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Monday, December 10, 2018

सनातन परंपराओं से छेड़छाड़ ठीक नहीं

सबरी मलाई मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से हम सभी हिंदू उद्वेलित हैं। इसी हफ्ते एक व्याख्यान में सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश श्रीमती ज्ञान सुधा मिश्रा का कहना था कि जहां संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का पंरपराओं से टकराव होगा, वहां अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। उन्होंने सती प्रथा का उदाहरण देकर अपनी बात का समर्थन किया। किंतु पूजा पद्धति और उससे जुड़े कर्मकांड को बदलने का अधिकार अदालत का नहीं होना चाहिए। जैसे- जन जातीय समाजों में जो कानून की व्यवस्था है, उसमें भारत सरकार हस्तक्षेप नहीं करती। अंग्रेज हुकुमत ने भी नहीं किया। अण्डमान के पास सेंटीनल द्वीप में वनवासियों द्वारा तीर-कमान से मारे गऐ, ‘अमरीकी मिशनरी युवा’ के मामले में सरकार कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर रही। क्योंकि गत 60 हजार सालों से यह प्रजाति शेष दुनिया से अलग-थलग रहकर जीवन यापन कर रही है। उसके अपने कानून हैं और भारत सरकार ने उनकी स्वतंत्रता को सम्मान दिया है। ईसाईयत का प्रचार करने के उद्देश्य से इस युवा ने कानून का उल्लंघ्न कर सेंटीनल द्वीप में प्रवेश किया और मारा गया।

ईसाई मिशनरी, अन्य धर्मी लोग या फिर अदालतें अगर हमारी धार्मिक मान्यताओं में हस्तक्षेप करे, तो उसका कारण समझा जा सकता है। क्योंकि उनकी आस्था हमारी परंपराओं में नहीं है। उनकी सोच भारतीय संस्कृति से हटकर अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति से प्रभावित है। पर अगर हिंदू संस्कृति की रक्षा करने का दावा करने वाले संत, संगठन या राजनैतिक दल ऐसा करते हैं, तो ये चिंता की बात है। इलाहाबाद का नाम ‘प्रयागराज’ करना, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी महाराज का प्रशंसनीय कदम है। पर अर्द्ध कुंभ को कुंभ कहना सनातन परंपराओं से खिलवाड़ है। कुंभ की परंपरा हिंदू मान्यताओं के अनुसार हजारों वर्ष पुरानी है। हर 12 वर्ष में कुंभ, हर 6 वर्ष में अर्द्ध कुंभ और हर 144 वर्ष में महाकुंभ होते आऐ हैं। इसके पीछे वैज्ञानिक और शास्त्रीय दोनों आधार हैं। हमारे धार्मिक  ग्रंथों में इन पर्वों का विस्तृत वर्णन आता है। कुंभ पर उठे वाद-विवादों और धर्म ससंदों का भी उल्लेख आता है। पर ऐसा उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि अर्द्ध कुंभ को पूर्णं कुंभ कह दिया जाऐ। योगी महाराज ने अपने अज्ञानी अधिकारियों की चाटुकारिता भरी सलाह से जो यह निर्णंय लिया है, वह संत समाज के गले नहीं उतर रहा। कुछ खुल कर कह रहे हैं और अधिकतर चुपचाप सह रहे हैं। अगर इसी तरह नाम बदले गऐ, तो भविष्य में कोई ऐसी सरकार भी आ सकती है, जो यह कह दे कि 12 वर्ष में ही कुंभ क्यों होगा? हम तो हर मकर संक्राति को कुंभ करेंगे, तब उसे कौन रोक लेगा?

बात यहीं तक नहीं है। पिछले डेढ़ वर्ष में ब्रजभूमि को लेकर योगी महाराज की सरकार ने जो भी कार्यक्रम और योजनाऐं घोषित की हैं, वे सब ब्रज संस्कृति और मान्यताओं के विपरीत हैं। श्रीमदभागवतम् के दशम स्कंध के 24वें अध्याय के 24वें श्लोक में बालकृष्ण नंद बाबा से कहते हैं कि, ‘ये नगर और गांव हमारे घर नहीं। हमारे घर तो वन और पर्वत हैं।’ आज  ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ अपने ही बनाये कानूनों को तोड़कर हजारों करोड़ रूपयों की वाहियात योजनाऐं ब्रज विकास के नाम पर लागू करवा रही है, जो भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन की भावना के सर्वथा विपरीत हैं।  इनसे ब्रज की सेवा नहीं, विनाश होगा। ये बात हम जैसे लोग लगातार कह रहे हैं। पर अपने मद में चूर और बड़े कमीशन पर निगाह रखने वाले इन अधिकारियों को समझ में नहीं आ रहा।

इसी तरह मथुरा और वृंदावन के बीच भावनात्मक दूरी है। अक्रूर जी जब कृष्ण-बलराम को मथुरा ले गऐ और कंस वध करने के बाद भगवान लौटे नहीं, तो वे मथुरा के राजमहल में वृंदावन की याद करके अपने मित्र उद्धव से कहते है, ‘उधौ मोहे ब्रज बिसरत नाहि’। वृंदावनवासी ग्वारिये कृष्ण के प्रति साख्य भाव रखते हैं। जबकि मथुरावासी कृष्ण को द्वारिकाधीश अर्थात् राजा के रूप में पूजते हैं। पर योगी महाराज की सरकार ने वृंदावनवासियों के घोर विरोध की उपेक्षा करके मथुरा-वृंदावन नगर निगम बना दिया। जोकि ब्रज की सनातन परंपरा के पूरी तरह विपरीत है। पूरा ब्रज भक्ति भावना प्रधान है। नंदग्राम वालों के लिए अगर ग्वारिया कृष्ण अधिक महत्वपूर्णं हैं, तो बरसानावासी राधारानी के प्रति स्वयं का सखी भाव रखते हैं। हर गांव का अपना पौराणिक इतिहास है। इसी तरह गोवर्धन, जो प्रकृति पूजा का सर्वोत्तम उदाहरण है। उसके चारों ओर विकास का जो मॉडल ‘ब्रजतीर्थ विकास परिषद्’ लेकर आई है। वह गोवर्धन की भावना का सर्वथा प्रतिकूल है। इससे गोवर्धन ‘न्यूयॉर्क’ शहर की तरह हो जाऐगा। जो इसकी अपूर्णंनीय क्षति होगी।

हमारी सनातन परंपराओं से अगर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी ने ऐसी छेड़छाड़ की होती, तो निश्चय ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उससे जुड़े संगठन तूफान मचा देते। जो सही भी होता। लेकिन जब हिंदू धर्म की सेवा करने का दावा करने वाले दल भाजपा की सरकार में सनातन परंपराओं से खिलवाड़ हो, तो किसका विरोध किया जाऐ? यह हम सब सनातनधर्मियों की बिडंबना है और पीड़ा भी।

योगी महाराज के मुख्यमंत्री बनने पर हम सबसे ज्यादा उत्साहित थे । मैंने टीवी चैनलों पर ऐसा कई बार  कहा भी था। आशा थी कि योगी जी हम सनातनधर्मियों की भावना का सम्मान करते हुए, हमारी सांस्कृति विरासतों की रक्षा में उदारता से सहयोग करेंगे। उनकी मंशा और धर्म के प्रति समर्पण में आज भी कोई संदेह नहीं है। वे सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए भरपूर थैली खोले बैठे हैं। पर बिडंबना यह है कि उनके चारों ओर वे लोग हैं, जो उनसे तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं को निज लाभ के लिए पारित करवा कर सनातन धर्म की परंपराओं और भावनाओं पर कुठाराघात कर रहे हैं। योगी जी को इस मकड़जाल से निकलकर मुक्त हृदय से दूसरे पक्ष की बात को भी गंभीरता से सुनने की सामर्थ्य दिखानी चाहिए। तभी धर्म की सच्ची सेवा होगी अन्यथा धर्म का विनाश होगा और केवल कुछ जेबें भारी जाएंगी। आगे हरि इच्छा।