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Monday, July 8, 2013

उत्तराखंड का सबक: मीडिया अपना रवैया बदले

उत्तराखंड की तबाही और मानवीय त्रासदी पर देश के मीडिया ने बहुत शानदार रिर्पोटिंग की है। दुर्गम स्थितिओं में जाकर पड़ताल करना और दिल दहलाने वाली रिर्पोट निकालकर लाना कोई आसान काम नहीं था। जिसे टीवी और प्रिंट मीडिया के युवा कैमरामैनों व संवादाताओं ने पूरी निष्ठा से किया। जैसा कि ऐसी हर दुर्घटना के बाद होता है, अब उत्तराखंड से ध्यान धीरे-धीरे हटकर दूसरे मुद्दों पर जाने लगा है। जो एक स्वभाविक प्रक्रिया है। पर यहीं जरा ठहरकर सोचने की जरुरत है। पिछले कुछ वर्षों में, खासकर टीवी मीडिया में, ऐसा कवरेज हो रहा है जिससे सनसनी तो फैलती है, उत्तेजना भी बढ़ती है, पर दर्शक कुछ सोचने को मजबूर नहीं होता। बहुत कम चैनल हैं जो मुद्दों की गहराई तक जाकर सोचने पर मजबूर करते हैं। इस मामले में आदर्श टीवी पत्रकारिता के मानदंडों पर बीबीसी जैसा चैनल काफी हद तक खरा उतरता है। जिन विषयों को वह उठाता है, जिस गहराई से उसके संवाददाता दुनिया के कोने-कोने में जाकर गहरी पड़ताल करते हैं, जिस संयत भाषा और भंगिमा का वे प्रयोग करते हैं, उसे देखकर हर दर्शक सोचने पर मजबूर होता है।
 
जबकि हमारे यहां अनेक संवाददाता और एंकरपर्सन खबरों पर ऐसे उछलते हैं मानो समुद्र में से पहली बार मोती निकाल कर लाये हैं। इस हड़बड़ी में रहते हैं कि कहीं दूसरा यश न ले ले। फिर भी वही सूचना और वाक्य कई-कई बार दोहराते हैं। इस हद तक कि बोरियत होने लगे। अनेक समाचार चैनल तो ऐसे हैं जिनकी खबरें सुनकर लगता हैं कि धरती फटने वाली हैं और दुनियां उसमें समाने वाली है। जबकि खबर ऐसी होती है कि खोदा पहाड़ निकली चुहिया। इस देश में खबरों का टोटा नहीं है। पहले कहा जाता था कि अगर कहीं खबरें न मिले तो बिहार चले जाओ, खबरें ही खबरें मिलेंगी। अब तो पूरे देश की यह हालत है। हर जगह खबरों का अम्बार लगा है। उन्हें पकड़ने वाली निगाहें चाहिए।
 
हत्या, बलात्कार, चोरी और फसाद की खबरें तो थोक में मिलती भी हैं और छपती भी हैं। पर विकास के नाम पर देश में चल रहे विनाश के तांडव पर बहुत खबरें देखने को नहीं मिलती। फ्लाईओवर टूटकर गिर गया, तब तो हर चैनल कवरेज को भागेगा ही, पर कितने चैनल और अखबार हैं जो देश में बन रहे फ्लाईओवरों के निर्माण में बरती जा रही कोताही और बेईमानी को समय रहते उजागर करते हैं ? ऐसी कितनी खबरें टीवी चैनलों पर या अखबारों में आती हैं जिन्हें देख या पढ़कर ऐसे निर्माण अधर में रोक देना सरकार की मजबूरी बन जाये। सांप निकलने के बाद लकीर पर लठ्ठ बजाने से क्या लाभ ?
 
आज देश में विकास की जितनी योजनाएं सरकारी अफसर बनवाते हैं, उनमें से ज्यादातर गैर जरूरी, फिजूल खर्चे वाली, जनविरोधी और पर्यावरण के विपरीत होती है। जिससे देश के हर हिस्से में रात- दिन उत्तराखंड जैसा विनाशोन्मुख ‘विकास‘ हो रहा है। इन योजनाओं को बनाने वालों का एक ही मकसद होता है, कमीशनखोरी और घूसखोरी। इसलिए ऐसे कन्सलटेन्ट रखे जाते है जो अपनी प्रस्तावित फीस का 80 फीसदी तक काम देने वाले अफसर या नेता को घूस में दे देते हैं। बचे बीस फीसदी में वे अपने खर्चे निकालकर मुनाफा कमाते हैं, इसलिए काम देने वाले कि मर्जी से उटपटांग योजनाएं बनाकर दे देते हैं। इस तरह देश की गरीब जनता का अरबों-खरबों रुपया निरर्थक योजनाओं पर बर्बाद कर दिया जाता है। जिसका कोई लाभ जनता को नहीं मिलता। हां नेता, अफसर और ठेकेदारों के महल जरूर खड़े हो जाते हैं। देश में दर्जनों समाचार चैनल और सैकड़ों अखबार हैं। उनकी युवा टीमों को सतर्क रहकर ऐसी परियोजनाओं की असलियत समय रहते उजागर करनी चाहिए। पर यह देख कर बहुत तकलीफ होती है कि ऐसे मुद्दें आज के युवा संवाददाताओं को ग्लैमरस नहीं लगते। वे चटपटी, सनसनीखेज खबरों और विवादास्पद बयानों पर आधारित खबरें ही करना चाहते हैं। कहते है इससे उनकी टीआरपी बढ़ती है। उन्हें लगता है कि जनता विकास और पर्यावरण के विषयों में रुचि नहीं लेगी।
 
जबकि हकीकत कुछ और है। अगर उत्तराखंड की वर्तमान त्रासदी पर पूरा देश सांस थामें पन्द्रह दिन तक टीवी के परदे के आगे बैठा रहता है, तो जरा सोचिए कि ऐसी त्रासदियों की याद दिलाकर देश की जनता और हुक्मरानों को उनकी विनाशकारी नीतियों और परियोजनाओं के विपरीत चेतावनी क्यों नहीं दी जा सकती ? जनता का ध्यान उनसे होने वाले नुकसान की तरफ क्यों नही आकृष्ट किया जा सकता ? जब जनता को ऐसी खबरें देखने को  मिलेंगी तो उसके मन में आक्रोश भी पैदा होगा और सही समाधान ढूंढने की ललक भी पैदा होगी। आज हम टीवी बहसों में या अखबार की खबरों में भ्रष्टाचार के आरोप-प्रत्यारोपों वाली बहसें तो खूब दिखाते हैं पर किसी परियोजना के नफे -नुकसान को उजागर करने वाले विषय छूते तक नहीं। पौराणिक कहावत है- कुछ लोग दूसरों की गलती देखकर सीख लेते हैं। कुछ लोग गलती करके सीखते हैं और कुछ गलती करके भी नहीं सीखते। मीडिया को हर क्षण ऐसा काम करना चाहिए कि लोग त्रासदियों के दौर में ही संवेदनशील न बनें बल्कि हर क्षण अपने परिवेश और पर्यावरण के विरुद्ध होने वाले किसी भी काम को, किसी भी हालत में होने न दें। तभी मीडिया लोकतंत्र का चैथा खम्बा कहलाने का हकदार बनेगा और तभी उत्तराखंड जैसी त्रासदियों को समय रहते टाला जा सकेगा। 

Monday, July 1, 2013

प्राकृतिक आपदा के बहाने क्या-क्या ?

उत्तराखंड में बाढ़ की विभीषिका की खबरें आना जारी हैं। इस आपदा की तीव्रता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2 हफ्ते बाद भी यह पता नहीं चल पा रहा है कि विभीषिका में कितनी जानें गयी। लेकिन हद की बात यह है कि उत्तराखंड की इस आपदा को लेकर कुछ लोग राजनीतिक नफा-नुकसान का हिसाब लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं।
 
राजनीति के अलावा मीडिया का रुख और रवैया दूसरा पहलू है। तबाही के तीन दिन बाद से यानि 10 दिन से मीडिया भी उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा की करुण व्यथा के चित्र दिखा रहा है। इन वीभत्स और भयानक दृश्यों के जरिये कुल मिलाकर एक ही बात बतायी जाती है कि इस आपदा की विभीषिका के असर को कम करने में प्रशासन नाकाम रहा। शुरु में जिला स्तर के प्रशासन की लाचारी की बातें उठीं और बाद में प्रदेश स्तर पर शासन और प्रशासन की बेबसी की बातें होने लगीं। आज यानि 2 हफ्ते बाद भी उत्तराखंड में राजनीतिक विपक्ष और मीडिया सरकार को कटघरे में खडा कर रहा है। वैसे इस आपदा के विश्वसनीय आंकडे अभी तक किसी के पास नहीं है। सरकारी स्तर पर यानि दस्तावेजों की जानकारी के मुताबिक अब तक 1 हजार लोगों के मारे जाने का अनुमान है। उधर विपक्ष और मीडिया इससे 10 गुना ज्यादा लोगों की मौत का अंदाजा बता रहा है। इसके साथ ही 3 से 7 हजार लोगो की लापता होने की भी जानकारियां दी जा रहीं हैं। इस आपदा को लेकर टीवी चैनलों और अखबारों में खूब बहस और नोंक-झोंक हो रहीं हैं। क्या हमें इन बहसों के मकसद पर भी ध्यान नहीं देना चाहिए ? इस आपदा के बारे में सोचें तो तीन बातें सामने आतीं हैं। पहली ये कि हम इस प्रकृतिक आपदा से कुछ सबक ले सकें और भविष्य में आपदा से बचने के लिए कोई विश्वसनीय व्यवस्था कर सकें। यानि ऐसा कुछ कर पायें जो आपदा प्रबंधन व्यवस्था को सुनिश्चित कर सके। दूसरी बात यह है कि प्रशासन को कटघरे में लाकर उसे जबाबदेह बनाने का इंतजाम कर सकें। और तीसरी बात यह है कि शासन को घेरकर जनता को यह बताने की कोशिश करें कि आपदा के बाद की स्थिति से निपटने में आपकी सरकार नाकाम रही। लेकिन यहां सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या विगत में ऐसी आपदाओं से हमने कोई सबक नहीं लिया था? इस बारे में कहा जा सकता है कि आपदा प्रबंधन को लेकर पिछले 2 सालों से जिला स्तर तो क्या बल्कि तहसील स्तर पर भी जोर-शोर से कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। लेकिन ये कोशिशें जागरूकता अभियान चलाने के आगे जाती नहीं दिखीं। अब सवाल यह है कि क्या देश के 600 जिलों के लिए हम 2 लाख करोड़ रुपये का अलग से इंतजाम करने की स्थिति में हैं ? उत्तराखंड की इस विभीषिका का पूर्वानुमान करते हुए क्या कोई आपदा प्रबंधन व्यवस्था बनाने में हम आर्थिक रुप से समर्थ हैं ? सवाल यहीं नहीं खत्म होते क्योंकि ऐसी प्राकृतिक आपदा के खतरे के दायरे में उत्तराखंड के अलावा 100 से ज्यादा इलाके आते हैं।
 
जलवायु विशेषज्ञांे को पता होता है कि विलक्षण जलवायु विविधता वाले भारत वर्ष में कैसी संभावनाएं और अंदेशे हैं। उन्हें यह भी पता होता है कि जलवायु संबधी अध्ययनों मे 75 साल के आंकडों के आधार पर ही हमें अपना नियोजन करना चाहिए। लेकिन देश भर में यह स्थिति है कि 25 साल के आंकडों के आधार पर ही नियोजन होने लगा है। बाढ़, सूखा, भूकम्प के लिहाज से अंदेशों वाले इलाकों में नदियों के किनारे की जमीन पर निर्माण हो रहे हैं। तालाबों को पाटकर वहां बस्तियां बसायी जा रही हैं। यानि बारिश के पानी को वहीं रोककर रखने की पारम्परिक व्यवस्था भी टूट रही है। अगर इस तरफ ध्यान नहीं दिया जाता तो हमें ऐसी विपत्तियों से कौन बचा सकता है।
 
जब हम प्रकृति के स्वभाव को बदलने का कोई उपाय कर ही नहीं सकते तो हमारे पास एक ही उपाय बचता है कि हम अपने प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का प्रबंध और नियोजन प्रकृति की इच्छा के अनुरुप करना सीखें। हमें फौरन 75 या 100 साल के पिछले आंकडों के हिसाब से नियोजन करना होगा। नदियों के किनारे बनाए गये निर्माणों और वहां बसायी गयी बस्तियों पर फौरन गौर करना होगा। उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा से हमें यह साफ संदेश मिल रहा है, कि हम अपनी छोटी-बडी नदियों के पाटों का पुनःनिर्धारण कर लें। देश में उत्तराखंड की इस आपदा से हमें यह सबक भी मिल रहा है कि वर्षा के जल का स्थानीय तौर पर ही प्रबंधन करना बुद्धिमत्तापूर्ण है। इसके लिए यह सुझाव भी दिया जा सकता है, कि देश में पारम्परिक तौर पर मौजूद 10-12 लाख तालाबों की जलधारण क्षमता की बहाली करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। लगे हाथ यह भी याद दिलाया जा सकता है, कि टिहरी बाध की जलधारण क्षमता के कारण ही उत्तराखंड की विभीषिका के और ज्यादा भयानक हो जाने की स्थिति से हम बच गये हैं। इन सब बातों के मद्देनजर हमें अपनी नीतिओं और नियोजन के तरीके पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है।

Monday, June 24, 2013

धर्मस्थलों का व्यवसायीकरण

केदारनाथ से लेकर शेष उतराखंड में भोले नाथ का तांडव और माँ गंगा का रौद्र रूप हम सबके सामने है। जिसने भोगा नहीं उसने टीवी पर देखा या अखबार में पढ़ा। सबके कलेजे दहल गये हैं पर यह क्षणिक चिन्ता है। हफ्ते-दस दिन बाद कोई नई घटना भयानक इस त्रासदी से हमारा ध्यान हटा देगी। फिर पुराना ढर्रा चालू हो जायेगा। इसलिए कुछ खास बातों पर गौर करना जरुरी है।
 
जब से देश में टीवी चैनलों की बाढ़ आयी है तब से धार्मिक प्रवचनों का भी अंबार लग गया है। हर प्रवचनकर्ता पूरे देश और दुनियां के लोगों को अपने-अपने तीर्थस्थलों पर रात दिन न्यौता देता रहता है। इस तरह अपने अनुयायियों के मन पर एक अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल देता है। इसलिए वे पहले के मुकाबले कई सौ गुना ज्यादा संख्या में तीर्थाटन को जाने लगे है। संचार और यातायात के साधनों मे आयी आशातीत प्रगति इन यात्राओं को और भी सुगम बना दिया है। इस तरह एक तरफ तो तीर्थस्थल जाने वालों का हुजूम खड़ा रहता है और दूसरी तरफ सम्बंधित राज्यों की सरकारें इतने बडे हुजूम को संभालने के लिए कोई माकूल व्यवस्था नहीं कर रही है। नतीजतन निजी स्तर पर होटल, टैक्सी, धर्मशाला, व बाजार आदि कुकुरमुत्ते की तरह इन तीर्थस्थलों पर अवैध रुप से बढ़ते जा रहे है। जिससे इन सभी तीर्थस्थलों की व्यवस्था चरमरा गई है। उतराखंड का ताजा उदाहरण उसकी एक  बानगी मात्र है। पिछले वर्षों में हमने बिहार, हिमाचल, राजस्थान और महाराष्ट्र के देवालयों मे मची भगदड मे सैकडों मौतों को इसी तरह देखा है। जब ऐसी दुर्घटना होती है तो दो-तीन दिन तक मीडिया इस पर शोर मचाता है फिर सब अगली दुर्घटना तक के लिए खामोश हो जाता है।
 
जरुरत इस बात की है कि तीर्थस्थलों के सही विकास, प्रबंधन व रखरखाव के लिए एक राष्ट्र नीति घोषित की जाये। इस नीति के तहत ऐसे सभी तीर्थस्थलों के हर पक्ष को एक केन्द्रीयकृत ईकाई अधिकार के साथ मॉनीटर करे और उस राज्य के सम्बंधित अधिकारी इस के अधीन हों। जिससे अनुभव, योग्यता, नेतृत्व की क्षमता और केन्द्र सरकार से सीधा समन्वय होने के कारण यह ईकाई देश के हर तीर्थस्थल के लिए व्यवहारिक और सार्थक नीतियाँ बना सके। जिन्हें शासन से स्वीकृत करा कर समयबद्ध कार्यक्रम के तहत लागू किया जा सके। इसके कई लाभ होंगे एक तो तीर्थस्थलों के विकास के नाम पर जो विनाश हो रहा है वो रुकेगा, दूसरा योजनाबद्ध तरीके से विकास होगाः तीसरा किसी भी संकट की घड़ी में अफरा तफरी नहीं मचेगीः
 
इसके साथ ही आवश्यक है कि हज यात्रा की तरह या कैलाश-मानसरोवर की तरह शेष तीर्थस्थलों में भी यात्रियों के जाने की सीमा को निर्धारित करके चले। देश दुनिया के लोगों देश दुनिया के लोगों से तीर्थ यात्रा पर जाने के लिए आवेदन लिए जायें। उन्हें एक पारदर्शी प्रक्रिया के तहत शारीरिक क्षमता के अनुसार चुना जाये। फिर उन्हें सम्बंधित यात्राओं के जोखिम के बारे में प्रशिक्षित किया जाये, जिससे वे ऐसी अप्रत्याशित त्रासदी में भी अपनी स्थिति संभालने मे भी सक्षम हों। इसके साथ ही तीर्थस्थलों पर जो अरबों रुपया साल भर में दान में आता है। उसे नियंत्रित कर उस तीर्थ स्थल के विकास की व्यवहारिक योजनाएं तैयार की जायें। जिसमें पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से संवेदनहीनता न हो, जैसा आज तीर्थस्थलों में विकास के नाम पर दिखाई दे रहा है। जिससे इन तीर्थ स्थलों का तेजी से विनाश होता जा रहा है। इस पहल से साधनों की कमी नहीं रहेगी और दानदाताओं को अपने प्रिय धर्मक्षेत्र के सही विकास में योगदान करने का अवसर प्राप्त होगा। वरना यह अपार धन चन्द लोगों की जेबों में चला जाता है। जिसका कोई सद्उपयोग नहीं होता। यहां इस बात का विशेष ध्यान रखा जाये कि जिस धर्म क्षेत्र में ऐसा धन एकत्र हो रहा हो उसे उसी धर्मक्षेत्र के विकास पर लगाया जाये। अन्यथा इसका भारी विरोध होगा। इस बात का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि सरकारी अधिकारी सहयोग करने के लिए तैनात हों, रूकावट ड़ालने के लिए नहीं। योजनाओं के क्रियान्वन मे भी दानदाताओं के प्रतिनिधिओं का का भी नियंत्रण रहना चाहिए।
 
उतराखंड की त्रासदी पर आसूं बहाना और वहां की पिछली हर सरकार को कोसना बडी स्वाभाविक सी बात है। क्योंकि भाजपा और कांग्रेस की इन सरकारों ने ही उतराखंड में प्रकृति के विरोध में जाकर अंधाधुंध अवैध निर्माण को संरक्षण प्रदान किया है। जिसका खामियाजा आज आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। पर इस बर्बादी के लिए आम जनता भी कम जिम्मेदार नहीं। इसने तीर्थ स्थाटन का मूल सिद्धान्त ही भूला दिया है। पहले मन की शुद्धि और आत्मा की वृद्धि के लिए जोखिम उठाकर तीर्थ जाया जाता था। तीर्थ जाना मानों तपस्चर्या करना। आज ऐसी भावना से तीर्थ जाने वाले उंगलियों पर गिने जाते है। हम जैसे ज्यादातर लोग तो तीर्थ यात्रा पर भी गुलछर्रे उडाने और छुट्टियाँ मनाने जाते है। इससे न सिर्फ तीर्थस्थलों की दिव्यता नष्ट होती है बल्कि वहां के प्राकृतिक संसाधनों का भी भारी विनाश होता है। जो फिर ऐसी ही सुनामी लेकर आता है। इसलिए अब जागने का वक्त है। हम अगर सनातन धर्म के अनुयायी हैं तो हमें अपने सनातन धर्म की इस अत्यावश्यक सेवा के लिए उत्साह से आगे बढ़ना चाहिए।