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Monday, September 7, 2026

जनता की जागरूकता लोकतंत्र के लिए ज़रूरी

जब से ‘जेन-ज़ी’ ने जंतर मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ सफल धरने का आयोजन किया है, तब से पूरे देश के विद्यार्थियों में अभूतपूर्व नवचेतना का उदय हुआ है। आज देश भर के ग्रामीण अंचलों के खस्ता हाल सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी अपने स्कूलों की अव्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाने लगे हैं। उनमें स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल पूछने की हिम्मत आ गई है। प्रसन्नता तो इस बात की है कि अब ऐसी चेतना प्राथमिक पाठशालाओं के बच्चों तक में पैदा हो गई है। वे अपने स्कूल की जरजर या नदारद इमारत, शौचालयों का अभाव, शिक्षकों की संख्या में भारी कमी, स्कूल से मिलने वाले भोजन की खराब क्वालिटी, स्कूल तक पहुँचने वाले मार्गों की दुर्दशा, जैसे गंभीर मुद्दों पर खुलकर और संगठित होकर सवाल पूछने लगे हैं। राजस्थान के एक माध्यमिक विद्यालय की छात्राओं ने तो विद्यालय के गेट पर ताला ही डाल दिया और धरने पर बैठ गईं। उनका कहना था कि जबतक उनकी मांगे पूरी नहीं हो जाती, स्कूल का ताला नहीं खुलेगा। 



देश भर में पनप रही इस नई प्रवृत्ति से प्रशासन और सत्तारूढ़ दल हक्के-बक्के हो गए हैं। उन्हें जवाब देते नहीं बन रहा। सोशल मीडिया पर ऐसे दर्जनों वीडियो रोज़ वायरल हो रहे हैं जिनमें ये घटनाक्रम प्रमुखता से दिखाए जा रहे हैं। सबसे रोचक बात यह है कि इस तरह विरोध के स्वर उठाने वाले छात्र किसी राजनैतिक दल के बहकावे में आ कर ये कदम नहीं उठा रहे। राजनैतिक दल और उनके कार्यकर्ता तो ख़ुद इस नई परिस्थिति से बेचैन हैं। क्योंकि आजतक जनता और शासन के बीच बिचौलिये की उनकी आत्मघोषित भूमिका अब निरर्थक होती जा रही है। यही हाल मीडिया का भी है। जो मीडिया सरकारों की चाटुकारिता या उनका प्रचारक बन कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहा था वो अचानक यह महसूस कर रहा है कि आम जनता की दृष्टि में अब उनकी कोई अहमियत नहीं बची। एक और रोचक तथ्य यह है कि ऐसी जागृति केवल भाजपा शासित राज्यों में आई हो, ये बात नहीं है। जिन राज्यों में कांग्रेस या अन्य दलों की सरकारें हैं वहाँ के छात्र भी शिक्षा व्यवस्था की खामियों को लेकर अब मुखर हो गए हैं। 



कुछ पत्रकार तो हमेशा ही अपना कर्तव्य निष्ठा से निभाते आए हैं। इस माहौल से उत्साहित हो कर जब उन्होंने कुछ राज्यों में विद्यालयों की दुर्दशा पर रिपोर्टिंग की तो उससे घबराकर वहाँ के मुख्यमंत्रियों ने ऐसे पत्रकारों के विरुद्ध पुलिस की दंडात्मक कार्यवाही शुरू करवा दी। मज़े की बात यह है कि ऐसा करने वालों में वो मुख्यमंत्री भी हैं जो दिन-रात सैंकड़ों करोड़ रुपया अपने प्रचार-प्रसार पर खर्च करके अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटते हैं। दरअसल ऐसे मुख्यमंत्री, चाहे किसी भी दल के क्यों न हों, इस मुग़ालते में थे कि उनका आक्रामक प्रचार, उनके शासन की कमज़ोरियों को ढक लेगा। जब मीडिया ही मैनेज हो गया तो उनकी सरकारों की कमज़ोरियाँ आम जनता तक कौन पहुँचाएगा? 



लेकिन अब पासा पलट गया। मीडिया तो मैनेज हो गया, लेकिन टेक्नोलॉजी का फ़ायदा उठा कर अब हर छात्र एक रिपोर्टर बन चुका है। वो एक स्मार्ट फ़ोन से ज़मीनी हक़ीक़त दिखाकर, सरकार के झूठे दावों की पोल खोल रहा है। ये तो एक तरह का ऐसा सैलाब है जिसे काबू कर पाना अब किसी भी दल की सरकार के लिए नामुमकिन होगा। दो-चार पत्रकारों पर तो दंडात्मक कार्यवाही की जा सकती है लेकिन जब विद्यालयों के सैंकड़ों छात्र हकीकत बयान करने लगें तो उन पर दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जा सकती। अगर किसी मूर्ख नेता ने अहंकारवश ऐसा करने का दुस्साहस किया तो वो वोट बैंक को खो देगा। क्योंकि बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य को लेकर हर माता-पिता चिंतित रहता है। जब वो देखेंगे कि उनके बच्चों को स्कूलों में बुनियादी सुविधा मिलना तो दूर उल्टा उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने पर पुलिस की दंडात्मक कार्यवाही को झेलना पड़ रहा है तो उनका पारा भी सातवें आसमान पर चढ़ेगा। ऐसे हालातों को क़ाबू कर पाना किसी भी मंत्री या सरकार के लिए असंभव होगा। 



ये तो एक शुरुआत है, जो लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़रूरी है। लेकिन इसका दायरा अब और बढ़ना चाहिए। हर आम नागरिक को अपने परिवेश पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए। अगर उनके घर के सामने सड़क टूटी पड़ी है या उसमें पानी भर रहा है, या उनके इर्दगिर्द कूड़े के अम्बार लगे हैं तो उन्हें उसकी फ़ोटो खींच कर फ़ौरन सोशल मीडिया पर वायरल कर देना चाहिए। जिससे स्थानीय प्रशासन हरकत में आए और जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करे। जब हर नागरिक ऐसा करना शुरू कर देगा तो भ्रष्ट अधिकारियों या राजनेताओं पर भारी दबाव पड़ेगा। उन्हें मजबूरन जनता की परेशानियों का निदान करना होगा। जब एक ही इलाक़े के दर्जनों या सैंकड़ों लोग एक सी समस्याओं का खुलासा करेंगे तो फिर उन सबका सामूहिक दमन करना किसी भी प्रांतीय सरकार या स्थानीय निकायों को करना मुश्किल होगा। इससे अपना लोकतंत्र मजबूत बनेगा और नेताओं और अधिकारियों में ज़िम्मेदारियों की भावना विकसित होगी। जो आज़ादी मिलने के दो दशक बाद से ही लुप्त होना शुरू हो गई थी। आज तो हालत ये हो गई है कि जो नेता या अफसर जितना ज़्यादा भ्रष्ट होता है वो उतनी ही दबंगई दिखाता है। उसे अभी तक ये गलतफहमी है कि उससे कोई सवाल नहीं कर सकता। 

जो राजनेता, मुख्यमंत्री, मंत्री, सच्चे और ईमानदार हैं और यह चाहते हैं कि विकास कार्यों के लिए आवंटित धन का सदुपयोग हो वो जनता की इस पहल का स्वागत करेंगे, क्योंकि ऐसा करने से उन्हें अपने प्रांत के बारे में ज़मीनी हकीकत बिना किसी लाग-लपेट के नियमित मिलने लगेगी। ऐसे में वे अपने प्रशासन को कड़े निर्देश देकर जनता की समस्याओं का हल करवा पाएंगे।  

Monday, April 13, 2026

जनसेवा की नई मिसाल देता नेपाल का युवा मंत्रिमंडल !

नेपाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव आया जब 27 मार्च 2026 को राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के नेतृत्व में बालेन शाह (बलेंद्र शाह) ने 36 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और 15 सदस्यीय कैबिनेट का गठन किया। यह मंत्रिमंडल न सिर्फ नेपाल का सबसे युवा कैबिनेट है, बल्कि दक्षिण एशिया में अपनी उच्च शैक्षणिक योग्यता के लिए वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन रहा है। इस मंत्रिमंडल के सदस्यों की औसत आयु मात्र 38.21 वर्ष है, दस मंत्री 40 वर्ष से कम उम्र के, पांच महिला मंत्री और 80 प्रतिशत से अधिक सदस्यों के पास स्नातकोत्तर या डॉक्टरेट की डिग्री। यह आंकड़े नेपाल की राजनीति के पारंपरिक चेहरे को पूरी तरह बदल रहे हैं। 


यह कैबिनेट 'जेन-ज़ी आंदोलन' के परिणामस्वरूप सत्ता में आई है। भ्रष्टाचार, पुरानी पार्टियों की नाकामी और युवाओं की मांगों को लेकर हुए आंदोलन ने आरएसपी को भारी बहुमत दिलाया। अब यह युवा टीम न सिर्फ नेपाल में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में 'दुनिया का सबसे युवा कैबिनेट' और 'सबसे शिक्षित मंत्रिमंडल' के रूप में प्रसिद्ध हो रही है। कई भारतीय अखबारों ने इसे 'जनरेशनल शिफ्ट' करार दिया है। विश्व स्तर पर इसकी सराहना हो रही है क्योंकि यह पारंपरिक राजनीति से हटकर योग्यता, तकनीकी विशेषज्ञता और समावेशिता पर आधारित है। यह दक्षिण एशिया का चमकता उदाहरण है, जहां भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों के कैबिनेट अक्सर वरिष्ठ नेताओं पर निर्भर रहते हैं।


इस कैबिनेट की सबसे बड़ी ताकत इसकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि है। प्रधानमंत्री बालेन शाह स्वयं सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक (पूर्वांचल विश्वविद्यालय) और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में एम.टेक (निट्टे मीनाक्षी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बेंगलुरु, भारत) हैं। वे काठमांडू के पूर्व मेयर और लोकप्रिय रैपर भी हैं। उनकी टीम में दो डॉक्टरेट धारक और दस स्नातकोत्तर सदस्य हैं। वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले (41 वर्ष, कैबिनेट के सबसे वरिष्ठ) अर्थशास्त्र में पीएचडी (ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी), हार्वर्ड से एमपीए/आईडी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से स्नातक हैं। वे पूर्व में यूएनडीपी के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय आर्थिक सलाहकार और नेपाल की राष्ट्रीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी विशेषज्ञता आर्थिक सुधार, गरीबी उन्मूलन और सतत विकास में है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल (47 वर्ष) अमेरिका के विस्कॉन्सिन-मैडिसन से पब्लिक पॉलिसी में मास्टर्स और यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिजपोर्ट से पॉलिटिकल इकोनॉमी में स्नातक हैं। वे 'टीच फॉर नेपाल' के सह-संस्थापक हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा सुधार का प्रमुख अभियान है।


शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा युवा एवं खेल मंत्री सस्मित पोखरेल (29 वर्ष) कैबिनेट के सबसे युवा सदस्य हैं। वे काठमांडू विश्वविद्यालय से बिजनेस मैनेजमेंट एवं कानून में स्नातक हैं और पॉलिसी, गवर्नेंस एवं भ्रष्टाचार-निरोध पर मास्टर्स कर रहे हैं। वे बालेन के मेयर काल में शहरी नियोजन सलाहकार रह चुके हैं। स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता (38 वर्ष) भारत के ग्वालियर से नर्सिंग में मास्टर्स और दिल्ली के एम्स से प्रशिक्षित हैं। सामान्य प्रशासन मंत्री प्रतिभा रावल (32 वर्ष) एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (चेन्नई) से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा रखती हैं। श्रम मंत्री दीपक कुमार साह (34 वर्ष) लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन से पीएचडी स्कॉलर, एलएसई से हेल्थ पॉलिसी में मास्टर्स और आईओएम से पब्लिक हेल्थ में मास्टर्स रखते हैं।


महिला, बाल-बालिका एवं ज्येष्ठ नागरिक मंत्री सीता बादी (30 वर्ष) राजनीति विज्ञान में मास्टर्स हैं और बादी समुदाय की प्रतिनिधि के रूप में समावेशिता का प्रतीक हैं। कानून मंत्री सोबिता गौतम (30 वर्ष) राष्ट्रीय विधि महाविद्यालय से बीए एलएलबी हैं और संसदीय समितियों में सक्रिय रहीं हैं। भौतिक पूर्वाधार मंत्री सुनील लाम्सल (35 वर्ष) भी भारत से एम.टेक (स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग) हैं।


गौरतलब है कि ये योग्यताएं महज डिग्रियां नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुभव से जुड़ी हैं। यूएनडीपी, टीच फॉर नेपाल, आपदा राहत संगठन 'हामी नेपाल' और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में इन सभी की अहम भूमिका रही है। पांच महिला मंत्रियों का प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी (जैसे सीता बादी) समावेशिता को मजबूत करती है।


देखा जाए तो नेपाल का यह कैबिनेट अपने पड़ोसियों से अलग दिखता है। भारत के वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल में 71 सदस्य है, जिसमें 57 सदस्य स्नातक या उससे ऊपर हैं, लेकिन 11 सदस्य मात्र 12वीं पास हैं। कई मंत्री राजनीतिक अनुभव पर निर्भर हैं, जबकि युवा चेहरे कम हैं। वहीं चीन का मंत्रिमंडल अत्यधिक शिक्षित तकनीकी विशेषज्ञों (इंजीनियरिंग, अर्थशास्त्र) से भरा है, लेकिन उनकी औसत आयु 55-60 वर्ष के आसपास है और निर्णय प्रक्रिया केंद्रीकृत पार्टी संरचना पर आधारित है। बांग्लादेश के हालिया कैबिनेट में 46/50 सदस्य उच्च शिक्षा वाले हैं (तीन पीएचडी), लेकिन वहां भी वरिष्ठता और राजनीतिक वफादारी प्रमुख है।


नेपाल का कैबिनेट इन सभी से युवा, अधिक समावेशी और योग्यता-आधारित है। भारत और चीन की तुलना में यहां भ्रष्टाचार-विरोधी 'डिलीवरी बेस्ड गवर्नेंस' पर जोर है, जो पड़ोसियों में अक्सर कम देखा जाता है। हालांकि, कुछ विश्लेषक चेताते हैं कि इस मंत्रिमंडल के पास अनुभव की कमी एक चुनौती है। भारत की तरह बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था या चीन की तरह दीर्घकालिक नियोजन यहां अभी संभव नहीं, लेकिन पारदर्शिता और तेज निर्णय लेने की क्षमता नेपाल को लाभ दे सकती है।


केवल दो सप्ताह पुरानी यह सरकार पहले ही '100 सूत्री शासन सुधार एजेंडा' लागू कर चुकी है। पहली कैबिनेट बैठक में मंत्रालयों का पुनर्गठन, दक्षिण एशिया संघर्ष के प्रभाव से नेपाली प्रवासियों की सुरक्षा, ‘कार्की आयोग’ रिपोर्ट पर कार्रवाई और संविधान संशोधन पर चर्चा पत्र तैयार करने जैसे कदम उठाए गए। शिक्षा मंत्री सस्मित पोखरेल ने पार्टी-आधारित छात्र संगठनों को समाप्त करने और स्वास्थ्य मंत्री निशा मेहता ने निजी अस्पतालों में 10 प्रतिशत मुफ्त बेड सुनिश्चित करने की घोषणा की है।


वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले आर्थिक स्थिरता, पर्यटन विकास और बुनियादी ढांचे पर ध्यान दे रहे हैं। श्रम और स्वास्थ्य मंत्रियों की स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञता गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन में मदद करेगी। विदेश मंत्री शिशिर खनाल की पॉलिसी विशेषज्ञता नेपाल की कूटनीति को मजबूत करेगी। युवा बेरोजगारी घटाने, शिक्षा गुणवत्ता सुधारने, स्वास्थ्य पहुंच बढ़ाने और भ्रष्टाचार रोकने के प्रयास पहले ही दिख रहे हैं। दैनिक प्रगति निगरानी प्रणाली लागू कर सरकार जवाबदेही सुनिश्चित कर रही है। हालांकि, चुनौतियां यहाँ भी हैं, जैसे कि पहाड़ी इलाकों में पहुंच, संसाधन सीमाएं और पुरानी पार्टियों का विरोध। फिर भी, यह कैबिनेट जनता की उम्मीदें पूरी करने की राह पर है।


कुल मिलाकर देखा जाए तो नेपाल का यह ‘जेन-ज़ी’ कैबिनेट न सिर्फ दक्षिण एशिया के लिए मिसाल है, बल्कि विकासशील देशों को सिखाता है कि योग्यता और युवा ऊर्जा राजनीति को बदल सकती है। यदि यह टीम अपने 100 सूत्री एजेंडा को ईमानदारी से लागू कर पाई, तो नेपाल आर्थिक समृद्धि, सामाजिक न्याय और सुशासन का नया मॉडल बन सकता है।