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Monday, March 23, 2026

एचपीवी वैक्सीन के दुष्प्रभावों को क्यों छिपाया गया?

कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक पोस्ट काफ़ी चर्चा में छाई हुई है। इसमें पीटर गोट्शे नामक एक प्रसिद्ध चिकित्सक, शोधकर्ता और लेखक, ने ‘हाउ मर्क एंड ड्रग रेगुलेटर्स हिड सीरियस हार्म्स ऑफ एचपीवी वैक्सीन’ नाम की पुस्तक का विश्लेषण कर कुछ गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इस पोस्ट में पीटर द्वारा किए गए दावा ज़िक्र किया गया है कि कैसे महिलाओं में होने वाले सर्वाइकल कैंसर को रोकने वाली एक वैक्सीन के दुष्प्रभावों को दुनिया से छिपाया गया है।   

पोस्ट के अनुसार पीटर गोट्शे की पुस्तक में वे बताते हैं कि कैसे ‘एचपीवी क्सीन’ को ‘लाइफ-सेविंग’ बताकर बेचा गया, लेकिन इसके ट्रायल्स में गंभीर कमियां थीं और नुकसान छुपाए गए। यह मर्क की वैज्ञानिक दुराचार की कहानी है, जो कभी-कभी फ्रॉड के स्तर तक पहुंचती है। गोट्शे के अनुसार, मर्क ने कई तरीकों से गार्डासिल के नुकसानों को छुपाया। ज्यादातर ट्रायल्स में सच्चा प्लेसिबो (सलाइन) नहीं इस्तेमाल किया गया। इसके बजाय एल्यूमिनियम एडजुवेंट या दूसरी वैक्सीन को ‘प्लेसिबो’ बताया गया। ये दोनों खुद नुकसान पहुंचा सकते हैं (न्यूरोटॉक्सिक), इसलिए वैक्सीन और ‘प्लेसिबो’ के साइड इफेक्ट्स समान दिखे और नुकसान ‘सुरक्षित’ साबित हुआ। लेखक कहते हैं कि इससे मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन हुआ। 



वहीं दूसरी ओर गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याएं जैसे POTS (Postural Orthostatic Tachycardia Syndrome—खड़े होते ही चक्कर और दिल की धड़कन तेज होना) और CRPS (Complex Regional Pain Syndrome—तीव्र दर्द और सूजन) को रिपोर्ट नहीं किया गया। केवल 14 दिनों के अंदर की घटनाएं गिनी गईं, जबकि 90% नुकसान इससे बाहर थे। कई केसों को ‘कोई संबंध नहीं’ बता दिया गया या बाहर कर दिया गया। गोट्शे इसे ‘आउटराइट फ्रॉड’ कहते हैं।


उल्लेखनीय है कि वैक्सीन को सर्वाइकल कैंसर रोकने वाला बताया गया, लेकिन गोट्शे दावा करते हैं कि ट्रायल्स में असली कैंसर केस शून्य थे। लंबे समय के डेटा में एंटीबॉडी स्तर तेजी से गिरता है और पहले से एचपीवी संक्रमित महिलाओं में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया या डेनमार्क में ऑब्जर्वेशनल स्टडीज में कैंसर घाटे को वैक्सीन का श्रेय दिया जाता है, लेकिन स्क्रीनिंग और अन्य फैक्टर्स को नजरअंदाज किया जाता है। पुस्तक के अनुसार मर्क ने ऐसा डर फैलाया कि कैंसर हजारों महिलाओं को मारता है, हर राज्य में लॉबिंग की और स्कूल मैंडेट के लिए दबाव डाला। इस वैक्सीन को ‘फास्ट-ट्रैक अप्रूवल’ मिला, जबकि FDA ने बाद में माना कि सेफ्टी मॉनिटरिंग की क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया था। 



इसके साथ ही FDA, EMA जैसे नियामकों की भूमिका भी संदेहास्पद रही। पुस्तक में ये आरोप भी लगाया गया है कि इन नियामकों ने मर्क के एकतरफा रिपोर्ट्स को बिना सवाल स्वीकार किया। EMA की 2015 जांच में भी कंपनियों के डेटा पर भरोसा किया गया। गोट्शे कहते हैं कि रेगुलेटर्स इंडस्ट्री द्के क़ब्ज़े में हैं। पुस्तक में Vioxx घोटाले की तुलना भी की गई है। लेखक अन्य देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों के भ्रामक बयानों के उदाहरण भी देते हैं।


दुनिया भर के विश्लेषक इस पुस्तक की ताकत का वर्णन करते हुए इसे गोपनीय आंतरिक दस्तावेजों पर आधारित मानकर जर्नल पेपर्स से ज्यादा विस्तृत मानते हैं। इस पुस्तक के छपने का सबसे प्रभावी असर यह है कि यह पारदर्शिता की मांग करता है और कानूनी मुकदमों (जैसे Robi केस, जो 2025 में चल रहा था) में सच्चाई उजागर होने का उदाहरण भी देता है। ब्राउनस्टोन इंस्टीट्यूट जैसे समीक्षक इसे ‘फियरलेस इंडिक्टमेंट’ कहते हैं।



गौरतलब है कि गोट्शे को ब्रिटिश मेडिकल शोध संस्थान कोक्रेन से निकाला गया था क्योंकि उन्होंने 2018 में एचपीवी वैक्सीन रिव्यू पर इसी तरह की आलोचना की थी। वहीं WHO, CDC, Cochrane जैसे मुख्यधारा के शोध संस्थान का मानना है कि वैक्सीन प्री-कैंसरस लेशन्स 80-90% तक कम करती है, असरदार है और गंभीर साइड इफेक्ट्स बहुत दुर्लभ हैं। विश्व स्वास्थ संगठन के VigiBase में 667 मौतें रिपोर्ट हुई हैं, लेकिन कारण संबंध साबित नहीं। गोट्शे की व्याख्या को ‘anti-vax’ माना जाता है, हालांकि वे खुद वैक्सीन के खिलाफ नहीं बल्कि ‘ट्रांसपेरेंसी’ के पक्षधर हैं।


भारत में इस पुस्तक का सीधा और व्यापक प्रभाव अभी तक दिखाई नहीं देता। 2026 तक के उपलब्ध डेटा में कोई बड़ा मीडिया बहस या सरकारी प्रतिक्रिया नहीं मिली। लेकिन यह अप्रत्यक्ष रूप से प्रासंगिक है क्योंकि 2009-2010 में PATH (बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन) के साथ मर्क के गार्डासिल और GSK के Cervarix ट्रायल्स आंध्र प्रदेश और गुजरात में चले जहाँ 7 लड़कियों की मौत हुई, जिसके बाद संसदीय समिति ने नैतिक उल्लंघन (इनफॉर्म्ड कंसेंट के बिना गरीब लड़कियों पर प्रयोग) का आरोप लगाया। ट्रायल्स रोके गए। यह विवाद आज भी HPV वैक्सीन पर शक पैदा करता है।


उल्लेखनीय है कि भारत सर्वाइकल कैंसर खत्म करने के लिए HPV वैक्सीन को स्कूल प्रोग्राम में ला रहा है, जिसकी शुरुआत सिक्किम, पंजाब आदि में राष्ट्रीय रोलआउट की योजना के तहत की जा सकती है। इंडिजिनस Cervavac भी उपलब्ध है, लेकिन क्वाड्रिवेलेंट वैक्सीन (मर्क जैसी) भी इस्तेमाल होती है। भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय इसे सुरक्षित और जरूरी बताती है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो पुस्तक के दावे के अनुसार वैक्सीन के छुपे नुकसान सोशल मीडिया या एंटी-वैक्सीन ग्रुप्स में फैल सकते हैं, जिससे हिचकिचाहट बढ़ सकती है। खासकर 2010 के ट्रायल विवाद के बाद। लेकिन भारत में मुख्यधारा मीडिया और स्वास्थ्य विभाग इसे ‘मिथ’ बताते हुए प्रमोशन जारी रखते हैं। अगर अमरीका में हुए मुकदमे को केंद्र में रखा जाए तो ज्यादा सुर्खियां बन सकती हैं जिससे इस पर प्रभाव बढ़ सकता है। परंतु, पुस्तक भारत में सतर्कता अवश्य बढ़ा सकती है लेकिन कार्यक्रम को नहीं रोक पाएगी, क्योंकि कैंसर का बोझ बहुत बड़ा है।


यह पुस्तक दवा उद्योग और नियामकों पर गंभीर सवाल उठाती है। गोट्शे के दस्तावेजी सबूत मजबूत हैं, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय में यह अल्पमत है। भारत जैसे देश में जहां एचपीवी वैक्सीन सार्वजनिक स्वास्थ्य का बड़ा हथियार है, ऐसे में पुस्तक याद दिलाती है कि माता-पिता को स्वतंत्र शोध करना चाहिए, स्क्रीनिंग के साथ वैक्सीनेशन बैलेंस करें। अगर आप वैक्सीन के पक्ष में हैं, तो डॉक्टर से चर्चा करें और आधिकारिक डेटा भी देखें।

Monday, November 29, 2021

कोरोना: ख़तरा अभी थमा नहीं


यूरोप में कोरोना फिर क़हर ढाह रहा है। जैसे-जैसे कोरोना के संक्रमण के दोबारा फैलने की खबरें आ रही हैं वैसे-वैसे ही आम जनता में इसके प्रति चिंता बढ़ती जा रही है। ये बात सही है कि भारत में कोरोना महामारी की स्थित पहले से बेहतर तो हुई है। लेकिन जब तक यह बीमारी पूरी तरह से समाप्त नहीं हो जाती हम सबको सावधानी ही बरतनी पड़ेगी। हमें इस बीमारी के साथ अभी और रहने की आदत डाल लेनी चाहिए ।


कोरोना का वाइरस एक ड्रिप इंफ़ेक्शन है जो केवल निकटता और सम्पर्क में आने से ही फैलता है हवा में नहीं। लगातार हाथ धोने और उचित दूरी बनाए रखने से ही इससे बचा जा सकता है।  कोरोना का वाइरस किसी भी धर्म, जाति, लिंग या स्टेटस में भेद नहीं करता। ये किसी को भी हो सकता है। यदि आप बाहर से आते हैं तो घर के बाहर जूतों को उतारना एक अच्छी आदत है। इसलिए घर में घुसते ही तुरंत कपड़े बदलना और स्नान करना अनिवार्य नहीं है। लेकिन शुद्धि करना एक अच्छी आदत होती है जो हमारे देश में सदियों से चली आ रही है। कोरोना के चलते दुनिया भर में हुए लॉकडाउन ने हमें एक बार फिर अपनी जीवन पद्धति को समझने, सोचने और सुधारने पर मजबूर किया है। 



लेकिन पिछले कुछ महीनों से जिस तरह से लोग बेपरवाह हो कर खुलेआम घूम रहे हैं और सामाजिक दूरी भी नहीं बना रहे उससे संक्रमण के फिर से फैलने की खबरें आने लग गई हैं।विशेषज्ञों की मानें तो संक्रमण के मामलों में गिरावट का श्रेय टीकाकरण अभियान है। साथ ही इस साल आई कोरोना की दूसरी लहर के दौरान वायरस से संक्रमित होने वाले लोगों में पनपी हाइब्रिड इम्युनिटी को भी दिया जा सकता है।


परंतु जिन्होंने इस बीमारी की भयावहता को भोगा है, वो हर एक को पूरी सावधानी बरतने की हिदायत देते हैं। जो लोग मामूली बुख़ार, खांसी झेलकर या बिना लक्षणों के ही कोविड पॉज़िटिव से कोविड नेगेटिव हो गए, वो यह कहते नहीं थकते कि कोरोना आम फ़्लू की तरह एक मौसमी बीमारी है और इससे डरने की कोई ज़रूरत नहीं। लेकिन ऐसा सही नहीं है। 


पिछले हफ़्ते दक्षिण भारत के अंग्रेज़ी अख़बार ‘द हिंदू’ में एक लेख छपा जिसके अनुसार यूरोप के अनुभव को देखते हुए ऐसा लगता है कि केवल वैक्सीन से ही कोरोना संक्रमण की श्रंखला को नहीं तोड़ा जा सकता और न ही इस महामारी का अन्त किया जा सकता है। यूरोप में पिछले वर्ष मार्च के पश्चात् दूसरी बार कोरोना संक्रमण के नये मामलों और मौतों में तेज गति से वृद्धि हो रही है। आज यूरोप पुनः कोरोना महामारी का मुख्य केन्द्र बन गया है।


इस वर्ष अक्टूबर के प्रारम्भ से ही संक्रमण के मामलों में रोजाना वृद्धि होनी शुरू हुई थी। यह वृद्धि प्रारम्भ में तीन देशों तक ही सीमित थी किन्तु बाद में यूरोप के सभी देशों में फैल गई जिसकी मुख्य वजह डेल्टा वेरियंट है।


पिछले सप्ताह यूरोप में 20 लाख नये मामले सामने आए जो महामारी की शुरूआत होने के बाद से सर्वाधिक है। कोरोना से पूरे विश्व में जितनी मौतें हुई है उनमें से आधे से ज्यादा इस महीने यूरोप में हुई है।


ऑस्ट्रिया, नीदरलैण्ड, जर्मनी, डेनमार्क तथा नोर्वे में प्रतिदिन संक्रमण के सर्वाधिक मामले हो रहे हैं। रोमानिया तथा यूक्रेन में भी कुछ दिनों पहले सर्वाधिक मामले हुए। पूरे यूरोप में हॉस्पीटल बेड्स तेज गति से भर रहे हैं।


विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान हैं कि वर्तमान से लगाकर अगले वर्ष मार्च तक यूरोप के अनेक देशों में हॉस्पीटल, हॉस्पीट्ल्स बेड्स और आई. सी. यू. पर भारी दबाव बना रहेगा। इसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया भर के देशों को कोविड के खतरे के खिलाफ अलर्ट रहने को कहा और जल्द से जल्द जरूरी कदम उठाने के निर्देश भी दिए हैं।


अधिकांश पश्चिमी यूरोप के देशों में टीकाकरण की दर बहुत ऊँची है। आयरलैण्ड में 90 प्रतिशत से अधिक लोगों को इस वर्ष सितम्बर तक दोनों टीके लग चुके है। फ्रांस में बिना टीका लगे लोगों की उन्मुक्त आवाजाही तथा कार्यालय जाने को मुश्किल बना दिया गया है। अगले वर्ष फरवरी से आस्ट्रिया में टीकाकरण अनिवार्य कर दिया जायेगा। आस्ट्रिया में इस वर्ष 22 नवम्बर से 3 सप्ताह का राष्ट्रव्यापी लॉक-डाउन भी लगाया गया है। इस देश में 65 प्रतिशत लोगों को दोनों टीके लगे हुए हैं फिर भी संक्रमण तेज गति से फैल रहा है।


ग़ौरतलब है कि यूरोप में संक्रमण के अधिकांश नये मामले उन लोगों के है जिनका टीकाकरण नहीं हुआ है, जिन्हे ब्रेकथू्र इन्फेक्शन हैं तथा दोनों टीका लगे हुए लोग भी भारी संख्या में अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं।


इस सबको देखते हुए भारत जैसे देश में भी कुछ कठोर कदम उठाने की ज़रूरत है वरना कोरोना की तीसरी ही नहीं चौथी-पाँचवी लहर भी आ सकती है। सरकार को कुछ ऐसे कदम उठाने की ज़रूरत है जिससे कि जनता खुद से ही आगे आकर टीका लगवाए। इससे कोरोना महामारी से कुछ तो राहत मिलेगी। साथ ही हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम जितनी सावधानी बरतेंगे उतना ही जल्दी इस बीमारी से बचे रहेंगे और छुटकारा पा सकेंगे। 


दुनिया भर के कई ऐसे देश हैं जहां लोगों को टीके की दोनो डोज़ लगने के बाद भी कोरोना हुआ है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि यह बीमारी हमारा पीछा इतनी आसानी से नहीं छोड़ने वाली है। किसी ने शायद ये ठीक ही कहा है ‘सावधानी हटी - दुर्घटना घटी’। इसलिए जितना हो सके अपने आप को इस बीमारी से बचाने की ज़रूरत है।


हाल ही में मशहूर फ़िल्म अभिनेता कमल हसन को भी कोविड संक्रमित पाया गया। उधर जिस तरह चीन में कोरोना से ठीक हो चुके लोगों को ये दोबारा हो रहा है, इस सबसे कोरोना के ख़तरे को हल्के में नहीं लिया जा सकता। जहां तक सम्भव हो घर से बाहर न निकलें। किसी को भी स्पर्श करने से बचें। साबुन से हाथ लगातार धोते रहें। घर के बाहर नाक और मुँह को ढक कर रखें। तो काफ़ी हद तक अपनी व औरों की सुरक्षा की जा सकती है। जब तक कोरोना का कोई माकूल इलाज सामने नहीं आता तब तक सावधानी बरतना और भगवत कृपा के आसरे ही जीना होगा।