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Monday, March 30, 2026

आ अब लौट चलें !

जो लोग एक्स (ट्विटर) पर गंभीर विषयों को तलाशते रहते हैं उन्हें पता है कि किस तरह बाजारू शक्तियां हमारे दैनिक जीवन पर शिकंजा कसती जा रही हैं। हमारे खाद्यान, सब्ज़ियाँ, फल व दूध ही नहीं, हमारी दवाईयां और वैक्सीन तक सब पर इन ताकतों का क़ब्ज़ा है। इनका उद्देश्य ना तो हमें स्वस्थ रखना है और ना ही सुखी। अरबों खरबों रुपये का मुनाफा कमाना ही इनका उद्देश्य होता है। इनके लिए हम सब प्रयोगशाला के जानवर हैं, जिनपर ये लगातार खतरनाक परीक्षण करते रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का ताना-बना इस तरह बुना जाता है कि दुनिया के तमाम देशों का नेतृत्व इन ताकतों के चंगुल में फसा रहे और अपनी प्रजा के हितों का बलिदान करके भी इनके मुनाफ़े बढ़ाने में मदद करे। इन ताकतों का मुख्य केंद्र है अमरीका। ये सर्वविदित है कि अमरीका की शस्त्र उद्योग लॉबी अमरीकी शासकों को मोहरा बना कर दुनिया भर में युद्ध करवाती रहती है। जिससे उसका माल बिकता रहे। इन ताकतों के आगे अमरीका का सभ्य और सुसंस्कृत समाज भी लाचार है। ‘एपस्टीन फाइल्स’ में जिस क्रूर, पाशविक प्रवृत्तियों का खुलासा हुआ है उसके बाद अमरीका के तमाम मशहूर बड़े लोग जेल के सीखचों के पीछे होने चाहिए थे, पर वहाँ ऐसा नहीं हो रहा। गोस्वामी तुलसीदास जी लिख गए हैं कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं। 



जिस तरह के संकट और महामारियां अब लगातार हमारे जनजीवन पर बार-बार हमला करने लगी हैं, उससे यह स्पष्ट है कि हमारा और हमारी अगली पीढ़ियों का भविष्य अंधकार मय है। राष्ट्र का ‘सकल घरेलू उत्पादन’ या आर्थिक वृद्धि की दर उस राष्ट्र के लोगों के सुखी और स्वस्थ होने का पैमाना नहीं होते। ये आंकड़े उन्हें मुट्ठी भर लोगों को हर्षित करते हैं जो देश के तीन चौथाई संसाधनों पर क़ब्ज़ा किए बैठे हैं। अगर लोगों की खुशहाली देखना है तो हमें पड़ोसी देश भूटान की ओर रूख करना पड़ेगा। जो अपनी प्रगति को ‘सकल घरेलू उत्पादन’ के पैमाने पर नहीं बल्कि ‘सकल घरेलू उल्लास’ (हैप्पीनेस इंडेक्स) के पैमाने पर नापता है। हमें अपने विकास की दिशा और दशा बदलनी चाहिए। देश के 5.5 लाख गांवों को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। जिससे आम भारतीय बाजारू शक्तियों के मकड़ जाल से बच कर सुखी और स्वस्थ जीवन जी सके।  



खाड़ी के देशों में चल रहा भयानक युद्ध, उससे निरंतर बढ़ता ऊर्जा संकट और वायु में घुलता ज़हर पूरी दुनिया के लिए हर दिन चिंता बढ़ा रहा है। इसका बुरा असर अर्थव्यवस्था और रोज़गार पर भी पड़ रहा है। समस्या भयावय होती जा रही है। हर घर में अनिश्चितता और हताशा बढ़ने लगी है। कुकिंग गैस पर से निर्भरता हटा कर गोबर के कंडों और लकड़ी पर लौटना पड़ सकता है। क्यों न इस दिशा में एक नई पहल की जाए। सनातन हिन्दू संस्कृति में गाय को माँ माना जाता है। धर्म शास्त्र कहते हैं कि गाय में 33 करोड़ देवताओं का वास होता है। गाय का दूध, उससे बना दही, छाछ, पनीर व घी स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। देशी गाय के गोबर और मूत्र के गुण वैज्ञानिक परीक्षणों से सिद्ध हो चुके हैं। सदियों से हर सनातनी के घर गौ पालन की प्रथा थी। पर शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने इस परंपरा को बहुत तेज़ी से नष्ट किया है। गौ वंश और कृषि आधारित जीवन आम भारतीय को स्वस्थ और सुखी रखने के लिए सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ है। गत 79 वर्षों में हमारी सरकारों ने अगर इस अनुभव का लाभ उठाया होता और आर्थिक विकास के मॉडल को इस तरह दिशा दी होती की गाँव का जीवन आत्मनिर्भर बनता तो शहरीकरण और उससे पैदा हुई हज़ारों चुनौतियाँ आज हमारे सामने मुँह बाय न खड़ी होती। गाँव की लक्ष्मी गाँव में रहती और गाँव का युवा गाँव में ही रोज़गार पाता तो करोड़ों भारतवासियों को गंदी बस्तियों में नारकीय जीवन न जीना पड़ता। 



मुझे लगता है कि अगर गौ रक्षा के मामले में एक नई और समेकित सोच को केंद्र में रखते हुए विकास का मॉडल तैयार किया जाए तो गौ वंश और भूमिहीन परिवारों का बहुत कल्याण हो सकता है। ये कोरी कल्पना नहीं है। इस दिशा में हमने एक छोटा सा प्रयोग 20 बरस पहले मथुरा में करके देखा था। जिसके सकारात्मक परिणाम आए। हम इसे आगे इसलिए नहीं चला पाए क्योंकि हमारी प्राथमिकता ब्रज के कृष्ण कालीन सरोवरों और वनों को बचाने की थी। ये मॉडल बहुत सरल है। देश के हर गांव में चरागाह की काफ़ी भूमि हुआ करती थी। वोटों की राजनीति ने उसकी बंदरबाँट कर दी। फिर भी देश में 10,210,000 हेक्टर भूमि चरागाहों के लिए उपलब्ध है। जो देश के कुल भौगौलिक क्षेत्र की 3-4 फ़ीसद है। हर गाँव में अनेक भूमिहीन परिवार होते हैं। जिन्हें ‘मनरेगा’ जैसी योजनाएं चला कर, साल के कुछ दिन सरकार रोज़गार देती है। हर ज़िले में और उसके गाँवों में ऐसे तमाम पढ़े-लिखे सक्षम नौजवान हैं जो सामाजिक कार्यों में रुचि लेते हैं। होना यह चाहिए कि गाँव के भूमिहीन परिवारों की समिति बना कर उन्हें चरागाहों की भूमि पर चारा उगाने के काम में लगाया जाए। ये चारा फिर हर उस भूमिहीन परिवार को दिया जाए जिसे दानदाता और सरकार नक़द दान की जगह स्वस्थ देशी नस्ल की गाय निशुल्क उपलब्ध कराए। ये परिवार चरागाह में मेहनत करके आय प्राप्त करे और मुफ्त के चारे से अपने गौ वंश की सेवा करके उसके दुग्ध उत्पादन से अपने परिवार का पालन-पोषण करे और स्वस्थ जीवन जी सके। आज गाँव बच्चों के मुँह में दूध नहीं जाता। गाँव की छोड़िये देश के महानगरों तक में नकली दूध, घी, पनीर आदि का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। हम शहरी लोग ही दूध के नाम पर अपने बच्चों को ज़हर पिला रहे हैं। आज देश में जितना दूध पैदा हो रहा है उससे कई गुना उसकी खपत है। ऐसे में ये बकाया दूध कहाँ से आ रहा है? 



दूध के नाम पर क्या पिलाया जा रहा है, इसकी चिंता किसी भी सरकार को नहीं है। छापे पड़ते हैं, नक़ली माल पकड़ा जाता है, खबर छपती है और मामले दबा दिए जाते हैं। इसलिए इस पूरी व्यवस्था पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। हमने जब ये प्रयोग मथुरा में किया तो हमने दानदाताओं से कहा कि वे एक गाँव की चरागाह पर चारा उगाने में आर्थिक मदद करें और किसी को गौ सेवा के नाम पर धन का दान न करें। अपेक्षा के विपरीत हमें ऐसे अनेक उदारमना दानदाता मिल गए और उस गाँव के समर्पित नौजवान भी। जिन्होंने इस प्रयोग को सफल बनाने में सहयोग किया। हमारा प्रयोग तो बहुत छोटे स्तर का था। पर आईआईटी और आईआईएम से पढ़कर और अमरीका में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मोटे वेतन की नौकरियां छोड़ कर कुछ नौजवान मध्य भारत में बहुत बड़े पैमाने पर इस मॉडल पर काम कर रहे हैं। उन्होंने हज़ारों ग़रीबों की ज़िंदगी खुशहाल बना दी और इस प्रक्रिया से उत्पन्न गोबर की खाद से बंजर पड़ी ज़मीनों में फलों के बड़े-बड़े बगीचे लगा दिए हैं। शुरू में उनका उपहास करने वाले और उनके रास्ते में रोड़े अटकाने वाले ताक़तवर लोग, नेता और अफसर अब उनके सामने हथियार डाल चुके हैं और उनके साथ सहयोग कर रहे हैं। इसलिए असंभव कुछ भी नहीं है। आवश्यकता है एक ईमानदार और उदार सोच की।
  

Monday, March 23, 2026

एचपीवी वैक्सीन के दुष्प्रभावों को क्यों छिपाया गया?

कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक पोस्ट काफ़ी चर्चा में छाई हुई है। इसमें पीटर गोट्शे नामक एक प्रसिद्ध चिकित्सक, शोधकर्ता और लेखक, ने ‘हाउ मर्क एंड ड्रग रेगुलेटर्स हिड सीरियस हार्म्स ऑफ एचपीवी वैक्सीन’ नाम की पुस्तक का विश्लेषण कर कुछ गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इस पोस्ट में पीटर द्वारा किए गए दावा ज़िक्र किया गया है कि कैसे महिलाओं में होने वाले सर्वाइकल कैंसर को रोकने वाली एक वैक्सीन के दुष्प्रभावों को दुनिया से छिपाया गया है।   

पोस्ट के अनुसार पीटर गोट्शे की पुस्तक में वे बताते हैं कि कैसे ‘एचपीवी क्सीन’ को ‘लाइफ-सेविंग’ बताकर बेचा गया, लेकिन इसके ट्रायल्स में गंभीर कमियां थीं और नुकसान छुपाए गए। यह मर्क की वैज्ञानिक दुराचार की कहानी है, जो कभी-कभी फ्रॉड के स्तर तक पहुंचती है। गोट्शे के अनुसार, मर्क ने कई तरीकों से गार्डासिल के नुकसानों को छुपाया। ज्यादातर ट्रायल्स में सच्चा प्लेसिबो (सलाइन) नहीं इस्तेमाल किया गया। इसके बजाय एल्यूमिनियम एडजुवेंट या दूसरी वैक्सीन को ‘प्लेसिबो’ बताया गया। ये दोनों खुद नुकसान पहुंचा सकते हैं (न्यूरोटॉक्सिक), इसलिए वैक्सीन और ‘प्लेसिबो’ के साइड इफेक्ट्स समान दिखे और नुकसान ‘सुरक्षित’ साबित हुआ। लेखक कहते हैं कि इससे मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन हुआ। 



वहीं दूसरी ओर गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याएं जैसे POTS (Postural Orthostatic Tachycardia Syndrome—खड़े होते ही चक्कर और दिल की धड़कन तेज होना) और CRPS (Complex Regional Pain Syndrome—तीव्र दर्द और सूजन) को रिपोर्ट नहीं किया गया। केवल 14 दिनों के अंदर की घटनाएं गिनी गईं, जबकि 90% नुकसान इससे बाहर थे। कई केसों को ‘कोई संबंध नहीं’ बता दिया गया या बाहर कर दिया गया। गोट्शे इसे ‘आउटराइट फ्रॉड’ कहते हैं।


उल्लेखनीय है कि वैक्सीन को सर्वाइकल कैंसर रोकने वाला बताया गया, लेकिन गोट्शे दावा करते हैं कि ट्रायल्स में असली कैंसर केस शून्य थे। लंबे समय के डेटा में एंटीबॉडी स्तर तेजी से गिरता है और पहले से एचपीवी संक्रमित महिलाओं में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया या डेनमार्क में ऑब्जर्वेशनल स्टडीज में कैंसर घाटे को वैक्सीन का श्रेय दिया जाता है, लेकिन स्क्रीनिंग और अन्य फैक्टर्स को नजरअंदाज किया जाता है। पुस्तक के अनुसार मर्क ने ऐसा डर फैलाया कि कैंसर हजारों महिलाओं को मारता है, हर राज्य में लॉबिंग की और स्कूल मैंडेट के लिए दबाव डाला। इस वैक्सीन को ‘फास्ट-ट्रैक अप्रूवल’ मिला, जबकि FDA ने बाद में माना कि सेफ्टी मॉनिटरिंग की क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया था। 



इसके साथ ही FDA, EMA जैसे नियामकों की भूमिका भी संदेहास्पद रही। पुस्तक में ये आरोप भी लगाया गया है कि इन नियामकों ने मर्क के एकतरफा रिपोर्ट्स को बिना सवाल स्वीकार किया। EMA की 2015 जांच में भी कंपनियों के डेटा पर भरोसा किया गया। गोट्शे कहते हैं कि रेगुलेटर्स इंडस्ट्री द्के क़ब्ज़े में हैं। पुस्तक में Vioxx घोटाले की तुलना भी की गई है। लेखक अन्य देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों के भ्रामक बयानों के उदाहरण भी देते हैं।


दुनिया भर के विश्लेषक इस पुस्तक की ताकत का वर्णन करते हुए इसे गोपनीय आंतरिक दस्तावेजों पर आधारित मानकर जर्नल पेपर्स से ज्यादा विस्तृत मानते हैं। इस पुस्तक के छपने का सबसे प्रभावी असर यह है कि यह पारदर्शिता की मांग करता है और कानूनी मुकदमों (जैसे Robi केस, जो 2025 में चल रहा था) में सच्चाई उजागर होने का उदाहरण भी देता है। ब्राउनस्टोन इंस्टीट्यूट जैसे समीक्षक इसे ‘फियरलेस इंडिक्टमेंट’ कहते हैं।



गौरतलब है कि गोट्शे को ब्रिटिश मेडिकल शोध संस्थान कोक्रेन से निकाला गया था क्योंकि उन्होंने 2018 में एचपीवी वैक्सीन रिव्यू पर इसी तरह की आलोचना की थी। वहीं WHO, CDC, Cochrane जैसे मुख्यधारा के शोध संस्थान का मानना है कि वैक्सीन प्री-कैंसरस लेशन्स 80-90% तक कम करती है, असरदार है और गंभीर साइड इफेक्ट्स बहुत दुर्लभ हैं। विश्व स्वास्थ संगठन के VigiBase में 667 मौतें रिपोर्ट हुई हैं, लेकिन कारण संबंध साबित नहीं। गोट्शे की व्याख्या को ‘anti-vax’ माना जाता है, हालांकि वे खुद वैक्सीन के खिलाफ नहीं बल्कि ‘ट्रांसपेरेंसी’ के पक्षधर हैं।


भारत में इस पुस्तक का सीधा और व्यापक प्रभाव अभी तक दिखाई नहीं देता। 2026 तक के उपलब्ध डेटा में कोई बड़ा मीडिया बहस या सरकारी प्रतिक्रिया नहीं मिली। लेकिन यह अप्रत्यक्ष रूप से प्रासंगिक है क्योंकि 2009-2010 में PATH (बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन) के साथ मर्क के गार्डासिल और GSK के Cervarix ट्रायल्स आंध्र प्रदेश और गुजरात में चले जहाँ 7 लड़कियों की मौत हुई, जिसके बाद संसदीय समिति ने नैतिक उल्लंघन (इनफॉर्म्ड कंसेंट के बिना गरीब लड़कियों पर प्रयोग) का आरोप लगाया। ट्रायल्स रोके गए। यह विवाद आज भी HPV वैक्सीन पर शक पैदा करता है।


उल्लेखनीय है कि भारत सर्वाइकल कैंसर खत्म करने के लिए HPV वैक्सीन को स्कूल प्रोग्राम में ला रहा है, जिसकी शुरुआत सिक्किम, पंजाब आदि में राष्ट्रीय रोलआउट की योजना के तहत की जा सकती है। इंडिजिनस Cervavac भी उपलब्ध है, लेकिन क्वाड्रिवेलेंट वैक्सीन (मर्क जैसी) भी इस्तेमाल होती है। भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय इसे सुरक्षित और जरूरी बताती है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो पुस्तक के दावे के अनुसार वैक्सीन के छुपे नुकसान सोशल मीडिया या एंटी-वैक्सीन ग्रुप्स में फैल सकते हैं, जिससे हिचकिचाहट बढ़ सकती है। खासकर 2010 के ट्रायल विवाद के बाद। लेकिन भारत में मुख्यधारा मीडिया और स्वास्थ्य विभाग इसे ‘मिथ’ बताते हुए प्रमोशन जारी रखते हैं। अगर अमरीका में हुए मुकदमे को केंद्र में रखा जाए तो ज्यादा सुर्खियां बन सकती हैं जिससे इस पर प्रभाव बढ़ सकता है। परंतु, पुस्तक भारत में सतर्कता अवश्य बढ़ा सकती है लेकिन कार्यक्रम को नहीं रोक पाएगी, क्योंकि कैंसर का बोझ बहुत बड़ा है।


यह पुस्तक दवा उद्योग और नियामकों पर गंभीर सवाल उठाती है। गोट्शे के दस्तावेजी सबूत मजबूत हैं, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय में यह अल्पमत है। भारत जैसे देश में जहां एचपीवी वैक्सीन सार्वजनिक स्वास्थ्य का बड़ा हथियार है, ऐसे में पुस्तक याद दिलाती है कि माता-पिता को स्वतंत्र शोध करना चाहिए, स्क्रीनिंग के साथ वैक्सीनेशन बैलेंस करें। अगर आप वैक्सीन के पक्ष में हैं, तो डॉक्टर से चर्चा करें और आधिकारिक डेटा भी देखें।

Monday, February 16, 2026

एचबीए1सी टेस्ट पर नया अध्ययन: डायबिटीज की चुनौतियाँ

डायबिटीज, जिसे आधुनिक युग की महामारी कहा जा रहा है, भारत में करोड़ों लोगों को अपनी चपेट में ले चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत दुनिया का डायबिटीज कैपिटल है, जहां 10 करोड़ से अधिक लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं। डायबिटीज के निदान और नियंत्रण के लिए एचबीए1सी (ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन) टेस्ट को ‘सोने का मानक’ माना जाता रहा है। यह टेस्ट पिछले दो-तीन महीनों की औसत ब्लड शुगर लेवल को मापता है, जो आसान, गैर-आक्रामक और विश्वसनीय लगता है। लेकिन फरवरी 2026 में ‘द लैंसेट रीजनल हेल्थ - साउथईस्ट एशिया’ जर्नल में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दे दी है। यह अध्ययन, जो विशेष रूप से भारतीय और दक्षिण एशियाई आबादी पर केंद्रित है, चेतावनी देता है कि एनीमिया, हीमोग्लोबिन विकृतियों और अन्य कारकों के कारण एचबीए1सी टेस्ट गलत निदान कर सकता है, जिससे डायबिटीज का पता चार साल तक देरी से चल सकता है।


यह अध्ययन, प्रोफेसर अनूप मिश्रा और उनके सहयोगियों द्वारा लिखित, एचबीए1सी की सीमाओं पर गहन समीक्षा करता है। भारत में एनीमिया एक महामारी है – राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, 50% से अधिक वयस्क महिलाएं और 25% पुरुष एनीमिया से प्रभावित हैं। एनीमिया आयरन की कमी से लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या घटाता है, जिससे एचबीए1सी का स्तर कृत्रिम रूप से ऊंचा हो जाता है। परिणामस्वरूप, जो व्यक्ति डायबिटीज से ग्रस्त नहीं है, उसे गलत तरीके से डायबिटीज का मरीज घोषित कर दिया जा सकता है। इसके विपरीत, हीमोग्लोबिनोपैथी (जैसे थैलेसीमिया, जो भारत में 4% आबादी को प्रभावित करता है) या जी6पीडी की कमी एचबीए1सी को कम दिखा सकती है, जिससे वास्तविक डायबिटीज वाले मरीजों का निदान देरी से होता है।



अध्ययन के अनुसार, दक्षिण एशियाई लोगों में एचबीए1सी और वास्तविक ब्लड ग्लूकोज के बीच सहसंबंध कमजोर है। उदाहरण के लिए, एनीमिया वाले क्षेत्रों में एचबीए1सी पर निर्भरता से डायबिटीज का निदान 20-30% मामलों में गलत हो सकता है। यह न केवल निदान को प्रभावित करता है, बल्कि उपचार को भी, अनावश्यक दवाएं या देरी से उपचार से जटिलताएं जैसे हृदय रोग, किडनी फेलियर बढ़ सकती हैं। अध्ययन की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत जैसे विकासशील देशों में जहां एनीमिया और आनुवंशिक विकार आम हैं, एचबीए1सी को अकेले इस्तेमाल करना जोखिमपूर्ण है। यह पश्चिमी आबादी पर आधारित मानकों को सीधे लागू करने की भूल को उजागर करता है।



भारत में डायबिटीज का बोझ पहले से ही भारी है। आईसीएमआर के अनुसार, 2030 तक यह 13.5 करोड़ तक पहुंच सकता है। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि लाखों लोग अनदेखे डायबिटीज से पीड़ित हो सकते हैं, क्योंकि एचबीए1सी पर अंधविश्वास ने अन्य टेस्ट जैसे ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) या फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज (एफपीजी) को पीछे धकेल दिया है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत और महिलाओं के लिए यह खतरा अधिक है, जहां एनीमिया दर 60% से ऊपर है। देरी से निदान से न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य बिगड़ता है, बल्कि स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ भी बढ़ता है।


चिंता का मतलब घबराहट नहीं होना चाहिए। यह अध्ययन एक जागृति का संकेत है। भारतीयों की आनुवंशिक संरचना – जैसे ‘थ्रिफ्टी जीन’ हाइपोथेसिस, जो दक्षिण एशियाई लोगों में इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है – पहले से ही डायबिटीज को जन्मभूमि बनाती है। लेकिन एचबीए1सी की सीमाएं जानकर हम बेहतर रणनीति बना सकते हैं। अगर हम इसे नजरअंदाज करेंगे, तो ‘साइलेंट किलर’ जाने जाने वाली डायबिटीज और घातक हो जाएगी।


गौरतलब है कि फार्मा उद्योग, जो डायबिटीज मार्केट से सालाना अरबों-खरबों कमाता है, इस अध्ययन से हलचल में आ सकता है। भारत में एचबीए1सी टेस्ट किट्स का बाजार 500 करोड़ रुपये से अधिक का है। इस अध्ययन से बड़ी कमानियों की बिक्री प्रभावित हो सकती है, क्योंकि डॉक्टर अब कॉम्बिनेशन टेस्ट की सिफारिश करेंगे।  


संभावना है कि फार्मा कंपनियां वैकल्पिक डायग्नोस्टिक टूल्स पर निवेश बढ़ाएंगी। दवाओं के मामले में भी सदियों से चली आ रही दवाओं पर सीधा असर कम होगा, क्योंकि निदान गलत होने से उपचार की शुरुआत प्रभावित होगी, लेकिन एक बार निदान हो जाए तो दवाओं को उसी मुताबिक दिया जाएगा। हालांकि, फार्मा इंडस्ट्री की लॉबी इस  अध्ययन को चुनौती दे सकती है, यह दावा करते हुए कि एचबीए1सी अभी भी उपयोगी है। वहीं वैश्विक स्तर पर, कुछ कंपनियां, जो अलग तरह के जांच उपकरण व दवाएँ बेचती हैं, इस नए अध्ययन को मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं। कुल मिलाकर, यह उद्योग के लिए एक अवसर भी साबित हो सकता है, जो बाजार को नया आयाम देगा। लेकिन अगर प्रतिक्रिया नकारात्मक हुई, तो नियामक दबाव बढ़ सकता है।


भारतीय डॉक्टर इस अध्ययन से सहमत हैं, लेकिन घबराहट की बजाय सतर्कता की वकालत करते हैं। प्रोफेसर अनूप मिश्रा, अध्ययन के मुख्य लेखक और फोर्टिस सीकेडी हॉस्पिटल के चेयरमैन, कहते हैं, एचबीए1सी पर पूर्ण निर्भरता से डायबिटीज की स्थिति का गलत वर्गीकरण हो सकता है। कुछ लोग अनुचित रूप से देरी से निदान हो सकते हैं। एंडोक्राइन सोसाइटी ऑफ इंडिया के एक सर्वे में 70% डॉक्टरों ने कहा कि एनीमिया वाले मरीजों में ओजीटीटी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस अध्ययन के बाद, डॉक्टरों का मत है कि एचबीए1सी उपयोगी है, लेकिन अकेला नहीं। वो मानते हैं कि मिलीजुली प्रकिया के तहत डायबटीज जैसी बीमारी का निदान किया जा सकता है।


यह अध्ययन हमें निष्क्रियता से हटाकर सक्रियता की ओर ले जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर आप एचबीए1सी टेस्ट करवा रहे हैं, तो सीबीसी (कम्प्लीट ब्लड काउंट) से एनीमिया भी चेक जरूर करवाएं। अगर एनीमिया है, तो ओजीटीटी या एफपीजी पर स्विच करें। इसके साथ ही 30 वर्ष से ऊपर वाले व्यक्तियों को हर साल कम से कम दो टेस्ट – एफपीजी और एचबीए1सी करवाने चाहिए। डायबिटीज का 80% जोखिम रोकथाम योग्य है। दैनिक 30 मिनट व्यायाम, फाइबर-युक्त आहार (दालें, सब्जियां) और वजन नियंत्रण अपनाएं। अध्ययन दिखाता है कि भारतीयों में वजन बढ़ने से इंसुलिन रेजिस्टेंस तेजी से बढ़ता है। एनीमिया रोकने के लिए आहार में पालक, गुड़ और पौष्टिक आहार शामिल करें, लेकिन अपने डॉक्टर की सलाह से। अस्पतालों और सामाजिक संस्थाओं को सामुदायिक स्तर पर कैंप लगाने चाहिए, जिससे कि जागरूकता बढ़े। सस्ते व आसानी से उपलब्ध ग्लूकोमीटर या ऐप्स से घर पर मॉनिटरिंग करें। ये कदम न केवल डायबिटीज को नियंत्रित करेंगे, बल्कि समग्र स्वास्थ्य भी सुधारेंगे।

यह लैंसेट अध्ययन एचबीए1सी को खारिज नहीं करता, बल्कि इसकी सीमाओं को उजागर करता है। भारतीयों के लिए यह एक जागृति का क्षण है, चिंता करें, लेकिन उचित कार्रवाई भी करें। डायबिटीज से लड़ाई में सटीक निदान पहला कदम है। अगर हम इसे अपनाएं, तो भारत न केवल डायबिटीज कैपिटल से उबर सकता है, बल्कि हेल्थकेयर का वैश्विक मॉडल भी बन सकता है। समय है सोच बदलने का – स्वास्थ्य के लिए, भविष्य के लिए। 

Monday, January 19, 2026

योग और स्वस्थ जीवनशैली के लाभ

भारत की प्राचीन सभ्यता में योग को जीवन का आधार माना गया है। आज की तेज़-रफ़्तार और तनावपूर्ण दुनिया में, जहां जीवनशैली संबंधी बीमारियाँ जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और मानसिक विकार तेज़ी से बढ़ रहे हैं, योग एक प्राचीन लेकिन अत्यंत प्रासंगिक समाधान के रूप में उभर रहा है। भारत की यह अमूल्य धरोहर न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाती है, बल्कि मन की शांति और आध्यात्मिक संतुलन भी प्रदान करती है। बीते वर्ष, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम ‘एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग’ ने इसे और अधिक प्रासंगिक बना दिया है, क्योंकि योग व्यक्तिगत स्वास्थ्य से लेकर पर्यावरणीय संतुलन तक सब कुछ जोड़ता है। आज का विषय योग को दैनिक जीवन में अपनाने के व्यावहारिक लाभों पर केंद्रित है, ताकि हम एक स्वस्थ, सकारात्मक और संतुलित जीवन जी सकें। 



योग का अर्थ है ‘जोड़ना’ या ‘मिलन’। यह शरीर, मन और आत्मा का मिलन है। महर्षि पतंजलि के योग सूत्रों में योग को ‘चित्त वृत्ति निरोधः’ कहा गया है, अर्थात मन की वृत्तियों का निरोध। लेकिन योग सिर्फ ध्यान या समाधि तक सीमित नहीं; यह हठ योग, राज योग, भक्ति योग और कर्म योग जैसे विभिन्न रूपों में जीवन को संतुलित करता है। आज के संदर्भ में, हठ योग के आसन और प्राणायाम सबसे अधिक प्रचलित हैं, क्योंकि ये व्यावहारिक और तुरंत लाभ देने वाले हैं।



शारीरिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में योग के लाभ अनेक हैं। नियमित योगाभ्यास से शरीर लचीला, मजबूत और संतुलित होता है। सूर्य नमस्कार जैसे गतिशील आसन पूरे शरीर की मांसपेशियों को सक्रिय करते हैं, रक्त संचार बढ़ाते हैं और चयापचय (मेटाबॉलिज्म) को तेज़ करते हैं। इससे वजन नियंत्रण में मदद मिलती है। कई अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि योग से मोटापा कम होता है, खासकर पेट की चर्बी। धनुरासन, भुजंगासन और नौकासन जैसे आसन पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं, कब्ज और एसिडिटी जैसी समस्याओं से राहत देते हैं। महिलाओं के लिए योग मासिक धर्म चक्र को नियमित करता है, प्रसव के बाद रिकवरी में सहायक होता है और हड्डियों की मजबूती बढ़ाता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी वृद्धावस्था की बीमारियों से बचाव होता है।



हृदय स्वास्थ्य के लिए योग एक वरदान है। अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम रक्तचाप को नियंत्रित करते हैं, कोलेस्ट्रॉल स्तर कम करते हैं और हृदय की धड़कन को संतुलित रखते हैं। भारत में हृदय रोग मौत का प्रमुख कारण है, और योग जैसे प्राकृतिक तरीके से इसे रोका जा सकता है। योग इम्यून सिस्टम को भी मजबूत बनाता है। नियमित अभ्यास से शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कोविड महामारी के बाद यह और भी महत्वपूर्ण हो गया है।


मानसिक स्वास्थ्य योग का सबसे बड़ा योगदान है। आज की युवा पीढ़ी चिंता, अवसाद और तनाव से ग्रस्त है। योग में ध्यान और प्राणायाम मन को शांत करते हैं। विपश्यना या mindfulness ध्यान से स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल कम होता है, नींद बेहतर आती है और एकाग्रता बढ़ती है। छात्रों के लिए यह परीक्षा तनाव कम करने का बेहतरीन माध्यम है। कार्यरत लोगों के लिए योग वर्क-लाइफ बैलेंस बनाए रखता है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है और भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है। योग से आत्मविश्वास बढ़ता है, जो व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में सफलता की कुंजी है।



योग को स्वस्थ जीवनशैली का आधार बनाना चाहिए। योग सिर्फ आसन नहीं, बल्कि आहार, नींद और दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है। आयुर्वेद के अनुसार, सात्विक भोजन – फल, सब्जियाँ, दालें, अनाज और दूध – योग के लाभों को बढ़ाता है। जंक फूड, ज्यादा तेल-मसाले और रात में भारी भोजन से दूर रहना चाहिए। सुबह जल्दी उठना, सूर्योदय के साथ योग करना और रात को 7-8 घंटे की नींद लेना आदर्श है। डिजिटल डिटॉक्स भी योग का हिस्सा बन सकता है – स्क्रीन टाइम कम करके ध्यान बढ़ाना।


योग नियमित अभ्यास से लचीलापन बढ़ाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है और संतुलन सुधारता है, जिससे गिरने का खतरा कम होता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से सिद्ध है कि यह तनाव कम करता है, कोर्टिसोल स्तर घटाता है और चिंता को 40% तक कम कर सकता है। हृदय स्वास्थ्य में सुधार, बेहतर नींद, आत्मसम्मान में वृद्धि और समग्र जीवन गुणवत्ता में वृद्धि जैसे लाभ भी प्रमाणित हैं। योग कैंसर रोगियों में थकान कम करता है और मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है, जिससे दैनिक जीवन अधिक संतुलित और ऊर्जावान बनता है।


समाजिक स्तर पर योग समुदाय को जोड़ता है। गांवों में योग शिविर, शहरों में पार्कों में सामूहिक सत्र और स्कूलों में योग शिक्षा से लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं। महिलाओं के लिए यह सशक्तिकरण का साधन है – घरेलू कामों के साथ स्वास्थ्य बनाए रखना। बुजुर्गों के लिए योग गतिशीलता बनाए रखता है और अकेलेपन को कम करता है। पर्यावरणीय दृष्टि से, योग हमें प्रकृति से जोड़ता है। योग हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य और पृथ्वी का स्वास्थ्य जुड़े हुए हैं। कम खपत, अधिक जागरूकता और संतुलित जीवन से हम पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं।


आर्थिक रूप से भी योग फायदेमंद है। अस्पतालों के खर्च कम होते हैं, दवाओं पर निर्भरता घटती है। एक स्वस्थ व्यक्ति अधिक उत्पादक होता है, जिससे परिवार और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है। भारत में योग पर्यटन बढ़ रहा है – ऋषिकेश, हरिद्वार जैसे स्थान विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, जिससे रोजगार भी बढ़ता है।

योग अपनाना आसान है। शुरुआत में 15-20 मिनट रोज़ काफी हैं। घर पर ऑनलाइन वीडियो या ऐप्स से सीख सकते हैं। वहीं सरकारी योजनाएँ जैसे आयुष मंत्रालय के योग कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के शिविर मुफ्त प्रशिक्षण देते हैं। लेकिन महत्वपूर्ण है निरंतरता। योग कोई जादू नहीं, बल्कि अभ्यास है। योग को धीरे-धीरे बढ़ाएँ, शरीर की सुनें और धैर्य रखें। याद रहे कि योग हमें सिखाता है कि सच्चा स्वास्थ्य बाहर नहीं, भीतर है। जब हम योग अपनाते हैं, तो न केवल हम स्वस्थ होते हैं, बल्कि समाज और पर्यावरण भी लाभान्वित होता है। इसलिए कोशिश करें कि हम योग को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ।  

Monday, April 14, 2025

अचानक मौतें क्या 'कोविशील्ड' के कारण हो रही हैं?


बिना किसी बीमारी या चेतावनी के लगातार अचानक युवाओं की मृत्यु क्यों हो रही है? क्या ये कोविशील्ड के वैक्सीनेशन का दुष्परिणाम है? क्योंकि कोविशील्ड बनाने वाली कंपनी ने सर्वोच्च अदालत में अब यह स्वीकार कर लिया है कि उनके इस वैक्सीन से ख़ून के थक्के जमने की संभावना होती है। पिछले हफ़्ते क्रिकेट खेलते एक युवा की अचानक मौत हो गई। अपने विदाई समारोह में कॉलेज में भाषण देते-देते एक 20 वर्ष की महिला अचानक मर गई। रामलीला में मंच पर हनुमान जी का किरदार निभाने वाले कलाकार की अचानक मंच पर ही मृत्यु हो गई। अपने विवाह में पति के गले में जयमाल डालते-डालते नववधू मर कर गिर गई। 





कोविड के बाद से पूरे देश में ऐसी मौतों की बाढ़ सी आ गई है। जिन जागरूक डॉक्टर, वकील और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कोविशील्ड वैक्सीन की क्षमता पर संदेह किया था और ये आरोप लगाया था कि बिना सही परीक्षण किए, जल्दबाजी में, प्रशासनिक दबाव बना कर जिस तरह पूरे देश में कोविशील्ड का टीकाकरण किया गया इससे लोगों की जान को भारी खतरा पैदा हो गया। मुंबई उच्च न्यायालय के वकील निलेश ओझा ने कोविशील्ड कंपनी और भारत सरकार के विरुद्ध मुंबई उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में जनहित के मुकदमे करके वैक्सीन बनाने वाली कंपनी पर दबाव बनाया जिसके चलते इस कंपनी ने अपने वैक्सीन के दुष्परिणामों की संभावनाओं को अदालत में स्वीकार किया। 



इससे यह सिद्ध हो गया कि ये वैक्सीन बिना परीक्षण पूरा किए ही जल्दबाज़ी में पूरे देश पर थोप दिया गया। इन लोगों को और देश के तमाम जागरूक लोगों को इस बात से भारी नाराज़गी है कि भारत की मौजूदा सरकार, ऐसी अचानक हो रही मौतों की न तो संख्या जारी कर रही है और न ही उसके कारणों की जांच करवा रही है। यह बहुत चिंता की बात है। इसी समूह से जुड़ी डॉ सुसन राज जो मध्य प्रदेश के राजनन्दगांव ज़िले में रहती हैं, उनका दावा है कि सारी मौतें कोविशील्ड वैक्सीन के कारण ही हो रही हैं। डॉ सुसन राज हर उस व्यक्ति को, जिसने ये टीका लगवाया था, चेतावनी दे रही हैं कि वे यथा शीघ्र अपने शरीर को ‘डिटॉक्स’ (विषमुक्त) कर लें जिससे कोविशील्ड वैक्सीन के संभावित दुष्परिणामों से बचा जा सके। ‘डिटॉक्स’ करने की ट्रेनिंग वो ज़ूम कॉल पर दुनिया भर के हज़ारो लोगों को दे चुकी हैं। उनकी यह प्रक्रिया इतनी सरल है कि कोई भी व्यक्ति देश-दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न बैठा हो वो डॉ सुसन राज से ज़ूम कॉल पर ख़ुद को विषमुक्त करने का तरीका सीख सकता है। ये तकनीक बहुत सरल है और घर बैठे अपना ट्रीटमेंट किया जा सकता है। 



एक रोचक तथ्य यह है कि हमारे आपके सामाजिक दायरे में जिन लोगों ने कोविशील्ड वैक्सीन नहीं लगवाई थी वे आज भले चंगे हैं। जिन्होंने लगवाई थी उनमें से बहुत सारे लोगों को अजीबो-गरीब बीमारियां शुरू हो गई हैं। मेरे ही परिवार में मुझ समेत कई लोगों को ऐसी बीमारियां हो गई हैं जिनका कोई कारण समझ में नहीं आता। क्योंकि हम सब एक संतुलित शाकाहारी सात्विक जीवन जीते हैं। हालांकि एक पक्ष ऐसा भी है जो मानता है कि इन मौतों और बीमारियों का वैक्सीन से कोई लेना-देना नहीं है। पर ये पक्ष इन मौतों और अचानक पनप रही इन बीमारियों का कारण बताने में असमर्थ हैं। इसलिए डॉ सुसन सबको सलाह देती हैं कि वे अपने शरीर को वैक्सीन के विष से मुक्त कर लें और स्वस्थ जीवन जियें। 



डॉ सुसन के अनुसार हमारी कोशिकाएँ सात तरीकों से खुद को डिटॉक्स करती हैं। पाँच रासायनिक डिटॉक्स हैं, एक यांत्रिक डिटॉक्स है और एक विद्युत डिटॉक्स है। ऑक्सीकरण और जलयोजन पाँच रासायनिक डिटॉक्स में से दो हैं, जिनका उपयोग कोशिकाएँ करती हैं। आमतौर पर यह साँस लेने, जूस और पानी के द्वारा किया जाता है। इन दो कार्यों का समर्थन करने के लिए, हम क्या कर सकते हैं, एक घोल तैयार करें जिसमें ऑक्सीजन के 2 अणु नमक से क्लोराइड के एक अणु के साथ बंधते हैं, और इसे पानी में घोलते हैं। यह ऑक्सीजन युक्त पानी बन जाता है, जो ऑक्सीकरण द्वारा बहुत कुशल डिटॉक्स करता है।


एंटीऑक्सीडेंट भोजन, जड़ी-बूटियाँ और तेल हैं जिनमें प्रोटीन, विटामिन, खनिज, कार्ब्स और वसा होते हैं। ये वस्तुएँ कोशिका संरचना का निर्माण करके डिटॉक्स करती हैं। एंडोक्राइन स्राव को मन की शक्ति द्वारा प्रबंधित किया जाता है जो विचारों में परिवर्तित होने वाली सूचनाओं और फिर सकारात्मक भावनाओं से जुड़कर अच्छा महसूस कराने वाले न्यूरोट्रांसमीटर का उत्पादन करके बनाया जाता है, जो 90% बीमारियों को ठीक कर सकता है। ऑटोफैगी स्वयं खाने का उपयोग करके डिटॉक्स करता है। यह उपवास में होता है। यहाँ वह डिटॉक्स है जिसे एकीकृत सेलुलर डिटॉक्स थेरेपी में जोड़ा जाता है। 


गौरतलब है कि आज कल के आधुनिक जीवन की भागदौड़ में हमारा मन और शरीर अक्सर तनाव, नकारात्मकता और अनावश्यक बोझ से भर जाता है। ‘सेल्फ डिटॉक्स’ एक ऐसी प्रक्रिया है, जो हमें शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से शुद्ध करने में मदद करती है। यह न केवल हमें तरोताजा करती है, बल्कि जीवन में स्पष्टता और संतुलन भी लाती है। सेल्फ डिटॉक्स की शुरुआत शरीर से होनी चाहिए। इसके लिए संतुलित आहार, पर्याप्त पानी का सेवन और नियमित व्यायाम जरूरी है। जंक फूड, शराब और कैफीन से दूरी बनाकर शरीर को हल्का और ऊर्जावान बनाया जा सकता है। प्राकृतिक खाद्य पदार्थ जैसे फल, सब्जियां और साबुत अनाज शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करते हैं। योग और प्राणायाम भी शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं। 


हमारा दिमाग सोशल मीडिया, नकारात्मक खबरों और अनावश्यक विचारों से भरा रहता है। मानसिक डिटॉक्स के लिए ध्यान और माइंडफुलनेस का अभ्यास प्रभावी है। रोजाना कुछ समय शांत बैठकर अपने विचारों को व्यवस्थित करें। अनावश्यक जानकारी से दूरी बनाएं और सकारात्मक किताबें पढ़ें। डिजिटल डिटॉक्स, यानी फोन और इंटरनेट से ब्रेक लेना, भी मानसिक शांति देता है। नकारात्मक भावनाएं जैसे गुस्सा, ईर्ष्या या दुख हमें कमजोर बनाती हैं। इनसे मुक्ति के लिए आत्म-चिंतन उपयोगी हैं। अपनी भावनाओं को स्वीकार करें और उन्हें व्यक्त करने का स्वस्थ तरीका ढूंढें। अपनों के साथ समय बिताएं और कृतज्ञता का अभ्यास करें। इन तमाम तरीकों से हम अपने शरीर से  कोविशील्ड वैक्सीन के कारण उत्पन्न विष को निकाल सकते हैं और इसके संभावित दुष्परिणामों से बच सकते हैं। डॉ सुसन राज हों या समाज के अन्य जागरूक लोग, हमें ऐसा करने की सलाह दे रहे हैं। हम माने या न मानें ये हम ओर निर्भर है।