Monday, November 4, 2019

मोदी जी योजनाओं की जांच करवायें

जब से श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने, तब से नया भारतबनाने के लिए उन्होने अनेक जनोपयोगी क्रांतिकारी योजनाओं की घोषणाऐं की हैं। जैसे महिलाओं को गैस का सिलेंडर, निर्धनों के घरों में शौचालयों का निर्माण, जनधन योजना, आयुष्मान भारत, स्वच्छ भारत, जलशक्ति अभियान आदि। हर कोई मानता है कि मोदी जी ने एक बड़ा सपना देखा है और ये सारी योजनाऐं उसी सपने को पूरा करने की तरफ है एक-एक कदम हैं।
यंू तो देश का हर प्रधानमंत्री आज तक जनता के हित में कोई न कोई नई योजनाऐं घोषित करता रहा, पर मात्र 6 वर्ष में इतनी सारी योजनाऐं इससे पहले कभी किसी प्रधानमंत्री ने घोषित नहीं की थीं। 
इन योजनाओं में से कुछ योजनाओं का निश्चित रूप से लाभ आम आदमी को मिला है। तभी 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी जी को दोबारा इतना व्यापक जन समर्थन मिला। पर ये बात मोदी जी भी जानते होंगे और उनसे पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि जनता के विकास के लिए आवंटित धनराशि का जो प्रत्येक 100 रूपया दिल्ली से जाता है, वह जमीन तक पहुँचते-पहुँचते मात्र 14 रूपये रह जाता है। 86 रूपये रास्ते में भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाते हैं। इसलिए सारा विकास कागजों पर धरा रह जाता है।
जहाँ मोदी जी ने देश की अनेक दकियानूसी परंपराओं तोड़कर अपने लिए एक नया मैदान तैयार किया है, वहीं यह भी जरूरी है कि समय-समय पर इस बात का जायजा लेते रहें कि उनके द्वारा घोषित कार्यक्रमों का क्रियान्वयन कितने फीसदी हो रहा है।
जमीनी सच्चाई जानने के लिए मोदी जी को गैर पारंपरिक साधनों का प्रयोग करना पड़ेगा। ऐसे में मौजूदा सरकारी खूफिया एजेंसिया या सूचना तंत्र उनकी सीमित मदद कर पाऐंगे। प्रशासनिक ढांचे का अंग होने के कारण इनकी अपनी सीमाऐं हैं। इसलिए मोदी जी को गैर पारंपरिक फीड बैक मैकेनिज्मका भी सहारा लेना पड़ेगा, जैसा आज से 2300 साल पहले भारत के पहले सबसे बड़े मगध साम्राज्य के शासक अशोक महान किया करते थे। जो जादूगरों और बाजीगरों के वेश में अपने विश्वासपात्र लोगों को पूरे साम्राज्य में भेजकर जमीनी हकीकत का पता लगवाते थे और उसके आधार पर अपने प्रशासनिक निर्णय लेते थे। 
अगर मोदी जी ऐसा कुछ करते हैं, तो उन्हें बहुत बड़ा लाभ होगा। पहला तो ये कि अगले चुनाव तक उन्हें उपलब्धियों के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर आंकड़ें प्रस्तुत करने वाली अफसरशाही और खुफिया तंत्र गुमराह नहीं कर पाऐगा। क्योंकि उनके पास समानान्तर स्रोत से सूचना पहले से ही उपलब्ध होगी। ऐसा करने से वे उस स्थिति से बच जाऐंगे, जो स्थिति हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों के परिणाम आने से पैदा हुई है। जहाँ भाजपा को तीन चैथाई स्पष्ट बहुमत मिलने का पूर्णं विश्वास था, लेकिन परिणाम ऐसे आऐ कि सरकार बनाना भी दूसरे के रहमों-करम पर निर्भर हो गया। ऐसी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने का तरीका यही है कि अफसरशाही के अलावा जमीनी लोगों से भी हकीकत जानने की गंभीर कोशिश की जाए। ये पहल प्रधानमंत्री को ही करनी होगी।
ताजा उदाहरण मथुरा जिले का है। जहाँ 23 सितंबर 2019 को मथुरा में 1046 कुंडों (सरोवरों) को गहरा खोदने की घोषणा राष्ट्रीय स्तर पर की गई थी। पर जब हमने इस दावे की वैधता पर प्रश्न खड़े किये तो ये दावा करने वाले घबराकर भाग छूटे। अगर वास्तव में जलशक्ति अभियानके तहत 1046 कुंड खुदे होते तो दावा करने वालों को बगले नहीं झांकनी पड़ती। ये कहानी तो केवल एक मथुरा जिले की है और वो भी केवल एक जलशक्ति अभियानकी। अगर पूरे देश के हर जिले में प्रधानमंत्री की घोषित योजनाओं का जमीन पर मूल्यांकन किया जाए, तो पता नहीं कैसे परिणाम आऐंग? अच्छे परिणाम आते हैं, तो प्रधानमंत्री का हौसला बढ़ेगा और वो मजबूती से आगे कदम बढ़ाऐंगे। अगर परिणाम आशा के विपरीत या मथुरा में खोदे गए 1046 कुंडों के जैसे आते हैं, तो यह प्रधानमंत्री के लिए चिंता का विषय होगा। ऐसे में उन्हें अफसरशाही पर लगाम कसनी होगी। अभी उनके पास पूरे साढ़े चार वर्ष हैं। जो कमी रह गई होगी, वो इतने अरसे में पूरी की जा सकती है। साथ ही फर्जी आंकड़े देकर बयानबाजी करवाने वाली अफसरशाही के ऐसे लोग भी समय रहते बेनकाब हो जाऐंगे। तब प्रधानमंत्री को ढूँढने होंगे वे अफसर, जिनकी प्रतिष्ठा काम करके दिखाने की है, न कि भ्रष्टाचार या चाटुकारिता करने की ।

सोशल ऑडिटकरने का यह तरीका किसी भी लोकतंत्र के लिए बहुत ही फायदे का सौदा होता है। इसलिए जो प्रधानमंत्री ईमानदार होगा, पारदर्शिता में जिसका विश्वास होगा और जो वास्तव में अपने लोगों की भलाई और तरक्की देखना चाहेगा, वो सरकारी तंत्र के दायरे के बाहर इस तरह का सोशल ऑडिटकरवाना अपनी प्राथमिकता में रखेगा। चूंकि मोदी जी बार-बार जवाबदेहीपारदर्शितापर जोर देते हैं, इसलिए उन्हें यह सुझाव अवश्य ही पसंद आएगा। आशा की जानी चाहिए कि आने वाले हफ्तों में हम जैसे हजारों देश के नागरिकों को प्रधानमंत्री के आदेश पर इस तरह का सोशल ऑडिटकरने के लिए आव्हान किया जाऐगा। इससे देश में नई चेतना और राष्ट्रवाद का संचार होगा और भ्रष्टाचार पर लगाम कसेगी।

Monday, October 21, 2019

राम जन्मभूमि विवाद: क्या फैसला आयेगा ?

सर्वोच्च न्यायालय में सबसे लंबा चला मुकदमा अब फैसले के इंतजार में है। अदालत फैसला 17 नंबवर को आऐगा। दोनों पक्ष दिल थामकर इसका इंतजार कर रहे हैं। यहां इस केस में दोनों पक्षों द्वारा दिये तर्क-वितर्काें का मैं कोई मूल्यांकन नहीं करूँगा। ये अधिकार तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय का है। जाहिर सी बात है कि फैसला जिसके पक्ष में आएगा, दूसरा पक्ष उसका विरोध करेगा। यह भी निश्चित है कि अगर फैसला हिंदूओं के हक में आता है, तो मुसलमानों को उत्तेजित और आन्दोलित करने का भरसक प्रयास उनके राजनेताओं द्वारा किया जाएगा। अगर फैसला मुसलमानों के पक्ष में आता है, तो हिंदू भी सड़कों पर उतर आऐंगे। दोनों ही स्थितियाँ समाज के लिए अच्छी नहीं होंगी। पर जैसा कि 1990 से मैं और मेरे जैसे अनेकों निष्पक्ष पत्रकार लिखते और बोलते आऐ हैं कि जब तक अयोध्या, काशी और मथुरा में हमारे सबसे पवित्र तीर्थस्थलों पर से मस्जिदें नहीं हटेंगी, तब तक दोनों पक्षों के बीच में सद्भाव ही नहीं सकता। 

मैं ब्रजवासी हूँ। ब्रजवासी होने के नाते स्वाभाविक रूप से श्रीकृष्ण भक्त हूँ और जब से होश संभाला है, तब से श्रीकृष्ण जन्मस्थान मथुरा के दर्शन करने जाता रहा हूँ। हर बार वहां खड़ी विशाल मस्जिद को देखकर मन में एक चुभन होती है और उस क्षण की याद ताजा हो जाती है, जब वहां स्थित भव्य देवालय को आक्रांताओं ने तोड़कर मस्जिद चिनी थी। हम उस दृश्य के साक्षी नहीं है, पर इतिहास पढ़कर और सुनकर कल्पना करते हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि हमारे आराध्य की जन्मभूमि पर जिस समय उस भव्य मंदिर को तोड़ा जा रहा होगा, तो वहां मौजूद भक्तों, संतों और ब्रजवासियों कोे कितनी मानसिक यातना हुई होगी। यह भाव मेरी आने वाली पीढ़ियों को भी वैसा ही होगा जैसा हमारी पीढ़ी या हमसे पिछली पीढ़ियों को होता आया है। वह भी तब जबकि हम धर्मान्ध या कट्टरवादी नहीं हैं और दूसरे धर्मों का भी सम्मान करना हमें हमारे माता-पिता ने बचपन से सिखाया है। पर अपने हिंदू धर्म के प्रति हमारी गहरी आस्था है। इसलिए अयोध्या ही नहीं, हम तो मथुरा और काशी से भी इन मस्जिदों को हटाना चाहते हैं। आशा करते हैं कि ऊपर भगवान और नीचे इस देश के शासक सदियों की हमारी इस पीड़ा को शीघ्र दूर करेंगे।

इसलिए मैं बार-बार अपने मुसलमान भाईयों से बड़ी विनम्रता से यही निवेदन करता आया हूं कि वे इस पीड़ा को समझे और भविष्य में आपसी सौहार्द् का वातावरण बनाने के लिए स्वयं ही हिंदू धर्म की इन तीन दिव्य स्थलों से अपनी मस्जिदों को ससम्मान दूसरी जगह ले जाएं। तुर्की की राजधानी इस्तानबुल में मध्य युग की एक ऐतिहासिक इमारत जिसेसोफिया मस्जिदकहते थे, मौजूद है। दरअसल ये एक भव्य चर्च था, जिसे मुस्लिम शासकों ने जबरन कब्जा कर मस्जिद बना दिया था। पर तुर्की के दूरदृष्टि वाले आधुनिक शासकों ने इसकी संवेदनशीलता को समझा और उसे मुसलमानों की इबादत के लिए बंद कर दिया। इतना ही नहीं मुस्लिम आक्रंताओं ने यीशू मसीह के जीवन से संबंधित दीवारों पर जो विशाल भव्य चित्र बने थे, उन पर कई सदियों पहले पलस्तर करके उन्हें छिपा दिया था। पर अब वह सब हटा दिया गया है औरसोफिया चर्चजनता के दर्शनार्थ खोल दिया गया है। जहाँ जाकर आपको मस्जिद होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। ये उस देश में हुआ, जो मुस्लिम देश है। तो भारत में, जहाँ हिंदू धर्म की परंपरा इस्लाम से 4000 वर्ष से भी पहले की है और जहाँ की बहुसख्यंक आबादी हिंदू है, वहाँ ये क्यों नहीं हो सकता


अगर अदालत का फैसला हिंदूओं के पक्ष में आता है, तो उन्हें संयम बरतना चाहिए। हर्ष और उत्साह के अतिरेक में ऐसा कुछ करे जिससे समाज में वैमनस्य फैले और हिंसक संघर्ष हो। बल्कि मुस्लिम समाज को आश्वासन देना चाहिए कि वे अयोध्या में उनकी नई मस्जिद के निर्माण में तन, मन और धन से सहयोग करेंगे। अगर अदालत बहुसंख्यक हिंदूओं की भावना और वकीलों के तर्क को दरकिनार कर फैसला मुसलमानों के पक्ष में दे देती है, तो इसे अपनी कानूनी जीत मानकर, मुसलमानों को एक उदार भाई की तरह हिंदूओं को राम जन्मभूमि सौंप देनी चाहिए। यह कहते हुए कि हम कानून की लड़ाई जीत गये, पर अब हम आपका दिल जीतने का काम करेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि फैसला जो भी आऐ, समाज में सौहार्द बना रहे और बहुसंख्यक हिंदूओं की आस्था के इतने बड़े केंद्र पर भविष्य में तनाव की जगह भजन और भक्ति का वातावरण बने।