Showing posts with label UK. Show all posts
Showing posts with label UK. Show all posts

Monday, July 6, 2026

यूरोप में बदलते मौसम: पर्यावरण कुप्रबंधन और जलवायु परिवर्तन की मार!

आज विश्व मौसम की अनिश्चितता का सामना कर रहा है। पिछले महीने से यूरोप एक अभूतपूर्व गर्मी की लहर (हीटवेव) से जूझ रहा है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, ब्रिटेन समेत कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। स्पेन और फ्रांस में 45 डिग्री के पार रिकॉर्ड टूटे, जबकि रातें भी असामान्य रूप से गर्म रहीं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन (WWA) के अध्ययनों के अनुसार, यह हीटवेव मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के बिना लगभग असंभव होती। 1976 में ऐसी स्थिति कल्पना से परे थी, लेकिन आज यह सामान्य होती जा रही है।


यूरोप, जो एक बार ठंडे मौसम के लिए जाना जाता था, अब सबसे तेज गर्म हो रहा महाद्वीप बन गया है। 1980 के दशक से यहां तापमान वैश्विक औसत से दोगुना तेजी से बढ़ रहा है। 2024-2026 के वर्षों में रिकॉर्ड गर्मी, सूखा, जंगल की आग और बाढ़ ने लाखों लोगों को प्रभावित किया। जून 2026 की गर्मी में यूरोप में हजारों अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं। इस सब का अनुमानित आर्थिक नुकसान अरबों यूरो का है। 1980-2024 के बीच यूरोप में जलवायु से संबंधित घटनाओं से 822 बिलियन यूरो का नुकसान हुआ, जिसमें हाल के वर्षों में तेज वृद्धि देखी गई।



यह सिर्फ यूरोप की समस्या नहीं है। एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में भी मौसम के स्वरूप बदल रहे हैं। पाकिस्तान, भारत, चीन में बाढ़ और सूखे की घटनाएं बढ़ी हैं। अमेरिका में तूफान और जंगल की आग सामान्य हो गई हैं। ऑस्ट्रेलिया में लंबे सूखे और भारत में अनियमित मानसून ने कृषि और जल संसाधनों को प्रभावित किया। वैश्विक स्तर पर बेहद खराब मौसम की घटनाएं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। हीटवेव, भारी बारिश, सूखा, तूफान जैसी घटनाओं में निरन्तर वृद्धि हो रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, 1.1-1.4 डिग्री सेल्सियस की वैश्विक गर्मी ने इन घटनाओं को दसियों गुना अधिक संभावित बना दिया है।


देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन का मूल कारण मानवीय गतिविधियां हैं। जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) का जलाना बिजली उत्पादन, परिवहन और उद्योगों में मुख्य जिम्मेदार है। यह कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करता है, जो पृथ्वी की गर्मी को फंसाता है। तेज़ी से हो रही बेतरतीब वनों की कटाई इसका दूसरा बड़ा कारण है। एक अनुमान के तहत हर साल लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर जंगल नष्ट होते हैं, जो न सिर्फ CO2 अवशोषित करने की क्षमता कम करते हैं बल्कि संग्रहीत कार्बन भी वायुमंडल में छोड़ते हैं। कृषि, पशुपालन, मिथेन गैस और भूमि उपयोग परिवर्तन कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग एक तिहाई जिम्मेदार हैं। एक शोध के अनुसार पिछले तीन वर्षों में भारत सरकार के सलिप्तता से देश भर में एक अनुमान के अनुसार 28 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं और ये क्रम अभी जारी है। ये आत्मघाती नीति वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए जानलेवा सिद्ध होगी।



पर्यावरण प्रबंधन की कमी इन समस्याओं को और बढ़ाती है। उल्लेखनीय है कि कई विकसित देशों में भी, जहां तकनीक और नीतियां उपलब्ध हैं, क्रियान्वयन कमजोर है वाहन भी ऐसे कुप्रबंधन के कारण पर्यावरण और मौसम पर असर पड़ रहा है। यूरोप में नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ रही है, लेकिन कोयला और गैस पर निर्भरता अभी भी बनी हुई है। विकासशील देशों में वन संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और सतत विकास की उपेक्षा की जाती है। औद्योगिक प्रदूषण, अनियोजित शहरीकरण, प्लास्टिक और कचरे का गलत निपटान, नदियों का प्रदूषण, ये सभी कारक प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ रहे हैं।


जानकर मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के अन्य कारक भी हैं, जैसे प्राकृतिक चक्र (El Niño), लेकिन वैज्ञानिक सहमति है कि मानवीय कारक मुख्य हैं। 50 वर्षों में गर्मी की घटनाएं सैकड़ों गुना अधिक संभावित हो गई हैं। ग़लत  प्रबंधन का मतलब है कि अनुकूलन और शमन दोनों में कमी। यूरोप जैसे महाद्वीप में भी एयर कंडीशनिंग, स्वास्थ्य सेवाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर गर्मी के लिए तैयार नहीं थे, जिस करण वहाँ पर मौतें बढ़ीं। कुछ विकासशील देशों में तो स्थिति और बदतर है। वहाँ बाढ़ से फसलें नष्ट हो रही हैं, सूखे से जल संकट पैदा हो रहा है और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं।



यूरोप और अमरीका में गर्मी से जंगल की आग, सूखा और फसल नुकसान हो रहा है। आर्कटिक क्षेत्र तक गर्मी पहुंच रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र स्तर बढ़ रहा है, तटीय क्षेत्र खतरे में हैं। स्वास्थ्य प्रभाव गंभीर हैं। हीट स्ट्रोक, श्वसन रोग, पानी से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं। विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार, 2022 में यूरोप में 60,000 से ज्यादा मौतें गर्मी से हुईं; अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या दोगुनी हो सकती हैं।


अन्य देशों में भी यही कहानी है। भारत जैसे देशों में अनियमित बारिश से कृषि प्रभावित हो रही है, ऐसे में गरीब किसान सबसे ज्यादा पीड़ित होता है। अफ्रीका में सूखा भुखमरी बढ़ा रहा है। वैश्विक स्तर पर जलवायु शरणार्थी बढ़ रहे हैं। ऐसे में कई देशों में आर्थिक नुकसान वहाँ के GDP का प्रतिशत बिगाड़ रहे हैं।


पर्यावरण प्रबंधन की विफलता राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, लॉबीइंग (फॉसिल फ्यूल कंपनियां) और अल्पकालिक लाभ की सोच से उपजी है। पेरिस समझौते के बावजूद उत्सर्जन कम नहीं हो रहा। ऐसे में विकसित देशों को पहल करनी चाहिए, लेकिन वे भी लक्ष्य से पीछे चल रहे हैं।


जानकारों के अनुसार इस संकट का समाधान स्पष्ट हैं। जीवाश्म ईंधन से तेजी से संक्रमण नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) की ओर चला जाए। वनों की रक्षा और पुनर्स्थापना के लिए REDD+ जैसे कार्यक्रमों को मजबूत किया जाए। सतत कृषि, हरित परिवहन, अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाए। अनुकूलन: मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, जल संरक्षण, स्वास्थ्य तैयारियां को सुचारू बनाया जाए। धनी देशों से विकासशील देशों को वित्त और तकनीक हस्तांतरण दिया जाए। भारत जैसे देशों को अपनी सांस्कृतिक विरासत (जैसे वृक्ष पूजा, संतुलित जीवन) को आधुनिक नीतियों से जोड़ना चाहिए।

यूरोप की गर्मी सिर्फ एक चेतावनी है। अगर हम खराब पर्यावरण प्रबंधन और लापरवाही जारी रखेंगे, तो भविष्य में 50 डिग्री तापमान, विनाशकारी बाढ़ और अपरिवर्तनीय क्षति सामान्य हो जाएंगी। समय कम है। 1.5 डिग्री लक्ष्य बचाना संभव है, लेकिन इसके लिए तत्काल, सामूहिक और निर्णायक कार्रवाई जरूरी है। ऐसे में सरकारें, उद्योग, नागरिक सभी को जिम्मेदारी लेनी होगी। प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है, अब अनदेखी करने का समय नहीं बचा। सतत विकास ही एकमात्र रास्ता है, वरना आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। 

Monday, March 23, 2026

एचपीवी वैक्सीन के दुष्प्रभावों को क्यों छिपाया गया?

कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर एक पोस्ट काफ़ी चर्चा में छाई हुई है। इसमें पीटर गोट्शे नामक एक प्रसिद्ध चिकित्सक, शोधकर्ता और लेखक, ने ‘हाउ मर्क एंड ड्रग रेगुलेटर्स हिड सीरियस हार्म्स ऑफ एचपीवी वैक्सीन’ नाम की पुस्तक का विश्लेषण कर कुछ गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इस पोस्ट में पीटर द्वारा किए गए दावा ज़िक्र किया गया है कि कैसे महिलाओं में होने वाले सर्वाइकल कैंसर को रोकने वाली एक वैक्सीन के दुष्प्रभावों को दुनिया से छिपाया गया है।   

पोस्ट के अनुसार पीटर गोट्शे की पुस्तक में वे बताते हैं कि कैसे ‘एचपीवी क्सीन’ को ‘लाइफ-सेविंग’ बताकर बेचा गया, लेकिन इसके ट्रायल्स में गंभीर कमियां थीं और नुकसान छुपाए गए। यह मर्क की वैज्ञानिक दुराचार की कहानी है, जो कभी-कभी फ्रॉड के स्तर तक पहुंचती है। गोट्शे के अनुसार, मर्क ने कई तरीकों से गार्डासिल के नुकसानों को छुपाया। ज्यादातर ट्रायल्स में सच्चा प्लेसिबो (सलाइन) नहीं इस्तेमाल किया गया। इसके बजाय एल्यूमिनियम एडजुवेंट या दूसरी वैक्सीन को ‘प्लेसिबो’ बताया गया। ये दोनों खुद नुकसान पहुंचा सकते हैं (न्यूरोटॉक्सिक), इसलिए वैक्सीन और ‘प्लेसिबो’ के साइड इफेक्ट्स समान दिखे और नुकसान ‘सुरक्षित’ साबित हुआ। लेखक कहते हैं कि इससे मेडिकल एथिक्स का उल्लंघन हुआ। 



वहीं दूसरी ओर गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याएं जैसे POTS (Postural Orthostatic Tachycardia Syndrome—खड़े होते ही चक्कर और दिल की धड़कन तेज होना) और CRPS (Complex Regional Pain Syndrome—तीव्र दर्द और सूजन) को रिपोर्ट नहीं किया गया। केवल 14 दिनों के अंदर की घटनाएं गिनी गईं, जबकि 90% नुकसान इससे बाहर थे। कई केसों को ‘कोई संबंध नहीं’ बता दिया गया या बाहर कर दिया गया। गोट्शे इसे ‘आउटराइट फ्रॉड’ कहते हैं।


उल्लेखनीय है कि वैक्सीन को सर्वाइकल कैंसर रोकने वाला बताया गया, लेकिन गोट्शे दावा करते हैं कि ट्रायल्स में असली कैंसर केस शून्य थे। लंबे समय के डेटा में एंटीबॉडी स्तर तेजी से गिरता है और पहले से एचपीवी संक्रमित महिलाओं में कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया या डेनमार्क में ऑब्जर्वेशनल स्टडीज में कैंसर घाटे को वैक्सीन का श्रेय दिया जाता है, लेकिन स्क्रीनिंग और अन्य फैक्टर्स को नजरअंदाज किया जाता है। पुस्तक के अनुसार मर्क ने ऐसा डर फैलाया कि कैंसर हजारों महिलाओं को मारता है, हर राज्य में लॉबिंग की और स्कूल मैंडेट के लिए दबाव डाला। इस वैक्सीन को ‘फास्ट-ट्रैक अप्रूवल’ मिला, जबकि FDA ने बाद में माना कि सेफ्टी मॉनिटरिंग की क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया था। 



इसके साथ ही FDA, EMA जैसे नियामकों की भूमिका भी संदेहास्पद रही। पुस्तक में ये आरोप भी लगाया गया है कि इन नियामकों ने मर्क के एकतरफा रिपोर्ट्स को बिना सवाल स्वीकार किया। EMA की 2015 जांच में भी कंपनियों के डेटा पर भरोसा किया गया। गोट्शे कहते हैं कि रेगुलेटर्स इंडस्ट्री द्के क़ब्ज़े में हैं। पुस्तक में Vioxx घोटाले की तुलना भी की गई है। लेखक अन्य देशों के स्वास्थ्य अधिकारियों के भ्रामक बयानों के उदाहरण भी देते हैं।


दुनिया भर के विश्लेषक इस पुस्तक की ताकत का वर्णन करते हुए इसे गोपनीय आंतरिक दस्तावेजों पर आधारित मानकर जर्नल पेपर्स से ज्यादा विस्तृत मानते हैं। इस पुस्तक के छपने का सबसे प्रभावी असर यह है कि यह पारदर्शिता की मांग करता है और कानूनी मुकदमों (जैसे Robi केस, जो 2025 में चल रहा था) में सच्चाई उजागर होने का उदाहरण भी देता है। ब्राउनस्टोन इंस्टीट्यूट जैसे समीक्षक इसे ‘फियरलेस इंडिक्टमेंट’ कहते हैं।



गौरतलब है कि गोट्शे को ब्रिटिश मेडिकल शोध संस्थान कोक्रेन से निकाला गया था क्योंकि उन्होंने 2018 में एचपीवी वैक्सीन रिव्यू पर इसी तरह की आलोचना की थी। वहीं WHO, CDC, Cochrane जैसे मुख्यधारा के शोध संस्थान का मानना है कि वैक्सीन प्री-कैंसरस लेशन्स 80-90% तक कम करती है, असरदार है और गंभीर साइड इफेक्ट्स बहुत दुर्लभ हैं। विश्व स्वास्थ संगठन के VigiBase में 667 मौतें रिपोर्ट हुई हैं, लेकिन कारण संबंध साबित नहीं। गोट्शे की व्याख्या को ‘anti-vax’ माना जाता है, हालांकि वे खुद वैक्सीन के खिलाफ नहीं बल्कि ‘ट्रांसपेरेंसी’ के पक्षधर हैं।


भारत में इस पुस्तक का सीधा और व्यापक प्रभाव अभी तक दिखाई नहीं देता। 2026 तक के उपलब्ध डेटा में कोई बड़ा मीडिया बहस या सरकारी प्रतिक्रिया नहीं मिली। लेकिन यह अप्रत्यक्ष रूप से प्रासंगिक है क्योंकि 2009-2010 में PATH (बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन) के साथ मर्क के गार्डासिल और GSK के Cervarix ट्रायल्स आंध्र प्रदेश और गुजरात में चले जहाँ 7 लड़कियों की मौत हुई, जिसके बाद संसदीय समिति ने नैतिक उल्लंघन (इनफॉर्म्ड कंसेंट के बिना गरीब लड़कियों पर प्रयोग) का आरोप लगाया। ट्रायल्स रोके गए। यह विवाद आज भी HPV वैक्सीन पर शक पैदा करता है।


उल्लेखनीय है कि भारत सर्वाइकल कैंसर खत्म करने के लिए HPV वैक्सीन को स्कूल प्रोग्राम में ला रहा है, जिसकी शुरुआत सिक्किम, पंजाब आदि में राष्ट्रीय रोलआउट की योजना के तहत की जा सकती है। इंडिजिनस Cervavac भी उपलब्ध है, लेकिन क्वाड्रिवेलेंट वैक्सीन (मर्क जैसी) भी इस्तेमाल होती है। भारत सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय इसे सुरक्षित और जरूरी बताती है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो पुस्तक के दावे के अनुसार वैक्सीन के छुपे नुकसान सोशल मीडिया या एंटी-वैक्सीन ग्रुप्स में फैल सकते हैं, जिससे हिचकिचाहट बढ़ सकती है। खासकर 2010 के ट्रायल विवाद के बाद। लेकिन भारत में मुख्यधारा मीडिया और स्वास्थ्य विभाग इसे ‘मिथ’ बताते हुए प्रमोशन जारी रखते हैं। अगर अमरीका में हुए मुकदमे को केंद्र में रखा जाए तो ज्यादा सुर्खियां बन सकती हैं जिससे इस पर प्रभाव बढ़ सकता है। परंतु, पुस्तक भारत में सतर्कता अवश्य बढ़ा सकती है लेकिन कार्यक्रम को नहीं रोक पाएगी, क्योंकि कैंसर का बोझ बहुत बड़ा है।


यह पुस्तक दवा उद्योग और नियामकों पर गंभीर सवाल उठाती है। गोट्शे के दस्तावेजी सबूत मजबूत हैं, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय में यह अल्पमत है। भारत जैसे देश में जहां एचपीवी वैक्सीन सार्वजनिक स्वास्थ्य का बड़ा हथियार है, ऐसे में पुस्तक याद दिलाती है कि माता-पिता को स्वतंत्र शोध करना चाहिए, स्क्रीनिंग के साथ वैक्सीनेशन बैलेंस करें। अगर आप वैक्सीन के पक्ष में हैं, तो डॉक्टर से चर्चा करें और आधिकारिक डेटा भी देखें।

Monday, October 31, 2022

परदेस में कितने देसी नेता


क्या आप जानते हैं कि इंग्लैंड के अलावा भी कई देशों में भारतीय मूल के प्रधान मंत्री हैं? दीपावली के दिन जैसे ही ये खबर आई कि ऋषि सौनक निर्विरोध ब्रिटेन के प्रधान मंत्री चुन लिए गये हैं, तो विश्व भर के हिंदुओं में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी, विशेषकर भारत में। लोग बल्लियों उछलने लगा। मानो भारत ने इंग्लैंड को जीत लिया हो। औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त रहे भारतीयों के लिए निश्चय ही ये एक गर्व का विषय है कि ऋषि सौनक उन गोरों के प्रधान मंत्री हैं जो कभी भारतीयों को शासन करने में नाकारा बताते थे। यह भी सही है की ऋषि सौनक के पूर्वजों की जड़ें पूर्वी पाकिस्तान और भारत से जुड़ी हैं और वे इंफ़ोसिस के संस्थापक नारायणमूर्ति के दामाद हैं। इससे भी ज़्यादा यह कि वे स्वयं को हिंदू घोषित कर चुके हैं और उन्होंने अपनी सांसदीय शपथ भी भगवद् गीता पर हाथ रख कर ली थी। इससे आगे ऐसा कुछ नहीं है जिसके लिये भारत के कुछ लोग इतने उत्साहित हैं।


ऋषि सौनक को ये संस्कार श्रील ए॰सी॰ भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा स्थापित इस्कॉन ने दिए हैं, जो मानता है कि हम हिंदू नहीं, हमारी पहचान सनातन धर्मी के रूप में है। जबकि कुछ संगठन सभी सनातन शास्त्रों व मान्यताओं के विपरीत चलते हुए अपना ही बनाया ‘हिंदुत्व’ सब पर थोपते हैं। लंदन के इस्कॉन मन्दिर में ऋषि सौनक ने सपरिवार जा कर गौ माता का पूजन किया तो कुछ लोग इसे इंग्लैंड में भारतीय संस्कृति के प्रसार की संभावना मान कर अति उत्साहित हो गये। पर अगले ही दिन ऋषि सौनक ने ट्विटर पर लिखा कि मेरा संसदीय क्षेत्र गाय और बकरों के मांस का व्यापार करने वालों का है। ये एक बढ़िया उद्योग है। कोई क्या खाए, ये उसकी पसंद से तय होता है। इसलिए मैं इस उद्योग को पूरा बढ़ावा दूँगा- देश में भी और विदेश में भी। 



इसके बाद ही ऋषि सौनक के श्वसुर नारायणमूर्ति व सास सुधा नारायण मूर्ति के काफ़ी निकट के मित्र, प्रधान मंत्री मोदी जी व आरएसएस के नेताओं के भी ख़ास सहयोगी व सलाहकार, बेंगलुरु के मशहूर उद्योगपति मोहन दास पाई ने ट्वीटर पर लिखा कि ऋषि सौनक इंग्लैंड के नागरिक हैं और उनका समर्पण इंग्लैंड के प्रति है। वे यूके के हित के सामने भारत के लिए कुछ भी नहीं करने जा रहे। भारत उनसे कोई आशा न रखे। उन्होंने ये भी लिखा कि ऋषि सौनक का भारत के प्रति कड़ा तेवर रहने वाला है इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिये।  


पिछले हफ़्ते सोशल मीडिया पर छाये रहे इस पूरे प्रकरण से कुछ बातें समझनी चाहिए। पहली बात तो यह है कि भारतीय मूल के जो युवा विदेशों में पैदा हुए और पले बढ़े और वहीं के नागरिक हैं, उनका भारत के प्रति न तो वह भाव है और न ही वह आकर्षण, जो उनके माता-पिता या पूर्वजों का रहा है, जो भारत में जन्में थे और बाद में विदेशों में जा बसे। 


ऋषि सौनक भारतीय उपमहाद्वीप मूल के पहले युवा नहीं हैं जो इस ऊँचाई तक पहुँचे हैं। अमरीका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की ननिहाल तमिल नाडू में है। उन्हें दक्षिण भारतीय खाना पसंद है और वे अपने मौसी-मामाओं से जुड़ी रहती हैं। पर भारत के प्रति कमला हैरिस का रवैया वही है जो आम अमरीकी का है। मसलन वे कश्मीर को मानवाधिकार का विषय मानती हैं। जो भारतीय दृष्टिकोण के विरुद्ध है।


हम में से कितने लोग यह जानते हैं कि 2017-2020 तक आयरलैंड के प्रधान मंत्री रहे लिओ वराडकर के माता-पिता मुंबई के पास वसई के रहने वाले हैं। लिओ ने 2003 में मुंबई के केईएम अस्पताल से इण्टर्नशिप पूरी की थी। उनकी माँ आयरिश हैं और पिता भारतीय। लिओ वराडकर की इस प्रभावशाली सफलता का भारत में कोई ज़िक्र क्यों नहीं करता? क्या इसलिए कि वे ईसाई हैं? ये बहुत ओछि  मानसिकता का परिचायक है। 



इसी तरह पुर्तगाल के मौजूदा प्रधान मंत्री एंटोनियो कोस्टा भी भारतीय मूल के हैं। उनके माता-पिता का जन्म गोवा में हुआ था। ये दूसरी बार प्रधान मंत्री चुने गये हैं। विडंबना देखिए कि न तो भारत के मीडिया को इसकी खबर है और ना ही देश की जनता को। तो फिर भारत माँ के इन सपूतों की इस उपलब्धि पर जश्न कौन मनाएगा? जबकि एंटोनियो कोस्टा तो आज भी ओसीआई कार्ड के धारक हैं और लिओ वराडकर अक्सर अपने रिश्तेदारों से मिलने महाराष्ट्र के ठाणे ज़िले में आते रहते हैं। पर इसकी मीडिया में कहीं कोई चर्चा क्यों नहीं होती? ये प्रमाण हैं इस बात का कि देश का मीडिया कितना संकुचित और कुंद हो गया है। ये रवैया भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और लोकतंत्र के लिए घातक है।


पिछले कुछ वर्षों से हिंदुत्व को लेकर जो अभियान चलाया जा रहा है उसे लेकर देश के करोड़ों सनातन धर्मियों के मन में अनेक प्रश्न खड़े हो रहे हैं, जिनका संतुष्टि पूर्ण उत्तर संघ परिवार के सर्वोच्च पदाधिकारियों को देना चाहिए। एक तरफ़ तो सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ऐसे वक्तव्य देते हैं जिससे लगता है कि संघ अपने कट्टरपंथी चोले से बाहर आ रहा है। जैसे मुसलमानों और हिंदुओं का डीएनए एक है। अब मस्जिदों में और शिव लिंग खोजना बंद करें। दूसरी तरफ़ संघ प्रेरित सोशल मीडिया का दिन-रात हमला मुसलमानों के विरुद्ध भावनाएँ भड़काने के लिए होता रहता है। ये विरोधाभास क्यों? 


एक तरफ़ तो संघ परिवार हिंदुत्व की जमकर पैरवी करता है और दूसरी तरफ़ सनातन धर्म की परंपराओं, वैदिक शास्त्रों और शंकराचार्य जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के विरुद्ध आचरण भी करता है। ये विरोधाभास क्यों? ऐसे में हमारे जैसा एक आस्थावान सनातन धर्मी किस मार्ग का अनुसरण करे? ये भ्रम जितनी जल्दी दूर हो उतना ही हमारे समाज और राष्ट्र के हित में होगा। वरना हम इसी तरह ऋषि सौनक की उपलब्धि पर तो बल्लियों उछलेंगे और एंटोनियो कोस्टा व लिओ वराडकर की उपलब्धियों से मूर्खों की तरह बेख़बर बने रहेंगे। भागवत जी के वक्तव्य को यदि गंभीरता से लिया जाए तो ये खाई अब पटनी चाहिए।