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Monday, November 12, 2018

खेमों में न बँटें बुद्धिजीवी और समाज के पहरूआ

जब भी देश में लोकतांत्रिक मूल्यों के पतन की बात होती है, तो एक से बढ़कर एक विद्वान, विचारक, समाज सुधारक और पत्रकार ये कहते नहीं थकते कि हमारी राजनैतिक व्यवस्था पर अपराधी हावी हो गऐ हैं। चुनाव ईमानदारी के पैसे से नहीं जीता जा सकता। चुनाव जीतने के लिए धनबल, बाहुबल और छलबल की आवश्यक्ता होती है। राजनेताओं में वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं है। वे बेपैंदी के लोटे हो गऐ हैं। मोटे पैसे लेकर दल बदलना आम बात हो गई है। भ्रष्टाचार के मामलों पर कोई भी दल या सरकार ठोस कदम नहीं उठाना चाहती। भ्रष्टाचार के बड़े घोटालों में तो पक्ष और विपक्ष की साझेदारी रहती है। सत्तारूढ़ दल मोटा कमीशन खाता है और विपक्षी दल पहले शोर मचाते हैं, फिर अपनी कीमत वसूल कर चुप हो जाते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार सुरसा की जीभ की तरह बढ़ता जा रहा है और कोई राजनैतिक दल इसे रोकना नहीं चाहता। हर चुनाव के पहले सभी विपक्षी दल सत्तारूढ़ दल पर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े आरोप लगाते हैं, पर खुद सत्ता में आते ही वही सब करने लगते हैं, जिसे खत्म करने का वायदा करके वो चुनाव जीतते हैं। कोई भी राजनैतिक दल इसका अपवाद नहीं है।


देश के विश्वविद्यालयों में और पढ़े-लिखे लोगों की बैठकों में अक्सर देश की दुर्गति पर चिंता व्यक्त की जाती है। बड़ी उत्तेजक बहसें होती हैं। कभी-कभी तनातनी भी हो जाती है। पर इन्हीं लोगों को जब विपरीत परिस्थिति का सामना पड़ता है, तो उनके नैतिक मूल्य धरे रह जाते हैं। वे वही करते हैं, जिसकी वे आम जीवन में निंदा करते नहीं थकते। किसी एक विचारधारा पर समर्पित बुद्धिजीवी, अपनी विचारधारा को मानने वाले नेताओं में दोष नहीं देखना चाहते और हर बात का ठीकरा विपक्षी दलों के माथे पर थोंप देते हैं।

अक्सर सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय देश की गिरती स्थिति पर कठोर और बेबाक टिप्पणियां  करते हैं और केंद्रीय व प्रांतीय सरकारों को लताड़ते हैं। जबकि न्यायपालिका में नीचे से ऊपर तक व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए वे कोई सख्त कदम नहीं उठाते। अगर न्यायपालिका ही पूरी तरह ईमानदार और निष्पक्ष हो जाए, तो देश की आधी समस्याऐ तो बिना प्रयास के हल हो सकती है। प्रश्न है कि जब इन न्यायधीशों को सारी सुविधाऐं और सुरक्षा सहज उपलब्ध हैं, तो फिर ये कड़े निर्णंय लेने से क्यों डरते हैं? क्यों नहीं यही ठोस पहल करके समाज के लिए आर्दश स्थापित करते हैं? आखिर इस देश की सवा सौ करोड़ जनता उन्हें न्यायमूर्ति नहीं बल्कि न्याय देने वाला भगवान मानती है। फिर भगवान ही अगर राज्यपाल या सांसद बनने के मोह में न्यायमूर्ति पद की गरिमा का ध्यान न रखे, तो समाज के पतन के लिए कौन दोषी है?

समाज के हर वर्ग की गतिविधियों पर नजर रखने वाले और प्रशासकों को हमेशा सवालों के घेेरे में लपेटने वाले मीडियाकर्मी क्या किसी से कम हैं? आज देश में कितने मीडियाकर्मी हैं, जो दावे से यह सिद्ध कर सकें कि उन्होंने कभी किसी नेता या अफसर की दी हुई मंहगी शराब नहीं पी? उनकी दावतें नहीं उड़ाई? उनसे किसी खास विषय पर रिर्पोट लिखने की एडवांस रकम नहीं मांगी? सत्ता पक्ष के साथ मिलकर कोई दलाली नहीं की? किसी की ब्लैकमेलिंग नहीं की? और एक व्यक्ति को लाभ पंहुचाने के लिए उसके विरोधी का चरित्र हनन करने की फीस लेकर इकतरफा रिपोर्टिंग नहीं की?

कितने व्यापारी और उद्योगपति हैं, जो ये दावे से कह सकते हैं कि उनकी आर्थिक प्रगति के पीछे उनकी कड़ी मेहनत और वर्षों बहाया गया खून-पसीना है? कितने व्यापारी और उद्योगपति यह दावे से कह सकते हैं कि उन्होंने अपने कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए नाजायज तरीकों को इस्तेमाल नहीं किया?

कितने प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी हैं, जो ये दावा कर सकते हैं कि उन्होंने ताकतवर पद पाने के लिए अपने राजनैतिक आकांओं की चप्पल नहीं उठाई? कितने दावे से कह सकते हैं कि उन्होंने अपने राजनैतिक आकांओं के हित के लिए सरकारी संसाधनों का दुरूपयोग नहीं किया? कितनों ने अपने कर्मचारियों का शोषण नहीं किया?

कितने शिक्षक ऐसे हैं, जिन्होंने तन और मन से अपने विद्वार्थियों को ज्ञान देने और उनका चरित्र निर्माण करने के लिए जीवन में बलिदान किऐ हैं ? कितने शिक्षक ऐसे हैं, जो ये दावा कर सकते हैं कि उन्होंने अपने विद्यार्थियों के साथ शिक्षा का व्यवसाय नहीं किया?

अगर हर ओर उत्तर हताशा करने वाले हैं, तो समाज और देश कैसे सुधरेगा? कोई डोनाल्ड ट्रंप या इमरान खान तो हमारी दशा, अर्थव्यवस्था, राजनीतिक, प्रशासनिक, शिक्षा व स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने आयेगा नहीं। यह काम हमें ही करना होगा। जैसे हम अपने घर का कूड़ा साफ करने में हिचकते नहीं, वैसे ही अपने देश को अपना परिवार मानकर, यदि हम अपने क्षेत्र को सुधारने का संकल्प ले लें, तो हमें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। अन्यथा ये सारी चिंता घड़ियाली आँसू से ज्यादा कुछ नहीं है। हमें अपने मन में झांककर यह सोचना होगा कि हमारे लिए जीवन में क्या बड़ा है, स्वार्थ या परमार्थ?

Monday, November 5, 2018

पटाखों बिना कैसे मनाऐं दीपावली?


सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और सिर्फ दो घंटे का समय दिया गया है, जिसमें पटाखें चलाऐ जा सकते हैं। इस आदेश को लेकर पटाखा व्यवसाय से जुड़े हुए सभी व्यापारी परेशान हैं कि अब उनका व्यापार कैसे चलेगा? कुछ हिंदुओं ने भी यह हल्ला मचाया है कि हिंदू धर्म के पर्वों में ही क्यों पाबंदी लगाई जाती है? मुसलमानों की ‘शब-ए-बारात’, ईसाईयों की ‘क्रिसमस’, या ‘न्यू इयर्स डे’ आदि में पटाखे छुड़ाने पर पाबंदी क्यों नहीं लगाई जाती? जबकि आवश्यक्ता इस बात की है कि भारत में पटाखों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लग जाना चाहिए। क्योंकि देश में पहले से पर्यावरण प्रदूषण की वजह से बुरा हाल हो रहा है और पटाखों से निकलने वाली प्रदूषित गैस पर्यावरण को और अधिक नुकसान पहुंचाएगी।

आतिशबाजी’ सनातन धर्म के शब्दकोश में कोई शब्द नहीं है। यह पश्चिम ऐशिया से आयातित है, क्योंकि गोला-बारूद भी भारत में वहीं से ‘मध्ययुग’ में आया था। इसलिए दीपावली पर पटाखों को प्रतिबंधित करके, सर्वोच्च न्यायालय ने उचित निर्णंय लिया। हम सभी जानते हैं कि पर्यावरण, स्वास्थ, सुरक्षा व सामाजिक कारणों से पटाखे हमारी जिंदगी में जहर घोलते हैं। इनका निर्माण व प्रयोग सदा के लिए बंद होना चाहिए। यह बात पिछले 30 वर्षों से बार-बार उठती रही है।

हमारी सांस्कृतिक परंपरा में हर उत्सव व त्यौहार, आनंद और पर्यावरण की शुद्धि करने वाला होता है। दीपावली पर तेल या घी के दीपक जलाना, यज्ञ करके उसमें आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां डालकर वातावरण को शुद्ध करना, द्वार पर आम के पत्तों के तोरण बांधना, केले के स्तंभ लगाना, रंगोली बनाना, घर पर शुद्ध पकवान बनाना, मिल बैठकर मंगल गीत गाना, धर्म चर्चा करना, बालकों द्वारा भगवान की लीलाओं का मंचन करना, घर के बहीखातों में परिवार के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर लेकर, समसामयिक अर्थव्यवस्था का रिकार्ड दर्ज करना जैसी गतिविधियों में दशहरा-दीपावली के उत्सव आनंद से संपन्न होते आऐ हैं। जिनसे परिवार और समाज में नई ऊर्जा का संचार होता है।

गनीमत है कि भारत के ग्रामों में अभी बाजारू संस्कृति का वैसा व्यापक दुष्प्रभाव नहीं पड़ा, जैसा शहरों पर पड़ा है। अन्यथा सब चैपट हो जाता। ग्रामीण अंचलों में आज भी त्यौहारों को मनाने में भारत की माटी का सोंधापन दीखता है। यह स्थिति बदल रही है। जिसे ग्रामीण युवाओं को रोकना है।

बाजार के प्रभाव में आज हमने अपने सभी पर्वों को विद्रूप और आक्रामक बना दिया है। अब उनको मनाना, अपनी आर्थिक सत्ता का प्रदर्शन करना और आसपास के वातावरण में हलचल पैदा करने जैसा होता है। इसमें से सामूहिकता, प्रेम-सौहार्द और उत्सव के उत्साह जैसी भावना का लोप हो गया है। रही सही कसर चीनी सामान ने पूरी कर दी। त्यौहार कोई भी हो, उसमें खपने वाली सामग्री साम्यवादी चीन से बनकर आ रही है। उससे हमारे देश के रोजगार पर भारी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।

मिट्टी के बने दीऐ, मिट्टी के खिलौने, मिट्टी की बनी गूजरी व हटरी आदि आज भी हमारे घरों में दीवाली की पूजा का अभिन्न अंग होते हैं, पर शहरीकरण की मार से बड़े शहरों में इनका उपयोग समाप्त होता जा रहा है। अगर हम अपनी इस रीति को जीवित रखें, तो हमारे कुम्हार भाईयों की पेट पर लात नहीं पड़ेगी।

हम अपने बच्चों का जन्मदिन (हैपी बर्थ डे) केक काटकर मनाते हैं। जिसका हमारी मान्यताओं और संस्कृति से कोई नाता नहीं है। जबकि हमें उनका तिलक कर, आरती उतार कर या आर्शीवाद या मंगलाचरण गायन कर उनका जन्मदिन मनाना चाहिए। अगर हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी भारतीय संस्कृति पर गर्व करे, परिवार में प्रेम को बढ़ाने वाली गतिविधियां हों, बच्चे बड़ों का सम्मान करें, तो हमें अपने समाज में पुनः पारंपरिक मूल्यों की स्थापना करनी होगी। वो जीवन मूल्य, जिन्होंने हमारी संस्कृति को हजारों साल तक बचाकर रखा, चाहे कितने ही तूफान आये। पश्चिमी देशों में जाकर बस गए, भारतीय परिवारों से पूछिऐ-जिन्होंने वहां की संस्कृति को अपनाया, उनके परिवारों का क्या हाल है और जिन्होंने वहां रहकर भी भारतीय सामाजिक मूल्यों को अपने परिवार और बच्चों पर लागू किया। वे कितने सधे हुए, सुखी और संगठित है। तनाव, बिखराव तलाक, टूटन ये आधुनिक जीवन पद्धति के ‘प्रसाद’ है। इनसे बचना और अपनी जड़ों से जुड़ना, यह भारत के सनातनधर्मियों का मूलमंत्र होना चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों से टेलीविजन चैनलों पर साम्प्रदायिक मुद्दों को लेकर आऐ दिन तीखी झरपें होती रहती है। जिनका कोई अर्थ नहीं होता। उनसे किसी भी सम्प्रदाय को कोई भी लाभ नहीं मिलता, केवल उत्तेजना बढ़ती है। जबकि हर धर्म और संस्कृति में कुछ ऐसे जीवन मूल्य होते हैं, जिनका यदि अनुपालन किया जाए, तो समाज में सुख, शांति और समरसता का विस्तार होगा। अगर हमारे टीवी एंकर और उनकी शोध टीम ऐसे मुद्दों को चुनकर उन पर गंभीर और सार्थक बहस करवाऐं, तो समाज को दिशा मिलेगी। हर धर्म के मानने वालों को यह स्वीकारना होगा कि दूसरों के धर्म में सब कुछ बुरा नहीं है और उनके धर्म में सब कुछ श्रेष्ठ नहीं है। चूंकि हम हिंदू बहुसंख्यक हैं और सदियों से इस बात से पीड़ित रहे हैं कि सत्ताओं ने कभी हमारे बुनियादी सिद्धांतों को समझने की कोशिश नहीं की। या तो उन्हें दबाया गया या उनका उपहास किया गया या उन्हें अनिच्छा से सह लिया गया। नये माहौल में इन सवालों पर खुलकर बहस होनी चाहिए थी। जो नहीं हो रही। निरर्थक विषयों को उठाकर समाज में विष घोला जा रहा है। इसलिए इस दीपावली सब मिल बैठकर सोचें, कौन थे हम, क्या हो गये और होंगे क्या अभी।

Monday, January 8, 2018

शिक्षा में क्रांतिः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की क्रन्तिकारी पहल

भगवान श्रीकृष्ण के गुरू संदीपनि मुनि के गुरूकुल की छत्रछाया में आगामी 28 अप्रैल से ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ उज्जैन से विद्यालयी शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक क्रांति का शंखनाद् करने जा रहा है। मैकाले की ‘गुलाम बनाने वाली शिक्षा’ ने गत 200 वर्षों से भारत को इतनी बुरी तरह जकड़ रखा है कि हम उससे आज तक मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा के बोर्ड शिक्षा व्यवस्था में कोई नवीनता लाने को तैयार नहीं है। सब लकीर के फकीर बने हैं। पिछले 70 साल में हर शिक्षाविद् ने ये बात दोहराई कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली के कारण हमारी युवा पीढ़ी परजीवी बन रही है। उसमें जोखिम उठाने, हाथ से काम करने, उत्पादक व्यवसाय खड़ा करने, अपने शरीर और परिवेश को स्वस्थ रखने व अपने अतीत पर गर्व करने के संस्कार नहीं हैं। उस अतीत पर, जिसने भारत को सोने की चिड़िया बनाया था। वे आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त होकर, सरकार की बाबूगिरी को जीवन का लक्ष्य मानते हैं। ये बात दूसरी है कि सरकारी नौकरियाँ नगण्य है और आवेदकों की संख्या करोड़ों में। इससे युवाओं में हताशा, कुंठा, हीन भावना और हिंसा पनप रही हैं।
संघ से जुड़े बुद्धिजीवियों का लंबे समय से यह मानना रहा है कि जब तक भारत की शिक्षा व्यवस्था भारतीय परिवेश और मानदंडों के अनुकूल नहीं होगी, तब तक माँ भारती अपना खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त नहीं कर पायेंगी। इसके लिए एक समानान्तर शिक्षा व्यवस्था खड़ी करने की आवश्यक्ता है। जो आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी, उत्पादक, संस्कारवान व प्रखर प्रज्ञा के युवाओं को तैयार करे।
इस दिशा में अहमदाबाद के उत्तम भाई ने अभूतपूर्व कार्य किया है। हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला, साबरमती में विशुद्ध गुरूकुल शिक्षा प्रणाली से शिक्षण और विद्यार्थियों का पालन पोषण कर उत्तम भाई ने विश्व स्तर की योग्यता वाले मेधावी छात्रों को तैयार किया है। जिसके विषय में इस कालम में गत वर्षों में मैं दो लेख पहले लिख चुका हूं। जिन्हें पढ़कर, देशभर से अनेक शिक्षाशास्त्री और अभिाभावक साबरमती पहुंचते रहे हैं।
उज्जैन के सम्मेलन में इस गुरूकुल के प्रभावशाली अनुभवों और उपलब्धियों के अलावा देश के अन्य हिस्सों में चल रहे, ऐसे ही दूसरे गुरूकुलों के साझे अनुभव से प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पूरे देश में लाखों गुरूकुलों की स्थापना की तैयारी कर रहा है। जिसका एक अलग शिक्षा बोर्ड सरकारी स्तर पर भी बने, ऐसा लक्ष्य रखा गया है। जिससे इस गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था में औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था के घालमेल की संभावना न रहे। इस अनुष्ठान में वेद विज्ञान गुरूकुलम् (बंगलुरू), प्रबोधिनी गुरूकुलम्, हरिहरपुर (कर्नाटक), मैत्रेयी गुरूकुलम् (मंगलुरू), सिद्धगिरि ज्ञानपीठ (महाराष्ट्र), आदिनाथ संस्कार विद्यापीठ (चेन्नई), श्री वीर लोकशाह संस्कृत ज्ञानपीठ गुरूकुल (जोधपुर), महर्षियाज्ञवल्क्यज्ञानपीठ (गुजरात) व नेपाल के 6 गुरूकुल भी भाग ले रहे हैं। उज्जैन में इस सागर मंथन के बाद, जो अमृत कलश निकलेगा, वह पुनः स्थापित होने जा रही, भारत की गुरूकुल शिक्षा प्रणाली का आधार बनेगा।
अनादिकाल से भारतीय शिक्षा पद्धति नालंदा, तक्षशिला, वल्लभी व विक्रमशिला जैसे गुरूकुलों के कारण विश्वविख्यात रही हैं। जहां सहस्त्रों छात्र और सैकड़ों आचार्य एक साथ रहकर, अध्ययन व शिक्षण करते थे। वैदिक सनातन परंपरा के साथ ही बौद्ध और जैन मतों के गुरूकुलों का भी प्रचलन रहा। 1823 तक देश के प्रत्येक ग्राम में बड़ी संख्या में पाठशालाऐं होती थीं, जिनमें सभी वर्गों के लोगों को जीवनोपयी शिक्षा दी जाती थी। आवासीय व्यवस्था व समग्र शिक्षा से मजे हुए युवा तैयार होते थे। जो जीवन के हर क्षेत्र में अपना श्रेष्ठ योगदान करते थे।
बाद में लार्ड मैकाले ने यह अनुभव किया कि भारत की इस सशक्त शिक्षा व्यवस्था को नष्ट किये बिना भारतीयों को गुलाम नहीं बनाया जा सकता। इसलिए उसने एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था हम पर थोपी, जिसने हमें हर तरह से अंग्रेज़ियत का गुलाम बना दिया और हम आज तक उस गुलामी से मुक्त नहीं हुए।
'भारतीय शिक्षण मंडल' शिक्षा के भारतीय प्रारूप को पुनर्स्थापित करने का कार्य कर रहा है। जिससे एक बार फिर भारत के गांवों में ही नहीं, नगरों में भी, गुरूकुल शिक्षा पद्धति स्थापित हो जाऐ। जिससे बालकों का सर्वांगीर्णं विकास हो। उज्जैन में होने जा रहे गुरूकुल शिक्षा के इस कुंभ में देशभर से शिक्षाविद् और आचार्यगण भाग लेंगे। अगर इस मंथन में गुरूकुल शिक्षा व्यवस्था के प्रारूप पर आम सहमति बनती है, तो भारतीय शिक्षण मंडल इस प्रस्ताव को माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के पास लेकर जायेगा और उनसे गुरूकुल शिक्षा का एक अलग निदेशालय या बोर्ड गठित करने को कहेगा।
चूंकि मैंने स्वयं कई बार साबरमती में हेमचंद्राचार्य संस्कृत पाठशाला की गतिविधियों को वहां रहकर निकट से देखा है और उसके छात्रों के प्रदर्शन को भी देखा है, इसलिए मुझे इस सम्मेलन से बहुत आशा है। काश इसमें सहमति बने, जो शायद वहां सरसंघाचलक डा. मोहन भागवत जी की उपस्थिति और सदिच्छा  के कारण संभव होगी। इससे भारत की किशोर आबादी को बहुत लाभ होने वाला है। क्योंकि आज शिक्षा का इतना व्यवसायीकरण हो गया है कि अब शिक्षा संस्थानों में छात्रों का भविष्य नहीं बनता बल्कि उनका वर्तमान भी उनसे छीन लिया जाता है। बिरले ही हैं, जो अपनी मेधा और पुरूषार्थ से आगे बढ़ पाते हैं। जो शिक्षा संस्थान आज भी देश में अच्छी शिक्षा देने का दावा करते हैं, उनके  छात्र भी  भौतिक दृष्टि से भले ही सफल हो जाऐं, पर उनके व्यक्तित्व का विकास समग्रता में नहीं होता।

Monday, January 1, 2018

बरसाना में लठमार होली के सरकारी आयोजन से संत व ब्रजवासी चिंतित

अयोध्या में हाल में मनाई भव्य दीपावली की तर्ज पर योगी सरकार 60 करोड़ रुपया खर्च करके इस बार बरसाना की लठमार होली मनाने जा रही है। जिससे ब्रज के संत और भक्त समाज में काफी चिंता देखी जा रही है। ब्रज में माधुर्य भाव और ऐश्वर्य भाव से रसोपासना होती है। नंदगांव और बरसाने के बीच होली माधुर्य रस की उपासना का अंग है। जिसकी परंपरा 5000 वर्ष प्राचीन है। जिसकी बारीकी से जानकारी शायद उन लोगों को नहीं है, जिन्होंने योगी जी को बरसाना में भव्य होली आयोजन का सुझाव दिया। क्योंकि इस परंपरा में जो रस है, उसे स्थानीय गोस्वामी गण, उनके परिवार, संतगण व ब्रजवासी ही प्रस्तुत कर सकते हैं। बाहर से आने वाले व्यवसायी कलाकार नहीं। जैसी घोषणा हुई है।

इस रसोपासना के अंतर्गत होली एक महीने चलती है और हर दिन उसका स्वरूप और भाव भिन्न होता है। इसके साहित्य का गहरा सागर है। रंगीली होली उसका एक छोटा भाग है। जो पहले ही विश्व प्रसिद्ध है और इसे देखने दूर-दूर से भक्त और अंतराष्ट्रीय मीडिया हर वर्ष यहां आता है। पर इसके स्वरूप से कभी छेड़-छाड़ नहीं की गई। आज से 43 वर्ष पूर्व उ.प्र. के राज्यपाल डा. एम चेन्ना रेड्डी प्रतिवर्ष श्रद्धा से रंगीली होली देखने बरसाना आते थे। तब से सदा ही ऐसे विशिष्ट अतिथि यहां आते रहे हैं। पर जिस तरह का आयोजन इस वर्ष योगी सरकार करने जा रही है, उससे नंदगांव और बरसाना का संत, भक्त व गोस्वामी समाज ही नहीं बल्कि पूरा ब्रजमंडल बहुत चिंतित है।

रमणरेती, गोकुल, के संत काष्र्णि गुरूशरणानंद जी के शिष्य व ब्रज की संस्कृति पर कई दशकों से गहराई से शोध करने वाले, इसके संरक्षण के अंतिम स्तंभ, श्री मोहन स्वरूप भाटिया (मथुरा) का कहना है कि ‘‘इस आयोजन से बरसाना की होली की परंपरा को भारी ठेस  लगेगी और संतो, भक्तों और रसिकाचार्यों की उपेक्षा होगी। किराये के कलाकार और तमाशे बरसाने की होली का रंग-भंग कर देंगें। उ.प्र. सरकार को अगर ऐसा आयोजन करना ही है, तो लखनऊ या दिल्ली में करे। बरसाना की होली का विनाश न करे।’’

उधर पीली पोखर (बरसाना) पर रहने वाले बाबा महाराज भी इस घोषणा से व्यथित हैं। बाबा का कहना है कि, ’’इस पूरे आयोजन से बरसाना की होली का रस भंग हो जायेगा, जो माधुर्य उपासना की एक गहरी परंपरा का अंग है। इस आयोजन से संतों, गोस्वामीगणों, भक्तों और ब्रजवासियों का अपमान होगा और उनको भारी ठेस लगेगी।’’

बरसाना के क्रांतिकारी युवा पद्म फौजी का कहना है कि, ‘‘जितना रूपया इस आयोजन में खर्च किया जायेगा, उतने में तो पूरा बरसाना चमक सकता है, अगर संजीदगी से योजना बनाई जाए तो। पर वैसे नहीं जैसे अभी काम चल रहा है।’’ बरसाना के किसान भी इस आयोजन के विरूद्ध हैं और बार-बार प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं, पर उनकी सुनी नहीं जा रही। उनकी खड़ी फसल पर बुल्डोजर चल रहे हैं।

जब से यह समाचार प्रसारित हुआ है, पूरे ब्रजमंडल के अनेक लोगों ने इसका विरोध प्रगट किया और मुख्यमंत्री तक उनकी पीड़ा पहुंचाने का अनुरोध किया। जब ब्रजसेवा के हमारे प्रेरणा स्त्रोत बरसाना के विरक्त संत श्रद्धेय श्री रमेश बाबा से मैंने पूछा कि इस विषय में उनका क्या विचार है, तो वे बोले-
 "कबिरा तेरी झोपड़ी,
गल कटियन के पास।
जो करेगा सो भरेगा,
तू काहे होत उदास।।"

वैसे भी बाबा कहते हैं कि ब्रज में तो श्री कृष्ण भी ऐश्वर्य त्यागकर गवारिया बनकर रहे। उसी भाव से आना चाहिए। यहां तो हिंदुस्तान का बादशाह अकबर भी राजसी भेष त्यागकर स्वामी हरिदास जी के दर्शन करने आया था।

योगी जी ने सदियों से उपेक्षित अयोध्या में जिस उत्साह से दीपावली मनाई, उसकी प्रशंसा मैंने अपने पिछले लेख में की थी। पर ब्रज तो पहले ही विश्वभर में आकर्षण का केंद्र है और इसकी उपेक्षा अयोध्या की तरह नहीं हुई है। इसलिये ब्रज का भाव समझे बिना, ब्रज के विकास की बड़ी- बड़ी योजनाऐं बनवाना और ऐसे भव्य कार्यक्रम आयोजित करना, यहां की समृद्ध भक्ति परंपराओं का स्थाई विनाश करने से कम नहीं होगा।

अगर बरसाना की मौजूदा सकरी गलियों  में यह विशाल आयोजन किया जाता है, तो भीड़ में दुर्घटना की पूरी संभावना रहेगी। अगर आयोजन के लिए फरमान जारी कर रंगीली गली की तोड-फोड़ की जाती है, तो बरसाना का मौलिक स्वरूप नष्ट हो जायेगा। जिसे देखने दुनिया भर से भक्त यहाँ आते हैं। इसलिये ब्रजवासियो की योगी जी से प्रार्थना है कि होली का प्रस्तावित आयोजन बरसाना के किसी विशाल मैदान में  करें तो उनका उद्देश्य भी पूरा हो जायेगा और संतगणों, भक्तगणों व ब्रजवासियों की भावना भी आहत नहीं होगी।

चिंता की बात है कि जिन लोगों से योगी सरकार ब्रज विकास की योजनाऐं बनवा रही है, वे बिना ब्रज की संस्कृति और भावना को समझे, उत्साह के अतिरेक में, वह सब कर रहे हैं, जिससे ब्रज संस्कृति का संरक्षण नहीं होगा, विनाश ही होगा। इसके अनेक प्रमाण हैं। गोवर्धन परिक्रमा के लिए छह महीने पहले ऐसे ही हजारो-करोड़ रूपये के एक बड़े कुप्रयास के विरूद्ध समय रहते मैंने योगी जी को सावधान किया था। उस पर मेरा यहां लेख भी छपा था। आभारी हूं कि उन्होंने तुरंत  हमारी  चिंता पर ध्यान दिया और उसे वहीं रोक दिया। वरना जयपुर के एक स्थापित घोटालेबाज के हाथों गोवर्धन की परिक्रमा का विनाश हो जाता। आशा है वे अब भी हमारी विनम्र प्रार्थना पर गंभीरता से ध्यान देंगे और इस आयोजन से जुड़े निहित स्वार्थों के प्रभाव में आए बिना ब्रज की हजारों वर्ष प्राचीन संस्कृति का सम्मान करते हुए उचित निर्णय लेंगे।

Monday, August 28, 2017

कब मोह भंग होगा हमारा छद्म गुरूओं से

एक ओर आत्मघोषित गुरू का भांडाफोड़ हुआ। कल तक ऐश्वर्य की गोद में रंग-रंगेलिया मनाने वाला ‘भक्तों का भगवान’ अब बाकी की जिंदगी, आसाराम और रामलाल की तरह जेल की सलाखों के पीछे काटेगा। सच्चे भक्तों की पीड़ा, मैं समझ सकता हूँ, क्योंकि मैंने कुछ ऐसा मंजर बहुत करीब से देखा है और उसके खिलाफ देशभर में, आवाज भी बुलंद की थी। जब मुझे पता चला कि अपनी पूजा करवाने गुरूओं का इतिहास व व्यभिचार और दुराचरण से भरा हुआ है।  सन्यास का वेश धारणकर, शिष्यों के पुत्र-पुत्रियों और पत्नियों से नाजायाज संबंध बनाने वाले, ये तथाकथित सन्यासी, अब गृहस्थ जीवन जी रहे हैं। उनमें से एक, पूर्व सन्यासी रहे, व्यक्ति से मैंने पूछा कि क्यों तो तुमने सन्यास लिया और क्यों तुम्हारा पतन हो गया? उसने सीधा उत्तर दिया कि अपने गुरू भाईयों का ऐश्वर्य और उनके सैकड़ों-हजारों चेलों की उनके प्रति अंधभक्ति देख, मेरी भी इच्छा गुरू बनने की हुई और मैंने सन्यास ले लिया। दिनभर तो मैं किसी तरह, अपने पर नियन्त्रण रख लेता, पर रात नहीं कटती थी। रात को कामवासना इतनी प्रबल हो जाती थी कि मुझसे नहीं रहा गया। उसने तो अपना गुनाह कबूल कर लिया। पर शेर की खाल में आज भी हजारों भेड़िये, देशभर में आध्यात्मिक गुरू बने बैठे हैं। जो भोली जनता की भावुकता का नाजायज लाभ उठाकर, उसे हर तरह से लूटते हैं। तन-मन-धन गुरू पर न्यौछावर कर देने वाले भक्तों को, जब पता चलता है कि जिसे गुरू रूपी भगवान माना, वो लंपट धूर्त निकला, तो  वे अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं। वे या तो धर्म विमुख हो जाते हैं या अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं। सिरसा में जो हुआ, उसके पीछे भक्तों की स्वभाविक प्रतिक्रिया कम और बाबा के पाले हुए बदमाशों की हिंसक रणनीति ज्यादा थी।

दरअसल छद्म भेष धरकर इन आत्मघोषित गुरूओं ने धर्म की परिभाषा बदल दी है। कलियुग के इन गुरूओं ने, उस दोहे का भरपूर दुरूपयोग किया है, जिसमें कहा गया, ‘‘गुरू गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पांय। बलिहारी गुरू आपने, जिन गोविंद दियो बताय।’’ ध्यान देने वाली बात ये है कि यहां उस गुरू को भगवान से ज्यादा महत्व देने की बात कही गई है, जो हमें भगवान से मिलाता है। पर आत्मघोषित गुरू तो खुद को ही भगवान बना बैठे हैं। मजे की बात यह है कि जब कभी भगवान धरती पर अवतरित हुए, तो उन्होंने मानव सुलभ लीलाऐं की, किंतु खुद को भगवान नहीं बताया। आज के धनपिपासु, बलात्कारी, हत्यारे और षड्यन्त्रकारी आत्मघोषित गुरू तो बाकायदा खुद को भगवान बताकर, अपना प्रचार करवाते हैं। इन्होंने तो गुरू शब्द की महिमा को ही लज्जित कर रखा है।

इसी कॉलम में जब-जब धर्म की हानि करने वाले ऐसे गुरूओं का पतन होता है, तब-तब मैं इन्हीं बिंदुओं को उठाता हूँ। इस आशा में कुछ पाठक तो ऐसे होंगे, जो इस गंभीर विषय पर सोचेंगे। दरअसल, धर्म का धंधा केवल भारत में चलता हो या केवल हिन्दू कथावाचक या महंत ही इसमें लिप्त हों यह सही नहीं है। तीन दिन तक मैं इटली के रोम नगर में ईसाईयों के सर्वोच्च आध्यात्मिक केन्द्र वेटिकन सिटी में पोप और आर्क बिशपों के आलीशान महल और वैभव के भंडार देखता रहा। एक क्षण को भी न तो आध्यात्मिक स्फूर्ति हुई और न ही कहीं भगवान के पुत्र माने जाने वाले यीशू मसीह के जीवन और आचरण से कोई संबध दिखाई दिया। कहां तो विरक्ति का जीवन जीने वाले यीशू मसीह और कहां उनके नाम पर असीम ऐश्वर्य में जीने वाले ईसाई धर्म गुरू? पैगम्बर साहब हों या गुरू नानक देव, गौतम बुद्ध हो या महावीर स्वामी, गइया चराने वाले ब्रज के गोपाल कृष्ण हो या वनवास झेलने वाले भगवान राम, कैलाश पर्वत पर समाधिस्थ भोले शंकर हो या कुशा के आसन पर भजन करने वाले हनुमान जी सबका जीवन अत्यन्त सादगी और वैराग्य पूर्ण रहा है। पर धर्म के नाम पर धंधा करने वालों ने उनके आदर्शों को ग्रन्थों तक सीमित कर साम्राज्य खड़े कर लिए हैं। कोई धर्म इस रोग से अछूता नहीं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि हर धर्म क्रमशः भौतिकता की ओर पतनशील हो जाता है।

संत वो है जिसके पास बैठने से हम जैसे गृहस्थ विषयी भोगियों की वासनाएं शान्त हो जाए, भौतिकता से विरक्ति होने लगे और प्रभु के श्री चरणों में अनुराग बढ़ने लगे। पर आज स्वंय को ‘संत‘ कहलाने वाले क्या इस मापदंड पर खरे उतरते हैं ? जो वास्तव में संत हैं उन्हें अपने नाम के आगे विशेषण लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। क्या मीराबाई, रैदास, तुलसीदास, नानक देव, कबीरदास जैसे नाम से ही उनके संतत्व का परिचय नहीं मिलता ? इनमें से किसी ने अपने नाम के पहले जगतगुरू, महामंडलेश्वर, परमपूज्य, अवतारी पुरूष, श्री श्री 1008 जैसी उपाधियां नहीं लगाईं। पर इनका स्मरण करते ही स्वतः भक्ति जागृत होने लगती है। ऐसे संतों की हर धर्म में आज भी कमी नहीं है। पर वे टीवी पर अपनी महानता का विज्ञापन चलवाकर या लाखों रूपया देकर अपने प्रवचनों का प्रसारण नहीं करवाते। क्योंकि वे तो वास्तव में प्रभु मिलन के प्रयास में जुटे हैं ? हम सब जानते हैं कि घी का मतलब होता है गाय या किसी अन्य पशु के दूध से निकली चिकनाई । अब अगर किसी कम्पनी को सौ फीसदी शुद्ध घी कहकर अपना माल बेचना पड़े तो साफ जाहिर है कि उसका दावा सच्चाई से कोसों दूर है। क्योंकि जो घी शुद्ध होगा उसकी सुगन्ध ही उसका परिचय दे देगी। सच्चे संत तो भौतिकता से दूर रहकर सच्चे जिज्ञासुओं को आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग बताते हैं। उन्हें तो हम जानते तक नहीं क्योंकि वे चाहते ही नहीं कि कोई उन्हें जाने। पर जो रोजाना टीवी, अखबारों और होर्डिगों पर पेप्सी कोला की तरह विज्ञापन करके अपने को संत, महामंडलेश्वर, जगद्गुरू या राधे मां कहलवाते हैं उनकी सच्चाई उनके साथ रहने से एक दिन में सामने आ जाती है। बशर्ते देखने वाले के पास आंख हों।

जैसे-जैसे आत्मघोषित धर्माचार्यो पर भौतिकता हावी होती जाती है, वैसे-वैसे उन्हें स्वंय पर विश्वास नहीं रहता इसलिए वे भांति-भांति के प्रत्यय और उपसर्ग लगाकर अपने नाम का श्रंगार करते हैं। नाम का ही नहीं तन का भी श्रंगार करते हैं। पोप के जरीदार गाउन हो या रत्न जटित तामझाम, भागवताचार्यो के राजसी वस्त्र और अलंकरण हों या उनके व्यास आसन की साज सज्जा, क्या इसका यीशू मसीह के सादा लिबास या शुकदेव जी के विरक्त स्वरूप से कोई सम्बन्ध है ? अगर नहीं तो ये लोग न तो अपने इष्ट के प्रति सच्चे हैं और न ही उस आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति जिसे बांटने का ये दावा करते हैं ? हमने सच्चे संतों के श्रीमुख से सुना है कि जितने लोग आज हर धर्म के नाम पर विश्वभर में अपना साम्राज्य चला रहे हैं, अगर उनमें दस फीसदी भी ईमानदारी होती तो आज विश्व इतने संकट में न होता।

गुरमीत राम रहीम सिंह का कोई अपवाद नहीं है। वो भी उसी भौतिक चमक दमक के पीछे भागने वाला शब्दों का जादूगर है, जो शरणागत की भावनाओं का दोहन कर दिन दूनी और रात चैगुनी सम्पत्ति बढ़ाने की दौड़ में लगा रहा है। जिसके जिस्म पर लदे करोड़ों रूपए के आभूषण, फिल्मी हीरो की तरह चाल-ढाल, भड़काऊ पाश्चात्य वेशभूषा और शास्त्र विरूद्ध आचरण देखने के बाद भी उसके अनुयायी क्यों हकीकत नहीं जान पाते? जब-जब आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वालों का संबध ऐश्वर्य से जुड़ा है तब-तब उस धर्म का पतन हुआ है। इतिहास इसका साक्षी है। यह तो उस जनता को समझना है जो अपने जीवन के छोटे-छोटे कष्टों के निवारण की आशा में मृग-मरीचिका की तरह रेगिस्तान में दौड़ती है, कि कहीं जल मिल जाए और प्यास बुझ जाए। पर उसे निराशा ही हाथ लगती है। पुरानी कहावत है ‘पानी पीजे छान के, गुरू कीजे जान के‘।

Monday, July 31, 2017

जमीन से जुड़े शहरी विद्यालयों के छात्र

पिछले हफ्ते हमने ब्रज के एक गांव में पौराणिक नाग-पंचमी का मेला आयोजित किया। जिसमें पिछले 3 वर्षों से लगभग बीस हजार ब्रजवासी उत्साह से भाग ले रहे हैं। हमें लगता था कि टी.वी. सीरियलों और यू-ट्यूब के युग में सांस्कृतिक परंपराएं लुप्त हो रही हैं। पर इस तरह के कई मेले, ब्रज में दशाब्दियों बाद दोबारा शुरू करने के बाद, हमें विश्वास हो गया कि लोक संस्कृति की जड़े गहरी हैं। यह सही है कि आज गांवों की शादियों में डी.जे. के कर्कश शोर ने महिलाओं के सारगर्भित लोकगीतों को दबा दिया है। पर अवसर मिलने पर वे स्वयं स्फुरित हो जाते हैं। उनका भाव और शैली मन को छू लेती है। ऐसे मेलों में लोक कलाकारों और ग्रामीण प्रतिभाओं को उभरने का मौका मिलता है। तब पता चलता है कि ‘इंडियन आइडियल’ या ‘डांस इंडिया डांस’ जैसे टीवी शो भी अभी गांवों को प्रदूषित नहीं कर पाऐ हैं। गांव के बच्चे कहीं ज्यादा समझदारी से और सार्थक विषयों पर अपनी बात रखने को उत्साहित रहते हैं।

इस बार हमने एक प्रयोग और किया। गांव के इस लोकप्रिय मेले में मथुरा शहर के प्रमुख विद्यालयों के छात्र-छात्राओं को अपनी-अपनी प्रस्तुतियां देने को आमंत्रित किया। इसका बहुत सुखद अनुभव हुआ और कई लाभ प्राप्त हुए। सुखद अनुभव, इस बात का कि आधुनिक शिक्षा पा रहे, हमारे शहरी बच्चे भी सही प्रशिक्षण और प्रोत्साहन मिलने पर सांस्कृतिक, सामाजिक या पर्यावरण संबंधी विषयों पर कितनी स्पष्ट समझ और सोच रखते हैं। उनकी प्रस्तुतियों ने न सिर्फ हजारों ग्रामवासियों का मन मोहा बल्कि कई सार्थक संदेश भी दिये। जिस आत्मविश्वास के साथ इन शहरी बच्चों ने देहाती माहौल में, बिना संकोच के, अपनी प्रस्तुतियां दीं, उससे ग्रामीण बच्चों को भी बहुत प्रेरणा मिली।

इस दिशा में कई अभिनव प्रयोग देश में चल रहे हैं। ‘प्रदान’, ‘अजय पीरामल फाउंडेशन’, ‘इच वन-टीच वन’ जैसी कई संस्थाऐं मुहिम चलाकर, ग्रामीण विद्यालयों में शहरी स्वयंसेवक भेज रही हैं। जो अपने व्यापक अनुभव को गाँव के सीमित दायरे में रहने वाले, शिक्षकों और विद्यार्थियों से खुलकर बांट रहे हैं। शुरू की हिचक के बाद, उन्हें ग्रामीण विद्यालय स्वीकार कर लेते हैं। फिर देखते ही देखते, पूरे विद्यालय के वातावरण में बहुत बड़ा परिवर्तन आ जाता है। ऐसा परिवर्तन, जो मात्र सरकारी नीतियों से दशाब्दियों में नहीं आता। इसलिए चीन के कामरेड माओ की तरह मोदी जी को ‘मानव संसाधन मंत्रालय’ में एक नीतिगत शुरूआत करवानी चाहिए। जिसके तहत हर शहरी स्कूल के बच्चों तथा अध्यापकों को महीने में एक दिन अपनी गतिविधियां, आसपास के देहातों के विद्यालयों आयोजित करना अनिवार्य हो। इससे दो लाभ होंगे, एक तो ग्रामीण विद्यालय को शहरी विद्यालय के मुकाबले अपने स्तर का पता चलेगा और उसमें भी वैसा कुछ करने की ललक बढ़ेगी। दूसरा हमेशा जमीनी हकीकत से कटे रहने वाले शहरों के मध्यम वर्गीय व उच्च वर्गीय विद्यार्थियों को भारत की असलियत को निकट से देखने और समझने का अवसर मिलेगा। इस विषय में मेरा व्यक्तिगत अनुभव बहुत अनूठा है।

1974 में जब मैं 18 वर्ष का था। शहर के संपन्न परिवार में परवरिश होने के कारण, मैं गांव के जीवन से अनभिज्ञ था। उन्ही दिनों मुरादाबाद के पास, अमरपुरकाशी गांव के ठा. मुकुट सिंह, अपनी आस्ट्रेलियन पत्नी के साथ लंदन से, अपने गांव का विकास करने आए। उनके इस साहसिक और अनूठे कदम ने मुझे उनके गांव जाने के लिए प्रोत्साहित किया। शुरू में मैं ग्रीष्मावकाश के लिए गया। गांव बहुत पिछड़ा और गरीब था। पर वहां के लोगों की सरलता ने मेरा मन मोह लिया। फिर तो मैं लगभग हर हफ्ते वहां जाने लगा और एम.ए. पास करने के बाद, मैंने एक वर्ष, उसी गांव में स्वयंसेवक के रूप में रहने का मन बनाया। वहां देश-विदेश के अन्य युवा भी आकर रहते थे।

अभावों में भी मुकुट सिंह जी और उनकी पत्नी के त्याग, स्नेह और प्रशिक्षण ने, हमें पूरी तरह बदल दिया। अब मुझे पैसे के पीछे भागने की कोई चाहत नहीं थी। क्योंकि जमीनी हकीकत से परिचय हो जाने के बाद, एक ही जुनून था कि जो कुछ करूंगा, समाज के हित के लिए करूंगा। चाहे कितना भी संघर्ष क्यों न करना पड़े। आज उस अनुभव को 40 वर्ष हो गये। पर सोच नहीं बदली। पत्रकारिता की, तो डंके की चोट पर की। किसी को ब्लैकमेल करने या अपना चैनल खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि जनहित के मुद्दों को मजबूती के साथ व्यवस्था के सामने रखने के लिए की। प्रभुकृपा से पत्रकारिता में देश में कई बार इतिहास रचा। गत 15 वर्षों से ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण की नैसर्गिक और सांस्कृतिक लीलास्थलियों को सजाने-संवारने में जुटा हूँ, तो यहां भी प्रभु नित्य नया इतिहास रच रहे हैं। न पत्रकारिता की डगर आसान थी और न ब्रज सेवा की आसान है। पर उनकी ही कृपा से विपरीत परिस्थितियां भी डिगा नहीं पातीं। कुछ पाने की चाहत कभी नहीं रहती। केवल कर्म करने में ही आनंद आता है। इसलिए मैं अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि हर विद्यार्थी को, जिसका जन्म शहरों के संपन्न परिवारों में हुआ हो, नौकरी या व्यवसाय शुरू करने से पहले, कम से कम एक वर्ष किसी पिछड़े गांव में रहने का अनुभव अवश्य करना चाहिए। इससे जीवन के प्रति दृष्टि पूरी तरह बदल जाती है।

Monday, May 8, 2017

नया भारत कर रहा अपनी धार्मिक अस्मिता को पुर्नस्थापित

नया भारत अपनी धार्मिक अस्मिता और मानकों को पुर्नस्थापित करने की चेष्टा में पुरजोर लगा हुआ है। ऐसी ही एक चेष्टा पिछले 15 सालों से योगेश्वर श्रीकृष्ण की क्रीड़ा स्थली ब्रज में मूर्त रूप ले रही है। जिसका एक मनमोहने वाला दृश्य गिरि गोवर्धन की तलहटी में 24 फुट ऊँचे भगवान संकर्षण की स्थापना के दौरान सामने आया। बृजवासियों का उत्साह देखने लायक था। इन्द्र के मान मर्दन के समय जिस आत्मविश्वास का स्थापन हुआ था वही जनभावना दाऊ दादा की इस स्थापना के समय स्फूर्त हुई। जिन कतिपय ताकतों द्वारा ब्रज के सॉंस्कृतिक सोपानों को हड़पने का दुष्चक्र चलाया जा रहा है वो दाऊ दादा की जय के निनाद से भयभीत हो उठे से दिखे।
5000 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ को भगवान संकर्षण (दाऊजी) का जो विग्रह प्राप्त हुआ था, उसी का एक विशालकाय व भव्य प्रतिरूप गोवर्धन की तलहटी में स्थित संकर्षण कुंड, आन्यौर में स्थापित किया गया। इस विग्रह को तिरूपति बालाजी में स्थित कार्यशाला में 22 अनुभवी शिल्पकारों के एक वर्ष की सघन परिश्रम के पश्चात निर्मित किया गया।
आध्यात्मिक भारत अनादि काल से एकीकृत रहा है। हमारी आस्थाएँ, हमारी परम्पराएँ और हमारे संस्कृतिक मानक भाषा व भूगोल से परे एक से ही रहे हैं। वैविध्यपूर्ण इकाइयाँ एक दूसरे से अंतरंगता बनाए रखती हैं। तभी तो दक्षिण के सर्वमान्य चिन्ना जीवर स्वामी तिरूपति स्थित अपनी शिल्पशाला में उत्तर के बलराम को संकर्षण स्वरूप देने को सहज तैयार हो जाते हैं। तो वेंकटेश्वर बालाजी के भक्त डॉ रामेश्वर राव उतर भारत की इस महाकृति को वित्तीय अनुदान सहज भाव से स्वीकृत कर देते हैं। भारत की यही आध्यात्मिक एकता ही तो नए भारत का निर्माण कर पाएगी।
सांस्कृतिक मानबिंदुओ की पुनः प्रतिष्ठा का एक गहरा प्रभाव सामाजिक अंतर्मन पर होता है जोकि समसामयिक अर्थ व राज व्यवस्था का निर्माण करता है। नए भारत के निर्माण हेतु यह एक प्रमुख अवयव होगा जिसके लिए किसी भी विदेशी धन और ज्ञान की जरूरत नहीं होगी। कम से कम 5000 वर्ष की सुसमृद्ध सभ्यता का धनी भारत अपने व्यक्तिक चिन्तन व कौशल से अपना पुनर्निर्माण करने में सक्षम है। श्रीकृष्ण सरीखे राजनयिक ने विकास का जो मोडेल ब्रज प्रांत में स्थापित किया उससे प्रेरणा लेने की जरूरत है।
इंद्र की अमरावती के ऐश्वर्य का मोह तज उन्होंने ब्रज की समृद्धि के मूल कारक गिरि गोवर्धन की प्रतिष्ठा की। ब्रज के वन और शैल को ही ब्रजवासियोंके मूल निवास स्थान के रूप में स्थापित किया। ऐसा नहीं की वो नगरीय संस्कृति से अनभिज्ञ थे। द्वारिका का प्रणयन तो उन्हीं के कर कमलों से ही हुआ था। सन्दर्भ की सारगर्भित व्याख्या और प्रतिष्ठा ने ही तो कृष्ण को जगतगुरु की पदवी प्रदान की। उन्होंने कंस जैसी विजातीय संस्कृति के अनुयायी के प्रभाव को ब्रज में प्रवेश ही नहीं होने दिया।
ब्रज की सम्पदा को संरक्षित करने के उनके अभिनव प्रयास ने उन्हें ब्रजराज की ख्याति भी दिला दी। ब्रज के वन्य-ग्राम्य जीवन को ना केवल उन्होंने प्रचारित किया बल्कि स्वयं अपनाया भी। नए भारत के निर्माताओं को श्रीकृष्ण द्वारा स्थापित मूल्यों और मानकों की ओर अपना ध्यान आकृष्ट करना चाहिए। एक भव्य और दिव्य भारत का निर्माण भारतीय अधिष्ठान पर ही हो पाएगा ऐसा विश्वास भारतीय जनमानस में सृष्टिकाल से रहा है।
1893 के शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन से लेकर संयुक्त राष्ट्र की महासभा के 2015 के अभिभाषण तक में भारत के इस चिर परिचित स्वरूप का निरूपण हुआ है। दोनों ही नरेंद्र नामराशियों ने भारत के आध्यात्मिक जन मानस की विशद व्याख्या की है। भगवान संकर्षण के इस विशालकाय स्वरूप की स्थापना भी इसी ओर इंगित करती है।नई संज्ञाएँ, नए समीकरण और नए सोपान भारत की धर्मभीः जनता को भ्रमित नहीं कर पाएँगे। इसका जीता जागता उद्घोष गिरि गोवर्धन की तलहटी में स्थापित भगवान संकर्षण का गगनचुंबी श्रीविग्रह कर रहा है। नया भारत, चिर पुरातन भारत की नित प्रवाहमान और सारगर्भित जीवन शैली के अनुक्रम में ही अँगड़ाई ले पाएगा। एक विजातीय परम्परा के अनुगमन के रूप में शायद कभी नहीं।
ब्रज भूमि में ही जन्मे और पले बढ़े एकात्म मानवतावाद के प्रवर्तक दीन दयाल जी ने भी कृष्ण के ही इस जल, जंगल, जमीन, जन और जानवर के दर्शन को ही अपने राजनैतिक जीवन का आधार बनाया। उनका विशद वॉंग्मय इस दिशा में स्पष्ट व सारगर्भित है। पश्चिम का अलक्षेन्द्र विविध मुखौटे लगा भारत का अतिक्रमण ही करेगा। भारत के फटे वसन को सीने की उसकी लालसा न होगी।