Monday, September 9, 2019

ख़ौफ़ में क्यों है आम नागरिक?

हाल ही में मोदी सरकार द्वारा लागू हुए मोटर व्हीकल (संशोधन) अधिनियम 2019 को लेकर मिली जुली प्रतिक्रिया सामने रही है। कुछ लोग इसे एक अच्छी पहल बता रहे हैं तो वही पर दूसरे लोग इसे जनता के बीच ख़ौफ़ पैदा करने का एक नया तरीक़ा। कुछ तो इसे यातायात पुलिस में भ्रष्टाचार बढ़ाने का एक नया औज़ार भी बता रहे हैं। मोटर नियम को सख्त बनाकर मोदी सरकार के परिवहन विभाग ने यातायात नियम का उल्लंघन रोकने की कोशिश तो ज़रूर की है। लेकिन इसे कामयाब बनाने के लिए केवल जुर्माने की राशि पांच से सौ गुणा तक बढ़ा देने से कुछ नहीं होगा। 
मौजूदा नियम को अगर काफ़ी सख़्ती से लागू किया जाता और जुर्माने की राशि को दुगना या तिगुना किया जाता, तो काफ़ी सुधार हो सकता था। उदाहरण के तौर पर आपको याद दिलाना चाहेंगे कि जब भारत में जब राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हुआ था तो दिल्ली में एक लेन केवल खिलाड़ियों की बस और आपातकालीन वाहनों के लिए निर्धारित की गई थी। यातायात पुलिस के कर्मी इस व्यवस्था को काफ़ी अनुशासन और कड़ाई से लागू करते दिखे थे, और नागरिकों ने भी नियमों का पालन किया था। इस बात से यह स्पष्ट होता है कि अगर पुलिस प्रशासन अपन काम क़ायदे से करे तो जनता को नीयमों का पालन करने में कोई भी दिक्कत नहीं होगी। 

ऐसा देखा गया है कि जब भारतीय कभी भी विदेश यात्रा पर जाते हैं तो वहाँ के नियमों का पालन निष्ठा से करते हैं लेकिन अपने ही देश में नियमों की धज्जियाँ इसी उम्मीद में उड़ाई जाती हैं किजो होगा देखा जाएगा

पुलिस अधिकारियों की सुनें तो उनके अनुसार नए नियम के जो भी चालान किए जा रहे हैं उनको कोर्ट में भेज जा रहा है क्योंकि अभी सड़क पर तैनात अधिकारियों को इतनी बड़ी राशि के चालान काट कर जुर्माने की रक़म लेने के लिए अधिकृत नहीं किया गया है। लेकिन इतना ज़रूर है कि इतने भारी जुर्माने की ख़बर सुन कर सभी शहरों में वाहन चालकों के ख़ौफ़ का अंदाज़ा पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों में प्रदूषण की जाँच करवाने की लम्बी क़तारों से लगाया जा सकता है, जो कि समय पर नहीं कराई गई थी। ऐसा तभी हुआ जब पुलिस प्रशासन ने नियम उल्लघन करने वालों के विरध अपना शिकंजा कसा। 

सोशल मीडिया में कुछ ऐसा भी देखा गया है जहाँ पर कुछ लोग, जिन्हें भारी जुर्माने का चालान दिया गया तो उनका ग़ुस्सा भी फूटा। मोटर व्हीकल (संशोधन) अधिनियम 2019 के प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई पुलिसकर्मी नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए पाए जाता है तो, उन्हें जुर्माने के रूप में दोगुनी राशि का भुगतान करना होगा। सरकार की यह पहल केवल पुलिस अधिकारियों पर नहीं बल्कि सभी सरकारी गाड़ियों के चालकों पर लागू होनी चाहिए।

उदाहरण के तौर पर, दिल्ली की सड़कों पर चलने वाली डीटीसी की बसों के ड्राइवर खुले आम नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हैं और पुलिस अधिकारी उनका चालान नहीं करते। मोटर व्हीकल (संशोधन) अधिनियम 2019 के लागू होने के बाद भी, इस आरोप को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। डीटीसी की बसों के ड्राइवर तो सीट बेल्ट का उपयोग करते हैं और ही अपनी बसों को सही लेन में चलाते हैं, इतना ही नहीं वे बसों को सड़क के बीचों बीच इस क़दर रोक देते हैं कि जाम लग जाता है। यदि कोई इनकी शिकायत दिल्ली यातायात पुलिस को करे तो उनका चालान करने के बजाए ये जवाब मिलता है किइस लापरवाही की शिकायत वे परिवहन विभाग को भेज देंगे इस दोहरे मापदण्ड को लेकर भी सवाल उठते रहते हैं। 

जानकारों की मानें तो इन सभी नियमों को लागू करने से पहले सरकार को चाहिए था कि नए जुर्माने का प्रचार उसी तरह से करना चाहिए था जिस तरह से नियम के लागू करने के बाद, भारी जुर्माने के शिकार हुए नागरिकों की प्रतिक्रिया का किया जा रहा है। जानकारी के आभाव में नागरिकों को दंडित किए जाने से बेहतर होता कि सरकार जगह जगह आधार कार्ड या वोटर कार्ड बनवाने जैसे अभियान चला कर जनता को नए नियमों से वाक़िफ़ कराती। इस अभियान के तहत लगने वाले कैम्प पर प्रदूषण की जाँच से लेकर वाहन बीमा करने की भी व्यवस्था रहती तो नोटबंदी के दौरान बेंकों के बाद पेट्रोल पंपों पर लगने वाली क़तार शायद छोटी होती। 

कुलमिलाकर देखा जाए तो इस समय सभी नागरिक इस ख़ौफ़ में या तो अपने वाहन चला नहीं रहे या मोटर व्हीकल (संशोधन) अधिनियम 2019 के लागू होने के बाद भारी जुर्माने से बचने के लिए अपने वाहन के सभी ज़रूरी दस्तावेज़ दुरुस्त कर रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं था की जनता को इन नियमों का ज्ञान पहले नहीं था, सड़क पर पड़ा हुआ पत्थर तो सबको दिखता है लेकिन जब तक उस पत्थर से ठोकर खा कर चोट खा लें कोई सीखता नहीं है। विपक्ष की मानें तो ये क़दम मोदी सरकार द्वारा उठाए गए नोटबंदी और जीएसटी जैसा ही है जिसमें जनता को सुकून का सपना दिखा कर ख़ौफ़ में जीने को मजबूर किया जा रहा है। लेकिन ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि ये क़दम फ़ायदे का था या नहीं। 

Monday, September 2, 2019

क्या न्यायाधीशों को सच बोलना मना है?

पटना हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति राकेश कुमार के खिलाफ उनके बाकी साथी न्यायाधीशों व मुख्य न्यायाधीश ने बैठक करके एक आदेश पारित किया, जिसके तहत न्यायमूर्ति राकेश कुमार से सभी मुकदमों की सुनवाई छीन ली गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि न्यायमूर्ति राकेश कुमार ने एक मुकदमें में फैसला देते हुए न्यायाधीशों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर तल्ख टिप्पणी की थी।

न्यायमूर्ति राकेश कुमार ने एक लंबे आदेश में बताया कि जब से उन्होंने न्यायाधीश का काम संभाला, तब से उन्होंने देखा कि किस तरह उनके साथी न्यायाधीश भ्रष्टाचार व अनैतिक आचरण में लिप्त हैं। उन्होंने यह भी देखा कि उनके साथी न्यायाधीश छोटे-छोटे लाभ के लिए किस तरह मुख्य न्यायाधीश की चाटूकारिता करते हैं।

न्यायमूर्ति राकेश कुमार का इतना आक्रामक आदेश और न्यायाधीशों के आचरण पर इतनी बेबाक टिप्पणी न्यायपालिका के माननीय सदस्यों को स्वीकार नहीं हुई और उन्होंने न्यायमूर्ति राकेश कुमार को सच बोलने की सजा दे डाली। 

ये कैसा विरोधाभास है? जबकि अदालतों में बयान देने से पहले धर्म ग्रंथ पर हाथ रखवाकर यह शपथ दिलाई जाती है कि, ‘मैं जो भी कहूंगा, सच कहूंगा और सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा।’ मतलब यह है कि याचिकाकर्ता या प्रतिवादी या गवाह से तो सच बोलने की अपेक्षा की जाती है, पर उनके वक्तव्यों पर अपना फैसला देने वाले न्यायाधीश को सच बोलने की आजादी नहीं है। क्या ये सच नहीं है कि निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालयों तक में अनेक न्यायाधीशों के आचरण समय-समय पर अनैतिक पाये गए हैं और उन पर सप्रमाण भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं। 

भारत के मुख्य न्यायाधीश जे. एस. वर्मा ने एक बार सर्वोच्च न्यायालय की खुली अदालत में ये कहा था कि निचली अदालतों में भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। इतना ही नहीं उनके बाद बने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस पी भरूचा ने दिसंबर 2001 में केरल के कोवलम् में एक सेमीनार को संबोधित करते हुए कहा था कि, ‘उच्च न्यायालयों में 20 फीसदी न्यायाधीश भ्रष्ट हैं। भ्रष्ट न्यायाधीशों के खिलाफ जांच होनी चाहिए और उन्हें नौकरी से निकाल देना चाहिए।’ साथ ही उन्होने यह भी कहा था कि मौजूदा कानून न्यायाधीशों के भ्रष्टचार से निपटने में नाकाफी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए जो संवैधानिक प्रक्रिया आज है, वह अत्यन्त जटिल है। इस प्रक्रिया के तहत लोकसभा के 100 सांसद या राज्यसभा के 50 सांसद जब हस्ताक्षरयुक्त नोटिस लोकसभा या राज्यसभा के सभापतियों को देते हैं और महा अभियोग प्रस्ताव पर बहस होती है और अगर महा अभियोग में आरोप सिद्ध हो जाते है और दो तिहाई सदन की सहमति होती है, तब इसकी सूचना राष्ट्रपति को दी जाती है, जो न्यायाधीश को बर्खास्त करते हैं। संविधान की धारा 124 व 218 में इस पूरी प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन है। 

उच्च न्यायपालिका के सदस्यों में 20 फीसदी भ्रष्ट हैं, यह स्वीकारोक्ति भारत के पदासीन मुख्य न्यायाधीश की है। 2001 से अब यह प्रतिशत 20 से बढ़कर कितना अधिक हो गया है, इसका कोई सर्वेक्षण नहीं हुआ है। अगर मान लें कि 20 फीसदी ही न्यायधीश भ्रष्ट हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि जिनके मुकदमें इन न्यायाधीशों के सामने सुनवाई के लिए जाते होंगे, उनमें उन्हें न्याय नहीं मिलता होगा। क्योंकि भ्रष्ट न्यायाधीश पैसे लेकर फैसला सुनाने में संकोच नहीं करते होंगे। 

इस स्वीकारोक्ति को आज 18 साल हो गए। इन दो दशकों में संसद ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे देश की जनता को भ्रष्ट न्यायाधीशों से छुटकारा मिल पाता। यह स्वीकारोक्ति भी न्यायमूर्ति भरूचा ने तब की थी, जब मैंने 1998-2000 के बीच सर्वोच्च न्यायालय के दो मुख्य न्यायाधीशों और एक न्यायधीश के भ्रष्टाचार को सप्रमाण अपने साप्ताहिक अखबार में छापकर देश के सामने उजागर करने की हिम्मत दिखाई थी। इस ‘दुस्साहस’ का परिणाम यह हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय के जमीन घोटालों में आरोपित मुख्य न्यायाधीश ने मुझ पर जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय में अदालत की अवमानना का मुकदमा दायर करवाया। जिसका मैंने डटकर मुकाबला किया और इस विषय को अंतर्राष्ट्रीय टैलीवीजन और अखबारों में खूब प्रसारित किया। तब देश में ऐसा माहौल बन गया था कि न्यायमूर्ति भरूचा को यह कड़वा सच सार्वजनिक रूप से स्वीकारना पड़ा।

इस संदर्भ में यह महत्वपूर्णं है कि अदालत की अवमानना कानून का नाजायज उपयोग करके भ्रष्टाचार में लिप्त न्यायाधीश आवाज उठाने वाले को प्रताड़ित करते हैं। जो प्रयास मेरे विरूद्ध भी किया गया और तब मैंने पुस्तक लिखी ‘अदालत की अवमानना कानून का दुरूपयोग।’ इस पर टिप्पणी करते हुए ‘प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया’ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति पी बी सांवत का कहना था कि, ‘इस संघर्ष ने अदालत की अवमानना कानून के दुरूपयोग को एक मुद्दा बना दिया।’ दुख की बात ये है कि इतना संघर्ष करने के बाद भी आज तक स्थिति ज्यों की त्यों है। तभी तो न्यायपालिका के खिलाफ सच बोलने वाले एक हम जैसे पत्रकार या साधारण नागरिक को नहीं, बल्कि स्वयं पटना हाईकोर्ट के न्यायधीश को न्यायपालिका का आज कोपभाजन बनना पड़ा है। 

ऐसे में देश के जागरूक नागरिकों को सभी सांसदों से अपील करनी चाहिए कि संविधान में इस तरह का संशोधन हो, जिससे न्यायपालिका के सदस्यों पर भ्रष्टाचार या अनैतिक आचरण के प्रामाणिक आरोप लगाने वाला कोई भी साहसी व्यक्ति अदालत की प्रताड़ना का शिकार न हो।

Monday, August 19, 2019

अचानक क्यों बढ़ रही हैं देश की आर्थिक हालत की चर्चाएँ

देश की आर्थिक स्थिति को लेकर मीडिया में चर्चाएं अचानक बढ़ गई हैं। पिछली तिमाहीं में कार और दो पहिया वाहनों की माँग में तेज़ी से आयी गिरावट के बाद तो कुछ ज्यादा ही चिंता जताई जाने लगी है। उधर विश्व में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत का ओहदा घट जाने की खबर ने भी ऐसी चर्चाओं को और हवा दे दी। अंदरूनी तौर पर वास्तविक स्थिति क्या है, इसका पता फ़ौरन नहीं चलता। हकीकत बाद में पता चलेगी। लेकिन फिलहाल सरकार उतनी चिंतित नहीं दिखाई देती। उसके पास कुछ तर्क भी हैं। मसलन जीएसटी से कर संग्रह पर असर पड़ा नहीं दिख रहा है। दूसरा तर्क यह कि अपने देश में उत्पादन में सुस्ती का एक कारण वैश्विक मंदी है। बहरहाल, आर्थिक हालत अभी उतनी बुरी न सही लेकिन आगे के लिए सतर्कता बरतना हमेशा ही जरूरी माना जाता है।
सकल घरेलू उत्पाद में आधा पौन फीसद की घटबढ़ एक रूझान तो हो सकता है लेकिन यह किसी आफत का लक्षण नहीं कहा जा सकता। इसी आंकड़े से देश की अर्थव्यवस्था का आकार तय होता है। हाल ही में हम विश्व में पांचवे से खिसककर सातवें पर भले ही आ गए हों लेकिन यह उतनी चिंताजनक बात है नहीं। बल्कि यह आंकड़ा हमें उत्पादक कामकाज में सुधार के लिए प्रेरित कर सकता है। 
पिछली तिमाही में वाहनों की बिक्री में फिलहाल कमी ही दिखी है, ये उघोग खत्म नहीं हो गया है। विशेष प्रयासों से देश में आर्थिक गतिविधियाँ कभी भी बढ़ाई जा सकती हैं। देश में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ाने के कई उपाय किए जा सकते है और स्थिति को सुधारा जा सकता है। खबरें हैं कि वित्तमंत्री इस काम पर लग भी गई हैं। फिर भी सावधानी के तौर पर  यह समय देश की माली हालत के कई पहलुओं पर गौर करने का जरूर है।
आर्थिक मामलों के जानकार बताते रहते हैं कि अपने देश की अर्थव्यवस्था तीन क्षेत्रों में वृद्धि से तय होती है। ये क्षेत्र हैं विनिर्माण, सेवा और कृषि। मौजूदा चिंता विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में सुस्ती से उपजी है। कृषि को कोई लेखे में नही ले रहा है। भले ही जीडीपी में कृषि का योगदान थोड़ा सा ही बचा हो लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि कृषि ही वह क्षेत्र है जो देश में आधी से ज्यादा आबादी को उत्पादक काम में लगाए हुए है। और यही वह क्षेत्र है जिसमें बेरोजगारी की समस्या ज्यादा बढ़ गई है। इसी क्षेत्र के लोगों को उत्पादक कार्यो में लगाने की गुंजाइश भी है और मौजूदा हालात से निपटने का मौका भी इसी क्षेत्र में बन सकता है।
कई विद्वानों की तरफ से सुझाव मिल रहा है कि देश में किसी भी तरह से मांग बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए। लेकिन मांग बढ़ाने के लिए क्या यह जरूरी नहीं कि लोगों की जेब में ज्यादा पैसा हो। सरकार ने किसानों के बैंक खातों में हर महीने पांच सौ रूप्ए डालने का फैसला किया था। इस योजना में  सरकारी खजाने से हर साल 90 हजार करोड़ निकल कर किसानों की जेब में जाना है। कुछ विश्लेषकों ने अंदाजा लगाया था कि यह रकम देश में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ा देगी और उत्पादन में सुस्ती कम होगी। लेकिन पिछले छह महीनों का अनुभव यह है कि इस योेजना का ऐसा असर अभी दिखा नहीं है। हो सकता है कि इस कारण से न दिखा हो क्योंकि अभी यह रकम सभी किसानों के खातों में पहुंच नहीं पाई है। अगर वाकई देश में मांग घटने की समस्या बड़ी होती जा रही है तो किसानों को रकम भेजने का काम फौरन तेज किया जाना चाहिए। लोगों की जेबों में पैसा डालने के तरीके अपनाए जाने चाहिए।
सरकार के स्तर पर सतर्कता बरतने के लिए एक क्षेत्र और है। यह मामला भी कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। वह ये है कि देश में बारिश के आंकड़े सामान्य नहीं हैं। बारिश के दो महीने से ज्यादा गुजरने के बाद भी देश में नौ फीसद वर्षा कम हुई है। आने वाले समय में अगर देश में औसम वर्षा की भरपाई न हुई तो कृषि उत्पादन पर भारी असर पड़ सकता है। वैसे यह अभी उतनी चिंता की बात नहीं है। फिर भी किसी ख़तरे की आशंका पर नज़र तो रखनी ही पड़ेगी।
आर्थिक मंदी की सबसे ज़्यादा मार रोजगार पर पड़ती है। हम पहले से ही बेरोेजगारी से परेशान हैं। इस तरह से वर्तमान परिस्थितियों में अगर सबसे ज्यादा सतर्कता की जरूरत है तो वह बेरोज़गारी के मोर्चे पर चैकस रहने की है।
एक तबका महंगाई को लेकर परेशानी जता रहा है। हालांकि यह शिकायत खाने पीने की कुछ चीजों को लेकर है। लेकिन देश में महंगाई की चिंता का तुक बैठता नहीं है। जहां मंदी के लक्षण हो वहां शुरूआती तौर पर माल बिकने की ही परेशानी खड़ी होती है और दाम गिरते हैं। विद्वानों ने इस बात पर ज्यादा गौर नहीे किया है कि पिछला एक साल खाद्य महंगाई की दर ज्यादा नहीं बढ़ने का रहा है। कृषि उत्पाद के दाम न बढ़ने से किसान बहुत परेशान रहे हैं। देश में मौसम की गड़बड़ी उनको और ज्यादा चिंता में डाले है। 

कुल मिलाकर मंदी की आहट के इस दौर में सरकार को अगर किसी की चिंता करने की जरूरत है तो सबसे ज्यादा किसानों की चिंता करने की है।

Monday, August 12, 2019

अब कश्मीर में क्या होगा?


जहाँ सारा देश मोदी सरकार के कश्मीर कदम से बमबम है वहीं अलगाववादी तत्वों के समर्थक अभी भी मानते हैं कि घाटी के आतंकवादी फिलिस्तानियों की तरह लंबे समय तक आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते रहेंगे। जिसके कारण अमरीका जैसे-शस्त्र निर्माता देश भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को बढ़ाकर हथियारों बिक्री करेंगे। उनका ये भी मानना है कि केंद्र के निर्देश पर जो पूंजी निवेश कश्मीर में करवाया जाएगा, उसका सीधा लाभ आम आदमी को नहीं मिलेगा और इसलिए कश्मीर के हालात सामान्य नहीं होंगे। पर ये नकारात्मक सोच है।

इतिहास गवाह है कि मजबूत इरादों से किसी शासक ने जब कभी इस तरह के चुनौतीपूर्णं कदम उठाये हैं, तो उन्हें अंजाम तक ले जाने की नीति भी पहले से ही बना ली होती है।

कश्मीर में जो कुछ मोदी और शाह जोड़ी ने किया, वो अप्रत्याशित और ऐतिहासिक तो है ही, चिरप्रतिक्षित कदम भी है। हम इसी कॉलम में कई बार लिखते आए हैं, कि जब कश्मीरी सारे देश में सम्पत्ति खरीद सकते हैं, व्यापार और नौकरी भी कर सकते हैं, तो शेष भारतवासियों को कश्मीर में ये हक क्यों नहीं मिले?

मोदी है, तो मुमकिन है। आज ये हो गया। जिस तरह का प्रशासनिक, फौजी और पुलिस बंदोबस्त करके गृहमंत्री अमित शाह ने अपनी नीति को अंजाम दिया है, उसमें अलगावादी नेताओं और आतंकवादियों के समर्थकों के लिए बच निकलने का अब कोई रास्ता नहीं बचा। अब अगर उन्होंने कुछ भी हरकत की, तो उन्हें बुरे अंजाम भोगने होंगे। जहां तक  कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी का प्रश्न है, वो तो हमेशा ही आर्थिक प्रगति चाहती है। जो बिना अमन-चैन कायम हुए संभव नहीं है। इसलिए भी अब कश्मीर में अराजकता के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची।

कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर, गृहमंत्री ने वहंा की कानून व्यवस्था पर अपना सीधा नियंत्रण स्थापित कर लिया है। अब जम्मू-कश्मीर पुलिस की जबावदेही वहां के मुख्यमंत्रियों के प्रति नहीं, बल्कि केंद्रीय गृहमंत्री के प्रति होगी। ऐसे में अलगाववादी शक्तियों से निपटना और भी सरल होगा।

जहां तक स्थानीय नेतृत्व का सवाल है। कश्मीर की राजनीति में मुफ्ती मोहम्मद सईद और मेहबूबा मुफ्ती ने सबसे ज्यादा नकारात्मक भूमिका निभाई है। अब ऐसे नेताओं को कश्मीर में अपनी जमीन तलाशना मुश्किल होगा। इससे घाटी में से नये नेतृत्व के उभरने की संभावनाऐं बढ़ गई हैं। जो नेतृत्व पाकिस्तान के इशारे पर चलने के बजाय अपने आवाम के फायदे को सामने रखकर आगे बढ़ेगा, तभी कामयाब हो पाऐगा।

जहां तक कश्मीर की तरक्की की बात है। आजादी के बाद से आज तक कश्मीर के साथ केंद्र की सरकार ने दामाद जैसा व्यवहार किया है। उन्हें सस्ता राशन, सस्ती बिजली, आयकर में छूट जैसी तमाम सुविधाऐं दी गई और विकास के लिए अरबों रूपया झोंका गया। इसलिए ये कहना कि अब कश्मीर का विकास तेजी से करने की जरूरत है, सही नहीं होगा। भारत के अनेक राज्यों की तुलना में कश्मीरीयों का जीवन स्तर आज भी बहुत बेहतर है।

जरूरत इस बात है कि कश्मीर के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना वहाँ पर्यटन, फल-फूल और सब्जी से जुड़े उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए और देशभर के लोगों को वहां ऐसे उद्योग व्यापार स्थापित करने में मदद दी जाऐ। ताकि कश्मीर की जनता शेष भारत की जनता के प्रति द्वेष की भावना से निकलकर सहयोग की भावना की तरफ आगे बढ़े।
आज तक सबसे ज्यादा प्रहार तो कश्मीर में हिंदू संस्कृति पर किया गया। जब से वहां मुसलमानों का शासन आया, तब से हजारों साल की हिंदू संस्कृति को नृशंस तरीके से नष्ट किया गया। आज उस सबके पुनरोद्धार की जरूरत है। जिससे दुनिया को एक बार फिर पता चल सके कि भारत सरकार कश्मीर में ज्यात्ती नहीं कर रही थी, जैसा कि आज तक दुष्प्रचार किया गया, बल्कि मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदूओं पर अत्याचार किये, उनके शास्त्र और धम्रस्थल नष्ट किये और उन्हें खदेड़कर कश्मीर से बाहर कर दिया। जिसे देखकर सारी दुनिया मौन रही। श्रीनगर के सरकारी संग्रहालय में वहाँ की हिंदू संस्कृति और इतिहास के अनेक प्रमाण मौजूद हैं पर वहाँ की सरकारों ने उनको उपेक्षित तरीकों से पटका हुआ है। जब हमने संग्रहालय के धूप सेंकते कर्मचारियों से संग्रहालय की इन धरोहरों के बारे में बताने को कहा तो उन्होंने हमारी ओर उपेक्षा से देखकर कहा कि वहाँ पड़ी हैं, जाकर देख लो। वो तो गनीमत है कि प्रभु कृपा से ये प्रमाण बचे रह गए, वरना आतंकवादी तो इस संग्रहालय को ध्वस्त करना चाहते थे। जिससे कश्मीर के हिंदू इतिहास के सबूत ही नष्ट हो जाएँ। अब इस सबको बदलने का समय आ गया है। देशभर के लोगों को उम्मीद है कि मोदी और शाह की जोड़ी के द्वारा लिए गए इस ऐतहासिक फैसले से ऐसा मुमकिन हो पायेगा।