Monday, October 17, 2016

हाकिमों की मौज पर पाबंदी


हाल ही में मोदी सरकार ने प्रशासनिक सुधारों की तरफ एक और कड़ा कदम उठाया है जिसके तहत केंद्र सरकार के ऊँचे पदों पर रहे आला अधिकारियों को मिल रही वो सारी सुविधाएं वापिस ले ली हैं जो वे सेवानिवृत होने के बावजूद लिए बैठे थे | मसलन चपरासी, ड्राइवर, गाड़ी आदि | इस तरह एक ही झटके में मोदी सरकार ने जनता का करोड़ों रुपया महीना बर्बाद होने से बचा लिया | इतना ही नहीं भिवष्य के लिए इस प्रवृति पर ही रोक लग गई | वरना होता ये आया था की हिन्दुस्तान की नौकरशाही किसी न किसी बहाने से सेवानिवृत होने के बाद भी अनेक किस्म की सुविधाएँ अपने विभाग से स्वीकृत करा कर भोगते चले आ रहे थे | ज़ाहिर है कि जो रवैया बन गया था वो रुकने वाला नहीं था | बल्कि और भी बढने वाला था | जिस पर मोदी सरकार ने एक झटके से ब्रेक लगा दिया | पर अभी तो ये आगाज़ है अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है |

केंद्र की पूर्वर्ती सरकारों ने पूर्व राष्ट्रपतियों, उपराष्ट्रपतियों, प्रधान मंत्रियों, उप प्रधान मंत्रियों व अन्य ऐसे ही राजनैतिक परिवारों को बड़े बड़े बंगले अलॉट करने की नीति चला रखी है | ये बहुत आश्चर्य की बात है कि जिस देश में आम आदमी को रोटी, कपड़ा, मकान जैसी बुनयादी जरूरतों को हासिल करने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता हो, उसमे जनता के अरबों रुपयों को क्यूँ इनपे खर्च किया जाता है ? जबकि दुनिया के किसी सम्पन्न देश में भी कार्यकाल पूरा होने के बाद ऐसी कोई भी सुविधा राजनेताओं को नहीं दी जाती | नतीजतन भारत के राजनेता दोहरा फायदा उठाते हैं | एक तरफ तो अपने पद का दुरूपयोग करके मोटी कमाई करते हैं और दूसरी तरफ सरकारी सम्पत्तियों पर ज़िन्दगी भर कब्जा जमे बैठे रहते हैं | जबकी उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं होती | डा. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने रष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा होने के बाद सरकारी बंगला लेने से इनकार कर दिया | पर उन्हें भी किसी क़ानून का हवाला देकर उनकी इच्छा के विरुद्ध बंगला आवंटित किया गया |

इसी तरह कई प्रदेशों की राजधानियों में भी यही प्रवृति चल रही है | हर पूर्व मुख्यमंत्री एक न एक सरकारी बंगला दबाए बैठा है | इस पर भी रोक लगनी चाहिए | मोदी जी और अमित भाई शाह कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं की भाजपा शासित राज्यों में इस नीति की प्रवृति को खत्म करें | जैसे सरकार के अन्य विभागों में होता है कि सेवानिवृत होने के बाद ऐसी कोई सुविधा नहीं मिलती | इससे सरकार के खजाने की फ़िज़ूल खर्ची रोकी जा सकेगी और उस पैसे से जन कल्याण का काम होगा | वैसे भी यह वृत्ति लोकतंत्र के मानकों के विपरीत है | इस नीति के चलते समाज में भेद होता है | जबकि कायदे से हर व्यक्ति को प्राकृतिक संसाधन इस्तेमाल करने के लिए समान अधिकार मिलना चहिये | वैसे भी निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को ऐसी कोई रियातें नहीं मिलती |

समाजवादी विकास मॉडल के जुनून में पंडित नेहरु ने अंग्रेजों की स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था को बदलने की कोई कोशिश नहीं की | नतीजतन हर आदमी सरकार से नौकरी और सुविधाओं की अपेक्षा करता है | जबकि होना यह चाहिए कि हर व्यक्ति सरकार पर निर्भर होने की कोशिश करे, अपने पैरों पर खड़ा हो और अपनी जरूरत के साधन अपनी मेहनत से जुटाय | तब होगा राष्ट्र का निर्माण | सेवानिवृत होने पर ही क्यों, सेवा काल में ही सरकारी अफसर जन सेवा के लिए मिले संसाधनों का जमकर दुरूपयोग अपने परिवार के लिए करते हैं |

आज़ादी के 70 साल बाद भी देश की नौकरशाही अंग्रेजी हुक्मरानों की मानसिकता से काम कर रही है | जिस जनता का उसे सेवक होना चाहिए उसकी मालिक बन कर बैठी है | इन अफसरों के घर सरकारी नौकरों की फौज अवैध रूप से तैनात रहती है । सरकारी गाडि़यां इनके दुरुपयोग के लिये कतारबद्ध रहती हैं। इनकी पत्नियाँ अपने पति के अधीनस्थ अधिकारियों पर घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिये ऐसे हुक्म चलाती हैंमानो वे उनके खरीदे गुलाम हों। ये अधीनस्थ अधिकारी भी फर्शी सलाम करने में पीछे नहीं रहते। अगर मैडम खुश तो साहब के नाखुश होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। ये लोग निजी यात्रा को भी सरकारी यात्रा बनाकर सरकारी तामझाम के साथ चलना पसंद करते हैं। जन सेवा के नाम पर सरकारी तामझाम का पूरे देश में एक ऐसा विशाल तन्त्र खड़ा कर दिया गया है जिसमे केवल अफसरों और नेताओं के परिवार मौज लेते हैं | किसी विकसित देश में भी ऐसा तामझाम अफसरों के लिए नहीं होता | इस पर भी मोदी सरकार को नजर डालनी चाहिए | ऐसे तमाम बिंदु हैं जिन पर हम जैसे लोग वर्षों से बेबाक लिखते रहे हैं | पर किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी | अब लगता है कि ऐसी छोटी लेकिन बुनयादी बातों की ओर भी धीरे धीरे मोदी सरकार का ध्यान जायेगा | भारत को अगर एक मजबूत राष्ट्र बनना है तो उसके हर नागरिक को सम्मान से जीने का हक होना चाहिए | वो उसे तभी मिलेगा जब सरकारी क्षेत्र में सेवा करने वाले अपने को हाकिम नहीं बल्कि सेवक समझें जैसे निजी क्षेत्र में सेवा करने वाला हर आदमी, चाहे कितने बड़े पद पर क्यों न हो अपने को कम्पनी का नौकर ही समझता है |


Monday, October 10, 2016

Only God can save the Civil Aviation Ministry


While the storm of scams confronting Jet Airways and Ministry of Civil Aviation had not subsided, a new tornado has gained traction. Earlier 131 pilots of Jet Airways were fiddling with the lives of passengers by flying planes without the requisite pilot proficiency check (PPC). The RTI filed by Kalchakra News Bureau led to this expose. These pilots were grounded and suspended with mere warning. This is not the lone matter in which the unholy nexus between the Ministry of Civil Aviation and its subordinate Directorate General Civil Aviation (DGCA) with that of private airlines has come to the fore. Whether it’s the integrity of pilot proficiency checks or the grant of licenses to fly, the entire spectrum is smeared with irregularities & profound aberrations. The senior officials of the ministry seem to be turning a blind eye and a deaf ear to this entire escapade. Any recommendation coming from the top bosses of the private airlines, is considered a dictum which has to be heeded by all means. It’s but obvious that nobody shall extend such out of turn favors without getting a bounty of personal gains.


The case of Ms. Parul Sachdev is quite striking to bring home the aforesaid state of affairs. Ms. Sachdev presented her educational credentials from a Board of Education which was not recognized by the Government. She passed off the Central Board of Secondary Education (CBSE) for Central Board of Higher Education (CBHE) to obtain the pilot’s license and went on to fly for years. This poses severe questions on the probity & process of scrutiny & validation of documents on part of the learned officials of the Ministry and its associated departments.


This matter too came to light as an eventual outcome of a RTI application filed by Kalchakra News Bureau seeking the PPC of pilots of private airlines. This forced the Ministry to conduct an audit of the licenses of the pilots of various airlines. This precipitated half-baked and incomplete action against Ms. Sachdev as well. Instead of getting her license revoked and getting a case of forgery filed under relevant section of IPC, Sh. R N Choubey, the current Civil Aviation Secretary in his order dated September 16th, 2016 mandated for a suspension for 2 years instead of 5 years as prescribed under rule 39(1) of the Civil Aviation Rules 1937. He went on to suggest that Ms. Sachdev can get her papers in proper shape in these 2 years of suspension.  


What a mockery of the entire set of the laid down procedures of probity? When you can’t establish even your basic qualifications, how can you be issued a license in the first place? How can your certificates issued from non-recognized bodies be accepted as bonafides? If not, isn’t the revocation of the license issued, the best course of natural justice.


You may recall the Mangalore tragedy whereby the plane went off the airstrip while landing. Why did that accident happened at all? If you pay heed to the pilots, they would say that landing at Mangalore is no mean task. It requires precision of the highest order which only an alert & duly energised pilot can manage. This is the very reason that pilots under a state of exhaustion and fatigue are not allowed to fly. But it seems that for Jet Airways, complying with this rule has not much value as well. As per DGCA rules, every pilot has to undergo a compulsory rest of 12 hours before undertaking a flight where the time zone difference between the departure and destination is less than 3 hours (as is the case with Hong Kong).


A senior pilot as well as an examiner of Jet Airways Manoj Mahna set out a distinctive record of flouting the aforesaid rule on September 3rd, 2015. He flew as an additional crew member on the 8 am flight from Mumbai - Delhi, attended a number of meetings and returned back to Mumbai from Delhi by the 5 pm flight in the same fashion as an additional crew member. On the night of the same day he took off the late night 1.20 am flight from Mumbai to Hong Kong as a captain which landed at 9.40 am (IST) at Hong Kong. This was a gross violation of DGCA rules of undertaking adequate rest before taking off a commercial flight.


When Kalchakra News Bureau took up this case, every official worth his credence found Captain Mahna guilty and recommended for the most severe of the action. It’s not that Captain Mahna broke the rule book for the first time. He was found guilty of the same offence in 2006 as well.


Section 7 of the Civil Aviation Rules and the Indian Aircraft Act, 1934 call for a punishment of 2 years and a fine of Rs. 10 lakhs for this gross violation. Nonetheless, the Ministry of Civil Aviation in its order dated March 1st 2016 extended a suspension of only 1 year instead of 2 which was later on reduced to a mere 6 months complying with injunctions issued from Jet Airways, which is known to run the writ at this important ministry.


In yet another case of murky nexus of Ministry of Civil Aviation officials with private interests is that of the GVK group which operates a major airport in the country. The existing Secretary of the Ministry has went out of the way to give a clearance to the GVK group which has serious implications to national security. Whether it’s a private airlines or a private airport operator, it’s senior officials need to undergo a mandatory security clearance from the Home Ministry.


For instance, when Kalchakra News Bureau exposed the non-compliance of security clearance of Captain Hamid Ali, Jet Airways had to remove Captain Ali from the post of its CEO/COO at once. This flouting of security clearance from Home Ministry is going on in the case GVK Group’s Board of Directors as well. The Ministry of Civil Aviation is overlooking the same and is extending out of the way benefits to the group.


Why is it that the current Civil Aviation Secretary Sh. R N Choubey is flouting all laid down norms and protocols to extend out of the way benefits to private airlines or other private operators in the domain of Civil Aviation?


At a time when air travel has expanded by multitudes, the responsibility of the Ministry of Civil Aviation has increased all the more. Instead of flouting the well thought out norms of safety & security, the Ministry needs to implement them in letter and spirit. The passengers would otherwise be left out with no option but to travel with faith in the Lord alone.

भगवान भरोसे नागरिक उड्डयन मंत्रालय

अभी जेट एयरवेज और नागरिक विमानन मंत्रालय के घोटालों का तूफान थमा भी नहीं था कि एक नया मुद्दा सामने आया है। पहले जेट एयरवेज के 131 पायलेट बिना पायलेट प्रोफिशैंसी जांच के विमान उड़ाए जा रहे थे और लाखों यात्रियों की जान से खिलवाड़ कर रहे थे। यह मामला उजागर होने के बाद इन 131 पायलेटों को सस्पेंड किया गया और चेतावनी दी गई। यह एक अकेला ऐसा मामला नहीं है, जहां नागरिक उड्डयन मंत्रालय और उसके अधीन नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) की निजी एयरलाइंस के साथ सांठगांठ सामने आई हो। अब वो चाहे पायलेटों की प्रोफिशैंसी जांच हो या शुरूआत दौर में ही उनको विमान उड़ाने का लाइसेंस दिया जाना हो, हर जगह घोटाला है। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी मानो आंख पर पट्टी बांधकर बैठे हैं। जैसी भी सिफारिश किसी भी निजी एयरलाइंस के मुखिया की तरफ से आती है, तो ये इन अधिकारियों के लिए फरमान से कम नहीं होती। उन्हें तो अपने इन आकाओं की हर बात को आंख मूंदकर मानना होता है। जाहिर है बिना मोटे फायदे के ऐसे गैर कानूनी काम कोइ क्यों करेगा?

उदाहरण के तौर पर एक अन्य निजी एयरलाइंस की महिला पायलेट सुश्री पारूल सचदेव ने शुरूआती दौर में ही अपनी शैक्षिक योग्यताओं को उस बोर्ड से दिखाया, जोकि भारत सरकार के द्वारा मान्यता प्राप्त ही नहीं था। अचंभे की बात है कि ये अधिकारी अपनी आंखों पर ऐसा चश्मा लगाते हैं कि इन्हें मान्यता प्राप्त संस्थाओं को जांचने का भी समय नहीं मिलता। इस महिला पायलेट ने मान्यता प्राप्त संस्थान केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के नाम से मिलती-जुलती फर्जी संस्था केंद्रीय उच्च शिक्षा बोर्ड (सीबीएचई) के दस्तावेज जमा कराकर न सिर्फ पायलेट का लाइसेंस ले लिया, बल्कि कई सालों तक उस निजी एयरलाइंस का विमान उड़ाती रही और हजारों यात्रियों की जान खतरे में डालती रही।
 
ये मामला भी उजागर तब हुआ, जब कालचक्र समाचार ब्यूरो द्वारा मांगी गई आरटीआई के बाद मंत्रालय को मजबूरन सभी एयरलाइंसों के पायलेटों के लाइसेंस को जांचना पड़ा। तब इस महिला पायलेट को भी दंड मिला, पर आधा अधूरा। बजाय इसके कि इस जालसाजी की जुर्म में इस महिला पायलेट का लाइसेंस रद्द किया जाता और थाने में केस दर्ज होता, मौजूदा नागरिक उड्डयन सचिव श्री आर. एन. चैबे ने 16 सितंबर, 2016 के अपने आदेश में न जाने किस दबाव में इस महिला पायलेट को विमानन नियम 1937 की नियम संख्या-39(1) के तहत 5 साल के बजाय मात्र 2 साल के लिए ही सस्पेंड किया और आदेश दिया कि इन 2 सालों में वे सभी जरूरी कागजात ठीक कर लें। कैसा मजाक है ? अगर आपकी बुनियादी योग्यता ही सही नहीं है, तो आप लाइसेंस के हकदार कैसे बन जाते हैं ? अगर आपने गैर मान्यता प्राप्त संस्था का प्रमाण पत्र दिया है, तो क्या आपका प्रमाण पत्र स्वीकृत होना उचित था ? यदि नहीं, तो लाइसेंस का निरस्त होना ही सही न्याय होगा।
 
आप सबको मैंग्लौर हवाई हादसे की याद तो होगी। वह हादसा क्यों हुआ था ? अगर पायलेटों से बात की जाए तो उनका कहना है कि मैंग्लौर के हवाई अड्डे पर विमान उतारना हर किसी के बस का नहीं है। अगर आप थकान से चूर हो, ऐसे में आपको विमान उड़ाने की अनुमति नहीं मिलती है। जेट एयरवेज के लिए यह कानून भी मान्य नहीं है। जेट एयरवेज के एक वरिष्ठ पायलेट कैप्टन मनोज महाना, जो कि जेट एयरवेज में बतौर प्रशिक्षक भी कार्यरत् हैं, उन्होंने 3 सितंबर, 2015 की सुबह 8 बजे मुंबई से दिल्ली एक अतिरिक्त क्रू-मेंबर के नाते हवाई यात्रा की। दिनभर उन्होंने दिल्ली में कई सारी मीटिंग कीं और वापिस मुंबई शाम 5 बजे के विमान से ठीक उसी तरह अतिरिक्त क्रू-मेंबर के नाते मुंबई तक की यात्रा की। उसी रात 1.20 पर कैप्टन महाना ने मुंबई से हाॅगकाॅग की उड़ान बतौर कैप्टर के नाते भरी। यह विमान अगले दिन 4 सितंबर को भारतीय समयानुसार सुबह 9.40 पर हाॅगकाॅग में उतरा।  नागरिक विमानन नियमों के तहत किसी भी पायलेट को उड़ान भरने से पहले कम से कम 12 घंटे का विश्राम करना अनिवार्य है, जो कि कैप्टन महाना ने नहीं किया। यह इन नियमों के उल्लंघन का गंभीर मामला है। 

यह मामला जब कालचक्र समाचार ब्यूरो के हत्थे चढ़ा, तो हमारी लिखित शिकायत पर एक बहुत मोटी फाइल बनी। उस फाइल में हर एक अधिकारी ने तमाम नियम और कानूनों का हवाला देते हुए कैप्टन मनोज महाना को दोषी पाया और उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही करने की सलाह दी। ऐसा नहीं है कि कैप्टन महाना ने ये पहली बार किया हो, सितंबर, 2006 में भी उन्हें ऐसी ही गलती किए जाने पर दोषी पाया गया था और इनके खिलाफ कार्यवाही हुई थी।
 
नागरिक विमानन कानून के सैक्शन 7 व भारतीय विमान कानून 1934 के तहत 2 साल की सजा और 10 लाख रूपए के जुर्माने का प्रावधान है। जेट एयरवेज के इशारे पर चलने वाले नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने अपने आकाओं को खुश करने के लिए कैप्टन महाना को 1 मार्च, 2016 के अपने आदेश के तहत पहले 2 साल के बजाए 1 साल और फिर 1 साल के बजाए मात्र 6 महीने की सजा ही दी।
 
देश का एक बड़ा औद्योगिक घराना जीवीके प्रोजेक्ट्स भी कुछ संदेहास्पद सवालों के घेरे में है। यह औद्योगिक घराना भारत के एक प्रतिष्ठित हवाई अड्डे का संचालन करता है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय के मौजूदा सचिव ने इस औद्योगिक घराने को ‘आउट आॅफ द वे‘ जाकर एक ऐसे कानून की अनदेखी कर दी है, जो बहुत ही गंभीर है। चाहे वो निजी एयरलाइन हो या हवाई अड्डे का प्रबंध करने वाली निजी कंपनी। उनके वरिष्ठ अधिकारियों की गृह मंत्रालय द्वारा सुरक्षा जांच होना अनिवार्य है। ये जिम्मेदारी हर उस निजी कंपनी की होती है, जो नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन है।
 
उदाहरण के तौर पर आपको याद दिलाना चाहूंगा कि इसी काॅलम के माध्यम से हमने जेट एयरवेज के वरिष्ठ अधिकारी कैप्टन हामिद अली की सुरक्षा जांच के न होने का पर्दाफाश किया था। उसका नतीजा यह हुआ कि जेट एयरवेज ने कालचक्र समाचार ब्यूरो द्वारा नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधिकारियों पर दबाव डाले जाने पर उस कैप्टन हामिद अली को रातों-रात अपने बोर्ड आॅफ डायरेक्टर के पद से हटाया। अब जीवीके ग्रुप के निदेशकों का भी कुछ ऐसा ही हाल है। ये निदेशक बिना अनिवार्य सुरक्षा जांच के कंपनी के बोर्ड पर बने रहे और नागरिक उड्डयन मंत्रालय आंख मूंदे खर्राटे भरता रहा। यहां पर फिर नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने इस कंपनी को ‘आउट आॅफ द वे‘ जा कर एक विशेष लाभ पहुंचाया और इस कंपनी व उसके निदेशक को मात्र चेतावनी देकर छोड़ दिया। ऐसा क्यों है कि मौजूदा नागरिक उड्डयन सचिव श्री चैबे सभी नियमों को ताक पर रखकर एक के बाद एक निजी एयरलाइंस या निजी कंपनी को सीधा फायदा पहुंचा रहे हैं ?
 
आज के दौर में जब हवाई यात्रा की संख्या काफी बढ़ गई है, तो नागरिक उड्डयन मंत्रालय की जिम्मेदारी भी कम नहीं हुई है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय को अपना काम कानून के दायरे में रहकर ही करना चाहिए, न कि लाखों यात्रियों की जान से खिलवाड़ करना चाहिए। नहीं तो हर हवाई यात्रा करने वाले को विमान के पायलेट या मंत्रालय के अधिकारियों की इन बेईमानियो के चलते केवल भगवान भरोसे ही यात्रा करनी होगी।

Monday, October 3, 2016

आतंकवाद से निपटने के लिए और क्या करें



छप्पन इंच का सीना रखने वाले भारत के लोकप्रिय प्रधान मंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने वो कर दिखाया जिसका मुझे 23 बरस से इंतज़ार था | उन्होंने पाकिस्तान को  ही चुनौती नही दी बल्कि आतंकवाद से लड़ने की दृढ इच्छा शक्ति दिखाई है | जिसके लिए वे और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलहाकार अजीत डोभाल दोनों बधाई के पात्र हैं | यहाँ याद दिलाना चाहूँगा कि 1993 में जब मैंने कश्मीर के आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन को दुबई और लन्दन से आ रही अवैध आर्थिक मदद के खिलाफ हवाला काण्ड को उजागर कर सर्वोच्च न्यायलय में जनहित याचिका दायर की थी, तब किसी ने इस खतरनाक और लम्बी लड़ाई में साथ नहीं दिया | तब न तो आतंकवाद इतना बढ़ा था और न ही तब इसने अपने पैर दुनिया भर में पसारे थे | तब अगर देश के हुक्मरानों, सांसदों, जांच एजेंसियों और मीडिया ने आतंकवाद के खिलाफ इस लड़ाई में साथ दिया होता तो भारत को हजारों बेगुनाह और जांबाज़ सिपाहियों और अफसरों की क़ुरबानी नहीं देनी पड़ती | आज टीवी चैनलों पर जो एंकर परसन और विशेषज्ञ उत्साह में भर कर आतंकवाद के खिलाफ लम्बे चौड़े बयान दे रहे हैं वे 1993 से 1998 के दौर में अपने लेखों और वक्तव्यों को याद करें तो पायेंगे कि उन्होंने उस वक्त अपनी ज़िम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वाह नहीं किया |

हवाला काण्ड उजागर करने के बाद से आज तक देश विदेश के सैंकड़ों मंचों पर, टीवी चैनलों पर और अखबारों में मैं इन सवालों को लगातार उठाता रहा हूँ | मुम्बई पर हुए आतंकी हमले के बाद देश के दो दर्जन बड़े उद्योगपतियों ने मुझे मुम्बई बुलाया था वे सब बुरी तरह भयभीत थे | जिस तरह आतंकवादियों ने ताज होटल से लेकर छत्रपति शिवाजी स्टेशन तक भारी नरसंहार किया उससे उनका विश्वास देश की पुलिस और सुरक्षा व्यवस्था पर से हिला हुआ था | वे मुझसे जानना चाहते थे कि देश में आतंकवाद पर कैसे काबू पाया जाय| जो बात तब मैंने उनके सामने रखी वही आज एक बार फिर दोहराने की जरूरत है | अंतर इतना है कि आज देश के भीतर और देश के बाहर श्री नरेंद्र मोदी को आतंकवाद से लड़ने में एक मजबूत नेतृत्व के रूप में देखा जा रहा है | साथ ही देशवासियों और दुनिया के तमाम देशों का आतंकवाद के विरुद्ध इकतरफा साझा जनमत है | ऐसे में प्रधान मंत्री अगर कोई ठोस कदम उठाते हैं तो उसका विरोध करने वालों को देशद्रोही समझा जायेगा और जनता ऐसे लोगों को सडकों पर उतर कर सबक सिखा देगी | हम सीमा पर लड़ने और जीतने की तय्यारी में जुटे रहें और देश के भीतर आईएसआई के एजेंट आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते रहें तो यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती | देश की ख़ुफ़िया एजेंसियों को इस बात की पुख्ता जानकारी है कि देश के 350 से ज्यादा शहरों और कस्बों की सघन बस्तियों में आरडीएक्स, मादक द्रव्यों और अवैध हथियारों का जखीरा जमा हुआ है जो आतंकवादियों के लिए रसद पहुँचाने का काम करता है | प्रधान मंत्री को चाहिए कि इसके खिलाफ एक ‘आपरेशन क्लीन स्टार’ या ‘अपराधमुक्त भारत अभियान’ की शुरुआत करें और पुलिस व अर्धसैनिक बलों को इस बात की खुली छूट दें जिससे वे इन बस्तियों में जाकर व्यापक तलाशी अभियान चलाएं और ऐसे सारे जखीरों को बाहर निकालें|

आतंकवाद को रसद पहुंचाने का दूसरा जरिया है हवाला कारोबार | वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के तालिबानी हमले के बाद से अमरीका ने इस तथ्य को समझा और हवाला कारोबार पर कड़ा नियन्त्रण कर लिया | नतीजतन तब से आज तक वहां आतंकवाद की कोई घटना नहीं हुई | जबकि भारत में पिछले 23 वर्षों से हम जैसे कुछ लोग लगातार हवाला कारोबार पर रोक लगाने की मांग करते आये हैं | पर ये भारत में बेरोकटोक जारी है | इस पर नियन्त्रण किये बिना आतंकवाद की श्वासनली को काटा नहीं जा सकता | तीसरा कदम संसद को उठाना है | ऐसे कानून बनाकर जिनके तहत आतंकवाद के आरोपित मुजरिमों पर विशेष अदालतों में मुकदमे चला कर 6 महीनों में सज़ा सुनाई जा सके | जिस दिन मोदी सरकार ये 3 कदम उठा लेगी उस दिन से भारत में आतंकवाद का बहुत हद तक सफाया हो जाएगा |

आज के माहौल में ऐसे कड़े कदम उठाना मोदी सरकार के लिए मुश्किल काम नहीं है | क्योंकि जनमत उसके पक्ष में है | आतंकवाद से पूरी दुनिया त्रस्त है | भारत में ही नहीं पाकिस्तान तक में आम जनता का जीवन आतंकवादियों ने खतरे में डाल दिया है | कौन जाने कब, कहाँ और कैसे आतंकवादी हमला हो जाय और बेकसूर लोगों की जानें चली जाएं | इसलिए हर समझदार नागरिक, चाहे किसी भी देश या धर्म का हो, आतंकवाद को समाप्त करना चाहता है | उसकी निगाहें अपने हुक्मरानों पर टिकी हैं | मोदी इस मामले में अपने गुणों के कारण सबसे आगे खड़े हैं | आतंकवाद से निपटने के लिए वे सीमा के पार या सीमा के भीतर जो भी करेंगे सब में जनता उनका साथ देगी |
जामवंत कहि सुन हनुमाना | का चुप साध रह्यो बलवाना ||

Monday, September 26, 2016

केंद्र सरकार के लिए मध्यावधि चुनाव जैसे होंगे विस चुनाव

विधानसभा चुनावों के लिए राज्यों में चुनावी मंच सजना शुरू हो गए हैं। खासतौर पर उप्र और पंजाब में तो चुनावी हलचल जोरों पर है। उप्र में सभी राजनीतिक दलों ने अपने कार्यकर्ताओं की कमर भी कस दी है। लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए ये चुनाव सिर्फ विधान सभा चुनाव तक सीमित नहीं दिख रहे हैं। मोदी सरकार के सामने बिल्कुल वैसी चुनौती है जैसे उसके लिए ये मघ्यावधि चुनाव हों। वाकई उसके कार्यकाल का आधा समय गुजरा है। इसी बीच उसके कामकाज की समीक्षाएं हो रही होंगी। हालांकि उप्र में चुनावी तैयारियों के तौर पर अभी थोड़ी सी बढ़त कांग्रेस की दिख रही है। गौर करने लायक बात है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की उप्र में महीने भर की किसान यात्रा की अनदेखी मीडिया भी नहीं कर पाया।

हर चुनाव में सत्तारूढ़ दल के सामने एक अतिरिक्त चुनौती अपने काम काज या अपनी उपलब्धियां बताने की होती है। इस लिहाज से भाजपा और उप्र की अखिलेश सरकार के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है। यानी उप्र में सपा और भाजपा को अपने सभी प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के उठाए सवालों का सामना करना पड़ेगा।  उप्र में भाजपा भले ही तीसरे नंबर का दल है लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ होने के कारण उससे केंद्र में सत्तारूढ़ होने के नाते सवाल पूछे जाएंगे। इसी आधार पर कहा जा रहा है कि उसके लिए यह चुनाव मध्यावधि जैसा होगा। रही बात समालवादी पार्टी की तो उसने तो अपनी उपलब्धियों की लंबी चौड़ी सूची तैयार करके पोस्टर और होर्डिग का अंबार लगा दिया है। ये बात अलग है सपा के भीतर ही प्रभुत्व की जोरआजमाइश ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी। लेकिन जिस तरह से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जोश और विश्वास के साथ परिस्थियों का सामना किया उससे सपा की छवि को उतनी चोट पहुंच नहीं पाई। इधर उप्र विकास के कामों को फटाफट निपटाने जो ताबड़तोड़ मुहिम चल रही है उसे उप्र विधान सभा चुनाव की तैयारियां ही माना जाना चाहिए।

कांग्रेस ने जिस तरह से उप्र के चालीस जिलों से होकर कि सान यात्रा निकाली है उससे अचानक हलचल मच गई है। दो महीने पहले तक कांग्रेस मुक्त भारत का जो अभियान भाजपा चला रही थी वह भी ठंडा पड़ रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस के चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर ने कांग्रेस में जान फूंक दी। अब तो कांग्रेस के बड़े नेता भी प्रशांत किशोर के सलाह मशविरे को तवज्जो देते दिख रहे हैं। वैसे तो विधान सभा चुनाव अभी छह महीने दूर हैं  लेकिन  कांग्रेस की मेहनत देखकर लगने लगा है कि उसे हल्के में नहीं लिया जा पाएगा। उसने दूसरे बड़े दलों से गठजोड़ लायक हैसियत तो अभी ही बना ही ली है।  

रही बात इस समय दूसरे पायदान पर खड़ी बसपा की तो बसपा के बारे में सभी लोग मानते हैं कि उसके अपने जनाधार को हिलाना डुलाना आसान नहीं है। उसके इस पक्के घर में कितनी भी तोड़फोड़ हुई हो लेकिन जल्दी ही वह बेफर्क मुद्रा में आ गई। पिछले दिनों उसकी बड़ी बड़ी रैलियों से इस बात का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। हां कार्यकर्ताओं के मनोबल पर तो फर्क पड़ता ही है। वास्तविक स्थिति के पता करने का उपाय तो हमारे पास नहीं है लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में पहुंची चोट का असर उस पर जरूर होगा। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर आगे चलकर बसपा गठबंधन के जरिए अपना रास्ता आसान बना ले।

कुलमिलाकर उप्र में मचने वाला चुनावी घमासान चौतरफा होगा। इस चौतरफा लड़ाई में अभी सभी प्रमुख दल अपने बूते पर खड़े रहने का दम भर रहे हैं। कोई संकेत या सुराग नहीं मिलता कि कौन सा दल किस एक के  खिलाफ मोर्चा लेगा। लेकिन केंद्र की राजनीति के दो प्रमुख दल कांग्र्रेस और भाजपा का आमने सामने होना तय है। इसी तरह प्रदेश के दो प्रमुख दल सपा और बसपा के बीच गुत्थमगुत्था होना तय है। लेकिन उप्र के एक ही रणक्षेत्र में एक ही समय में दो तरह के युद्ध तो चल नहीं सकते। सो जाहिर है कि चाहे गठबंधन की राजनीति सिरे चढ़े और चाहे सीटों के बंटवारे के नाम पर हो अंतरदलीय ध्रुवीकरण तो होगा ही। बहुत संभव है कि इसीलिए अभी कोई नहीं भाप पा रहा है कौन किसके कितने नजदीक जाएगा। 

अपने बूते पर ही खड़े रहने की ताल कोई कितना भी ठोक ले लेकिन चुनावी लोकतंत्र में दो ध्रवीय होने की मजबूरी बन ही जाती है। इस मजबूरी को मानकर चलें तो कमसे इतना तय है कि उप्र का चुनाव या तो सपा और बसपा के बीच शुद्ध रूप् से प्रदेश की सत्ता के लक्ष्य को सामने रख कर होगा या कांग्रेस और भाजपा के बीच 2019 को सामने रखकर होगा। पहली सूरत में राष्टीय स्तर के दो बड़े दलों यानी भाजपा और कांग्रेस को तय करना पड़ेगा कि सपा या बसपा में से किसे मदद पहुंचाएं। दूसरी सूरत है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच साधे ही तूफानी भिड़त होने लगे। देश में जैसा माहौल है उसे देखते हुए इसका योग बन सकता है लेकिन उप्र कोई औसत दर्जे का प्रदेश नहीं है। दुनिया के औसत देश के आकार का प्रदेश है। लिहाजा इस चुनाव का लक्ष्य प्रदेश की सत्ता ही होगा। जाहिर है घूमफिर कर लड़ाई का योग सपा और बसपा के बीच ही ज्यादा बनता दिख रहा है। बाकी पीछे से केंद्र के मध्यावधि चुनाव जैसा माहौल दिखता रहेगा।