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Monday, April 22, 2024

लोकतंत्र अभी और परिपक्व हो


अभी आम चुनाव का प्रथम चरण ही पूरा हुआ है पर ऐसा नहीं लगता कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव जैसी कोई महत्वपूर्ण घटना घट रही है। चारों ओर एक अजीब सन्नाटा है। न तो गाँव, कस्बों और शहरों में राजनैतिक दलों के होर्डिंग और पोस्टर दिखाई दे रहे हैं और न ही लाऊडस्पीकर पर वोट माँगने वालों का शोर सुनाई दे रहा है, चाय के ढाबों और पान की दुकानों पर अक्सर जमा होने वाली भीड़ भी खामोश है। जबकि पहले चुनावों में ये शहर के वो स्थान होते थे जहाँ से मतदाताओं की नब्ज पकड़ना आसान होता था। आज मतदाता खामोश है। इसका क्या कारण हो सकता है। या तो मतदाता तय कर चुके हैं कि उन्हें किसे वोट देना है पर अपने मन की बात को ज़ुबान पर नहीं लाना चाहते। क्योंकि उन्हें इसके सम्भावित दुष्परिणामों का खतरा नजर आता है। ये हमारे लोकतंत्र के स्वस्थ के लिए अच्छा लक्षण नहीं है। जनसंवाद के कई लाभ होते हैं। एक तो जनता की बात नेता तक पहुँचती है दूसरा ऐसे संवादों से जनता जागरूक होती है। अलबत्ता शासन में जो दल बैठा होता है वो कभी नहीं चाहता कि उसकी नीतियों पर खुली चर्चा हो। इससे माहौल बिगड़ने का खतरा रहता है। हर शासक यही चाहता है कि उसकी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर मतदाता के सामने पेश किया जाए। इंदिरा गाँधी से नरेन्द्र मोदी तक कोई भी इस मानसिकता का अपवाद नहीं रहा है। 



आमतौर पर यह माना जाता था कि मीडिया सचेतक की भूमिका निभाएगा। पर मीडिया को भी खरीदने और नियंत्रित करने पर हर राजनैतिक दल अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करता है। जिससे उसका प्रचार होता रहे। पत्रकारिता में इस मानसिकता के जो अपवाद होते हैं वे यथा संभव निष्पक्ष रहने का प्रयास करते हैं। ताकि परिस्थितियों और समस्याओं का सही मूल्यांकन हो सके। पर इनकी पहुँच बहुत सीमित होती है, जैसा आज हो रहा है। ऐसे में मतदाता तक सही सूचनाएँ नहीं पहुँच पातीं। अधूरी जानकारी से जो निर्णय लिए जाते हैं वो मतदाता, समाज और देश के हित में नहीं होते। जिससे लोकतंत्र कमजोर होता है।   


सब मानते हैं कि किसी भी देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था ही सबसे अच्छी होती है क्योंकि इसमें समाज के हर वर्ग को अपनी सरकार चुनने का मौका मिलता है। इस शासन प्रणाली के अन्तर्गत आम आदमी को अपनी इच्छा से चुनाव में खड़े हुए किसी भी प्रत्याशी को वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार होता है। इस तरह चुने गए प्रतिनिधियों से विधायिका बनती है। एक अच्छा लोकतन्त्र वह है जिसमें  राजनीतिक और सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक न्याय की व्यवस्था भी है। देश में यह शासन प्रणाली लोगों को सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान करती हैं।


आज भारत में जो परिस्थिति है उसमें जनता भ्रमित है। उसे अपनी बुनियादी समस्याओं की चिंता है पर उसके एक हिस्से के दिमाग में भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं ने ये बैठा दिया है कि नरेन्द्र मोदी अब तक के सबसे श्रेष्ठ और ईमानदार प्रधान मंत्री हैं इसलिए वे तीसरी बार फिर जीतकर आएंगे। जबकि ज़मीनी हकीकत अभी अस्पष्ट है। क्षेत्रीय दलों के नेता काफी तेज़ी से अपने इलाके के मतदाताओं पर पकड़ बना रहे हैं। और उन सवालों को उठा रहे हैं जिनसे देश का किसान, मजदूर और नौजवान चिंतित है। इसलिए उनके प्रति आम जनता की अपेक्षाएं बढ़ी हैं इसलिए ‘इंडिया’ गठबंधन के नेताओं की रैलियों में भरी भीड़ आ रही है। जबकि भाजपा की रैलियों का रंग फीका है। हालाँकि चुनाव की हवा मतदान के 24 घंटे पहले भी पलट जाती है इसलिए कुछ कहा नहीं जा सकता। 


70 के दशक में हुए जयप्रकाश आन्दोलन के बाद से किसी भी राजनैतिक दल ने आम मतदाताओं को लोकतंत्र के इस महापर्व के लिए प्रशिक्षित नहीं किया है। जबकि अगर ऐसा किया होता तो इन दलों को चुनाव के पहले मतदाताओं को खैरात बाँटने और उनके सामने लम्बे चौड़े झूठे वायदे करने की नौबत नहीं आती। हर दल का अपना एक समर्पित काडर होता। जबकि आज काडर के नाम पर पैसा देकर कार्यकर्ता जुटाए जाते हैं या वे लोग सक्रिय होते हैं जिन्हें सत्ता मिलने के बाद सत्ता की दलाली करने के अवसरों की तलाश होती है। ऐसे किराये के कार्यकर्ताओं और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता का अभाव ही दल बदल का मुख्य कारण है। इससे राजनेताओं की और उनके दलों की साख तेज़ी से गिरी है। एक दृष्टि से इसे लोकतंत्र के पतन का प्रमाण माना जा सकता है। हालाँकि दूसरी ओर ये मानने वालों की भी कमी नहीं है कि इन सब आंधियों को झेलने के बावजूद भारत का लोकतंत्र मजबूत हुआ है। उसके करोड़ों आम मतदाताओं ने बार-बार राजनैतिक परिपक्वता का परिचय दिया है। जब उसने बिना शोर मचाये अपने मत के जोर पर कई बार सत्ता परिवर्तन किये हैं। मतदाता की राजनैतिक परिपक्वता का एक और प्रमाण ये है की अब निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रभाव लगभग समाप्त हो चला है। 1951 के आम चुनावों में 6% निर्दलीय उम्मीदवार जीते थे जबकि 2019 के चुनाव में इनकी संख्या घटकर मात्र 0.11% रह गई। स्पष्ट है कि मतदाता ऐसे उम्मीदवारों के हाथ मजबूत नहीं करना चाहता जो अल्पमत की सरकारों से मोटी रकम ऐंठकर समर्थन देते हैं। मतदाताओं की अपेक्षा और विश्वास संगठित दलों और नेताओं के प्रति है यदि वे अपने कर्तव्य का सही पालन करें तो। इसलिए हमें निराश नहीं होना है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हमारे परिवार और समाज में राजनीति के प्रति समझ बढ़े और हर मतदाता अपने मत का प्रयोग सोच समझकर करे। कोई नेता या दल मतदाता को भेड़-बकरी समझकर हाँकने की जुर्रत न करे। 

Monday, February 15, 2021

भारत कैसे फिर बने गणराज्य


दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र, अमरीका नहीं भारत है। 600 ई॰पू॰ भारत में सैंकड़ों गणराज्य थे। जहां बिना लिंग और जाति भेद के समाज के हर वर्ग के प्रतिनिधि खुली चर्चाओं के बाद शासन के नियम और क़ानून तय करते थे। फिर राजतंत्र की स्थापना हुई और दो हज़ार से ज़्यादा वर्षों तक चली। माना यह जाता है कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान पश्चिमी विचारों से प्रभावित हो कर समानता, स्वतंत्रता व बंधुत्व का भारत में प्रचार हुआ और उसी से जन्मा हमारा आज का लोकतंत्र। जिसे आज पूरी दुनिया में  इसलिए सराहा जाता है क्योंकि इसमें बिना रक्त क्रांतियों के चुनाव के माध्यम से शांतिपूर्ण तरीक़े से सरकारें बदल जाती हैं। जबकि हमारे साथ ही आज़ाद हुए पड़ोसी देशों में आए दिन सैनिक तख्ता पलट होते रहते हैं। आज पूरी दुनिया मानती है कि शासन का सबसे बढ़िया प्रारूप लोकतंत्र है। क्योंकि इसमें किसी के अधिनायकवादी बनने की संभावना नहीं रहती। एक चाय बेचने वाला भी देश का प्रधान मंत्री बन सकता है या एक दलित भारत का राष्ट्रपति या मुख्य न्यायाधीश बन सकता है। अपनी इस खूबी के बावजूद भारत के लोकतंत्र की ख़ामियों पर सवाल उठते रहे हैं। 


सातवें दशक में गुजरात के छात्र आंदोलन और फिर लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संघर्षवाहिनी के माध्यम से पैदा हुए जनआक्रोश की परिणिति पहले आपातकाल की घोषणा और फिर केंद्र में सत्ता पलटने से हुई। तब से आजतक अनेक राष्ट्रीय आंदोलनों और क्षेत्रीय आंदोलनों के कारण प्रांतों और केंद्र में सरकारें चुनावों के माध्यम से शांतिपूर्ण तरीक़े से बदलती रही हैं। लेकिन हमारे लोकतंत्र की गुणवत्ता नहीं सुधरी। इसके विपरीत राजनीति में जवाबदेही और पारदर्शिता का तेज़ी से पतन हुआ है। आज राजनीति में न तो विचारधारा का कोई महत्व बचा है और न ही ईमानदारी का। हर दल में समाज के लिए जीवन खपाने वाले कार्यकर्ता कभी भी अपना उचित स्थान नहीं पाते। उनका जीवन दरी बिछाने और नारे लगाने में ही समाप्त हो जाता है। हर दल चुनाव के समय टिकट उसी को देता है जो करोड़ों रुपया खर्च करने को तैयार हो या उसके समर्थन में उसकी जाति का विशाल वोट बैंक हो। फिर चाहे उसका आपराधिक इतिहास रहा हो या उसने बार-बार दल बदले हों, इसका कोई विचार नहीं किया जाता। 


यही कारण है कि आज भारत में भी लोकतंत्र सही मायने में जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं कर रहा। हर दल और हर सरकार में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अधिनायकवादी प्रवृतियाँ ही देखी जाती हैं। परिणामतः भारत हमेशा एक चुनावी माहौल में उलझा रहता है। चुनाव जीतने के सफल नुस्ख़ों को हरदम हर दल द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। नतीजतन देश में साम्प्रदायिक, जातिगत हिंसा या तनाव और जनसंसाधनों की खुली लूट का तांडव चलता रहता है। जिसके कारण समाज का हर वर्ग हमेशा असुरक्षित और अशांत रहता है। ऐसे में आम जन के सम्पूर्ण विकास की कल्पना करना भी बेमानी है। मूलभूत आवश्यकताओं के लिए आज भी हमारा बहुसंख्यक समाज रात दिन संघर्षरत रहता है।

पिछले कुछ हफ़्तों से चल रहे किसान आंदोलन को मोदी जी किसानों का पवित्र आंदोलन बताते हैं और आंदोलनजीवियों पर प्रहार करते हैं। अपनी निशपक्षता खो चुका मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आंदोलनकारियों को आतंकवादी, खलिस्तानी या नकसलवादी बताता है। विपक्षी दल सरकार को पूँजीपतियों का दलाल और किसान विरोधी बता रहे हैं। पर सच्चाई क्या है? कौनसा दल है जो पूँजीपतियों का दलाल नहीं है? कौनसा दल है जिसने सत्ता में आकर किसान मज़दूरों की आर्थिक प्रगति को अपनी प्राथमिकता माना हो? धनधान्य से भरपूर भारत का मेहनतकश आम आदमी आज अपने दुर्भाग्य के कारण नहीं बल्कि शासनतंत्र में लगातार चले आ रहे भ्रष्टाचार के कारण गरीब है। इन सब समस्याओं के मूल में है संवाद की कमी। 

आंदोलनकारी किसानों और सरकार के बीच जो परिस्थिति आज पैदा हुई है वह भी संवाद की कमी के कारण हुई है। अगर ये कृषि क़ानून समुचित संवाद के बाद लागू किए जाते तो शायद यह नौबत नहीं आती। आज दिल्ली बोर्डर से निकल कर किसानों की महा-पंचायतों का एक क्रम चारों ओर फैलता जा रहा है और ये सिलसिला आसानी से रुकने वाला नहीं लगता। क्योंकि अब इसमें विपक्षी दल भी खुल कर कूद पड़े हैं। हो सकता है कि इन महा-पंचायतों के दबावों में सरकार इन क़ानूनों को वापिस ले ले। पर उससे देश के किसान मज़दूर और आम आदमी को क्या उसका वाजिब हक़ मिल पाएगा? ऐसा होना असंभव है। इसलिए लगता है कि अब वो समय आ गया है कि जब दलों की दलदल से बाहर निकल कर लोकतंत्र को ज़मीनी स्तर पर मज़बूत किया जाए। जिसके लिए हमें 600 ई॰पू॰ भारतीय गणराज्यों से प्रेरणा लेनी होगी। जहां संवाद ही लोकतंत्र की सफलता की कुंजी था। 

सत्तारूढ़ दलों सहित देश के हर दल को इसमें पहल करनी होगी और साथ ही समाज के हर वर्ग के जागरूक लोगों आगे आना होगा। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी महा-पंचायत हर तीन महीने में हर ज़िले के स्तर पर आयोजित की जाए जिनमें स्थानीय, प्रांतीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर जनता के बीच संवाद हो। इन महा-पंचायतों में कोई भी राजनैतिक दल या संगठन अपना झंडा या बैनर न लगाए, केवल तिरंगा झंडा ही लगाया जाए और न ही कोई नारेबाज़ी हो। महा-पंचायतों का आयोजन एक समन्वय समिति करे। जिसमें चर्चा के लिए तय किए हुए मुद्दे मीडिया के माध्यम से क्षेत्र में पहले ही प्रचारित कर दिए जाएँ और उन पर अपनी बात रखने के लिए क्षेत्र के लोगों को खुला निमंत्रण दिया जाए। इन महा-पंचायतों में उस क्षेत्र के सांसद और विधायकों की केवल श्रोता के रूप में उपस्थिति अनिवार्य हो, वक्ता के रूप में नहीं। क्योंकि विधान सभा और संसद में हर मुद्दे के लिए बहस का समय नहीं मिलता। इस तरह जनता की बात शासन तक पहुँचेगी और फिर धरने, प्रदर्शनों और हड़तालों की सार्थकता क्रमशः घटती जाएगी। अगर ईमानदारी से यह प्रयास किया जाए तो निश्चित रूप से हमारा लोकतंत्र सुदृढ़ होगा और हर भारतवासी लगातार सक्रिय रहकर अपने हक़ को पाने के लिए सचेत रहेगा। फिर उसकी बात सुनना सरकारों की मजबूरी होगी।      

Monday, November 9, 2020

अमरीकी टीवी से सीखें भारतीय टीवी चैनल

अमरीका में चुनाव का जो भी नतीजा हो मतगणना के दौरान डॉनल्ड ट्रम्प ने जो जो नाटक किए उससे उनका पूरी दुनिया में मज़ाक़ उड़ा है। अपनी हार की आशंका से बौखलाए ट्रम्प ने कई बार संवाददाता सम्मेलन करके विपक्ष पर चुनाव हड़पने के तमाम झूठे आरोप लगाए और उनके समर्थन में एक भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। उनके इस ग़ैर ज़िम्मेदाराना आचरण से दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के राष्ट्रपति के पद की गरिमा को भारी ठेस लगी है। 

पर हमारा आज का विषय ट्रम्प नहीं बल्कि अमरीकी टीवी चैनल हैं। जिन्होंने गत शुक्रवार को ट्रम्प के संवाददाता सम्मेलन का सीधा प्रसारण बीच में ही रोक दिया। यह कहते हुए कि राष्ट्रपति ट्रम्प सरासर झूठ बोल रहे हैं और बिना सबूत के दर्जनों झूठे आरोप लगा रहे हैं। इन टीवी  चैनलों के एंकरों ने यह भी कहा ट्रम्प के इस ग़ैर ज़िम्मेदाराना आचरण से अमरीकी समाज में अफ़रातफ़री फैल सकती है और संघर्ष पैदा हो सकता है, इसलिए जनहित में हम राष्ट्रपति ट्रम्प के भाषण का सीधा प्रसारण बीच में ही रोक रहे हैं। 


अमरीका के समाचार टीवी चैनलों की इस बहादुरी और ज़िम्मेदाराना पत्रकारिता की सारी दुनिया में तारिफ़ हो रही है। दरअसल अपनी इसी भूमिका के लिए ही मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। ये भारत के समाचार टीवी चैनलों के लिए बहुत बड़ा तमाचा है। दूरदर्शन तो अपने जन्म से ही सरकार का भोंपू रहा है। प्रसार भारती बनने के बाद उस स्थिति में थोड़ा बदलाव ज़रूर आया है। पर कमोबेश वो आज भी सरकार का भोंपू बना हुआ है। भारत में स्वतंत्र टीवी पत्रकारिता इंडिया टुडे समूह ने अंग्रेज़ी विडीओ न्यूज़ पत्रिका ‘न्यूज़ट्रैक’ से और मैंने ‘कालचक्र’ हिंदी विडीओ समाचार पत्रिका से 30 वर्ष पहले शुरू की थी। तब अंग्रेज़ी दैनिक पायनियर में मेरा और न्यूज़ट्रैक की संपादिका मधु त्रेहान का एक इंटरव्यू छपा था। जिसमें मधु ने कहा था, ‘हम मीडिया के व्यापार में हैं और व्यापार लाभ के लिए किया जाता है।’ और मैंने कहा था, ‘हम जनता के प्रवक्ता हैं इसलिए जो भी सरकार में होगा उसकी ग़लत नीतियों की आलोचना करना और जनता के दुःख दर्द को सरकार तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य है और हम हमेशा यही करेंगे।’ 


जब से निजी टीवी चैनलों की भरमार हुई है तबसे लोगों को लगा कि अब टीवी समाचार सरकार के शिकंजे से मुक्त हो गए। पर ऐसा हुआ नहीं। व्यापारिक हितों को ध्यान में रखते हुए ज़्यादातर समाचार चैनल राजनैतिक ख़ेमों में बट गए हैं। ऐसा करना उनकी मजबूरी भी था। क्योंकि जितना आडम्बरयुक्त और खर्चीला साम्राज्य इन टीवी चैनलों ने खड़ा कर लिया है उसे चलाने के लिए मोटी रक़म चाहिए। जो राजनैतिक दलों या औद्योगिक घरानों के सहयोग के बिना मिलनी असम्भव है। फिर भी कुछ वर्ष पहले तक कुल मिलाकर सभी टीवी चैनल एक संतुलन बनाए रखने का कम से कम दिखावा तो कर ही रहे थे। पर पिछले कुछ वर्षों में भारत के ज़्यादातर समाचार चैनलों का इतनी तेज़ी से पतन हुआ कि रातों रात टीवी पत्रकारों की जगह चारण और भाटों ने ले ली। जो रात दिन चीख-चीख कर एक पक्ष के समर्थन में दूसरे पक्ष पर हमला करते हैं। 


इनकी एंकरिंग या रिपोर्टिंग में तथ्यों का भारी अभाव होता है या वे इकतरफ़ा होते हैं। इनकी भाषा और तेवर गली मौहल्ले के मवालियों जैसी हो गई है। इनके ‘टॉक शो’ चौराहों पर होने वाले छिछले झगड़ों जैसे होते हैं। और तो और कभी चाँद पर उतरने का एस्ट्रोनॉट परिधान पहन कर और कभी राफ़ेल के पाइलट बन कर जो नौटंकी ये एंकर करते हैं, उससे ये पत्रकार कम जोकर ज़्यादा नज़र आते हैं। इतना ही नहीं दुनिया भर के टीवी चैनलों के पुरुष और महिला एंकरों और संवाददाताओं के पहनावे, भाषा और तेवर की तुलना अगर भारत के ज़्यादातर टीवी चैनलों के एंकरों और संवाददाताओं से की जाए तो स्थिति स्वयं ही स्पष्ट हो जाएगी। भारत के ज़्यादातर समाचार टीवी चैनल पत्रकारिता के अलवा सब कुछ कर रहे हैं। यह शर्मनाक ही नहीं दुखद स्थिति है। गत शुक्रवार को अमरीका के राष्ट्रपति के झूठे बयानों का प्रसारण बीच में रोकने की जो दिलेरी अमरीका के टीवी एंकरों ने दिखाई वैसी हिम्मत भारत के कितने समाचार टीवी एंकरों की है? 


उधर अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी को लेकर भी जो विवाद हुआ है उसे भी इसी परिपेक्ष में देखने की ज़रूरत है। अगर आप यूट्यूब पर मेरे नाम से खोजें तो आपको तमाम टीवी शो ऐसे मिलेंगे जिनमें एंकर के नाते अर्नब ने हमेशा मुझे पूरा सम्मान दिया है और मेरे संघर्षों का गर्व से उल्लेख भी किया है। ज़ाहिर है कि मैं अर्नब के विरोधियों में से नहीं हूँ। टीवी समाचारों के 31 बरस के अपने अनुभव और उम्र के हिसाब से मैं उस स्थिति में हूँ कि एक शुभचिंतक के नाते अर्नब की कमियों को उसके हित में खुल कर कह सकूं। पिछले कुछ वर्षों में अर्नब ने पत्रकारिता की सीमाओं को लांघ कर जो कुछ किया है उससे स्वतंत्र टीवी पत्रकारिता कलंकित हुई है। अर्नब के अंधभक्तों को मेरी यह टिप्पणी अच्छी नहीं लगेगी। पर हक़ीक़त यह है कि अर्नब भारतीय टीवी का एक जागरूक, समझदार और ऊर्जावान एंकर था। लेकिन अब उसने अपनी वह उपलब्धि अपने ही व्यवहार से नष्ट कर दी। कहते हैं जब जागो तब सवेरा। हो सकता है कि अर्नब को इस आपराधिक मामले में सज़ा हो जाए या वो बरी हो जाए। अगर वो बरी हो जाता है तो उसे एकांत में कुछ दिन पहले ध्यान करना चाहिए और फिर चिंतन और मनन कि वो पत्रकारिता की राह से कब और क्यों भटका? यही चेतावनी बाक़ी समाचार चैनलों के एंकरों और संवाददाताओं के लिए भी है कि वे लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ का सदस्य होने की गरिमा और मर्यादा को समझें और टीवी पत्रकार की तरह व्यवहार करें, चारण और भाट की तरह नहीं।


Monday, October 12, 2020

अफ़सरशाही बनाम नौकरशाही

वैसे तो यह कोई नया विषय नहीं है। जबसे हमें अंग्रेजों की ग़ुलामी से मुक्ति मिली है, तबसे यह चर्चा का विषय रहा है कि देश का ‘स्टील फ्रेमवर्क’ मानी जाने वाली कार्यपालिका किसके प्रति जवाबदेह है? उस जनता के प्रति जिसके कर के पैसे से इसे वेतन और सुविधाएँ मिलती हैं या राजनेताओं के प्रति जो हर चुनाव में बदलते रहते हैं? 

आम व्यवहार में देखने में यह आता है कि जिस जनता की सेवा के लिए इस तंत्र को खड़ा किया गया है और पाला पोसा जाता है, उस जनता के प्रति इन तथाकथित जनसेवकों का व्यवहार बहुत निराशाजनक और सामंतवाद की दुर्गंध लिए होता है। ऐसा नहीं है कि इसके अपवाद नहीं हैं। पर उनका प्रतिशत लगातार घटता जा रहा है। 


कार्यपालिका के इस तंत्र को नौकरशाही कहा जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, नौकर यानी सेवक, जो अपने मालिक की विनम्रता से और ईमानदारी से सेवा करे। इस परिभाषा के अनुसार हर नौकरशाह को आम जनता यानी गरीब से गरीब आदमी की सेवा करने, उसकी फ़रियाद सुनने और उसकी समस्याओं का हल करने के लिए 24 घंटे खुले दिल से तत्पर रहना चाहिए। जबकि होता इसका उल्टा है। नौकरशाहों के सरकारी बंगलों पर प्रायः गरीब या आम आदमी को फटकार, तिरस्कार या उपेक्षा मिलती है। जबकि भ्रष्ट, अपराधी या माफिया क़िस्म के लोगों को, उनके राजनैतिक सम्पर्कों के कारण, विशिष्ट व्यक्तियों का सा सम्मान मिलता है। जबकि दुत्कारा जाने वाला व्यक्ति अपने खून पसीने की कमाई से नौकरशाही का भरण पोषण करता है और सार्वजनिक संसाधनों और बेंकों को अवैध तरीक़े से लूटने वाला तथाकथित बड़ा आदमी समाज पर जोंक की तरह होता है। फिर भी नौकरशाही अपने असली मालिकों की उपेक्षा करके इन नक़ली मालिकों के आगे झुकती है। उसके इसी रवैय्ये के कारण देश तरक़्क़ी नहीं कर पा रहा और लुटता रहता है। 


जिन राजनैतिक आकाओं के सामने इस तंत्र को अफ़सरशाही दिखानी चाहिए, वहाँ ये दुम दबा कर नौकरशाह बन जाते हैं। अफ़सरशाही मतलब हर मुद्दे को क़ानून के दायरे में समझ कर और उसके व्यवहारिक हल ढूँढ कर मंत्री के आगे प्रस्तुत करना, अफ़सरशाही का कर्तव्य होता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि बिना राग द्वेष के हर मुद्दे पर अफ़सर अपनी निष्पक्ष राय प्रस्तुत करेगा, जिससे मंत्री को सही निर्णय लेने में सुविधा होगी। इतना ही नहीं, अगर मंत्री अपने दल या स्वयं के लाभार्थ अफ़सर पर अनुचित दबाव डालकर कुछ अवैध या अनैतिक काम करवाना चाहता है तो अफ़सर का फ़र्ज़ होता है कि वो उसे ऐसा करने से रोके या उसे फ़ाइलों के पेचों में उलझाकर उसके इरादों को कामयाब न होने दे। जिससे जनता और देश का भला हो। 



पर होता इसका उल्टा है। अपने राजनैतिक आकाओं को खुश करने के लिए अफ़सरशाही झुकना तो छोटी बात है, उनके आगे साष्टांग लेटने में भी संकोच नहीं करती। स्पष्ट है कि ऐसा अनैतिक कृत्य करने के पहले अफ़सर को यह विश्वास होता है कि इस ‘सेवा’ का उसे अपेक्षा से ज़्यादा व्यक्तिगत लाभ मिलेगा। इसलिए वह लालच के अंधे कुएँ में डूबता चला जाता है। ऐसा कम ही होता है कि इस तरह का भ्रष्ट आचरण करने वाला अफ़सर कभी क़ानून के शिकंजे में फँसता हो। हास्य कवि काका हाथरसी की एक मशहूर कविता है, ‘क्यों डरता है बेटा रिश्वत लेकर - छूट जाएगा तू भी रिश्वत दे कर’। अच्छी और कमाऊ पोस्टिंग के लालच में अफ़सरशाही अपने राजनैतिक आकाओं के आगे दुम हिलती हुई नौकरशाह बनी सेवा को तत्पर खड़ी रहती है। इसीलिए देश में आए दिन हज़ारों बड़े-बड़े घोटाले होते रहते हैं। और किसी का कुछ नहीं बिगड़ता। 


एक बार फिर मध्य प्रदेश की आईएएस अधिकारी दीपाली रस्तोगी की इस स्वीकारोक्ति को यहाँ लाना सार्थक होगा। अपने एक लेख में दीपाली लिखती हैं :  

हम अपने बारे में, अपनी बुद्धिमता के बारे में और अपने अनुभव के बारे में बहुत ऊँची राय रखते हैं और सोचते हैं कि लोग इसीलिए हमारा सम्मान करते हैं। जबकि असलियत यह है कि लोग हमारे आगे इसलिए समर्पण करते हैं क्योंकि हमें फ़ायदा पहुँचाने या नुक़सान करने की ताक़त दी गई है। पिछले दशकों में हमने एक आदत डाल ली है कि हम बड़ी तादाद में ख़ैरात बाँटने के अभ्यस्त हो गाए हैं, चाहें वह वस्तु के रूप में हो या विचारों के रूप में। असलियत यह है कि जो हम बाँटते हैं वो हमारा नहीं होता। 

हमें वेतन और सुविधाएँ इसलिए मिलती हैं कि हम अपने काम को कुशलता से करें और ‘सिस्टम’ विकसित करें। सच्चाई यह है कि हम कुप्रबंध और अराजकता फैला कर पनपते हैं क्योंकि ऐसा करने से हम कुछ को फ़ायदा पहुँचाने के लिए चुन सकते हैं और बाक़ी की उपेक्षा कर सकते हैं। हमें भारतीय गणतंत्र का ‘स्टील फ्रेम’ माना जाता है। सच्चाई यह है कि हममें दूरदृष्टि ही नहीं होती। हम अपने राजनैतिक आकाओं की इच्छा के अनुसार औचक निर्णय लेते हैं। 

हम पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का अपनी जागीर की तरह अपने फ़ायदे में या अपने चहेते लोगों के फ़ायदे में शोषण करते हैं। हम काफ़ी ढोंगी हैं क्योंकि हम यह सब करते हुए यह दावा करते हैं कि हम लोगों की ‘मदद’ कर रहे हैं। हम जानते हैं कि अगर हम ऐसी व्यवस्था बनाएँ जिसमें हर व्यक्ति आसानी से हमारी सेवाओं का लाभ ले सके, तो हम फ़ालतू हो जाएँगे। इसलिए हम अव्यवस्था को चलने देते हैं। 

हम अपने कार्यक्षेत्र को अनावश्यक विस्तार देते जाते हैं। बिना इस बात की चिंता किए कि हमारे द्वारा बनाई गई व्यवस्था में कुशलता है कि नहीं। सबसे ख़राब बात यह है कि हम बहुत दिखावटी, दूसरों को परेशान करने वाले और बिगड़ैल लोगों का समूह हैं। बावजूद इसके हम यह कहने में संकोच नहीं करते कि हम इस देश की जनता के लिए काम करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि इस देश से हमें कोई लेना देना नहीं है क्योंकि हमारे बच्चे विदेशों में पड़ते हैं और हमने जो भी सुख सुविधाएँ, इस व्यवस्था में मिल सकती हैं उन्हें अपने लिए जुटा कर अपने सुखी जीवन का प्रबंध कर लिया है। हमें आम जनता के लिए कोई सहानुभूति नहीं होती हालाँकि हम सही प्रकार का शोर मचाने के लिए सतर्क रहते हैं।

अगर इस देश में न्याय किया जाता तो हम बहुत पहले ही लुप्त हो जाते। पर हम इतने ज़्यादा ताक़तवर हैं कि हम अपने अस्तित्व को कभी समाप्त नहीं होने देते। क्योंकि हम भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं।

Monday, September 7, 2020

संसद सत्र में ‘शून्य काल’ क्यों नहीं?


श्री नरेंद्र मोदी भारत के अकेले ऐसे प्रधान मंत्री हैं जिन्होंने जब पहली बार प्रधान मंत्री के रूप में संसद में प्रवेश किया तो उसकी सीढ़ियों पर माथा टेक कर प्रणाम किया। यह भावुक दृश्य देख कर देश विदेश में बैठा हर भारतीय गद गद हो गया था। श्री मोदी ने दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र के संसद को मंदिर मानते हुए यह भाव प्रस्तुत किया। स्पष्ट है कि संसदीय परम्पराओं के लिए उनके माँ में पूर्ण सम्मान है। वैसे भारत में लोकतंत्र की परम्परा केवल अंग्रेजों की देन नहीं है। ईसा से छह सदी पूर्व सारे भारत में सैंकड़ों गणराज्य थे जहां समाज के प्रतिनिधि इसी तरह खुली सार्वजनिक चर्चा के द्वारा अपने गणराज्यों का संचालन करते थे। मध्य युग के राजतंत्र में भी जो राजा चरित्रवान थे और जिनके हृदय में जनता के लिए स्नेह था और जनता को अपनी संतान समझते थे, वे आम आदमी की भी बात को बड़ी गम्भीरता से सुनते और उसका निदान करते थे।
 


भारत की मौजूदा संसद की प्रक्रिया में कई देशों के लोकतांत्रिक शिष्टाचार का सम्मिश्रण है। जिसमें सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सार्थक संवाद से क़ानून बनते हैं और समस्याओं के हल भी निकलते हैं। 


हर संसदीय क्षेत्र के लाखों मत्तदाता टीवी पर ये देखने को उत्सुक रहते हैं कि उनके सांसद ने संसद में क्या बोला। संवाद की इस प्रक्रिया में शालीन नौक-झौंक और टीका-टिप्पणी का आनंद भी दोनो पक्ष लेते हैं। विपक्ष, जो सत्तापक्ष को कटघरे में खड़ा करता है और सत्तापक्ष, जो मुस्कुरा कर इन हमलों को झेलता है और अपनी बारी आने पर हर प्रश्न का जवाब देश के सामने रखता है। कोई किसी का बुरा नहीं मानता।



लोकसभा के सत्रों में ऐसी अनेक रोचक घटनाएँ हुई हैं, जैसे समाजवादी नेता डा राम मनोहर लोहिया जब प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पर तीखे हमले करते थे तो लगता था कि दोनों में भारी दुश्मनी है। पर भोजन अवकाश में जब नेहरू जी सदन के बाहर निकलते तो लोहिया जी के कंधे पर हाथ रख कर कहते, लोहिया तुमने गाली तो बहुत दे दी अब मेरे घर चलो दोनों लंच साथ करेंगे। जब-जब देश पर संकट आया तो जो भी विपक्ष में था उसने सरकार का खुल कर साथ दिया। सरकारों की भी कोशिश रहती है कि संसद के हर सत्र से पहले विपक्षी दलों के नेताओं के साथ विचार विमर्श करके ख़ास मुद्दों पर सहमति बना लें।


शून्य काल सदन के सत्र का वह समय होता है जब सांसदों को सरकार से सीधे प्रश्न करने की छूट होती है। यही सदन का सबसे रोचक समय होता है। क्योंकि जो बात अन्य माध्यमों से सरकार तक नहीं पहुँच पाती, वह शून्य काल में पहुँच जाती है। फिर उन कमियों को सुधारना सरकार की ज़िम्मेदारी होती है। इसलिए संसद के सत्र में शून्य काल का स्थगन नहीं होना चाहिए। जैसा इस बार किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि कोरोना के कारण इस तरह के संवाद की परिस्थिति न हो। अगर सत्र चल रहा है तो शून्य काल भी चल ही सकता है। 

 

आज के दौर में जिस तरह मीडिया ने अपनी भूमिका का पतन किया है उससे आम जनता की बात सत्ता तक पहुँचना मुश्किल हो गया है। ऐसे में जनता में घुटन और आक्रोश बढ़ता है। जिससे हानि सत्तापक्ष की ही होती है। सुशांत सिंह राजपूत एक होनहार युवक था। उसकी हत्या या आत्महत्या की जाँच ईमानदारी से होनी चाहिए और जो कोई भी दोषी हो उसे सजा मिलनी चाहिए। पर क्या 135 करोड़ भारतवासियों के लिए आज यही सबसे बड़ा सवाल है? करोड़ों की बेरोजगारी, 40 साल में सबसे नीचे गिरती हुई जीडीपी और जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास आदि के शाश्वत प्रश्न क्या इतने गौड़ हो गए हैं कि उन पर कोई चर्चा की आवश्यकता ही नहीं है। सुशांत सिंह राजपूत की मौत की गुत्थी सुलझते ही क्या इन सारी समस्याओं का हल एक रात में हो जाएगा?



लोकतंत्र में बस संसद ही तो है जहां जनता के वैध प्रतिनिधि सवाल पूछते है। सवालों के जरिए ही जनता का दुख-दर्द कहा जाता है। जवाबों से पता चलता है कि जनता की समस्याओं से सरकार का सरोकार कितना है। सरकार की जवाबदेही दिखाने के लिए संसद के अलावा और कोई जगह हो भी क्या सकती है? हालांकि कहने को तो कोई कह सकता है कि किसी को कुछ जानना हो तो वह सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांग सकता है। लेकिन प्रशासकों की जवाबदेही की हालत सबके सामने उजागर है। सूचना देने में हीलाहवाली और आनाकानी इतनी ज्यादा बढ़ती जा रही है कि आम जनता को यह तरीका थकाउ लगने लगा है। यानी संसद में प्रश्नकाल ही इकलौती कारगर व्यवस्था है। एकदम पारदर्शी भी है। 


बेशक देश इस समय चौतरफा संकटों की चपेट में है। अर्थव्यवस्था हो या महामारी से निपटने के इंतजाम हों या सीमा पर बढ़ते संकट हों, इतने सारे सवाल खड़े हो गए हैं कि जनता में बेचैनी और दुविधाएं बढ़ रही है। देश के कारोबारी माहौल पर ये दुविधाएं खासा असर डालती हैं। जबकि संसद में उठे सवालों का जवाब देकर बहुतेरी दुविधाएं खुद ब खुद खत्म हो जाती हैं। 



इतना ही नहीं, संसद में प्रश्नकाल सरकार के लिए भी एक अच्छा मौका होता है। खासतौर पर जनता के भीतर विश्वास पैदा करने में जिस तरह मंत्रालयों के बड़े अफसर और प्रवक्ता नाकाम हो रहे हैं वैसे में संसद में सत्तारूढ दल ही मोर्चा संभाल पाता है। संसद की कार्यवाही को मीडिया में अच्छी खासी जगह मिलती है। सरकार अपने जवाबों के जरिए जैसा प्रचार चाहे मीडिया में प्रचार भी करवा सकती है। सरकार को सवालों से डरना नहीं चाहिए यानी उसे आपदा नहीं मानना चाहिए बल्कि प्रश्नकाल को वह अवसर में बदल सकती है। 

Saturday, August 15, 2020

भारतीय गणतंत्र की अफ़सरशाहीः भ्रम और हक़ीक़त

आज़ादी के पहले देश की अफ़सरशाही को अंग्रेज हुक्मरानों के लिए काम करना पड़ता था। आज़ादी के बाद उन्हें आम जनता की सेवा करनी चाहिए थी। मध्य प्रदेश में तैनात एक आईएएस अधिकारी दीपाली रस्तोगी का हाल में एक अंग्रेज़ी अख़बार में छपा लेख नौकरशाही की हक़ीक़त बयान करता है। उसी लेख के बिंदुओं को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करना पाठकों को अच्छा भी लगेगा और सोचने पर मजबूर भी करेगा। दीपाली लिखती हैं कि, “हम आईएएस में सेवा करने के लिए आते हैं पर हम शायद ही कभी सेवक की तरह बर्ताव करते हैं। हमें अकूत धन और विशाल मानव संसाधन सौंपे जाते हैं, जबकि इसे सम्भालने की योग्यता हममें नहीं होती क्योंकि हमें वैसा प्रशिक्षण ही नहीं दिया जाता। 

हम अपने बारे में, अपनी “बुद्धिमता” के बारे में और अपने “अनुभव” के बारे में बहुत ऊँची राय रखते हैं और सोचते हैं कि लोग इसीलिए हमारा सम्मान करते हैं। जबकि असलियत यह है कि लोग हमारे आगे इसलिए समर्पण करते हैं क्योंकि हमें फ़ायदा पहुँचाने या नुक़सान करने की ताक़त दी गई है। पिछले दशकों में हमने एक आदत डाल ली है कि हम बड़ी तादाद में ख़ैरात बाँटने के अभ्यस्त हो गाए हैं, चाहें वह वस्तु के रूप में हो या विचारों के रूप में। असलियत यह है कि जो हम बाँटते हैं वो हमारा नहीं होता। 

हमें वेतन और सुविधाएँ इसलिए मिलती हैं कि हम अपने काम को कुशलता से करें और ‘सिस्टम’ विकसित करें। सच्चाई यह है कि हम कुप्रबंध और अराजकता फैला कर पनपते हैं क्योंकि ऐसा करने से हम कुछ को फ़ायदा पहुँचाने के लिए चुन सकते हैं और बाक़ी की उपेक्षा कर सकते हैं। हमें भारतीय गणतंत्र का ‘स्टील फ्रेम’ माना जाता है। सच्चाई यह है कि हममें दूरदृष्टि ही नहीं होती। हम अपने राजनैतिक आकाओं की इच्छा के अनुसार औचक निर्णय लेते हैं। 

हम पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का अपनी जागीर की तरह अपने फ़ायदे में या अपने चहेते लोगों के फ़ायदे में शोषण करते हैं। हम काफ़ी ढोंगी हैं क्योंकि हम यह सब करते हुए यह दावा करते हैं कि हम लोगों की ‘मदद’ कर रहे हैं। हम जानते हैं कि अगर हम ऐसी व्यवस्था बनाएँ जिसमें हर व्यक्ति आसानी से हमारी सेवाओं का लाभ ले सके, तो हम फ़ालतू हो जाएँगे। इसलिए हम अव्यवस्था को चलने देते हैं। 

हम अपने कार्यक्षेत्र को अनावश्यक विस्तार देते जाते हैं। बिना इस बात की चिंता किए कि हमारे द्वारा बनाई गई व्यवस्था में कुशलता है कि नहीं। सबसे ख़राब बात यह है कि हम बहुत दिखावटी, दूसरों को परेशान करने वाले और बिगड़ैल लोगों का समूह हैं। बावजूद इसके हम यह कहने में संकोच नहीं करते कि हम इस देश की जनता के लिए काम करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि इस देश से हमें कोई लेना देना नहीं है क्योंकि हमारे बच्चे विदेशों में पड़ते हैं और हमने जो भी सुख सुविधाएँ, इस व्यवस्था में मिल सकती हैं उन्हें अपने लिए जुटा कर अपने सुखी जीवन का प्रबंध कर लिया है। हमें आम जनता के लिए कोई सहानुभूति नहीं होती हालाँकि हम सही प्रकार का शोर मचाने के लिए सतर्क रहते हैं।

अगर इस देश में न्याय किया जाता तो हम बहुत पहले ही लुप्त हो जाते। पर हम इतने ज़्यादा ताक़तवर हैं कि हम अपने अस्तित्व को कभी समाप्त नहीं होने देते। क्योंकि हम भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं।” यह लिखते हुए मुझे गर्व है कि दीपाली मेरी छोटी ममेरी बहन है जो हमेशा जनहित में काम करती है और अपने स्वार्थ के लिए कोई समझौता नहीं करती। 

Monday, November 25, 2019

चुनाव सुधार के प्रणेता टी एन शेषन के साथ ऐतिहासिक क्षण

भारत में पहली बार चुनाव सुधार लागू करने वाले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त और मेरे घनिष्ठ मित्र श्री टी एन शेषन के अभी हाल में हुए निधन पर भावपूर्णं श्रद्धांजली। श्री बाँकेबिहारी जी अपने चरणों में उन्हें स्थान दें। यद्यपि वो आयु में मुझसे 22 वर्ष बड़े थे पर हमारी मित्रता समान स्तर पर थी। 
चुनाव सुधार
भारत में चुनाव सुधार का ऐतिहासिक कार्य करके उन्होंने विश्व भर में नाम कमाया। उस अभियान का अनौपचारिक दफ्तर कालचक्र समाचार ट्रस्टका हमारा दिल्ली दफ्तर ही था। जहां वो अक्सर बैठकों के लिए आते थे। क्योंकि उनके इस अभियान में हमने भी सक्रिय योगदान दिया।  
देश का दौरा साथ साथ किया
देश को जगाने के उद्देश्य से 1994 से 1996 के बीच उनके साथ मैंने भी चुनाव सुधारों पर देश भर में सैंकड़ों जन सभाओं को संबोधित किया। हम दौनों सुबह जल्दी के प्लेन से दिल्ली से निकलते तो कभी मुम्बई, हैदराबाद, भुवनेश्वर  जैसे शहरों में एक एक दिन में कई सभाओं को सम्बोधित करते । हम विश्वविध्यालयों  के छात्रों, चेम्बर ओफ कामर्स, बॉर काउन्सिल, प्रेस कॉन्फ्रेन्स और शाम को एक विशाल जन सभा  को सम्बोधित करके रोज दिल्ली लौट आते थे। 
भारी भीड़ उमड़ती थी
जनता में उन्हें देखने सुनने का बड़ा उत्साह था। हवाई अड्डे से जब हमारी कारों का लंबा काफिला बाहर निकलता तो हजारों लोग उनकी एक झलक पाने को बेताब रहते । चूँकि 1993 में मैंने राजनीतिक भ्रष्टाचार और आतंकवाद के विरूद्ध जैन हवाला कांडउजागर करके देश में एक बड़ी जंग छेड़ दी थी, तो उन्होंने ही प्रस्ताव रखा क्यों न हम दौनों साथ साथ देश में जन सभाएँ करें। हमारी  जनसभाओं में, बिना राजनीतिक हथकंडों अपनाए या खर्चे किए, स्वतः ही भारी भीड़ उमड़ती थी । 
नरसिंह राव ने दिया झटका 
उनकी बढ़ती लोकप्रियता और निरंकुश स्वभाव को देखकर प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने अचानक एक सदस्यी चुनाव आयोग में दो सदस्य और जोड़ दिए। तब शेषन युगल छुट्टी पर अमरीका में थे। उन्हें बहुत झटका लगा। फोन पर उन्होंने मुझसे आगे की रणनीति पर लंबी बात की। जब वो भारत लौटे तो अपने घर पर अकेले में मेरे कंधे पर सिर रखकर खूब रोए थे। बोले नरसिंह राव ने मेरे साथ बहुत धोखा किया। 
शेषन, किरण बेदी, के जे एलफोंज और मैं....
जब जनवरी 1996 में जैन हवाला कांड में देश के 115 ताकतवर नेता और अफसर चार्जशीट हो गये तो मेरे दिल्ली दफ्तर के बाहर विदेशी टीवी चैनलों की कतार लग गयी, जो मुझे इंटरव्यू करने आते थे। उसी गहमा-गहमी के बीच किरण, एलफी और शेषन सारा दिन मेरे दफ्तर में बैठक करते थे। हम लोग एक देशव्यापी अभियान शुरू करने की योजना बना रहे थे। कभी कभी इन बैठकों में मुम्बई के बहुचर्चित म्यूनिसिपल कमिश्नरजी. आर. खेरनार भी शामिल होते थे। जिन्होंने दाऊद की अवैध संपत्तियों पर बुल्डोजर चलाये थे ।
भारत यात्रा का बड़ा प्लान 
हमारी  योजना थी कि शेषन चेन्नई से, एल्फी त्रिवेंद्रम से, किरण अमृतसर से, खेरनार मुम्बई से और मैं कलकत्ते से अलग अलग रथों पर सवार होकर निकलें और मार्ग में जन सभाओं को सम्बोधित करते हुए भारत के केंद्र नागपुर में आकर मिलें और तब देश में एक वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था की घोषणा करें। ये चिंतन बैठकें हफ्तों चली। 
बाहर पत्रकार उत्सुकता में भीड़ लगाए खड़े रहते थे। पर हमारी वार्ता गोपनीय रहती क्योंकि जब तक कुछ तय न हो  हम प्रेस से कुछ साझा नहीं करना चाहते थे। पर फिर बात बनी नहीं। क्योंकि मेरे अलावा ये चारों सरकारी अफसर थे और देश में क्रांति लाने लिए अपनी नौकरी दांव पर लगाने को तैयार नहीं थे । 
जब वो फिल्मी सितारों के सामने मंच पर थिरके.......
एक बार वो, उनकी पत्नी, मेरी पत्नी मीता नारायण और मैं मुम्बई में फिल्मफेअर अवार्डसमारोह में गए। पूरे फिल्म जगत के सितारे भारी तादाद में मौजूद थे। लता मंगेशकर जी हमारे साथ ही अगली पंक्ति में बैठी थी। तभी अचानक शत्रुघ्न सिन्हा शेषन को चुपचाप उठाकर मंच के पीछे ले गये। वहाँ  उन्हें सिल्क का धोती-कुरता पहनाया। सर्प्राइज आइटम की तरह जब शेषन हलके-हलके थिरकते हुए मंच पर अवतरित हुए तो पीछे से गाना बज रहा था , तू चीज बड़ी है मस्त मस्त। देश में एक गुस्सैल और कठोर छवि वाले शेषन को  इस मस्ती में देखकर फिल्मी दुनियाँ के सितारे भी मस्त हो गए और सब ताली की थाप देकर झूमने लगे। 
देशभक्त ट्रस्ट

वो, उनकी पत्नी श्रीमती जया शेषन और मैं उनके द्वारा स्थापित देशभक्त ट्रस्टके न्यासी भी थे। हम दोनों ने अपनी अपनी पुस्तकों में भी एक दूसरे का उल्लेख किया है। अभी कुछ वर्ष पहले जब मैं आईआईटी चेन्नाई में छात्रों को सम्बोधित करने  गया था तब उनके घर भी गया था। दोनों बड़े स्नेह से मिले थे। तब एक चमत्कारिक आध्यात्मिक घटना भी घटी थी जो मैं कभी भूल नहीं पाउँगा। हम दोनों परिवारों ने 1994 से 1996 के उस दौर में मिलकर अनेक धार्मिक उत्सव और यात्राएँ साथ-साथ की थीं। अब तो उनकी केवल स्मृतियाँ शेष रह गयीं।

Monday, September 9, 2019

ख़ौफ़ में क्यों है आम नागरिक?

हाल ही में मोदी सरकार द्वारा लागू हुए मोटर व्हीकल (संशोधन) अधिनियम 2019 को लेकर मिली जुली प्रतिक्रिया सामने रही है। कुछ लोग इसे एक अच्छी पहल बता रहे हैं तो वही पर दूसरे लोग इसे जनता के बीच ख़ौफ़ पैदा करने का एक नया तरीक़ा। कुछ तो इसे यातायात पुलिस में भ्रष्टाचार बढ़ाने का एक नया औज़ार भी बता रहे हैं। मोटर नियम को सख्त बनाकर मोदी सरकार के परिवहन विभाग ने यातायात नियम का उल्लंघन रोकने की कोशिश तो ज़रूर की है। लेकिन इसे कामयाब बनाने के लिए केवल जुर्माने की राशि पांच से सौ गुणा तक बढ़ा देने से कुछ नहीं होगा। 
मौजूदा नियम को अगर काफ़ी सख़्ती से लागू किया जाता और जुर्माने की राशि को दुगना या तिगुना किया जाता, तो काफ़ी सुधार हो सकता था। उदाहरण के तौर पर आपको याद दिलाना चाहेंगे कि जब भारत में जब राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हुआ था तो दिल्ली में एक लेन केवल खिलाड़ियों की बस और आपातकालीन वाहनों के लिए निर्धारित की गई थी। यातायात पुलिस के कर्मी इस व्यवस्था को काफ़ी अनुशासन और कड़ाई से लागू करते दिखे थे, और नागरिकों ने भी नियमों का पालन किया था। इस बात से यह स्पष्ट होता है कि अगर पुलिस प्रशासन अपन काम क़ायदे से करे तो जनता को नीयमों का पालन करने में कोई भी दिक्कत नहीं होगी। 

ऐसा देखा गया है कि जब भारतीय कभी भी विदेश यात्रा पर जाते हैं तो वहाँ के नियमों का पालन निष्ठा से करते हैं लेकिन अपने ही देश में नियमों की धज्जियाँ इसी उम्मीद में उड़ाई जाती हैं किजो होगा देखा जाएगा

पुलिस अधिकारियों की सुनें तो उनके अनुसार नए नियम के जो भी चालान किए जा रहे हैं उनको कोर्ट में भेज जा रहा है क्योंकि अभी सड़क पर तैनात अधिकारियों को इतनी बड़ी राशि के चालान काट कर जुर्माने की रक़म लेने के लिए अधिकृत नहीं किया गया है। लेकिन इतना ज़रूर है कि इतने भारी जुर्माने की ख़बर सुन कर सभी शहरों में वाहन चालकों के ख़ौफ़ का अंदाज़ा पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों में प्रदूषण की जाँच करवाने की लम्बी क़तारों से लगाया जा सकता है, जो कि समय पर नहीं कराई गई थी। ऐसा तभी हुआ जब पुलिस प्रशासन ने नियम उल्लघन करने वालों के विरध अपना शिकंजा कसा। 

सोशल मीडिया में कुछ ऐसा भी देखा गया है जहाँ पर कुछ लोग, जिन्हें भारी जुर्माने का चालान दिया गया तो उनका ग़ुस्सा भी फूटा। मोटर व्हीकल (संशोधन) अधिनियम 2019 के प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई पुलिसकर्मी नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए पाए जाता है तो, उन्हें जुर्माने के रूप में दोगुनी राशि का भुगतान करना होगा। सरकार की यह पहल केवल पुलिस अधिकारियों पर नहीं बल्कि सभी सरकारी गाड़ियों के चालकों पर लागू होनी चाहिए।

उदाहरण के तौर पर, दिल्ली की सड़कों पर चलने वाली डीटीसी की बसों के ड्राइवर खुले आम नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हैं और पुलिस अधिकारी उनका चालान नहीं करते। मोटर व्हीकल (संशोधन) अधिनियम 2019 के लागू होने के बाद भी, इस आरोप को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। डीटीसी की बसों के ड्राइवर तो सीट बेल्ट का उपयोग करते हैं और ही अपनी बसों को सही लेन में चलाते हैं, इतना ही नहीं वे बसों को सड़क के बीचों बीच इस क़दर रोक देते हैं कि जाम लग जाता है। यदि कोई इनकी शिकायत दिल्ली यातायात पुलिस को करे तो उनका चालान करने के बजाए ये जवाब मिलता है किइस लापरवाही की शिकायत वे परिवहन विभाग को भेज देंगे इस दोहरे मापदण्ड को लेकर भी सवाल उठते रहते हैं। 

जानकारों की मानें तो इन सभी नियमों को लागू करने से पहले सरकार को चाहिए था कि नए जुर्माने का प्रचार उसी तरह से करना चाहिए था जिस तरह से नियम के लागू करने के बाद, भारी जुर्माने के शिकार हुए नागरिकों की प्रतिक्रिया का किया जा रहा है। जानकारी के आभाव में नागरिकों को दंडित किए जाने से बेहतर होता कि सरकार जगह जगह आधार कार्ड या वोटर कार्ड बनवाने जैसे अभियान चला कर जनता को नए नियमों से वाक़िफ़ कराती। इस अभियान के तहत लगने वाले कैम्प पर प्रदूषण की जाँच से लेकर वाहन बीमा करने की भी व्यवस्था रहती तो नोटबंदी के दौरान बेंकों के बाद पेट्रोल पंपों पर लगने वाली क़तार शायद छोटी होती। 

कुलमिलाकर देखा जाए तो इस समय सभी नागरिक इस ख़ौफ़ में या तो अपने वाहन चला नहीं रहे या मोटर व्हीकल (संशोधन) अधिनियम 2019 के लागू होने के बाद भारी जुर्माने से बचने के लिए अपने वाहन के सभी ज़रूरी दस्तावेज़ दुरुस्त कर रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं था की जनता को इन नियमों का ज्ञान पहले नहीं था, सड़क पर पड़ा हुआ पत्थर तो सबको दिखता है लेकिन जब तक उस पत्थर से ठोकर खा कर चोट खा लें कोई सीखता नहीं है। विपक्ष की मानें तो ये क़दम मोदी सरकार द्वारा उठाए गए नोटबंदी और जीएसटी जैसा ही है जिसमें जनता को सुकून का सपना दिखा कर ख़ौफ़ में जीने को मजबूर किया जा रहा है। लेकिन ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि ये क़दम फ़ायदे का था या नहीं।