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Monday, April 13, 2026

जनसेवा की नई मिसाल देता नेपाल का युवा मंत्रिमंडल !

नेपाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव आया जब 27 मार्च 2026 को राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के नेतृत्व में बालेन शाह (बलेंद्र शाह) ने 36 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और 15 सदस्यीय कैबिनेट का गठन किया। यह मंत्रिमंडल न सिर्फ नेपाल का सबसे युवा कैबिनेट है, बल्कि दक्षिण एशिया में अपनी उच्च शैक्षणिक योग्यता के लिए वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन रहा है। इस मंत्रिमंडल के सदस्यों की औसत आयु मात्र 38.21 वर्ष है, दस मंत्री 40 वर्ष से कम उम्र के, पांच महिला मंत्री और 80 प्रतिशत से अधिक सदस्यों के पास स्नातकोत्तर या डॉक्टरेट की डिग्री। यह आंकड़े नेपाल की राजनीति के पारंपरिक चेहरे को पूरी तरह बदल रहे हैं। 


यह कैबिनेट 'जेन-ज़ी आंदोलन' के परिणामस्वरूप सत्ता में आई है। भ्रष्टाचार, पुरानी पार्टियों की नाकामी और युवाओं की मांगों को लेकर हुए आंदोलन ने आरएसपी को भारी बहुमत दिलाया। अब यह युवा टीम न सिर्फ नेपाल में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में 'दुनिया का सबसे युवा कैबिनेट' और 'सबसे शिक्षित मंत्रिमंडल' के रूप में प्रसिद्ध हो रही है। कई भारतीय अखबारों ने इसे 'जनरेशनल शिफ्ट' करार दिया है। विश्व स्तर पर इसकी सराहना हो रही है क्योंकि यह पारंपरिक राजनीति से हटकर योग्यता, तकनीकी विशेषज्ञता और समावेशिता पर आधारित है। यह दक्षिण एशिया का चमकता उदाहरण है, जहां भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों के कैबिनेट अक्सर वरिष्ठ नेताओं पर निर्भर रहते हैं।


इस कैबिनेट की सबसे बड़ी ताकत इसकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि है। प्रधानमंत्री बालेन शाह स्वयं सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक (पूर्वांचल विश्वविद्यालय) और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में एम.टेक (निट्टे मीनाक्षी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बेंगलुरु, भारत) हैं। वे काठमांडू के पूर्व मेयर और लोकप्रिय रैपर भी हैं। उनकी टीम में दो डॉक्टरेट धारक और दस स्नातकोत्तर सदस्य हैं। वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले (41 वर्ष, कैबिनेट के सबसे वरिष्ठ) अर्थशास्त्र में पीएचडी (ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी), हार्वर्ड से एमपीए/आईडी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से स्नातक हैं। वे पूर्व में यूएनडीपी के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय आर्थिक सलाहकार और नेपाल की राष्ट्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी विशेषज्ञता आर्थिक सुधार, गरीबी उन्मूलन और सतत विकास में है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल (47 वर्ष) अमेरिका के विस्कॉन्सिन-मैडिसन से पब्लिक पॉलिसी में मास्टर्स और यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिजपोर्ट से पॉलिटिकल इकोनॉमी में स्नातक हैं। वे 'टीच फॉर नेपाल' के सह-संस्थापक हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा सुधार का प्रमुख अभियान है।


शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा युवा एवं खेल मंत्री सस्मित पोखरेल (29 वर्ष) कैबिनेट के सबसे युवा सदस्य हैं। वे काठमांडू विश्वविद्यालय से बिजनेस मैनेजमेंट एवं कानून में स्नातक हैं और पॉलिसी, गवर्नेंस एवं भ्रष्टाचार-निरोध पर मास्टर्स कर रहे हैं। वे बालेन के मेयर काल में शहरी नियोजन सलाहकार रह चुके हैं। स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता (38 वर्ष) भारत के ग्वालियर से नर्सिंग में मास्टर्स और दिल्ली के एम्स से प्रशिक्षित हैं। सामान्य प्रशासन मंत्री प्रतिभा रावल (32 वर्ष) एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (चेन्नई) से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा रखती हैं। श्रम मंत्री दीपक कुमार साह (34 वर्ष) लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन से पीएचडी स्कॉलर, एलएसई से हेल्थ पॉलिसी में मास्टर्स और आईओएम से पब्लिक हेल्थ में मास्टर्स रखते हैं।


महिला, बाल-बालिका एवं ज्येष्ठ नागरिक मंत्री सीता बादी (30 वर्ष) राजनीति विज्ञान में मास्टर्स हैं और बादी समुदाय की प्रतिनिधि के रूप में समावेशिता का प्रतीक हैं। कानून मंत्री सोबिता गौतम (30 वर्ष) राष्ट्रीय विधि महाविद्यालय से बीए एलएलबी हैं और संसदीय समितियों में सक्रिय रहीं हैं। भौतिक पूर्वाधार मंत्री सुनील लाम्सल (35 वर्ष) भी भारत से एम.टेक (स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग) हैं।


गौरतलब है कि ये योग्यताएं महज डिग्रियां नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुभव से जुड़ी हैं। यूएनडीपी, टीच फॉर नेपाल, आपदा राहत संगठन 'हामी नेपाल' और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में इन सभी की अहम भूमिका रही है। पांच महिला मंत्रियों का प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी (जैसे सीता बादी) समावेशिता को मजबूत करती है।


देखा जाए तो नेपाल का यह कैबिनेट अपने पड़ोसियों से अलग दिखता है। भारत के वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल में 71 सदस्य है, जिसमें 57 सदस्य स्नातक या उससे ऊपर हैं, लेकिन 11 सदस्य मात्र 12वीं पास हैं। कई मंत्री राजनीतिक अनुभव पर निर्भर हैं, जबकि युवा चेहरे कम हैं। वहीं चीन का मंत्रिमंडल अत्यधिक शिक्षित तकनीकी विशेषज्ञों (इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र) से भरा है, लेकिन उनकी औसत आयु 55-60 वर्ष के आसपास है और निर्णय प्रक्रिया केंद्रीकृत पार्टी संरचना पर आधारित है। बांग्लादेश के हालिया कैबिनेट में 46/50 सदस्य उच्च शिक्षा वाले हैं (तीन पीएचडी), लेकिन वहां भी वरिष्ठता और राजनीतिक वफादारी प्रमुख है।


नेपाल का कैबिनेट इन सभी से युवा, अधिक समावेशी और योग्यता-आधारित है। भारत और चीन की तुलना में यहां भ्रष्टाचार-विरोधी 'डिलीवरी बेस्ड गवर्नेंस' पर जोर है, जो पड़ोसियों में अक्सर कम देखा जाता है। हालांकि, कुछ विश्लेषक चेताते हैं कि इस मंत्रिमंडल के पास अनुभव की कमी एक चुनौती है। भारत की तरह बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था या चीन की तरह दीर्घकालिक नियोजन यहां अभी संभव नहीं, लेकिन पारदर्शिता और तेज निर्णय लेने की क्षमता नेपाल को लाभ दे सकती है।


केवल दो सप्ताह पुरानी यह सरकार पहले ही '100 सूत्री शासन सुधार एजेंडा' लागू कर चुकी है। पहली कैबिनेट बैठक में मंत्रालयों का पुनर्गठन, दक्षिण एशिया संघर्ष के प्रभाव से नेपाली प्रवासियों की सुरक्षा, ‘कार्की आयोग’ रिपोर्ट पर कार्रवाई और संविधान संशोधन पर चर्चा पत्र तैयार करने जैसे कदम उठाए गए। शिक्षा मंत्री सस्मित पोखरेल ने पार्टी-आधारित छात्र संगठनों को समाप्त करने और स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता ने निजी अस्पतालों में 10 प्रतिशत मुफ्त बेड सुनिश्चित करने की घोषणा की है।


वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले आर्थिक स्थिरता, पर्यटन विकास और बुनियादी ढांचे पर ध्यान दे रहे हैं। श्रम और स्वास्थ्य मंत्रियों की स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञता गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन में मदद करेगी। विदेश मंत्री शिशिर खनाल की पॉलिसी विशेषज्ञता नेपाल की कूटनीति को मजबूत करेगी। युवा बेरोजगारी घटाने, शिक्षा गुणवत्ता सुधारने, स्वास्थ्य पहुंच बढ़ाने और भ्रष्टाचार रोकने के प्रयास पहले ही दिख रहे हैं। दैनिक प्रगति निगरानी प्रणाली लागू कर सरकार जवाबदेही सुनिश्चित कर रही है। हालांकि, चुनौतियां यहाँ भी हैं, जैसे कि पहाड़ी इलाकों में पहुंच, संसाधन सीमाएं और पुरानी पार्टियों का विरोध। फिर भी, यह कैबिनेट जनता की उम्मीदें पूरी करने की राह पर है।


कुल मिलाकर देखा जाए तो नेपाल का यह ‘जेन-ज़ी’ कैबिनेट न सिर्फ दक्षिण एशिया के लिए मिसाल है, बल्कि विकासशील देशों को सिखाता है कि योग्यता और युवा ऊर्जा राजनीति को बदल सकती है। यदि यह टीम अपने 100 सूत्री एजेंडा को ईमानदारी से लागू कर पाई, तो नेपाल आर्थिक समृद्धि, सामाजिक न्याय और सुशासन का नया मॉडल बन सकता है। 

Monday, August 4, 2025

डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत को तोहफ़ा?

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत से आयात होने वाले सामानों पर 25% टैरिफ और रूस से तेल और हथियारों की खरीद के लिए अतिरिक्त दंड की घोषणा की। यह कदम भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, विशेष रूप से तब जब दोनों देश एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। ट्रम्प ने भारत और रूस को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ (डेड इकॉनमी) कहकर निशाना बनाया और भारत के उच्च टैरिफ और गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाओं को इसका कारण बताया।


डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल में वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने वाली आक्रामक टैरिफ नीतियों को अपनाया है। 7 अगस्त 2025 से लागू होने वाले 25% टैरिफ का ऐलान करते हुए, ट्रम्प ने भारत के रूस से तेल और सैन्य उपकरणों की खरीद को प्रमुख कारण बताया। उनके अनुसार, भारत रूस का सबसे बड़ा ऊर्जा खरीदार है, जो यूक्रेन में रूस के सैन्य अभियान के समय में अस्वीकार्य है। इसके अतिरिक्त, ट्रम्प ने भारत के उच्च टैरिफ (जिसे उन्होंने दुनिया में सबसे अधिक बताया) और गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाओं की भी आलोचना की।



यह टैरिफ अचानक भारत के लिए एक झटके के रूप में आया है, क्योंकि भारत और अमेरिका पिछले कुछ महीनों से एक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे थे। ट्रम्प ने पहले 20-25% टैरिफ की संभावना जताई थी, लेकिन अंतिम घोषणा में अतिरिक्त दंड भी शामिल किया गया। यह कदम भारत के फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, रत्न और आभूषण, और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है, जो अमेरिका के साथ भारत के व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।


कांग्रेस के नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ट्रम्प के ‘मृत अर्थव्यवस्था’ वाले बयान का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, हां, ट्रम्प सही हैं। हर कोई जानता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मृत है, सिवाय प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के। मुझे खुशी है कि ट्रम्प ने यह तथ्य सामने रखा। पूरी दुनिया जानती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था खत्म हो चुकी है। भाजपा ने अडानी को मदद करने के लिए अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया।



राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए, विशेष रूप से नोटबंदी और ‘त्रुटिपूर्ण’ जीएसटी को अर्थव्यवस्था के पतन का कारण बताया। उन्होंने यह भी पूछा कि ट्रम्प के भारत-पाकिस्तान सीजफायर को लेकर बार बार किए जा रहे दावों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी क्यों है?



कांग्रेस पार्टी ने इस टैरिफ को भारत की विदेश नीति की विफलता के रूप में चित्रित किया। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, राहुल गांधी ने पहले ही इस बारे में चेतावनी दी थी। यह टैरिफ हमारी अर्थव्यवस्था, निर्यात, उत्पादन और रोजगार पर असर डालेगा। हम अमेरिका को फार्मास्यूटिकल्स निर्यात करते हैं और 25% टैरिफ से ये महंगे हो जाएंगे, जिससे मांग कम होगी और उत्पादन व रोजगार पर असर पड़ेगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाए और टैरिफ को भारत के व्यापार, एमएसएमई और किसानों के लिए हानिकारक बताया।


अन्य विपक्षी नेताओं ने भी इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना की। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बुरे दिनों की शुरुआत बताया, जबकि असदुद्दीन ओवैसी ने ट्रम्प को व्हाइट हाउस का जोकर कहकर उनकी आलोचना की। हालांकि, कांग्रेस के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी के रुख से अलग हटकर अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। शशि थरूर ने चेतावनी दी कि टैरिफ भारत-अमेरिका व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं और भारत को अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की आवश्यकता है।


वहीं अर्थशास्त्रियों ने इस टैरिफ के भारत की अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव को लेकर मिश्रित राय व्यक्त की है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रभाव सीमित होगा, जबकि अन्य ने दीर्घकालिक नुकसान की चेतावनी दी है। ईन्वेस्टमेंट इनफार्मेशन एंड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ऑफ इंडिया (आईसीआरए) की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, प्रस्तावित टैरिफ और दंड हमारी अपेक्षा से अधिक हैं और इससे भारत की जीडीपी वृद्धि पर असर पड़ सकता है। प्रभाव की गंभीरता दंड के आकार पर निर्भर करेगी। अर्नेस्ट एंड यंग इंडिया (ई वाई) के व्यापार नीति विशेषज्ञ अग्नेश्वर सेन ने बताया कि टैरिफ से समुद्री उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, चमड़ा और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होंगे। ये क्षेत्र भारत-अमेरिका व्यापार में मजबूत हैं, और टैरिफ से इनकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है।


फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक डेवलपमेंट के राहुल अहलूवालिया ने चेतावनी दी कि टैरिफ भारत को वियतनाम और चीन जैसे अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कमजोर स्थिति में ला सकता है। उनके अनुसार, निर्यात आपूर्ति श्रृंखलाओं का भारत की ओर स्थानांतरण अब संभावना नहीं है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने आशावादी रुख अपनाया। फिक्की के अध्यक्ष हर्षवर्धन अग्रवाल ने कहा, हालांकि यह कदम दुर्भाग्यपूर्ण है और हमारे निर्यात पर असर डालेगा, हमें उम्मीद है कि यह एक अल्पकालिक घटना होगी और दोनों पक्ष जल्द ही एक स्थायी व्यापार समझौते पर पहुंच जाएंगे।


भारत सरकार ने इस मुद्दे पर सतर्क और संयमित रुख अपनाया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में कहा, हम राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएंगे। भारत ने एक दशक में ‘फ्रैजाइल फाइव’ से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का सफर तय किया है। सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया है कि भारत तत्काल जवाबी टैरिफ लगाने के बजाय बातचीत के रास्ते को अपनाएगा। एक सूत्र ने कहा, चुप्पी सबसे अच्छा जवाब है। हम बातचीत की मेज पर इस मुद्दे को हल करेंगे। 

कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ और अतिरिक्त दंड ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर दिया है। राहुल गांधी और विपक्ष ने इसे सरकार की आर्थिक और विदेश नीति की विफलता के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि अर्थशास्त्रियों ने इसके मिश्रित प्रभावों की ओर इशारा किया है। जहां कुछ क्षेत्रों पर तत्काल असर पड़ सकता है, वहीं भारत के पास अन्य बाजारों में विविधता लाने और बातचीत के जरिए समाधान खोजने का अवसर है। यह स्थिति न केवल आर्थिक बल्कि भूराजनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों को संतुलित करना होगा। देखना यह है कि आनेवाले दिनों में सरकार इस समस्या से कैसे निपटती है।  

Sunday, June 1, 2025

रक्षा परियोजनाओं में देरी क्यों?

भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने 29 मई 2025 को नई दिल्ली में आयोजित एक सभा में रक्षा परियोजनाओं में देरी को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा, टाइमलाइन एक बड़ा मुद्दा है। मेरे विचार में एक भी परियोजना ऐसी नहीं है जो समय पर पूरी हुई हो। कई बार हम कॉन्ट्रैक्ट साइन करते समय जानते हैं कि यह सिस्टम समय पर नहीं आएगा। फिर भी हम कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लेते हैं। यह बयान न केवल रक्षा क्षेत्र में मौजूदा चुनौतियों को उजागर करता है, बल्कि भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में चल रही प्रक्रिया पर भी सवाल उठाता है।


एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने अपने बयान में विशेष रूप से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा तेजस Mk1A फाइटर जेट की डिलीवरी में देरी का उल्लेख किया। यह देरी 2021 में हस्ताक्षरित 48,000 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा है, जिसमें 83 तेजस Mk1A जेट्स की डिलीवरी मार्च 2024 से शुरू होनी थी, लेकिन अभी तक एक भी विमान डिलीवर नहीं हुआ है। इसके अलावा, उन्होंने तेजस Mk2 और उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (AMCA) जैसे अन्य महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में भी प्रोटोटाइप की कमी और देरी का जिक्र किया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ रहा है, विशेष रूप से ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद, जिसे उन्होंने राष्ट्रीय जीत करार दिया।



उनके बयान का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह रक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह पहली बार नहीं है जब HAL की आलोचना हुई है। फरवरी 2025 में, एयरो इंडिया 2025 के दौरान, एयर चीफ मार्शल सिंह ने HAL के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा था, मुझे HAL पर भरोसा नहीं है, जो बहुत गलत बात है। यह बयान एक अनौपचारिक बातचीत में रिकॉर्ड हुआ था, लेकिन इसने रक्षा उद्योग में गहरे मुद्दों को उजागर किया।


रक्षा परियोजनाओं में देरी के कई कारण हैं, जिनमें से कुछ संरचनात्मक और कुछ प्रबंधन से संबंधित हैं। तेजस Mk1A की डिलीवरी में देरी का एक प्रमुख कारण जनरल इलेक्ट्रिक से इंजनों की धीमी आपूर्ति है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में समस्याएं, विशेष रूप से 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद भारत पर लगे प्रतिबंधों ने HAL की उत्पादन क्षमता को प्रभावित किया है । सिंह ने HAL को मिशन मोड में न होने के लिए आलोचना की। उन्होंने कहा कि HAL के भीतर लोग अपने-अपने साइलो में काम करते हैं, जिससे समग्र तस्वीर पर ध्यान नहीं दिया जाता। यह संगठनात्मक अक्षमता और समन्वय की कमी का संकेत है। सिंह ने इस बात पर भी जोर दिया कि कई बार कॉन्ट्रैक्ट साइन करते समय ही यह स्पष्ट होता है कि समय सीमा अवास्तविक है। फिर भी, कॉन्ट्रैक्ट साइन कर लिए जाते हैं, जिससे प्रक्रिया शुरू से ही खराब हो जाती है। यह एक गहरी सांस्कृतिक समस्या को दर्शाता है, जहां जवाबदेही की कमी है। हालांकि सरकार ने AMCA जैसे प्रोजेक्ट्स में निजी क्षेत्र की भागीदारी को मंजूरी दी है, लेकिन अभी तक रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भूमिका सीमित रही है। इससे HAL और DRDO जैसे सार्वजनिक उपक्रमों पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ती है, जो अक्सर समय सीमा पूरी करने में विफल रहते हैं। भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली है। इसके अलावा, डिजाइन और विकास में देरी, जैसे कि तेजस Mk2 और AMCA के प्रोटोटाइप की कमी, परियोजनाओं को और पीछे धकेलती है।



रक्षा परियोजनाओं में देरी का भारतीय वायुसेना की परिचालन तत्परता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वर्तमान में, भारतीय वायु सेना के पास 42.5 स्क्वाड्रनों की स्वीकृत ताकत के मुकाबले केवल 30 फाइटर स्क्वाड्रन हैं। तेजस Mk1A जैसे स्वदेशी विमानों की देरी और पुराने मिग-21 स्क्वाड्रनों का डीकमीशनिंग इस कमी को और गंभीर बनाता है।



इसके अलावा, देरी से रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में भारत की प्रगति भी प्रभावित होती है। सिंह ने कहा, हमें केवल भारत में उत्पादन की बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि डिजाइन और विकास भी भारत में करना चाहिए। देरी न केवल IAF की युद्ध क्षमता को कमजोर करती है, बल्कि रक्षा उद्योग में विश्वास को भी प्रभावित करती है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे हालिया सैन्य अभियानों ने यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक युद्ध में हवाई शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है, और इसके लिए समय पर डिलीवरी और तकनीकी उन्नति अनिवार्य है।


एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह के बयान ने रक्षा क्षेत्र में सुधार की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया है। रक्षा कॉन्ट्रैक्ट्स में यथार्थवादी समयसीमाएं निर्धारित की जानी चाहिए। सिंह ने सुझाव दिया कि हमें वही वादा करना चाहिए जो हम हासिल कर सकते हैं। इसके लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन करने से पहले गहन तकनीकी और लॉजिस्टिकल मूल्यांकन की आवश्यकता है। AMCA प्रोजेक्ट में निजी क्षेत्र की भागीदारी एक सकारात्मक कदम है। निजी कंपनियों को रक्षा उत्पादन में और अधिक शामिल करने से HAL और DRDO पर निर्भरता कम होगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। 


HAL और अन्य सार्वजनिक उपक्रमों को ‘मिशन मोड’ में काम करने के लिए संगठनात्मक सुधार करने चाहिए। इसके लिए समन्वय, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और कर्मचारी प्रशिक्षण में सुधार की आवश्यकता है। इंजन और अन्य महत्वपूर्ण घटकों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता को कम करने के लिए स्वदेशी विकास पर ध्यान देना होगा। रक्षा खरीद प्रक्रिया को सरल और तेज करने की आवश्यकता है ताकि अनावश्यक देरी से बचा जा सके।


एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह का बयान रक्षा क्षेत्र में गहरी जड़ें जमाए बैठी समस्याओं को उजागर करता है। उनकी स्पष्टवादिता न केवल जवाबदेही की मांग करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भारत को आत्मनिर्भर और युद्ध के लिए तैयार रहने के लिए तत्काल सुधारों की आवश्यकता है। तेजस Mk1A, Mk2 और AMCA जैसे प्रोजेक्ट्स भारत की रक्षा क्षमता के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनमें देरी न केवल हमारी फौज की तत्परता को प्रभावित करती है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरे में डालती है। सरकार, रक्षा उद्योग और निजी क्षेत्र को मिलकर इन चुनौतियों का समाधान करना होगा ताकि भारत न केवल उत्पादन में, बल्कि डिजाइन और विकास में भी आत्मनिर्भर बन सके। सिंह का यह बयान एक चेतावनी तो है ही, लेकिन साथ ही यह रक्षा क्षेत्र को ‘सर्वश्रेष्ठ’ करने  की दिशा में एक अवसर भी है।

Monday, May 19, 2025

‘ऑपरेशन सिंदूर’ और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय !


भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का इतिहास लंबा और जटिल रहा है। दोनों देशों के बीच कश्मीर को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद समय-समय पर हिंसक संघर्षों का कारण बनता रहा है। हाल ही में, अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया। इस हमले में 26 पर्यटकों की जान गई थी, जिसके लिए भारत ने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। इसके जवाब में भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया, जिसमें पाकिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले किए गए। इस घटनाक्रम ने दक्षिण एशिया में तनाव को और बढ़ा दिया। इस संदर्भ में, अमरीका के जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय की युद्ध मामलों की विशेषज्ञ प्रोफेसर क्रिस्टीन फेयर ने एक टीवी साक्षात्कार में इस संघर्ष के कारणों, परिणामों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की।


प्रोफेसर फेयर ने अपने साक्षात्कार में बताया कि पाकिस्तान की सेना और उसका खुफिया तंत्र लंबे समय से आतंकी संगठनों, जैसे लश्कर-ए-तैयबा आदि को समर्थन देता रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये संगठन न केवल कश्मीर में सक्रिय हैं, बल्कि पाकिस्तान के आंतरिक सुरक्षा परिदृश्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार, पाकिस्तानी सेना इन संगठनों को रणनीतिक संपत्ति के रूप में देखती है, जो भारत के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़ने में उपयोगी हैं।



पहलगाम हमले के जवाब में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जिसमें भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। इस ऑपरेशन को भारत ने अपनी आत्मरक्षा का अधिकार बताया, जबकि पाकिस्तान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला करार दिया। प्रोफेसर फेयर ने इस ऑपरेशन को भारत की बदलती रणनीति का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि भारत अब पहले की तरह केवल कूटनीतिक जवाब तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह सैन्य कार्रवाई के जरिए आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश भी देना जानता है। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ऑपरेशन सिंदूर जैसे कदम आतंकवाद को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते, क्योंकि पाकिस्तान की सेना के लिए भारत के खिलाफ संघर्ष अस्तित्वगत है।ये उनके वजूद का सवाल है। भारत का डर दिखा -दिखा कर ही पाकिस्तान अनेक देशों से आर्थिक मदद माँगता रहा है । 


प्रोफेसर फेयर ने पाकिस्तानी सेना की भारत के प्रति कार्यशैली पर एक किताब भी लिखी है। इस साक्षात्कार में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पाकिस्तान की सेना अपने देश की नीति-निर्माण प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी सेना भारत को अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानती है और इस धारणा को बनाए रखने के लिए वह आतंकी संगठनों का इस्तेमाल करती है। फेयर के अनुसार, उनकी यह नीति न केवल भारत के लिए खतरा है, बल्कि पाकिस्तान के आंतरिक स्थायित्व को भी कमजोर करती है।



उन्होंने यह भी बताया कि पाकिस्तानी सेना के लिए कश्मीर विवाद केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उनकी वैचारिक और रणनीतिक पहचान का हिस्सा है। फेयर ने कहा कि पाकिस्तान की सेना तब तक आतंकवाद को समर्थन देती रहेगी, जब तक कि उसे भारत के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिलता रहेगा। भारत की हालिया सैन्य कार्रवाइयों, जैसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’, ने पाकिस्तान को यह संदेश दिया है कि भारत अब पहले की तरह निष्क्रिय नहीं रहेगा।



साक्षात्कार में प्रोफेसर फेयर ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल की रणनीति की भी चर्चा की। उन्होंने डोवाल को एक ऐसे रणनीतिकार के रूप में वर्णित किया, जो भारत की सुरक्षा नीति को आक्रामक और सक्रिय दिशा में ले जा रहे हैं। फेयर ने कहा कि डोवाल की सक्रिय रक्षा की नीति ने भारत को पाकिस्तान के खिलाफ अधिक प्रभावी बनाया है। ऑपरेशन सिंदूर इस नीति का एक उदाहरण है, जिसमें भारत ने न केवल आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, बल्कि पाकिस्तान को कूटनीतिक और सैन्य रूप से भी जवाब दिया।


हालांकि, फेयर ने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह की आक्रामक नीति के अपने जोखिम भी हैं। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान, दोनों ही परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं और किसी भी सैन्य टकराव का बढ़ना दक्षिण एशिया में व्यापक विनाश का कारण बन सकता है। उनके अनुसार, भारत को अपनी रणनीति में संतुलन बनाए रखना होगा, ताकि वह आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए, लेकिन साथ ही स्थिति को पूर्ण युद्ध की ओर बढ़ने से रोके।


10 मई 2025 को भारत और पाकिस्तान ने एक युद्धविराम की घोषणा की, जिसे अमेरिका की मध्यस्थता से संभव माना गया। हालांकि, भारत ने इसे द्विपक्षीय समझौता बताया और अमेरिकी हस्तक्षेप को कमतर करने की कोशिश की। प्रोफेसर फेयर ने इस युद्धविराम को अस्थायी करार दिया। उन्होंने कहा कि जब तक पाकिस्तानी सेना अपनी नीतियों में बदलाव नहीं करती, तब तक इस तरह के तनाव बार-बार सामने आएंगे। उन्होंने यह भी भविष्यवाणी की कि पाकिस्तान भविष्य में फिर से भारत के खिलाफ आतंकी हमले कर सकता है, क्योंकि यह उसकी रणनीति का हिस्सा है।


फेयर के अनुसार अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से अमेरिका, इस क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका की मध्यस्थता हमेशा दोनों देशों को स्वीकार्य नहीं होती, खासकर भारत के लिए, जो कश्मीर को अपना आंतरिक मामला मानता है।


प्रोफेसर क्रिस्टीन फेयर का टीवी साक्षात्कार भारत-पाकिस्तान संघर्ष की जटिलताओं को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उनके विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि इसमें गहरे ऐतिहासिक, वैचारिक और रणनीतिक आयाम हैं। पाकिस्तानी सेना की आतंकवाद समर्थक नीतियां और भारत की आक्रामक जवाबी रणनीति इस क्षेत्र में स्थायी शांति की राह में बड़ी बाधाएं हैं।


हालांकि, फेयर का यह भी मानना है कि दोनों देशों के बीच संवाद और कूटनीति के रास्ते अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। यदि पाकिस्तान अपनी नीतियों में बदलाव लाता है और भारत संतुलित रुख अपनाता है, तो भविष्य में तनाव को कम करने की संभावना बनी रह सकती है। लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों को न केवल अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करना होगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ सहयोग भी करना होगा। 

Monday, December 16, 2024

मुसलमान ज़रा सोचें


हर जमात में शरीफ लोगों की कमी नहीं होती। मुसलमानों में भी नहीं है। चाहे भारत के हों या पाकिस्तान के। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर इम्तियाज अहमद उन मुसलमानों में से थे जिन्होंने भारत में इस्लाम की हालत पर वर्षों गहन अध्ययन किया। इस अध्ययन के आधार पर उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं। इस पुस्तकों में उन्होंने बताने की कोशिश की है कि भारत में रहने वाले मुसलमानों का सामाजिक जीवन, सोच और प्राथमिकतायें दूसरे देशों के मुसलमानों से भिन्न हैं और भारतीय हैं। उनका मानना है कि धर्मान्धता से ग्रस्त होकर विद्वेष की भावना रखने वाले मुसलमानों की संख्या बहुत थोड़ी है। भारत में रहने वाले ज्यादातर मुसलमान ये जानते हैं कि उनका जीवन पाकिस्तान में रह रहे मुसलमानों से कही बेहतर है। जितनी आजादी और आगे बढ़ने के अवसर उन्हें भारत में मिले हैं, उतने कट्टरपंथी पाकिस्तान में नहीं मिलते।



आमतौर पर यह माना जाता है कि पूरे देश का समाज हिन्दू और मुसलमान दो खेमों में बंटा है। इन दोनों खेमों के बीच स्थाई द्वेष और अपने अपने खेमे के भीतर भारी एकजुटता है। दोनों पक्षों के धर्मान्ध नेता इस मान्यता को बढ़ाने में काफी तत्पर रहते हैं। हकीकत यह नहीं है। कश्मीर के एक मुसलमान को यह देखकर आश्चर्य होगा कि तमिलनाडु के मुसलमानों के घर बारात का स्वागत केले के पत्ते, नारियल और इलायची से वैसे ही किया जाता है जैसे किसी हिन्दू के घर में। कश्मीर का मुसलमान तमिलनाडु के मुसलमान के घर का भोजन खाकर तृप्त नहीं होता ठीक वैसे ही जैसे तमिलनाडु का मुसलमान तमिल घर में भोजन खाकर ही प्रसन्न होता है। बात बात पर उत्तेजित हो जाने वाली बंगाल की आम जनता के साथ अगर आप रेलगाड़ी के साधारण डिब्बे में सफर कर रहे हैं और आपकी बहस किसी स्थानीय व्यक्ति से हो जाए तो आप अपने को अकेला पाएंगे। आपके विरोध में हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदाय के लोग एकजुट होकर खड़े हो जायेंगे। वहां सवाल इस बात का नहीं होगा कि आप हिन्दू हैं या मुसलमान। आप गैर बंगाली हैं इसलिये आपके प्रति स्थानीय लोगों की हमदर्दी हो ही नहीं सकती। हर राज्य का यही हाल है। भाषा, पहनावा, भोजन, आचार विचार के मामले में भारत के भिन्न भिन्न प्रांतों में रहने वाले लोग भिन्न भिन्न समुदायों में बंटै हैं मसलन तमिल, कन्नड, केरलीय, मराठी, गुजराती, उडि़या, बंगाली, असमिया, पंजाबी, बिहारी, हरियाणवी आदि। जब तक कोई धर्मान्धता की घुट्टी पिलाने न जाए स्थानीय जनता अपने धर्म के संकुचित दायरे में ही सिमट कर नहीं रहती बल्कि परदेशी के विरूद्ध स्थानीय लोगों की एकजुटता का प्रदर्शन करती है। इसलिये यह कहना कि सारे मुसलमान एक जैसे हैं, ठीक नहीं।



ठीक इसी तरह से ये सोचना भ्रम है कि इस्लाम धर्म के मानने वाले सभी लोगों में भारी एकजुटता होती है। कुरान शरीफ के मुताबिक खुदा की नजर में उसका हर बंदा एक समान हैसियत रखता है। कोई भेद नहीं। मुसलमान दावा भी करते हैं कि वे एक पंगत में बैठकर नमाज अदा करते हैं और एक ही पंगत में बैठकर खाते हैं पर यह भी हकीकत है कि उनकी यह एकजुटता कुछ खास मकसद तक सिमट कर रह जाती है। कायदे से मुसलमानों में जाति व्यवस्था नहीं होनी चाहिये पर चूंकि भारत में रहने वाले बहुसंख्यक मुसलमान स्थानीय मूल के ही लोग हैं जिन्होंने किन्हीं कारणों से इस्लाम स्वीकार कर लिया था और जब वे मुसलमान बने तो अपने साथ वे न सिर्फ अपनी जीवनशैली ले गये बल्कि जाति व्यवस्था को भी ले गये। इसीलिये मुस्लिम समाज में भी अनेक जातियां हैं। मसलन जुलाहे, बढ़ई, लुहार, धुनिया, नाई आदि। मुसलमानों में भी तथाकथित ऊंची और नीची जातियां होती हैं ऊंची जातियों में प्रमुख हैं- सैय्यद, लोधी, पठान वगैरह। अब अगर कोई गरीब मुसलमान जुलाहा किसी पठान या सैययद के बैटे से अपनी बेटी के निकाह का पैगाम लेकर जाए तो उसे कामयाबी नहीं मिलेगी। शायद इज्जत बचाकर लौटना भी मुश्किल होगा। ठीक वैसे ही जैसे हिन्दुओं में अगर कोई केवट जाति का पिता ब्राह्मण परिवार में अपनी कन्या का प्रस्ताव लेकर जाये तो उसके साथ भी ऐसा ही होगा। इसलिये यह मानना कि सारे हिन्दू एक तरफ हैं और सारे मुसलमान एक तरफ, गलत होगा।


हिन्दूओं की तरह ही मुसलमानों में बहुसंख्यक लोग ऐसे हैं जिन्हें मजहब से ज्यादा रोजी रोटी की फिक्र है। वे चाहे पाकिस्तान में रह रहे हों या भारत में। लाहौर में बसे राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर मुबारक अली बताते हैं कि पाकिस्तान की पढ़ी लिखी आबादी तालिबान की नीतियों की समर्थक नहीं है। उन्हें डर है कि अगर कठमुल्लापन इसी तरह बढ़ता गया और इसे रोका न गया तो पाकिस्तान की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था चूर चूर हो जाएगी


मिस्त्र, इरान, इराक, मलेशिया, इंडोनेशिया और तमाम दूसरे ऐसे देश हैं जो घोषित रूप से इस्लाम में आस्था रखने वाले देश हैं पर अगर इनकी तरक्की, वेशभूषा और आधुनिकता को देखा जाए तो यह आश्चर्य होगा कि मुसलमान होते हुए भी ये इतने प्रगतिशील कैसे हैं। इन देशों के संतुश्ट और खुशहाल नागरिक बताते हैं कि उन्होंने कुरान के मूल संदेश को अपनाया है। पर साथ ही हर मोर्चे पर आगे बढ़ने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता।


जिन लोगों को 1980 के मुरादाबाद के साम्प्रदायिक दंगों की याद है उन्हें ये भी याद होगा कि इन दंगों के बाद मुरादाबाद के कलात्मक बर्तनों के निर्यात में भारी कमी आयी थी। जिसके बाद हजारों हुनरमंद कारीगरों को बदहाली से मजबूर होकर अपने बच्चों के पेट पालने के लिये रिक्शा चलाना पड़ा। जो यह करने के बाद भी अपने बच्चों का पेट नहीं भर सके उन्होंने पूरे परिवार को तेजाब पिलाकर खुद भी पी लिया और खुदा को प्यारे हो गये। आज हालात फिर वैसे ही बन रहे हैं।


दुर्भाग्य से अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिये तमाम सियासती लोग और मजहबों के ठेकेदार देश की जनता को धार्मिक और जातीय खेमों में बांटते जा रहे हैं। जिसका भारी खामियाजा देश की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। इसलिये ऐसे संवेदनशील माहौल में जब आतंकवाद का चारों तरफ तांडव हो रहा हो भारत के मुसलमानों को चाहिये कि वे वतनपरस्ती की एक ऐसी जलवाफरोशी करें कि उनके आलोचक भी दंग रह जायें। अक्सर यह सवाल उठाया जा सकता है कि इसी मुल्क में पैदा होने के बावजूद मुसलमानों से बार बार देश प्रेम का सबूत क्यों मांगा जाता है ? सवाल बिल्कुल जायज है। क्या ऐसा नहीं है कि देश के साथ अनेक मोर्चों पर गद्दारी करने वालों में विभिन्न प्रांतों के अनेक हिन्दू ही शामिल रहे हैं तो फिर ऐसी अपेक्षा मुसलमानों से ही क्यो? इसकी एक वजह है। पिछले कुछ वर्षों से देश में फैल रहे आतंकवाद में शामिल नौजवान मुस्लिम समाज से ही आये हैं। इसलिये अगर देश की शेष जनता मुस्लिम समुदाय और आतंकवादियों के बीच सीधा सम्बन्ध देखती है तो यह अस्वाभाविक नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे अमरीका में हुए आतंकवादी हमले के बाद अमरीकी जनता ने एक सरदार जी को इसलिये मार डाला क्योंकि उनकी शक्ल ओसामा बिन लादेन से मिलती थी। गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है। 


इसलिये भारत के मुसलमानों को चाहिये कि वे कट्टरपंथी और दहशतगर्दों से बचकर रहे। इतना ही नहीं इनको पकड़वाने और इनके हौसले नाकामयाब करने में सक्रिय हों। देश भर में होने वाले आतंकी हमले, ख़ासकर जम्मू कश्मीर में होने वाले  भयानक विस्फोटों की निंदा सारे भारत में उसी तरह की जानी चाहिये जैसे अमरीका में रहने वाले हर धर्म के लोगों ने न्यूयार्क के हमले के विरोध में प्रदर्शन और प्रार्थनायें कीं। यदि ऐसा किया जाता है तो इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। न सिर्फ फिरकापरस्त सियासतदानों के हौसले पस्त होंगे बल्कि समाज में जानबूझकर पैदा कर दी गयी खाई भी पटने लगेगी। इसमें कोई बुरा मानने की बात नहीं है। मौके की नजाकत को देखकर कभी कभी हमें रोजमर्रा की जिंदगी से हटकर भी कुछ करना पड़ता है। इससे आवाम का ही फायदा होता है। उम्मीद की जानी चाहिये कि भारत के मुसलमान वक्त के इस नाजुक दौर में परिपक्वता और होशियारी का परिचय देंगे ताकि हर परिवार में खुशहाली और अमन चैन बढ़े, नफरत और बैर नहीं।