Sunday, May 2, 2010

बुलेटप्रूफ जैकेट या सिपाहियों की जिंदगी से खिलवाड़


भारत सरकार के गृहमंत्रालय के दो वरिष्ठ अधिकारी रिश्वत लेते गिरफ्तार हो गये। आपदा प्रबंधन के संयुक्त सचिव ओ. रवि को 25 लाख रूपये की रिश्वत लेते पकड़ा गया। जबकि निदेशक राधे श्याम शर्मा को बुलेटप्रूफ जैकेट खरीद में रिश्वत लेने के आरोप में। साथ ही रिश्वत देने के आरोप में युवा इंजीनियर आर. के. गुप्ता व उनकी पत्नी लवीना गुप्ता को भी गिरफ्तार किया गया। इस केस के कुछ ऐसे महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य हैं जिन पर देश को विचार करना चाहिए। उल्लेखनीय है कि आंतकवाद और नक्सलवाद के बढ़ते खतरों के बीच गृहमंत्रालय को बुलेटप्रूफ जैकेटों की भारी आवश्यकता पड़ने लगी है। दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में मारी गयी सीआरपीएफ की पूरी कंपनी के बाद तो सिपाहियों की सुरक्षा को लेकर और भी सवाल उठने लगे हैं। पर चिंता की बात यह है कि गृहमंत्रालय बुलेटप्रूफ जैकेटों की खरीद के मामले में जो प्रक्रिया अपनाता रहा है वह पारदर्शी नहीं है। यह खरीद भी पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल के जमाने से विवादों में रही है। चयन प्रक्रिया में खुले आम धांधली होती है और चहेतों को आर्डर देने के लिए हर हथकंडा अपनाया जाता है। जरूरी नहीं कि जिस निर्माता की बनाई बुलेटप्रूफ जैकेटें खरीदी जांए उसका उत्पाद सर्वश्रेष्ठ हो। क्योंकि गुणवत्ता से ज्यादा कमीशन की रकम पर खरीदार मंडली का ध्यान रहता है। फिर चाहे जाबांज सिपाहियों की जिंदगी से ही समझौता क्यों न करना पड़े।
26 नवम्बर, 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले की रात ए.टी.एस चीफ हेमंत करकरे की बुलेटप्रूफ जैकेट गायब हो गयी थी। यह समाचार सभी टीवी चैनलों पर बार-बार आता रहा। फिर अचानक चार दिन बाद यह बुलेटप्रूफ जैकेट मिल गयी। इतने संवेदनशील मामले में इससे बड़ा मजाक कोई हो नहीं सकता। जानकारों का कहना है कि जब श्री करकरे पर आतंकी गोली चली तो उनकी बुलेटप्रूफ जैकेट उसे झेल नहीं पायी। क्योंकि वह नकली थी और देश ने एक कर्तव्यनिष्ठ जाबांज अधिकारी को खो दिया। जानकारों का कहना है कि चार दिन बाद मिली बुलेटप्रूफ जैकेट वह नहीं थी जिसे करकरे ने हमले के समय पहना हुआ था। बल्कि यह बाद में उसी कोण से गोली चलाकर तैयार की गयी दूसरी जैकेट थी। चाहे इंदिरा गांधी के हत्यारों को पकड़े जाने के बाद भी मारने का हादसा हो या राजीव हत्याकांड के महत्वपूर्ण गवाह की पुलिस हिरासत में आत्महत्या का मामला हो या फिर करकरे की बुलेटप्रूफ जैकेट का, कभी सच सामने आ ही नही ंपाता। वर्षों जांच का नाटक चलता रहता है।

गृहमंत्रालय के ताजा हादसे के संदर्भ मंें यह बात महत्वपूर्ण है कि जिस आर. के. गुप्ता और उसकी पत्नी लवीना को गिरफ्तार किया गया है वे दोनों काफी अर्से से बुलेटप्रूफ जैकेटों का यह आर्डर लेने के लिए लगे हुए थे। उनका दावा था कि उनका माल सर्वश्रेष्ठ होने के बावजूद इसलिए परीक्षण में फेल कर दिया गया क्योंकि खरीदार मंडली किसी और को ठेका देना चाहती थी। इसलिए आर. के. गुप्ता ने गृहमंत्रालय के कुछ महत्पूर्ण अधिकारियों के खिलाफ उनके अनैतिक आचरण के कई प्रमाण और रिकार्डिंग इकठा कर ली थी। वे इसे लेकर दिल्ली के मीडिया सर्किल में घूम रहे थे। इसी बीच गृहमंत्रालय के अधिकारियों को भनक लग गयी और वे डर गये। पर उन्होंने होशियारी से आर. के. गुप्ता से डील करने का प्रस्ताव रखा। व्यापारी बुद्धि का व्यक्ति कोई योद्धा तो होता नहंीं जो एक बार जंग छेड़कर मैदान मेें टिका रहे। उसे तो पैसा कमाना होता है। लगता है इसी लालच में आर. के. गुप्ता फिसल गया और इन अधिकारियों के जाल में फंस गया। जहां तक उसके रिश्वत देने का मामला है तो यह अपराध करते हुए वह रंगे हाथ पकड़ा गया है। अगर अभियोग पक्ष अपना आरोप अदालत में सिद्ध कर पाता है तो उसे कानूनन सजा मिलेगी। पर साथ ही क्या यह भी जरूरी नहीं कि गृहमंत्रालय के अधिकारियों के विरूद्ध जो सबूत आर. के. गुप्ता लेकर घूम रहा था उसकी भी पूरी ईमानदारी से जांच की जाए। यह भी जांच की जाए कि बुलेटप्रूफ जैकेटों की खरीद के परीक्षण में जो प्रक्रिया अपनाई गयी वह पूरी तरह पारदर्शी थी या नहीं। अगर यह पता चलता है कि बेईमानी से, कम गुणवत्ता वाले निर्माता को यह ठेका दिया जा रहा था तो सांसदों, मीडिया और जागरूक नागरिकों को सवाल खड़े करने चाहिए। एक तरफ तो हम आतंकवाद और नक्सलवाद से निपटने के लंबे चौड़े दावे रोज टीवी पर सुनते हैं और दूसरी तरफ अपनी जान खतरे में डालने वाले गरीब माताओं के नौनिहाल सिपाहियों की जिंदगी के साथ घटिया माल लेकर इस तरह खिलवाड़ किया जाता है।

वैसे सरकारी ठेकों में बिना कमीशन तय किये केवल गुणवत्ता के आधार पर ठेका मिल जाता हो ऐसा अनुभव शायद ही किसी प्रांत या केन्द्र सरकार से व्यापारिक संबंध रखने वाले किसी व्यापारी का होगा। कमीशन के बिना सरकार में पत्ता भी नहंी हिलता। अभी पिछले ही दिनों हमने भारतीय पर्यटन विकास निगम लि0 की टैंडर प्रक्रिया में ऐसा ही एक घोटाला पकड़ा और उसे केंन्द्रीय सतर्कता आयोग को थमा दिया। आयोग के अधिकारियों ने जांच के बाद हमारे आरोप सही पाये और अब इस घोटाले में शामिल उच्च अधिकारियों के खिलाफ मेजर पैनल्टी यानी बड़ी सजा दिये जाने का प्रस्ताव किया गया है। सांप छछूदर वाली स्थिति है। आप कमीशन न दो तो ठेका नहीं मिलेगा। कमीशन दो तो भी गारंटी नहीं कि आपको ही मिलेगा। क्यांेकि कमीशन के अलावा भी अन्य कई बातें होती हैं जिनका ध्यान खरीदार मंडली के जहन में रहता है। इसलिए आपका उत्पादन सर्वश्रेष्ठ हो, कीमत भी मुनासिब हो तो भी गारंटी नहीं कि ठेका आपको मिलेगा।

आर. के. गुप्ता जैसे निर्माता तो अपनी बेवकूफी से कभी-कभी पकड़े जाते हैं पर सच्चाई यह है कि अगर सरकार से व्यापार करना है तो आप पारदर्शिता और गुणवत्ता की अपेक्षा नहीं कर सकते। ऐसे में जो पकड़ा जाए वो चोर और बच जाए वह शाह। सोचने वाली बात है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध तमाम संस्थायें और भाषणबाजी होने के बावजूद भ्रष्टाचार और तेजी से बढ़ रहा है। फिर जिसे व्यापार करना है वो क्या करे। महाराजा हरीशचन्द्र बनकर बनारस के मंणिकर्णिका घाट पर शवदाह का कर वसूले या हाकिमों को मोटे कमीशन देकर ठेके हासिल करे। जब तक इस मकड़जाल को खत्म नहीं किया जायेगा ऐसे हादसे होते रहेंगे। देशवासी तो रोजमर्रा की मंहगाई को लेकर ही रोते रहेंगे और घोटाले करने वाले करोड़ों-अरबों डकारते रहेंगे।

Sunday, April 25, 2010

दिले नादां तुझे हुआ क्या है?

आई.पी.एल. सरकारी शिकंजे में फंस चुकी है। शशि थरूर पर उंगली उठाकर ललित मोदी ने आई.पी.एल. की कब्र खोद दी। पर यह तो कभी न कभी होना ही था। प्रकृति का सिद्धान्त है कि जो वस्तु जितनी तेजी से ऊपर जाती है, उतनी ही तेजी से नीचे भी आती है। आई.पी.एल. ही क्यों, बी.सी.सी.आई. की कारगुजारियाँ भी संदेह से परे नहीं। जनता हैरान है कि जिस देश में पीने के पानी का संकट बढ़ता जा रहा हो, आजादी के 63 साल बाद भी आधी आबादी गरीबी सीमा रेखा से नीचे जिन्दगी बसर करने को मजबूर हो, न्याय व्यवस्था चरमरा गयी हो, कार्यपालिका लकीर पीट रही हो और लोकतान्त्रिक संस्थाऐं गुण्डे और मवालियों के हाथ में जा रही हों, उस देश में हर दल के बड़े नेता लोगों की बुनियादी समस्याओं को हल करना तो दूर उन्हें सुनने तक के लिए वक्त नहीं निकाल पाते। वे ही नेता रात दिन क्रिकेट के इतने दीवाने कैसे हो गये कि क्रिकेट के फैसले लेने के लिए बी.सी.सी.आई. या आई.पी.एल. की बैठकों में भाग लेने देश ही नहीं विदेशों तक में तुरत-फुरत पहुँच जाते हैं। मतदाता सवाल पूछते हैं कि नेंका के नेता हों या इंका के, एन.सी.पी.ए. के हों या भाजपा के, इन सबको इतना समय क्रिकेट के लिए कैसे मिल जाता है?

क्या इन नेताओं को आई.पी.एल. या बी.सी.सी.आई. में रूचि इसलिए है कि इससे देश की जनता की ये बेहतर सेवा कर पाते हैं? तो यह सच नहीं है। आई.पी.एल. या बी.सी.सी.आई. क्रिकेट के खेल में जो अरबों रूपये का मुनाफा कमाती हैं, उसका एक अंश भी देश की आम जनता के हित में खर्च नहीं होता। विकास के मुद्दे छोड़ दो और बाकी खेलों की बात भी छोड़ दो तो क्या बी.सी.सी.आई. बता सकती है कि उसने देश के कितने गाँव में क्रिकेट की पिच तैयार करवायीं? कितने गाँव के युवा दलों को क्रिकेट सैट खरीद कर दिये? कितने गाँव और कस्बों में क्रिकेट सिखाने के लिए प्रशिक्षकों की व्यवस्था की? कितने गाँव और शहरों के बीच क्रिकेट मैच करवाये और खिलाडि़यों को उचित पुरस्कार दिये? कितने भूतपूर्व क्रिकेट खिलाडि़यों की आर्थिक अवस्था के अनुरूप, आवश्यकतानुसार, उनकी पेंशन बाँधी? कितने कस्बों और शहरों में क्रिकेट के लिए स्टेडियम बनवाये? देश के कितने स्कूल और काॅलेजों के बीच क्रिकेट के टूर्नामेंट आयोजित किये? इन सब सवालों का जबाव नकारात्मक ही मिलेगा।

देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। बड़े-बड़े नेता जनता के दुख-दर्द दूर करने में असफल रहे हैं। इसलिए नक्सलवाद पनप रहा है। पनप ही नहीं रहा, व्यवस्था में भी अपनी जड़ें घुसाता जा रहा है। गृहमंत्री लाख दावे करें, प्रधानमंत्री लाख आश्वासन दें, पर देश की जनता जानती है कि नक्सलवाद से निपटना सरकार के लिए आसान काम नहीं है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र की जनता से देश के बड़े राजनेता और केन्द्रीय मंत्री जा जाकर पूछें कि उनकी माँग क्या है? उनकी शिकायत क्या है? और यथासम्भव उसे दूर करने का प्रयास करें। पर वे ऐसा नहीं कर रहे। उन्हें लगता है कि गोली और तोप के जोर पर सरकार और उसकी पुलिस नक्सलवाद पर काबू पा लेगी। दंतेवाडा का काण्ड उनके इस दावे को झूठा सिद्ध करता है। यानि लड़ाई दोनों मोर्चों पर लड़ी जानी हैं। एक तरफ आम जनता को राहत मिले, उसके जीवन जीने के हालात सुधरें और दूसरी तरफ नक्सलवादी हिंसा से कड़ाई से निपटा जाऐ। पर इसके लिए उनके पास वक्त नहीं है। यह सब काम त्वरित प्राथमिकता वाले होते हुए भी इन नेताओं की प्राथमिकता सूची में नहीं हैं। पर क्रिकेट की राजनीति को और क्रिकेट के खेल को नियन्त्रित करने के लिए इनके पास खूब वक्त है। और तो और गुजरात के विकास पुरूष नरेन्द्र मोदी से लेकर बिहार के लालू यादव तक क्रिकेट की राजनीति में आकण्ठ डूबे हैं। यह चिन्ता का विषय है।

शशि थरूर को नैतिकता के आधार पर इस्तीफे देने के लिए मजबूर करने वाले राजनीतिक दलों को आत्ममंथन भी करना चाहिए। क्या क्रिकेट में इतनी रूचि इस खेल के प्रति उनके जन्मजात रूझान का फल है, या क्रिकेट में आ रहा अरबों-खरबों रूपया इनके आकर्षण का केन्द्र है। देश का आम आदमी भी समझता है कि कोई राजनेता क्रिकेट की राजनीति में खेल की सेवा भावना से नहीं आया है। बल्कि इस खेल में पैदा हो रहे खरबों रूपये के काले धन को बाँटने के लिए आया है। ऐसे में जो राजनेता क्रिकेट की इस राजनीति से अछूते हैं, उन्हें संसद में तूफान खड़ा करना चाहिए और विधेयक लाना चाहिए जिसके अनुसार खेलों का प्रबन्ध करना खेलों के पुराने खिलाडि़यों, उद्योगपतियों या प्रशासनिक अनुभव वाले व्यवसायिक लोगों के हाथ में छोड़ देना चाहिए। किसी भी राजनेता को जो विधानसभा या संसद का सदस्य है, क्रिकेट की किसी भी समिति का सदस्य बनना प्रतिबन्धित होना चाहिए।

क्रिकेट ही क्यों, अब तो हाॅकी, फुटबाॅल, टेनिस और बाॅक्सिंग तक में ग्लैमर बढ़ने लगा है। भविष्य में इन खेलों की भी हालत क्रिकेट जैसी बन सकती है। इसलिए क्रिकेट ही नहीं सभी खेलांे के संचालन के लिए बनी समितियों में विधायकों व सांसदों के प्रवेश पर उक्त विधेयक में प्रावधान होना चाहिए। आयकर विभाग और फेमा जैसे विभाग तो पूरी छानबीन में जुटे ही हैं, पर देश की जनता, मीडिया और सांसदों व विधायकों को इस विषय में गंभीरता से ठोस प्रयास करने चाहिऐं जिससे हमारा खेल भी सुधरे और हमारे राजनेता भी मैच फिक्सिंग और क्रिकेट के सट्टे के लोभ से बच सकें और अपना ध्यान देश की समस्याओं के हल पर लगायें। कहते हैं कि दर्द का हद से गुजर जाना है दवा हो जाना। क्रिकेट की राजनीति का कैंसर इस कदर बढ़ चुका था कि शशि थरूर के बहाने जो कुछ होगा वो इसका इलाज ही होगा। देश को इन्तजार रहेगा जाँच एजेंन्सियों की उपलब्धियों का। रही बात ललित मोदी की तो जहाँ तक आई.पी.एल. को आकार देने की बात है, उसका श्रेय तो ललित मोदी को मिलेगा ही और मिल भी रहा है। पर अगर इस आकार देने की प्रक्रिया में बहुत बड़े आर्थिक अपराध जुड़े हैं तो मोदी जैसे लोग भी कानून की पकड़ से बच नहीं पायेंगे।

Sunday, April 18, 2010

बेचारे शशि थरूर!

जब कभी कोई राजनैतिक दल भ्रष्टाचार के मुद्दे पर शोर मचाता है तो उसका मकसद भ्रष्टाचार को समाप्त करना नहीं होता। आरोपी को सजा दिलवाना भी नहीं होता। केवल राजनैतिक लाभ उठाने के मकसद से शोर मचाया जाता है। ताजा मामला शशि थरूर का है।  रोंदेवु स्पोर्ट्स की भागीदार सुनन्दा पुष्कर उनकी मित्र, पे्रयसी या भावी पत्नी हैं, यही आधार काफी है उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने को। विपक्षी दल सरकार को घेर रहे हैं। सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता यह कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं कि रोंदेवु स्पोर्ट्स के व्यवसायिक मामले में हस्तक्षेप का हक किसी को नहीं बनता। शशि थरूर की निजी जिन्दगी से दल का कोई वास्ता नहीं। पर विपक्ष थरूर के इस्तीफे की माँग पर अड़ा है। इंका आलाकमान और उनके समर्थित भारत के प्रधानमंत्री पर थरूर को हटाने का दबाव बनाया जा रहा है। क्या फैसला होता है, यह तो जल्द ही सामने आ जायेगा। पर इस माहौल में कुछ सवाल जरूर खड़े होते हैं।

शोर मचाने वाले दलों के नेता क्या दावे से कह सकते हैं कि उनका दामन पाक-साफ है? उन्होंने आज तक जीवन में जो भी धन और सम्पत्ति अर्जित की है, वह सीधे और नैतिक रास्तों से की है? जो भी चुनाव लड़े हैं, वह काले धन से नहीं लड़े? उनके देशभर में कहीं कोई व्यवसायिक हित नहीं हैं? उन्होंने कभी भी अपने पद का दुरूपयोग किसी चहेते या भाई-भतीजे के आर्थिक लाभ के लिए नहीं किया? जब कभी उनके ही दल के बड़े नेता किसी घोटाले में फंसे या आरोपित हुए, तो भी उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर की तरह सच का साथ दिया और अपने ही दल के नेताओं के खिलाफ संसद में ऐसे ही शोर मचाया जैसा वे आज शशि थरूर के खिलाफ मचा रहे हैं? अगर यह सच है तो शशि थरूर को सजा दिलवाने की माँग करने वाले सांसदों का समर्थन किया जाना चाहिए और उन्हें सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और निष्पक्षता के उच्च मानदण्ड स्थापित करने के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए। पर सब जानते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं है। जो ललित मोदी आज भाजपा नेताओं की मदद लेकर शशि थरूर को नैतिकता का आईना दिखा रहे हैं, उनके राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे के कार्यकाल में क्या कारनामे रहे उससे राजस्थान की जनता ही नहीं और भी बहुत लोग वाकिफ हैं। दिवंगत फिल्मी सितारे राजकुमार का एक डाॅयलाग यहाँ उपयुक्त रहेगा, ‘जिनके घर के शीशे के होते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फैंकते

शशि थरूर ने अगर कुछ भी अनैतिक किया है तो विपक्ष, मीडिया व खुद प्रधानमंत्री उसकी आसानी से उपेक्षा नहीं करेंगे। पर पिछले तीन दशक की पत्रकारिता में मैंने अनुभव किया है कि प्रायः ऐसे नेताओं पर कीचड़ ज्यादा उछलती है जो राजनीति में पारंपरिक छवि से भिन्न अपनी कुछ विशिष्ट पहचान लिये होते हैं। राजनीति के घिसे मँजे लोग तो बड़े से बड़ा घोटाला भी इस सफाई से कर जाते हैं कि आसानी से पकड़े न जाऐं। अगर पकड़े जाते हैं तो या तो मीडिया मैनेज कर लेते हैं या मोटी चमड़ी के बनकर सारे विवाद को अनदेखा कर देते हैं। किरकिरी तो शशि थरूर जैसे उन नेताओं की होती है जिनके व्यक्तित्व की चमक बाकी लोगों को अच्छी नहीं लगती। राजीव गाँधी का भी यही हश्र हुआ। वे बेचारे भोले-भाले पायलट राजनीति की समझ से परे थे। उनके सरल आचरण से जो लापरवाही हुई, उसका विपक्षी दलों ने तिल का ताड़ बना दिया। एक सोचा समझा अभियान चलाकर राजीव गाँधी की छवि को बिगाड़ने की भरपूर और काफी हद तक कामयाब कोशिश की गयी। जबकि उस वक्त राजीव गाँधी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह के तीन प्रमुख सहयोगियों विद्याचरण शुक्ल, आरिफ मोहम्मद खान और सतपाल मलिक का दामन पाक-साफ है, ऐसा दावा तो वो खुद भी नहीं कर सकते। राजीव गाँधी को हराकर सत्ता में आये दलों के नेताओं ने राजा हरीशचन्द्र की तरह आचरण किया हो, इसके प्रमाण नहीं मिलते। जबकि इसके विपरीत आचरण के तमाम प्रमाण मिल जायेंगे। पर राजीव गाँधी तो शहीद हो ही गये। ताजा लोकसभा चुनाव के कुछ समय पहले प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह पर हल्ला बोला गया कि वे एक कमजोर प्रधानमंत्री हैं। जो आतंकवाद और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर कड़े फैसले नहीं ले सकते। पर इस अभियान को चलाने वाले नेताओं को जब उनके कार्यकाल की याद दिलायी गयी तो यह हमला शान्त हो गया क्योंकि हमलावरों के हथियार भौंतरे हो गये थे। पर काफी दिन तक एक शरीफ प्रधानमंत्री पर हतोत्साहित करने का सोचा-समझा अभियान चलाया गया। इसलिए प्रधानमंत्री को शशि थरूर के मामले में ठण्डे दिमाग से फैसला लेना चाहिए। अगर इस बात पर सन्देह नजर आये कि थरूर का इस रोंदेवु स्पोर्ट्स की डील में कोई हिस्सा था, तो उन पर कार्यवाही की जा सकती है। लेकिन विपक्ष के शोर मचाने पर मीडिया के इस मामले को उछालने पर अपनी राय कायम नहीं करनी चाहिए।

1993 में जब मैंने देश के 115 बड़े राजनेताओं और आला अफसरों को जैन डायरी हवाला काण्ड में लिप्त पाया और उन्हें सी.बी.आई. से चार्जशीट करवाया, तो ऐसा देश के इतिहास में पहली बार हुआ था। सबको लगा कि राजनैतिक हालात अब तेजी से बदलेंगे। इस घोटाले से व्यवस्था में दरार तो जरूर आयी, पर भ्रष्टाचार घटने की बजाय बढ़ गया। नेताओं ने भी समझ लिया कि सी.बी.आई. और सर्वोच्च न्यायालय के बावजूद उनका कुछ नहीं बिगड़ा। इसलिए वे और भी निरंकुश हो गये। आजादी के बाद से समय-समय पर सत्ता पक्ष के घोटाले सामने आते रहे हैं और विपक्ष उन पर संसद में शोर मचाता रहा। सजा दिलवाना न कोई चाहता था और न किसी को मिली। सी.बी.आई. जाँच के नाम पर नाटक हुए और तथ्यों को दबा दिया गया। भ्रष्टाचार के मामले पर शोर मचाने से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि इससे निपटने के जो कारगर उपाय हैं, उनको अपनाने में आने वाली अड़चनों को दूर करने का अभियान चलाया जाए। जिससे भ्रष्टाचार का कैंसर बढ़ने से रोका जा सके। पर देखने में यही आया है कि ऐसे मुद्दों पर शोर मचाने वाले बदलाव नहीं चाहते, केवल राजनैतिक लाभ चाहते हैं। इसलिए शशि थरूर का भविष्य क्या होगा, कहना सम्भव नहीं। पर इतना जरूर है कि इस विवाद से निकलकर वे और परिपक्व राजनेता बनेंगे। 

Sunday, April 11, 2010

न्यायमूर्ति दिनाकरण पर महाअभियोग न्यायोचित नहीं

न्यायपालिका के भ्रष्टाचार से त्रस्त भारत की जनता इस प्रश्न का उत्तर यही देगी कि भ्रष्टाचार के आरोपी किसी भी न्यायधीश पर महाअभियोग चलाना उचित है। यह बात दीगर है कि संसदीय जाँच समिति अभी कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश पी. डी. दिनाकरण पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच कर रही है। यदि इस जाँच में आरोप सिद्ध होते हैं तो संसद में उन पर महाअभियोग चल सकता है। जिसके लिए प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। पहले यह प्रस्ताव राज्यसभा में पारित होना होगा और फिर लोकसभा में। इस प्रक्रिया में साल-डेढ़ साल आसानी से निकल सकता है। तब तक न्यायमूर्ति दिनाकरण वैसे भी सेवानिवृत्त हो जायेंगे।

सवाल उठता है कि न्यायमूर्ति दिनाकरण पर ही यह महाअभियोग क्यों चलाया जा रहा है? क्या यह देश के ऐसे पहले न्यायाधीश हैं जिनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों? यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि 1991 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी. रामास्वामी के खिलाफ भी संसद में महाअभियोग प्रस्ताव आया था। पर केवल 108 सांसदों का समर्थन मिला। संसद में बहुमत का समर्थन न मिलने के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। दिनाकरण के मामले में तो अभी आरोप सिद्ध होने हैं पर न्यायमूर्ति रामास्वामी के मामले में तो सभी आरोपों के प्रमाण मौजूद थे। फिर क्यों महाअभियोग नहीं चलाया गया? सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन क्यों नहीं किया?

इससे भी ज्यादा रोचक बात यह है कि अरूण जेटली के नेतृत्व में भाजपा के जिन सांसदों ने न्यायमूर्ति पी. डी. दिनाकरण के खिलाफ इस महाअभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये हैं, उन्हें शायद यह याद नहीं कि केन्द्र में जब एन.डी.ए. की सरकार थी और अरूण जेटली उसके कानून मंत्री थे तो उस समय भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डाॅ. ए.एस. आनंद के कई जमीन घोटाले मैंने ही सभी सबूतों के साथ प्रकाशित किये थे। उस समय न तो श्री जेटली ने, न प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने और न ही एन.डी.ए. में शामिल दलों के सांसदों ने न्यायमूर्ति डा. आनंद के विरूद्ध महाअभियोग प्रस्ताव लाने की कोई भी चेष्ठा की। क्या इस देश में एक ही तरह के अपराध को नापने के दो मापदण्ड हैं? क्या वजह है कि जिन न्यायमूर्ति रामास्वामी और न्यायमूर्ति आनन्द के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के प्रमाण प्रकाशित हो चुके थे, उनके खिलाफ तो महाअभियोग चला नहीं पर न्यायमूर्ति दिनाकरण के खिलाफ यह प्रस्ताव लाया गया? इतना ही नहीं हरियाणा उच्च न्यायालय की न्यायाधीश सुश्री निर्मल यादव के घर रिश्वत का नकद रूपया पकड़ा गया, फिर भी उन पर अभी तक महाअभियोग प्रस्ताव नहीं लाया गया तो न्यायमूर्ति दिनाकरण के ही खिलाफ यह प्रस्ताव क्यों? क्या इसलिए कि वे दलित वर्ग से हैं और अब तक जितने भी न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार के मामले सामने आये, वे सभी सवर्ण थे? महाअभियोग चलाने वाले सांसदों के पास इसका कोई जवाब नहीं है। वे पलटवार कर कहते हैं कि यह मुद्दा उठाकर तुम एक भ्रष्ट न्यायाधीश को बचाना चाहते हो। पर जब उनसे यह पूछा जाता है कि इस शुद्धिकरण की शुरूआत बैंगलूर से क्यों की जा रही है, सर्वोच्च न्यायलय से नीचे की ओर या निचली अदालतों से ऊपर की ओर क्यों नहीं, तो इसका भी कोई जवाब उनके पास नहीं। उनकी इस चुप्पी से दाल में काला नजर आता है।

नैतिकता के दो मापदण्ड हो ही नहीं सकते। या तो ये कोई गहरा राजनैतिक खेल है, जिसमें न्यायमूर्ति दिनाकरण को लपेटा जा रहा है या सीधा-सीधा दलितों के विरूद्ध सवर्णों की लामबन्दी का मामला है। न्यायापालिका और राजनीति के गलियारों में दबी जबान से यह चर्चा चल रही है कि न्यायमूर्ति दिनाकरण के कुछ फैसलों से भाजपा की एक वरिष्ठ नेता के प्रबल समर्थकों के हित प्रभावित हुए हैं। इसलिए भाजपा सांसदों ने इस मामले में इतना उत्साह दिखाया है। दूसरी चर्चा यह भी है कि न्यायमूर्ति दिनाकरण ने अपने कुछ फैसलों से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करूणानिधि को अप्रसन्न कर दिया है। इसलिए वे भी इस महाअभियोग के समर्थन में हैं। इन चर्चाओं में सच्चाई क्या है, यह जाँच का विषय हो सकता है। पर सीधी और सपाट बात जो किसी भी आम पाठक या मतदाता की समझ में आ जायेगी, वह यह है कि न्यायमूर्ति दिनाकरण देश के पहले ऐसे न्यायाधीश नहीं हैं जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों और वे भी अभी सिद्ध होने बाकी हों। बल्कि ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें अनैतिक आचरण वाले न्यायाधीशों को तमाम सबूतों के बावजूद हाथ नहीं लगाया गया। देशवासी भारत के पूर्व न्यायाधीश वाई. के. सब्बरवाल का प्रकरण भूले नहीं होंगे, जब उन्होंने दिल्ली नगर निगम पर जोर डाल-डालकर दिल्ली में हजारों करोड़ रूपये के अवैध निर्माण गिरवाये थे। उस अफरा-तफरी के दौर में दिल्ली के लाखों घर तबाह हो गये। हजारों उद्योग बन्द हो गये। अनेकों परिवारों ने बदहाली और बेरोजगारी से तंग आकर आत्महत्याऐं कर लीं। दूसरी तरफ इसी दौर में दिल्ली में व्यवसायिक भवनों की कीमत रातों-रात कई गुना बढ़ गई। जिससे भवन निर्माताओं ने हजारों करोड़ कमाये। उस समय तमाम प्रमाणों के साथ यह आरोप लगाये गये कि उन भवन निर्माताओं के साथ न्यायमूर्ति सब्बरवाल के पुत्रों के व्यवसायिक हित जुड़े थे और उन्होंने इसका पूरा लाभ उठाया। सब्बरवाल के पद पर रहते हुए भी और पद से हटने के बाद यह मामला खूब उछला, पर महाअभियोग का कोई प्र्रस्ताव नहीं लाया गया। ऐसे अनेक दूसरे उदाहरण भी हैं।

यदि न्यायमूर्ति दिनाकरण पर महाअभियोग मात्र इसलिए चलाया जा रहा है कि वे दलित हैं और सवर्ण नहीं चाहते कि एक और दलित सर्वोच्च न्यायालय पहुँचे। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति दिनाकरण का नाम सर्वोच्च न्यायालय के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश ने अनुमोदन सहित भारत सरकार के कानून मंत्रालय को भेज दिया था। उसी बीच यह महाअभियोग प्रस्ताव लाया गया और नियुक्ति की यह प्रक्रिया रोक दी गयी। ंअगर यही सच है तो फिर दलित सांसदों, विधायकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और दलितवर्ग के आम लोगों को इसका खुलकर जोरदार विरोध करना चाहिए और महाअभियोग चलाने वालों से ये सारे सवाल पूछने चाहिऐें। अगर न्यायपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित की जानी है और उसे पारदर्शी बनाना है तो इस शुद्धिकरण अभियान की शुरूआत सर्वोच्च न्यायालय से की जानी चाहिए। क्योंकि जैसा वहाँ आचरण होगा, उसका वैसा ही अनुसरण उच्च न्यायालयों के या निचली अदालतों के न्यायाधीश करेंगे। इस लेख का उद्देश्य भ्रष्टाचार के आरोपी किसी एक जज को बचाना नहीं है, बल्कि यह मूलभूत प्रश्न खड़े करना है कि एक ही अपराध के दो मापदण्ड इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार नहीं किये जा सकते।

Sunday, April 4, 2010

फिर राम के सहारे भाजपा

अभी उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों मs दो वर्ष का समय बाकी है। पर भाजपा ने अभी से तय कर लिया है कि अयोध्या मs भगवान श्री राम के मन्दिर का निर्माण उनका मुख्य चुनावी मुद्दा होगा। यह पहली दफा नहीं है जब भाजपा को चुनाव से पहले राम की याद आयी है। 1990-91 में हुए राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन से आज तक जब-जब चुनाव आये, तब-तब भाजपा और उसके सहयोगी संगठन विहिप व संघ ने राम मन्दिर का राग अलापा। पर देश और विदेश में रहने वाला हर हिन्दू इस बात से व्यथित है कि भाजपा ने लोगों की आस्था को चुनावी हथकण्डा बनाकर गद्दी हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया। अगर भाजपा चाहती तो उत्तर प्रदेश और केन्द्र में अपनी सरकारों के दौर में, तमाम विवादों के बावजूद, राम मन्दिर या अयोध्या के मूलभूत ढाँचे में सुधार का कुछ न कुछ कार्य तो कर ही सकती थी। पर उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया। अब एक बार फिर उसे राम की याद सता रही है।

भाजपा के वरिष्ठतम सक्रिय नेता, जो आज भी दल को रिमोट कंट्रोल से चला रहे हैं, लालकृष्ण आडवाणी ही राम मन्दिर के मुद्दे पर अपनी दृष्टि साफ नहीं कर पाये हैं। सोमनाथ से रथयात्रा लेकर चलने वाले आडवाणी जी हर जनसभा में कहते रहे कि सौगंध राम की खाते हैं हम मन्दिर वहीं बनायेंगे। उत्तर प्रदेश की महिला आई.पी.एस. अधिकारी अंजू गुप्ता की माने तो आडवाणी जी विवादित ढाँचें के गिरते समय काफी सक्रिय और आल्हादित थे। पर बाद में मामले की नजाकत को समझते हुए उन्होंने बयान दिया कि ढाँचे का गिरना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। इतना ही नहीं उन्होंने मन्दिर के मुद्दे पर कई बार अपने बयान बदले हैं और विरोधाभाषी बयान दिये हैं। राम रथयात्रा के जरिये दिल्ली की कुर्सी तक पहुँचने वाले आडवाणी जी अयोध्या जाने की बजाय जिन्ना की मजार तक जा पहुँचे। उन्हें उम्मीद थी कि उनका यह कदम उन्हें दुनिया की नजर में धर्मनिरपेक्ष सिद्ध कर देगा और उन पर से 6 दिसम्बर 1991 का कलंक मिटा देगा। पर हुआ उल्टा ही, ‘न खुदा ही मिला न बिसाले सनम; न इधर के रहे न उधर के रहे।

भारतीय जनता पार्टी ने भारतीय जनमानस की भावनाओं को भ्रमित करते हुए सत्ता की सीढि़याँ चढ़ीं। लेकिन हुआ ये कि मतदाताओं को भ्रमित करने के चक्कर में खुद भाजपा व सहयोगी संगठन इस भ्रम जाल में उलझ गये। नतीजतन इन संगठनों में भारी अन्र्तकलह होने लगी। हालात इतने बिगड़ गये कि अब मजबूरी में नये-नये चेहरे लाकर अपनी साख बचानी पड रही है। फिर भी कलह शांत नहीं हो रही। इसलिए भाजपा को एक बार फिर आत्ममंथन करना चाहिए कि जिस मुद्दे को वे फिर से उठाना चाहते हैं, कहीं वही मुद्दा उन्हें फिर से भ्रमजाल में न उलझा दे। चैबे जी चले छब्बे बनने और दुबे बनकर लौटे। संतो के आशीर्वाद और समर्थन से खड़ी होने वाली भाजपा के नेताओं ने सन्तों का यह प्रवचन बार-बार सुना होगा कि, ‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समायें।या तो राम ही ले लो या सत्ता ही ले लो। सत्ता ही लेनी है तो राम का व्यापार क्यों? क्या देश का मतदाता इतना मूर्ख है कि तुम्हारी बातों में आ जायेगा? काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ा करती।

नये चेहरे भी ऐसे जिनके चेहरे पर सौ-सौ दाग हैं। अब नयी बनी उपाध्यक्षा श्रीमती हेमा मालिनी को ही लीजिए या उनके सांसद रहे पति धर्मेन्द्र को ही लीजिए। हिन्दू धर्म के कानून के अनुसार शादी सम्भव नहीं थी इसलिए दोनों आयशा और इफ्तियार बने। हिन्दू धर्म छोड़ा और इस्लाम को अपनाया। कानून की नजर में दोनों आज भी आयशा और इफ्तियार ही हैं। इसलिए अटल जी की एक कविता की पंक्तियाँ भाजपा के नये चेहरों को जरूर पढ़ लेनी चाहिए। अटल जी कहते हैं, ‘‘दागदार चेहरे हैं, घाव बड़े गहरे हैं। मीत नहीं पाता हूँ, गीत नया गाता हूँ।’’ वैसे यह बात तो सभी भाजपाईयों को पता होगी कि भगवान श्रीराम को यूँ ही मर्यादा पुरूषोत्तम नहीं कहते हैं। उन्होंने एक पत्नी धर्म व्रत लिया और उसे आजन्म निभाया। राम का सहारा चाहिए तो राम के आदर्श को अपनाना होगा।

वैसे इसमें शक नहीं है कि राम जन्मभूमि का मुद्दा आज से नहीं बाबर के जमाने से भारत के जनमानस पर हावी रहा है। वे इस नासूर को भुला नहीं पाये हैं और भुला भी नहीं पायेंगे। 1990-1991 में भाजपा ने हिन्दुओं की इस दुखती रग पर हाथ रखकर अपना खेल खड़ा कर लिया। पर उसके बाद से आज तक न तो भाजपा, न उसके सहयोगी संगठन राम मन्दिर के मुद्दे पर कोई प्रभावशाली जन आन्दोलन खड़ा कर पायें हैं। प्रयास तो बहुत किये, पर सफल नहीं हुए। मथुरा में विष्णु यज्ञ बुरी तरह विफल रहा। जबरन शिलान्यास का तूफान खड़ा किया। पर जनता और संत समाज साथ नहीं आया, तो शिला पूजन करके ही कार्यक्रम फुस्स हो गया। विहिप के वरिष्ठ नेताओं ने 1991 के बाद भारत के संत समाज को एकजुट करने के भागीरथी प्रयास किये, पर संत इनके झाँसे में नहीं आये। खेमों में बंट गये। ये बात दूसरी है कि संतों की मनुहार करते-करते विहिप नेता खुद ही संत बन गये और जैसा मंहतों और मठाधीशों में होता है, ये संत बने नेता आपस में ही मठों की गद्दी की लड़ाई लड़ने लगे।

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ निश्चित रूप से हिन्दू हित के लिए समर्पित संगठन है। पर अपने हित साधने के लिए उनके पास एक मात्र हथियार भाजपा है। यह संघ का दुर्भाग्य समझिये या भाजपा के नेताओं की आत्मकेन्द्रित धूर्तता कि उन्होंने कभी भी संघ के सपने पूरे करने में कोई गम्भीर प्रयास नहीं किया। नतीजतन संघ के समर्पित युवा काॅडर का भी मोह भंग हो गया और आज संघ का¡डर विहीन हो गया है। चर्चा है कि मोहन भागवत ने भाजपा पर नकेल कसी है और संघ का वर्चस्व भाजपा पर कायम हुआ है। पर नितिन गडकरी की टीम के चयन की प्रक्रिया और उसके परिणाम कुछ और ही संकेत करते हैं। आज भी भाजपा को रिमोट कंट्रोल से आडवाणी जी ही चला रहे हैं। जबकि जिन्ना प्रकरण के बाद से संघ ने उनसे दल के अध्यक्ष का पद छीन लिया था और माना जा रहा था कि उन्हें हाशिए पर डाल दिया जायेगा। ऐसे विरोधाभास में कैसे उम्मीद की जाये की नितिन गडकरी की टीम संघ के उद्देश्यों को पूरा करने में सहायक बनेगी। इसके लिए बेचारे नितिन गडकरी को दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि उनकी दशा तो उस सेल्समैन की सी है जिसे रातों-रात कम्पनी का एम.डी. बना दिया जाये। ऐसी स्थिति में राम मन्दिर के मुद्दे के सहारे भाजपा की वैतरणी पार होने वाली नहीं है। उसे कोई और बेहतर मुद्दा सोचना होगा।

Sunday, March 28, 2010

थाईलैंड: राजतंत्र बनाम लोकतंत्र

चाणाक्य पंडित ने कहा है कि व्यवस्था कोई भी हो अगर उसको चलाने वाले ठीक हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता। फिर चाहे राजतंत्र हो या लोकतंत्र। अगर राजा चरित्रहीन या खुदगर्ज हो तो राजतंत्र जनता के लिए अभिशाप बन जाता है और अगर सांसद अपराधी और भ्रष्ट हों तो लोकतंत्र जनता के लिए नासूर बन जाता है। थाईलैंड जो कभी गुलाम नहीं रहा। पिछले 64 साल से एक ही राजा के आधीन शासित है। 1946 में अपने बड़े भाई की रहस्यमय मृत्यु के दिन ही भूमिबोल का राज्याभिषेक कर दिया गया। तब से आज तक राजा भूमिबोल ने पितातुल्य व्यवहार से शासन किया और जनता के हृदय में स्थान बनाया है। वे आज दुनिया के सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में रहने वाले राजा हैं। यूं तो थाईलैंड में 1932 से आज तक 18 बार फौजी हुकूमत कायम हो चुकी है। पर यह राजा भूमिबोल की सूझ-बूझ थी कि हर बार उन्होंने सत्ता का संतुलन पुनः स्थापित कर दिया। अभी 2008 में ही बैंकाक की सड़कों पर लाल कमीज वाले प्रदर्शनकारियों ने फौज से संर्घष किया था। पिछले वर्ष भी ये सड़कों पर उतर आये। एक बार फिर इस मार्च के दूसरे हफ्ते में डेढ़ लाख लाल कमीज वाले प्रदर्शनकारी एक हफ्ते तक धरना प्रदर्शन करते रहे। ये लोग लोकतंत्र की बहाली चाहते हैं। इन्हें भगोड़े प्रधानमंत्री थकसिन का समर्थन है। जिन्हें 2006 में सैना ने अपदस्थ कर कठपुतली प्रधानमंत्री अभिशित वजाजिवा को सत्ता पर बिठा दिया। राजा ने इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया। थाईलैंड के धनाड्य वर्ग के चहेते अभिशित वजाजिवा जनता की आंखों में खटक रहे हैं। आम जनता विशेष कर पूर्वोतर की जनता थकसिन की जनहित नीतियों के कारण उनकी लोकतांत्रिक बहाली चाहती है। हलाकि थकसिन की अकूत दौलत और शाही जीवन आलोचना का विषय रहा है पर उनकी नीतियां आम जनता के हित में रही।

थाईलैंड के बुद्धिजीवी मानते हैं कि आज की दुनिया में राजतंत्र का कोई औचित्य नहीं बचा है। थाईलैंड को भी यूरोप के देशों की तरह राजा का पद मात्र अलंकरण के लिए ही रखना चाहिए। राजा को शासन में दखल नहीं देना चाहिए। पर यह बात वहां खुलकर नहीं कही जा सकती। जनसभाओं, लेखों और अखबारों में तो बिलकुल नहीं। थाईलैंड का कानून राज परिवार के बारे में कुछ भी नकारात्मक चर्चा करने की अनुमति नहीं देता। ऐसा करने वाले को फौरन कारावास भेज दिया जाता है। इसलिए यह राजनैतिक चर्चा दबी जुबान से निजी दायरों में की जाती है। पर बहुमत लोकतंत्र के पक्ष में है। अलबता जनता राजवंश को पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहती। विशेष कर मौजूदा राजा को तो कतई नहीं। समस्या युवराज को लेकर है। 57 वर्षीय युवराज वाजीरालोगोकर्ण का जीवन ढर्रा, स्वभाव, चरित्र व आचरण जनता के बीच चिंता का विषय बना रहता है। राजा भूमिबोल गत सात माह से अस्पताल में है। 82 वर्ष की आयु में उनके बहुत ठीक  होने या लंबे समय तक जिंदा रहने की आशा नहीं की जा सकती। थाईलैंड की जनता को यही चिंता सत्ता रही है कि राजा के बाद उनका उत्तराधिकारी देश को दिशा कैसे दे पायेगा। जबकि दूसरी तरफ राजकुमारी सिरिधौर्न की छवि एक ममतामयी समाज सेवी की है। जनता की हार्दिक इच्छा राजकुमारी सिरिधौर्न को सत्ता में देखने की है।

राजनैतिक विश्लेषकों को भय है कि अगर राजकुमार वाजीरालोगोकर्ण को सत्ता मिलती है तो कहीं थाईलैंड में नेपाल जैसी खूनी क्रांति न हो जाए और कहीं राजतंत्र समाप्त ही न हो जाए। स्वयं वाजीरालोगोकर्ण अपने जीवन को लेकर इतने सशंकित रहते हैं कि उनके अंगरक्षकों को आग्नेय अस्त्र रखकर उनके इर्द-गिर्द खड़े होने की छूट नहीं है। बुजुर्गों का कहना है कि राजा अंत समय में अपनी वसीयत में राजकुमारी सिरिधौर्न को सत्ता देंगे और राजकुमार वाजीरालोगोकर्ण को देश निकाला। राजकुमार वाजीरालोगोकर्ण के पास अकूत दौलत है। इसलिए उन्हें यूरोप जैसे देशों में रहकर ऐशोआराम की जिंदगी बिताना मुश्किल न होगा। राजा ऐसा करेंगे या नहीं यह तो वक्त ही बतायेगा किन्तु इतना निश्चित है कि राजा भूमिबोल की मृत्यु के बाद थाईलैंड के राजतंत्र का स्वरूप और छवि ऐसी नहीं रहने वाली है जैसे आज है।

अच्छा होता कि राजा भूमिबोल अपने जीवनकाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था को विकसित करते। इससे देश में राजनैतिक अस्थिरता का माहौल इस तरह बार-बार न बनता। उन्होंने अपनी मर्जी के श्रेष्ठ लोगों की सलाहकार परिषद् बनाकर और उनसे सलाह लेकर देश तो ठीक चलाया और आर्थिक तरक्की भी खूब की। पर वे देश में सही नेतृत्व विकसित नहीं कर पाये। दरअसल थाईलैंड के राजा का आर्थिक साम्राज्य बहुत विशाल है। थाई अर्थव्यवस्था के लगभग हर क्षेत्र में राज परिवार का मोटा पैसा लगा है। वे प्रशासन कम और तिजारत ज्यादा करते हैं। लोगों को उनकी दौलत का कोई आंकलन नहीं है और न ही उनके खर्चों के हिसाब जनता की जांच के लिए उपलब्ध होते हैं। जबकि यूरोप के देशों में राज परिवारों पर किये जा रहे खर्चे को बाकायदा जनता की जांच के लिए प्रचारित किया जाता है या वेबसाईट पर डाला जाता है।

अगर थाईलैंड के राजपरिवार को लंबे समय तक अपनी स्थिति बनाये रखनी है तो उसे भूटान के राजा से सबक लेकर स्वतः ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बहाल कर देना चाहिए। थाईलैंड के जागरूक लोगों को डर है कि ऐसा न करने पर थाईलैंड के राजवंश की दशा नेपाल के राजवंश जैसी न हो जाए।

Sunday, March 21, 2010

विकंलागों के साथ यह मजाक क्यों?


1995 में भारत सरकार ने विकलांगों को शिक्षा में समान अवसर देने के मकसद से एक कानून बनाया। जिसके तहत हर विकलांग के लिए शिक्षा प्राप्त करना उसका मूलभूत अधिकार बन गया। सर्व शिक्षा अभियान के तहत स्कूलों को निर्देश जारी किये गये कि वे ऐसे सभी बच्चों के पंजीकरण कर लें। दिल्ली में जनवरी 2010 में एक अभियान चलाकर स्कूलों में विकलांगों के पंजीकरण कराये गये। सरकार की इस पहल का बहुत स्वागत हुआ। पंजीकरण के लिए विद्यालयों में काफी बच्चे आये। स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी इस अभियान में बढ़-चढ़ कर भाग लिया और उनकी जानकारी में जितने भी विकलांग बच्चे थे उन सबका पंजीकरण करवा दिया।

अब पहली अप्रैल से इन बच्चों के बकायदा दाखिले किये जायेंगे। पर इस नई उत्पन्न स्थिति के लिए यह स्कूल  तैयार नहीं है। इसलिए हर ओर अफरा तफरी का माहौल है। विकलांगों के लिए हर स्कूल में जगह-जगह लोहे की रेलिंग, रैम्प व विशेष टा¡यलेट होना जरूरी है। काफी स्कूलों ने दावा किया है कि उनके यहां यह व्यवस्था की जा चुकी है। जबकि हकीकत यह है कि इन स्कूलों के  इन विशेष टा¡यलटों में टूटा फर्नीचर या फाइलें भरी हुई हैं। इन्हें गोदाम बना दिया है। रेलिंग या तो है ही नहीं या टूटी पड़ी हैं। रैम्प बनाने वालों ने यह नहीं सोचा कि इन रैम्पों पर विकलांग बच्चे चलेंगे। इतनी बेहूदा रैम्प हैं कि उन पर चलने से दुर्घटना होने की संभावना ज्यादा है। वैसे भी इन रैम्पों पर स्कूल के कर्मचारी और छात्र दिनभर स्कूटर या साइकिल उतारते रहते हैं।

विकलांग छात्रों को शिक्षा देने के लिए शिक्षकों को जिस विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है उसकी कोई व्यवस्था आज तक नहीं की गयी है। बिना इस प्रशिक्षण के यह पारंपरिक शिक्षक इन बच्चों से कैसा व्यवहार करेंगे? उनकी समस्याओं को कैसे समझेंगे? उनकी सीमाओं में रहते हुए उनके सीखने की क्षमता को कैसे बढ़ायेंगे? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनकी चिंता मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नहीं की है। जाहिर है कि जहां इन शिक्षकों में इस नई स्थिति को लेकर असमंजस और तनाव है वहीं विकलांग बच्चों के माता-पिता भी कम चिंतित नहीं। उन्हें डर है कि संवेदनशीलता के अभाव में उनके बच्चों के साथ शिक्षक और सहपाठी ऐसा आक्रामक या व्यंगात्मक व्यवहार कर सकते है जिससे बच्चों  के मनोविज्ञान पर विपरीत प्रभाव पड़ जाए। शिक्षा पाने की बजाय उसका मन टूट जाए और उसका जीवन और भी जटिल हो जाए।

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय को निर्देश दिये गये हैं कि वह 90-90 दिन के विशेष पाठ्यक्रम चलाकर सभी शिक्षकों को विकलांग बच्चों के साथ उचित व्यवहार करने का प्रशिक्षण दें। यह प्रशिक्षण महज खानापूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं है। इसके अलावा इस नीति में यह भी प्रावधान है कि होम ऐजुकेशनदी जाए। यानी शिक्षक विकलांग छात्रों के घर जाकर भी उन्हें शिक्षा दें। आज की भाग दौड़ की जिंदगी में ऐसे कितने शिक्षक हैं जो सहानुभूतिपूर्वक विकलांग बच्चों की समस्याओं को समझे और उनके घर जाकर भी शिक्षा देने को तैयार हों?

वैसे भी सरकारी स्कूलों में हर कक्षा में 80-80 बच्चे हैं। कहीं-कहीं तो सवा सौ बच्चे भी एक कक्षा में भर्ती किये गये हैं। सर्व शिक्षा अभियान में 14 वर्ष तक के हर बच्चे को शिक्षा दिये जाने की नीति बनायी गयी है। नतीजतन गांव, गली, मौहोल्ले के हर बच्चे को ढूंढ-ढूंढ कर दाखिल किया जा रहा है। भेड़-बकरी की तरह बच्चे भर दिये गये हैं। न तो जगह है और न ही फर्नीचर। ऐसे में एक शिक्षक जो ऐसी कक्षा में जायेगा वह कितनी देर में तो हाजिरी लेगा? क्या पढ़ायेगा? कैसे जानेगा कि बच्चे समझे या नहीं? कैसे बच्चे परीक्षा में अच्छा कर पायेंगे? नहीं कर पायेंगे तो शिक्षक की खिंचायी नहीं की जायेगी क्या? फिर इस बेचारे शिक्षक से कैसे उम्मीद की जाए की वह विकलांगों की ओर विशेष ध्यान देगा?

इतना ही नहीं स्कूलों में शिक्षकों का भारी आभाव है। भर्तियां हुई ही नहीं हेैं। अनेक स्कूल तो बिना प्राचार्यों के ही चल रहे हैं। जिस स्कूल में प्राचार्य ही नहीं उसके प्रशासन की क्या दशा होगी? इसकी चिंता शायद सर्व शिक्षा अभियान चलाने वालों को नहीं है।

आजादी के बाद से आज तक प्राथमिक शिक्षा को लेकर नीतियां तो बहुत बनीं। बजट भी बहुत आवंटित किये गये। घोषणाएं भी बहुत हुईं। पर धरातल पर कुछ भी नहीं बदला है। हर नया शिक्षा मंत्री नई नीतियां और नये दावों का ढिंढोरा पीटता है। पर बदलता कुछ नहीं। साधन सम्पन्न लोग ही अपने बच्चों को ठीक शिक्षा दिलवा पाते हैं। बाकी के करोड़ों बच्चे तो भगवान भरोसे जीवन काट देते हैं। फिर वे नक्सलवादी, आतंकवादी या अपराधी बनें तो दोष किसका है। विकलांग बच्चे तो यह भी नहीं कर सकते। आवश्यकता है ईमानदार सोच और व्यवहारिक नीतियों की। नारों से समस्याओं के हल नहीं निकला करते।