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Monday, June 8, 2026

नकलमुक्त शिक्षा व्यवस्था प्रबंधन कैसे हो ?

हाल ही में रद्द हुई नीट परीक्षाओं के विवाद से देश भर में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। ये परीक्षाएं दोबारा करवाने की बात भी हो रही है। लेकिन अक्सर यह देखा गया है कि भारत में होने वाली परीक्षाओं में या तो पेपर लीक किए जाते हैं या फिर परीक्षाओं के समय बड़े स्तर पर नक़ल की जाती है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता रहती है कि जो परीक्षाएँ हों, न तो उनके पेपर लीक हों न ही ऐसी परीक्षाओं में नकल हो। लेकिन असल में वास्तविकता इसके विपरीत ही हो जाती है। ऐसा नहीं है कि देश में नक़लमुक्त शिक्षा संभव नहीं है। कमी है तो सिर्फ़ इसके प्रबंधन की। 

प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश का हर युवा, देश के विकास में योगदान करे। इसके लिए उन्होंने ‘कौशल विकास’ का विशेष मंत्रालय भी बनाया है। सर्वविदित है कि सरकार हर नौजवान को नौकरी नहीं दे सकती है। निजी क्षेत्र, कृषि या स्वरोजगार ही वो रास्ते है, जिनके जरिये एक नौजवान अपने जीवन में स्थायित्व ला सकता है। जीवन जीने की चुनौतियां अनेक है। जिनका सामना करने के लिए, हर युवा का संतुलित विकास होना आवश्यक है। व्यक्तित्व विकास का एक महत्वपूर्णं अंग शिक्षा है। अशिक्षित युवा के लिए चुनौतियां और भी बढ़ जाती है। पर समस्या इस बात की है कि जिन्हें शिक्षित या डिग्रीधारी माना जाता है, वे स्वयं ही अंधेरे कुऐं में पड़े हैं। डिग्रियां हाथ में हैं, फिर भी वे शिक्षित नहीं कहे जाते।


वैसे तो संपूर्ण भारत में प्राथमिक, माध्यमिक और स्नातक स्तर की शिक्षा व्यवस्था अपनी आत्मा और आधारभूत संरचनाओं में वर्तमान एवं भावी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। परन्तु विशेषतः उत्तर प्रदेश के परिपेक्ष में इसे सरकारी संरक्षण में नकल माफिया के हाथ सौंपकर इसकी लगभग हत्या ही कर दी गयी है। आश्चर्य जनक है कि समाज, सरकार, प्रशासन और मीडिया, इस न बदली जा सकने वाली सामाजिक और राष्ट्रीय बर्बादी पर चुप्पी साधे है।



सारे साल स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाई न के बराबर होती है। शिक्षा व्यवस्था के प्रबंध तंत्र, शिक्षक एवं छात्र सभी भाई-भतीजावाद एवं पैसों के लेनदेन से नकल कराकर प्रमाणपत्र हासिल कर लेने के दुश्चक्र में फंस चुके हैं। इस माफिया का अंग बना युवा, मेधावी बच्चों की संभावनाओं का गला काटकर, अपने प्रमाण पत्र लहराकर शिक्षित दिखता है, सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है या फिर बड़े संस्थानों में प्रवेश पा लेता है। जबकि मेधावी छात्र, जो इस फरेब का अंग नहीं बनना चाहते, वे पीछे छूट जाते हैं। इससे उपजी अर्थव्यवस्था से सरकारी अधिकारी परीक्षा करने वाली संस्थाएं, स्कूल-कॉलेजों के मालिक, शिक्षक, माफिया एवं निकम्मे छात्र लाभान्वित होते हैं और भारत के ताबूत में हर साल कीलें ठोक रहे हैं। आश्चर्य है कि इस सामूहिक बर्बादी पर सब चुप हैं। सरकार शायद विवश है कि वो निकम्मे और जाल-साज शिक्षकों पर अच्छा काम करने का दबाव डालना नहीं चाहती क्योंकि वह चुनाव तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।



प्रदेशों में कई बार ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं जिन्होंने बातें तो बड़ी-बड़ी की लेकिन बजाए इसके कि वो शिक्षा में सुधार लाते, उन्होंने एक ऐसा शिक्षा माफिया खड़ा कर दिया, जिसने विद्यार्थियों की नकल करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया और इससे उपजने वाले धन के संग्रहण के लिए पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी। कोई भी पीढ़ी जिसकी शिक्षा की जड़ें हवा में हों, मजबूत भारत के निर्माण में कैसे सहायक होगी? खोखली शिक्षा के आधार पर तैयार ये पीढ़ी, जिसके हाथों में स्मार्ट फोन है, वही इस माफिया तंत्र का हिस्सा बन जाता है और ये क्रम निरंतर जारी है।


छोटे-छोटे देश अपनी मजबूत शिक्षा व्यवस्था की वजह से विकसित देशों की कतार में आ गए हैं। हमने माफिया को शिक्षा व्यवस्था सौंपकर अपनी कम से कम दो पीढ़ियों को निकम्मा और लाचार बना दिया है। इस बात की ज्यादा संभावना है कि ये पीढ़ी, नक्सलवाद, आतंकवाद और संगठित अपराध की ओर जाए। ऐसे में ऐसी पीढ़ी न समाज के लिए और न ही देश के विकास के लिए कोई योगदान देने में सक्षम हो पायेगी।


यदि हमें एक विकसित समाज और देश की संरचना करनी है, जैसा हमारे नेता भी अपने चुनावी भाषणों में बोलते हैं, तो नेताओं व बुद्धिजीवियों को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था स्थापित करनी ही होगी, जिसमें तकनीक द्वारा संचालित नकल मुक्त शिक्षा पद्धतियों का विकास, मानकीकरण एवं निगरानी अनुभवी व्यक्तियों की समिति या आयोग द्वारा की जाए। नौकरशाही, शिक्षकों एवं पुलिस द्वारा केवल प्रबंधन ही किया जाए। क्योंकि नौकरशाही, शिक्षक एवं पुलिस इस व्यवस्था को ठीक करने में लगातार नाकाम रहे हैं।


तकनीकी पर आधारित शिक्षा व्यवस्था ही हमें इस मानवीय दुर्गुण से बचा सकती है। अन्यथा हम ऐसे सामूहिक विनाश की तरफ अग्रसर होंगे, जिसे ठीक करने का मौका भी समय हमे नहीं देगा और भावी पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। आशा की जानी चाहिए कि सभी शिक्षाविद् इसकी महत्ता को समझेंगे और वर्तमान नेतागण इस विषय पर गंभीर और महत्त्वपूर्ण निर्णय लेंगे और इस अधोगति को रोकने में सहायक होंगे।

आजादी के बाद से आज तक शिक्षा को सुधारने के लिए दर्जनों आयोग बने और उन्होंने तमाम सुझाव भी दिये। जिसकी रिर्पोट दशाब्दियों से धूल खा रही है। जब देश में इतना कुछ बदल रहा है, तो प्रदेशों की सरकार को अपने-अपने प्रदेशों के शिक्षा तंत्र से इस माफिया को दूर करना चाहिए और शिक्षा नीति में बड़ा परिवर्तन करना चाहिए। तभी होगा ‘सबका साथ और सबके विकास‘ का नारा सार्थक। 

Monday, October 11, 2021

शाहरुख़ खान तुमने ठीक नहीं किया


आज कल सोशल मीडिया पर एक विडीओ वायरल हो रहा है। इसमें शाहरुख़ खान सिमि गरेवाल को गर्व से कह रहे हैं कि उनका बेटा दो बरस की आयु से ही अगर ड्रग्स ले या सेक्स करे तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। अगर यह विडीओ सही है, तो मज़ाक़ में भी एक पिता का अपने बेटे के विषय में ऐसा सोचना बहुत चिंताजनक है। हाल में शाहरुख़ खान के बेटे आर्यन खान को क्रूज़ की ‘रेव पार्टी’ से एनसीबी ने गिरफ़्तार किया है। जिस पर टीवी ऐंकर कई दिनों से भरतनाट्यम कर रहे हैं। जबकि देश की अन्य कई महत्वपूर्ण दुर्घटनाओं की तरफ़ उनका ध्यान भी नहीं है। यह कोई अजूबा नहीं है। पिछले सात वर्षों में ज़्यादातर मीडिया ने अपनी हालत चारण और भाटों जैसी कर ली है। देशवासी तो उन्हें देख सुनकर ऐसा कह ही रहे हैं, पर मेरी चिंता का विषय इससे ज़्यादा गम्भीर है। उस पर मैं बाद में आऊँगा। पहले ड्रग कार्टल को लेकर एक पुरानी बात बता दूँ।
 


34 वर्ष पहले की बात है ‘न्यू यॉर्क टाइम्ज़’ की एक अमरीकी महिला संवाददाता मुझे दिल्ली में किसी मित्र के घर लंच पर मिली। उन दिनों न्यू यॉर्क में ड्रग्स के भारी चलन की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही थी। मैंने उत्सुकतावश उससे पूछा कि तुम्हारे यहाँ भी क्या पुलिस महकमें में इतना भ्रष्टाचार है कि न्यू यॉर्क जैसे बड़े शहरों में ड्रग्स का प्रचलन सरेआम हो रहा है? उसने बहुत चौंकाने वाला जवाब दिया। वो बोलीं, न्यू यॉर्क में साल भर में ड्रग्स के मामले में जितने लोगों को न्यू यॉर्क की पुलिस पकड़ती है अगर वो सब जेल में बंद रहें तो साल भर में आधा न्यू यॉर्क ख़ाली हो जाए। उसके इस वक्तव्य में अतिशयोक्ति हो सकती है, पर उसका भाव यह था कि पुलिस में फैले भारी भ्रष्टाचार के कारण ही वहाँ ड्रग्स का कारोबार इतना फल फूल रहा है। 

यह कोई अपवाद नहीं है। जिस देश में भी ड्रग्स का धंधा फल-फूल रहा है उसे निश्चित तौर पर वहाँ की पुलिस और सरकार का परोक्ष संरक्षण प्राप्त होता है। वरना हर देश की सीमाओं पर कड़ी सुरक्षा और देश में आने वाले हवाई जहाज़ों, पानी के जहाज़ों और सड़क वाहनों की कस्टम तलाशी के बावजूद ड्रग्स कैसे अंदर आ पाते हैं? ये उन देशों के नागरिकों के लिए बहुत ही चिंता का विषय है क्योंकि इस तरह पूरे देश की धमनियों में फैलने वाली ड्रग्स का प्रभाव न सिर्फ़ युवा पीढ़ी को बर्बाद करता है, बल्कि लाखों औरतों को विधवा और करोड़ों बच्चों को अनाथ बना देता है। 

आर्यन खान के मामले में या उससे पहले रिया चक्रवर्ती के मामले में हमारे मीडिया ने जितनी आँधी काटी उसका एक अंश ऊर्जा भी इस बात को जानने में खर्च नहीं की कि गरीब से अमीर तक के हाथ में, पूरे देश में ड्रग्स पहुँचती कैसे है? अभी हाल ही में एनसीबी ने गुजरात में अडानी के प्रबंधन में चल रहे बंदरगाह से 3000 किलो ड्रग्स पकड़ी, जो अफगानिस्तान से ‘टेल्कम पाउडर’ बता कर आयात की गई थी। इस पकड़ के बाद एनसीबी ने जाँच को किस तरह आगे बढ़ाया ये हर पत्रकार की रुचि का विषय होना चाहिए था। पर इस पूरे मामले पर चारण और भाट मीडिया ने चुप्पी साध ली। ये बहुत ख़ौफ़नाक है। ये हमारे मीडिया के पतन की पराकाष्ठा का प्रमाण है। 

इससे भी बड़ी घटना एक और हुई जिसे मीडिया ने बहुत बेशर्मी से नज़रअन्दाज़ कर दिया। जबकि ड्रग्स के मामले में वो खबर भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के इतिहास की शायद सबसे बड़ी खबर होनी चाहिए थी। अभी दो हफ़्ते पहले 20 सितम्बर को हैदराबाद से छ्पने वाले अंग्रेज़ी अख़बार ‘डेक्कन क्रानिकल’ ने एक खोजी खबर छापी कि अडानी के ही बंदरगाह के रास्ते जून 2021 में देश में 25 टन ड्रग्स जिसे भी सेमी कट टेल्क्म पाउडर ब्लॉक बताया जा रहा है, भारत में आई। जिसकी क़ीमत खुले बाज़ार में 72 हज़ार करोड़ रुपए है। पहला प्रश्न तो यह है कि टीवी चैनलों पर उछल-कूद मचाने वाले मशहूर ऐंकरों ने इस खबर का संज्ञान क्यों नहीं लिया? दूसरी बात, भारत जैसे औद्योगिक रूप से काफ़ी विकसित देश में अफगानिस्तान से ‘टेल्कम पाउडर’ आयात करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी? दुनिया जानती है अफगानिस्तान पूरी दुनिया में ड्रग्स बेचने का एक बड़ा केंद्र है और ड्रग्स और ‘टेल्क्म पाउडर’ दिखने में एक से होते हैं। इसलिए अफगानिस्तान से अगर कोई ‘टेल्क्म पाउडर’ का आयात कर रहा है तो उसकी जाँच पड़ताल में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए। 

संदेह की सुई इसलिए भी हैरान करने वाली है कि अडानी पोर्ट से राजस्थान की ट्रांसपोर्ट कम्पनी के जिस ट्रक नम्बर RJ 01 GB 8328 में ये 25 टन माल रवाना किया गया, उसने एक भी टोल बैरियर पार नहीं किया। मतलब दस्तावेज़ों में ट्रक का नाम, नम्बर फ़र्ज़ी तरीक़े से लिखा गया। इस 25 टन के खेप का आयात करने वाला व्यक्ति माछेवरापु सुधाकर चेन्नई का रहने वाला है। इसने अपनी पत्नी वैशाली के नाम ‘आशि ट्रेडिंग कम्पनी’ के बैनर तले ये माल आयात किया। इस कम्पनी को जीएसटी, विजयवाड़ा के एक रिहायशी पते के आधार पर दिया गया है, जिसे दस्तावेज़ों में कम्पनी का मुख्यालय बताया गया है। जब ‘डेक्कन क्रानिकल’ के संवाददाता, एन वंशी श्रीनिवास ने विजयवाड़ा के सत्यनारायणा पुरम जाकर तहक़ीक़ात की तो पता चला कि वह पता वैशाली की माँ के घर का है, जहां किसी भी कम्पनी का कोई कार्यालय नहीं है। आगे तहक़ीक़ात करने पर पता चला कि पिछले वर्ष ही पंजीकृत हुई इस कम्पनी का घोषित उद्देश्य काकीनाडा बंदरगाह से चावल का निर्यात करना था। पर पिछले पूरे एक वर्ष में अडानी के बंदरगाह से जून 2021 में आयात किए गए इस 25 टन तथाकथित ‘टेल्क्म पाउडर’ के सिवाय इस कम्पनी ने कोई और कारोबार नहीं किया। 

इतने स्पष्ट प्रमाणों और इतनी संदेहास्पद गतिविधियों पर देश का मीडिया कैसे ख़ामोश बैठा है? आर्यन खान ने जो किया उसकी सज़ा उसे क़ानून देगा। पर आर्यन जैसे देश के करोड़ों युवाओं के हाथों में ड्रग पहुँचने का काम कौन कर रहा है, इसकी भी खोज खबर लेना क्या देश के नामी मीडिया वालों की नैतिक ज़िम्मेदारी नहीं है? 

Monday, January 21, 2019

राष्ट्रीय सरकार क्यों न बने?

संसदीय चुनाव दस्तक दे रहा है। सत्ता पक्ष खम ठोक कर अपने वापिस आने का दावा कर रहा है और साथ ही विपक्षी दलों के गठबंधन को अवसरवादियों का जमावाड़ा बता रहा है। आने वाले दिनों में दोनों ओर से हमले तेज होंगे। कुछ अप्रत्याशित घटनाऐं भी हो सकती है। जिनसे मतों का ध्रुवीकरण किया जा सके। पर चुनाव के बाद की स्थिति अभी  स्पष्ट नहीं है। हर दल अपने दिल में जानता है कि इस बार किसी की भी बहुमत की सरकार बनने नहीं जा रही। जो दूसरे दलों को अवसरवादी बता रहे हैं, वे भी सत्ता पाने के लिए चुनाव के बाद किसी भी दल के साथ गठबंधन करने को तत्पर होंगे। इतिहास इस बात का गवाह है कि भजपा हो या कांग्रेस, तृणमूल हो या सपा, तेलगुदेशम् हो या डीएमके, शिवसेना हो या राष्ट्रवादी कांग्रेस, रालोद हो या जनता दल, कोई भी दल, अवसर पड़ने पर किसी भी अन्य दल के साथ समझौता कर लेता है। तब सारे मतभेद भुला दिये जाते है। चुनाव के पहले की कटुता भी याद नहीं रहती। इससे यह स्पष्ट है कि चुनाव के पहले मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए जो भी राजनैतिक आतिशबाजी की जाती है, वो मात्र छलावा होता है। अंदर से सब एक ही हैं।

इसलिए मेरे कुछ प्रश्न सभी राजनैतिक दलों से हैं। क्या भ्रष्टाचार के मामले में कोई भी दल अछूता है? क्या चुनाव उतने ही पैसे में लड़े जाते हैं, जितने चुनाव आयोग द्वारा स्वीकृत हैं? या उससे कई गुना ज्यादा खर्च करके चुनाव लड़ा जाता है? क्या जातिवाद और साम्प्रदायिकता के मामले में कोई भी दल अपने को पाक-साफ सिद्ध कर सकता है? क्या ये सही नहीं है कि उम्मीदवारों को टिकटों का बटवारा जाति और सम्प्रदाय के मतों के अनुसार किया जाता है? क्या ये सही नहीं कि वोट पाने के लिए सार्वजनिक धन को लुटाने या कर्जे माफ करने  में कोई भी दल पीछे नहीं रहता? क्या ये सच नहीं है कि इस तरह की खैरात वाली राजनीति से देश की अर्थव्यस्था और बैंकिग व्यवस्था चरमरा गई है? क्या ये सही नहीं है कि विकास के मौडल में किसी भी राजनैतिक दल का दूसरे दल से कोई बुनियादी अंतर नहीं है? क्या ये सही नहीं है कि चुनाव जीतने के बाद मंत्री पदों का बटवारा योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि दल के नेता की इच्छा के अनुसार होता है? क्या ये सही नहीं कि केंद्र सरकार में भी तमाम योग्य सांसदों की उपेक्षा कर अयोग्य और चाटुकार उम्मीदवारों को प्रायः महत्वपूर्णं पद दे दिये जाते हैं?

जब ये सब सही है, तो फिर इस चुनावी दंगल से क्या हासिल होगा? क्या देश से भ्रष्टाचार, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, गरीबी, असमानता आदि दूर हो जाऐंगे? क्या जो सरकार बनेगी, वो मतदाताओं की आकांक्षाओं के अनुरूप काम करेगी? अगर उत्तर है नहीं, तो फिर ये सब हंगामा और नाटकबाजी क्यों? क्यों एकबार राष्ट्रीय सरकार के गठन का प्रयोग किया जाए। जो भी राजनैतिक दल आज चुनाव के मैदान में उतर रहे हैं, उन सबके जीते हुए सांसद मिलकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से एक साझी सरकार का गठन करे। साथ ही गत 72 वर्षों के अनुभव के आधार पर व्यवहारिक नीतिओं और कार्यक्रमों का, सामूहिक और सार्थक विचार-विमर्श के उपरांत, निर्णंय करे। 5 वर्ष तक ये राष्ट्रीय सरकार चलाने का ईमानदार प्रयास करें और अपने-अपने दायित्व का शब्दशः उसी भावना के साथ निर्वहन करें, जिस भावना के लिए राष्ट्रपति महोदय शपथग्रहण समारोह में इन्हें शपथ दिलाते हैं। इस शपथ का एक-एक शब्द जनहित के लिए होता है, अगर उस पर ध्यान दिया जाऐ तो। पर हकीकत ये है कि शपथ ग्रहण करने के बाद उसकी भावना को राष्ट्रपति भवन के भीतर छोड़ आया जाता है। फिर तो शासन ऐसे चलता है, जिससे जनता का कम और अपना लाभ ज्यादा हो।

राष्ट्रीय सरकार का ढांचा लगभग उसी तरह होगा, जैसा .पू. की सदियों में भारत के गणराज्यों में होता था। वो प्रथा कई शताब्दियों तक सुचारू रूप से चली। रोमन साम्राज्य में भी इसी को बहुत दिनों तक सफलतापूर्वक चलाया गया। बाद में गणराज्य व्यवस्था में जो दोष उभर आऐ थे और जिनके कारण वह व्यवस्था क्रमशः लुप्त हो गई, उन दोषों पर भी मंथन कर लिया जाऐ किसी एक व्यक्ति के हाथ में सत्ता का ऐसा संकेन्द्रण हो कि वो तानाशाह बन जाऐ और बिना किसी की सलाह माने अपने अहमकपन से सरकार चलाऐ।

यह विषय राजनैतिक दलों के लिए ही नहीं देश के बुद्धिजीवी वर्ग, राजनैतिक चिंतक आम आदमी के लिए भी विचार करने योग्य है। हो सकता है कि हम सबके सामूहिक चिंतन, सद्भभावना और भगवतकृपा से कुछ ऐसा स्वरूप निकलकर सामने आऐ कि हम राजनीति की वर्तमान दलदल से बाहर निकलकर सुनहरे भारत का निर्माण कर सकें। जिसमें हर नागरिक को सम्मान से जीने का अवसर हो। भारतवासी सुखी, संपन्न संतुष्ट हो सके।