Monday, November 2, 2026

सोशल मीडिया का ‘स्टॉकअप’ हंगामा: क्या यह सिर्फ चिंता फैलाने का खेल है?

बीते कुछ दिनों से दुनिया भर के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक ही तरह के पोस्ट वायरल हो रहे हैं। इनमें दावा किया जा रहा है कि ‘20 से 33 देशों’ ने अपने नागरिकों से खाद्य पदार्थ, पानी, दवाइयाँ और नकदी का स्टॉक जमा करने को कहा है। कई पोस्ट इसे मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध से जोड़ते हुए किसी बड़े आसन्न संकट का संकेत बता रहे हैं। कुछ जगहों पर तो ‘तीसरे विश्व युद्ध’ या ‘तेल संकट’ जैसी आशंकाएँ खुलकर व्यक्त की जा रही हैं। सवाल यह है कि ये चेतावनियाँ कितनी वास्तविक हैं? इनके पीछे कौन-सा संकट छिपा है? और भारत को इससे क्या सीखना चाहिए?


वास्तविकता यह है कि कई देशों ने घरेलू तैयारियों की
सलाह दी है, लेकिन यह कोई एक साथ जारी की गई वैश्विक आपात चेतावनी नहीं है। ब्रिटेन ने 22 अक्टूबर को ‘बी रेडी’ अभियान शुरू किया, जिसमें परिवारों को तीन दिन (72 घंटे) के लिए पानी, टिन फूड, रेडियो, नकदी और पॉवर बैंक रखने की सलाह दी गई। फ्रांस और कुछ अन्य यूरोपीय देशों ने भी 72 घंटे की किट की बात कही। जापान भूकंप और ज्वालामुखी जोखिमों को देखते हुए तीन से सात दिन की आपूर्ति की सलाह दे रहा है। स्वीडन का ‘इन केस ऑफ़ क्राइसिस ऑर वॉर’ गाइड एक सप्ताह की तैयारी सुझाता है, जबकि जर्मनी दस दिन तक की बात करता है।



ये सलाहें न तो एक ही दिन जारी की गईं और न ही सभी देशों में एक जैसी हैं। कई देश पहले से ही ऐसी तैयारियाँ रखे हुए थे। अमेरिका में Ready.gov की सलाह वर्षों पुरानी है। भारत में भी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) घरेलू आपातकालीन किट रखने की सलाह देता है, हालांकि इसमें निश्चित दिनों की संख्या नहीं बताई गई है। थाईलैंड जैसे देशों के प्रधानमंत्री ने अपने नागरिकों को घबराहट से बचने और खाद्य सुरक्षा पर भरोसा रखने को कहा है।



कुल मिलाकर देखा जाए तो यह कोई एक ‘अपेक्षित संकट’ नहीं है। बल्कि कई अलग-अलग जोखिम हैं जो कि एक साथ बढ़ रहे हैं। यूरोप में रूस की हाइब्रिड वारफेयर बढ़ रही है, साइबर हमले, ड्रोन घुसपैठ, तोड़फोड़ और बुनियादी ढाँचे पर खतरे बने हुए हैं। मध्य-पूर्व में ईरान के साथ युद्ध फरवरी 2026 से चल रहा है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और इजराइल मिडटर्म चुनाव (3 नवंबर) के बाद ईरान पर छोटी लेकिन तीव्र कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं। खाड़ी देशों को भी संभावित जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहने को कहा गया है। इसके अलावा जलवायु संबंधी चरम मौसम, बिजली ग्रिड और संचार प्रणालियों पर साइबर खतरे, तथा जापान जैसे देशों में प्राकृतिक आपदाएँ भी शामिल हैं।



देखा जाए तो ये जोखिम वास्तविक हैं। 2022 के बाद से यूरोप में रूसी हाइब्रिड गतिविधियों में वृद्धि दर्ज की गई है। मध्य-पूर्व में तेल आपूर्ति और शिपिंग मार्गों पर खतरा बना हुआ है। लेकिन जानकर मानते हैं कि इन्हें ‘कल से विश्व युद्ध शुरू हो जाएगा’ जैसा एक एकल संकट नहीं माना जा सकता।


अगर मध्य-पूर्व में संघर्ष फिर से तीव्र होता है, तो सबसे बड़ा झटका तेल की कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ेगा। भारत जैसे तेल आयातक देश सबसे अधिक प्रभावित होंगे। यूरोप में बुनियादी ढाँचे पर हमले बिजली, परिवहन और संचार को बाधित कर सकते हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होंगी। खाद्य सुरक्षा भी दबाव में आ सकती है, खासकर तब यदि वैश्विक व्यापार बाधित हो। सोशल मीडिया पर फैली घबराहट से ही ब्रिटेन में टिन फूड, टॉयलेट पेपर और रेडियो की बिक्री अचानक बढ़ गई। यह दिखाता है कि सूचना का गलत प्रसार वास्तविक कमी भी पैदा कर सकता है।


सवाल उठता है कि क्या इस चेतावनी को सच मन लिया जाए? आंशिक रूप से हाँ। सोशल मीडिया पर सामान्य तैयारी की सलाहों को ‘आसन्न आपदा’ या ‘सरकारों की गुप्त चेतावनी’ के रूप में पेश किया जा रहा है। कई पोस्ट पुरानी या अलग-अलग समय की सलाहों को एक साथ जोड़कर सनसनी पैदा कर रहे हैं। मध्य-पूर्व युद्ध को लेकर पहले से मौजूद चिंता को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। गौरतलब है कि ऐसा पैटर्न 2020 के कोविड काल या अन्य संकटों के दौरान भी देखा गया था।


हालाँकि, इसे पूरी तरह से फर्जी या केवल ‘लोगों को चिंतित रखने’ वाला अभियान कहना भी गलत होगा। यूरोप में हाइब्रिड खतरे बढ़े हैं और मध्य-पूर्व में सैन्य तैयारी की रिपोर्टें विश्वसनीय मीडिया स्रोतों से आ रही हैं। सरकारें नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं ताकि आपातकालीन सेवाएँ सबसे कमजोर लोगों पर ध्यान केंद्रित कर सकें। यह दीर्घकालिक लचीलेपन की नीति है, न कि केवल घबराहट पैदा करने का प्रयास।


ऐसे में भारत को घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन सतर्क रहने की जरूरत है। हमारे पास खाद्य भंडार अपेक्षाकृत मजबूत है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा अभी भी कमजोर है। रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने की योजनाएँ पहले से चल रही हैं, जिन्हें तेज किया जाना चाहिए। क्रिटिकल मिनरल्स के स्टॉकपाइल पर भी काम जारी है और इसे भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


नागरिक स्तर पर, बिना घबराहट पैदा किए, एनडीएमए की मौजूदा सलाह को अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक बनाया जा सकता है। सिविल डिफेंस और समुदाय स्तर की तैयारी को मजबूत करना उचित होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए ऊर्जा स्रोतों में विविधता लानी चाहिए और मध्य-पूर्व तथा यूरोप दोनों से संभावित अतिरिक्त प्रभावों (तेल कीमतें, व्यापार बाधाएँ) पर नजर रखनी चाहिए।


सोशल मीडिया पर वायरल हो रही ये पोस्ट वास्तविक तैयारियों को अतिरंजित रूप में पेश कर रही हैं। हाइब्रिड खतरे, मध्य-पूर्व में संभावित वृद्धि, और जलवायु-संबंधी व्यवधान जैसे कई जोखिम मौजूद हैं। लेकिन ये ‘कल से सब कुछ खत्म हो जाएगा’ वाला संकेत नहीं हैं। ऐसे में ‘तैयारी’ बुद्धिमानी है, ‘घबराहट’ नहीं। भारत को शांत, तथ्य-आधारित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए: अपनी कमजोरियों को पहचानें, भंडार मजबूत करें और नागरिकों को सही जानकारी दें। सोशल मीडिया की शोरगुल भरी चेतावनियों के बजाय, वास्तविक लचीलापन ही सबसे अच्छी सुरक्षा है। 

Friday, October 30, 2026

खड़गे के बयान पर बवाल!

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसके नेताओं की गरिमा और संवाद की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। लेकिन हाल के वर्षों में राजनीतिक बयानों में अभद्र और व्यक्तिगत हमले बढ़ते जा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण 25 अक्टूबर 2026 को पटना में मिला, जहां कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भीड़ में से किसी के “मोदी नहीं जाएंगे” कहने पर जवाब दिया,“मोदी का बाप भी जाएगा।” इस विवादित बयान के बाद भाजपा ने इसे जहरीली और अमर्यादित राजनीति बताते हुए माफी की मांग की और देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। 


संसदीय परंपरा में असंसदीय भाषा वह होती है जो अपमानजनक, अभद्र या व्यक्तिगत हमला करने वाली हो। संसद के अंदर स्पीकर ऐसी भाषा हटा सकते हैं, लेकिन बाहर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है। चुनावी मौसम में यह और तीखा हो जाता है। खड़गे का यह बयान नया नहीं है; इससे पहले भी वे प्रधानमंत्री को “आतंकवादी” कह चुके हैं और भाजपा-आरएसएस की तुलना “जहरीले सांप” से कर चुके हैं। सोशल मीडिया के युग में ऐसे बयान तुरंत वायरल हो जाते हैं और लाखों लोगों तक पहुंचते हैं।


ऐसा नहीं है कि अभद्र भाषा का प्रयोग किसी एक राजनैतिक दल द्वारा ही किया गया हो। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जहाँ कांग्रेस के नेताओं को भी अभद्र भाषा का सामना करना पड़ा। इनमें प्रमुख बयान हैं, “कांग्रेस की विधवा”, “जर्सी गाय”, “50 करोड़ की गर्लफ्रेंड”, “हाइब्रिड बछड़ा” आदि। यदि इतना कुछ काफ़ी नहीं था तो एक लाइव टीवी डिबेट में भाजपा के प्रवक्ता ने कांग्रेस के प्रवक्ता की माँ के प्रति काफ़ी अपशब्द कहे जो कि किसी भी सभ्य समाज में सहन नहीं किए जा सकते। लेकिन इस सबके बावजूद भाजपा ने अपने उस प्रवक्ता पर कोई कारवाही नहीं की। अब खड़गे के बयान के बाद कांग्रेस भी इन सभी बयानों को खुल कर याद दिला रही है।   

जब शीर्ष नेता सार्वजनिक मंच पर परिवार को निशाना बनाते हैं तो नागरिकों में नेतृत्व के प्रति सम्मान कमजोर होता है। खासकर युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है, सोचती है कि अगर देश के बड़े नेता खुले मंच पर ऐसी भाषा इस्तेमाल कर सकते हैं तो सामान्य जीवन में क्या होगा? इससे राजनीति को ‘गंदा खेल’ मानने की धारणा मजबूत होती है और मतदान में उदासीनता बढ़ती है। कई नागरिक मानते हैं कि ऐसी भाषा से लोकतंत्र की विश्वसनीयता घटती है।

पार्टी कार्यकर्ता अपने नेताओं को आदर्श मानते हैं। जब शीर्ष नेता व्यक्तिगत हमला करते हैं तो कार्यकर्ताओं में भी यही प्रवृत्ति बढ़ती है। रैलियों में अभद्र नारे और कभी-कभी हिंसक झड़पें देखने को मिलती हैं। खड़गे के बयान के बाद पटना में पुतले फूंके गए और माफी की मांग की गई, यह दिखाता है कि एक बयान कितनी तेजी से सड़क पर उतर सकता है। ऐसी घटनाओं से आंतरिक कलह और मनोबल गिरने का खतरा भी बना रहता है।

नेता एक दूसरों पर बयान दें वो तो आजकल की राजनीति में आम बात हो चुकी है। लेकिन ऐसे में मीडिया पर इसका असर और भी चिंताजनक है। जब नेता तीखे सवालों पर “पेड मीडिया” या “दलाल” कहते हैं या शारीरिक धमकी देते हैं तो पत्रकार सवाल पूछने से हिचकिचाते हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी सक्रिय हो जाती है। खड़गे मामले में भी विवाद तुरंत सुर्खियों में आ गया, लेकिन कई बार पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों प्रभावित होती है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भारत में पत्रकारों पर हमलों की संख्या बढ़ने का जिक्र है।

महिलाओं और विपक्षी नेताओं के प्रति लिंगभेदी या व्यक्तिगत टिप्पणियां भी आम हैं। “आइटम” या शारीरिक बनावट पर हमले न केवल अपमानजनक हैं बल्कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को हतोत्साहित करते हैं। नीतिगत मतभेद की जगह परिवार, जाति या धर्म पर हमले राजनीतिक बहस का स्तर गिरा देते हैं।

सवाल है कि इसका समाधान क्या है? सबसे पहले नेताओं को स्वयं अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना होगा। संसद और विधानसभाओं के बाहर भी नैतिक दिशानिर्देश लागू होने चाहिए। मीडिया को ऐसी भाषा को बढ़ावा देने के बजाय जिम्मेदारी से रिपोर्ट करना चाहिए। नागरिक सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री शेयर करने से बचें और विरोध जताएं। राजनीतिक दलों को कार्यकर्ताओं को नीतियों पर बहस का प्रशिक्षण देना चाहिए, व्यक्तिगत हमलों का नहीं। महिलाओं के प्रति सम्मान के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून जरूरी हैं।

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन व्यक्तिगत और अभद्र भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। खड़गे का ताजा बयान और उसके बाद का बवाल इसी प्रवृत्ति की ताजा मिसाल है। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी हमारा लोकतंत्र सच्चे अर्थों में मजबूत होगा। 

Monday, October 26, 2026

कचरा प्रबंधन और सर्कुलर इकोनॉमी

भारत हर दिन लाखों टन कचरा पैदा करता है। शहरी क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट की मात्रा लगातार बढ़ रही है, जबकि ग्रामीण इलाकों में भी प्लास्टिक और अन्य कचरे का ढेर लग रहा है। 2014 में सरकार के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ ने स्वच्छता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव लेन की पहल की, लेकिन ठोस कचरा प्रबंधन में इसकी सफलता अधूरी रही है। पर्यावरण और जनहित की दृष्टि से अब जरूरत इस बात की है कि हम रैखिक मॉडल (उत्पादन-उपयोग-फेंकना) से आगे बढ़कर सर्कुलर इकोनॉमी (वृत्ताकार अर्थव्यवस्था) को अपनाएं, जिसमें कचरे को संसाधन बनाया जाए।


उल्लेखनीय है कि ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का सबसे बड़ा


योगदान शौचालय निर्माण और खुले में शौच कम करने में रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में करोड़ों शौचालय बने और कई राज्यों को ओपन डिफेकेशन फ्री घोषित किया गया। शहरी क्षेत्रों में भी डोर-टू-डोर कलेक्शन और सफाई में सुधार देखा गया। लेकिन जब बात ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की आती है तो तस्वीर अलग है। अभियान का शुरुआती जोर शौचालयों और दिखाऊ स्वच्छता पर रहा। कचरे को स्रोत पर अलग करना, प्रोसेस करना और लैंडफिल में कम भेजना, ये चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। कई जगहों पर अपशिष्ट प्रबंधन केंद्र बने, लेकिन रखरखाव और संचालन के अभाव में वे बेकार पड़े हैं। सोर्स सेग्रीगेशन का दावा ज्यादा है, लेकिन जमीन पर मिश्रित कचरा ही पहुंचता है। इससे प्रोसेसिंग प्लांट्स की क्षमता प्रभावित होती है और लैंडफिल पर बोझ बना रहता है। नगरपालिकाओं में कर्मचारियों, धन और तकनीकी क्षमता की कमी भी एक बड़ा कारण है। जागरूकता की कमी के चलते व्यवहारगत बदलाव धीमा रहा है, लोग कचरा अलग नहीं करते या खुले में फेंक देते हैं। सत्यापन की कमजोरी के कारण ओडीएफ प्लस जैसी उपलब्धियां भी पूरी तरह टिकाऊ नहीं हो पाई हैं।



यहीं सर्कुलर इकोनॉमी का महत्व सामने आता है। यह मॉडल कचरे को शून्य करने या न्यूनतम करने पर जोर देता है। रिड्यूस, रियूज, रिसाइकिल और रिकवर, ये इसके मुख्य सिद्धांत हैं। भारत में ठोस अपशिष्ट का बड़ा हिस्सा जैविक है। इसे खाद या बायोगैस में बदला जा सकता है। प्लास्टिक, ई-कचरा, बैटरी और अन्य सामग्री को रीसाइक्लिंग के जरिए वापस आर्थिक चक्र में लाया जा सकता है। इससे लैंडफिल का दबाव कम होगा, प्रदूषण घटेगा, रोजगार बढ़ेंगे और आयात पर निर्भरता भी कम हो सकती है। सरकार ने प्लास्टिक, ई-कचरा, बैटरी, टायर समेत कई कचरा धाराओं के लिए नियम बनाए हैं और विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी (ईपीआर) लागू की है। इसके तहत उत्पादकों को अपने उत्पादों के जीवनकाल के अंत में जिम्मेदारी लेनी होती है। कई लाख टन कचरा प्रोसेस भी हो चुका है, लेकिन अभी भी स्रोत पर पृथक्करण, रीसाइक्लिंग क्षमता और अनौपचारिक क्षेत्र के एकीकरण में बड़ी कमी है।



समस्या का मूल कारण सिस्टम की कमजोरी है। कचरा अलग न होने से रीसाइक्लिंग महंगी और मुश्किल हो जाती है। अनौपचारिक कबाड़ी और कचरा उठाने वाले महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन उन्हें औपचारिक सिस्टम में शामिल करने की व्यवस्था अपर्याप्त है। नगरपालिकाएं अक्सर बड़े प्लांट्स पर निर्भर रहती हैं, जबकि विकेंद्रीकृत समाधान, जैसे सामुदायिक कंपोस्टिंग ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं। वहीं निगरानी और प्रवर्तन भी कमजोर है। नागरिकों को जागरूक करने के प्रयास हुए, लेकिन निरंतरता और जवाबदेही की कमी रही। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ ने कुछ हद तक जागरूकता पैदा की, लेकिन टिकाऊ आदतें और बुनियादी ढांचा दोनों अधूरे रहे।



आगे का रास्ता स्पष्ट है। सबसे पहले स्रोत पर कचरा पृथक्करण को अनिवार्य और व्यावहारिक बनाना होगा। इसके लिए नगरपालिकाओं को अलग-अलग वाहन और प्रोसेसिंग सुविधाएं देनी होंगी। ईपीआर को और सख्ती से लागू किया जाए और उत्पादकों-रीसाइक्लर्स के बीच समन्वय बेहतर हो। जैविक कचरे के लिए गोबरधन जैसी योजनाओं को विस्तार देना चाहिए। अनौपचारिक क्षेत्र को प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण और उचित मूल्य देकर औपचारिक बनाया जाए। स्कूलों, आवासीय समितियों और सार्वजनिक अभियानों के जरिए नागरिकों की भागीदारी भी बढ़ाई जाए। ऐसे में सबसे अहम कारण यह है कि नागरिकों में स्रोत पर कचरा अलग करने की आदत अभी भी कमजोर है। जब घरेलू स्तर पर ही गीला और सूखा कचरा मिला रहता है तो रीसाइक्लिंग और कंपोस्टिंग दोनों मुश्किल हो जाते हैं। साथ ही, नगरपालिकाओं की क्षमता बढ़ाने के लिए फंडिंग, स्टाफ और तकनीकी सहायता जरूरी है। लीगेसी डंपसाइट्स की सफाई जारी रखनी होगी, लेकिन नया कचरा वहां न पहुंचे, यह भी सुनिश्चित करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।


सर्कुलर इकोनॉमी केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक अवसर भी है। यह रोजगार पैदा करता है, संसाधन बचाता है और स्वास्थ्य सुधारता है। सर्कुलर इकोनॉमी तभी सफल होगी जब हम कचरे को केवल साफ करने का साधन न मानें, बल्कि उसे आर्थिक मूल्य वाला संसाधन बनाएं। प्लास्टिक, ई-कचरा और जैविक कचरे से रोजगार और आय पैदा हो सकती है, लेकिन इसके लिए अनौपचारिक क्षेत्र को सम्मानजनक तरीके से जोड़ना और उत्पादकों पर ईपीआर को सख्ती से लागू करना जरूरी है। यदि ‘स्वच्छ भारत अभियान’ ने नींव रखी, लेकिन अब उस नींव पर वृत्ताकार मॉडल खड़ा करना होगा। इस अभियान के अनुभवों से सीख लेकर विकेंद्रीकृत समाधानों और नागरिक जिम्मेदारी को मजबूत किया जाए, तो कचरा प्रबंधन टिकाऊ और लाभकारी बन सकता है। जनहित की दृष्टि से यह जरूरी है कि सरकार, उद्योग, नगरपालिका और नागरिक मिलकर काम करें। जब तक कचरा ‘कचरा’ माना जाएगा, समस्या बनी रहेगी। जब उसे संसाधन माना जाएगा, तभी असली स्वच्छता और टिकाऊ विकास संभव होगा। समय आ गया है कि हम इस दिशा में ठोस और निरंतर कदम उठाएं। 

Monday, October 19, 2026

बच्चों का इंटरनेट अधिकार: प्रतिबंध नहीं, जिम्मेदारी की ज़रूरत

सुप्रीम कोर्ट का हालिया आदेश भारतीय समाज के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका उपयोग हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और इसमें बच्चे भी शामिल हैं। यह अधिकार अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) तथा अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) से जुड़ा है। कोर्ट ने बच्चों पर इंटरनेट के पूर्ण प्रतिबंध को असंगत और अनुपातहीन माना, जबकि बाल यौन शोषण संबंधी सामग्री की पहचान, रिपोर्टिंग और हटाने के लिए सख्त व्यवस्था करने का निर्देश दिया। साथ ही ‘चाइल्ड मोड’, अभिभावकीय सहमति और लक्षित सुरक्षा उपायों का सुझाव भी दिया। यह फैसला ‘डिजिटल इंडिया’ में सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक आवश्यक कदम है।



भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन अब जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। लाखों बच्चे शिक्षा, मनोरंजन, सामाजिक संपर्क और जानकारी के लिए ऑनलाइन दुनिया पर निर्भर हैं। कोविड काल के बाद डिजिटल शिक्षा का विस्तार हुआ, लेकिन इसके साथ ही इसके जोखिम भी बढ़े। सोशल मीडिया पर अश्लील सामग्री, साइबर बुलिंग, गेमिंग की लत और बाल शोषण के मामले बार-बार सामने आते रहे हैं। कुछ राज्यों में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की चर्चा हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं चिंताओं के बीच यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। पूर्ण प्रतिबंध न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह बच्चों को डिजिटल साक्षरता और अभिव्यक्ति के अवसर से भी वंचित कर सकता है।



फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया। उसने बाल यौन शोषण सामग्री के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर हैश और यूआरएल डेटाबेस बनाने, प्लेटफॉर्म्स के लिए त्वरित रिपोर्टिंग की समय-सीमा तय करने और मजबूत मॉडरेशन तंत्र विकसित करने का निर्देश दिया। देखा जाए तो यह कदम आवश्यक था, क्योंकि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या हल नहीं होती। इंटरनेट पर हानिकारक सामग्री तेजी से फैलती है और तकनीकी समाधान के बिना उसे नियंत्रित करना मुश्किल है। कोर्ट ने ‘चाइल्ड मोड’ जैसी व्यवस्था का सुझाव देकर एक मध्यम मार्ग अपनाया है, जिसमें खाते डिफॉल्ट रूप से निजी हों, अजनबियों से संपर्क सीमित हो और विज्ञापन तथा सामग्री का उचित मॉडरेशन हो। यह व्यावहारिक दृष्टिकोण है, जो पूर्ण प्रतिबंध की जगह जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा देता है।



भारत में इस फैसले का महत्व और भी अधिक है क्योंकि यहां डिजिटल डिवाइड अभी भी मौजूद है। शहरी और शिक्षित परिवारों में बच्चे आसानी से स्मार्टफोन और इंटरनेट का उपयोग करते हैं, जबकि कई ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में इसकी पहुंच सीमित है। पूर्ण प्रतिबंध लगाने से जो बच्चे पहले से ही डिजिटल अवसरों से वंचित हैं, वे और पीछे रह जाएंगे। दूसरी ओर, जिनके पास पहुंच है, उनके लिए बिना उचित मार्गदर्शन के सोशल मीडिया मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। अध्ययनों और रिपोर्टों में किशोरों में चिंता, अवसाद और नींद की कमी जैसी समस्याएं बढ़ने के संकेत मिले हैं। ऐसे में कोर्ट का यह रुख सही है कि समाधान प्रतिबंध में नहीं, बल्कि जागरूकता, शिक्षा और तकनीकी सुरक्षा में है।


इस फैसले से सरकार, टेक कंपनियों और अभिभावकों तीनों की जिम्मेदारी स्पष्ट होती है। सरकार को अब मजबूत नियामक ढांचा तैयार करना होगा, जिसमें प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही सुनिश्चित हो, लेकिन बच्चों के अधिकारों का हनन न हो। टेक कंपनियों को अपने एल्गोरिदम और मॉडरेशन सिस्टम को और पारदर्शी तथा प्रभावी बनाना होगा। भारत जैसे देश में, जहां लाखों बच्चे पहली बार इंटरनेट से जुड़ रहे हैं, कंपनियों को स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भ को ध्यान में रखकर सुरक्षा उपाय विकसित करने चाहिए। ऐसे में अभिभावकों की भूमिका भी अहम है। डिजिटल साक्षरता केवल बच्चों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। माता-पिता को भी समझना होगा कि पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं है, लेकिन नियमित संवाद, समय-सीमा और सकारात्मक उपयोग की आदत डालना जरूरी है।


स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था को भी इस दिशा में सक्रिय होना होगा। डिजिटल नागरिकता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि बच्चे ऑनलाइन जोखिमों को पहचान सकें और इंटरनेट के सुरक्षित व्यवहार सीख सकें। साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता को भी मजबूत करने की जरूरत है, क्योंकि सोशल मीडिया का प्रभाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है।


सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश एक चेतावनी भी है। यदि सरकार और प्लेटफॉर्म्स प्रभावी कदम नहीं उठाते, तो भविष्य में और अधिक सख्त हस्तक्षेप की मांग उठ सकती है। दूसरी ओर, अगर सुरक्षा के नाम पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो यह बच्चों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा और डिजिटल असमानता को बढ़ाएगा। संतुलित दृष्टिकोण ही भारत के लिए सही है। हमें एक ऐसा डिजिटल वातावरण चाहिए जहां बच्चे सीख सकें, सृजन कर सकें और सुरक्षित रह सकें। इसके लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं है। समाज, परिवार, स्कूल और तकनीक कंपनियों को मिलकर काम करना होगा।


कुल मिलाकर, यह फैसला हमें याद दिलाता है कि डिजिटल युग में अधिकार और जिम्मेदारी साथ-साथ चलते हैं। इंटरनेट एक शक्तिशाली साधन है, जो ज्ञान और अवसर देता है, लेकिन बिना सावधानी के यह नुकसान भी पहुंचा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सही दिशा दिखाई है। अब जरूरत है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भारत के बच्चे डिजिटल युग का लाभ उठा सकें और उसकी चुनौतियों से सुरक्षित रह सकें। यह संतुलन ही भविष्य की पीढ़ी के लिए एक मजबूत और जिम्मेदार डिजिटल समाज की नींव रखेगा। 

Monday, October 12, 2026

युवा आंदोलन और सत्ता का दायित्व !

एक बार फिर से देश में युवाओं ने सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा दी है। यह कोई नई बात नहीं है, जब-जब छात्र राजनैतिक व्यवस्था के विरूद्ध सड़क पर उतरते हैं, तब-तब ये सवाल उठता है कि क्या छात्रों को राजनीति करनी चाहिए? इस सवाल के उत्तर अपनी-अपनी दृष्टि से हर समुदाय देता है। जो राजनैतिक दल सत्ता में होते हैं, वे छात्र आन्दोलन की भर्त्सना करते हैं। उसे हतोत्साहित करते हैं और जब छात्र काबू में नहीं आते, तो उनका दमन भी करते हैं। फिर वो चाहे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों या 70 के दशक में गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन से शुरू होकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्णं क्रांति के आव्हान पर कूंदने वाले छात्र हों, जिन्होने इंदिरा गांधी की सत्ता पलट दी थी या फिर अन्ना हजारे के आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों। लेकिन देश में कॉक्रोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन और देश भर में चल रहे ताज़ा आंदोलन ने इस सवाल को दोबारा जगा दिया है युवा और सरकार के आंदोलन का हल कैसे निकले?   



रोचक बात ये है कि जो दल सत्ता में आकर छात्रों का दमन करते हैं, वही दल जब विपक्ष में होते हैं, तो छात्र आन्दोलनों को हवा देकर ही अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकते हैं। इसमें कोई दल अपवाद नहीं हैं। अगर शिक्षा संस्थानों और अभिभावकों की दृष्टि से देखा जाऐ, तो भी दो मत हैं। जो संस्थान या अभिभावक चाहते हैं कि उनके निर्देशन में युवा केवल पढ़ाई पर ध्यान दें, डिग्री हासिल करें और नौकरी करे, वे नहीं चाहते कि उनके छात्र किसी भी तरह की राजनीति में हिस्सा ले। 


मगर एक दूसरा वर्ग उन शिक्षकों और अभिभावकों का है, जो अपने छात्रों में पूर्णं विश्वास रखते हैं और जानते हैं कि चाहे वे छात्र राजनीति में कितना ही हिस्सा क्यों न लें, उन्हें अपने भविष्य को लेकर पूरी स्पष्टता है। इसलिए वे पढ़ाई की कीमत पर आन्दोलन नहीं करेंगे। ऐसे संस्थान और अभिभावक छात्रों को रचनात्मक राजनीति करने से नहीं रोकते।



अगर निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो हम पाऐंगे कि जो छात्र केवल पढ़ाई पर ध्यान देते हैं और रट्टू तोते की तरह इम्तेहान पास करते जाते हैं, उनके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नहीं होता। प्रायः ऐसे नौजवानों में समाजिक सारोकार भी नहीं होते। उनका व्यक्तित्व एकांगी हो जाता है और जीवन के संघर्षों में वे उतनी मजबूती से नहीं खड़े हो पाते, जितना कि वे छात्र खड़े होते हैं, जिन्होंने शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार को बनाऐ रखा हो। जो छात्र विज्ञान, शोध या तकनीकी के क्षेत्र में जाते हैं, उनकी बात दूसरी है। उनका ध्यान अपने विषय पर ही केंद्रित रहता है और वे अपने संपूर्णं अंगों को कछुऐ की तरह समेटकर एक ही दिशा में लगातार काम करते जाते हैं।



अपने जीवन में मैंने भी अलग-अलग तरह माहौल में अनुभव प्राप्त किये हैं। जब तक मैं कॉलेज में पढ़तो था, तो मेरा व्यक्तित्व दो धुरियों में बटां था। मेरे पिता जो एक बड़े शिक्षाविद् थे, उनके विचार यही थे कि मैं पढ़ू और नौकरी करूं। जबकि मेरी मां जो कि संस्कृत की विद्वान थी और मथुरा के रमणरेती वाले महाराज श्रद्धेय गुरू शरणनानंद जी की लखनऊ विश्विद्यालय की सहपाठी थीं, वे छात्र जीवन से ही गांधीवादी विचारधारा और सामाजिक सरोकारों को लेकर बहुत सक्रिय रहीं थीं। उनका ही प्रभाव मुझ पर ज्यादा पड़ा और 18 वर्ष की आयु में एक स्वयंसेवक के रूप में पिछड़े गाँवों में सेवा कार्य करने घर छोड़कर चला गया। 1974 के उस दौर में मैंने गाँव की गरीबी और बदहाली में जीवन के अनूठे अनुभव प्राप्त किये। उसका ही परिणाम है कि आजतक मैं धन कमाने की दौड़ में न पड़कर समाज, राष्ट्र या सनातन धर्म के विषयों पर अपनी ऊर्जा पूरी निष्ठा से लगाता रहा हूं। अगर इसे अपने मुंह मियाँ मिट्ठू न माना जाऐ, तो देश में जो लोग मुझे जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि मैंने प्रभु कृपा भारत में कई बार इतिहास रचा है। ये निर्भीकता और समाज के प्रति समर्पण का ये भाव इसीलिए आया क्योंकि मैंने पढ़ाई के साथ समाज का भी अध्ययन जारी रखा। अन्यथा मैं आज किसी तंत्र की नौकरी में जीवन बिताकर खाली बैठा होता। जैसा आईसीएस रहे श्री जेसी माथुर ने सेवानिवृत्त होने के बाद एक सुप्रसिद्ध बौद्धिक पत्रिका ‘दिनमान’ में एक श्रृंखला लिखी थी। जिसका मूल था कि ‘मैं आईसीएस में रहते हुए, एक मशीन का पुर्जा था, जिसका न दिल था, न दिमाग था’। 


कल का आईसीएस ही आज का आईएएस है। पिछले 40 वर्षों में मैं सैंकड़ों आईएएस अधिकारियों से संपर्क रहा है और मैं दावे से कह सकता हूं कि, वही आईएसएस अधिकारी जीवन में कुछ ठोस और रचनात्मक कार्य कर पाते हैं, जो अपनी नौकरी के मायाजाल के बाहर, समाज से जुड़कर सहज जीवन जीते हैं और अपनी संवेदनशीलता को मरने नहीं देते। बाकी तो पूरी जिंदगी अच्छी पोस्टिंग और प्रमोशन के चक्कर में ही काट देते हैं। इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं। पर आमतौर पर यही अनुभव रहा है। 


इसलिए मैं इस बात का समर्थक हूं कि छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। फिर वो चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हों, किसी समाजवादी आन्दोलन के सदस्य हों, किसी वामपंथी आन्दोलन के सदस्य हों या किसी गांधीवादी आन्दोलन के सदस्य हों या नए जन्में सीजेपी के समर्थक ही क्यों हों। जो भी हो उन्हें इस प्रक्रिया से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। प्रांतीय और केंद्र सरकार का ये दायित्व है कि वे छात्र राजनीति पर तब तक अंकुश न लगायें, जब तक कि वह हिंसात्मक या विध्वंसात्मक न हो। ऐसी छात्र राजनीति समाज की घुटन को ‘सेफ्टी वाल्व’ के रूप में बाहर निकालती है और ये राज सत्ता के हित में ही होता है। इसलिए जब कभी देश का युवा सड़कों पर उतरे तो उसे गंभीरता से लिया जाए न कि दमनकारी रवैये से।  

Monday, October 5, 2026

प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई दुर्घटना का विश्लेषण

वृंदावन के विश्विख्यात संत प्रेमानंद महाराज के आश्रम में हुई दुर्घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। एक नौजवान भक्त की ऐसी रहस्यमय मृत्यु समाज और पुलिस के लिए चुनौतीपूर्ण घटना है, जिसकी गहराई से जाँच की जा रही है। पर इससे ज़्यादा चिंता की बात यह है कि कुछ सनातन धर्म विरोधी लोग इस दुर्घटना के लिए प्रेमानंद महाराज को ज़िम्मेदार ठहराकर उनपर कीचड़ उछाल रहे हैं। इस विषय में जो बात मैं आगे कहने जा रहा हूँ वो ऐसे आलोचकों को मेरा निष्पक्ष जवाब है। पर इसके साथ ही मैं उन बातों को भी यहाँ रखूँगा जिनको लेकर प्रेमानंद महाराज के चाहने वालों में भी लंबे समय से मंथन चल रहा है। उन्हें लगता है कि महाराज अपने चेलों के जाल में उलझ गए हैं। वे चेले जो महाराज की तपस्या को सोशल मीडिया पर वायरल करवाने की धुन में ब्रज के रसिक संतों की रहनी और आचरण को भूल बैठे हैं। आरोप है कि ऐसे चेले संपत्ति बनाने, कालोनियाँ बनाने और अपने-अपने साम्राज्य स्थापित करने में जुटे हैं। इन्हीं सब बातों पर आगे चर्चा होगी। 


प्रेमानंद महाराज एक लंबे अरसे से वृंदावन में रहकर तपस्वी का जीवन जी रहे थे। वे भीषण गर्मी के दिनों में भी घंटों यमुना जी की तपती रेत में पड़े रहकर भजन किया करते थे। प्रायः वे वृन्दावन की कँटीली झाड़ियों के बीच बैठ कर भी भजन करते थे। उन्होंने बरसों तक न भला खाया, न भला पहना। हम वृंदावनवासी जानते हैं कि वे वृन्दावन की गलियों में भिक्षा माँगकर रोटी खाते थे। 7-8 बरस पहले तक उनका नाम भी कोई नहीं जानता था। उनके दैन्य और तपस्या की प्रशंसा हर ब्रजवासी आजतक करता आया है। वे भी ब्रजवासियों के प्रति भारी श्रद्धा का भाव रखते हैं। 



अब से कुछ वर्ष पहले तक यमुना किनारे एक बगीची में, अपने चंद शिष्यों के बीच वे प्रवचन किया करते थे। धीरे-धीरे उनके प्रवचन की लोकप्रियता बढ़ने लगी और देखते ही देखते लगभग 1000 भक्त हर प्रातः उनका प्रवचन सुनने आने लगे। उस दौर में मैं भी प्रायः उनका प्रवचन सुनने उस बगीची में जाता था। धीरे-धीरे इस भीड़ में ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ने लगी जो आईआईटी - आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़ कर देश विदेश में अपनी लाखों की नौकरी छोड़ कर आ गए और प्रेमानंद महाराज के शिष्य बन कर पीली चादर ओढ़ ली। 


इन्हीं शिष्यों में कुछ ऐसे शिष्य भी थे जिन्होंने महाराज के प्रति अपने गहरे प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना शुरू किया और पूरी दुनिया में उन्हें इतना प्रचारित कर दिया कि विराट कोहली से लेकर तमाम जानी-मानी हस्तियां  उनके दर्शन को आने लगी। महाराज की मार्किटिंग इस कदर की गई कि उनके दर्शन के लिए आधी रात से हज़ारों की भीड़ जमा होने लगी। इस भीड़ के कारण वृंदावन की यातायात व्यवस्था भी बाधित हुई। महाराज जब रात में सड़क पर पैदल निकलते तो हज़ारों लोग उनके दर्शन को खड़े रहते। 


फिर तो वहाँ पैसे की वर्षा होने लगी। अब संपत्तियां खरीदने व बड़े-बड़े आश्रम बनाने की होड़ लग गई। यमुना की खादर में अवैध रूप से कॉलोनी बनाने के आरोप भी इन्हीं शिष्यों पर लगे। महाराज के दर्शन के लिए एडवांस टोकन मिलने लगे और भारी तामझाम का एक सुनियोजित आडंबर रच दिया गया। 


इतना ही नहीं प्रेमानंद महाराज के कुछ वर्ष पहले ही बने शिष्य भी अब सोशल मीडिया पर अपनी मार्केटिंग करवाने लगे। किसी को शिव का स्वरूप बताया जाने लगा तो किसी को ब्रह्म ऋषि। सैंकड़ों सालों से ब्रज के संत घर-घर रोटी माँग कर प्रसाद पाते थे। इसे माधुकरी कहते हैं। ब्रज में ये संतों का सामान्य शिष्टाचार है। पर किसी ने भी कभी इसे प्रचारित कर सेलिब्रिटी बनने की कोशिश नहीं की। प्रेमानंद महाराज के शिष्यों का माधुकरी माँगना भी सोशल मीडिया का ग्लैमर बन गया। पिछले कुछ वर्षों में प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता  को बढ़ाने और उनकी मार्केटिंग करने के जितने प्रयास हुए वैसा ब्रज में पहले कभी नहीं देखा गया। यह ब्रज की भक्ति परंपरा के अनुकूल नहीं था। परिणामतः केलि कुंज की आलोचनाएं भी होने लगी। इसी सबके बीच महाराज के शिष्यों में सत्ता और संपत्ति को लेकर गुटबाजी और झगड़े शुरू हो गए। 


इस सब से विचलित हो कर प्रेमानंद महाराज वृंदावन के अपने नए बने भव्य आश्रमों को छोड़ कर यमुना के उस पार बेल वन में चले गए।वहाँ जो बृजवासी गांव वाले रहते हैं वे परेशान हैं क्योंकि रात भर महाराज के दर्शनार्थी आते हैं। ब्रजवासी बच्चे घर से निकल जाए तो भीड़ में खो जाते हैं। सारे रास्ते जाम हो जाते हैं। अब वहाँ भी चेलों द्वारा कालोनियां बनाने का खेल चालू हो गया है। प्रेमानंद जी महाराज के प्रति श्रद्धा रखने वाले हम जैसे लाखों भक्त हैं। उनके शिष्य रसिक दुलारी शरण की मृत्यु से उस श्रद्धा में कोई कमी नहीं आई है। पर इतना अवश्य है कि अब समय आ गया है कि जब प्रेमानंद महाराज शिष्यों के बनाये इस आडंबर के जाल से निकल कर अपने मूल स्वरूप में लौट आएँ। 


जहाँ तक रसिक दुलारी शरण की मृत्यु का प्रश्न है तो सच्चाई तो पुलिस जांच के बाद ही सामने आएगी। पर इतना अवश्य है कि युवा साधकों के बीच ऐसी दुर्घटना होना कोई नई बात नहीं है। साधना की प्रारंभिक अवस्था में अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण न रख पाने के कारण कई युवा साधक अपने लिंग को हानि पहुँचा देते हैं। ये उनकी नासमझी या उत्साह के अतिरेक में उठाया गया एक मूर्खतापूर्ण कदम होता है। इन्द्रियों पर नियंत्रण, मन पर नियंत्रण होने के बाद होता है। अगर मन वास्तव में भगवत भक्ति में रम जाए तो हमारी सभी इंद्रियाँ स्वयं ही शांत हो जाती हैं। इस तरह के जबरन किए गए प्रयासों से इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता ये हर साधक को जानना चाहिए। इस घटना का जो भी परिणाम हो इससे प्रेमानंद महाराज की प्रतिष्ठा में कोई आंच नहीं आएगी। पर उनके इर्द-गिर्द जमा शिष्यों को इससे सबक लेकर आत्मवालोकन करना चाहिए।