Monday, July 13, 2020

पुलिसवालों की पीड़ा समझिए

कानपुर में जिस तरह विकास दुबे ने 8 पुलिसवालों की निर्मम हत्या की उससे प्रदेश की ही नहीं देश भर के पुलिसकर्मियों में आक्रोश है। इस पूरे घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश शासन के कुछ वरिष्ठ  अधिकारियों और नेताओं की भूमिका पर तमाम सवाल उठ रहे हैं। जिन्होंने इस जघन्य कांड के पहले और बाद भी विकास दुबे की मदद की। अभी बहुत सारे तथ्य सामने आने बाक़ी हैं जिन्हें दबाने के उद्देश्य से ही विकास दुबे को मारा गया। 


इसी संदर्भ में पुलिसवालों की तरफ़ से ये विचरोतेजक पोस्ट सोशल मीडिया पर आई है। 

मैं पुलिस हूँ...

मैं जानता था कि फूलन देवी ने नरसंहार किया है। मैं जानता था कि शाहबुद्दीन ने चंद्रशेखर प्रसाद के तीन बेटों को मारा है। मैं जानता था कि कुलदीप सेंगर का चरित्र ठीक नही है और उसने दुराचार किया है। मैं जानता था कि मलखान सिंह बिशनोई ने भँवरी देवी को मारा है। मैं जानता हूँ की दिल्ली के दंगो में अमानतुल्लाह खान ने लोगों को भड़काया। मैं जानता हूँ कि सैयद अली शाह गिलानी, यासीन मालिक, मीरवाज उमर फारूक आंतंकवादियो का साथ देते हैं।  लेकिन संविधान ने बोला की चुप ये सभी नेता है इनके बॉडीगार्ड बनो में बना क्यूँकि मैं पुलिस हूँ। आपको भी पता था की इशरत जहाँ, तुलसी प्रजापति आतंकवादी थे लेकिन फिर भी आपने हमारे वंजारा साहेब को कई सालों तक जेल में रखा। मैं चुप रहा क्योंकि में पुलिस हूँ। कुछ सालों पहले हमने विकास दुबे जिसने एक नेता का ख़ून किया था को आपके सामने प्रस्तुत किया था लेकिन गवाह के अभाव में आपने उसे छोड़ दिया था, मैं चुप रहा क्योंकि में पुलिस हूँ।


लेकिन माईलॉर्ड विकास दुबे ने इस बार ठाकुरों को नही, चंद्रशेखर के बच्चों को नही, भँवरी देवी को नही किसी नेता को नही मेरे अपने 8 पुलिस वालों की बेरहमी से हत्या की थी, उसको आपके पास लाते तो देर से ही सही लेकिन आप मुझे उसका बॉडीगार्ड बनने पर ज़रूर मजबूर करते इसी उधेड़बुन और डर से मैंने रात भर उज्जैन से लेकर कानपुर तक गाड़ी चलायी और कब नींद आ गयी पता ही नही चला और ऐक्सिडेंट हो गया और उसके बाद की घटना सभी को मालूम है। 


माईलॉर्ड कभी सोचिएगा की अमेरिका जैसे सम्पन्न और आधुनिक देश में पाँच सालों में पुलिस ने 5511 अपराधियों का एंकाउंटर किया वहीं हमारे विशाल जनसंख्या वाले देश में पिछले पाँच साल में 824 एंकाउंटर हुए और सभी पुलिस वालों की जाँच चल रही है।  


माईलॉर्ड मैं यह नही कह रहा हूँ की एंकाउंटर सही है लेकिन बड़े बड़े वकीलों द्वारा अपराधियों को बचाना फिर उनका राजनीति में आना और फिर आपके द्वारा हमें उनकी सुरक्षा में लगाना अब बंद होना चाहिये, सच कह रहा हूँ अब थकने लगे हैं हम, संविधान जो कई दशकों पहले लिखा गया था उसमें अब कुछ बदलाव की आवश्यकता है यदि बदलाव नही हुए तो ऐसी घटनाएँ होती रहेंगी और हम और आप कुछ दिन हाय तौबा करने के बाद चुप हो जाएँगे।


मूल में जाइए और रोग को जड़ से ख़त्म कीजिए, रोग हमारी क़ानून प्रणाली में है जिसे सही करने की आवश्यकता है अन्यथा देर सवेर ऐसी घटनाएं को सुनने के लिए तैयार रहिये 


पुलिस को स्वायत्ता दीजिए। हमें इन नेताओं के चंगुल से बचाइये ताकि देश और समाज अपने आप को सुरक्षित महसूस कर सके।


प्रार्थी 

नेताओं की कठपुतली 

हिंदुस्तान की पुलिस


यह बड़े दुख और चिंता की बात है कि कोई भी राजनैतिक दल पुलिस व्यवस्था के मौजूदा स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहता। इसलिए न सिर्फ पुलिस आयोगों और समितियों की सिफारिशों की उपेक्षा कर दी जाती है बल्कि आजादी के 73 साल बाद भी आज देश औपनिवेशिक मानसिकता वाले संविधान विरोधी पुलिस कानून को ढो रहा है। इसलिए इस कानून में आमूलचूल परिवर्तन होना परम आवश्यक है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की पुलिस को जनोन्मुख होना ही पड़ेगा। पर राजनेता ऐसा होने दें तब न। 


आज हर सत्ताधीश राजनेता पुलिस को अपनी निजी जायदाद समझता है। नेताजी की सुरक्षा, उनके चारो ओर कमांडो फौज का घेरा, उनके पारिवारिक उत्सवों में मेहमानों की गाडि़यों का नियंत्रण, तो ऐसे वाहियात काम है ही जिनमें इस देश की ज्यादातर पुलिस का, ज्यादातर समय जाया होता है। इतना ही नहीं अपने मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए या उन्हें नियंत्रित करने के लिए पुलिस का दुरूपयोग अपने कार्यकर्ताओं और चमचों के अपराधों को छिपाने में भी किया जाता है। स्थानीय पुलिस को स्थानीय नेताओं से इसलिए भय लगाता है क्योंकि वे जरा सी बात पर नाराज होकर उस पुलिस अधिकारी या पुलिसकर्मी का तबादला करवाने की धमकी देते हैं और इस पर भी सहयोग न करने वाले पुलिस अधिकारी का तबादला करवा देते हैं। इसका नतीजा ये हुआ है कि अब निचले स्तर के पुलिसकर्मियों के बीच तेजी से जातिवाद फैलता जा रहा है। अपनी जाति के लोगों को संरक्षण देना और अपनी जाति के नेताओं के जा-बेजा हुक्मों को मानते जाना आज प्रांतीय पुलिस के लिए आम बात हो गई है। खामियाजा भुगत रही है वह जनता जिसके वोटों से ये राजनेता चुने जाते हैं। किसी शहर के बुजुर्ग और प्रतिष्ठित आदमी को भी इस बात का भरोसा नहीं होता कि अगर नौबत आ जाए तो पुलिस से उनका सामना सम्माननीय स्थिति में हो पाएगा। एक तरफ तो हम आधुनिकरण की बात करते हैं और जरा-जरा बात पर सलाह लेने पश्चिमी देशों की तरफ भागते हैं और दूसरी तरफ हम उनकी पुलिस व्यवस्था से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं हैं। वहां पुलिस जनता की रक्षक होती है, भक्षक नहीं। लंदन की भीड़ भरी सड़क पर अक्सर पुलिसकर्मियों को बूढ़े लोगों को सड़क पार करवाते हुए देखा जा सकता है। पश्चिम की पुलिस ने तमाम मानवीय क्रिया कलापो से वहां की जनता का विश्वास जीत रखा है। जबकि हमारे यहां यह स्वप्न जैसा लगेगा।


पुलिस आयोग की सिफारिश से लेकर आज तक बनी समितियों की सिफारिशों को इस तरह समझा जा सकता है; पुलिस जनता के प्रति जवाबदेह हो। पुलिस की कार्यप्रणाली पर लगातार निगाह रखी जाए। उनके प्रशिक्षण और काम की दशा पर गंभीरता से ध्यान दिया जाए। उनका दुरूपयोग रोका जाए। उनका राजनीतिकरण रोका जाए। उन पर राजनीतिक नियंत्रण समाप्त किया जाए। उनकी जवाबदेही निर्धारित करने के कड़े मापदंड हों। पुलिस महानिदेशकों का चुनाव केवल राजनैतिक निर्णयों से प्रभावित न हों बल्कि उसमें न्यायपालिका और समाज के प्रतिष्ठित लोगों का भी प्रतिनिधित्व हो। इस बात की आवश्यकता महसूस की गई कि पुलिस में तबादलों की व्यवस्था पारदर्शी हो। उसके कामकाज पर नजर रखने के लिए निष्पक्ष लोगों की अलग समितियां हों। पुलिस में भर्ती की प्रक्रिया में व्यापक सुधार किया जाए ताकि योग्य और अनुभवी लोग इसमें आ सकें। आज की तरह नहीं जब सिफारिश करवा कर या रिश्वत देकर अयोग्य लोग भी पुलिस में भर्ती हो जाते हैं। जो सिपाही या इन्सपेक्टर मोटी घुस देकर पुलिस की नौकरी प्राप्त करेगा उससे ईमानदार रहने की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? पुलिस जनता का विश्वास जीते। उसकी मददगार बनें। अपराधों की जांच बिना राजनैतिक दखलंदाज़ी के और बिना पक्षपात के फुर्ती से करे। लगभग ऐसा कहना हर समिति की रिपोर्ट का रहा है। पर लाख टके का सवाल यह है कि क्या हो यह तो सब जानते हैं, पर हो कैसे ये कोई नहीं जानता। राजनैतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई भी सुधार सफल नहीं हो सकता।

Monday, July 6, 2020

कैसे जाने मीडिया ईमानदार है?

पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में पहले दिन से पढ़ाया जाता है कि पत्रकारिता के तीन उद्देश्य होते हैं; सूचना देना, शिक्षा देना व मनोरंजन करना। हर पत्रकार चाहे वो प्रिंट मीडिया का हो या टीवी मीडिया का ये बात अच्छी तरह जानता है। पर आम पाठकों और दर्शकों को इसकी सही जानकारी नहीं होती। इस लेख को पढ़ने के बाद, आप आज से ही एक विशेषज्ञ की तरह ये परीक्षण कर पाएँगे जो टीवी चैनल आप देखते हैं या जो अख़बार आप पढ़ते हैं वह पत्रकारिता के उद्देश्य पूरे कर रहा है या पत्रकारिता के आवरण में कुछ और कर रहा है। 


पहले समझ लें की सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का सही अर्थ क्या है। मीडिया का काम आपको सूचना देना है। सूचना वो हो जो आपसे छिपाई जा रही हो। उसे खोज कर निकालना और आप तक पहुँचाना होता है। साफ़ ज़ाहिर है कि सरकार की घोषणाएँ, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और प्रधान मंत्रियों के वक्तव्य और उन पर बहस इस श्रेणी में नहीं आते। उन्हें जनता तक पहुँचाने का काम सरकार का दूरदर्शन, उसकी समाचार एजेंसियाँ और प्रेस सूचना विभाग रात दिन करता है। इसे सूचना की जगह प्रौपोगैंडा कहा जाता है। जनता के लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि मीडिया आपको बताए कि जो दावे और घोषणाएँ की जा रही हैं, उनमें कितनी ईमानदारी है ? क्या उनको पूरा करने की क्षमता और साधन सरकार के पास हैं? इससे पहले मौजूदा या पिछली सरकारों ने इसी तरह की घोषणाएँ कितनी ही बार कीं और क्या उन्हें पूरा किया गया? मीडिया आपको यह भी बता सकता है कि इन योजनाओं का घोषित लक्ष्य क्या है और पर्दे के पीछे छिपा हुआ लक्ष्य क्या है। कहीं जनसेवा के नाम पर किसी बड़े औद्योगिक घराने को बड़ा मुनाफ़ा कमाने के लिए तो यह नहीं किया जा रहा। अब आप खुद ही तय कर लीजिए, कि कितने टीवी चैनल और अख़बार आपके हित में ऐसी सूचनाएँ निडरता से देते हैं या सरकार के चाटुकार बनकर उनकी घोषणाओं और बयानबाज़ी पर बल्लियाँ उछलते हैं और नक़ली बहसें करवा कर सत्तारूढ़ दलों की चाटुकारिता करते हैं। मतलब ये कि ऐसे सब चैनल और अख़बार आपको खबरों के नाम पर सूचना नहीं दे रहे। यानी ये पत्रकारिता नहीं कर रहे। 


ये दूसरी बात है की इस तरह की भांडगिरी करने वालों को सरकारें बड़े विज्ञापन, नागरिक अलंकरण, राज्यसभा की सदस्यता या अन्य ओहदे देकर उपकृत करती है।

 

शिक्षा का तात्पर्य है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंबा होने के नाते आपके समवैधानिक अधिकारों की जानकारी आपको लगातार देता रहे और उनपर होने वाले किसी भी आघात पर आपको जागृत करता रहे। जहां तक बात पर्यावरण, भूगोल, इतिहास, वित्त जैसे विषयों की है, तो ये सब शिक्षा तो आपको विभिन्न स्तरों पर शिक्षा संस्थानों में मिलती ही है। यहाँ मीडिया का काम यह है कि क्षेत्रों में जो कुछ घट रहा है और उसका प्रभाव आपके जीवन में कैसा पड़ रहा है, उन विषयों को अपने विशेष समवाददाताओं या उस क्षेत्र के विशेषज्ञों के माध्यम से आप तक सूचना पहुँचाए। यह कहा जा सकता है कि इस मामले में मीडिया काफ़ी हद तक सजग है और आपको सही सूचना दे रहा है। मगर जो मुख्य शिक्षा लोकतांत्रिक अधिकारों या दमन के विरुद्ध दी जानी चाहिए उस काम में हमारे देश का बहुसंख्यक मीडिया विफल रहा है।           


जहां तक मनोरंजन की बात है, तो मीडिया में मनोरंजन देने का काम करने के लिए फ़िल्म, नाटक, साहित्य, संगीत व कला जैसे क्षेत्रों की अपनी संरचनाएँ हैं , जो आम जनता का मनोरंजन करती हैं। जिस संदर्भ  में यहाँ बात की जा रही है उसमें वैसे मनोरंजन का दायरा बहुत सीमित होता है। हालाँकि आजकल असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए मीडिया कई तरह के हल्के फुलके मनोरंजन, समाचारों के साथ दिखाने लगा है। पर उसमें गुणवत्ता का अभाव होता है। प्रायः यह मनोरंजन काफ़ी फूहड़ होता है। जिससे उस मीडिया हाउस की गरिमा कम होती है। इस संदर्भ में ऐसा माना जाता है कि खेलकूद, साहित्य, संस्कृति और फ़िल्मों आदि के बारे में समाचार देकर मनोरंजन का दायित्व  पूरा किया जा सकता है। 


1987 की बात है, मैं एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक में समवाददाता था और स्वास्थ्य मंत्रालय पर भी ख़बर देना मेरा दायित्व था। एक दिन मुझे दिल्ली पाँच सितारा ताज होटल में देश की प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन को कवर करने जाना था। जिसका उद्घघाटन तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मोती लाल वोरा कर रहे थे। सारा दिन सम्मेलन में बैठने के बाद मैंने पाँच कॉलम की जो खबर लिखी, उसकी पहली लाइन ये थी कि ‘देश के ग़रीबों के स्वास्थ्य पर चिंता जताने के लिए आज एक राष्ट्रीय सम्मेलन दिल्ली के पाँच सितारा होटल में सम्पन्न हुआ’ उसके बाद क़रीब 12 पैराग्राफ़ में, 12 प्रांतों से आए ग्रामीण स्वास्थ्य सेवकों की समस्याओं को लिखा।अंतिम पैराग्राफ़ में मैंने एक लाइन लिखी, ‘सम्मेलन का उद्टन करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मोती लाल वोरा ने कहा, सन 2000 तक हम देश में सबको स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान कर देंगे।’ ज़ाहिर है कि सामान्य रिपोर्टिंग से यह प्रारूप बिल्कुल अलग था। आप अपने अख़बार उठा कर देख लीजिए इस तरह की ख़बर में तीन चौथाई जगह मंत्रियों के भाषण को दी जाती है। जब मुझसे सम्पादक ने पूछा कि मैंने मंत्री के भाषण को ज़्यादा जगह क्यों नहीं दी ? तो मेरा उत्तर था कि मंत्री महोदय तो ये दावा देश के विभिन्न प्रांतों में आए दिन करते ही रहते हैं और वो छपता भी रहता है, उसमें नई बात क्या है? नई बात मेरे लिए यह थी कि मुझे एक ही जगह बैठ कर देश भर के प्राथमिक स्वास्थ्य सेवकों से उनकी दिक़्क़तें जानने का मौक़ा मिला, जिसे मैं बिना इन राज्यों में जाए कभी जान ही नहीं पाता। इस पर सम्पादक महोदय भी हंस दिए और उन्होंने रिपोर्ट की तारिफ़ भी की।       

Monday, June 29, 2020

नागर विमानन महानिदेशालय में इतने घोटाले क्यों ?

नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीननागर विमानन महानिदेशालय’ (डीजीसीए) की ज़िम्मेदारी है कि निजी या सरकारी क्षेत्र की जो भी हवाई सेवाएँ देश में चल रही हैं उन पर नियंत्रण रखना। हवाई जहाज़ उड़ाने वाले पाइलटों की परीक्षा करना। गलती करने पर उन्हें सज़ा देना और हवाई जहाज़ उड़ाने का लाइसेंस प्रदान करना। बिना इस लाइसेंस के कोई भी पाइलट हवाई जहाज़ या हेलिकॉप्टर नहीं उड़ा सकता। इसके साथ ही हर एयरलाइन की गतिविधियों पर निगरानी रखना, नियंत्रण करना, उन्हें हवाई सेवाओं के रूट आवंटित करना और किसी भी हादसे की जाँच करना भी इसी निदेशालय के अधीन आता है। 


ज़ाहिर है कि अवैध रूप से मोटा लाभ कमाने के लिए एयरलाईनस प्रायः नियमों के विरुद्ध सेवाओं का संचालन भी करती हैं। जिनके पकड़े जाने पर उन्हें दंडित किया जाना चाहिए और अगर अपराध संगीन हो तो उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि इन सब अधिकारों के चलते निदेशालय के अधिकारियों की शक्ति असीमित है जिसका दुरुपयोग करके वे अवैध रूप से मोटी कमाई भी कर सकते हैं। 


हर मीडिया हाउस में नागरिक उड्डयन मंत्रालय और नागर विमानन महानिदेशालय को कवर करने के लिए विशेष रिपोर्टर होते हैं। जिनका काम ऐसी अनियमित्ताओं को उजागर कर जनता के सामने लाना होता है। क्योंकि उड़ान के दौरान की गई कोई भी लापरवाही आम जनता की ही नहीं अतिविशिष्ठ यात्रियों की भी जान ले सकती है। इसलिए इन संवाददाताओं को मुस्तैदी से अपना काम करना चाहिये। पर अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि ये लोग अपना काम मुस्तैदी से करने में, कुछ अपवादों को छोड़ कर, नाकाम रहे हैं। इसका कारण भी स्पष्ट है कि ये एयरलाइनस ऐसे रेपोर्टर्ज़ या उनके सम्पादकों कोप्रोटोकॉलके नाम पर तमाम सुविधाएँ प्रदान करती हैं। जैसे कि मुफ़्त टिकट देना, टिकटअपग्रेडकर देना या गंतव्य पर पाँच सितारा आतिथ्य और वाहन आदि की सुविधाएँ प्रदान करना। इसका स्पष्ट उदाहरण जेट एयरवेज के अनेक घोटाले  हैं। नरेश गोयल की इस एयरलाइन ने अपने जन्म से ही इतने घोटाले किए हैं कि इसे कब का बंद हो जाना चाहिए था। किंतु नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अफ़सरों, राजनेताओं और मीडिया में अपने ऐसे ही सम्बन्धों के कारण ये एयरलाइंस दो दशक से भी ज़्यादा तक निडर होकर घोटाले करती रही।    


इन हालातों में, देश के हित में जेट एयरवेज़ के घोटालों को उजागर करने का काम, दो दशकों से भी ज़्यादा से मेरे सहयोगी और  दिल्ली के कालचक्र समाचार के प्रबंधकीय सम्पादक रजनीश कपूर ने किया। इसी आधार पर सीबीआई और सीवीसी में जेट के विरूद्ध दर्जनों शिकायतें दर्ज की और दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका भी दायर की। इस तरह चार वर्षों तक लगातार सरकार पर दबाव बनाने के बाद ही जेट एयरवेज़ पर कार्यवाही शुरू हुई। जिसका परिणाम आपके सामने है।  


अगर केवल जेट एयरवेज़ के अपराधों को ही छुपाने की बात होती तो माना जा सकता था कि राजनैतिक दबाव में नागर विमानन महानिदेशालय आँखें मींचे बैठा है। पर यहाँ तो ऐसे घोटालों का अम्बार लगा पड़ा है। ताज़ा उदाहरण देश की एक राज्य सरकार के पाइलट का है, जिसके पिता उसी राज्य के एक बड़े अधिकारी थे, वे तत्कालीन मुख्यमंत्री के कैबिनेट सचिव, जो कि स्वयं एक पाइलट थे, के काफ़ी करीबी थे। इसलिए इन महाशय की नियुक्ति ही नियमों की धज्जियाँ उड़ा कर हुई थी। नियमों के अनुसार अगर अतिविशिष्ट लोगों को उड़ाने के लिए किसी पाइलट की नियुक्ति होती है तो उसका मूल आधार है कि उस पाइलट के पास न्यूनतम 1000 घंटो की उड़ान का अनुभव हो। लेकिन इनके पास केवल अपने पिता के सम्पर्कों के सिवाय कुछ नहीं था। ग़ौरतलब है कि प्रदेश सरकार के नागरिक उड्डयन विभाग में बिना वरिष्ठतम पाइलट हुए ही इसने स्वयं को इस विभाग का सिर्फ़ ऑपरेशन मैनेजर बनाए रखा बल्कि सभी नियमों को दर-किनार कर दो तरह के विमानों को उड़ाने का काम कई वर्षों तक किया: हेलीकाप्टर वायुयान। जबकि नागर विमानन महानिदेशालय के नियमानुसार एक व्यक्ति द्वारा ऐसे दो तरह के विमान उड़ाना वर्जित है। इससे ऐरोड्यमिक्स की गफ़लत में बड़ा हादसा हो सकता है। फिर भी डीजीसीए ने कुछ नहीं किया? ऐसा उसने केवल मुख्यमंत्री और अतिविशिष्ठ व्यक्तियों से संपर्क साधने और दलाली करने की मंशा से ही किया था। 


इस पाइलट पर यह भी आरोप था कि इसने अपने आपराधिक इतिहास की सही जानकारी छुपा कर अपने लिएएयरपोर्ट एंट्री पासभी हासिल किया था। इसकी शिकायत भीकालचक्रने नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस) के महानिदेशक  से की और जाँच के बाद सभी आरोपों को सही पाए जाने पर इसकाएयरपोर्ट एंट्री पासभी हाल ही में रद्द किया गया। 


ग़नीमत है कि डीजीसीए ने इसी पाइलट की एक और गम्भीर गलती पर जाँच करके इसे इसके लाइसेंस को 10 जून 2020 को 6 महीनों के लिए निलम्बित भी कर दिया है। इस पर आरोप था कि एक हवाई यात्रा के दौरान इसने बीच आसमान में को-पाइलट के साथ सीट बदल कर विमान के कंट्रोल को अपने हाथ में ले लिया, जोकि सिर्फ़ ग़ैरक़ानूनी है, ख़तरनाक है, बल्कि एक आपराधिक कदम है। जबकि विमान 10,000 फुट के नीचे उड़ रहा था एवंऑटो पाइलटमोड में नहीं था। ग़ौरतलब है कि यह प्रकरण 2018 की जेट एयरवेज़ की लंदन फ़्लाइट, जिसमें दोनों पाइलट, बीच यात्रा के, कॉकपिट से बाहर निकल आए थे, से अधिक गम्भीर है। उस फ़्लाइट की जाँच के पश्चात पाइलट को पाइलट को 5 वर्ष के लिए निलम्बित किया गया था। लेकिन सूत्रों की मानें तो इस रसूखदार पाइलट ने इस बात को सुनिषचित कर लिया है कि इस निलम्बन को भी वो रद्द करवा लेगा। 


इस पाइलट पर वित्तीय अनियमिताओं के भी आरोप भी है और हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय ने प्रदेश के मुख्य सचिव को इनके विषय में लिखित सूचना भी प्रदान की है। इस पाइलट के परिवार के तार 200 से भी अधिक कम्पनियों से जुड़े हैं जिनमें अवैध रूप से सैंकड़ों करोड़ रुपयों का हेर-फेर होने का आरोप है, जिसकी जाँच चल रही है।   


ये तो केवल एक ऐसा मामला था जिसकी जाँच डीजीसीए के अधिकारियों को करनी थी। लेकिन डीजीसीए में तैनात अधिकारी अगर स्वयं ही भ्रष्टाचार और घोटालों में लिप्त हों तो न्याय कैसे मिले। डीजीसीए में ही तैनात कैप्टन अतुल चंद्रा भी  ऐसी ही संदिग्ध छवि वाले अधिकारी हैं। ये 2017 में एयर इंडिया से प्रतिनियुक्ति पर डीजीसीए में आए और आज चीफ फ्लाइट ऑपरेशंस इंस्पेक्टर (सीएफओआई) के रूप में कार्यरत हैं। सीएफओआई का पद बेहद संवेदनशील होता है क्योंकि यह विमान सेवाओं और पाइलट के उल्लंघनों पर नजर रखता है और इस मामले में सतर्कता बरतना उसका काम है।


ग़ौरतलब है कि 2017 से आश्चर्यजनक रूप से चंद्रा 19 महीनों तक एअर इंडिया और डीजीसीए, दोनों से वेतन प्राप्त करते रहे, जो कि एक आपराधिक कृत्य है। जब 2019 में मामला उजागर हुआ तो 2.80 करोड़ रुपयों में से इन्होंने 80 लख वापिस किए। इतना ही नहीं फ़ेमा और पीएमएलए के भिन्न उल्लंघनों के लिए प्रवर्तन निदेशालय भी उनकी जांच कर रहा है। 


लेकिन आश्चर्य है कि इन सब आरोपों को दर किनार करते हुए कैप्टन चंद्रा के डीजीसीए में कार्यकाल, जो 30 जून 2020 को समाप्त होना है, की अवधि बढ़ाने की पुरज़ोर कोशिश की जा रही है। चंद्रा के ऐसे स्पष्ट अपराध को एअर इंडिया के सीएमडी और डीजीसीए कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? ये लोग नियमों का पालन क्यों नहीं कर रहे हैं? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केभ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं होगाजैसे दावों पर भरोसा करने वाला आम भारतीय ऐसे मामलों में तत्काल कार्रवाई की अपेक्षा करेगा।