भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसके नेताओं की गरिमा और संवाद की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। लेकिन हाल के वर्षों में राजनीतिक बयानों में अभद्र और व्यक्तिगत हमले बढ़ते जा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण 25 अक्टूबर 2026 को पटना में मिला, जहां कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भीड़ में से किसी के “मोदी नहीं जाएंगे” कहने पर जवाब दिया,“मोदी का बाप भी जाएगा।” इस विवादित बयान के बाद भाजपा ने इसे जहरीली और अमर्यादित राजनीति बताते हुए माफी की मांग की और देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए।
संसदीय परंपरा में असंसदीय भाषा वह होती है जो अपमानजनक, अभद्र या व्यक्तिगत हमला करने वाली हो। संसद के अंदर स्पीकर ऐसी भाषा हटा सकते हैं, लेकिन बाहर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है। चुनावी मौसम में यह और तीखा हो जाता है। खड़गे का यह बयान नया नहीं है; इससे पहले भी वे प्रधानमंत्री को “आतंकवादी” कह चुके हैं और भाजपा-आरएसएस की तुलना “जहरीले सांप” से कर चुके हैं। सोशल मीडिया के युग में ऐसे बयान तुरंत वायरल हो जाते हैं और लाखों लोगों तक पहुंचते हैं।
ऐसा नहीं है कि अभद्र भाषा का प्रयोग किसी एक राजनैतिक दल द्वारा ही किया गया हो। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहाँ कांग्रेस के नेताओं को भी अभद्र भाषा का सामना करना पड़ा। इनमें प्रमुख बयान हैं, “कांग्रेस की विधवा”, “जर्सी गाय”, “50 करोड़ की गर्लफ्रेंड”, “हाइब्रिड बछड़ा” आदि। यदि इतना कुछ काफ़ी नहीं था तो एक लाइव टीवी डिबेट में भाजपा के प्रवक्ता ने कांग्रेस के प्रवक्ता की माँ के प्रति काफ़ी अपशब्द कहे जो कि किसी भी सभ्य समाज में सहन नहीं किए जा सकते। लेकिन इस सबके बावजूद भाजपा ने अपने उस प्रवक्ता पर कोई कारवाही नहीं की। अब खड़गे के बयान के बाद कांग्रेस भी इन सभी बयानों को खुल कर याद दिला रही है।
जब शीर्ष नेता सार्वजनिक मंच पर परिवार को निशाना बनाते हैं तो नागरिकों में नेतृत्व के प्रति सम्मान कमजोर होता है। खासकर युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है, सोचती है कि अगर देश के बड़े नेता खुले मंच पर ऐसी भाषा इस्तेमाल कर सकते हैं तो सामान्य जीवन में क्या होगा? इससे राजनीति को ‘गंदा खेल’ मानने की धारणा मजबूत होती है और मतदान में उदासीनता बढ़ती है। कई नागरिक मानते हैं कि ऐसी भाषा से लोकतंत्र की विश्वसनीयता घटती है।
पार्टी कार्यकर्ता अपने नेताओं को आदर्श मानते हैं। जब शीर्ष नेता व्यक्तिगत हमला करते हैं तो कार्यकर्ताओं में भी यही प्रवृत्ति बढ़ती है। रैलियों में अभद्र नारे और कभी-कभी हिंसक झड़पें देखने को मिलती हैं। खड़गे के बयान के बाद पटना में पुतले फूंके गए और माफी की मांग की गई, यह दिखाता है कि एक बयान कितनी तेजी से सड़क पर उतर सकता है। ऐसी घटनाओं से आंतरिक कलह और मनोबल गिरने का खतरा भी बना रहता है।
नेता एक दूसरों पर बयान दें वो तो आजकल की राजनीति में आम बात हो चुकी है। लेकिन ऐसे में मीडिया पर इसका असर और भी चिंताजनक है। जब नेता तीखे सवालों पर “पेड मीडिया” या “दलाल” कहते हैं या शारीरिक धमकी देते हैं तो पत्रकार सवाल पूछने से हिचकिचाते हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी सक्रिय हो जाती है। खड़गे मामले में भी विवाद तुरंत सुर्खियों में आ गया, लेकिन कई बार पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों प्रभावित होती है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भारत में पत्रकारों पर हमलों की संख्या बढ़ने का जिक्र है।
महिलाओं और विपक्षी नेताओं के प्रति लिंगभेदी या व्यक्तिगत टिप्पणियां भी आम हैं। “आइटम” या शारीरिक बनावट पर हमले न केवल अपमानजनक हैं बल्कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को हतोत्साहित करते हैं। नीतिगत मतभेद की जगह परिवार, जाति या धर्म पर हमले राजनीतिक बहस का स्तर गिरा देते हैं।
सवाल है कि इसका समाधान क्या है? सबसे पहले नेताओं को स्वयं अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना होगा। संसद और विधानसभाओं के बाहर भी नैतिक दिशानिर्देश लागू होने चाहिए। मीडिया को ऐसी भाषा को बढ़ावा देने के बजाय जिम्मेदारी से रिपोर्ट करना चाहिए। नागरिक सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री शेयर करने से बचें और विरोध जताएं। राजनीतिक दलों को कार्यकर्ताओं को नीतियों पर बहस का प्रशिक्षण देना चाहिए, व्यक्तिगत हमलों का नहीं। महिलाओं के प्रति सम्मान के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून जरूरी हैं।
लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन व्यक्तिगत और अभद्र भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। खड़गे का ताजा बयान और उसके बाद का बवाल इसी प्रवृत्ति की ताजा मिसाल है। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी हमारा लोकतंत्र सच्चे अर्थों में मजबूत होगा।





















