलता की शुभकामनाओं के साथ इस बात का भी स्मरण दिलाया है किजैन हवाला कांडकी आज तक जांच नहीं हुई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि गृहमंत्री हवाला कारोबार को पूरी तरह से नियंत्रित करने का काम करेंगे। जिससे आतंकवाद की कमर टूट जाए। उल्लेखनीय है कि 9/11 की घटना के बाद अमरीका की खुफिया एजेंसियों और आयकर विभाग ने ऐसा सख्त जाल बिछाया कि वहाँ किसी भी आतंकवादी को हवाला के जरिये पैसा पहुँचाना नामुमकिन हो गया। नतीजतन अमरीका में 9/11 के बाद कोई उल्लेखनीय आतंकवादी घटना नहीं हुई।

अमित शाह जैसे कुशल सेनापति को किसी की सलाह की जरूरत नहीं होती। वे अपने निर्णय लेने  में स्वयं सक्षम हैं, पर फिर भी उन्हें ये सावधानी बरतनी होगी कि आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कोई निर्णंय लेने से पहले वे उन सभी लोगों से राय जरूर लें, जिनका इस समस्या से लड़ने में गत 30 वर्षों में कुछ कुछ महत्वपूर्णं योगदान रहा है। केंद्रीय खुफिया ब्यूरो के पुराने निदेशक ही नहीं, जम्मू कश्मीर में नौकरी कर चुके स्वच्छ छबि वाले पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से भी अमित शाह जी को बात करनी चाहिए। ताकि एक ऐसी रणनीति बने, जो कारगर भी हो और उसमें जानमाल की कम से कम हानि हो।

अगर अमित शाह 72 साल से लटकी हुई कश्मीर की समस्या को हल करवाने में सफल हो जाते हैं, तो वे एक बड़ा इतिहास रचेंगे।