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Monday, March 23, 2026

एचपीवी वैक्सीन के दुष्प्रभावों को क्यों छिपाया गया?

कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक पोस्ट काफ़ी चर्चा में छाई हुई है। इसमें पीटर गोट्शे नामक एक प्रसिद्ध चिकित्सक, शोधकर्ता और लेखक, ने ‘हाउ मर्क एंड ड्रग रेगुलेटर्स हिड सीरियस हार्म्स ऑफ एचपीवी वैक्सीन’ नाम की पुस्तक का विश्लेषण कर कुछ गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इस पोस्ट में पीटर द्वारा किए गए दावा ज़िक्र किया गया है कि कैसे महिलाओं में होने वाले सर्वाइकल कैंसर को रोकने वाली एक वैक्सीन के दुष्प्रभावों को दुनिया से छिपाया गया है।   

पोस्ट के अनुसार पीटर गोट्शे की पुस्तक में वे बताते हैं कि कैसे ‘एचपीवी क्सीन’ को ‘लाइफ-सेविंग’ बताकर बेचा गया, लेकिन इसके ट्रायल्स में गंभीर कमियां थीं और नुकसान छुपाए गए। यह मर्क की वैज्ञानिक दुराचार की कहानी है, जो कभी-कभी फ्रॉड के स्तर तक पहुंचती है। गोट्शे के अनुसार, मर्क ने कई तरीकों से गार्डासिल के नुकसानों को छुपाया। ज्यादातर ट्रायल्स में सच्चा प्लेसिबो (सलाइन) नहीं इस्तेमाल किया गया। इसके बजाय एल्यूमिनियम एडजुवेंट या दूसरी वैक्सीन को ‘प्लेसिबो’ बताया गया। ये दोनों खुद नुकसान पहुंचा सकते हैं (न्यूरोटॉक्सिक), इसलिए वैक्सीन और ‘प्लेसिबो’ के साइड इफेक्ट्स समान दिखे और नुकसान ‘सुरक्षित’ साबित हुआ। लेखक कहते हैं कि इससे मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन हुआ। 



वहीं दूसरी ओर गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याएं जैसे POTS (Postural Orthostatic Tachycardia Syndrome—खड़े होते ही चक्कर और दिल की धड़कन तेज होना) और CRPS (Complex Regional Pain Syndrome—तीव्र दर्द और सूजन) को रिपोर्ट नहीं किया गया। केवल 14 दिनों के अंदर की घटनाएं गिनी गईं, जबकि 90% नुकसान इससे बाहर थे। कई केसों को ‘कोई संबंध नहीं’ बता दिया गया या बाहर कर दिया गया। गोट्शे इसे ‘आउटराइट फ्रॉड’ कहते हैं।


उल्लेखनीय है कि वैक्सीन को सर्वाइकल कैंसर रोकने वाला बताया गया, लेकिन गोट्शे दावा करते हैं कि ट्रायल्स में असली कैंसर केस शून्य थे। लंबे समय के डेटा में एंटीबॉडी स्तर तेजी से गिरता है और पहले से एचपीवी संक्रमित महिलाओं में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया या डेनमार्क में ऑब्जर्वेशनल स्टडीज में कैंसर घाटे को वैक्सीन का श्रेय दिया जाता है, लेकिन स्क्रीनिंग और अन्य फैक्टर्स को नजरअंदाज किया जाता है। पुस्तक के अनुसार मर्क ने ऐसा डर फैलाया कि कैंसर हजारों महिलाओं को मारता है, हर राज्य में लॉबिंग की और स्कूल मैंडेट के लिए दबाव डाला। इस वैक्सीन को ‘फास्ट-ट्रैक अप्रूवल’ मिला, जबकि FDA ने बाद में माना कि सेफ्टी मॉनिटरिंग की क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया था। 



इसके साथ ही FDA, EMA जैसे नियामकों की भूमिका भी संदेहास्पद रही। पुस्तक में ये आरोप भी लगाया गया है कि इन नियामकों ने मर्क के एकतरफा रिपोर्ट्स को बिना सवाल स्वीकार किया। EMA की 2015 जांच में भी कंपनियों के डेटा पर भरोसा किया गया। गोट्शे कहते हैं कि रेगुलेटर्स इंडस्ट्री द्के क़ब्ज़े में हैं। पुस्तक में Vioxx घोटाले की तुलना भी की गई है। लेखक अन्य देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों के भ्रामक बयानों के उदाहरण भी देते हैं।


दुनिया भर के विश्लेषक इस पुस्तक की ताकत का वर्णन करते हुए इसे गोपनीय आंतरिक दस्तावेजों पर आधारित मानकर जर्नल पेपर्स से ज्यादा विस्तृत मानते हैं। इस पुस्तक के छपने का सबसे प्रभावी असर यह है कि यह पारदर्शिता की मांग करता है और कानूनी मुकदमों (जैसे Robi केस, जो 2025 में चल रहा था) में सच्चाई उजागर होने का उदाहरण भी देता है। ब्राउनस्टोन इंस्टीट्यूट जैसे समीक्षक इसे ‘फियरलेस इंडिक्टमेंट’ कहते हैं।



गौरतलब है कि गोट्शे को ब्रिटिश मेडिकल शोध संस्थान कोक्रेन से निकाला गया था क्योंकि उन्होंने 2018 में एचपीवी वैक्सीन रिव्यू पर इसी तरह की आलोचना की थी। वहीं WHO, CDC, Cochrane जैसे मुख्यधारा के शोध संस्थान का मानना है कि वैक्सीन प्री-कैंसरस लेशन्स 80-90% तक कम करती है, असरदार है और गंभीर साइड इफेक्ट्स बहुत दुर्लभ हैं। विश्व स्वास्थ संगठन के VigiBase में 667 मौतें रिपोर्ट हुई हैं, लेकिन कारण संबंध साबित नहीं। गोट्शे की व्याख्या को ‘anti-vax’ माना जाता है, हालांकि वे खुद वैक्सीन के खिलाफ नहीं बल्कि ‘ट्रांसपेरेंसी’ के पक्षधर हैं।


भारत में इस पुस्तक का सीधा और व्यापक प्रभाव अभी तक दिखाई नहीं देता। 2026 तक के उपलब्ध डेटा में कोई बड़ा मीडिया बहस या सरकारी प्रतिक्रिया नहीं मिली। लेकिन यह अप्रत्यक्ष रूप से प्रासंगिक है क्योंकि 2009-2010 में PATH (बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन) के साथ मर्क के गार्डासिल और GSK के Cervarix ट्रायल्स आंध्र प्रदेश और गुजरात में चले जहाँ 7 लड़कियों की मौत हुई, जिसके बाद संसदीय समिति ने नैतिक उल्लंघन (इनफॉर्म्ड कंसेंट के बिना गरीब लड़कियों पर प्रयोग) का आरोप लगाया। ट्रायल्स रोके गए। यह विवाद आज भी HPV वैक्सीन पर शक पैदा करता है।


उल्लेखनीय है कि भारत सर्वाइकल कैंसर खत्म करने के लिए HPV वैक्सीन को स्कूल प्रोग्राम में ला रहा है, जिसकी शुरुआत सिक्किम, पंजाब आदि में राष्ट्रीय रोलआउट की योजना के तहत की जा सकती है। इंडिजिनस Cervavac भी उपलब्ध है, लेकिन क्वाड्रिवेलेंट वैक्सीन (मर्क जैसी) भी इस्तेमाल होती है। भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय इसे सुरक्षित और जरूरी बताती है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो पुस्तक के दावे के अनुसार वैक्सीन के छुपे नुकसान सोशल मीडिया या एंटी-वैक्सीन ग्रुप्स में फैल सकते हैं, जिससे हिचकिचाहट बढ़ सकती है। खासकर 2010 के ट्रायल विवाद के बाद। लेकिन भारत में मुख्यधारा मीडिया और स्वास्थ्य विभाग इसे ‘मिथ’ बताते हुए प्रमोशन जारी रखते हैं। अगर अमरीका में हुए मुकदमे को केंद्र में रखा जाए तो ज्यादा सुर्खियां बन सकती हैं जिससे इस पर प्रभाव बढ़ सकता है। परंतु, पुस्तक भारत में सतर्कता अवश्य बढ़ा सकती है लेकिन कार्यक्रम को नहीं रोक पाएगी, क्योंकि कैंसर का बोझ बहुत बड़ा है।


यह पुस्तक दवा उद्योग और नियामकों पर गंभीर सवाल उठाती है। गोट्शे के दस्तावेजी सबूत मजबूत हैं, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय में यह अल्पमत है। भारत जैसे देश में जहां एचपीवी वैक्सीन सार्वजनिक स्वास्थ्य का बड़ा हथियार है, ऐसे में पुस्तक याद दिलाती है कि माता-पिता को स्वतंत्र शोध करना चाहिए, स्क्रीनिंग के साथ वैक्सीनेशन बैलेंस करें। अगर आप वैक्सीन के पक्ष में हैं, तो डॉक्टर से चर्चा करें और आधिकारिक डेटा भी देखें।

Monday, March 16, 2026

अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर प्रभाव

दुनिया एक नए युद्ध की चपेट में है जो न केवल मध्य पूर्व को हिला रहा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति को भी प्रभावित कर रहा है। 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हवाई हमलों ने इस संघर्ष को एक पूर्ण युद्ध का रूप दे दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों और नौसेना को नष्ट करने का ऐलान किया है, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी ठिकानों और इज़राइल पर मिसाइलें दागी हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने से तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है। 


सवाल उठता है कि क्या यह युद्ध केवल अमेरिका की अहंकारपूर्ण कूटनीति का परिणाम है, जहां वह वैश्विक प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है और तेल तथा खनिज बाजार पर कब्जा जमाना चाहता है? या यह एक आवश्यक रक्षात्मक कदम है जो ईरान के परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए उठाया गया है? एक स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखें तो यह युद्ध अमेरिकी कूटनीति की विफलता का प्रतीक है, जहां वार्ता के बजाय सैन्य शक्ति पर जोर दिया गया। ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर अधिकतम दबाव की नीति अपनाई, लेकिन इससे ईरान और अधिक आक्रामक हो गया। रक्षा विशेषज्ञ जो कोस्टा का कहना है कि यह युद्ध अमेरिकी सैन्य तैयारियों को कमजोर कर रहा है, खासकर चीन के खिलाफ। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह तेल बाजार पर कब्जे की लड़ाई है, लेकिन इससे अमेरिका की वैश्विक स्थिति कमजोर हो सकती है।


भारत, जो अपनी 90% से अधिक कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, इस युद्ध से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल की आपूर्ति बाधित हो गई है, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ गया है। टीएस लोम्बार्ड की अर्थशास्त्री शुमिता देवेश्वर कहती हैं कि लंबे समय तक चलने वाला युद्ध भारत की रसद लागत और प्रेषण को प्रभावित करेगा। ऐसे में भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है, और मुद्रास्फीति बढ़ने से आम आदमी पर बोझ पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें पहले ही बढ़ी हुई हैं, जिससे परिवहन और कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।



रणनीतिक रूप से यह युद्ध भारत की विदेश नीति को जटिल बना रहा है। भारत ने ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह परियोजना में निवेश किया है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है। लेकिन युद्ध से यह परियोजना खतरे में आ गई है। वहीं, भारत-अरब-इज़राइल-यूरोप गलियारा (आईएमईसी) अब अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि ईरान की अस्थिरता से चाबहार का विकल्प सीमित हो गया है। रैंड के अर्थशास्त्री रफीक दोसानी कहते हैं कि अगर अमेरिका और इज़राइल जीतते हैं, तो आईएमईसी इज़राइल की प्राथमिकता बनेगा। 


इसके अलावा, मध्य पूर्व में रहने वाले लाखों प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ गई है। प्रेषण, जो भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, प्रभावित हो सकता है। हाल ही में ‘द हिंदू’ के एक संपादकीय में कहा गया है कि यह युद्ध भारत पर अपेक्षा से अधिक प्रभाव डालेगा और पड़ोसी क्षेत्र को और जटिल बनाएगा। भारत को अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते हुए ईरान के साथ संतुलन बनाना होगा, जो एक कूटनीतिक चुनौती है।


यह युद्ध अमेरिका की वैश्विक स्थिति को दोधारी तलवार की तरह प्रभावित कर रहा है। एक ओर, अमेरिका ने ईरान की नौसेना और मिसाइल क्षमताओं को काफी नुकसान पहुंचाया है, जो उसके सैन्य प्रभुत्व को दर्शाता है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि हमलों ने ईरान की नौसेना को ‘लड़ाई अक्षम’ बना दिया है। लेकिन लंबे समय में, यह युद्ध अमेरिकी संसाधनों को खींच सकता है। चैथम हाउस के विशेषज्ञों के अनुसार, लंबा युद्ध वैश्विक जीडीपी पर सीमित प्रभाव डालेगा, लेकिन उभरती अर्थव्यवस्थाओं को ऊर्जा कीमतों से नुकसान होगा। 


वैश्विक स्तर पर, यह युद्ध अमेरिका की कूटनीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है। यूरोप और एशिया में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जैसे एथेंस में हजारों लोगों का अमेरिकी दूतावास की ओर मार्च। चीन और रूस ईरान का समर्थन कर रहे हैं, जो बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत कर रहा है। अटलांटिक काउंसिल के विशेषज्ञों का कहना है कि चीन इस संघर्ष से फायदा उठा रहा है, क्योंकि ईरान उसका रणनीतिक साझेदार है। 


आर्थिक रूप से, अमेरिका ऊर्जा निर्यातक होने से कम प्रभावित है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान से मंदी का खतरा है। जेपी मॉर्गन के अर्थशास्त्री जोसेफ लुप्टन कहते हैं कि यह संघर्ष व्यापार युद्ध पर और दबाव डालेगा। अगर युद्ध क्षेत्रीय हो गया, तो तेल कीमतें 120 डॉलर तक पहुंच सकती हैं, जिससे अमेरिकी विकास दर नकारात्मक हो सकती है।


दुनिया भर के अधिकतर जानकारों का यह मत है कि यह युद्ध मुख्य रूप से अमेरिकी कूटनीति की विफलता है। ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते से बाहर निकालकर दबाव बढ़ाया, लेकिन इससे ईरान की आक्रामकता बढ़ी। तेल और खनिज बाजार पर कब्जे की महत्वाकांक्षा साफ दिखती है, क्योंकि होर्मुज का नियंत्रण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को नियंत्रित करता है। लेकिन यह अहंकारपूर्ण दृष्टिकोण है, क्योंकि हवाई हमले सरकार नहीं गिरा सकते। रक्षा विशेषज्ञ रॉब जॉनसन कहते हैं कि अमेरिका ईरान की वायु रक्षा को नष्ट कर सकता है, लेकिन लंबी अवधि में वैश्विक ऊर्जा स्थिरता प्रभावित होगी। 


कूटनीतिक विशेषज्ञ जेफरी फेल्टमैन और माइकल ओ'हैनलॉन का मानना है कि इस युद्ध के प्रभाव ईरान, मध्य पूर्व और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ेंगे। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुश्ताक हामी ने होर्मुज को बंद रखने की धमकी दी है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकती है। 

यह युद्ध न केवल ईरान की संप्रभुता का मुद्दा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का भी। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी चाहिए, जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान देना। अमेरिका को वार्ता की ओर लौटना चाहिए, वरना यह संघर्ष विश्व युद्ध का रूप ले सकता है। स्वतंत्र रूप से देखा जय तो, यह युद्ध अनावश्यक है और इससे सभी पक्ष हारेंगे। वैश्विक नेताओं को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि शांति बहाल हो सके। 

Monday, March 9, 2026

अमेरिका की कूटनीति नहीं दादागिरी!

आज दुनिया में हर ओर युद्ध, तबाही और अराजकता का दौर है। विकास की गति रुक रही है। अनिश्चितता का वातावरण है। अनेक देशों के नेता ही मवालियों की तरह बर्ताव कर रहे हैं। जबकि विश्व के लोग हमेशा शांति और विकास चाहते हैं। कोई भी युद्ध नहीं चाहता। हर कोई यह चाहता है कि दुनिया के हर मुल्क में स्थिरता का माहौल बना रहे। इसी उठा-पटक में अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सबसे आगे हैं। ट्रम्प ही क्यों, अमरीका की तो फ़ितरत ही रही है कि कोई बहाना ढूँढ कर कमजोर देशों को दबाना और उनके संसाधनों पर क़ब्ज़ा करना। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट ने अमेरिका की कूटनीति और युद्ध रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। 

सोशल मीडिया पर @sankofa360 से एक पोस्ट काफ़ी वायरल हुई जिसमें लिखा है कि, प्रिय दुनिया, क्या तुम अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा झूठ बोलने से थक नहीं गए हो? क्या तुम उस साम्राज्य से थक नहीं गए हो जो खून और मौत की तलाश में नहीं रुकता? उन्होंने कोरिया (1950–1953) के बारे में झूठ बोला, ग्वाटेमाला (1954) के बारे में, इंडोनेशिया (1958), क्यूबा (1961), वियतनाम (1961–1975), लाओस (1964–1973), कांगो (1964), डोमिनिकन रिपब्लिक (1965), कंबोडिया (1969–1970), ग्रेनाडा (1983), लेबनान (1983–1984), लीबिया (1986), ईरान (1987–1988), पनामा (1989), इराक (1991, 1998, 2003), सोमालिया (1992–1994, 2007–वर्तमान), बोस्निया (1994–1995), सूडान (1998), अफगानिस्तान (1998, 2001), यूगोस्लाविया (1999), यमन (2002–वर्तमान), पाकिस्तान (2004), सीरिया (2014), लीबिया (2011), वेनेजुएला (2026), क्यूबा (2026), ईरान (2026) के बारे में झूठ बोला। अमेरिका या उसके सहयोगी कभी किसी बात पर सच्चे रहे हैं? दुनिया कब इनके झूठ से ऊब जाएगी? अब तो हमें पता होना चाहिए कि वैश्विक अशांति, मौत, अराजकता और विनाश के जिम्मेदार कौन हैं? जो दुनिया की स्थिरता के खिलाफ हैं? जो विश्व शांति के विचार से डरते हैं? तुम्हारी चुप्पी सहयोग है! अमेरिका वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाला है। मौत और विनाश की मशीन! अमेरिकी साम्राज्य की तानाशाही के खिलाफ बोलो!!!



यह पोस्ट न केवल अमेरिका की ऐतिहासिक गलतियों को उजागर करती है बल्कि दुनिया को जगाने का प्रयास भी करती है। आज, जब हम वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान जैसे देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप की नई लहर देख रहे हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका के फैसले गलत साबित हो चुके हैं। इन युद्धों ने न केवल लाखों जानें लीं बल्कि दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेला। अमेरिका की इन गलतियों से यह पता चलता है कि वैश्विक समुदाय अब युद्धों से कितना ऊब चुका है?



अमेरिका की विदेश नीति का इतिहास झूठ, हस्तक्षेप और युद्धों से भरा पड़ा है। 1950 के दशक से शुरू करें तो कोरियाई युद्ध (1950-1953) में अमेरिका ने उत्तर कोरिया के आक्रमण का बहाना बनाकर हस्तक्षेप किया, लेकिन वास्तविकता यह थी कि यह शीत युद्ध की रणनीति का हिस्सा था। लाखों कोरियाई मारे गए, लेकिन क्या अमेरिका की जीत हुई? नहीं, यह युद्ध आज भी कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव का कारण बना हुआ है। इसी तरह, 1954 में ग्वाटेमाला में अमेरिका ने लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को उखाड़ फेंका, क्योंकि वहां की भूमि सुधार नीतियां अमेरिकी कंपनियों को पसंद नहीं आईं। सीआईए के ऑपरेशन ने देश को दशकों की अस्थिरता में डाल दिया। क्या यह फैसला सही साबित हुआ? नहीं, ग्वाटेमाला आज भी गरीबी और हिंसा से जूझ रहा है।



1950-60 के दशक से अमेरिका के झूठ की फेहरिस्त लंबी है। इंडोनेशिया (1958) में सीआईए ने विद्रोहियों को समर्थन दिया, लेकिन असफल रहा। क्यूबा (1961) में ‘बे ऑफ पिग्स’ हमला एक बड़ी असफलता थी, जहां अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो को हटाने की कोशिश की लेकिन खुद की किरकिरी हुई। वियतनाम युद्ध (1961-1975) तो अमेरिकी इतिहास का सबसे काला अध्याय है। अमेरिका ने 'टोंकिन की खाड़ी घटना' को बहाना बनाकर युद्ध शुरू किया, जो बाद में झूठ साबित हुआ। 58,000 अमेरिकी सैनिक और लाखों वियतनामी मारे गए। अमेरिका हारकर लौटा, और वियतनाम आज एक मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश है। क्या अमेरिका का फैसला सही था? नहीं, यह युद्ध अमेरिकी समाज को भी बांट गया। लाओस (1964-1973) और कंबोडिया (1969-1970) में गुप्त बमबारी ने लाखों लोगों को मार डाला और खमेर रूज जैसे आतंक को जन्म दिया। कांगो (1964) में अमेरिका ने वहाँ प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा की हत्या में भूमिका निभाई, जो अफ्रीका की आजादी के प्रतीक थे। डोमिनिकन रिपब्लिक (1965) में हस्तक्षेप ने लोकतंत्र को कुचला।



1980 के दशक में भी यह सिलसिला जारी रहा। ग्रेनाडा (1983) में अमेरिका ने मेडिकल छात्रों की सुरक्षा का बहाना बनाकर आक्रमण किया, लेकिन यह छोटे देश पर साम्राज्यवादी कब्जा था। लेबनान (1983-1984) में अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई, लेकिन कोई स्थायी शांति नहीं आई। लीबिया (1986) में कद्दाफी पर हमला, ईरान (1987-1988) में नौसेना संघर्ष, पनामा (1989) में नोरिएगा को हटाना – ये सभी फैसले अमेरिका की ताकत दिखाने के लिए थे, लेकिन उन्होंने क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाई। इराक के खिलाफ 1991 का गल्फ वॉर, 1998 की बमबारी और 2003 का आक्रमण 'महाविनाश के हथियारों' के झूठ पर आधारित था। सद्दाम हुसैन को हटाया गया, लेकिन इराक आज भी अराजकता में डूबा है, आईएसआईएस जैसे समूह पैदा हुए। सोमालिया (1992-1994, 2007-वर्तमान) में अमेरिकी हस्तक्षेप ने समुद्री डकैती और आतंकवाद बढ़ाया। बोस्निया (1994-1995) में नाटो हमले, सूडान (1998) में दूतावास बमबारी, अफगानिस्तान (1998, 2001) में तालिबान के खिलाफ युद्ध – ये सभी अमेरिका की ‘आतंकवाद विरोधी’ नीति के नाम पर थे, लेकिन अफगानिस्तान से 2021 की शर्मनाक वापसी ने साबित किया कि 20 साल का युद्ध व्यर्थ था।


यूगोस्लाविया (1999) में नाटो बमबारी ने कोसोवो को अलग किया, लेकिन जातीय तनाव आज भी हैं। यमन (2002-वर्तमान) में ड्रोन हमलों ने नागरिकों को मार डाला, पाकिस्तान (2004) में भी यही हुआ। सीरिया (2014) में आईएसआईएस के खिलाफ हस्तक्षेप ने देश को बर्बाद कर दिया। लीबिया (2011) में कद्दाफी को हटाने के बाद देश गृहयुद्ध में फंस गया। और अब 2026 में वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान पर झूठ। वेनेजुएला में अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए और विपक्ष को समर्थन दिया, दावा किया कि मदुरो तानाशाह है, लेकिन यह तेल संसाधनों पर कब्जे की कोशिश है। क्यूबा पर दशकों से प्रतिबंध, लेकिन 2026 में नए आरोप लगाकर दबाव बढ़ाया जा रहा है। ईरान पर परमाणु कार्यक्रम के बहाने हमले की धमकी, जबकि ईरान शांति समझौते चाहता है। ये सभी फैसले गलत साबित हो चुके हैं क्योंकि उन्होंने न केवल लक्षित देशों को नुकसान पहुंचाया बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। 


संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स बताती हैं कि युद्धों से करोड़ों लोग विस्थापित हुए, अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गईं। यूक्रेन-रूस संघर्ष और इजराइल-फिलिस्तीन विवाद में अमेरिका की भूमिका ने दिखाया कि वह शांति दलाल नहीं, बल्कि युद्ध उकसाने वाला है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश अब चीन और रूस जैसे भागीदारों की ओर मुड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये देश शांति और विकास पर जोर देते हैं। ब्रिक्स जैसे संगठन अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर #NoMoreWars जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। प्यू रिसर्च के सर्वे बताते हैं कि 70% से ज्यादा वैश्विक नागरिक युद्ध विरोधी हैं। कोरोना महामारी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने साबित किया कि दुनिया को सहयोग चाहिए, न कि संघर्ष।

अमेरिका की ये गलतियां साबित करती हैं कि उसकी कूटनीति स्वार्थ पर आधारित है। वह लोकतंत्र और मानवाधिकारों का ढोंग रचता है, लेकिन वास्तव में संसाधनों और वर्चस्व की तलाश करता है। अब समय आ गया है कि दुनिया जागे। जैसे पोस्ट कहती है, चुप्पी सहयोग है। हमें अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में सुधार, बहुपक्षीय समझौते और शांति वार्ताएं ही रास्ता हैं। भारत जैसे देश, जो अहिंसा का संदेश देते हैं, वैश्विक शांति के लिए आगे आएं। दुनिया शांति चाहती है, कोई युद्ध नहीं। अमेरिका को अपनी गलतियों से सीखना चाहिए, अन्यथा इतिहास उसे वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाले के रूप में याद रखेगा। 

Monday, February 2, 2026

‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ को कैसे प्रभावी बनाए सरकार?

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के रूप में जाना जा रहा है, 27 जनवरी 2026 को संपन्न हुआ है। यह समझौता लगभग दो दशकों की लंबी वार्ताओं का परिणाम है और इसमें 2 अरब से अधिक की आबादी तथा 27 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त अर्थव्यवस्था शामिल है, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग 25 प्रतिशत है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है, जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे वैश्विक व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा कवर करने वाला ऐतिहासिक कदम बताया।  यह समझौता भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का अवसर प्रदान करता है, विशेषकर ऐसे समय में जब अमेरिकी टैरिफ के कारण निर्यात प्रभावित हो रहा है। हालांकि, इसे प्रभावी बनाने के लिए सरकार को रणनीतिक कदम उठाने होंगे, जिसमें अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार की चेतावनियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। 


इस समझौते के तहत यूरोपीय संघ भारत में निर्यात होने वाले 96.6 प्रतिशत सामानों पर टैरिफ को समाप्त या कम करेगा, जिससे यूरोपीय कंपनियों को सालाना लगभग 4 बिलियन यूरो (लगभग 4.7 बिलियन डॉलर) की बचत होगी। भारत ने यूरोपीय संघ को 102 सेवा उप-क्षेत्रों में पहुंच प्रदान की है, जबकि यूरोपीय संघ ने भारत को 144 उप-क्षेत्रों में अवसर दिए हैं, जिसमें वित्तीय, समुद्री और दूरसंचार सेवाएं शामिल हैं। ऑटोमोटिव क्षेत्र में यूरोपीय कारों पर वर्तमान 110 प्रतिशत टैरिफ को धीरे-धीरे 10 प्रतिशत तक कम किया जाएगा। भारत के लिए यह समझौता टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाओं और इंजीनियरिंग निर्यात को बढ़ावा देगा। अनुमान है कि यह समझौता 2032 तक यूरोपीय संघ के भारत में निर्यात को दोगुना कर देगा।  साथ ही, यह अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने में मदद करेगा, जहां भारत के श्रम-गहन निर्यात प्रभावित हो रहे हैं।


माना जा रहा है कि यह समझौता ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ योजनाओं के साथ तालमेल बैठाता है। यह न केवल निर्यात को बढ़ाएगा बल्कि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, निवेश और रोजगार सृजन को भी प्रोत्साहित करेगा। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ के साथ समझौता भारतीय एमएसएमई को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने का अवसर देगा। हालांकि, इसके लाभों को अधिकतम करने के लिए चुनौतियों का सामना करना होगा। यहां जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुण कुमार की चेतावनियां प्रासंगिक हैं। प्रोफेसर कुमार, जो काले धन और आर्थिक नीतियों के विशेषज्ञ हैं, ने भारत-यूरोपीय संघ एफटीए को ‘अमेरिका जैसा एक और जाल’ बताया है। उन्होंने असमान शर्तों, घरेलू उद्योगों विशेषकर कृषि और डेयरी पर जोखिम, व्यापार घाटे में वृद्धि, नीति स्थान की हानि और दीर्घकालिक आर्थिक निर्भरता की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि पिछले एफटीए में भागीदारों को अधिक लाभ हुआ है, और निवेश नियमों, नियामक संरेखण तथा बाजार बाढ़ से आत्मनिर्भरता कमजोर हो सकती है। उन्होंने अमेरिकी व्यापार समझौतों से सबक लेने की सलाह दी है, जहां कृषि बाजार खोलने की मांग भारत के लिए कठिन है। 



इन चेतावनियों को ध्यान में रखते हुए, सरकार को रचनात्मक कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले, संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। समझौते में डेयरी और कुछ कृषि उत्पादों को बाहर रखा गया है, लेकिन कुमार की चेतावनी के अनुसार, बाजार बाढ़ से बचने के लिए सख्त निगरानी तंत्र विकसित करें। सरकार कृषि क्षेत्र में सब्सिडी और समर्थन को मजबूत करे, जैसे कि फसल बीमा और बाजार लिंकेज को बढ़ावा देकर। साथ ही, एग्रीस्टैक जैसी डिजिटल पहलों को तेज करें ताकि किसान वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादन कर सकें। 


दूसरा, एमएसएमई और छोटे उद्योगों की तैयारी पर फोकस करें। प्रोफ़ेसर कुमार की निर्भरता की चेतावनी को संबोधित करने के लिए, उत्पादन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) स्कीम को विस्तार दें, विशेषकर टेक्सटाइल, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स में। एमएसएमई को क्रेडिट पहुंच, कौशल विकास और निर्यात प्रशिक्षण प्रदान करें। यूरोपीय संघ के साथ संयुक्त निवेश कोष स्थापित करें जो प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर केंद्रित हो, ताकि ‘मेक इन इंडिया’ मजबूत हो सके।


तीसरा, पर्यावरण और सस्टेनेबिलिटी मानकों का अनुपालन। यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम), जो 1 जनवरी 2026 से पूर्ण रूप से लागू है, भारतीय स्टील और एल्यूमिनियम पर कार्बन टैक्स लगा सकता है, जिससे निर्यातकों को 22 प्रतिशत तक कीमत कम करनी पड़ सकती है। सरकार को नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाकर, जैसे कि 500 जीडब्ल्यू सौर लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़कर, इस चुनौती का सामना करना चाहिए। सीबीएएम-अनुपालन प्रमाणन प्रणाली विकसित करें और यूरोपीय संघ के साथ संयुक्त हरित प्रौद्योगिकी परियोजनाएं शुरू करें।


चौथा, व्यापार घाटे को संतुलित करने के लिए विविधीकरण। प्रोफ़ेसर कुमार की व्यापार घाटे की चेतावनी को देखते हुए, सरकार निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नए बाजारों की तलाश करे, जैसे कि अफ्रीका और लैटिन अमेरिका। साथ ही, समझौते के तहत निवेश नियमों को मजबूत करें ताकि नीति स्थान सुरक्षित रहे। राष्ट्रीय निवेश बोर्ड को सक्रिय करें जो विदेशी निवेश की समीक्षा करे और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे।


पांचवां, मानव संसाधन और प्रवासन पर फोकस। समझौता प्रवासन और मोबिलिटी फ्रेमवर्क से जुड़ा है, जो ‘टैलेंट एंड सिक्योरिटी’ पर केंद्रित है। सरकार को कौशल विकास कार्यक्रमों को यूरोपीय मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए, जैसे कि आईटी और इंजीनियरिंग में। इससे युवा रोजगार बढ़ेगा और ब्रेन ड्रेन को रोका जा सकेगा।


इन सुझावों से, सरकार यदि चाहे तो प्रोफ़ेसर कुमार की चेतावनियों को अवसर में बदल सकती है। समझौता वैश्विक अनिश्चितताओं, जैसे कि अमेरिकी टैरिफ और चीन से व्यापार विचलन के बीच, भारत को रणनीतिक लाभ देगा। अनुमान है कि यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार को 41-65 प्रतिशत बढ़ाएगा और जीडीपी में 0.12-0.13 प्रतिशत की वृद्धि करेगा।  यह चीन से व्यापार विचलन (5-9 प्रतिशत) को बढ़ावा देगा, जो यूरोपीय संघ की डी-रिस्किंग और भारत की विविधीकरण रणनीति से मेल खाता है। 


‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ भारत को विकसित राष्ट्र की दिशा में ले जाने का माध्यम बन सकता है। कबीरदास के दोहे, ‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।’ को ध्यान में रखते हुए  सरकार को प्रोफेसर कुमार की चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए और संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इससे न केवल आर्थिक विकास होगा बल्कि आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। 2047 तक ‘विकसित भारत’ का सपना साकार करने के लिए यह समझौता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। 

Monday, September 22, 2025

स्वच्छ ऊर्जा की दौड़ में चीन का बढ़ता वर्चस्व !

आज की दुनिया में ऊर्जा नीतियां सिर्फ आर्थिक निर्णय नहीं हैं, बल्कि वैश्विक वर्चस्व की कुंजी हैं। जब अमेरिका तेल और गैस पर दांव लगाकर पुरानी राह पर लौट रहा है, वहीं चीन स्वच्छ ऊर्जा क्रांति को गति दे रहा है। यह विरोधाभास न केवल आर्थिक असंतुलन पैदा कर रहा है, बल्कि भविष्य की तकनीकी दिग्गजों—जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)—के लिए बुनियादी ढांचे को भी प्रभावित कर रहा है। साइरस जेन्सेन की हालिया वीडियो ‘अमेरिका जस्ट मेड द ग्रेटेस्ट मिस्टेक ऑफ द 21वीं सेंचुरी’ इस मुद्दे को बेबाकी से उजागर करती है। 



अमेरिका, जो कभी नवाचार का प्रतीक था, अब अपनी ऊर्जा नीतियों में उल्टा चढ़ाव दिखा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में, अमेरिका ने अलास्का में 44 अरब डॉलर का प्राकृतिक गैस प्रोजेक्ट शुरू किया था। जनरल मोटर्स जैसी कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की योजनाओं को रद्द कर रही हैं और वी8 गैस इंजनों पर लौट रही हैं। यहां तक कि ईवी खरीद पर टैक्स क्रेडिट भी समाप्त कर दिए गए हैं। यह सब तब हो रहा है जब दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है और नवीकरणीय ऊर्जा ही भविष्य का रास्ता दिख रही है।


जेन्सेन की वीडियो में साफ कहा गया है कि अमेरिका की यह रणनीति अल्पकालिक लाभ के लिए है। तेल और गैस निर्यात बढ़ाने से तत्काल आर्थिक फायदा तो मिलेगा, लेकिन लंबे समय में यह वैश्विक बाजारों में पीछे धकेल देगा। अमेरिका ने 1950 के दशक में सोलर पैनल विकसित किए थे, 1970 के दशक में लिथियम-आयन बैटरी का आविष्कार किया, लेकिन रोनाल्ड रीगन जैसे नेताओं ने जिमी कार्टर के व्हाइट हाउस सोलर पैनल हटाकर इसकी उपेक्षा की। आज भी वही पुरानी सोच हावी है। परिणामस्वरूप, अमेरिका ईवी निर्यात में मात्र 12 अरब डॉलर और बैटरी निर्यात में 3 अरब डॉलर पर सिमट गया है, जबकि सोलर पैनल निर्यात तो महज 69 मिलियन डॉलर का है।



यह भूल सिर्फ आर्थिक नहीं, भू-राजनीतिक भी है। वैश्विक दक्षिण—जो सौर और पवन ऊर्जा के 70 प्रतिशत स्रोतों और महत्वपूर्ण खनिजों के 50 प्रतिशत का नियंत्रण रखता है—अब नवीकरणीय ऊर्जा की ओर मुड़ रहा है। अमेरिका का जीवाश्म ईंधन पर फोकस इन देशों को अलग-थलग कर देगा, जबकि चीन इनके साथ साझेदारी कर रहा है। वहीं, चीन ने स्वच्छ ऊर्जा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना लिया है। 2024 में चीन ने दुनिया के बाकी देशों से ज्यादा विंड टर्बाइन और सोलर पैनल लगाए। ईवी और बैटरी स्टोरेज में निवेश ने इसे वैश्विक नेता बना दिया है। पिछले साल चीन ने 38 अरब डॉलर के ईवी निर्यात किए, 65 अरब डॉलर की बैटरी बेचीं, और सोलर पैनल के 40 अरब डॉलर के निर्यात किए। स्वच्छ ऊर्जा पेटेंट में चीन के पास 7 लाख से ज्यादा हैं, जो दुनिया के आधे से अधिक हैं।



जेन्सेन उद्धृत करते हुए बताते हैं कि चीन की सफलता का राज समन्वित प्रयास है। सीएल के सह-अध्यक्ष शिएन पैन कहते हैं, चीन को लंबे लक्ष्य पर प्रतिबद्ध करना मुश्किल है, लेकिन जब हम प्रतिबद्ध होते हैं, तो समाज के हर पहलू—सरकार, नीति, निजी क्षेत्र, इंजीनियरिंग—सभी एक ही लक्ष्य की ओर कड़ी मेहनत करते हैं। यह दृष्टिकोण अमेरिका की छिटपुट नीतियों से बिल्कुल अलग है।


चीन अब वैश्विक बाजारों में फैल रहा है। ब्राजील, थाईलैंड, मोरक्को और हंगरी में ईवी और बैटरी फैक्टरियां बना रहा है। हंगरी में 8 अरब डॉलर का कारखाना, इंडोनेशिया में 11 अरब डॉलर का सोलर प्लांट—ये निवेश न केवल आर्थिक, बल्कि भू-राजनीतिक लाभ भी दे रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से जेन्सेन कहते हैं, ईवी बैटरी बनाने वाले देश दशकों तक आर्थिक और भू-राजनीतिक फायदे काटेंगे। अभी तक का एकमात्र विजेता चीन है।



पिछले 15 वर्षों में चीन ने बिजली उत्पादन में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई जैसी उभरती तकनीकें बिजली पर निर्भर हैं। चीन का स्वच्छ ऊर्जा निवेश न केवल पर्यावरण बचाएगा, बल्कि एआई क्रांति में भी नेतृत्व देगा। आरएमआई की ‘पावरिंग अप द ग्लोबल साउथ’ रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक दक्षिण के 70 प्रतिशत सौर-पवन संसाधन चीन की रणनीति से जुड़ रहे हैं।


यह संघर्ष सिर्फ दो महाशक्तियों का नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का है। वैश्विक दक्षिण—अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया—अब सस्ती और सतत ऊर्जा की तलाश में है। चीन ने इन देशों में सस्ते सोलर पैनल और ईवी तकनीक पहुंचाई है, जबकि अमेरिका के महंगे गैस प्रोजेक्ट इनके लिए बोझ साबित हो रहे हैं। परिणाम? ये देश चीन की ओर झुक रहे हैं।


भारत के संदर्भ में देखें तो यह चेतावनी स्पष्ट है। हमारी ‘मेक इन इंडिया’ और ‘प्लेड्ज फॉर क्लाइमेट’ पहलें स्वच्छ ऊर्जा पर केंद्रित हैं, लेकिन चीन का वर्चस्व चुनौती है। भारत सोलर और विंड में प्रगति कर रहा है, लेकिन बैटरी और ईवी चिप्स में आयात पर निर्भरता बनी हुई है। यदि हम चीन की तरह समन्वित नीति नहीं अपनाते, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में पीछे रह जाएंगे। अमेरिका की गलती से सबक लेते हुए, भारत को स्वदेशी नवाचार पर जोर देना चाहिए—जैसे लिथियम खनन और बैटरी रिसाइक्लिंग में निवेश।


अमेरिका की यह भूल नई नहीं है। 20वीं सदी में जापान ने इलेक्ट्रॉनिक्स में अमेरिका को पीछे छोड़ा था, क्योंकि अमेरिका ने अल्पकालिक लाभ को प्राथमिकता दी। आज चीन स्वच्छ ऊर्जा में वही कर रहा है। जेन्सेन की वीडियो एक चेतावनी है: जो देश बिजली उत्पादन में आगे होगा, वही एआई और अगली औद्योगिक क्रांति जीतेगा।

अमेरिका को अपनी नीतियां पलटनी होंगी—ईवी सब्सिडी बहाल करनी होंगी, नवीकरणीय अनुसंधान में निवेश बढ़ाना होगा। लेकिन समय कम है। चीन का बढ़त 10 वर्षों का नहीं, बल्कि दशकों का हो सकता है। अमेरिका ने 21वीं सदी की सबसे बड़ी गलती कर दी है—जीवाश्म ईंधन पर दांव लगाकर स्वच्छ ऊर्जा के भविष्य को गंवा दिया। चीन का उदय एक सबक है: समन्वित, दूरदर्शी नीतियां ही विजेता बनाती हैं। भारत जैसे देशों को इस दौड़ में शामिल होना चाहिए, ताकि हम न केवल पर्यावरण बचाएं, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता भी हासिल करें। समय आ गया है कि दुनिया एकजुट होकर स्वच्छ ऊर्जा को अपनाए। अन्यथा, इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।