Monday, June 1, 2026

गौ-माता राष्ट्रीय पशु घोषित हो !

पश्चिम बंगाल के चुनाव के नतीजों ने वो कर दिखाया जिसका दशकों से इंतज़ार था। पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने बक़रा ईद पर गौवंश की बलि न चढ़ाने का फ़ैसला किया है। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के मुसलमान संगठनों ने भारत सरकार से गौ-माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग की है। उन्होंने गौ हत्या करने वालों और गौ मांस का निर्यात करने वालों को सख्त सज़ा दिए जाने का क़ानून बनाने की भी माँग की है। जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है तब से लगातार गौ हत्या को लेकर गौ रक्षकों द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में आक्रोश व्यक्त किया जाता रहा है। इतना ही नहीं गौ मांस खाने व ले जाने के संदेह में कई बार मुसलमानों पर हिंसक हमले भी किए गए हैं। इस सबसे मुसलमानों के बीच ये संदेश गया है कि हिंदुस्तान में गौ वंश की हत्या को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसलिए उनका ये ताज़ा फ़ैसला और गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग एक समझदारी भरा कदम माना जाना चाहिए। मुस्लिम समाज के नेताओं को यहीं माँग देश के अन्य प्रांतों से भी उठानी चाहिए।   

उल्लेखनीय है कि हमारे पूरे इतिहास में, इस देश के शासकों और आदर्श व्यक्तियों ने गाय की रक्षा और पोषण किया है। राजा पृथु, जिनके नाम पर पृथ्वी को पृथ्वीकहा जाता है, ने पृथ्वी के स्वरूप वाली गाय का दोहन कर पृथ्वी पर अकाल को समाप्त किया और मानवता की रक्षा की। भगवान श्रीकृष्ण एक गोपाल (गाय चराने वाले) थे। अर्जुन ने विराटनगर के युद्ध में गायों की रक्षा के लिए 14 वर्ष का और निर्वासन झेलने का जोखिम उठाना उचित समझा। राजा नहुष को ऋषि च्यवन के जीवन के बराबर पुरस्कार देकर मछुआरों को मुआवजा देना पड़ा, जिसके लिए उन्होंने उन्हें एक गाय दान कर दी। चोल राजा मनु नीति चोलन ने अपने पुत्र वीधिविदंगन को मार डाला, क्योंकि उसके रथ के पहियों के नीचे एक गाय का बछड़ा कुचल गया था।


मुगल सम्राट अकबर (1556–1605), जहांगीर (1605–1627), और अहमद शाह (1748–1754) ने भी गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाए थे। मैसूर के सुल्तान हैदर अली (1761-82) ने गौ-हत्या को दंडनीय अपराध बनाया, जिसमें अपराधियों के हाथ काटे जाते थे। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में, सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पूरे राज्य में गौ-हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर ने 1857 में गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाया, गोमांस खाने पर रोक लगाई और गाय की हत्या करने वाले किसी भी व्यक्ति को तोप से उड़ाकर सजा देने की घोषणा की।


मराठा, जो सभी धर्मों के प्रति समावेशी और सहिष्णु माने जाते थे, उन्होंने गौ-हत्या को रोकने के लिए व्यापक कदम उठाए और गायों को मारने वालों से कठोरता से निपटा। कई मामलों में उन्हें फाँसी भी दी गई। उन्होंने 1790 के दशक के अंत में बसेन (वर्तमान वसई, महाराष्ट्र) के आसपास नाकेबंदी भी कर दी थी, ताकि गायों की लाशों को बॉम्बे और सलसेट के कसाइयों तक तस्करी से न पहुँचाया जा सके। हिंदू धर्म सम्राट करपात्री जी महाराज से लेकर आज तक हर संत और सनातन धर्मी गौ वंश की हत्या रोकने की मांग करता आया है। फिर भी रोज़ाना भारत से हज़ारों ट्रक गौ वंश काटने के लिए अवैध रूप से बांग्लादेश भेजा जाता है। आश्चर्य है कि बीएसएफ उसे रोक क्यों नहीं पाती?   


दरअसल गौरक्षा का मुद्दा बिल्कुल धार्मिक नहीं है। यह तो शुद्धतम रूप में लोगों की कृषि, अर्थव्यवस्था और उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है। हजारों साल पहले भारत के ऋषियो ने गौवंश के असीमित लाभ जान लिए थे। इसलिए उन्होंने भारतीय समाज में गौवंश को इतना महत्व दिया। अंग्रेज़ शासकों ने बाकायदा रणनीति बनाकर भारतीय गौवंश को पूरी तरह नष्ट करने का अभियान चलाया, जो आज तक चल रहा है। क्योंकि वह जानते थे कि हजारों साल से भारत की आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शक्ति का स्रोत गौ आधारित कृषि रहा था। बिना गौवंश की हत्या किए भारत और भारतीयों को कमजोर नहीं किया जा सकता था। आजादी के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इसमें बड़ी होशियारी से पर्दे के पीछे से भूमिका निभाई। उन्होंने इस तरह की मानसिकता तैयार की कि घर-घर में पलने वाली गाय हमारी उपेक्षा और हीनभावना का शिकार हो गयी। जिससे गाय का दूध, दही, मक्खन, घी और छाछ सेवन करके हर भारतीय परिवार स्वस्थ, सुखी और संस्कारवान रहता था। आज आम भारतीयों को जीवन के लिए पोषक तत्व प्राप्त नहीं हैं। दूध, दही, घी के नाम पर जो बड़े ब्रांडो के नाम से बेचा जा रहा है, उसमें कितने कीटनाशक, रासायनिक खाद्य और नकली तत्व मिले हैं, इसका अब हिसाब रखना भी मुश्किल है। नतीजा सामने है कि मेडीकल का व्यवसाय हर गली व शहर में तेजी से पनप रहा है।


चिंता और दुख की बात ये है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन पर जीने वाले कैसे देश के हित में सोच सकते हैं ? वह तो वही लिखेंगे और बोलेंगे, जो उनके कॉरपोरेट आका उन्हें लिखने को कहेंगे। इस लॉबी के खिलाफ देशभक्तो को संगठित होकर आवाज उठानी होगी। पर हिंसा से नहीं तर्क और प्रमाण के साथ। भारतीय गौवंश की श्रेष्ठता को भारतीय जनमानस के सामने लगातार हर मंच पर इस तरह रखना होगा कि एक बार फिर भारतीय परिवार गौवंश को अपने आंगन में स्थान दे।


गांवों में तो यह आसानी से संभव है, पर दुख की बात है कि वहां भी आज गौवंश की उपेक्षा हो रही है। हमने हमेशा कहा है कि गाय गौशाला में नहीं, बल्कि जब हर घर के आंगन में पलेंगी, तब गौवंश की रक्षा होगी। जिनके पास स्थान का अभाव है, उनकी तो मजबूरी है। पर वह भी भारतीय गौवंश के उत्पादों को सामूहिक रूप से प्रोत्साहन देकर अपने परिवार और समाज का भला कर सकते है। भूटान में हर व्यक्ति सुखी है, क्योंकि उनका जीवन गौ और कृषि आधारित है। उन्हें दुनिया के साथ दौड़ने की इच्छा नहीं है। क्योंकि वह तीव्र औद्योगीकरण के दुष्परिणामों से परिचित हैं।

फिर भारत क्यों औद्योगीकरण की और ‘बीफ’ निर्यात की अंधी दौड़ में भागना चाहता है, जिसका फल भौतिक प्रगति तो हो सकता है, पर उससे समाज सुखी नहीं होता। बल्कि समाज और ज्यादा असुरक्षित होकर तनाव में आ जाता है। भारत की सनातन संस्कृति सादा जीवन और उच्च विचार को जीवन में अपनाने की प्रेरणा देती है। इन्हीं मूल्यों के कारण भारतीय समाज हजारों साल से निरंतर जिंदा रहा है। जबकि पश्चिमी समाज ने एक शताब्दी के अंदर ही औद्योगीकरण के नफे और नुकसान, दोनों का अनुभव कर लिया है। अब वह भारतीय जीवन मूल्यों की ओर आकर्षित हो रहा है। ऐसे में भारत को फिर से विश्वगुरू बनना होगा। जो गौ आधारित जीवन और वेद आधारित ज्ञान से ही संभव है। इसमें न तो कोई अतिश्योक्ति है और न ही कोई धर्मांधता। कहीं ऐसा न हो कि सब कुछ लुटाकर होश में आए, तो क्या किया। 

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