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Monday, January 27, 2025

जीना है तो पीने की आदत बदलें


शर्बत और लस्सी के देश भारत के अधिकांश लोग पश्चिमी बयार में बहकर खुद को ‘मॉडर्न’ साबित करने के लिए ‘दूषित’ शीतल पेयों का जमकर उपयोग कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन शीतल पेयों के जरिए हम ऐसे कीटनाशकों को निगल रहे हैं, जिनके लंबे समय तक सेवन करने से कैंसर, स्नायु और प्रजनन तंत्र को क्षति, जन्मजात शिशुओं में विकृति और इम्यून सिस्टम तक में खराबी आ सकती है। कुछ समय पहले हुए एक शोध से यह बात सामने आई कि आकर्षक विज्ञापनों के जरिए बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जिन शीतल पेयों को आम भारतीयों के गले के नीचे उतार रही हैं, वह सेहत के लिए बिल्कुल भी मुफीद नहीं हैं। परंतु बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस बात का खंडन करती रहती हैं। वास्तविकता क्या है, यह तो विस्तृत जांच पड़ताल के बाद ही पता चलेगा। गैर सरकारी संगठन सेंटर फॉर  साइंस एंड एन्वायरन्मेंट (सीएसई) के अनुसार यह विदेशी कंपनियां भारत के साथ भेदभाव बरत रही हैं। अमेरिका और अन्य दूसरों देशों में इनके उत्पादों की गुणवत्ता का बारीकी से ध्यान रखा जाता है, जबकि भारत में यह पैसे बचाने के लिए कीटनाशकों का घोल जनता को पिलाते हैं।



पर, पेय पदार्थों में अपशिष्ट पदार्थों की मिलावट सिर्फ विदेशी कंपनियों के इन शीतल पेयों तक ही सीमित नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व बोतल बंद मिनरल वाटर के दूषित होने को लेकर भी काफी बवाल मचा था। उस समय सीएसई ने देसी-विदेशी विख्यात कंपनियों के बोतल बंद पानी के दिल्ली में 17 और मुंबई में 13 उत्पादों की जांच कर उनमें लिन्डेन, डीडीटी, क्लोरोपाइरोफोस, मेलाथियाॅन जैसे कीटनाशक पाए जाने की पुष्टि की थी। इसके बाद सरकार को होश आया और उसने भारतीय मानक ब्यूरो की सिफारिश के आधार पर बोतल बंद पानी की शुद्धता बरकरार रखने के लिए खाद्य अपमिश्रण कानून में कुछ फेरबदल कर इन्हें लागू करवा दिया। हालांकि भारत के अधिकांश लोग नगर पालिका या नगर निगम द्वारा आपूर्ति किया जाने वाला जल अथवा नदियों के पानी को ही पीते हैं। नगर पालिकाएं या नगर निगम इस पानी को स्वच्छ करने के लिए क्या कदम उठाती है, यह किसी से छिपा नही है। बाहरी जल की तो छोड़िए, पृथ्वी पर बढ़ते प्रदूषण के कारण भूगर्भीय जल भी अब स्वच्छ नहीं रहा है। कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोगों से अनाज, सब्जी और फल तक दूषित हो गए हैं। यदि इनकी बिना सफाई किए हुए यूं ही खा लिया जाए, तो यह सेहत बनाने के बजाए उसका बेड़ागर्क कर देंगे। ज्यादा पैदावार के चक्कर में किसान रासायनिक खादों का बेतरतीबी से इस्तेमाल कर रहे है। इसके दुष्परिणाम भी उनके सामने आने लगे हैं। भूमि बंजर हो रही है। उपज की गुणवत्ता में कमी आई है। जमीन से उपयोगी तत्व नष्ट हो रहे हैं, आदि-आदि।



कभी जहां इस देश में दूध-दही की नदियां बहा करती थीं, अब वहां हर चीज में मिलावट का आलम है। यहां तक कि दूध भी इससे अछूता नहीं रह गया है। थोड़े से लाभ के लिए लोग सेहत के लिए बेहद नुकसानदेह पदार्थों से नकली दूध तैयार कर लोगों को पिला रहे हैं। यूरिया, साबुन, और तेल जैसी खतरनाक चीजों को मिलाकर बनने वाले इस दूध में दूध नाम की कोई चीज ही नहीं होती। लोग अज्ञानतावश मानव सभ्यता के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। इन्हें नहीं पता कि इस दूध को पीकर हमारे नौनिहाल, जो देश का भविष्य हैं, कितनी बीमारियों के चंगुल में फंस जाएंगे। डॉ वर्गीज कुरियन ने भी भारत में ‘ऑपरेशन फ्लड’ शुरू करते समय यह नहीं सोचा होगा कि आम लोगों को दूध मुहैया कराने के लिए वह जिन डेयरियों को खुलवाने की बात कह रहे हैं, उनमें बरती जाने वाली लापरवाही गाय और भैंसों के लिए तो जानलेवा साबित होंगी ही, साथ ही वहां से मिलने वाला दूध भी आम आदमी के लिए मुफीद नहीं रहेगा। भारत में डेयरियों की हालत ज्यादा अच्छी नहीं है। ज्यादा दूध लेने के चक्कर में गायों को हर साल गर्भवती करवा दिया जाता है, क्योंकि बच्चा होने के बाद दस माह तक वह ज्यादा दूध देती हैं। हर रोज उन्हें ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं ताकि वे ज्यादा दूध दे सकें। परंतु यह इंजेक्शन उनके लिए कितने हानिकारक हैं, यह दूध दुहने वाले और डेयरी मालिक शायद नहीं जानते। अगर उन्हें पता है तो वह और भी गंभीर अपराध कर रहे हैं, क्योंकि जानबूझकर किसी को मौत के मुंह में धकेलना, भारतीय ही नहीं विदेशी कानून में भी अपराध की श्रेणी में आता है। यह सभी तरीके इन बेजुबान जानवरों के लिए तो खतरनाक है ही, साथ ही इनका दूध पीने वालों के लिए भी कम नुकसानदेह नहीं हैं।


इंडियन काउन्सिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) द्वारा सात साल के शोध के बाद निकाले नतीजों में पाया कि जिस गाय के दूध को सदियों से हम पूर्ण आहार मानकर पीते चले आ रहे हैं, वह भी कीटनाशकों से भर गया है। उसमें भी डाईक्लोरो डाई फिनाइल ट्राइक्लोरोईथेन (डीडीटी), हैक्साक्लोरो साइक्लोहैक्सेन (एचसीएच), डेल्ड्रिन, एल्ड्रिन जैसे खतरनाक कीटनाशक भारी मात्रा में मौजूद हैं। रिपोर्ट कहती है कि यदि अल्सर से पीडि़त किसी व्यक्ति को डेयरी का दूध और उसके उत्पाद खाने-पीने को दिए जाएं तो उसे दिल का दौरा पड़ने की संभावना दो से छह गुना तक बढ़ जाती है। भारतीय खाद्य अपमिश्रण कानून एक किलो में केवल 0.01 मिलीग्राम एचसीएच की अनुमति देता है, जबकि आईसीएमआर की रिपोर्ट में यह 5.7 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम निकला। इसके अलावा वैज्ञानिकों को दूध में आर्सेनिक, कैडमियम और सीसा जैसे खतरनाक अपशिष्ट भी मिले। यह इतने खतरनाक हैं कि इनसे किडनी, दिल और दिमाग तक क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।


बात सिर्फ गाय और भैंस के दूध तक ही सीमित नहीं है। खेती के दौरान भारी मात्रा में कीटनाशकों के प्रयोग से बच्चे के लिए अमृत कहा जाने वाला मां का दूध भी शुद्ध नहीं रह गया है। अमेरिका में हुए एक शोध में अमेरिकी औरत के दूध में कीटनाशकों के साथ-साथ सौ से भी ज्यादा औद्योगिक रसायन पाए गए। इस शोध में तो यहां तक कहा गया कि यदि इस दूध को बोतल में बंद करके बाजार में बेचने की कोशिश की जाए तो, अमेरिकी सरकार इसकी इजाजत नहीं देगी। पर, अनेक नुकसानदेह रसायनों के बावजूद मां का दूध बच्चे के पोषण के लिए बहुत जरूरी है। यह नवजात शिशु को अनेक बीमारियों से लड़ने की ताकत प्रदान करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि प्रतिवर्ष करीब दो लाख लोग कीटनाशकों को खाकर काल के गाल में समा जाते हैं। यह संख्या पिछले दस-12 सालों में लगभग सात गुनी हो गई है। संगठन की रिपोर्ट के अनुसार हर साल करीब 30 लाख लोग इन जहरों की चपेट में आते हैं और खास बात है कि इनमें से ज्यादातर बच्चे होते हैं।


कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से पैदा हुई इन स्थितियों को देखते हुए अनेक देशों ने तो इनका प्रयोग लगभग बंद ही कर दिया है और वे प्राकृतिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग करने लगे हैं। पर, भारत अभी पश्चिम की कदमताल कर रहा है। जिस तकनीक को वे उपयोग कर उसके बुरे प्रभावों को देखकर त्याग चुके हैं, भारतीय उनका अंधानुकरण कर रहे हैं। वे हमारी पुरातन संस्कृति और सभ्यता के गुणों से परिचित होकर उनका अध्ययन कर गूढ़ रहस्य को समझकर अपने जीवन में उतारने की कोशिश में लगे हैं, वहीं भारतवासी अपनी समृद्ध संपदा को छोड़कर पश्चिमी चकाचैंध के पीछे दीवाने हुए जा रहे हैं। तकनीक को अपनाना, चाहे वह अपने देश की हो या विदेश की, गलत नहीं है, पर उसके अच्छे और बुरे प्रभावों को जाने बिना उसका अंधानुकरण करना सही नहीं कहा जा सकता। 

Monday, October 7, 2024

क्या गाय का दूध पीना बंद कर दें?


अमरीका में हमारे एक शुभचिंतक सतीश जी है। जिन्होंने मुंबई आईआईटी से पढ़ाई करके अमरीका में अपार धन कमाया। पर वे अत्यंत धार्मिक हैं और शास्त्रों में पारंगत हैं। उन्होंने गौवंश की सेवा के लिए ब्रज की एक गौशाला को 800 करोड़ रुपये दान दिया था। पर अब वो ग़ोरस (दूध, दहीं, छाछ, मक्खन, पनीर आदि) के दैनिक जीवन में उपभोग के घोर विरोधी हो गये हैं और उस गौशाला को भी दान देना बंद कर दिया है। पिछले हफ़्ते मेरी उनसे बीस बरस बाद टेलीफोन पर बात हुई तो उन्होंने मुझसे ज़ोर देकर कहा कि मैं और मेरा परिवार गोरस का उपभोग तुरंत बंद कर दें और ‘वीगन’ बन जाएँ। आज दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे हैं जो वीगन बन चुके हैं। यानी वो पशु आधारित किसी भी खाद्य पदार्थ का सेवन नहीं करते। मतलब डेरी और मीट उत्पाद उनके भोजन से दूर जा चुके हैं। 



मैं सतीश जी के जीवन की पवित्रता, आध्यात्मिक ज्ञान, संस्कृत में संभाषण करने की क्षमता और धर्मार्थ कार्यों में उदारता से दान देने की प्रवृत्ति का सम्मान करता हूँ। पर उनकी यह सलाह मेरे गले नहीं उतरी। मुरलीधर गोपाल के भक्त हम सब ब्रजवासी गोरस को अपने दैनिक जीवन से भला कैसे दूर कर सकते हैं? कल्पना कीजिए कि आपको गर्म दूध, ठंडी लस्सी, पेड़े, गोघृत में चुपड़ी रोटी और नामक जीरे की छौंक लगी छाछ या मलाईदार क़ुल्फ़ी के सेवन से अगर अचानक वंचित कर दिया जाए तो हम ब्रजवासी जल बिन मछली की तरह तड़प जाएँगे। हम ही क्यों, बाहर से श्री वृंदावन बिहारी के दर्शन करने आने वाले करोड़ों भक्त, दर्शन करने के बाद सबसे पहले कुल्हड़ की लस्सी और वृंदावन के पेड़ों पर ही तो टूट कर पड़ते हैं। अगर उन्हें ये ही नहीं मिलेगा और ठाकुर जी की प्रसादी माखन मिश्री नहीं मिलेगी तो क्या ब्रज आने का उनका उत्साह आधा नहीं रह जाएगा? 



पर सतीश जी का तर्क भी बहुत वज़नदार है। उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं ओटीटी प्लेटफार्म पर जा कर एक फ़िल्म ‘माँ का दूध’ अवश्य देखूँ। ये ढाई घंटे की फ़िल्म बहुत गहन शोध और मेहनत से बनाई गई है। इसे देखने वाले का कलेजा काँप उठेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि इस फ़िल्म को देखने से पता चलता है कि दूध के नाम पर अपने को शाकाहारी और सात्विक मानने वाले हम लोग भी, जाने-अनजाने ही पशु हिंसा के भयंकर पाप कर्म में लिप्त हो रहे हैं। ये फ़िल्म हम सब की आँखें खोल देती है, ये बता कर कि हम पढ़े-लिखे लोग भी किस तरह अपनी अज्ञानता के कारण अपने भोजन में नित्य ज़हर खा रहे हैं। आज महामारी की तरह फैलता कैंसर रोग इसका एक प्रमाण है। 


मैंने सतीश जी के कहने पर अभी गोरस का प्रयोग बंद नहीं किया है। पर फ़िल्म देखने के बाद मैंने उनसे कहा कि उनकी बात में बहुत वज़न है। पर ये भी कहा कि सदियों का अभ्यास क्षणों में आसानी से छोड़ा नहीं जाता। 


यहाँ आपके मन में प्रश्न उठेगा कि गोरस और शाकाहार करने वाले लोग पशु हत्या के पाप में कैसे लिप्त हो सकते हैं? इस फ़िल्म को देखने से पता चलता है कि दूध के लालच में बिना दूध देने वाली करोड़ों गायों और उनके बछड़ों को रोज़ क़त्ल किया जा रहा है और उनके मांस का व्यापार अन्य देशों की तुलना में तपोभूमि भारत में सबसे ज़्यादा हो रहा है। 



जब भगवान श्रीकृष्ण-बलराम गायों को चराते थे तब  भारत की अर्थव्यवस्था गोवंश और कृषि पर आधारित थी। गऊ माता के दूध, गोबर और मूत्र से हमारा शरीर व पर्यावरण पुष्ट होता था और बैल कृषि के काम आते थे। दूध न देने वाली बूढ़ी गाय और हल में न जुत सकने वाले बैल कसाईखाने को नहीं बेचे जाते थे। बल्कि परिवार के बुजुर्गों  की तरह उनकी घर पर ही आजीवन सेवा होती थी। उनकी मृत्यु पर परिवार में ऐसे ही शोक मनाया जाता था जैसे कि परिवार के मुखिया के मरने पर मनाया जाता है। 


पिछले दशकों में आधुनिक खेती के नाम पर खनिज, उर्वरक, कीटनाशक, डीज़ल ट्रेक्टर और अन्य आधुनिक उपकरणों को भारतीय किसानों पर क्रमशः थोप दिया गया। नतीजतन किसान की  भूमि उर्वरता, उसके परिवार का स्वास्थ्य, उसकी आर्थिक स्थिति और उसके परिवेश पर ग्रहण लग गया। इस तथाकथित विकसित कृषि ने उसे कहीं का न छोड़ा। ये मत सोचियेगा कि इस सबका असर केवल किसानों के परिवार पर ही पड़ा है। बल्कि आप और हम भी इस दुश्चक्र में फँस कर स्वस्थ जीवन जीने की संभावना से हर दिन दूर होते जा रहे हैं। 


क्या आप जानते हैं कि भारत में रोज़ाना मात्र 14 करोड़ लीटर दूध का उत्पादन होता है। जबकि भारत में हर दिन 64 करोड़ लीटर दूध और उससे बने पदार्थों की खपत होती है।ये खपत 50 करोड़ लीटर नक़ली सिंथेटिक दूध बनाकर ही पूरी की जाती है। गोपाल की लीलाभूमि ब्रज तक में नक़ली दूध का कारोबार खुलेआम धड़ल्ले से लिया जा रहा है। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है। इस तरह दूध के नाम पर हम सब अपने परिवार को ज़हर खिला रहे हैं। 


मूल प्रश्न पर लौटें, गौ रस पान से हिंसा कैसे होती है? जब केवल दूध की चाहत है तो दूध देना बंद करने वाली गायों को कसाईखाने में कटने के लिए भेज दिया जाता है। इसी तरह जब खेती में बैल की जगह ट्रेक्टर जुतने लगे तो बछड़े और बैल का धड़ल्ले से उपयोग मांस के व्यापार के लिए होने लगा है। इस तरह उनके हत्या के लिए हम सब भी अपराधी हैं। इस गंभीर विषय को पूरी तरह समझने के लिए आप ‘माँ का दूध’ फ़िल्म ज़रूर देखियेगा। ये गंभीर चर्चा हम आगे भी जारी रखेंगे। मैंने सतीश जी को यह आश्वासन दिया है कि इस गंभीर विषय पर मैं अभी और शोध करूँगा और इस समस्या के हल का अपने जीवन में हम क्या विकल्प सोच सकते हैं इस पर भी अनुभवी लोगों से प्रश्न पूछूँगा, तभी कोई निर्णय ले पाने की स्थिति में पहुँच पाऊँगा। पाठक भी इस विषय पर गहरी जाँच करें। 

Monday, February 1, 2016

दूध के नाम पर फरेब बंद हो

    इसी हफ्ते गुजरात उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका का संज्ञान लेते हुए सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता ने वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर यह बताने की कोशिश की है कि देशी गाय के मुकाबले जर्सी गाय का दूध स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इसलिए दूध विक्रेताओं को दूध के पैकेट या बोतलों पर यह साफ-साफ लिखना चाहिए कि जो दूध बेचा जा रहा है, वह देशी गाय का है या जर्सी गाय का। याचिकाकर्ता चिंतन गोहेल ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला है कि जर्सी गाय का दूध ए/1 श्रेणी का होता है। जबकि देशी गाय का दूध ए/2 श्रेणी का होता है। यह दूध स्वास्थ्यवर्धक और पाचक होता है। जबकि ए/1 श्रेणी का दूध न केवल पाचन में तकलीफ देता है, बल्कि कई रोगों का कारण भी बनता है। याचिकाकर्ता ने यूरोप, अमेरिका और आस्टेªलिया में हुए कई अनुसंधानों का हवाला देते हुए अपनी बात रखी है। उल्लेखनीय है कि वैज्ञानिक लेखक कीथ वुडफोर्ड ने अपनी पुस्तक ‘डेविल इन द मिल्क’ (दूध में राक्षस) में बताया है कि किस तरह जर्सी गाय का दूध पीने से मधुमेह, शीजोफर्निया, हृदय रोग और मंदबुद्धि जैसी बीमारियां पनपती हैं। विशेषकर 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों को जर्सी गाय का दूध बिल्कुल नहीं दिया जाना चाहिए। चिंता का बात यह है कि मदर डेयरी से लेकर सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियां और विभिन्न नगरों के दूध विक्रेता खुलेआम जर्सी गायों का दूध बेच रहे हैं और हमारी पूरी पीढ़ी को बर्बाद कर रहे हैं। जिन पर कोई रोकटोक नहीं है। इतना ही नहीं गाय का शुद्ध घी नाम से जो घी देशभर में बेचा जा रहा है, वो भी देशी गाय का नहीं है। याचिकाकर्ता की मांग बिल्कुल जायज है कि दूध और घी विक्रेताओं को डिब्बे पर साफ-साफ लिखना चाहिए कि ‘देशी गाय का दूध’ है या ‘देशी गाय का घी’ है। अगर ऐसा नहीं है, तो साफ लिखना चाहिए कि ‘जर्सी गाय का दूध’ या ‘जर्सी गाय का घी’। साथ ही यह चेतावनी भी छापनी चाहिए कि जर्सी गाय का दूध स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

    पिछले दिनों दादरी में जो गौहत्या को लेकर सांप्रदायिक तनाव बना था और जिसके विरोध स्वरूप कुछ मशहूर लोगों ने मुद्दे को अनावश्यक रूप से धार्मिक असहिष्णुता का मुद्दा बना दिया, उस वक्त ही हमने यह बात कही थी कि देशी गाय कोई धार्मिक या भावनात्मक मुद्दा नहीं है। शुद्ध रूप से वैज्ञानिक और आर्थिक मुद्दा है।
भारत के ऋषियों ने हजारों साल के वैज्ञानिक प्रयोगों के बाद योग, आयुर्वेद, गौसेवा, यज्ञ, संस्कृत पठन-पाठन, मंत्रोच्चारण आदि व्यवस्थाओं को व्यापक समाज के हित में स्थापित किया था। उनकी सोच और उनका दिया ज्ञान आज भी विज्ञान की हर कसौटी पर खरा उतरता है। पर इन मुद्दों को धार्मिक या भावनात्मक बनाकर हिंदू समाज का ही एक हिस्सा अपनी जग हंसाई करवाता है। जबकि आवश्यकता इस बात की है कि इन सब चीजों के वैज्ञानिक व आर्थिक आधार को जोर-शोर से प्रचारित किया जाय। अगर किसी को यह समझ में आ जाए कि देशी गाय उसके गौरस से बने पदार्थ और उसके गोबर और मूत्र से उस परिवार की संपन्नता, स्वास्थ्य, चेतना और आनंद में वृद्धि होती है, तो कोई क्यों गाय बेचे और काटेगा ? ठीक ऐसे ही अगर देशवासियों को पता चल जाए कि जर्सी गाय का दूध पीने के कितने नुकसान है, तो दूध और घी का धंधा करने वाले ज्यादातर लोगों की दुकानें बंद हो जाएगी।

अब सवाल उठता है कि दूध की तो वैसे ही देश में कमी है और अगर यह बवंडर खड़ा कर दिया जाए, तो हाहाकार मच जाएगा। ऐसा नहीं है। हमारे कत्लखाने उस औपनिवेशिक सोच का परिणाम है, जिसने साजिशन गौमाता का उपहास कर भारत के हुक्मरानों के दिमाग में गौवंश का सफाया करने का माडल बेच दिया है। सरकार किसी की भी हो, देशी गायों और उनके बछड़ों और बेलों की नृशंसा हत्या और मांस का कारोबार दिन दूना और रात चैगुना पनप रहा है। इस पर अगर प्रभावी रोक लगा दी जाए, तो पूरे भारत के समाज को सुखी, संपन्न और स्वस्थ बनाया जा सकता है।

चिंता की बात तो यह है कि परंपराओं और देशी इलाज की पद्धतियों का प्रचार-प्रसार करने वाली कंपनियां भी भारत की परंपराओं से खिलवाड़ कर रही हैं। उनके उत्पादों में आयुर्वेद के शुद्ध सिद्धांतों का पालन नहीं होता। पूरी दुनिया जानती है कि प्लास्टिक और प्लास्टिक से बने पदार्थ पर्यावरण के ऊपर आधुनिक समाज का आणविक हमला जैसा है। पर हर आयुर्वेदिक कंपनी प्लास्टिक के लिए डिब्बों और बोतलों में अपना माल बेचने में लगी है। बिना इस बात की परवाह किए कि यह प्लास्टिक देशभर के गांवों, जंगलों और शहरों में नासूर की तरह बढ़ती जा रही है।

कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि देशी गाय, गौवंश, बिना घालमेल के शुद्ध आयुर्वेदिक परंपरा और भारत की पुरातन प्राकृतिक कृषि व्यवस्था की स्थापना ही भारतीय समाज को सुखी, संपन्न और स्वस्थ बना सकती है। इसके लिए हर समझदार व्यक्ति को जागरूक और सक्रिय होना पड़ेगा। ताकि हम मुनाफे के पीछे भागने वाली कंपनियों के मकड़जाल से छूटकर भारत के हर ग्राम को गोकुल बना सकें।