Monday, January 19, 2026

योग और स्वस्थ जीवनशैली के लाभ

भारत की प्राचीन सभ्यता में योग को जीवन का आधार माना गया है। आज की तेज़-रफ़्तार और तनावपूर्ण दुनिया में, जहां जीवनशैली संबंधी बीमारियाँ जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और मानसिक विकार तेज़ी से बढ़ रहे हैं, योग एक प्राचीन लेकिन अत्यंत प्रासंगिक समाधान के रूप में उभर रहा है। भारत की यह अमूल्य धरोहर न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाती है, बल्कि मन की शांति और आध्यात्मिक संतुलन भी प्रदान करती है। बीते वर्ष, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम ‘एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग’ ने इसे और अधिक प्रासंगिक बना दिया है, क्योंकि योग व्यक्तिगत स्वास्थ्य से लेकर पर्यावरणीय संतुलन तक सब कुछ जोड़ता है। आज का विषय योग को दैनिक जीवन में अपनाने के व्यावहारिक लाभों पर केंद्रित है, ताकि हम एक स्वस्थ, सकारात्मक और संतुलित जीवन जी सकें। 



योग का अर्थ है ‘जोड़ना’ या ‘मिलन’। यह शरीर, मन और आत्मा का मिलन है। महर्षि पतंजलि के योग सूत्रों में योग को ‘चित्त वृत्ति निरोधः’ कहा गया है, अर्थात मन की वृत्तियों का निरोध। लेकिन योग सिर्फ ध्यान या समाधि तक सीमित नहीं; यह हठ योग, राज योग, भक्ति योग और कर्म योग जैसे विभिन्न रूपों में जीवन को संतुलित करता है। आज के संदर्भ में, हठ योग के आसन और प्राणायाम सबसे अधिक प्रचलित हैं, क्योंकि ये व्यावहारिक और तुरंत लाभ देने वाले हैं।



शारीरिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में योग के लाभ अनेक हैं। नियमित योगाभ्यास से शरीर लचीला, मजबूत और संतुलित होता है। सूर्य नमस्कार जैसे गतिशील आसन पूरे शरीर की मांसपेशियों को सक्रिय करते हैं, रक्त संचार बढ़ाते हैं और चयापचय (मेटाबॉलिज्म) को तेज़ करते हैं। इससे वजन नियंत्रण में मदद मिलती है। कई अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि योग से मोटापा कम होता है, खासकर पेट की चर्बी। धनुरासन, भुजंगासन और नौकासन जैसे आसन पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं, कब्ज और एसिडिटी जैसी समस्याओं से राहत देते हैं। महिलाओं के लिए योग मासिक धर्म चक्र को नियमित करता है, प्रसव के बाद रिकवरी में सहायक होता है और हड्डियों की मजबूती बढ़ाता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी वृद्धावस्था की बीमारियों से बचाव होता है।



हृदय स्वास्थ्य के लिए योग एक वरदान है। अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम रक्तचाप को नियंत्रित करते हैं, कोलेस्ट्रॉल स्तर कम करते हैं और हृदय की धड़कन को संतुलित रखते हैं। भारत में हृदय रोग मौत का प्रमुख कारण है, और योग जैसे प्राकृतिक तरीके से इसे रोका जा सकता है। योग इम्यून सिस्टम को भी मजबूत बनाता है। नियमित अभ्यास से शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कोविड महामारी के बाद यह और भी महत्वपूर्ण हो गया है।


मानसिक स्वास्थ्य योग का सबसे बड़ा योगदान है। आज की युवा पीढ़ी चिंता, अवसाद और तनाव से ग्रस्त है। योग में ध्यान और प्राणायाम मन को शांत करते हैं। विपश्यना या mindfulness ध्यान से स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल कम होता है, नींद बेहतर आती है और एकाग्रता बढ़ती है। छात्रों के लिए यह परीक्षा तनाव कम करने का बेहतरीन माध्यम है। कार्यरत लोगों के लिए योग वर्क-लाइफ बैलेंस बनाए रखता है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है और भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है। योग से आत्मविश्वास बढ़ता है, जो व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में सफलता की कुंजी है।



योग को स्वस्थ जीवनशैली का आधार बनाना चाहिए। योग सिर्फ आसन नहीं, बल्कि आहार, नींद और दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है। आयुर्वेद के अनुसार, सात्विक भोजन – फल, सब्जियाँ, दालें, अनाज और दूध – योग के लाभों को बढ़ाता है। जंक फूड, ज्यादा तेल-मसाले और रात में भारी भोजन से दूर रहना चाहिए। सुबह जल्दी उठना, सूर्योदय के साथ योग करना और रात को 7-8 घंटे की नींद लेना आदर्श है। डिजिटल डिटॉक्स भी योग का हिस्सा बन सकता है – स्क्रीन टाइम कम करके ध्यान बढ़ाना।


योग नियमित अभ्यास से लचीलापन बढ़ाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है और संतुलन सुधारता है, जिससे गिरने का खतरा कम होता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से सिद्ध है कि यह तनाव कम करता है, कोर्टिसोल स्तर घटाता है और चिंता को 40% तक कम कर सकता है। हृदय स्वास्थ्य में सुधार, बेहतर नींद, आत्मसम्मान में वृद्धि और समग्र जीवन गुणवत्ता में वृद्धि जैसे लाभ भी प्रमाणित हैं। योग कैंसर रोगियों में थकान कम करता है और मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है, जिससे दैनिक जीवन अधिक संतुलित और ऊर्जावान बनता है।


समाजिक स्तर पर योग समुदाय को जोड़ता है। गांवों में योग शिविर, शहरों में पार्कों में सामूहिक सत्र और स्कूलों में योग शिक्षा से लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं। महिलाओं के लिए यह सशक्तिकरण का साधन है – घरेलू कामों के साथ स्वास्थ्य बनाए रखना। बुजुर्गों के लिए योग गतिशीलता बनाए रखता है और अकेलेपन को कम करता है। पर्यावरणीय दृष्टि से, योग हमें प्रकृति से जोड़ता है। योग हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य और पृथ्वी का स्वास्थ्य जुड़े हुए हैं। कम खपत, अधिक जागरूकता और संतुलित जीवन से हम पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं।


आर्थिक रूप से भी योग फायदेमंद है। अस्पतालों के खर्च कम होते हैं, दवाओं पर निर्भरता घटती है। एक स्वस्थ व्यक्ति अधिक उत्पादक होता है, जिससे परिवार और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है। भारत में योग पर्यटन बढ़ रहा है – ऋषिकेश, हरिद्वार जैसे स्थान विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, जिससे रोजगार भी बढ़ता है।

योग अपनाना आसान है। शुरुआत में 15-20 मिनट रोज़ काफी हैं। घर पर ऑनलाइन वीडियो या ऐप्स से सीख सकते हैं। वहीं सरकारी योजनाएँ जैसे आयुष मंत्रालय के योग कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के शिविर मुफ्त प्रशिक्षण देते हैं। लेकिन महत्वपूर्ण है निरंतरता। योग कोई जादू नहीं, बल्कि अभ्यास है। योग को धीरे-धीरे बढ़ाएँ, शरीर की सुनें और धैर्य रखें। याद रहे कि योग हमें सिखाता है कि सच्चा स्वास्थ्य बाहर नहीं, भीतर है। जब हम योग अपनाते हैं, तो न केवल हम स्वस्थ होते हैं, बल्कि समाज और पर्यावरण भी लाभान्वित होता है। इसलिए कोशिश करें कि हम योग को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ।  

Friday, January 16, 2026

भ्रष्टाचार के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का विभाजित फैसला!

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (पीसी एक्ट) की धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर एक विभाजित फैसला सुनाया है। 13 जनवरी 2026 को न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय व्यक्त की, जिसके परिणामस्वरूप मामला मुख्य न्यायाधीश को बड़ी पीठ के गठन के लिए संदर्भित कर दिया गया। यह फैसला सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की मंजूरी देने से संबंधित है, जो देश में भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण है। धारा 17ए, जो 2018 के संशोधन के माध्यम से अधिनियम में जोड़ी गई थी, जांच एजेंसियों को किसी भी लोक सेवक के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच, पूछताछ या अन्वेषण शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति प्राप्त करने का आदेश देती है। इस प्रावधान का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को राजनीतिक प्रतिशोध या अनावश्यक उत्पीड़न से बचाना है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह भ्रष्ट तत्वों को संरक्षण प्रदान करता है।

भारत में भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है और ऐसे प्रावधान जो जांच प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं, लोकतंत्र की नींव को प्रभावित कर सकते हैं। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने धारा 17ए को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि यह जांच एजेंसियों के हाथ बांधती है और भ्रष्टाचारियों को पूर्व चेतावनी देकर सबूत नष्ट करने का अवसर प्रदान करती है। उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रावधान ने जांच की 'आकस्मिकता' (element of surprise) को समाप्त कर दिया है, जो भ्रष्टाचार के मामलों में आवश्यक है। दूसरी ओर, न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने इसे वैध ठहराते हुए कहा कि यह लोक सेवकों को अनावश्यक जांच से बचाता है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। इस विभाजन ने एक बार फिर भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में संतुलन की आवश्यकता पर बहस छेड़ दी है।

2018 से पहले, पीसी एक्ट में जांच के लिए पूर्व अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं थी, केवल अभियोजन के लिए धारा 19 के तहत मंजूरी जरूरी थी। लेकिन 1990 के दशक में, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता पर सवाल उठे। ऐतिहासिक रूप से, ‘विनीत नारायण बनाम भारत संघ’ (1998) का फैसला एक मील का पत्थर है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए निर्देश दिया कि उच्च अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने ‘सिंगल डायरेक्टिव’ को असंवैधानिक घोषित किया, जो कैबिनेट सचिव स्तर के अधिकारियों के खिलाफ जांच के लिए सरकारी अनुमति मांगता था। इस फैसले ने भ्रष्टाचार विरोधी जांच को मजबूत किया और राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने का प्रयास किया।

हालांकि, 2003 में दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम (डीएसपीई एक्ट) में धारा 6ए जोड़ी गई, जो संयुक्त सचिव स्तर से ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य करती थी। यह प्रावधान भी विवादास्पद रहा। 2014 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 6ए को असंवैधानिक घोषित कर दिया, क्योंकि यह अधिकारियों के बीच भेदभाव करता था और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन करता था। कोर्ट ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार जांच में सभी को समान रूप से जवाबदेह होना चाहिए, चाहे उनका पद कितना भी ऊंचा हो। इस फैसले ने जांच एजेंसियों को अधिक स्वायत्तता प्रदान की, लेकिन सरकार ने 2018 में पीसी एक्ट में संशोधन कर धारा 17ए पुनः पेश की, जो सभी लोक सेवकों पर लागू होती है और पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाती है।

हालिया विभाजित फैसले से पहले भी धारा 17ए पर विवाद हुए हैं। 2023 में ‘सीबीआई बनाम आरआर किशोर’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2018 के संशोधन पूर्वव्यापी नहीं हैं, अर्थात 2018 से पहले के अपराधों पर धारा 17ए लागू नहीं होती। लेकिन 2024 में चंद्रबाबू नायडू मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ विभाजित हुई, जहां न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस ने धारा 17ए को प्रक्रियात्मक मानकर पूर्वव्यापी प्रभाव दिया, जबकि न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी ने इसे मूलभूत मानकर अस्वीकार किया। यह मामला भी बड़ी पीठ को संदर्भित किया गया। इन फैसलों से स्पष्ट है कि धारा 17ए ने जांच प्रक्रिया को जटिल बनाया है, जिससे कई भ्रष्टाचार मामले लंबित हो गए हैं। उदाहरणस्वरूप, लोकपाल और सीबीआई जैसी संस्थाओं ने शिकायत की है कि पूर्व अनुमति की प्रक्रिया में देरी से भ्रष्टाचारियों को फायदा होता है।

इस प्रावधान के पक्ष में तर्क केवल यही है कि यह ईमानदार अधिकारियों को बचाता है। भारत में राजनीतिक प्रतिशोध के कई उदाहरण हैं, जहां जांच एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया है। न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने अपने फैसले में कहा कि धारा 17ए निर्णय लेने की प्रक्रिया में साहस प्रदान करती है और अनावश्यक जांच से बचाती है। लेकिन वहीं इसके विपक्ष में, न्यायमूर्ति नागरत्ना का मत मजबूत है। यह प्रावधान भ्रष्टाचारियों को पूर्व सूचना देकर सबूत मिटाने का मौका देता है, जो ‘विनीत नारायण’ फैसले के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। अतीत के मामलों से सीखते हुए, हम देखते हैं कि पूर्व अनुमति जैसे प्रावधान अक्सर राजनीतिक संरक्षण का माध्यम बन जाते हैं। उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक के हवाला कांड में, जांच में देरी ने कई आरोपी को बचा लिया था।

इस विभाजित फैसले के गहरे प्रभाव भी हैं। यदि बड़ी पीठ धारा 17ए को असंवैधानिक घोषित करती है, तो भ्रष्टाचार जांच तेज होगी, जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल जैसे संगठनों की मांग के अनुरूप है। लेकिन इससे राजनीतिक दुरुपयोग का खतरा बढ़ सकता है, जैसा कि हाल के ईडी और सीबीआई मामलों में देखा गया। यदि इसे बरकरार रखा जाता है, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर होगी, क्योंकि अनुमति प्रक्रिया में महीनों लग सकते हैं। भारत, जहां भ्रष्टाचार सूचकांक में 85वें स्थान पर है, को ऐसे कानूनों की जरूरत है जो जांच को सुगम बनाएं, न कि बाधित।

गौरतलब है कि यह मुद्दा भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में संतुलन की मांग करता है। ‘विनीत नारायण’ जैसे ऐतिहासिक फैसलों ने जांच की स्वतंत्रता पर जोर दिया है और हालिया विभाजित फैसला इसी दिशा में एक कदम है। सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ को इस पर विचार करते हुए ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा और भ्रष्टाचार की रोकथाम दोनों को सुनिश्चित करना चाहिए। भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए, जांच प्रक्रिया पारदर्शी और त्वरित होनी चाहिए, ताकि न्याय की जीत हो। 

Monday, January 12, 2026

कैसे हल हो भारत में दूषित जल की समस्या? 

भारत, जो दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, आज दूषित जल के एक गंभीर संकट से जूझ रहा है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2025-2026 में, दूषित नल के पानी से 5,500 से अधिक लोग बीमार हुए और 34 मौतें हुईं, जो 26 शहरों में फैली हुई हैं। यह आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि वे एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या की ओर इशारा करते हैं। भारत की प्रमुख नदियां, जैसे गंगा और यमुना, औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज और कृषि अपवाह से बुरी तरह प्रदूषित हैं। विश्व जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में से 120वें स्थान पर है और लगभग 70% भूजल स्रोत दूषित हैं। 

दूषित जल की समस्या भारत में बहुआयामी है। मुख्य कारणों में अनुपचारित सीवेज सबसे बड़ा है, जो नदियों और भूजल को प्रदूषित करता है। इसके अलावा, कृषि से निकलने वाले कीटनाशक और उर्वरक, तथा उद्योगों से निकलने वाले रसायन जैसे भारी धातु और विषाक्त पदार्थ जल स्रोतों को नष्ट कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, कपड़ा और चमड़ा उद्योगों से निकलने वाला अपशिष्ट कई नदियों को प्रभावित कर रहा है। 163 मिलियन भारतीयों के पास सुरक्षित पेयजल की पहुंच नहीं है और 21% संक्रामक रोग जल से संबंधित हैं। 


हाल ही में इंदौर और अन्य शहरों के घटनाक्रमों ने इस समस्या को और उजागर किया है। इंदौर में दूषित पानी से कम से कम 8 मौतें हुईं, लेकिन रिकॉर्ड दिखाते हैं कि 18 परिवारों को मुआवजा दिया गया। यह असंगति सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठाती है। पूरे देश में टाइफाइड जैसे रोग फैल रहे हैं, जो दूषित पानी से जुड़े हैं। आर्थिक रूप से, यह संकट उत्पादकता को प्रभावित करता है, क्योंकि बीमारियां कार्यबल को कमजोर करती हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से, यह जैव विविधता को भी नुकसान पहुंचाता है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बढ़ाता है। 2025-2027 में जल की कमी भारत के लिए सबसे बड़ा पर्यावरणीय जोखिम साबित हो सकती है। यदि इसे नजरअंदाज किया गया, तो ‘डे जीरो’ की स्थिति कई राज्यों में आ सकती है।



सरकार की उदासीनता इस समस्या का एक प्रमुख कारण है। केंद्र सरकार पर आरोप है कि वह स्वच्छ जल और स्वच्छ हवा प्रदान करने में विफल रही है। विपक्षी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधान मंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष के अनुसार मुख्य कारणों में कमी नियमों की है, अत्यधिक निजीकरण, सरकारी भ्रष्टाचार और सामान्य उपेक्षा शामिल हैं। मध्य प्रदेश में इंदौर घटना के बाद नगर आयुक्त को हटाया गया और दो अधिकारियों को निलंबित किया गया, लेकिन विपक्ष इसे केवल प्रतिक्रियात्मक कदम मानता है। 


राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार चुनावी वादे जैसे ‘हर घर जल’ योजना लागू तो हुई, लेकिन गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया। दिल्ली जल बोर्ड को सख्त जांच के निर्देश दिए गए, लेकिन शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की कमी पाई गई है। भ्रष्टाचार के कारण फंड का दुरुपयोग होता है और स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचा अभी भी पुराना है। सीवेज और पेयजल लाइनों की मिश्रण जैसी समस्याएं आम हैं। राष्ट्रीय स्तर पर, जल गुणवत्ता 2025-26 में एक प्रमुख चुनौती है, लेकिन इस गंभीर चुनौती को कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) को स्थानांतरित करने के बजाय सरकार को अधिक सक्रिय होना चाहिए। यह उदासीनता न केवल स्वास्थ्य संकट पैदा करती है, बल्कि सामाजिक असमानता को भी बढ़ाती है, क्योंकि इससे गरीब तबके के लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।


दूषित जल की समस्या का समाधान संभव है, यदि बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया जाए। सबसे पहले, स्रोत पर प्रदूषण को रोकना जरूरी है। उद्योगों को अपशिष्ट उपचार संयंत्र स्थापित करने के लिए बाध्य किया जाए। कृषि में जैविक खेती को प्रोत्साहित करें ताकि रसायनों का अपवाह कम हो। सीवेज उपचार को 100% बनाना चाहिए, जो वर्तमान में अपर्याप्त है।


आंकड़े बताते है कि पश्चिमी देशों के अनुभव काफ़ी उपयोगी साबित हुए हैं। स्विट्जरलैंड में शहरी जल उपचार की गुणवत्ता सर्वोच्च है और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वहां का नल का पानी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। वे अपशिष्ट जल को पुनर्चक्रित करते हैं, जो कई देशों में अपनाया जाता है। यूरोप में ‘ब्लू रिवोल्यूशन’ रणनीति कुशल उपयोग, अपशिष्ट कमी और पारिस्थितिक संतुलन पर जोर देती है। प्रबंधित एक्विफर रिचार्ज (एमएआर) जैसी विधियां अपनाई जाती हैं, जिसमें नदी तलों को समायोजित करना, बैंक फिल्ट्रेशन, सतही पानी का वितरण और रिचार्ज कुओं का उपयोग शामिल है। 


वहीं अमेरिका और यूरोप में मेम्ब्रेन सेपरेशन टेक्नोलॉजी, सोलर वाटर डिसइंफेक्शन (एसओडीआईएस) और सिरेमिक फिल्ट्रेशन जैसी तकनीकें आम हैं। यूरोपीय संघ में जल बचत पर जोर है, विभिन्न क्षेत्रों में दक्षता बढ़ाने के लिए। काउंसिल ऑफ यूरोपियन बैंक ने 16 देशों में जल और स्वच्छता परियोजनाओं में 1.8 बिलियन यूरो का निवेश किया है। प्रकृति-आधारित समाधान (एनबीएस) यूरोप में जल प्रबंधन में उपयोगी हैं, जैसे वेटलैंड्स और वन क्षेत्रों का उपयोग फिल्टर के रूप में किया जाना। 


भारत को पश्चिमी अनुभवों से सीखते हुए उनके सफल उपाय को अपनाना चाहिए। अमेरिका की तरह, पर्यावरण संरक्षण एजेंसी जैसी स्वतंत्र संस्था बनाएं जो प्रदूषण पर नजर रखे। जुर्माने और जेल की सजा लागू करें। यूरोप की तरह, जल उपचार संयंत्रों में बड़े निवेश करें। डिसेलिनेशन प्लांट्स लगाएं, हालांकि उनके नुकसानों को ध्यान में रखें।  हर घर में फिल्टर सिस्टम अनिवार्य करें। स्विट्जरलैंड मॉडल अपनाएं, अपशिष्ट जल को पुन: उपयोग योग्य बनाएं। एमएआर तकनीक से भूजल रिचार्ज करें। स्थानीय समुदायों को शामिल करने पर भी ज़ोर दिया जाए, जैसे यूरोप में एनबीएस परियोजनाओं के तहत शिक्षा अभियान चलाए जाते हैं जिससे कि लोग जल संरक्षण करते हैं। नवीनतम तकनीकी का नवाचार करने पर भी ज़ोर देने की आवश्यकता है। 


इसके साथ ही सरकारी तंत्र के पारदर्शिता को बढ़ाए जाने की भी ज़रूरत है। इंदौर के उदाहरण को देखते हुए दूषित पानी के कारण हुई मौतों के आंकड़ों में असंगति न पैदा हो। सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो राष्ट्रीय जल नीति को मजबूत करें, जिसमें जलवायु परिवर्तन को भी शामिल किया जाए। ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा कि दूषित जल भारत की प्रगति में बाधा है, लेकिन पश्चिमी देशों के सफल मॉडल से प्रेरणा लेकर हम इसे हल कर सकते हैं। सरकार को उदासीनता छोड़कर सक्रिय होना चाहिए, अन्यथा यह संकट और गहराएगा। स्वच्छ जल हर नागरिक का अधिकार है और इसे सुनिश्चित करना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। 

Monday, January 5, 2026

नेताओं की भाषा का गिरता स्तर चिंताजनक 

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसके नेताओं की गरिमा और संवाद की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। लेकिन हाल के वर्षों में, राजनीतिक भाषणों व बयानों में अभद्र टिप्पणियां व असंसदीय भाषा, गाली-गलौज का बढ़ता प्रयोग एक गंभीर मुद्दा बन गया है। यह न केवल संसद और विधानसभाओं तक सीमित है, बल्कि चुनावी रैलियों, मीडिया इंटरव्यू और सोशल मीडिया पर भी फैल चुका है। यह मुद्दा इतना संवेदनशील बन चुका है कि राजनीतिक दल चाहे कोई भी क्यों न हो उनके बिगड़े बोल, आम नागरिकों, पार्टी कार्यकर्ताओं और मीडिया पर एक नकारात्मक प्रभाव  डालते हैं। साथ ही, महिलाओं, विपक्षी दलों और पत्रकारों के प्रति नेताओं के दुर्व्यवहार भी आजकल चर्चा में है जो कि इन अमर्यादित नेताओं के सच्चे चरित्र को सामने लाता है।


संसदीय परंपराओं में, असंसदीय भाषा वह होती है जो अपमानजनक, अभद्र या व्यक्तिगत हमला करने वाली होती है। भारतीय संसद में, स्पीकर अक्सर ऐसी भाषा को हटाने का आदेश देते हैं, लेकिन संसद के बाहर ऐसे बयानों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता। राजनीतिक नेता अक्सर विपक्षी नेताओं को 'चोर', 'गद्दार' या इससे भी बदतर शब्दों से संबोधित करते हैं। चुनावी मौसम में यह और तीव्र हो जाता है, जहां व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की जगह ले लेते हैं। गौरतलब है कि कुछ नेताओं की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के युग में यह वायरल होकर लाखों लोगों तक पहुंच जाती है, जिससे समाज पर इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।


भारतीय वोटर या नागरिक अपनी पसंद अनुसार राजनीतिक दलों का समर्थन करते हैं और उन दलों के नेताओं को अपना आदर्श भी मानते हैं। जब नेता सार्वजनिक मंचों पर गाली-गलौज करते हैं, तो यह नागरिकों में नेतृत्व के प्रति सम्मान की भावना को कमजोर करता है। विशेषकर युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है, इससे प्रभावित होती है। वे सोचते हैं कि अगर देश के लोकप्रिय नेता खुले मंचों पर ही ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो सामान्य जीवन में क्या करते होंगे? इससे समाज में असहिष्णुता और हिंसा की संस्कृति पनपती है। उदाहरणस्वरूप, जब कोई नेता विपक्षी को 'कुत्ता' या 'सुअर' जैसे शब्दों से नवाजता है, तो यह न केवल उस व्यक्ति का अपमान है, बल्कि पूरे लोकतंत्र का मजाक उड़ाता है। नागरिकों में यह धारणा बनती है कि राजनीति एक गंदा खेल है, जहां नैतिकता की कोई जगह नहीं। परिणामस्वरूप, मतदान में उदासीनता बढ़ती है और लोग राजनीति से दूर होते जाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, कई नागरिकों का मानना है कि ऐसी भाषा से राजनीति की विश्वसनीयता घटती है, जिससे लोकतंत्र कमजोर होता है।


राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अपने नेताओं को आदर्श मानकर उनका अनुसरण करते हैं। जब शीर्ष नेता असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो यह कार्यकर्ताओं में भी वैसी ही प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है। चुनावी रैलियों में कार्यकर्ता विपक्षी दलों के खिलाफ नारे लगाते समय अक्सर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जो कभी-कभी हिंसक झड़पों में बदल जाता है। इससे दल के अंदर अनुशासनहीनता बढ़ती है और कार्यकर्ता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा में उलझ जाते हैं। इसके अलावा, जब कोई नेता अपनी ही पार्टी के सदस्यों के खिलाफ ऐसी भाषा इस्तेमाल करता है (जैसे असंतोषी सदस्यों को 'गद्दार' कहना), तो यह आंतरिक कलह को जन्म देता है। पार्टी कार्यकर्ता निराश होते हैं और उनका मनोबल गिरता है। लंबे समय में, यह दलों की एकजुटता को प्रभावित करता है और राजनीतिक स्थिरता को खतरे में डालता है। कार्यकर्ता सोचते हैं कि अगर नेता ही सम्मान नहीं रखते, तो वे क्यों रखें? इससे राजनीतिक संस्कृति में गिरावट आती है।

वहीं मीडिया पर इसका प्रभाव सबसे अधिक चिंताजनक है। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो नेताओं से सवाल पूछकर जवाबदेही सुनिश्चित करती है। लेकिन जब पत्रकार तीखे सवाल पूछते हैं, तो कई नेता उन पर व्यक्तिगत हमला करते हैं या अभद्र व्यवहार करते हैं। उदाहरण के तौर पर, प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेता पत्रकारों को 'पेड मीडिया' या 'दलाल' कहकर अपमानित करते हैं। कभी-कभी यह शारीरिक धमकी तक पहुंच जाता है, जैसे कैमरा छीनना या बाहर निकालना। इससे मीडिया की स्वतंत्रता पर खतरा मंडराता है। पत्रकार डर के मारे सवाल पूछने से हिचकिचाते हैं, जिससे जनता को सच्ची जानकारी नहीं मिलती। सोशल मीडिया पर नेता पत्रकारों के खिलाफ ट्रोल आर्मी को सक्रिय करते हैं, जो अभद्र टिप्पणियों से उन्हें परेशान करते हैं। यह न केवल मीडिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा को भी खतरे में डालता है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भारत में पत्रकारों पर हमलों की संख्या बढ़ने का उल्लेख है, और असंसदीय भाषा इसका एक प्रमुख कारण है।

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन उनके खिलाफ लिंगभेदी टिप्पणियां एक बड़ी समस्या हैं। नेता अक्सर महिला विपक्षी नेताओं की शारीरिक बनावट, कपड़ों या व्यक्तिगत जीवन पर अभद्र टिप्पणियां करते हैं। जैसे 'आइटम' या 'डांस करने वाली' जैसे शब्दों का प्रयोग। यह न केवल महिलाओं का अपमान है, बल्कि पूरे समाज में लिंग असमानता को बढ़ावा देता है। इससे महिला कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है और वे राजनीति में आने से हिचकिचाती हैं। विपक्षी दलों के प्रति भी ऐसी भाषा का प्रयोग आम है। नीतिगत मतभेदों की बजाय, नेता व्यक्तिगत हमलों में उलझ जाते हैं, जैसे परिवार को निशाना बनाना या जाति-धर्म पर टिप्पणियां। इससे राजनीतिक बहस का स्तर गिरता है और समाज में विभाजन बढ़ता है। पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार का जिक्र पहले हो चुका है, लेकिन महिलाओं पत्रकारों के साथ यह और गंभीर होता है, जहां लिंगभेदी टिप्पणियां जोड़ी जाती हैं।

यह सब देखकर लगता है कि भारतीय राजनीति में सभ्यता की कमी एक बड़ी चुनौती है। लेकिन इसका समाधान क्या है? सबसे पहले, नेताओं को स्वयं अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सख्त नियम लागू करने चाहिए और बाहर के मंचों पर भी नैतिक दिशानिर्देश। मीडिया को ऐसी भाषा को बढ़ावा न देकर, जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग करनी चाहिए। नागरिकों को भी सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री को शेयर न करके, विरोध जताना चाहिए। राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना चाहिए कि बहस नीतियों पर हो, न कि व्यक्तिगत हमलों पर। महिलाओं के प्रति सम्मान बढ़ाने के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम चलाए जा सकते हैं। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून सख्त किए जाएं।

लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असंसदीय भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। अगर हम एक मजबूत भारत चाहते हैं, तो राजनीतिक बयानों व भाषणों को सभ्य बनाना होगा। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया सब मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी हमारा लोकतंत्र सच्चे अर्थों में चमकेगा। 

Monday, December 29, 2025

बढ़ता धार्मिक पर्यटन और धार्मिक नगरों की चुनौती 

भारत में धार्मिक पर्यटन सदैव से हमारी सांस्कृतिक और आस्था परंपराओं का अभिन्न हिस्सा रहा है। किंतु पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में जिस तीव्र गति से वृद्धि हुई है, उसने धार्मिक नगरों की तस्वीर ही बदल दी है। अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, वृंदावन, उज्जैन, द्वारका, तिरुपति जैसे नगर आज विश्व स्तरीय धार्मिक पर्यटन केंद्रों में बदल चुके हैं। सरकारें भी इसे ‘आस्था से अर्थव्यवस्था’ के सूत्र में जोड़कर पर्यटन को प्रोत्साहन देने के प्रयास में लगी हैं। लेकिन इन प्रयासों के समानांतर कुछ ऐसे प्रश्न भी हैं, जिनसे आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। क्या इस विकास की गति निभाई जा रही है? क्या स्थानीय निवासियों और तीर्थ स्थलों के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखा जा सका है? क्या प्रशासन इतना सक्षम है कि वो त्योहारों और छुट्टियों के समय अतिरिक्त पर्यटकों को संभाल सके?


अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण के बाद देश भर में धार्मिक पर्यटन में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है। अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यहाँ प्रतिवर्ष करोड़ों पर्यटक पहुंचेंगे। इसी तरह काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ने बनारस की ऐतिहासिक गलियों को व्यवसायिक जीवन दिया है; होटल, रेस्टोरेंट, परिवहन और हस्तशिल्प उद्योगों को भी नई सांस मिली है। वृंदावन और मथुरा में हर त्योहार अब अंतरराष्ट्रीय आयोजन का रूप ले चुका है। आर्थिक दृष्टि से यह परिवर्तन शुभ संकेत है, रोजगार बढ़े हैं, स्थानीय व्यापार में तेजी आई है और बुनियादी ढाँचे पर निवेश भी हुआ है।

लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि इस तेज़ी ने धार्मिक नगरीय संतुलन को डगमगा दिया है। छोटे नगरों की सीमित सड़कों, आवासों और संसाधनों पर अचानक लाखों की भीड़ का दबाव प्रशासन के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है। पर्यावरणीय दबाव, कचरा प्रबंधन और जल संकट जैसी समस्याएँ अब इन नगरों के स्थायी साथी बन चुके हैं।


उल्लेखनीय है कि भारत में भीड़ प्रबंधन का ढाँचा अभी भी विकासशील स्तर पर है। चाहे कुंभ मेले का आयोजन हो या अयोध्या में दीपोत्सव, प्रशासनिक तैयारियाँ अक्सर अनुमान से कम पड़ ही जाती हैं। पश्चिमी देशों जैसे इटली, फ्रांस या स्पेन में धार्मिक पर्यटन अत्यधिक संगठित ढंग से संचालित होता है। वेटिकन सिटी या लूर्ड जैसे स्थानों पर पर्यटकों की संख्या भले लाखों में हो, लेकिन वहाँ डिजिटल टिकटिंग, समय-वार प्रवेश प्रणाली, स्पष्ट दिशानिर्देश और प्रशिक्षित स्वयंसेवकों का जाल पूरी व्यवस्था को सुचारु बनाए रखता है। इन्हीं से प्रेरित हो कर हमारे देश में भी कुछ स्वघोषित गुरुओं के स्थानों पर भी व्यवस्था काफ़ी हद तक सुचारू दिखाई देती है।  


वहीं इसके विपरीत भारत के धार्मिक नगरों में तीर्थयात्रियों का आगमन प्रायः अनियोजित होता है। ट्रेन, बस, सड़कों पर भीड़ एक साथ उमड़ती है जिससे जाम, दुर्घटनाएँ और अव्यवस्था आम हो जाती है। सुरक्षा बलों और प्रशासनिक कर्मचारियों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, और अक्सर स्थानीय निवासियों का सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

धार्मिक पर्यटन का यह उभार स्थानीय नागरिकों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। अयोध्या या वाराणसी की गलियों में रहने वाले निवासियों को अब अपने ही घरों तक पहुंचने में कठिनाई होती है। सड़कों पर निरंतर भीड़, बढ़ते वाहन और लगातार चल रहे निर्माण कार्यों ने जीवन-स्तर को प्रभावित किया है। किराए आसमान छू गए हैं, स्थानीय दुकानों की जगह बड़े ब्रांडों ने ले ली है और धार्मिक शांति की जगह अब व्यावसायिक कोलाहल ने ले ली है। धार्मिक नगरों का जो आत्मिक वातावरण कभी लोगों को भीतर तक आस्था से जोड़ता था, वह अब सजावटी प्रकाशों और सेल्फ़ी प्वाइंट्स में खोता जा रहा है। श्रद्धा के स्थलों का ‘पर्यटन स्थल’ में बदल जाना विकास के नाम पर एक सांस्कृतिक ह्रास भी है।


अयोध्या, वाराणसी या वृंदावन जैसे नगरों की आत्मा उनकी प्राचीनता, उनकी पवित्रता और उनके पारंपरिक जीवन में बसती है। लेकिन आज ये नगर तेजी से ‘आधुनिक तीर्थ’ में तब्दील किए जा रहे हैं। चौड़ी सड़कों, चमकीले कॉरिडोर, आधुनिक गेस्टहाउस और मॉल जैसी परियोजनाएं विकास के प्रतीक मानी जा रही हैं। निःसंदेह इनसे सुविधा बढ़ी है, लेकिन इसके साथ-साथ धार्मिक अनुभव का मूल स्वरूप भी धीरे-धीरे बदल गया है।

वह आध्यात्मिक संवेदना, वह साधु-संतों के भजनों की सुगंध और घाटों पर बहती शांति, ये सब अब पर्यटक आकर्षण के दृश्य में सिमट गए हैं। भवनों के रंग, पारंपरिक स्थापत्य और स्थानीय शिल्प को आधुनिक डिज़ाइन ने विस्थापित कर दिया है। यह भीड़ केंद्रित विकास कहीं न कहीं नगरों की ‘आस्था आधारित पहचान’ को बाज़ारीकरण में बदल रहा है।

धार्मिक पर्यटन का बढ़ना अपने आप में बुरा नहीं है। यह सांस्कृतिक एकता, लोक व्यवसाय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब तीर्थस्थलों का विकास केवल संरचनात्मक दृष्टि से किया जाए और उसमें सांस्कृतिक संरक्षण की भावना गायब हो। भारत को पश्चिमी देशों से यह सीखने की जरूरत है कि आध्यात्मिक धरोहर को आधुनिक सुविधाओं के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है।

इसके लिए तीन स्तरों पर ठोस पहल जरूरी है: स्मार्ट प्लानिंग: पर्यटन की पूर्वानुमानित योजना बनाई जाए। डिजिटल टिकटिंग, भीड़ नियंत्रण एप्स और समयबद्ध दर्शनों की व्यवस्था लागू की जाए। स्थानीय सहभागिता: नगर के विकास में स्थानीय निवासियों की राय और सहभागिता सुनिश्चित हो, ताकि विकास उनके जीवन को प्रभावित न करे। सांस्कृतिक संरक्षण: निर्माण कार्यों में पारंपरिक स्थापत्य, स्थानीय कला और जीवन शैली को प्राथमिकता दी जाए, ताकि नगर की आत्मा जीवित रहे।

भारतीय धार्मिक पर्यटन आज देश की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान का नया प्रतीक बन गया है। अयोध्या, काशी, मथुरा, वृंदावन जैसे नगर आस्था की ऊर्जा से भरे हुए हैं, लेकिन उसी आस्था के संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही व्यापक है। यदि हम केवल पर्यटक बढ़ाने पर ध्यान देंगे और तीर्थ के मूल भाव को नजरअंदाज करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ इन नगरों में केवल चमक देख पाएंगी, वह अनुभूति नहीं, जिसके लिए हमारे पूर्वज तीर्थ यात्रा करते थे। विकास का अर्थ केवल इमारतों का निर्माण नहीं, बल्कि उस भावना को सहेजना है जो हमें भीतर से जोड़ती है। अगर आधुनिकता और आध्यात्मिकता के बीच यह संतुलन साध लिया गया, तभी धार्मिक पर्यटन भारत की सांस्कृतिक आत्मा को मजबूत करेगा, न कि उसकी मूल पहचान को मिटाएगा। 

Monday, December 22, 2025

अमेरिकी लोकतंत्र की पारदर्शिता और भारतीय संसद! 

अमेरिकी राजनीति में हाल ही में एक बार फिर एक ऐसी घटना घटी जब एफबीआई निदेशक काश पटेल को कांग्रेस की हाउस ज्यूडिशियरी कमिटी के समक्ष सुनवाई के लिए बुलाया गया। यह सुनवाई दिसंबर 2025 में हुई, जहां पटेल को जेफरी एपस्टीन फाइलों, एफबीआई की पारदर्शिता और अन्य विवादास्पद मुद्दों पर कड़े सवालों का सामना करना पड़ा। सुनवाई के दौरान एक एपस्टीन वीडियो चलाया गया, जिसने सदन में हंगामा मचा दिया। पटेल ने दावा किया कि एपस्टीन की फाइलों में कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है कि उन्होंने अन्य लोगों को ट्रैफिकिंग की गई पीड़िताएं प्रदान की थीं और जांच पुराने गैर-अभियोजन समझौतों से बंधी हुई है। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने ही एपस्टीन के खिलाफ मामले को फिर से खोला था, जबकि पहले के प्रशासन (ओबामा और बाइडेन) ने फाइलें जारी नहीं कीं। डेमोक्रेट सांसदों ने पटेल पर ट्रंप को बचाने का आरोप लगाया, जबकि पटेल ने इनकार किया और कहा कि सभी कानूनी रूप से जारी करने योग्य जानकारी साझा की जा रही है। सुनवाई में एजेंटों की पुनर्नियुक्ति, चार्ली किर्क की हत्या की जांच और एफबीआई के राजनीतिकरण जैसे मुद्दे भी उठे, जहां पटेल ने अपराध दर में कमी और गिरफ्तारियों में वृद्धि का हवाला दिया।


यह सुनवाई अमेरिकी लोकतंत्र की एक प्रमुख विशेषता को दर्शाती है। कांग्रेस द्वारा कार्यकारी अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से जवाबदेह ठहराना एक परंपरा रही है। काश पटेल, जो ट्रंप के करीबी सहयोगी हैं और एफबीआई निदेशक के रूप में नियुक्त हुए, को सितंबर 2025 में भी सीनेट और हाउस कमिटियों के समक्ष पेश होना पड़ा था, लेकिन दिसंबर की सुनवाई अधिक विवादास्पद रही क्योंकि इसमें एपस्टीन स्कैंडल पर फोकस था। सुनवाई के दौरान सांसदों ने पटेल से सीधे सवाल किए, जैसे एपस्टीन फाइलों में ट्रंप का नाम कितनी बार आया और क्यों रेडैक्शन (संशोधन) के लिए लगभग 1,000 एजेंटों को लगाया गया। पटेल ने इनकार किया कि संसाधनों का दुरुपयोग हुआ और कहा कि जांच चल रही है, लेकिन अदालती आदेशों से बंधे हैं। इस तरह की सुनवाई लाइव प्रसारित होती हैं, जो जनता को सीधे देखने का अवसर देती हैं और यह अमेरिकी संविधान की जांच और संतुलन की व्यवस्था का हिस्सा है।


यदि तुलना की जाए तो भारत में भी संसद द्वारा किसी अधिकारी को बुलाने की प्रक्रिया है। लेकिन यह अमेरिकी कांग्रेस की तरह सार्वजनिक और नाटकीय नहीं होती। भारतीय संसद की स्थायी समितियां, जैसे लोक लेखा समिति (पीएसी), अनुमान समिति या संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी), अधिकारियों को बुला सकती हैं और पूछताछ कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जेपीसी ने अधिकारियों को समन किया था, लेकिन ये कार्यवाहियां बंद दरवाजों के पीछे होती हैं, मीडिया को अनुमति नहीं होती और कोई लाइव ब्रॉडकास्ट भी नहीं होता। अमेरिका में जहां सुनवाई टीवी पर लाइव होती है और सांसद अधिकारियों को कड़े सवाल भी कर सकते हैं, भारत में यह गोपनीय रहती है ताकि जांच प्रभावित न हो। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 और 118 के तहत समितियां स्वतंत्र हैं, लेकिन सार्वजनिक सुनवाई की परंपरा नहीं है।


क्या भारत में कभी ऐसी सुनवाई हो सकती है? यह संभव है, लेकिन राजनीतिक घोटालों के बावजूद मुश्किल। भारत संसदीय प्रणाली पर आधारित है, जहां कार्यकारी और विधायिका में फ्यूजन है, जबकि अमेरिका राष्ट्रपति प्रणाली में पृथक्करण है। जबकि यहां प्रधानमंत्री और मंत्री संसद के सदस्य होते हैं, इसलिए अधिकारी को बुलाना मंत्री की जिम्मेदारी पर सवाल उठा सकता है, जो राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सकता है। यदि कोई बड़ा घोटाला हो, जैसे राफेल डील या कोयला घोटाला आदि, तो जेपीसी तो अवश्य बन सकती है, लेकिन सार्वजनिक सुनवाई से राजनीतिक पार्टियां डरती हैं क्योंकि इससे संसद में हंगामा, इस्तीफे या सरकार गिरने का खतरा होता है। हालांकि, डिजिटल युग में पारदर्शिता की मांग बढ़ रही है। यदि संसद नियमों में संशोधन करे, जैसे सुनवाई को लाइव प्रसारित करने का प्रावधान, तो यह संभव हो सकता है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक संस्कृति में, जहां विपक्ष और सत्ता पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, ऐसी सुनवाई से घोटाला ही फूट सकता है, जैसे संसद में अवरोध या मीडिया ट्रायल। फिर भी, लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह विचारणीय है।


किसी भी लोकतंत्र में, सत्ता में कोई भी पार्टी क्यों न हो, ऐसे अधिकारियों को बुलाने के कई लाभ हैं। सबसे पहले, यह जवाबदेही सुनिश्चित करता है। चुने हुए प्रतिनिधि कार्यकारी अधिकारियों से सवाल कर सकते हैं, जो जनता की ओर से होता है। इससे भ्रष्टाचार, दुरुपयोग या नीतिगत असफलताओं पर रोशनी पड़ती है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में पटेल की सुनवाई से एपस्टीन फाइलों पर जनता को जानकारी मिली, जो अन्यथा छिपी रह सकती थी। भारत में यदि ऐसा हो, तो सरकारी योजनाओं या जांचों की पारदर्शिता अवश्य बढ़ेगी।

दूसरा, यह जांच और संतुलन की व्यवस्था को मजबूत करता है। लोकतंत्र में कोई भी शाखा निरंकुश नहीं होनी चाहिए। विधायिका द्वारा कार्यकारी को बुलाना सत्ता के दुरुपयोग को रोकता है। सत्ता में चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, यह प्रक्रिया नीतियों को जनहित में रखती है। तीसरा, जनता की भागीदारी बढ़ती है। सार्वजनिक सुनवाई से लोग सूचित होते हैं, जो मतदान और सक्रिय नागरिकता को प्रोत्साहित करता है। चौथा, यह राजनीतिक पार्टियों को पारदर्शी बनाता है, क्योंकि सत्ता पक्ष को अपनी नीतियों का बचाव करना पड़ता है, जबकि विपक्ष को रचनात्मक सवाल करने पड़ते हैं। इससे लोकतंत्र की गुणवत्ता सुधरती है।

हालांकि, इस सब के नुकसान भी हो सकते हैं, जैसे राजनीतिकरण या मीडिया ट्रायल, लेकिन देखा जाए तो लाभ अधिक हैं। पटेल की सुनवाई से अमेरिका में एफबीआई की विश्वसनीयता पर बहस हुई, जो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। भारत में यदि ऐसी व्यवस्था आए, तो घोटालों के बावजूद, यह देश को मजबूत बनाएगा और जवाबदेही व पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा।  

Monday, December 15, 2025

खाद्य मिलावट का गहराता संकट! 

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक चेतावनी दी जा रही है कि 15 साल में देश का हर व्यक्ति कैंसर का शिकार हो जाएगा…! वीडियो में यह दावा किया गया है कि मिलावटी खाने से पूरे समाज को धीरे-धीरे मार दिया जा रहा है। इसी तरह, एक और वीडियो में चीन के किसी लैब में फल-सब्ज़ियों पर रसायन और रंग छिड़कते हुए दिखाया गया है, जो तुरंत पक जाते हैं। ये वीडियो भय पैदा कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है: क्या ये सिर्फ अतिशयोक्ति हैं, या वास्तविकता का आईना? भारत में खाद्य मिलावट की समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे ‘धीमी हत्या’ कह रहे हैं। कैंसर, हृदय रोग और किडनी फेलियर जैसी बीमारियों का बढ़ता ग्राफ इसी का नतीजा है। लेकिन हम कितने प्रभावित होंगे? समस्या कितनी गंभीर है? और सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए?



खाद्य मिलावट कोई नई समस्या नहीं है। प्राचीन काल से ही व्यापारी लाभ के लिए अनाज में पत्थर, दूध में यूरिया और मसालों में कृत्रिम रंग मिलाते आए हैं। लेकिन 2025 में यह महामारी का रूप ले चुकी है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अनुसार, त्योहारों के मौसम में मिलावट के मामले 30 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं। दूध, घी, पनीर, मावा, तेल और मसाले – ये रोज़मर्रा के सामान अब ज़हर की तरह बन चुके हैं। हाल ही में गुजरात में 198 दूध और पनीर के नमूने असुरक्षित पाए गए, जिनमें स्टार्च और सिंथेटिक फैट मिले थे। आगरा में 2 क्विंटल मिलावटी खोआ नष्ट किया गया, जबकि सूरत के पास 745 किलो नकली पनीर जब्त हुआ। तिरुपति के प्रसिद्ध लड्डू के घी मिलावट कांड में सीबीआई ने 12 लोगों को गिरफ्तार किया, जहां वनस्पति तेल, बीटा कैरोटीन और एसिड एस्टर जैसे रसायनों से घी बनाया जा रहा था। पतंजलि का घी भी गुणवत्ता परीक्षण में फेल हो गया, जिसमें मिलावट की पुष्टि हुई। 



ये मामले सिर्फ़ तो सिर्फ़ संकेत हैं। जम्मू-कश्मीर में 2025 में 13,944 निरीक्षण हुए, जिनमें 21 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। लखनऊ में केएफसी, मैकडॉनल्ड्स और हल्दीराम जैसे ब्रांडों के 36 नमूने फेल हुए, जहां बैक्टीरिया और बासी सामग्री मिली। सोशल मीडिया पर हाल के पोस्ट्स में गोरखपुर की फैक्ट्री से 40 क्विंटल नकली पनीर (पोस्टर कलर, डिटर्जेंट और सल्फ्यूरिक एसिड से बना) जब्त होने की बात है, जो सड़क किनारे के ठेलों पर बिकता था। पाली में 4660 किलो मिलावटी मावा, देवली में मूंगफली तेल के नमूने – ये उदाहरण बताते हैं कि मिलावट अब छोटे-बड़े सभी स्तरों पर फैल चुकी है। 



अब सवाल है कि हम कितने प्रभावित होंगे? मिलावट का असर तत्काल और दीर्घकालिक दोनों है। तत्काल प्रभाव में उल्टी, दस्त, फूड पॉइज़निंग शामिल हैं, जैसा कि हाल के कफ सिरप कांड में 14 बच्चों की मौत हुई। लेकिन दीर्घकालिक खतरा और भी भयानक है। कैडमियम, पेस्टीसाइड्स और मेटानिल येलो जैसे रसायन कैंसर, लीवर-किडनी डैमेज और हृदय रोग का कारण बनते हैं।  यूरोपीय संघ ने 2019-2024 के बीच 400 से ज़्यादा भारतीय उत्पादों को कैंसरकारी पदार्थों से दूषित पाया, जिनमें मसाले, मछली और फल शामिल थे। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के अनुसार, मिलावट से जुड़े गैर-संक्रामक रोगों में 20 प्रतिशत वृद्धि हुई है। दक्षिण भारत में दूध और फलों में मिले रसायन गॉलब्लैडर कैंसर और ड्रॉप्सी के मामलों को बढ़ा रहे हैं। बैकरी आइटम्स में कृत्रिम रंगों से कैंसर का जोखिम दोगुना हो गया है। 


वायरल पोस्ट में दावा किया गया कि 15 साल में सबको कैंसर होगा – यह अतिशयोक्ति है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कभी ऐसा नहीं कहा कि 87 प्रतिशत भारतीयों को मिलावटी दूध से कैंसर होगा। लेकिन समस्या गंभीर है। फ्रंटलाइन पत्रिका के अनुसार, मिलावट से क्रॉनिक डिज़ीज़ेज़ में उछाल आया है, खासकर कैंसर और कार्डियोवस्कुलर डिसऑर्डर में।  भारत पहले से ही एशिया में कैंसर के मामलों में तीसरा सबसे बड़ा देश है, और मिलावट इसे और बढ़ावा दे रही है। ग्रामीण इलाकों में जहां जैविक खेती कम है, प्रभाव ज़्यादा पड़ता है। शहरीकरण और प्रोसेस्ड फूड के बढ़ते उपयोग से मध्यम वर्ग सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहा है।


चीन वाले वीडियो पर बात करें तो वह एआई-जनरेटेड फेक है। टिकटॉक पर मूल वीडियो को एआई कंटेंट के रूप में चिह्नित किया गया था और फैक्ट-चेकर्स ने असंगतताओं (जैसे अस्वाभाविक रंग परिवर्तन) की पुष्टि की। लेकिन यह वीडियो वास्तविक समस्या को उजागर करता है। चीन में अंगूरों पर 24 बार पेस्टीसाइड स्प्रे और चेरीज़ से आईसीयू के मामले सामने आए हैं। वैश्विक व्यापार में भारतीय निर्यात भी प्रभावित हो रहा है। लेकिन घरेलू स्तर पर समस्या ज़्यादा चिंताजनक है, जहां नियमन कमज़ोर है।


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मिलावट को ‘सामाजिक अपराध’ कहा और तीन नई माइक्रोबायोलॉजी लैब्स शुरू कीं।  एफएसएसएआई ने त्योहारों पर विशेष अभियान चलाए, लेकिन सज़ाएं कमज़ोर हैं। रामेश्वरम कैफे मामले में कीड़े मिलने पर एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन मालिकों को सज़ा मिलना मुश्किल।  हज़ारीबाग में डेयरी सील हुई, लेकिन दोबारा खुलने का डर रहता है।  समस्या यह है कि दंड अपर्याप्त हैं – अधिकतम 10 लाख का जुर्माना या 7 साल की सज़ा, लेकिन लागू नहीं होता। लैब्स की कमी से टेस्टिंग देरी से होती है।


ऐसे में सरकार को क्या करना चाहिए? सबसे पहले, सख्त कानून: मिलावट पर न्यूनतम 20 साल की सज़ा और संपत्ति जब्ती। एफएसएसएआई को स्वायत्त बनाएं, न कि स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन। हर जिले में मोबाइल टेस्टिंग वैन और एआई-आधारित निगरानी शुरू करें। जैविक खेती को सब्सिडी दें – गोबर से उर्वरक बनाने पर प्रोत्साहन।  जन जागरूकता अभियान चलाएं: स्कूलों में मिलावट की पहचान सिखाएं। आयातित फलों पर सख्त जांच। और सबसे ज़रूरी, भ्रष्टाचार पर प्रहार – निरीक्षक जो रिश्वत लेते हैं, उन्हें बर्खास्त करें।


वायरल पोस्ट्स भय पैदा करते हैं, लेकिन वे सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। मिलावट सिर्फ़ व्यापारिक लालच नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य पर हमला है। अगर 15 साल में कैंसर न फैले, तो इसके लिए सरकार, उद्योग और उपभोक्ता सबको जागना होगा। घर पर टेस्ट किट्स इस्तेमाल करें, ब्रांडेड उत्पाद चुनें और शिकायत दर्ज कराएं। अन्यथा, हमारा भोजन ही हमारी कब्र बन जाएगा। समय आ गया है – मिलावट रोकें, जीवन बचाएं!