Monday, July 13, 2026

डिजिटल डिटॉक्स: परिवारों के लिए एक अनिवार्य कदम

आधुनिक युग में स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, OTT और इंटरनेट आदि हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुके हैं। सुबह उठते ही पहला काम स्क्रीन चेक करना, रात सोने से पहले आखिरी काम भी स्क्रीन देखना, यह एक सामान्य सी बात हो गई है। लेकिन इस डिजिटल निर्भरता ने हमारे मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक फिटनेस, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ऐसे में कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox) यानी डिजिटल उपकरणों से कुछ समय के लिए पूरी तरह दूर रहना, आज हर परिवार के लिए आवश्यकता बन गया है। यह न सिर्फ व्यक्तिगत विकास के लिए बल्कि पूरे परिवार की खुशहाली के लिए महत्वपूर्ण है। आज हम डिजिटल लत के दुष्परिणामों तथा परिवारों द्वारा डिटॉक्स अपनाने की जरूरत पर चर्चा करेंगे।



गौरतलब है कि डिजिटल माध्यमों की लत अब एक महामारी का रूप ले चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, औसत व्यक्ति दिन में 7-8 घंटे से अधिक स्क्रीन पर बिताता है। बच्चों और किशोरों में यह आंकड़ा और भी अधिक है। इस लत के कई खतरनाक प्रभाव हैं। सबसे अहम है मानसिक स्वास्थ्य पर असर। हर समय नोटिफिकेशन्स, लाइक्स और कमेंट्स आदि की तलाश में हमारा मस्तिष्क डोपामाइन की लगातार खोज में रहता है। इससे चिंता, अवसाद, नींद की समस्या और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी आती है। ‘डिजिटल डिप्रेशन’ या ‘सोशल मीडिया एंग्जायटी’ अब आम शब्द बन गए हैं। युवा पीढ़ी में आत्म-सम्मान कम होना, दूसरों से तुलना करना और वास्तविक दुनिया से कटाव बढ़ रहा है।



इसके साथ ही शारीरिक स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा है। आंखों की थकान, गर्दन-पीठ दर्द, मोटापा, कमजोर इम्यूनिटी,ये सब भी अधिक स्क्रीन टाइम के सीधे परिणाम हैं। बच्चों में शारीरिक गतिविधियों की कमी से विकास प्रभावित हो रहा है। परिवारों में बातचीत कम हो गई है। खाने की मेज़ पर सभी अपना फोन देखते हैं, बच्चे माँ-बाप से कम और यूट्यूब आदि से ज्यादा सीखते हैं। ऐसे में रिश्तों में गहराई कम हो रही है।


इतना ही नहीं इस बुरी लत का सामाजिक स्तर पर भी नुकसान है। फेक न्यूज, साइबर बुलिंग, प्राइवेसी का हनन और समय की बर्बादी के आंकड़ों में भी बढ़ौतरी हो रही है। काम की उत्पादकता घट रही है क्योंकि मल्टी-टास्किंग के नाम पर हम एक काम पर भी ध्यान नहीं दे पाते। अध्ययनों से पता चलता है कि सोशल मीडिया यूजर्स की याददाश्त और गहरी सोचने की क्षमता कम हो रही है।



सोशल मीडिया क्रांति (लगभग 2004-2006 के बाद फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि) से पहले की दुनिया याद कीजिए। सूचना और मनोरंजन के साधन अलग थे, लेकिन उनके लाभ आज के डिजिटल माध्यमों से कहीं अधिक गहरे थे। लोग किताबें पढ़ते थे। एक उपन्यास पढ़ने में पूरा ध्यान लगता था। इससे शब्दावली बढ़ती थी, कल्पनाशक्ति विकसित होती थी और धैर्य आता था। समाचार पत्र पढ़ना परिवार का सामूहिक कार्य होता था। सुबह चाय के साथ अखबार पढ़ना, चर्चा करने से बौद्धिक विकास और पारिवारिक बंधन दोनों बढ़ते थे। आज की तुलना में उस समय जानकारी कम लेकिन गहरी और विश्वसनीय होती थी।


हर घर के बच्चे मैदान में खेलते थे। क्रिकेट, कबड्डी, फुटबाल आदि शारीरिक व्यायाम के साथ सामाजिक कौशल भी विकसित होते थे। पड़ोसियों से बातें होती थी, त्योहारों पर सामूहिक उत्सव मनाए जाते थे, बच्चों का बड़ो से कहानियां सुनना, ये सब भावनात्मक बुद्धिमत्ता बढ़ाते थे। लेकिन आज के बच्चों में ये कौशल कम हो रहे हैं।


वहीं रेडियो पर समाचार और गाने सुनना परिवार को एक साथ लाता था। दूरदर्शन पर सीरियल देखना साप्ताहिक कार्यक्रम होता था, न कि 24 घंटे स्क्रीन पर डेट रहना। इससे अपेक्षा और संतोष का संतुलन बना रहता था।


दादा-दादी से कहानियां सुनना, लोकगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना, ये सब स्मृति और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते थे। जानकारी का प्रसार धीमा लेकिन प्रभावशाली होता था। लोग गहरी बातचीत करते थे, बहसें होती थीं और रिश्ते मजबूत होते थे। उस युग में ध्यान भटकाने वाले तत्व कम थे। परिणामस्वरूप लोग ज्यादा रचनात्मक, धैर्यवान और खुश रहते थे। अध्ययनों से साबित होता है कि स्क्रीन-फ्री पीढ़ी की याददाश्त, समस्या-समाधान क्षमता और रचनात्मकता आज की पीढ़ी से बेहतर थी।


परिवार समाज की मूल इकाई है। अगर परिवार डिजिटल लत से ग्रस्त है तो पूरा समाज प्रभावित होता है। ऐसे में डिजिटल डिटॉक्स अपनाने के कई लाभ हैं। बिना फोन के डिनर, बाहर घूमना, बोर्ड गेम्स खेलना, ये छोटी-छोटी आदतें रिश्तों में गर्माहट लाती हैं। इससे बच्चे अपने बड़ों से ज्यादा जुड़ते हैं। स्क्रीन से दूर रहने से नींद बेहतर होती है, चिंता कम होती है और खुशी बढ़ती है। जिससे मस्तिष्क को आराम मिलता है। पढ़ाई, खेलकूद, कलात्मक गतिविधियों में वृद्धि होती है। स्क्रीन टाइम सीमित करने से एकाग्रता और रचनात्मकता बढ़ती है। ज्यादा चलना-फिरना, व्यायाम, स्वस्थ भोजन की आदतें पड़ती हैं।


जानकर मानते हैं कि डिजिटल डिटॉक्स एकदम से नहीं, धीरे-धीरे अपनाना चाहिए। इसके लिए हम अपने परिवार स्तर पर कुछ नियम बनाएं तो डिजिटल डिटॉक्स से कई लाभ होंगे। घर में स्क्रीन-फ्री जोन बनाए जाएँ। जैसे कि  भोजन कक्ष, बेडरूम में फोन प्रतिबंधित हो। डिटॉक्स टाइम तय किया जाए। मिसाल के तौर पर हर दिन कम से कम 2 घंटे और वीकेंड पर पूरा दिन स्क्रीन-फ्री बनाने की कोशिश करें। परिवारिक गतिविधियां बढ़ाएँ। जैसे कि किताब पढ़ना, पिकनिक पर जाना, खुले में खेलना, संगीत सुनना आदि। ऐसे में माता-पिता खुद उदाहरण पेश करें तो बच्चे उसका पालन करेंगे। इसके साथ ही स्कूलों, कार्यालयों और सरकार को भी इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।


यह सत्य है कि डिजिटल तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसका दुरुपयोग हमारी खुशहाली छीन रहा है। डिजिटल डिटॉक्स पीछे लौटना नहीं, बल्कि संतुलित जीवन की ओर बढ़ना है। हर परिवार को इसे अपनाना चाहिए ताकि हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों, पारिवारिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बचाकर रख सकें। पहले का युग हमें याद दिलाता है कि खुशी स्क्रीन्स में नहीं, बल्कि रिश्तों, प्रकृति और सृजनशीलता में है। हमें प्रयास  करना चाहिए कि डिजिटल डिटॉक्स की डिश में छोटे-छोटे कदम उठाएं। फोन को थोड़ी देर दूर रखें, परिवार के साथ समय बिताएं और वास्तविक जीवन का आनंद लें। डिजिटल डिटॉक्स न सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। स्वस्थ परिवार ही स्वस्थ राष्ट्र की नींव है। 

Monday, July 6, 2026

यूरोप में बदलते मौसम: पर्यावरण कुप्रबंधन और जलवायु परिवर्तन की मार!

आज विश्व मौसम की अनिश्चितता का सामना कर रहा है। पिछले महीने से यूरोप एक अभूतपूर्व गर्मी की लहर (हीटवेव) से जूझ रहा है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, ब्रिटेन समेत कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। स्पेन और फ्रांस में 45 डिग्री के पार रिकॉर्ड टूटे, जबकि रातें भी असामान्य रूप से गर्म रहीं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और वर्ल्ड वेदर एट्रीब्यूशन (WWA) के अध्ययनों के अनुसार, यह हीटवेव मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन के बिना लगभग असंभव होती। 1976 में ऐसी स्थिति कल्पना से परे थी, लेकिन आज यह सामान्य होती जा रही है।


यूरोप, जो एक बार ठंडे मौसम के लिए जाना जाता था, अब सबसे तेज गर्म हो रहा महाद्वीप बन गया है। 1980 के दशक से यहां तापमान वैश्विक औसत से दोगुना तेजी से बढ़ रहा है। 2024-2026 के वर्षों में रिकॉर्ड गर्मी, सूखा, जंगल की आग और बाढ़ ने लाखों लोगों को प्रभावित किया। जून 2026 की गर्मी में यूरोप में हजारों अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं। इस सब का अनुमानित आर्थिक नुकसान अरबों यूरो का है। 1980-2024 के बीच यूरोप में जलवायु से संबंधित घटनाओं से 822 बिलियन यूरो का नुकसान हुआ, जिसमें हाल के वर्षों में तेज वृद्धि देखी गई।



यह सिर्फ यूरोप की समस्या नहीं है। एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में भी मौसम के स्वरूप बदल रहे हैं। पाकिस्तान, भारत, चीन में बाढ़ और सूखे की घटनाएं बढ़ी हैं। अमेरिका में तूफान और जंगल की आग सामान्य हो गई हैं। ऑस्ट्रेलिया में लंबे सूखे और भारत में अनियमित मानसून ने कृषि और जल संसाधनों को प्रभावित किया। वैश्विक स्तर पर बेहद खराब मौसम की घटनाएं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। हीटवेव, भारी बारिश, सूखा, तूफान जैसी घटनाओं में निरन्तर वृद्धि हो रही है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, 1.1-1.4 डिग्री सेल्सियस की वैश्विक गर्मी ने इन घटनाओं को दसियों गुना अधिक संभावित बना दिया है।


देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन का मूल कारण मानवीय गतिविधियां हैं। जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) का जलाना बिजली उत्पादन, परिवहन और उद्योगों में मुख्य जिम्मेदार है। यह कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करता है, जो पृथ्वी की गर्मी को फंसाता है। तेज़ी से हो रही बेतरतीब वनों की कटाई इसका दूसरा बड़ा कारण है। एक अनुमान के तहत हर साल लगभग 10 मिलियन हेक्टेयर जंगल नष्ट होते हैं, जो न सिर्फ CO2 अवशोषित करने की क्षमता कम करते हैं बल्कि संग्रहीत कार्बन भी वायुमंडल में छोड़ते हैं। कृषि, पशुपालन, मिथेन गैस और भूमि उपयोग परिवर्तन कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग एक तिहाई जिम्मेदार हैं। एक शोध के अनुसार पिछले तीन वर्षों में भारत सरकार के सलिप्तता से देश भर में एक अनुमान के अनुसार 28 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं और ये क्रम अभी जारी है। ये आत्मघाती नीति वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए जानलेवा सिद्ध होगी।



पर्यावरण प्रबंधन की कमी इन समस्याओं को और बढ़ाती है। उल्लेखनीय है कि कई विकसित देशों में भी, जहां तकनीक और नीतियां उपलब्ध हैं, क्रियान्वयन कमजोर है वाहन भी ऐसे कुप्रबंधन के कारण पर्यावरण और मौसम पर असर पड़ रहा है। यूरोप में नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ रही है, लेकिन कोयला और गैस पर निर्भरता अभी भी बनी हुई है। विकासशील देशों में वन संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और सतत विकास की उपेक्षा की जाती है। औद्योगिक प्रदूषण, अनियोजित शहरीकरण, प्लास्टिक और कचरे का गलत निपटान, नदियों का प्रदूषण, ये सभी कारक प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ रहे हैं।


जानकर मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के अन्य कारक भी हैं, जैसे प्राकृतिक चक्र (El Niño), लेकिन वैज्ञानिक सहमति है कि मानवीय कारक मुख्य हैं। 50 वर्षों में गर्मी की घटनाएं सैकड़ों गुना अधिक संभावित हो गई हैं। ग़लत  प्रबंधन का मतलब है कि अनुकूलन और शमन दोनों में कमी। यूरोप जैसे महाद्वीप में भी एयर कंडीशनिंग, स्वास्थ्य सेवाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर गर्मी के लिए तैयार नहीं थे, जिस करण वहाँ पर मौतें बढ़ीं। कुछ विकासशील देशों में तो स्थिति और बदतर है। वहाँ बाढ़ से फसलें नष्ट हो रही हैं, सूखे से जल संकट पैदा हो रहा है और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं।



यूरोप और अमरीका में गर्मी से जंगल की आग, सूखा और फसल नुकसान हो रहा है। आर्कटिक क्षेत्र तक गर्मी पहुंच रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र स्तर बढ़ रहा है, तटीय क्षेत्र खतरे में हैं। स्वास्थ्य प्रभाव गंभीर हैं। हीट स्ट्रोक, श्वसन रोग, पानी से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं। विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार, 2022 में यूरोप में 60,000 से ज्यादा मौतें गर्मी से हुईं; अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या दोगुनी हो सकती हैं।


अन्य देशों में भी यही कहानी है। भारत जैसे देशों में अनियमित बारिश से कृषि प्रभावित हो रही है, ऐसे में गरीब किसान सबसे ज्यादा पीड़ित होता है। अफ्रीका में सूखा भुखमरी बढ़ा रहा है। वैश्विक स्तर पर जलवायु शरणार्थी बढ़ रहे हैं। ऐसे में कई देशों में आर्थिक नुकसान वहाँ के GDP का प्रतिशत बिगाड़ रहे हैं।


पर्यावरण प्रबंधन की विफलता राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, लॉबीइंग (फॉसिल फ्यूल कंपनियां) और अल्पकालिक लाभ की सोच से उपजी है। पेरिस समझौते के बावजूद उत्सर्जन कम नहीं हो रहा। ऐसे में विकसित देशों को पहल करनी चाहिए, लेकिन वे भी लक्ष्य से पीछे चल रहे हैं।


जानकारों के अनुसार इस संकट का समाधान स्पष्ट हैं। जीवाश्म ईंधन से तेजी से संक्रमण नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) की ओर चला जाए। वनों की रक्षा और पुनर्स्थापना के लिए REDD+ जैसे कार्यक्रमों को मजबूत किया जाए। सतत कृषि, हरित परिवहन, अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाए। अनुकूलन: मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, जल संरक्षण, स्वास्थ्य तैयारियां को सुचारू बनाया जाए। धनी देशों से विकासशील देशों को वित्त और तकनीक हस्तांतरण दिया जाए। भारत जैसे देशों को अपनी सांस्कृतिक विरासत (जैसे वृक्ष पूजा, संतुलित जीवन) को आधुनिक नीतियों से जोड़ना चाहिए।

यूरोप की गर्मी सिर्फ एक चेतावनी है। अगर हम खराब पर्यावरण प्रबंधन और लापरवाही जारी रखेंगे, तो भविष्य में 50 डिग्री तापमान, विनाशकारी बाढ़ और अपरिवर्तनीय क्षति सामान्य हो जाएंगी। समय कम है। 1.5 डिग्री लक्ष्य बचाना संभव है, लेकिन इसके लिए तत्काल, सामूहिक और निर्णायक कार्रवाई जरूरी है। ऐसे में सरकारें, उद्योग, नागरिक सभी को जिम्मेदारी लेनी होगी। प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है, अब अनदेखी करने का समय नहीं बचा। सतत विकास ही एकमात्र रास्ता है, वरना आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। 

Monday, June 29, 2026

पासपोर्ट पर अनावश्यक विवाद !

24 जून 2026 को पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (ट्रैवल डॉक्युमेंट) है, न कि नागरिकता का निर्णायक प्रमाण। इस बयान ने सोशल मीडिया पर तूफान खड़ा कर दिया, विपक्षी दलों ने इसे सत्ता पक्ष की ‘नागरिकता राजनीति’ से जोड़ा। जिससे आम नागरिकों के मन में भ्रम और आशंका पैदा हो गई। लाखों पासपोर्ट धारकों ने पूछना शुरू कर दिया, क्या हमारी नागरिकता पर सवाल उठ सकता है? यह विवाद क्यों और कब उठा और क्या यह विवाद खड़ा करना आवश्यक था? इस विवाद की जड़ों को समझें। अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में पासपोर्ट की भूमिका का विश्लेषण करेंगे और देखेंगे कि यह बयान वर्तमान भारतीय परिदृश्य में कितना प्रासंगिक या अप्रासंगिक है। साथ ही, यह कैसे अनावश्यक भ्रम पैदा कर रहा है और सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए।


गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पासपोर्ट को मुख्य रूप से यात्रा दस्तावेज माना जाता है, जो धारक की राष्ट्रीयता (नेशनलिटी) की पुष्टि करता है। वियना कन्वेंशन ऑन डिप्लोमैटिक रिलेशंस और अन्य अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत, पासपोर्ट जारी करने वाला देश यह गारंटी देता है कि धारक उसके क्षेत्र में लौट सकता है। यह दस्तावेज सीमा पार यात्रा, वीजा प्राप्ति और विदेश में सुरक्षा के लिए आवश्यक होता है।


वहीं कई देशों में पासपोर्ट को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता। उदाहरण के लिए, अमेरिका में भी पासपोर्ट नागरिकता का प्राथमिक प्रमाण है, लेकिन यह जन्म, वंशानुगतता या प्राकृतिकरण जैसे आधारों पर निर्भर करता है। भारत में भी पासपोर्ट एक्ट, 1967 के तहत पासपोर्ट यात्रा के लिए जारी किया जाता है। विदेश मंत्रालय का बयान इस कानूनी वास्तविकता को दोहराता है। पासपोर्ट नागरिकता नहीं बनाता, बल्कि सरकार की संतुष्टि पर आधारित होता है कि धारक भारतीय नागरिक है।



अंतरराष्ट्रीय रूप से, पासपोर्ट राष्ट्रीयता का प्रतीक है, लेकिन यदि किसी की नागरिकता पर विवाद हो (जैसे आप्रवासन, आतंकवाद या दोहरी नागरिकता के मामले में), तो कोर्ट या सक्षम प्राधिकरण मूल दस्तावेजों: जन्म प्रमाण-पत्र, माता-पिता के दस्तावेज, प्राकृतिककरण प्रमाण आदि, की जांच करते हैं। भारत में यह स्थिति नई नहीं है; बॉम्बे हाईकोर्ट (2013) और सुप्रीम कोर्ट ने भी यही रुख अपनाया है कि पासपोर्ट अकेला निर्णायक साक्ष्य नहीं है।


भारतीय नागरिकता संविधान के अनुच्छेद 5 से 11 और नागरिकता अधिनियम, 1955 द्वारा निर्धारित होती है। नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण, प्राकृतिकरण या क्षेत्र समावेशन से प्राप्त होती है। 1987 और 2004 के संशोधनों ने जन्म-आधारित नागरिकता को माता-पिता की नागरिकता पर निर्भर कर दिया। कोई एकल दस्तावेज (पासपोर्ट, आधार, वोटर आईडी या पैन) नागरिकता का पूर्ण प्रमाण नहीं है।


वर्तमान विवाद का संदर्भ विशेष गहन समीक्षा (एसआईआर) है, जो 16 राज्यों में मतदाता सूचियों की सफाई के लिए चल रही है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट वोटर सूची से बाहर किए गए व्यक्ति के खिलाफ चुनौती के लिए पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि यह यात्रा दस्तावेज है। यह बयान ‘सीएए-एनआरसी’ बहस, ‘डिटेक्ट-डिलीट-डिपोर्ट’ नीति और सीमा सुरक्षा के संदर्भ में आया है।

 

वास्तव में, यह कानूनी रूप से सही है, लेकिन व्यावहारिक रूप से अपर्याप्त। करोड़ों भारतीय पासपोर्ट धारक दैनिक जीवन में इसे अपनी भारतीयता का सबसे मजबूत प्रतीक मानते हैं। पासपोर्ट पुलिस वेरिफिकेशन, दस्तावेज जांच और जैवमितीय डेटा के बाद जारी होने वाला दस्तावेज है। सरकार के कई पोर्टल और फॉर्म्स में अक्सर पासपोर्ट को नागरिकता के सबूत के रूप में स्वीकार किया जाता है। विपरीत रूप से देखा जाए तो आम नागरिकों के पास कोई ‘नागरिकता प्रमाण-पत्र’ नहीं होता; यह मुख्य रूप से प्राकृतिककरण या विशेष मामलों में ही जारी किया जाता है।यह बयान इसलिए अप्रासंगिक लगता है क्योंकि भारत में अधिकांश नागरिक जन्म-आधारित हैं। पासपोर्ट जारी करने से पहले गहन जांच होती है। इसे अचानक केवल ‘यात्रा दस्तावेज’ कहकर सरकार ने जनता को यह महसूस कराया कि उनकी भारतीयता ‘कागजी’ है, जबकि वास्तव में यह संवैधानिक अधिकार है।


देख जाए तो यह विवाद अनावश्यक भ्रम का सबसे बड़ा उदाहरण है। आम आदमी सोच रहा है कि क्या उसका पासपोर्ट रद्द हो सकता है या ‘सीएए-एनआरसी’ जैसे अभियानों में इसे नजरअंदाज किया जाएगा? विपक्षी दल इसे मुस्लिम-विरोधी एजेंडे से जोड़ रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष इसे कानूनी स्पष्टीकरण बता रहा है। वहीं सोशल मीडिया की वायरल पोस्ट्स ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जिससे अप्रवासी भारतीय और युवा पीढ़ी में भी आशंका फैली।सवाल उठता है कि आधार, वोटर आईडी आदि भी निर्णायक नहीं हैं, तो क्या सबकी नागरिकता संदिग्ध है? यह सवाल लाखों लोगों के मन में घूम रहा है। परिणामस्वरूप, विश्वसनीयता का संकट पैदा हो गया है। जो दस्तावेज विदेश यात्रा और पहचान के लिए सबसे मजबूत है, उसे ‘अपर्याप्त’ बताकर सरकार ने खुद को घेर लिया है।


पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, यह कानूनी सत्य है, लेकिन संदर्भ से बाहर कहे जाने पर यह भ्रम का कारण बन जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह यात्रा दस्तावेज है, जबकि भारत में करोड़ों लोगों के लिए यह पहचान और गर्व का प्रतीक। वर्तमान विवाद अनावश्यक है क्योंकि यह मौजूदा कानूनी ढांचे को दोहराता है, लेकिन जनभावनाओं को नजरअंदाज करता है। सरकार को अब संवाद और स्पष्टता से इस संकट को दूर करना चाहिए। सरकार नागरिकों को आश्वस्त करें कि उनकी भारतीयता संवैधानिक है, न कि किसी दस्तावेज पर निर्भर। ऐसा करने से एक मजबूत, पारदर्शी नागरिकता ढांचा न केवल भ्रम दूर करेगा, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर और मजबूत बनाएगा।

Friday, June 26, 2026

चढ़ावा चोरी जघन्य पाप है !

अयोध्या के श्री राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी को लेकर रोज़ विस्फोटक खुलासे हो रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो जांच समिति गठित की है वो अपने उद्देश में कितनी सफल हो पाएगी ये तो उसकी रिपोर्ट देखने के बाद ही पता चलेगा। किंतु एक बात निश्चित है कि भगवान के मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए धन, सोना, चाँदी व जवाहरात आदि की लेशमात्र भी चोरी करना हमारे शास्त्रों में जघन्य अपराध बताया गया है। चूँकि योगी जी सनातन धर्म की ध्वजा संभालने में गर्व महसूस करते हैं इसलिए आशा की जानी चाहिए कि वे इस दान चोरी के सभी आरोपियों को यथासंभव सनातन धर्म के नियमों के अनुसार कठोरतम सज़ा देंगे। 

उल्लेखनीय है कि हिंदू धर्मशास्त्रों में देवद्रव्य (देवता की संपत्ति) की चोरी को अत्यंत गंभीर पाप माना गया है। मनुस्मृति के अनुसार देवता की संपत्ति (सोना आदि) चोरी पर मृत्यु दंड का प्रावधान है। बृहस्पति स्मृति के अनुसार चोरी किए गए द्रव्य और सोना, रत्न आदि की कीमत का दोगुना जुर्माना भरना पड़ता है या अपराधी को मृत्युदंड दिये जाने का प्रावधान है। गरुड़ पुराण आदि में नरक के वर्णन में चोरों के लिए विशेष यातनाएँ जैसे जलते अंगारों पर चलना, ख़ूँख़ार कुत्तों द्वारा पीछा किए जाना, आदि का वर्णन आता है। चढ़ावा भगवान का होता है, उसे चुराना भगवान से चोरी के समान है। यह कर्म का भारी बोझ बनता है—इस जन्म में अपयश और अगले जन्म में घोर दुख मिलता है। शास्त्र कहते हैं कि ऐसा पाप क्षमा नहीं होता जब तक पूर्ण प्रायश्चित न हो। तात्पर्य यह है कि श्री राम मंदिर अयोध्या के चढ़ावा चोरी के सभी आरोपियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए, अन्यथा भक्तों का विश्वास सरकार पर नहीं रहेगा। क्योंकि श्री राम मंदिर के सभी ट्रस्टी सरकार द्वारा मनोनीत हैं, वे अपनी किसी धार्मिक उपलब्धि या सनातन धर्म के ऊँचे पद पर आसीन होने के कारण ट्रस्टी नहीं बनाए गए थे। 


2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश महोदय के अनुरोध पर मैंने मथुरा के दो प्रसिद्ध मंदिरों के रिसीवर का अवैतनिक पद स्वीकार किया। ये थे वृंदावन के श्री बांके बिहारी जी का मंदिर व गोवर्धन की दान घाटी का मंदिर। मंदिर प्रबंधन की चुनौती थी चढ़ावे की राशि का ईमानदारी से आंकलन और उसे बैंक में जमा कराना। इसमें काफी गड़बड़ी की शिकायत आती थी। मंदिर की आमदनी भी बहुत कम थी। एक वरिष्ठ गोस्वामी का फोन आया कि मैं हर महीने चौदह में से दो दान-पात्र अपने लाभ के लिए अलग करवा लूँ। ये सुनकर मुझे बहुत धक्का लगा। लेकिन इसे एक चेतावनी मानकर मैंने एक नई व्यवस्था बनाई। मंदिर के प्रांगण में जहाँ गुल्लकें (दानपत्र) खोली जाती थीं वहाँ वीडियो कैमरे लगवा दिए और प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्कता बरतने के लिए वहाँ बिठा दिया। परिणाम यह हुआ कि पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा दानराशि गुल्लकों से निकली, जिसे बैंक में जमा करा दिया गया।


एक और रोचक अनुभव हुआ जो अयोध्या के संदर्भ में बहुत उपयोगी रहेगा। कैसे दानदाता और मंदिर प्रबंधन के बीच बिचौलिए दान का धन हड़प लेते हैं। वृन्दावन के एक प्रतिष्ठित नागरिक हैं, जो काफी धनवान हैं और आजकल एक प्रमुख राजनैतिक दल के नेता भी हैं। एक दिन सुबह वे मेरे घर आये और बोले कि उनके परिचित कलकत्ता के एक सेठ, बिहारी जी मंदिर को मोटी रकम नकद दान देना चाहते हैं। पर वो आपके हाथ में ही पैसा देना चाहते हैं। उन्हें मैं आज शाम को आपके घर लेकर आऊंगा। आप दान ले लेना और उसमें से एक तिहाई रूपये आप रख लेना व एक तिहाई रूपये मुझे दे देना। बाकी मंदिर में जमा करा देना। मैंने उनके प्रस्ताव पर सहमति जताई। निर्धारित समय पर मंदिर के मैनेजर, अकाउंटेंट और दो बैंकों के कैशियरों को पहले से बुलाकर अपनी कोठी के स्टाफ क्वार्टर में बिठा दिया। दानदाता और उन स्थानीय नेता की मैंने आवभगत की। जब सेठ जी नोटों की गड्डियां बैग से निकालने लगे तो मैंने फौरन मंदिर के स्टाफ को वहीं बुला लिया। यह देख कर वो नेता जी बहुत विचलित हो गए। मंदिर स्टाफ ने जब नोट गिन लिए तो मैंने उन्हें यह सब धनराशि बैंक में जमा कराने को कह दिया और उन्हें तुरंत  ‘गुप्तदान’ की रसीद काट कर दिलवा दी। उस दिन के बाद से ऐसा प्रस्ताव लेकर कोई मेरे पास नहीं आया। श्री राम मंदिर अयोध्या के ट्रस्टीगणों ने अगर पहले दिन से चढ़ावे की व्यवस्था पारदर्शी बनाई होती तो आज उन्हें इतनी बदनामी नहीं झेलनी पड़ती। समाचार पत्रों से पता चल रहा है कि जब से ये चढ़ावा विवाद सामने आया है तब से मंदिर को होने वाली दान की आय एक-तिहाई से भी कम हो गई है। स्पष्ट है कि इस विवाद से सभी सनातन धर्मियों को गहरा आघात लगा है। 


त्रिवेंद्रम के विश्व प्रसिद्ध व दुनिया के सबसे ज़्यादा संपन्न पद्मनाभ स्वामी के मंदिर का उदाहरण पूरे भारत के लिए अनुकरणीय है। इस मंदिर का स्वामित्व वहाँ के राज परिवार के पास है। मंदिर के लॉकरों में लाखों करोड़ रुपये का सोना, चाँदी और जवाहरात जमा है। उल्लेखनीय बात यह है कि सदियों से राज परिवार ने अपनी निज संपत्ति होते हुए भी मंदिर के चढ़ावे में से कभी एक अंश भर भी लेना स्वीकार नहीं किया। हर दिन प्रातः भगवान के प्रथम दर्शन का अधिकार राज परिवार को प्राप्त है। ये परिवार जब हर रोज़ दर्शन करके मंदिर से बाहर निकलता है तो मंदिर के द्वार पर बैठ कर अपने पैर के तलवों पर चिपक गई मंदिर की धूल को अपने हाथों से झाड़ कर वहीं गिरा देता है। तात्पर्य यह है कि भगवान के मंदिर से धूल का कण भी ले जाना उनकी दृष्टि में जघन्य अपराध है। पिछले कुछ दशकों से केंद्र और राज्य सरकारें मंदिरों के अधिग्रहण के प्रति अति-उत्साहित हैं। पर अनुभव बताता है कि इन व्यवस्थाओं में लगाए जाने वाले लोग प्रायः संदेहास्पद आचरण वाले ही होते हैं। ऐसे में सरकारों को इस नीति को त्याग कर मंदिरों का प्रबंधन विरक्त संत महात्माओं या धन्ना सेठों को सौंपना चाहिए जिनकी भगवान में आस्था है और जो दैविक द्रव्य की चोरी को विषपान के समान समझते हैं।  

Monday, June 22, 2026

पेपर लीक: सही कारण पकड़ें और सफल उदाहरण से सीखें!

भारत में प्रवेश परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में एनईईटी-यूजी 2026 परीक्षा को पेपर लीक के आरोपों के बाद रद्द कर दिया गया। इससे लाख से अधिक छात्र-छात्राओं का भविष्य प्रभावित हुआ। एक 'गेस पेपर' में सैकड़ों सवाल असली पेपर से मैच कर गए, जिसकी जांच सीबीआई कर रही है। राजस्थान, बिहार, हरियाणा आदि राज्यों में कोचिंग माफिया और प्रिंटिंग एजेंसियों तक लीक का सिलसिला पहुंचा। पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। 2024 में भी एनईईटी विवादों में घिरा था। वहीं, आईआईटी-जेईई जैसी परीक्षाओं का रिकॉर्ड आजतक लगभग बेदाग रहा है। एक बार 1997 में लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर से लीक की खबर आई थी, लेकिन उसके बाद सख्त प्रोटोकॉल ने इसे रोका। ऐसा क्यों है कि एक ही देश में कुछ परीक्षाएं दोष रहित रहती हैं और क्यों अन्य परीक्षाएं बार-बार पेपर लीक से निरस्त होती हैं?


एनईईटी जैसी परीक्षाओं में लीक का मुख्य कारण मानवीय हस्तक्षेप और कमजोर सुरक्षा है। पेपर सेटिंग, प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्टेशन और परीक्षा केंद्रों तक पहुंच, हर चरण में भ्रष्टाचार की गुंजाइश है। एनटीए (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) पर बहुत अधिक बोझ है। ऐसे में कई परीक्षाएं आउटसोर्स की जाती हैं, जहां प्राइवेट प्रिंटिंग प्रेस और लॉजिस्टिक्स कंपनियां शामिल होती हैं। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में पेपर लीक की गुंजाइश को नकारा नहीं जा सकता।  


गौरतलब है कि एक पेपर लाखों रुपये में बिकता है। जिसके पीछे छात्रों का दबाव, कोचिंग उद्योग का सैकड़ों करोड़ का कारोबार और राजनीतिक संरक्षण पेपर लीक को बढ़ावा देते हैं। वहीं देश में इस अपराध की कानूनी सजा कमजोर है, आरोपी आसानी से ज़मानत पर बाहर आ जाते हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों में 70-90 से अधिक पेपर लीक के मामले दर्ज हुए हैं। लेकिन किसी भी मामले में किसी बड़े अधिकारी को कोई सज़ा नहीं सुनाई गई। 



वहीं एनटीए की ‘एड-हॉक’ व्यवस्था, संस्थागत स्मृति की कमी और पारदर्शिता की अनुपस्थिति इस समस्या को गहरा बनाती है। ओएमआर शीट्स का इस्तेमाल, डिजिटल ट्रांसिशन में देरी और चेन-ऑफ-कस्टडी की कमी लीक को आसान बनाती है।


गौरतलब है कि हमारे देश में ही आईआईटी-जेईई में लीक लगभग नहीं के बराबर होता। इसका कारण स्पष्ट हैं, बहु-स्तरीय सुरक्षा: पेपर सेटिंग आईआईटी प्रोफेसरों द्वारा कैंपस में होती है। कई सेट तैयार किए जाते हैं, जिसमें सीबीटी (कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट) फॉर्मेट से अंतिम मिनट तक बदलाव संभव होता है। कम आउटसोर्सिंग के कारण ये प्रक्रिया आईआईटी संस्थानों के सीधे नियंत्रण में ही रहती है। जेईई भारत की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा है। इसलिए इसमें शामिल लोग अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। इसके साथ ही तकनीकी का पूरा इस्तेमाल किया जाता है: जिससे  रैंडमाइज्ड प्रश्न, मजबूत एन्क्रिप्शन और सख्त निगरानी की जाती है। जेईई में लाखों छात्र शामिल होते हैं, फिर भी इस पर उनका विश्वास कायम है। यानी कि समस्या परीक्षा के आकार में नहीं, बल्कि प्रबंधन और इरादे में है।



भारत अकेला ही ऐसा देश नहीं है जहाँ बड़े पैमाने पर ऐसी परीक्षाएं होती हैं। चीन का गाओकाओ एक करोड़ तीस लाख छात्र जिसमें बैठते हैं वो दुनिया की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक है । पर इसमें लीक की घटनाएं नगण्य हैं। पेपर को परमाणु हथियारों जैसा ‘टॉप सीक्रेट’ माना जाता है। पेपर सेटर्स एक महीने पहले से ही आइसोलेशन में भेजे जाते हैं। पर्चों की प्रिंटिंग जेलों या विशेष सरकारी सुविधाओं में की जाती है जहाँ फोन/संपर्क प्रतिबंधित रहता है। पर्चों का ट्रांसपोर्ट पुलिस और आर्म्ड फोर्सेस, द्वारा एयरटाइट सुरक्षा में किया जाता है। इसके बाद इन पर्चों को आर्म्ड गार्ड्स, 24x7 कैमरा निगरानी के साथ सुरक्षित रखा जाता है। जहाँ फेशियल रिकग्निशन, ड्रोन, सिग्नल जैमर्स द्वारा ऑनलाइन मॉनिटरिंग की जाती है। इतना ही नहीं चीन में सख्त कानूनों के चलते लीक को देशद्रोह माना जाता है, जिसकी कड़ी सजा दी जाती है। समाज इसे राष्ट्रीय त्योहार की तरह देखता है। परिणाम: लगभग शून्य बड़े लीक।


2026 के नीट परीक्षाओं के ‘री-एग्जाम’ के लिए भारतीय वायुसेना को पेपर ट्रांसपोर्ट के लिए बुलाया गया है। सेना  भी लॉजिस्टिक्स में मदद देगी। ऐसा पहली बार हुआ है। जानकर मानते हैं कि सैन्य अनुशासन और निष्पक्षता से विद्यार्थियों और जनता का विश्वास बढ़ेगा। लेकिन वहीं कुछ लोग इसे सिस्टम की विफलता का स्वीकारोक्ति भी मानते हैं। सैन्य बल देश की सीमा की रक्षा करती है, ऐसे में इन्हें शिक्षा मंत्रालय/एनटीए की जिम्मेदारी नहीं संभालनी चाहिए। यह ‘फायरफाइटिंग’ तो अवश्य है, लेकिन समाधान नहीं। यदि प्रबंधन सही होते तो ऐसे संसाधनों का दुरुपयोग रोका जा सकता था। यह अच्छा अल्पकालिक कदम हो सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। चीन की तरह सिविलियन सिस्टम को मजबूत बनाना चाहिए, न कि सेना पर निर्भर होना।


लीक रोके बिना भारत का मानव संसाधन विकास असंभव है। ऐसे में सरकार को लीक रोकने और प्रभावी प्रबंधन के विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए। जैसे कि पूर्ण डिजिटलीकरण, रैंडम प्रश्न। केंद्रीकृत, आईआईटी/यूपीएससी जैसे मॉडल की तरह स्वायत्त प्राधिकरण। लीक से निपटने के लिए सख्त कानून बनें जहाँ लीक को राष्ट्रीय सुरक्षा अपराध माना जाए और ऐसे मामलों का समयबद्ध ट्रायल हो। इसके साथ ही कोचिंग जैसे बीडी उद्योग का रेगुलेशन किया जाए जो कि पारदर्शी हो।


एनईईटी विवाद छात्रों, परिवारों और राष्ट्र के लिए दर्दनाक है। आत्महत्याएं, आर्थिक नुकसान और विश्वास का ह्रास हो रहा है। आईआईटी-जेईई साबित करता है कि भारत में सक्षम सिस्टम संभव है। वहीं चीन दिखाता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति से बड़े पैमाने पर परीक्षाएं सुरक्षित हो सकती हैं। सशस्त्र बलों की मदद स्वागत योग्य है, लेकिन यह सिस्टम की नाकामी है। सरकार को एनटीए का पुनर्गठन, जवाबदेही और सुधारों पर फोकस करना चाहिए। युवाओं का भविष्य राजनीति या मुनाफे की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए। शिक्षा राष्ट्र की नींव है इसे मजबूत बनाएं, वरना ‘विश्व गुरु’ का सपना अधूरा रहेगा।


Monday, June 15, 2026

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय का भविष्य

तमिलनाडु के नए युवा लोकप्रिय मुख्यमंत्री श्री सी. जोसेफ विजयने शपथ ग्रहण करते ही तीन अहम आदेशों पर हस्ताक्षर किए। जिनमें दो प्रमुख थे। एक, नशीली दवाओं की रोकथाम के कड़े कदम उठाना और दूसरा, महिलाओं की सुरक्षा के लिए पुलिस और प्रशासन को मुस्तैद करना। पर जिन कारणों से श्री विजय की ओर सबका ध्यान गया है, वो है उनकी सादगी, सहृदयता और धर्म निरपेक्षता। श्री विजय के पिता ईसाई हैं और माँ सनातनी हिंदू। इसलिए श्री विजय दोनों धर्मों में आस्था रखते हैं और दोनों के धार्मिक कृत्यों में श्रद्धा से भाग लेते हैं। उनका यही रवैया अन्य धर्मों के प्रति भी है। आज जब देश में धर्म के नाम पर उन्माद बढ़ता जा रहा है तब श्री विजय की इस पहल ने तमिलनाडु के लोगों को बहुत राहत प्रदान की है। 


प्रायः राजनीति में जो लोग आते रहे, वे होते हैं जिनकी आर्थिक पृष्ठभूमि मज़बूत नहीं होती थी। इसीलिए वे राजनीति को कमाई का ज़रिया बना कर अकूत धन संपत्ति जमा करने में जुट जाते थे। कमोबेश यह इतिहास हर राजनेता का रहा है। श्री विजय तमिलनाडु के सुपर स्टार हैं और 600 करोड़ से अधिक की अर्जित संपत्ति के मालिक हैं। वे अपने राज्य में एक कलाकार के रूप में लोकप्रियता के शिखर पर रहे हैं। इसलिए माना जा सकता है कि राजनीति में उनका प्रवेश धन या यश कमाने के लिए नहीं हुआ। वे कुछ नया कर गुज़रना चाहते हैं। उन्होंने तमिलनाडु में नेताओं के कटआउट और पोस्टर लगाने को प्रतिबंधित कर दिया है। जबकि हर दल के नेता अपने फ़ोटो के विज्ञापनों और कटआउटों पर देश की ग़रीब जनता का अरबों रुपया बर्बाद करते हैं। जिन पाठकों ने तमिलनाडु का दौरा किया है उन्होंने यह आश्चर्यजनक संस्कृति वहाँ देखा होगी कि राजनेताओं के 100-100 फुट ऊँचे कटआउट जगह-जगह लगे होते हैं। 



श्री विजय राजनीति से वीआईपी संस्कृति समाप्त करना चाहते हैं और इस दिशा में भी उन्होंने कई पहल की हैं जिसका अच्छा संदेश गया है। इतने सम्पन्न और सुप्रसिद्ध व्यक्ति होते हुए श्री विजय एक कर्मचारी की तरह समय पर दफ़्तर आते हैं और अपना लंच बॉक्स साथ लाते हैं। दोपहर को वे अपनी मेज़ पर डिब्बा खोल कर अकेले लंच करते हैं, कोई तामझाम नहीं। ऐसी छोटी-छोटी बातों का जनता पर बहुत अच्छा असर पड़ रहा है। दरअसल आम जनता की सरकार से अपेक्षाएँ बहुत सीमित होती हैं। मसलन बिजली-पानी की आपूर्ति गड्ढा-मुक्त सड़कें, नागरिक सुविधाएं प्रदान करने वाली एजेंसियों में आम जनता के प्रति ज़िम्मेदारी और सम्मान का भाव आदि। श्री विजय ने सख़्त आदेश दिए हैं कि नागरिकों की ऐसी छोटी-छोटी समस्याओं का हल 24 घंटों के भीतर हो जाना चाहिए। देश की जो कार्य संस्कृति रही है उसमें ऐसा हो पाना आसान नहीं है। पर नेतृत्व में अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो असंभव कुछ भी नहीं है। 



आज के राजनैतिक माहौल में जब अपने विपक्षी दलों के नेताओं को अपमानित करना, उनके प्रति अपशब्द बोलना और उनके परिवार पर छींटाकशी करना आम बात हो गई है, वहाँ श्री विजयने अपने व्यवहार से एक शुभ संकेत दिया है। मुख्यमंत्री का पद संभालते ही वे विपक्षी दलों के सभी बड़े नेताओं के घर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने गए थे। इसे तमिलनाडु की राजनीति में एक अनूठी पहल माना गया है। छोटे दलों के कुछ नेताओं का तो ये कहना था, कि उनके जीवन में पहली बार कोई मुख्यमंत्री उनके आवास पर इस तरह शिष्टाचार प्रदर्शित करने आया। जाहिर है कि विपक्ष के नेता भी श्री विजय की इस विनम्रता से अभिभूत हैं। 



आज के दौर में जब धर्मांध लोग एक दूसरे के धर्मस्थलों को अपमानित या ध्वस्त करना अपनी उपलब्धि मानते हैं, उस दौर में श्री विजय ने एक नई पहल की है। उन्होंने सभी धर्मों के उपेक्षित पड़े धर्मस्थलों का सरकारी प्रयास से जीर्णोद्धार कराए जाने की इच्छा व्यक्त की है। इस दिशा में वे कितने सफल हो पायेंगे, ये तो आनेवाला समय ही बताएगा। पर भारत के लोकतंत्र के लिए ये एक शुभ संकेत है। 



हम यहाँ उत्साह के अतिरेक में बह कर कल्पना लोक में नहीं जीना चाहते। हमें धरातल पर खड़े हो कर मुख्यमंत्री श्री विजय का निष्पक्ष मूल्यांकन करते रहना होगा। कहते हैं कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने बहुत आशा जगाई थी। लंबे-चौड़े दावे किए थे। अनेक क्रांतिकारी कदमों का ऐलान किया था। पर क्रमशः वह सब काफूर हो गया। आम आदमी पार्टी ने जनहित में कुछ अच्छे कार्य भी किए पर वो उन दावों की तुलना में बहुत कम थे, जो शुरू में किए गए थे। अब इसे देश का दुर्भाग्य कहें या राजनीति का यथार्थ कि सत्ता पाकर हर व्यक्ति बदल जाता है या हालात उसे बदलने के लिए मजबूर कर देते हैं। मेरा मानना है कि जिनमें आध्यात्मिक चेतना और नैतिक बल होता है वही राजनीति की दलदल कमल की तरह खिल पाते हैं। पर ऐसा यदा-कदा ही होता है। मुझे याद है किस तरह वाजपेयी जी की सरकार में जगमोहन जी के मंत्रालय तीन बार बदल दिए गए। वे कर्मठ व्यक्ति थे और पारदर्शिता के साथ सुधार करना चाहते थे। पर जिस मंत्रालय में भी वे सुधार के प्रयास करते थे, उन्हें वहाँ से हटा दिया जाता था। यही रवैया अन्य दलों के सत्ता में आने बाद देखा जाता है कि योग्य और भले लोगों को दरकिनार कर दिया जाता है, क्योंकि वे अपने राजनैतिक आकाओं की अनैतिक आकांशाओं को पूरा करने में सहयोग नहीं करते। 


श्री विजय की एक और सीमा है कि उनका दल पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर सका है। ऐसे में उन्हें अन्य दलों का सहारा लेना पड़ा है। अब ये दल कब तक उनका साथ दे पायेंगे इस पर सबकी नज़र रहेगी। उनकी एक और सीमा यह भी है कि वे उस आर्थिक-राजनैतिक गठजोड़ की संस्कृति में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहते हैं जो गठजोड़ इतना सशक्त होता है कि जो इसकी नहीं सुनता ये उसे विफल करने में ये कोई कसर नहीं छोड़ता। इसलिए श्री विजय की राह आसान नहीं होगी। पर सिंगापुर जैसे गाँव को अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में विकसित देश बनाने वाले ली क्वान का उदाहरण आशा की किरण दिखाता है। जो नगरपालिका के क्लर्क से उठ कर राष्ट्रपति बने और अपने ईमानदारी, सादगी और फौलादी इरादों से सिंगापुर को अग्रणी राष्ट्र बना दिया। देशवासियों की श्री विजय को यह शुभकामना रहेगी कि वे सफल हों, चिरायु हों और भारत की राजनीति में अपने आचरण और उपलब्धियों से नए मानदंड स्थापित करें।  

Monday, June 8, 2026

नकलमुक्त शिक्षा व्यवस्था प्रबंधन कैसे हो ?

हाल ही में रद्द हुई नीट परीक्षाओं के विवाद से देश भर में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। ये परीक्षाएं दोबारा करवाने की बात भी हो रही है। लेकिन अक्सर यह देखा गया है कि भारत में होने वाली परीक्षाओं में या तो पेपर लीक किए जाते हैं या फिर परीक्षाओं के समय बड़े स्तर पर नक़ल की जाती है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकता रहती है कि जो परीक्षाएँ हों, न तो उनके पेपर लीक हों न ही ऐसी परीक्षाओं में नकल हो। लेकिन असल में वास्तविकता इसके विपरीत ही हो जाती है। ऐसा नहीं है कि देश में नक़लमुक्त शिक्षा संभव नहीं है। कमी है तो सिर्फ़ इसके प्रबंधन की। 

प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश का हर युवा, देश के विकास में योगदान करे। इसके लिए उन्होंने ‘कौशल विकास’ का विशेष मंत्रालय भी बनाया है। सर्वविदित है कि सरकार हर नौजवान को नौकरी नहीं दे सकती है। निजी क्षेत्र, कृषि या स्वरोजगार ही वो रास्ते है, जिनके जरिये एक नौजवान अपने जीवन में स्थायित्व ला सकता है। जीवन जीने की चुनौतियां अनेक है। जिनका सामना करने के लिए, हर युवा का संतुलित विकास होना आवश्यक है। व्यक्तित्व विकास का एक महत्वपूर्णं अंग शिक्षा है। अशिक्षित युवा के लिए चुनौतियां और भी बढ़ जाती है। पर समस्या इस बात की है कि जिन्हें शिक्षित या डिग्रीधारी माना जाता है, वे स्वयं ही अंधेरे कुऐं में पड़े हैं। डिग्रियां हाथ में हैं, फिर भी वे शिक्षित नहीं कहे जाते।


वैसे तो संपूर्ण भारत में प्राथमिक, माध्यमिक और स्नातक स्तर की शिक्षा व्यवस्था अपनी आत्मा और आधारभूत संरचनाओं में वर्तमान एवं भावी आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। परन्तु विशेषतः उत्तर प्रदेश के परिपेक्ष में इसे सरकारी संरक्षण में नकल माफिया के हाथ सौंपकर इसकी लगभग हत्या ही कर दी गयी है। आश्चर्य जनक है कि समाज, सरकार, प्रशासन और मीडिया, इस न बदली जा सकने वाली सामाजिक और राष्ट्रीय बर्बादी पर चुप्पी साधे है।



सारे साल स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाई न के बराबर होती है। शिक्षा व्यवस्था के प्रबंध तंत्र, शिक्षक एवं छात्र सभी भाई-भतीजावाद एवं पैसों के लेनदेन से नकल कराकर प्रमाणपत्र हासिल कर लेने के दुश्चक्र में फंस चुके हैं। इस माफिया का अंग बना युवा, मेधावी बच्चों की संभावनाओं का गला काटकर, अपने प्रमाण पत्र लहराकर शिक्षित दिखता है, सरकारी नौकरी प्राप्त कर लेता है या फिर बड़े संस्थानों में प्रवेश पा लेता है। जबकि मेधावी छात्र, जो इस फरेब का अंग नहीं बनना चाहते, वे पीछे छूट जाते हैं। इससे उपजी अर्थव्यवस्था से सरकारी अधिकारी परीक्षा करने वाली संस्थाएं, स्कूल-कॉलेजों के मालिक, शिक्षक, माफिया एवं निकम्मे छात्र लाभान्वित होते हैं और भारत के ताबूत में हर साल कीलें ठोक रहे हैं। आश्चर्य है कि इस सामूहिक बर्बादी पर सब चुप हैं। सरकार शायद विवश है कि वो निकम्मे और जाल-साज शिक्षकों पर अच्छा काम करने का दबाव डालना नहीं चाहती क्योंकि वह चुनाव तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।



प्रदेशों में कई बार ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं जिन्होंने बातें तो बड़ी-बड़ी की लेकिन बजाए इसके कि वो शिक्षा में सुधार लाते, उन्होंने एक ऐसा शिक्षा माफिया खड़ा कर दिया, जिसने विद्यार्थियों की नकल करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया और इससे उपजने वाले धन के संग्रहण के लिए पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी। कोई भी पीढ़ी जिसकी शिक्षा की जड़ें हवा में हों, मजबूत भारत के निर्माण में कैसे सहायक होगी? खोखली शिक्षा के आधार पर तैयार ये पीढ़ी, जिसके हाथों में स्मार्ट फोन है, वही इस माफिया तंत्र का हिस्सा बन जाता है और ये क्रम निरंतर जारी है।


छोटे-छोटे देश अपनी मजबूत शिक्षा व्यवस्था की वजह से विकसित देशों की कतार में आ गए हैं। हमने माफिया को शिक्षा व्यवस्था सौंपकर अपनी कम से कम दो पीढ़ियों को निकम्मा और लाचार बना दिया है। इस बात की ज्यादा संभावना है कि ये पीढ़ी, नक्सलवाद, आतंकवाद और संगठित अपराध की ओर जाए। ऐसे में ऐसी पीढ़ी न समाज के लिए और न ही देश के विकास के लिए कोई योगदान देने में सक्षम हो पायेगी।


यदि हमें एक विकसित समाज और देश की संरचना करनी है, जैसा हमारे नेता भी अपने चुनावी भाषणों में बोलते हैं, तो नेताओं व बुद्धिजीवियों को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था स्थापित करनी ही होगी, जिसमें तकनीक द्वारा संचालित नकल मुक्त शिक्षा पद्धतियों का विकास, मानकीकरण एवं निगरानी अनुभवी व्यक्तियों की समिति या आयोग द्वारा की जाए। नौकरशाही, शिक्षकों एवं पुलिस द्वारा केवल प्रबंधन ही किया जाए। क्योंकि नौकरशाही, शिक्षक एवं पुलिस इस व्यवस्था को ठीक करने में लगातार नाकाम रहे हैं।


तकनीकी पर आधारित शिक्षा व्यवस्था ही हमें इस मानवीय दुर्गुण से बचा सकती है। अन्यथा हम ऐसे सामूहिक विनाश की तरफ अग्रसर होंगे, जिसे ठीक करने का मौका भी समय हमे नहीं देगा और भावी पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। आशा की जानी चाहिए कि सभी शिक्षाविद् इसकी महत्ता को समझेंगे और वर्तमान नेतागण इस विषय पर गंभीर और महत्त्वपूर्ण निर्णय लेंगे और इस अधोगति को रोकने में सहायक होंगे।

आजादी के बाद से आज तक शिक्षा को सुधारने के लिए दर्जनों आयोग बने और उन्होंने तमाम सुझाव भी दिये। जिसकी रिर्पोट दशाब्दियों से धूल खा रही है। जब देश में इतना कुछ बदल रहा है, तो प्रदेशों की सरकार को अपने-अपने प्रदेशों के शिक्षा तंत्र से इस माफिया को दूर करना चाहिए और शिक्षा नीति में बड़ा परिवर्तन करना चाहिए। तभी होगा ‘सबका साथ और सबके विकास‘ का नारा सार्थक।