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Monday, January 19, 2026

योग और स्वस्थ जीवनशैली के लाभ

भारत की प्राचीन सभ्यता में योग को जीवन का आधार माना गया है। आज की तेज़-रफ़्तार और तनावपूर्ण दुनिया में, जहां जीवनशैली संबंधी बीमारियाँ जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और मानसिक विकार तेज़ी से बढ़ रहे हैं, योग एक प्राचीन लेकिन अत्यंत प्रासंगिक समाधान के रूप में उभर रहा है। भारत की यह अमूल्य धरोहर न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाती है, बल्कि मन की शांति और आध्यात्मिक संतुलन भी प्रदान करती है। बीते वर्ष, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम ‘एक पृथ्वी, एक स्वास्थ्य के लिए योग’ ने इसे और अधिक प्रासंगिक बना दिया है, क्योंकि योग व्यक्तिगत स्वास्थ्य से लेकर पर्यावरणीय संतुलन तक सब कुछ जोड़ता है। आज का विषय योग को दैनिक जीवन में अपनाने के व्यावहारिक लाभों पर केंद्रित है, ताकि हम एक स्वस्थ, सकारात्मक और संतुलित जीवन जी सकें। 



योग का अर्थ है ‘जोड़ना’ या ‘मिलन’। यह शरीर, मन और आत्मा का मिलन है। महर्षि पतंजलि के योग सूत्रों में योग को ‘चित्त वृत्ति निरोधः’ कहा गया है, अर्थात मन की वृत्तियों का निरोध। लेकिन योग सिर्फ ध्यान या समाधि तक सीमित नहीं; यह हठ योग, राज योग, भक्ति योग और कर्म योग जैसे विभिन्न रूपों में जीवन को संतुलित करता है। आज के संदर्भ में, हठ योग के आसन और प्राणायाम सबसे अधिक प्रचलित हैं, क्योंकि ये व्यावहारिक और तुरंत लाभ देने वाले हैं।



शारीरिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में योग के लाभ अनेक हैं। नियमित योगाभ्यास से शरीर लचीला, मजबूत और संतुलित होता है। सूर्य नमस्कार जैसे गतिशील आसन पूरे शरीर की मांसपेशियों को सक्रिय करते हैं, रक्त संचार बढ़ाते हैं और चयापचय (मेटाबॉलिज्म) को तेज़ करते हैं। इससे वजन नियंत्रण में मदद मिलती है। कई अध्ययनों से सिद्ध हुआ है कि योग से मोटापा कम होता है, खासकर पेट की चर्बी। धनुरासन, भुजंगासन और नौकासन जैसे आसन पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं, कब्ज और एसिडिटी जैसी समस्याओं से राहत देते हैं। महिलाओं के लिए योग मासिक धर्म चक्र को नियमित करता है, प्रसव के बाद रिकवरी में सहायक होता है और हड्डियों की मजबूती बढ़ाता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसी वृद्धावस्था की बीमारियों से बचाव होता है।



हृदय स्वास्थ्य के लिए योग एक वरदान है। अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम रक्तचाप को नियंत्रित करते हैं, कोलेस्ट्रॉल स्तर कम करते हैं और हृदय की धड़कन को संतुलित रखते हैं। भारत में हृदय रोग मौत का प्रमुख कारण है, और योग जैसे प्राकृतिक तरीके से इसे रोका जा सकता है। योग इम्यून सिस्टम को भी मजबूत बनाता है। नियमित अभ्यास से शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कोविड महामारी के बाद यह और भी महत्वपूर्ण हो गया है।


मानसिक स्वास्थ्य योग का सबसे बड़ा योगदान है। आज की युवा पीढ़ी चिंता, अवसाद और तनाव से ग्रस्त है। योग में ध्यान और प्राणायाम मन को शांत करते हैं। विपश्यना या mindfulness ध्यान से स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल कम होता है, नींद बेहतर आती है और एकाग्रता बढ़ती है। छात्रों के लिए यह परीक्षा तनाव कम करने का बेहतरीन माध्यम है। कार्यरत लोगों के लिए योग वर्क-लाइफ बैलेंस बनाए रखता है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है और भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है। योग से आत्मविश्वास बढ़ता है, जो व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में सफलता की कुंजी है।



योग को स्वस्थ जीवनशैली का आधार बनाना चाहिए। योग सिर्फ आसन नहीं, बल्कि आहार, नींद और दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है। आयुर्वेद के अनुसार, सात्विक भोजन – फल, सब्जियाँ, दालें, अनाज और दूध – योग के लाभों को बढ़ाता है। जंक फूड, ज्यादा तेल-मसाले और रात में भारी भोजन से दूर रहना चाहिए। सुबह जल्दी उठना, सूर्योदय के साथ योग करना और रात को 7-8 घंटे की नींद लेना आदर्श है। डिजिटल डिटॉक्स भी योग का हिस्सा बन सकता है – स्क्रीन टाइम कम करके ध्यान बढ़ाना।


योग नियमित अभ्यास से लचीलापन बढ़ाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है और संतुलन सुधारता है, जिससे गिरने का खतरा कम होता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से सिद्ध है कि यह तनाव कम करता है, कोर्टिसोल स्तर घटाता है और चिंता को 40% तक कम कर सकता है। हृदय स्वास्थ्य में सुधार, बेहतर नींद, आत्मसम्मान में वृद्धि और समग्र जीवन गुणवत्ता में वृद्धि जैसे लाभ भी प्रमाणित हैं। योग कैंसर रोगियों में थकान कम करता है और मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाता है, जिससे दैनिक जीवन अधिक संतुलित और ऊर्जावान बनता है।


समाजिक स्तर पर योग समुदाय को जोड़ता है। गांवों में योग शिविर, शहरों में पार्कों में सामूहिक सत्र और स्कूलों में योग शिक्षा से लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं। महिलाओं के लिए यह सशक्तिकरण का साधन है – घरेलू कामों के साथ स्वास्थ्य बनाए रखना। बुजुर्गों के लिए योग गतिशीलता बनाए रखता है और अकेलेपन को कम करता है। पर्यावरणीय दृष्टि से, योग हमें प्रकृति से जोड़ता है। योग हमें सिखाता है कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य और पृथ्वी का स्वास्थ्य जुड़े हुए हैं। कम खपत, अधिक जागरूकता और संतुलित जीवन से हम पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं।


आर्थिक रूप से भी योग फायदेमंद है। अस्पतालों के खर्च कम होते हैं, दवाओं पर निर्भरता घटती है। एक स्वस्थ व्यक्ति अधिक उत्पादक होता है, जिससे परिवार और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होती है। भारत में योग पर्यटन बढ़ रहा है – ऋषिकेश, हरिद्वार जैसे स्थान विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, जिससे रोजगार भी बढ़ता है।

योग अपनाना आसान है। शुरुआत में 15-20 मिनट रोज़ काफी हैं। घर पर ऑनलाइन वीडियो या ऐप्स से सीख सकते हैं। वहीं सरकारी योजनाएँ जैसे आयुष मंत्रालय के योग कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के शिविर मुफ्त प्रशिक्षण देते हैं। लेकिन महत्वपूर्ण है निरंतरता। योग कोई जादू नहीं, बल्कि अभ्यास है। योग को धीरे-धीरे बढ़ाएँ, शरीर की सुनें और धैर्य रखें। याद रहे कि योग हमें सिखाता है कि सच्चा स्वास्थ्य बाहर नहीं, भीतर है। जब हम योग अपनाते हैं, तो न केवल हम स्वस्थ होते हैं, बल्कि समाज और पर्यावरण भी लाभान्वित होता है। इसलिए कोशिश करें कि हम योग को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ।  

Monday, January 8, 2024

रियुमोटाइड आर्थराइटिस: इलाज संभव है?

सोशल मीडिया के दुरुपयोग के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। पिछले तीन वर्षों से फ़ेसबुक पर एक विज्ञापन चल रहा है जिसमें दावा किया जाता है कि, चर्चित पत्रकार विनीत नारायण के घुटनों के दर्द का सफल इलाज। विज्ञापन देने वाले ने मेरे घुटनों के दर्द की कहानी बता कर अपनी दवा और इलाज का प्रमोशन किया है। मैं कितना चर्चित हूँ या गुमनाम हूँ यह विषय नहीं है। पर इस हिन्दी विज्ञापन के कारण आए दिन हिन्दी भाषी राज्यों के मेरे परिचितों के फ़ोन मुझे आते रहते हैं जो यह जानना चाहते हैं कि क्या वाक़ई इस इलाज से मेरे घुटने ठीक हो गये? मेरा जवाब सुन कर उन्हें धक्का लगता है क्योंकि वे इस विज्ञापन पर यक़ीन कर बैठे थे और कुछ ने तो इलाज भी शुरू कर दिया था। मेरा उनको जवाब होता है कि मैं ख़ुद हैरान हूँ इस विज्ञापन से। क्योंकि मैंने ऐसी किसी व्यक्ति से अपना इलाज कभी नहीं कराया। ये नितांत झूठा विज्ञापन है। अगर मुझे उस व्यक्ति का पता मिल जाए तो मैं उसके विरुद्ध क़ानूनी करवाई अवश्य करूँगा। 


ये सही है कि पिछले तीन वर्षों से मुझे घुटनों में दर्द की शिकायत है। जो कभी बढ़ जाता है तो कभी ग़ायब हो जाता है। ऐसा दर्द शरीर के अन्य जोड़ो में भी कभी-कभी होता रहता है। यह दर्द घुटनों के कार्टिलेज के घिसने वाला दर्द नहीं है, जो प्रायः हमारी उम्र के लोगों को हो जाता है। इस बीमारी का नाम है ‘रियुमोटाइड आर्थराइटिस’ जिसे आयुर्वेद में आमवात रोग कहते हैं। यह एक क़िस्म का गठिया रोग है। ये क्यों, किसे और कब होता है इसका कोई स्पष्ट कारण पता नहीं हैं। पर चिंता की बात यह है कि ये काफ़ी लोगों को होने लगा है। यहाँ तक कि किशोरों में भी अब यह रोग काफ़ी पाया जाने लगा है। इसमें अक्सर जोड़ो में सूजन आ जाती है। जो दो दिन से लेकर दस दिन तक चलती है और भयंकर पीड़ा देती है। रात में यह दर्द और बढ़ जाता है। कभी-कभी सारी रात जाग कर काटनी पड़ती है। 


मरता क्या न करता। इस रोग के शिकार दर-दर भटकते हैं। अगर आप यूट्यूब पर जाएँ तो रियुमोटाइड आर्थराइटिस का इलाज बताने वाले दर्जनों शो मिल जाएँगे, जो प्राकृतिक चिकित्सा, होम्योपैथी, आयुर्वेद और एलोपैथी में इसका अचूक इलाज होने का दावा करते हैं। 



ये लेख मैं अपनी राम कहानी बताने के लिए नहीं लिख रहा बल्कि अपना अनुभव साझा करने के लिए लिख रहा हूँ जिससे, जिन्हें ये रोग है उन्हें कुछ दिशा मिल सके। पारंपरिक रूप से मेरा एलोपैथी में विश्वास नहीं रहा है। हालाँकि हर बीमारी के एलोपैथी के उत्तर भारत के मशहूर डॉक्टरों से मेरे व्यक्तिगत संपर्क रहे हैं, फिर भी मैं उनसे इलाज कराने से बचता रहा हूँ। 


इसलिए तीन वर्ष पहले जब मुझे पहली बार इस रोग ने हमला किया तो मैं भाग कर वृंदावन के मशहूर होमियोपैथिक डॉक्टर प्रमोद कुमार सिंह को दिखाने हवाई जहाज़ से पूना गया। क्योंकि उन दिनों वे निजी कारणों से पूना में थे। उन्होंने एक घंटे मुझ से सवाल-जवाब किए और एक पुड़िया होम्योपैथी की मीठी गोलियों की दी। जिसको खाने के चौबीस घंटों में मेरी सारी सूजन और दर्द चला गया। मैंने बड़ी श्रद्धा और विश्वास से छह महीने उनसे इलाज करवाया। हाँ उनके बताए दो काम मैं नहीं कर सका। एक तो नियमित प्राणायाम करना और दूसरा एक घंटे रोज़ धूप में बैठना। 



इन छह महीनों में स्थिति काफ़ी नियंत्रण में रही। लेकिन फिर भी कभी-कभी जोड़ों की सूजन बढ़ जाती थी। तो मैंने आयुर्वेद का इलाज कराने का निश्चय किया। हालाँकि डॉ प्रमोद कुमार सिंह पर मेरा विश्वास आज भी क़ायम है और वो पिछले हफ़्ते ही मुझसे कह रहे थे कि अगर मैं एक डेढ़ साल लग कर उनका इलाज कर लूँ तो वे मुझे पूरी तरह से ठीक कर देंगे। 


आयुर्वेद का इलाज कराने मैं जयपुर जा पहुँचा। वहाँ आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य रहे डॉ महेश शर्मा ने मेरा इलाज शुरू किया। छह महीने तक मैंने उनकी सभी दवाएँ नियम से लीं। साथ ही उनके बताए परहेज़ भी काफ़ी निष्ठा से किए। जिसका मतलब था कि खाने में गेहूं, चावल, मैदा, चीनी और दूध के पदार्थों का निषेध और दालों में केवल मूँग और मसूर की दाल। ग़ज़ब का फ़ायदा हुआ। मैं इतना ठीक हो गया कि चाट-पकौड़ी और दही बड़े तक खाने लगा। जब डॉक्टर साहब को उनकी प्रशंसा में यह बताया तो उनका कहना था कि, आम वात रोग राख में दबी चिंगारी की तरह होता है, आप ज़रा सी लापरवाही करेंगे तो फिर बढ़ जाएगा। छह महीने बाद उन्होंने मुझे दवा देना बंद कर दिया यह कह कर कि मेरी तरफ़ से इलाज पूरा हुआ। उसके बाद मैं काफ़ी समय तक ठीक रहा। परंतु शाकाहारी होते हुए कई बार ख़ान-पान का अनुशासन तोड़ देता था। परिणाम वही हुआ जो उन्होंने कहा था। बीमारी फिर बढ़ गई। 



मेरे परिवेश में जितने भी लोग हैं वे मेरी मान्यताओं से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते। उनका कहना है कि आज के युग में जब हवा-पानी, ख़ान-पान सब अशुद्ध हैं और खाद्य पदार्थों पर कीटनाशक दवाओं और रासायनिक उर्वरकों का भारी दुष्प्रभाव है तो होम्योपैथी, आयुर्वेद या प्राकृतिक चिकित्सा के कड़े नियमों का पालन करना लगभग असंभव है। इन पद्धतियाँ में कोई कमी नहीं है। किंतु हमारी परिस्थिति, दिनचर्या और ख़ान-पान हमें इनके नियमों का पालन नहीं करने देते। इसलिए इनका पूरा व सही लाभ नहीं मिल पाता। इन सब मित्रों और परिवारजनों का आग्रह था कि मैं एलोपैथी डॉक्टर से इलाज करवाऊँ, तो मैंने दिल्ली के ‘इंडियन स्पाइनल इंजरिज़ अस्पताल’ के मशहूर डॉक्टर संजीव कपूर को दिखाया। जिन्हें मैं दो बरस पहले दिखा चुका था, पर इलाज नहीं किया था। ये उन्हें याद था। वे बोले, आप देश के प्रबुद्ध व्यक्ति हैं। आपके विचारों और लेखों का आमजन पर प्रभाव पड़ता है। फिर आप हमारी पद्धति पर शक क्यों करते हैं? हमारे पास दुनिया का सर्वश्रेष्ठ इलाज है और रियुमोटाइड आर्थराइटिस की हर अवस्था का हम इलाज कर सकते हैं। आप आश्वस्त रहिए हम आपका कष्ट दूर कर देंगे। अब मैंने उनका इलाज शुरू कर दिया है। उम्मीद है उनका दावा सही निकलेगा और मैं शेष जीवन इस कष्ट के बिना जी पाऊँगा जो मेरी भाग-दौड़ की सामाजिक ज़िंदगी के लिए बहुत ज़रूरी है।