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Monday, January 5, 2026

नेताओं की भाषा का गिरता स्तर चिंताजनक 

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसके नेताओं की गरिमा और संवाद की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। लेकिन हाल के वर्षों में, राजनीतिक भाषणों व बयानों में अभद्र टिप्पणियां व असंसदीय भाषा, गाली-गलौज का बढ़ता प्रयोग एक गंभीर मुद्दा बन गया है। यह न केवल संसद और विधानसभाओं तक सीमित है, बल्कि चुनावी रैलियों, मीडिया इंटरव्यू और सोशल मीडिया पर भी फैल चुका है। यह मुद्दा इतना संवेदनशील बन चुका है कि राजनीतिक दल चाहे कोई भी क्यों न हो उनके बिगड़े बोल, आम नागरिकों, पार्टी कार्यकर्ताओं और मीडिया पर एक नकारात्मक प्रभाव  डालते हैं। साथ ही, महिलाओं, विपक्षी दलों और पत्रकारों के प्रति नेताओं के दुर्व्यवहार भी आजकल चर्चा में है जो कि इन अमर्यादित नेताओं के सच्चे चरित्र को सामने लाता है।


संसदीय परंपराओं में, असंसदीय भाषा वह होती है जो अपमानजनक, अभद्र या व्यक्तिगत हमला करने वाली होती है। भारतीय संसद में, स्पीकर अक्सर ऐसी भाषा को हटाने का आदेश देते हैं, लेकिन संसद के बाहर ऐसे बयानों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता। राजनीतिक नेता अक्सर विपक्षी नेताओं को 'चोर', 'गद्दार' या इससे भी बदतर शब्दों से संबोधित करते हैं। चुनावी मौसम में यह और तीव्र हो जाता है, जहां व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की जगह ले लेते हैं। गौरतलब है कि कुछ नेताओं की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के युग में यह वायरल होकर लाखों लोगों तक पहुंच जाती है, जिससे समाज पर इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।


भारतीय वोटर या नागरिक अपनी पसंद अनुसार राजनीतिक दलों का समर्थन करते हैं और उन दलों के नेताओं को अपना आदर्श भी मानते हैं। जब नेता सार्वजनिक मंचों पर गाली-गलौज करते हैं, तो यह नागरिकों में नेतृत्व के प्रति सम्मान की भावना को कमजोर करता है। विशेषकर युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है, इससे प्रभावित होती है। वे सोचते हैं कि अगर देश के लोकप्रिय नेता खुले मंचों पर ही ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो सामान्य जीवन में क्या करते होंगे? इससे समाज में असहिष्णुता और हिंसा की संस्कृति पनपती है। उदाहरणस्वरूप, जब कोई नेता विपक्षी को 'कुत्ता' या 'सुअर' जैसे शब्दों से नवाजता है, तो यह न केवल उस व्यक्ति का अपमान है, बल्कि पूरे लोकतंत्र का मजाक उड़ाता है। नागरिकों में यह धारणा बनती है कि राजनीति एक गंदा खेल है, जहां नैतिकता की कोई जगह नहीं। परिणामस्वरूप, मतदान में उदासीनता बढ़ती है और लोग राजनीति से दूर होते जाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, कई नागरिकों का मानना है कि ऐसी भाषा से राजनीति की विश्वसनीयता घटती है, जिससे लोकतंत्र कमजोर होता है।


राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अपने नेताओं को आदर्श मानकर उनका अनुसरण करते हैं। जब शीर्ष नेता असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो यह कार्यकर्ताओं में भी वैसी ही प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है। चुनावी रैलियों में कार्यकर्ता विपक्षी दलों के खिलाफ नारे लगाते समय अक्सर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जो कभी-कभी हिंसक झड़पों में बदल जाता है। इससे दल के अंदर अनुशासनहीनता बढ़ती है और कार्यकर्ता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा में उलझ जाते हैं। इसके अलावा, जब कोई नेता अपनी ही पार्टी के सदस्यों के खिलाफ ऐसी भाषा इस्तेमाल करता है (जैसे असंतोषी सदस्यों को 'गद्दार' कहना), तो यह आंतरिक कलह को जन्म देता है। पार्टी कार्यकर्ता निराश होते हैं और उनका मनोबल गिरता है। लंबे समय में, यह दलों की एकजुटता को प्रभावित करता है और राजनीतिक स्थिरता को खतरे में डालता है। कार्यकर्ता सोचते हैं कि अगर नेता ही सम्मान नहीं रखते, तो वे क्यों रखें? इससे राजनीतिक संस्कृति में गिरावट आती है।

वहीं मीडिया पर इसका प्रभाव सबसे अधिक चिंताजनक है। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो नेताओं से सवाल पूछकर जवाबदेही सुनिश्चित करती है। लेकिन जब पत्रकार तीखे सवाल पूछते हैं, तो कई नेता उन पर व्यक्तिगत हमला करते हैं या अभद्र व्यवहार करते हैं। उदाहरण के तौर पर, प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेता पत्रकारों को 'पेड मीडिया' या 'दलाल' कहकर अपमानित करते हैं। कभी-कभी यह शारीरिक धमकी तक पहुंच जाता है, जैसे कैमरा छीनना या बाहर निकालना। इससे मीडिया की स्वतंत्रता पर खतरा मंडराता है। पत्रकार डर के मारे सवाल पूछने से हिचकिचाते हैं, जिससे जनता को सच्ची जानकारी नहीं मिलती। सोशल मीडिया पर नेता पत्रकारों के खिलाफ ट्रोल आर्मी को सक्रिय करते हैं, जो अभद्र टिप्पणियों से उन्हें परेशान करते हैं। यह न केवल मीडिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा को भी खतरे में डालता है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भारत में पत्रकारों पर हमलों की संख्या बढ़ने का उल्लेख है, और असंसदीय भाषा इसका एक प्रमुख कारण है।

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन उनके खिलाफ लिंगभेदी टिप्पणियां एक बड़ी समस्या हैं। नेता अक्सर महिला विपक्षी नेताओं की शारीरिक बनावट, कपड़ों या व्यक्तिगत जीवन पर अभद्र टिप्पणियां करते हैं। जैसे 'आइटम' या 'डांस करने वाली' जैसे शब्दों का प्रयोग। यह न केवल महिलाओं का अपमान है, बल्कि पूरे समाज में लिंग असमानता को बढ़ावा देता है। इससे महिला कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है और वे राजनीति में आने से हिचकिचाती हैं। विपक्षी दलों के प्रति भी ऐसी भाषा का प्रयोग आम है। नीतिगत मतभेदों की बजाय, नेता व्यक्तिगत हमलों में उलझ जाते हैं, जैसे परिवार को निशाना बनाना या जाति-धर्म पर टिप्पणियां। इससे राजनीतिक बहस का स्तर गिरता है और समाज में विभाजन बढ़ता है। पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार का जिक्र पहले हो चुका है, लेकिन महिलाओं पत्रकारों के साथ यह और गंभीर होता है, जहां लिंगभेदी टिप्पणियां जोड़ी जाती हैं।

यह सब देखकर लगता है कि भारतीय राजनीति में सभ्यता की कमी एक बड़ी चुनौती है। लेकिन इसका समाधान क्या है? सबसे पहले, नेताओं को स्वयं अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सख्त नियम लागू करने चाहिए और बाहर के मंचों पर भी नैतिक दिशानिर्देश। मीडिया को ऐसी भाषा को बढ़ावा न देकर, जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग करनी चाहिए। नागरिकों को भी सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री को शेयर न करके, विरोध जताना चाहिए। राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना चाहिए कि बहस नीतियों पर हो, न कि व्यक्तिगत हमलों पर। महिलाओं के प्रति सम्मान बढ़ाने के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम चलाए जा सकते हैं। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून सख्त किए जाएं।

लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असंसदीय भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। अगर हम एक मजबूत भारत चाहते हैं, तो राजनीतिक बयानों व भाषणों को सभ्य बनाना होगा। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया सब मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी हमारा लोकतंत्र सच्चे अर्थों में चमकेगा। 

Monday, May 26, 2025

राजनीति में अपशब्दों का बढ़ता प्रचलन !

भारत, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, एक ऐसा देश है जहाँ विविधता उसकी ताकत और चुनौती दोनों है। यहाँ की राजनीति में विभिन्न दलों के राजनेता अपने विचारों, नीतियों और नेतृत्व के माध्यम से जनता का विश्वास जीतने का प्रयास करते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में, भारतीय राजनीति में अपशब्दों और गैर-जिम्मेदाराना बयानों का बढ़ता उपयोग एक गंभीर मुद्दा बन गया है। यह न केवल सार्वजनिक विमर्श के स्तर को नीचे लाता है, बल्कि यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों, जैसे स्वतंत्रता, समानता, सम्मान और संवाद के खिलाफ भी है।



भारतीय राजनीति में अपशब्दों का प्रयोग पहले कतई नहीं होता था। लेकिन हाल के दशकों में इसकी तीव्रता और आवृत्ति में चिंताजनक वृद्धि हुई है। विभिन्न दलों के राजनेता, चाहे वे सत्ताधारी हों या विपक्षी, अक्सर एक-दूसरे पर निजी हमले करने, अपमानजनक टिप्पणियाँ करने और समाज को विभाजित करने वाले बयान देने में संकोच नहीं करते। उदाहरण के लिए, कुछ राजनेताओं ने अपने विरोधियों को नीच, मवाली, गद्दार, जैसे शब्दों से संबोधित किया है।



ऐसे बयानों का उद्देश्य अक्सर अपने समर्थकों को उत्तेजित करना और विपक्ष को कमज़ोर करना होता है। लेकिन यह लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तोड़ता है। 2017 में, एक सांसद ने एक धार्मिक आयोजन में जनसंख्या वृद्धि के लिए एक विशेष समुदाय को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा, देश में समस्याएँ खड़ी हो रही हैं जनसंख्या के कारण। इसके लिए हिंदू ज़िम्मेदार नहीं हैं। ज़िम्मेदार तो वो हैं जो चार बीवियों और चालीस बच्चों की बात करते हैं। इस तरह के बयान न केवल सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा देते हैं, बल्कि समाज में विभाजन को और गहरा करते हैं। बढ़ती जनसंख्या चिंता का विषय है पर उस पर प्रहार जनसंख्या नियंत्रण की नीति बना कर किया जाना चाहिए न कि केवल भड़काऊ बयान देकर। 



लोकतंत्र का गुण यह है कि ये जनता की भागीदारी, स्वतंत्र अभिव्यक्ति और विचारों के खुले आदान-प्रदान का मौक़ा देता है। भारत का संविधान, विशेष रूप से अनुच्छेद 19, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। लेकिन इसके साथ ही यह अपेक्षा भी करता है कि यह स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ प्रयोग की जाए। जब राजनेता अपशब्दों और गैर-जिम्मेदाराना बयानों का सहारा लेते हैं, तो वे लोकतंत्र के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। जब राजनेता नीतियों और विचारों के बजाय व्यक्तिगत हमलों और अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, तो यह विमर्श का स्तर गिराता है। सार्वजनिक जीवन में हमें एक-दूसरे की नीयत पर भरोसा करना चाहिए, हमारी आलोचना नीतियों पर आधारित होनी चाहिए, व्यक्तित्व पर नहीं। आज के काफ़ी राजनेताओं का व्यवहार इस सिद्धांत के विपरीत हो रहा है।



गत दस वर्षों से मुसलमानों के लेकर कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के लगातार आने वाले विरोधी बयानों ने देश में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी। उदाहरण के लिए, एक महिला नेता ने 2014 में एक सभा में लोगों को रामज़ादों और हरामज़ादों में बाँटने की बात कही। दूसरी तरफ़ सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत कहते हैं कि ‘हिंदू और मुसलमानों का डीएनए एक है, या मुसलमानों के बिना हिंदुत्व नहीं हैं।’ ऐसे विरोधाभासी बयानों से समाज में वैमनस्य और भ्रम की स्थिति फैलती है। जब राजनेता गैर-जिम्मेदाराना बयान देते हैं, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं, जैसे संसद और न्यायपालिका, के प्रति जनता के विश्वास को कम करता है। उदाहरण के लिए, 2024 में एक सांसद ने भाजपा पर संविधान को हज़ार घावों से खून बहाने का आरोप लगाया, जबकि भाजपा नेताओं ने विपक्षी नेताओं पर संविधान का अपमान करने का आरोप लगाया। इस तरह के आपसी आरोप-प्रत्यारोप संसद जैसे मंच की गरिमा को कम करते हैं। अपशब्दों और गैर-जिम्मेदाराना बयानों का उपयोग अक्सर असहमति को दबाने के लिए किया जाता है। पत्रकारों और आलोचकों को प्रेस्टीट्यूट जैसे शब्दों से संबोधित करना या उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करता है। यह लोकतंत्र के लिए खतरा है, क्योंकि असहमति और आलोचना लोकतंत्र के आधार हैं।


राजनेताओं के अपशब्द और गैर-जिम्मेदाराना बयान समाज पर गहरा प्रभाव डालते हैं। ये बयान न केवल जनता के बीच नकारात्मक भावनाओं को भड़काते हैं, बल्कि सामाजिक समरसता को भी नुकसान पहुँचाते हैं। सोशल मीडिया के युग में, जहाँ ये बयान तेजी से वायरल होते हैं, इनका प्रभाव और भी व्यापक हो जाता है। इससे न केवल राजनीतिक तनाव बढ़ता है, बल्कि सामाजिक ध्रुवीकरण भी होता है।


इसके अलावा, जब राजनेता लैंगिक, धार्मिक या जातीय आधार पर अपमानजनक टिप्पणियाँ करते हैं, तो यह समाज के कमज़ोर वर्गों, जैसे महिलाओं, अल्पसंख्यकों और दलितों के प्रति असंवेदनशीलता को बढ़ावा देता है। उदाहरण के लिए, 2013 में एक नेता ने अपनी ही पार्टी की सांसद को सौ टंच माल कहकर संबोधित किया, जो न केवल अपमानजनक था, बल्कि लैंगिक रूप से असंवेदनशील भी था।


इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं। चुनाव आयोग को राजनेताओं के अपशब्दों और गैर-जिम्मेदाराना बयानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। 2019 में, चुनाव आयोग ने कुछ नेताओं को नोटिस जारी किए थे, लेकिन ऐसी कार्रवाइयों को और प्रभावी करने की आवश्यकता है। मीडिया को भी गैर-जिम्मेदाराना बयानों को बढ़ावा देने के बजाय, स्वस्थ विमर्श को प्रोत्साहित करना चाहिए। सोशल मीडिया पर भी ऐसी सामग्री को नियंत्रित करने के लिए नीतियाँ बनानी चाहिए। जनता को जागरूक करने की आवश्यकता है कि वे ऐसे नेताओं का समर्थन न करें जो अपशब्दों और विभाजनकारी बयानों का सहारा लेते हैं। शिक्षा और जागरूकता अभियान इस दिशा में मदद कर सकते हैं। राजनेताओं को अपने बयानों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में आचार समितियों को और सक्रिय करना होगा।


जबसे संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण टीवी पर होना शुरू हुआ है, तब से देश के कोने-कोने में बैठे आम जन अपने राजनेताओं का आचरण देख कर उनके प्रति हेयदृष्टि अपनाने लगे हैं। युवा पीढ़ी पर तो इसका बहुत ही खराब असर पड़ रहा है। भगवान श्री कृष्ण भगवद गीता में कहते हैं कि बड़े लोग जैसा आचरण करते हैं तो समाज उनका वैसे ही अनुसरण करता है। नेताओं के उद्दंड व्यवहार से समाज में अराजकता और हिंसा बढ़ रही है जो सबके लिए चिंता का विषय होना चाहिए।  

Monday, February 3, 2025

सही दिशा में सुधार की ज़रूरत


बीते कई दशकों से ऐसा देखने में आया है कि गणतंत्रता या दिवस पर शहीदों को नमन कर, देश की दुर्दशा पर श्मशान वैराग्य दिखा कर, देश वासियों को लंबे-चौड़े वायदों की सौगात देकर देश का भला करने के संकल्प लिए जाते हैं। परंतु इन सब से क्या देश का भला हो सकता है? सुजलाम्, सुफलाम्, शस्यश्यामलाम्, भारतभूमि  में किसी चीज की कमी नहीं है। षट् ऋतुएं, उपजाऊ भूमि, सूर्य, चन्द्र, वरूण की असीम कृपा, रत्नगर्भा भूमि, सनातन संस्कृति, कड़ी मेहनत कर सादा जीवन जीने वाले भारतवासी, तकनीकी और प्रबंधकीय योग्यताओं से सुसज्जित युवाओं की एक लंबी फौज, उद्यमशीलता और कुछ कर गुजरने की ललक, क्या यह सब किसी देश को ऊंचाईयों तक ले जाने के लिए काफी नहीं है? दुनिया भर के कई देशों में प्रवासी भारतीयों ने कई क्षेत्रों में बुलंदियों को छुआ है। इसका मतलब यह हुआ कि भारतीयों में योग्यता की कोई कमी नहीं है। यदि सभी को सही मौक़ा और प्रोत्साहन मिले तो कठिन से कठिन लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।



अगर यह बात सही है तो फिर क्या वजह है कि खिलाडि़यों पर खर्चा करने की बजाय खेल के खर्चीले आयोजनों पर अरबों रूपया बर्बाद किया जाता है? कुछ हजार रुपये का कर्जा लेने वाले किसान आत्म हत्या करते हैं और लाखों करोड़ रुपये का बैंकों का कर्जा हड़पने वाले उद्योगपति ऐश। आधी जनता भूखे पेट सोती है और एफसीआई के गोदामों में करोड़ों टन अनाज सड़ता है। विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया भी ऐसी अव्यवस्था  का नंगा नाच दिखाने में पीछे नहीं रहते। नतीजतन आतंकवाद और नक्सलवाद चरम सीमा पर पहुंचता जा रहा है। सरकार के पास विकास के लिए धन की कमी नहीं है। पर धन का सदुपयोग कर विकास के कामों को ईमानदारी से करने वाले लोग व संस्थाएँ तो पैसे-पैसे के लिए धक्के खाते हैं और नकली योजनाओं पर अरबों रुपया डकारने वाले सरकार का धन बिना किसी रुकावट के खींच ले जाते हैं। ऐसे में स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्रता दिवस का क्या अर्थ लिया जाए? यही न कि हमने आज़ादी के नाम पर गोरे साहबों को धक्का देकर काले साहबों को बिठा दिया। पर काले साहब तो लूट के मामले में गोरों के भी बाप निकले। स्विटजरलैंड के बैंकों में सबसे ज्यादा काला धन जमा करने वालों में भारत काफी आगे है।



इसलिए जरूरत है हमारी सोच में बुनियादी परिवर्तन की। ‘सब चलता है’ और ‘ऐसे ही चलेगा’ कहने वाले इस लूट में शामिल हैं। जज्बा तो यह होना चाहिए कि ‘देश सुधरेगा क्यों नहीं?’ ‘हम ऐसे ही चलने नहीं देंगे’। अब सूचना क्रांति का जमाना है। हर नागरिक को सरकार के हर कदम को जांचने परखने का हक है। इस हथियार का इस्तेमाल पूरी ताकत से करना चाहिए। सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न हो उसमें में जो लोग बैठे हैं उन्हें भी अपने रवैये को बदलने की जरूरत है। एक मंत्री या मुख्यमंत्री रात के अंधेरे में मोटा पैसा खाकर उद्योगपतियों के गैर कानूनी काम करने में तो एक मिनट की देर नहीं लगाता। पर यह जानते हुए भी कि फलां व्यक्ति या संस्था राज्य के बेकार पड़े संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर सकती है, उसके साथ वही तत्परता नहीं दिखाता। आखिर क्यों? जब तक हम सही और अच्छे को बढ़ावा नहीं देंगे, उसका साथ नहीं देंगे, उसके लिए आलोचना भी सहने से नहीं डरेंगे तब तक कुछ नहीं बदलेगा। नारे बहुत दिये जाएँगे पर परिणाम केवल कागजों तक सीमित रह जाएँगे। सरकारों ने अगर अपने अधिकारियों के विरोध की परवाह करते हुए अपने कार्यकालों में कई सक्षम लोगों को यदि खुली छूट न दी होती तो अमूल और मेट्रो जैसे हजारों करोड़ के साम्राज्य कैसे खड़े होते?



आम आदमी के लिए रोजगार का सृजन करना हो या देश की गरीबी दूर करना हो, सरकार की नीतियों में बुनियादी बदलाव लाना होगा। केवल आंकड़े ही नहीं साक्षात परिणाम देखकर भी नीति बननी चाहिए। खोजी पत्रकारिता के चार दशक के मेरे अनुभव यही रहे कि बड़े से बड़ा भ्रष्टाचार बड़ी बेशर्मी से कर दिया जाता है। पर सच्चाई और अच्छाई का डटकर साथ देने की हिम्मत हमारे राजनेताओं में नहीं है। इसीलिए देश का सही विकास नहीं हो रहा। खाई बढ़ रही है। हताशा बढ़ रही है। हिंसा बढ़ रही है। पर नेता चारों ओर लगी आग देखकर भी कबूतर की तरह आंखे बंद किये बैठें हैं। इसलिए फिर से समाज के मध्यम वर्ग को समाज के हित में सक्रिय होना होगा। मशाल लेकर खड़ा होना होगा। टीवी सीरियलों और उपभोक्तावाद के चंगुल से बाहर निकल कर अपने इर्द-गिर्द की बदहाली पर निगाह डालनी होगी। ताकि हमारा खून खौले और हम बेहतर बदलाव के निमित्त बन सके। विनाश के मूक दृष्टा नहीं। तब ही हम सही मायने में आजाद हो पायेंगे। फिलहाल तो उन्हीं अंग्रेजों के गुलाम हैं जिनसे आजादी हासिल करने का मुगालता लिये बैठे हैं। हमारे दिमागों पर उन्हीं का कब्जा है। जो घटने की बजाय बढ़ता जा रहा है।



यह बातें या तो शेखचिल्ली के ख्वाब जैसी लगतीं हैं या किसी संत का उपदेश। पर ऐसा नहीं है। इन्हीं हालातों में बहुत कुछ किया जा सकता है। देश के हजारों लाखों लोग रात दिन निष्काम भाव से समाज के हित में समर्पित जीवन जी रहे हैं। हम इतना त्याग ना भी करें तो भी इतना तो कर ही सकते हैं कि अपने इर्द-गिर्द की गंदगी को साफ करने की ईमानदार कोशिश करें। चाहे वह गंदगी हमारे दिमागों में हो, हमारे परिवेश में हो या हमारे समाज में हो। हम नहीं कोशिश करेंगे तो दूसरा कौन आकर हमारा देश सुधारेगा? इसलिए यह ज़िम्मेदारी अकेले केवल देश के नेतृत्व कर रहे नेताओं का नहीं है, इसके लिए अफ़सरशाही, मीडिया और जनता सभी का होना चाहिए।
 

Monday, December 9, 2024

राजनेताओं के प्रेम प्रसंग


हमेशा की तरह राजनेताओं के प्रेम प्रसंग लगातार चर्चा में रहते हैं। ये बात दूसरी है कि ऐसे सभी मामलों को बल पूर्वक दबा दिया जाता है। जल्दी ही ऐसी घटनाएँ जनता के मानस से ग़ायब हो जाती हैं। पर दुनिया भर के राजनेताओं के चरित्र और आचरण पर जनता और मीडिया की पैनी निगाह हमेशा लगी रहती है। जब तक राजनेताओं के निजी जीवन पर परदा पड़ा रहता है, तब तक कुछ नहीं होता। पर एक बार सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। फिर तो उस राजनेता की मीडिया पर ऐसी धुनाई होती है कि कुर्सी भी जाती है और इज्जत भी। ज्यादा ही मामला बढ़ जाए, तो आपराधिक मामला तक दर्ज हो जाता है। विरोधी दल भी इसी ताक में लगे रहते हैं और एक दूसरे के खिलाफ सबूत इकट्ठे करते हैं। उन्हें तब तक छिपाकर रखते हैं, जब तक उससे उन्हें राजनैतिक लाभ मिलने की परिस्थितियाँ पैदा न हो जाऐं। मसलन चुनाव के पहले एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का काम जमकर होता है। पर यह भारत में ही होता हो, ऐसा नहीं है।
 



उन्मुक्त जीवन व विवाह पूर्व शारीरिक सम्बन्ध को मान्यता देने वाले अमरीकी समाज में भी जब उनके राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का अपनी सचिव मोनिका लेवांस्की से प्रेम सम्बन्ध उजागर हुआ तो अमरीका में भारी बवाल मचा था। इटली, फ्रांस व इंग्लैंड जैसे देशों में ऐसे सम्बन्धों को लेकर अनेक बार बड़े राजनेताओं को पद छोड़ने पड़े हैं। मध्य युग में फ्रांस के एक समलैंगिक रूचि वाले राजा को तो अपनी दावतों का अड्डा पेरिस से हटाकर शहर से बाहर ले जाना पड़ा। क्योंकि आए दिन होने वाली इन दावतों में पेरिस के नामी-गिरामी समलैंगिक पुरूष शिरकत करते थे, और जनता में उसकी चर्चा होने लगी थी। 



आजाद भारत के इतिहास में ऐसे कई मामले प्रकाश में आ चुके हैं, जहाँ मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों आदि के प्रेम प्रसंगों पर बवाल मचते रहे हैं। उड़ीसा के मुख्यमंत्री जी.बी. पटनायक पर समलैंगिकता का आरोप लगा था। आन्ध्र प्रदेश के राज्यपाल एन. डी. तिवारी का तीन महिला मित्रों के साथ शयनकक्ष का चित्र टी.वी. चैनलों पर दिखाया गया। अटल बिहारी वाजपयी का यह बयान कि वे न तो ब्रह्मचारी हैं और न ही विवाहित, काफी चर्चित रहा था। क्योंकि इसके अनेक मायने निकाले गए। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के सम्बन्धों को लेकर पार्टी में काफी विरोध हुआ था। ऐसे अनेक मामले हैं। पर यहाँ कई सवाल उठते हैं। 



घोर नैतिकतावादी विवाहेत्तर सम्बन्धों की कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हैं। उसे निकृष्ट कृत्य और समाज के लिए घातक बताते हैं। पर वास्तविकता यह है कि अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना राजाओं और नेताओं को छोड़, संतों और देवताओं के लिए भी अत्यंत दुष्कर कार्य रहा है। महान तपस्वी विश्वामित्र को स्वर्ग की अप्सरा मेनका ने अपनी पायल की झंकार से विचलित कर दिया। यहाँ तक कि भगवान विष्णु का मोहिनी रूप देखकर भोलेशंकर समाधि छोड़कर उठ भागे और मोहिनी से संतान उत्पत्ति की। इसी तरह अन्य धर्मों में भी संतो के ऐसे आचरण पर अनेक कथाऐं हैं। वर्तमान समय में भी जितने भी धर्मों के नेता हैं, वे गारण्टी से यह नहीं कह सकते कि उनका समूह शारीरिक वासना की पकड़ से मुक्त है। ऐसे में राजनेताओं से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे भगवान राम की तरह एक पत्नी व्रतधारी रहेंगे? विशेषकर तब जब सत्ता का वैभव सुन्दरियों को उन्हें अर्पित करने के लिए सदैव तत्पर रहता है। ऐसे में मन को रोक पाना बहुत कठिन काम है।


प्रश्न यह उठता है कि यह सम्बन्ध क्या पारस्परिक सहमति से बना है या सामने वाले का शोषण करने की भावना से? अगर सहमति से बना है या सामने वाला किसी लाभ की अपेक्षा से स्वंय को अर्पित कर रहा है तो राजनेता का बहुत दोष नहीं माना जा सकता। सिवाय इसके कि नेता से अनुकरणीय आचरण की अपेक्षा की जाती है। किन्तु अगर इस सम्बन्ध का आधार किसी की मजबूरी का लाभ उठाना है, तो वह सीधे-सीधे दुराचार की श्रेणी में आता है। लोकतंत्र में उसके लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। यह तो राजतंत्र जैसी बात हुई कि राजा ने जिसे चाहा उठवा लिया। 


ऐसे सम्बन्ध प्रायः तब तक उजागर नहीं होते, जब तक कि सम्बन्धित व्यक्ति चाहे पुरूष हो या स्त्री, इस सम्बन्ध का अनुचित लाभ उठाने का काम नहीं करता। जब वह ऐसा करता है, तो उसका बढ़ता प्रभाव, विरोधियों में ही नहीं, अपने दल में भी विरोध के स्वर प्रबल कर देता है। वैसे शासकों से जनता की अपेक्षा होती है कि वे आदर्श जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। पर अब हालात इतने बदल चुके हैं कि राजनेताओं को अपने ऐसे सम्बन्धों का खुलासा करने में संकोच नहीं होता। फिर भी जब कभी कोई असहज स्थिति पैदा हो जाती है, तो मामला बिगड़ जाता है। फिर शुरू होता है, ब्लैकमेल का खेल। जिसकी परिणिति पैसा या हत्या दोनों हो सकती है। जो राजनेता पैसा देकर अपनी जान बचा लेते हैं, वे उनसे बेहतर स्थिति में होते हैं जो पैसा भी नहीं देते और अपने प्रेमी या प्रेमिका की हत्या करवाकर लाश गायब करवा देते हैं। इस तरह वे अपनी बरबादी का खुद इंतजाम कर लेते हैं। 


मानव की इस प्रवृत्ति पर कोई कानून रोक नहीं लगा सकता। आप कानून बनाकर लोगों के आचरण को नियन्त्रित नहीं कर सकते। यह तो हर व्यक्ति की अपनी समझ और जीवन मूल्यों से ही निर्धारित होता है। अगर यह माना जाए कि मध्य युग के राजाओं की तरह राजनीति के समर में लगातार जूझने वाले राजनेताओं को बहुपत्नी या बहुपति जैसे सम्बन्धों की छूट होनी चाहिए तो इस विषय में बकायदा कोई व्यवस्था की जानी चाहिए। ताकि जो बिना किसी बाहरी दबाव के, स्वेच्छा से, ऐसा स्वतंत्र जीवन जीना चाहते हैं, उन्हें ऐसा जीने का हक मिले। पर यह सवाल इतना विवादास्पद है कि इस पर दो लोगों की एक राय होना सरल नहीं। इसलिए देश, काल और वातावरण के अनुसार व्यक्ति को व्यवहार करना चाहिए, ताकि वह भी न डूबे और समाज भी उद्वेलित न हो। 

Monday, August 26, 2024

अजमेर कांड के फ़ैसले का क्या असर होगा?


जहां कोलकाता की डॉक्टर के बलात्कार और नृशंस हत्या को लेकर सारे देश में निर्भया कांड की तरह भारी बवाल मच रहा है। वहीं 1992 में अजमेर में हुए देश के सबसे बड़े बलात्कार कांड का फ़ैसला भी पिछले हफ़्ते ही आया। इस फ़ैसले में 6 आरोपियों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई गई। जबकि 5 आरोपी पहले ही सज़ा काट चुके हैं और एक आरोपी ने आत्महत्या कर ली थी। अजमेर के एक प्रतिष्ठित महिला कॉलेज की 100 से अधिक छात्राओं को ब्लैकमेल करके उनसे बलात्कार किए गए। जिनकी अश्लील फ़ोटो शहर भर में फैल गई। इस कांड का मास्टर माइंड ज़िला यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष फ़ारूक़ चिश्ती था, जिसके साथ यूथ कांग्रेस का उपाध्यक्ष नफ़ीस चिश्ती और संयुक्त सचिव अनवर चिश्ती शामिल थे। इनके अलावा फ़ोटो लैब डेवलपर, पुरुषोत्तम, इक़बाल भाटी, कैलाश सोनी, सलीम चिश्ती, सोहेल गनी, ज़मीर हुसैन, अल्मास महाराज (फ़रार), इशरत अली, परवेज़ अंसारी, मोइज़ुल्ला, नसीम व फ़ोटो कलर लैब का मलिक महेश डोलानी भी शामिल थे। प्रदेश भर में भारी आंदोलन और देश भर में तहलका मचाने वाले इस कांड की जाँच राजस्थान के तत्कालीन मुख्य मंत्री भैरों सिंह शेखावत ने ख़ुफ़िया विभाग को सौंपी। ये पूरा मामला अजमेर से प्रकाशित ‘नवज्योति’ अख़बार के युवा पत्रकार, संतोष गुप्ता की हिम्मत से बाहर आया। चौंकाने वाली बात यह थी कि इस जघन्य कांड में शामिल ज़्यादातर अपराधी ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ की मज़ार के ख़ादिम (सेवादार) थे।
 


इनकी हवस का शिकार हुई लड़कियाँ प्रतिष्ठित हिंदू परिवारों से थीं। जिनमें से 6 ने बदनामी के डर से आत्महत्या कर ली। दर्जनों अपनी पहचान छुपा कर जी रही हैं। क्योंकि जो ज़ख़्म इन्हें युवा अवस्था में मिला उसका दर्द ये आजतक भूल नहीं पाईं हैं। चूँकि इस कांड में शामिल ज़्यादातर अपराधी मुसलमान हैं और शिकार हुई लड़कियाँ हिंदू, इसलिए इसे मज़हबी अपराध का जामा पहनाया जा सकता है और वो ठीक भी है। पर हमारे देश में हर 16 मिनट में एक बलात्कार होता है। इन सब बलात्कारों में शामिल अपराधी बहुसंख्यक हिंदू समाज से होते हैं। इतना ही नहीं, साधु, पादरी और मौलवी के वेश में, धर्म की आड़ में, अपने शिष्यों या शागिर्दों की बहू-बेटियों से दुष्कर्म करने वालों की संख्या भी ख़ासी बड़ी है। इसे राजनैतिक जामा भी पहनाया जा सकता है क्योंकि इस जघन्य कांड के मास्टर माइंड यूथ कांग्रेस के पदाधिकारी थे। पर क्या ये सही नहीं है कि देश भर में भाजपा व अन्य दलों के भी तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं के नाम लगातार बलात्कार जैसे कांडों में सामने आते रहते हैं। इसलिए महिलाओं के प्रति इस पाशविक मानसिकता को धर्म और राजनीति के चश्मे से हट कर देखने की ज़रूरत है। 



दुर्भाग्य से जब कभी ऐसी कोई घटना सामने आती है तो हर राजनैतिक दल उसका पूरा लाभ लेने की कोशिश करता है। ताकि जिस दल की सरकार के कार्यकाल में ऐसा हादसा हुआ हो उसे या जिस दल के नेता या उसके परिवार जन ने ऐसा कांड किया हो तो उन्हें घेरा जा सके। जब हमारे देश में हर 16 मिनट पर एक बलात्कार होता है और बच्चियों के साथ भी होता है, उनकी नृशंस हत्या भी होती है, तो क्या वजह है कि बलात्कार की एक घटना पर तो मीडिया और राजनीति में इतना बवाल मचता है और दूसरे हज़ारों इससे बड़े मामलों की बड़ी आसानी से अनदेखी कर दी जाती है, मीडिया द्वारा भी और समाज व राजनेताओं द्वारा भी। तब ये ज़रूरी होता है जब कभी बलात्कार के किसी कांड पर बवंडर मचे तो उसे इस नज़रिए से भी देखना चाहिए। ये बवंडर समस्या के हल के लिए हो रहा है या अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए। 


अब प्रश्न है कि ऐसे अपराधी को क्या सजा दे जाए? अपराध शास्त्र के विशेषज्ञ ये सिद्ध कर चुके हैं कि किसी अपराधी को मृत्यु दंड जैसी सज़ा सुनाने के बाद भी उसका दूसरों पर कोई असर नहीं पड़ता और इस तरह के अपराध फिर भी लगातार होते रहते हैं। पर दूसरी तरफ़ पश्चिमी एशिया के देशों में शरीयत क़ानूनों को लागू किया जाता है जिसमें चोरी करने वाले के हाथ काट दिए जाते हैं और बलात्कार करने वाले की गर्दन काट दी जाती है। पिछले ही हफ़्ते सोशल मीडिया पर दिल दहलाने वाला एक वीडियो प्रचारित हुआ, जिसमें दिखाया है कि कैसे 6 पाकिस्तानी युवाओं को 16 साल की लड़की से सामूहिक बलात्कार के आरोप में उनकी सरेआम तलवार से गर्दन काट दी गई। हादसे के अगले दिन वहाँ की अदालत ने अपना फ़ैसला सुना दिया। अक्सर इस बात का उदाहरण दिया जाता है कि शरीयत क़ानून में ऐसी सज़ाओं के चलते इन देशों में चोरी और बलात्कार की घटनाएँ नहीं होती। पर ये अर्धसत्य है। क्योंकि अक्सर ऐसी सज़ा पाने वाले अपराधी तो आम लोग होते हैं जो दुनिया के ग़रीब देशों से खाड़ी के देशों में रोज़गार के लिए आते हैं। जबकि ये तथ्य अब दुनिया से छिपा नहीं है कि खाड़ी के देशों के रईसज़ादे और शेख़ विदेशों से निकाह के नाम पर फुसला कर लाई गई सैंकड़ों लड़कियों का अपने हरम में रात-दिन शारीरिक शोषण करते हैं। फिर उन्हें नौकरानी बना देते हैं। इन सब पर शरीयत का क़ानून क्यों नहीं लागू होता? 


हमारे भी वेद ग्रंथों में बलात्कारी की सजा सुझाई गयी है। बलात्कारी का लिंग काट दिया जाए। उसके माथे पर एक स्थायी चिह्न बनाकर समाज में छोड़ दिया जाए। जिसे देखते ही कोई भी समझ जाए कि इसने बलात्कार कर किसी की जिंदगी बर्बाद की है। फिर ऐसे व्यक्ति से न कोई रिश्ता रखेगा, न दोस्ती। उसका परिवार भी उसे रखना पसंद नहीं करेगा। कोई नौकरी नहीं मिलेगी। कोई धंधा नहीं कर पायेगा। भीख भी नहीं मिलेगी। कोई डॉन भी हुआ, तो उसकी गैंग उसे छोड़ देगा। क्योंकि कोई गैंग नहीं चाहेगा कि उनकी गैंग किन्नरों की गैंग कहलाये। ऐसे में बलात्कारी या तो खुद ही आत्महत्या कर लेगा या अछूत बनकर जिल्लत भरी जिंदगी जियेगा। उसका यह हाल देख समाज में किसी और की यह अपराध करने की हिम्मत ही नहीं होगी। मगर जेल भेजने या फाँसी देने से अपराध नहीं रुकेगा।


अजमेर के मामले में 32 साल बाद आए फ़ैसले पर भी हमारी यही प्रतिक्रिया है कि ऐसे फ़ैसलों से समाज में कोई बदलाव नहीं आएगा। क्योंकि ‘जस्टिस डिलेड इज़ जस्टिस डिनाईड’ अर्थात् देर से न्याय मिलना न मिलने के समान होता है। इसलिए बात फिर वहीं अटक जाती है। महिलाओं के प्रति पुरुषों की इस पाशविक मानसिकता का क्या इलाज है? ये समस्या आज की नहीं, सदियों पुरानी है। हर समाज, हर धर्म और हर देश में महिलाएँ पुरुषों के यौन अत्याचारों का शिकार होती आयी हैं। बहुत कम को न्याय मिल पाता है, इसलिए 32 साल बाद अजमेर बलात्कार कांड का फ़ैसला कोई मायने नहीं रखता।    

Monday, September 19, 2022

सिर्फ़ उत्सवों से भूख नहीं मिटती


1789-90 में फ़्रांस में जब लोग भूखे मर रहे तो वहाँ की रानी मैरी एटोनी का ध्यान लोगों की बदहाली की ओर दिलाया गया। तो ऐशों आराम में लिप्त रानी बोली इनके पास रोटी खाने को नहीं है तो ये लोग केक क्यों नहीं खाते ? 


हर देश के हुक्मरान अपने देश की जनता को सम्बोधित करते हुए हमेशा बात तो करते हैं जनसेवा की, विकास की और अपने त्याग की लेकिन वास्तव में उनका आचरण वही होता है जो फ़्रांस में लुई सोलह और मैरी एटोनी कर रहे थे। ये सब नेता जनता के दुःख दर्द से बेख़बर रहकर मौज मस्ती का जीवन जीते हैं। इतना महँगा जीवन जीते हैं कि इनके एक दिन के खर्चे के धन से एक गाँव हमेशा के लिए सुधर जाए। जबकि आज राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है। पर लोकतंत्र में भी इनके ठाठ बाट किसी शहंशाह से कम नहीं होते। हाँ इसके अपवाद भी हैं। 



पर आज मीडिया से प्रचार करवाने का ज़माना है। इसलिये बिलकुल नाकारा, संवेदना शून्य, चरित्रहीन और भ्रष्ट नेता को भी मीडिया द्वारा महान बता दिया जाता है। हम सब जानते हैं कि गाय के दूध की छाछ, नीबू की शिंकजी, संतरे, मोसंबी, बेल या फ़ालसे का रस, लस्सी या ताज़ा गर्म दूध सेहत के लिये बहुत गुणकारी होता है। इनकी जगह जो आज देश में भारी मात्रा में बेचा और आम जनता द्वारा डट कर पिया जा रहा है वो हैं रंग बिरंगे ‘कोल्ड ड्रिंक्स’। जिनमें ताक़त के तत्व होना तो दूर शरीर को हानि पहुँचाने वाले रासायनिकों की भरमार होती है। फिर भी अगर आप किसी को समझाओ कि भैया ये कोल्ड ड्रिंक्स न पियो न पिलाओ, तो क्या वो आपकी बात मानेगा? कभी नहीं। क्योंकि विज्ञापन के मायाजाल ने उसका दिमाग़ कुंद कर दिया है। उसके सोचने, समझने और तर्क को स्वीकारने की शक्ति पंगु कर दी है। 


यही हाल नेताओं का भी होता है। जो मीडिया के मालिकों को मोटे फ़ायदे पहुँचाकर, पत्रकारों को रेवड़ी बाँट कर, दिन-रात अपना यशगान करवाते हैं। कुछ समय तक तो लोग भ्रम में पड़े रहते हैं और उसी नेता का गुणगान करते हैं। पर जब इन्हें ये एहसास होता है कि उन्हें कोरे आश्वासनों और वायदों के सिवाय कुछ नहीं मिला तो वे नींद से जागते हैं। पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। हालात बद से बदतर हो चुके होते हैं। फिर कोई नया मदारी आकर बंदर का खेल दिखाने लगता है और लोग उसकी तरफ़ आकर्षित हो जाते हैं। ये सिलसिला तब तक चलता है जब तक सच्चा लोकतंत्र नहीं आता। जब तक हर नागरिक और मीडिया अपने हुक्मरानों से कड़े सवाल पूछने शुरू नहीं करता। जब तक हर नागरिक मीडिया के प्रचार से हट कर अपने इर्दगिर्द के हालात पर नज़र नहीं डालता। 



विपक्षी दल सरकार को पूँजीपतियों का दलाल और जनता विरोधी बताते हैं। पर सच्चाई क्या है? कौनसा दल है जो पूँजीपतियों का दलाल नहीं है? कौनसा दल है जिसने सत्ता में आकर नागरिकों की आर्थिक प्रगति को अपनी प्राथमिकता माना हो? धनधान्य से भरपूर भारत का मेहनतकश आम आदमी आज अपने दुर्भाग्य के कारण नहीं बल्कि शासनतंत्र में लगातार चले आ रहे भ्रष्टाचार के कारण गरीब है। इन सब समस्याओं के मूल में है संवाद की कमी। जब तक सत्ता और जनता के बीच संवाद नहीं होगा तब तक गंभीर समस्याओं को नहीं सुलझाया जा सकता। इसलिए लगता है कि अब वो समय आ गया है कि जब दलों की दलदल से बाहर निकल कर लोकतंत्र को ज़मीनी स्तर पर मज़बूत किया जाए। जिसके लिए हमें 600 ई॰पू॰ भारतीय गणराज्यों से प्रेरणा लेनी होगी। जहां संवाद ही लोकतंत्र की सफलता की कुंजी था।  


देश के नेताओं के पास जब जनता को उपलब्धियों के नाम पर बताने को कुछ ठोस नहीं होता तो वे आये दिन रंग बिरंगे नए-नए उत्सव या कार्यक्रम आयोजित करवा कर जनता का ध्यान बटाते रहते हैं। इन कार्यक्रमों में गरीब देश की जनता का अरबों रुपया लगता है पर क्या इनके आयोजन से उसे भूख, बेरोज़गारी और मँहगाई से मुक्ति मिलती है? नहीं मिलती। उत्सव इंसान कब मनाता है जब उसका पेट भरा हो। 


आज हमारे देश को ही लें चारों ओर गंदगी का साम्राज्य बिखरा पड़ा है। करोड़ों देशवासी नारकीय स्थिति में, झुग्गी झोपड़ियों में, कीड़े-मकोड़ों की तरह ज़िंदगी जी रहे हैं। जब लोग मजबूर होते हैं तो नौकरी की तलाश में अपने गाँव को छोड़कर शहरों में बसने चले आते हैं। इससे वो गाँव तो उजड़ते ही हैं शहर भी नारकीय बन जाते हैं। 


सनातन धर्म में राजा से अपेक्षा की गयी है कि वो राजऋषि होगा। उसके चारों तरफ़ कितना ही वैभव क्यों न हो वो एक ऋषि की तरह त्याग और तपस्या का जीवन जिएगा। वो प्रजा को संतान की तरह पालेगा। खुद तकलीफ़ सहकर भी प्रजा को सुखी रखेगा। आज ऐसे कितने नेता आपकी नज़र में हैं? मीडिया के प्रचार से बचकर अपने सीने पर हाथ रखकर अगर ठीक से सोचा जाए तो एक भी नेता ऐसा नहीं मिलेगा। 75 वर्ष के आज़ाद भारत के इतिहास में कितने नेता हुए हैं जिनका जीवन लाल बहादुर शास्त्री जैसा सादा रहा हो? 


भगवान गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि ‘महाजनों येन गताः स पंथः’। महापुरुष जिस मार्ग पर चलते हैं वो अनुकरणीय बन जाता है। आज हमने नेताओं को ही महापुरुष मान लिया है। इसलिये उनके आचरण की नक़ल सब कर रहे हैं। फिर कहाँ मिलेगा त्याग-तपस्या का उदाहरण। हर ओर भोग का तांडव चल रहा है। फिर चाहे पर्यावरण का तेज़ी से विनाश हो, बेरोज़गारी व महंगाई चरम पर हो, शिक्षा के नाम पर वाट्सऐप विश्वविद्यालय चल रहे हों - तो देश तो बनेगा ही ‘महान’।


ज़रूरत है कि हम सब जागें, मीडिया पर निर्भर रहना और विश्वास करना बंद करें। अपने चारों ओर देखें कि क्या ख़ुशहाली आई है या नहीं? नहीं आई तो आवाज़ बुलंद करें। तब मिलेगा जनता को उसका हक़ और तब बनेगा भारत सोने की चिड़िया। केवल थोथे वायदों और प्रचार पर भरोसा करना बंद करें और अपने दिल और दिमाग़ से पूछें कि क्या देख रहे हो? तब नेता भी सुधरेंगे और देश भी। 

 

Monday, June 28, 2021

आईपीएस अपना कर्तव्य समझें


मार्च 2010 में भोपाल में मध्य प्रदेश शासन की ‘आर.सी.वी.पी. नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी’ ने आईपीएस अधिकारियों के बड़े समूह को संबोधित करने के लिए मुझे आमंत्रित किया। वहाँ शायद पाँच दर्जन आईपीएस अधिकारी देश के विभिन्न राज्यों से आकर कोर्स कर रहे थे। मुझे याद पड़ता है कि वे सन 2000 से 2008 के बैच के अधिकारी थे। मैं एक घंटा बोला और फिर तीन घंटे तक उनके अनेक जिज्ञासु प्रश्नों के उत्तर देता रहा। बाद में मुझे अकादमी के निदेशक व आईएएस अधिकारी संदीप खन्ना ने फ़ोन पर बताया कि इन युवा आईपीएस अधिकारियों ने अपनी कोर्स बुक में जो टिप्पणी दर्ज की वो इस प्रकार थी,
इस कोर्स के दौरान हमने विशेषज्ञों के जितने भी व्याख्यान सुने उनमें श्री विनीत नारायण का व्याख्यान सर्वश्रेष्ठ था।



आप सोचें कि ऐसा मैंने क्या अनूठा बोला होगा, जो उन्हें इतना अच्छा लगा? दरअसल, मैं शुरू से आजतक अपने को ज़मीन से जुड़ा जागरूक पत्रकार मानता हूँ। इसलिए चाहे मैं आईपीएस या आईएएस अधिकारियों के समूहों को सम्बोधित करूँ या वकीलों व न्यायाधीशों के समूहों को या फिर आईआईटी, आईआईएम या नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों को, जो भी बोलता हूँ, अपने व्यावहारिक अनुभव और दिल से बोलता हूँ। कभी-कभी वो इतना तीखा भी होता है कि श्रोताओं को डर लगने लगता है कि कोई इस निडरता से संवैधानिक पदों पर बैठे देश के बड़े-बड़े लोगों के बारे में इतना स्पष्ट और बेख़ौफ़ कैसे बोल सकता है। कारण है कि मैं किताबी ज्ञान नहीं बाँटता, जो प्रायः ऐसे विशेष समूहों को विशेषज्ञों व उच्च पदासीन व्यक्तियों द्वारा दिया जाता है। चूँकि मैंने गत चालीस वर्षों में कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों के अनैतिक आचरणों को, युवा अवस्था से ही, निडर होकर उजागर करने की हिम्मत दिखाई है, इसलिए मैंने जो देखा और भोगा है वही माँ सरस्वती की कृपा से वाणी में झलकता है। हर वक्ता को यह पता होता है कि जो बात ईमानदारी और मन से बोली जाती है, वह श्रोताओं के दिल में उतर जाती है। वही शायद उन युवा आईपीएस अधिकारियों के साथ भी हुआ होगा। 


उनके लिए उस दिन मैंने एक असमान्य विषय चुना था: ‘अगर आपके राजनैतिक आका आपसे जनता के प्रति अन्याय करने को कहें, तो आप कैसे न्याय करेंगे?’ उदाहरण के तौर पर राजनैतिक द्वेष के कारण या अपने अनैतिक व भ्रष्ट कृत्यों पर पर्दा डालने के लिए, किसी राज्य का मुख्य मंत्री किसी आईपीएस अधिकारी पर इस बात के लिए दबाव डाले कि वह किसी व्यक्ति पर क़ानून की तमाम वो कठोर धाराएँ लगा दे, जिस से उस व्यक्ति को दर्जनों मुक़दमों में फँसा कर डराया या प्रताड़ित किया जा सके। ऐसा प्रायः सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं व राजनैतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ करवाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों से देश के प्रतिष्ठित पत्रकारों पर भी इस तरह के आपराधिक मुक़दमें क़ायम करने की कुछ प्रांतों में अचानक बाढ़ सी आ गई है। हालाँकि हाल ही में भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने देश के मशहूर पत्रकार विनोद दुआ पर हिमाचल प्रदेश में की गई ऐसी ही एक ग़ैर ज़िम्मेदाराना एफ़आईआर को रद्द करते हुए 117 पन्नों का जो निर्णय दिया है, उसमें आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों के विरुद्ध मुखर रहे मराठी अख़बार ‘केसरी’ के संपादक लोकमान्य तिलक से लेकर आजतक दिए गए विभिन्न अदालतों के निर्णयों का हवाला देते हुए पत्रकारों की स्वतंत्रता की हिमायत की है और कहा है कि यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक है। 


सवाल है कि जब मुख्य मंत्री कार्यालय से ही ग़लत काम करने को दबाव आए तो एक आईपीएस अधिकारी क्या करे? जिसमें ईमानदारी और नैतिक बल होगा, वह अधिकारी ऐसे दबाव को मानने से निडरता से मना कर देगा। चार दशकों से मेरी मित्र, पुलिस महानिदेशक रही, महाराष्ट्र की दबंग पुलिस अधिकारी, मीरा बोरवांकर, मुंबई के 150 साल के इतिहास में पहले महिला थी, जिसे मुंबई की क्राइम ब्रांच का संयुक्त पुलिस आयुक्त बनाया गया। फ़िल्मों में देख कर आपको पता ही होगा कि मुंबई अंडरवर्ल्ड के अपराधों के कारण कुविख्यात है। ऐसे में एक महिला को ये ज़िम्मेदारी दिया जाना मीरा के लिए गौरव की बात थी। अपने कैरीयर के किसी मोड़ पर जब उसे महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री के निजी सचिव का फ़ोन आया, जिसमें उससे इसी तरह का अनैतिक काम करने का निर्देश दिया गया तो उसने साफ़ मना कर दिया, यह कह कर, कि मैं ऐसे आदेश मौखिक रूप से नहीं लेती। मुख्य मंत्री जी मुझे लिख कर आदेश दें तो मैं कर दूँगी। मीरा के इस एक स्पष्ट और मज़बूत कदम ने उसका शेष कार्यकाल सुविधाजनक कर दिया। कैरियर के अंत तक फिर कभी किसी मुख्य मंत्री या गृह मंत्री ने उससे ग़लत काम करने को नहीं कहा। 


कोई आईपीएस अधिकारी जानते हुए भी अगर ऐसे अनैतिक आदेश मानता है, तो स्पष्ट है कि उसकी आत्मा मर चुकी है। उसे या तो डर है या लालच। डर तबादला किए जाने का और लालच अपने राजनैतिक आका से नौकरी में पदोन्नति मिलने का या फिर अवैध धन कमाने का। पर जो एक बार फिसला फिर वो रुकता नहीं। फिसलता ही जाता है। अपनी ही नज़रों में गिर जाता है। हो सकता है इस पतन के कारण उसके परिवार में सुख शांति न रहे, अचानक कोई व्याधि आ जाए या उसके बच्चे संस्कारहीन हो जाएं। ये भी हो सकता है कि वो इस तरह कमाई अवैध दौलत को भोग ही न पाए। सीबीआई के एक अति भ्रष्ट माने जाने वाले चर्चित निदेशक की हाल ही में कोरोना से मृत्यु हो गई। जबकि उन्हें सेवानिवृत हुए कुछ ही समय हुआ था। उस अकूत दौलत का उन्हें क्या सुख मिला? दूसरी तरफ़ उत्तर प्रदेश के 1972 बैच के आईपीएस अधिकारी राजीव माथुर, जो आईपीएस के सर्वोच्च पद, निदेशक आईबी और भारत के मुख्य सूचना आयुक्त रहे, वे सेवानिवृत हो कर आज डीडीए के साधारण फ़्लैट में रहते हैं। देश में आईबी के किसी भी अधिकारी से आप श्री माथुर के बारे में पूछेंगे तो वह बड़े आदर से उनका नाम लेते हैं। एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने तो उन्हें भगवान तक की उपाधि दी। 


आम जनता के कर के पैसे से वेतन और सुविधाएँ लेने वाले आईपीएस अधिकारी, अगर उस जनता के प्रति ही अन्याय करेंगे और केवल अपना घर भरने पर दृष्टि रखेंगे, तो वे न तो इस लोक में सम्मान के अधिकारी होंगे और न ही परलोक में। दुविधा के समय ये निर्णय हर अधिकारी को अपने जीवन में स्वयं ही लेना पड़ता है। भोपाल में जो व्यावहारिक नुस्ख़े उन आईपीएस अधिकारियों को मैंने बताए थे, वो तो यहाँ सार्वजनिक नहीं करूँगा, क्योंकि वो उनके लिए ही थे। पर जिन्होंने उन्हें अपनाया होगा उनका आचरण आप अपने ज़िले अनुभव कर रहे होंगे।