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Monday, January 27, 2014

‘नई राजनीति’ को राष्ट्रपति की चेतावनी

अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताएं, देश की सशस्त्र सेना की परेड या राष्ट्रीय पर्वों पर शानो-शौकत से मनाए जाने वाले उत्सव किसी राष्ट्र की समृद्धि और सफलता की पहचान होते हैं। इनसे सेना और देशवासियों का उत्साह बढ़ता है। पर कुछ लोग यह सवाल करते हैं कि जब समाज का बहुत बड़ा वर्ग साधनहीन हो, तो उत्सव मनाना कहां तक उचित है। शायद इसी संदर्भ में भारत के महामहिम राष्ट्रपति डा.प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में अराजकता की राजनीति पर प्रहार किया है। अगर देश में उत्सव और पर्व नहीं मनाए जाएंगे, तो राष्ट्र के जीवन में नीरसता आ जाएगी। अपने तीज-त्यौहार तो हर व्यक्ति मनाता है, चाहे वो संपन्न हो या विपन्न। क्योंकि इनको मनाने से जीवन में आनन्दरस की प्राप्ति होती है।
हाल के दिनों में दिल्ली के मुख्यमंत्री ने नई राजनीति का दावा करते हुए धरने प्रदर्शन का जो स्वरूप प्रस्तुत किया, उससे हो सकता है कि आम आदमी की पुलिस के प्रति भड़ास को अभिव्यक्ति मिली हो। पर इससे समाधान कोई नहीं निकाल सका। स्वयं को अराजक कहने वाला मुख्यमंत्री यह भूल जाता है कि उसने अपने शपथ ग्रहण भाषण में दावा किया था कि मात्र 48 घंटे में भ्रष्टाचार से जुड़ी अपनी प्रजा की शिकायतों का निपटारा कर देगा। 48 घंटे तो दूर 30 दिनों के बाद भी निपटारे के आसार नजर नहीं आ रहे। मुख्यमंत्री बनने से पहले ही घर पर जनता दरबार लगा लिया। पर जब मुख्यमंत्री बनकर लगाया, तो होश ठिकाने आ गए। भीड़ से घबराकर, अपनी जान बचाने के लिए सचिवालय की छत पर दौड़कर चढ़ना पड़ा। मतलब साफ है कि भीड़ बुलाकर प्रशासनिक समाधान नहीं निकाले जा सकते। फिर रेल भवन के सामने धरना देकर नई राजनीति का दावा करने वाला यह मुख्यमंत्री क्या नहीं जानता था कि इस धरने का कोई औचित्य नहीं है और इससे कुछ नहीं हासिल होगा ?
हर कदम रणनीति के तहत उठाने वाला व्यक्ति मूर्ख नहीं हो सकता। उसने सोचा कि एक तो मीडिया में प्रसिद्धि मिलेगी और दूसरे आमआदमी से जो लम्बे चैड़े दावे किए गए थे, उन्हें पूरा किए बिना ही दोष केंद्र सरकार पर मढ़कर बच भागने का रास्ता निकल जाएगा। जनता भोलीभाली है। पुलिस से नाराज रहती है। वह इसी बात से बहक जाएगी कि हमारा मुख्यमंत्री सड़क पर गद्दे बिछाकर सोता है।
इस नई राजनीति का दंभ भरने वाले एंग्री यंग मैन मुख्यमंत्री क्या यह बताएंगे कि राजस्व का जो विभाग उनके सीधे नियंत्रण में है, उससे भ्रष्टाचार दूर करने में उन्हें क्या दिक्कत आ रही है ? क्योंकि कानून व्यवस्था व पुलिस के मामले में तो वे यह कहकर पल्ला झाड़ सकते हैं कि उनका पुलिस पर कोई नियंत्रण नहीं। पर दिल्ली में अरबों रूपये के सेल्स टैक्स की चोरी खुलेआम रोजाना हो रही है, इसे रोकने की पहल क्यों नहीं करते ? क्योंकि ऐसा करते ही पूरे दिल्ली की जनता एंग्री यंग मैन मुख्यमंत्री के खिलाफ खड़ी हो जाएगी। जो आज सेल्स टैक्स (वैट) दिए बिना ही अरबों का कारोबार करती है। इससे आम आदमी पार्टी का वोट बैंक खिलाफ हो जाएगा।
साफ जाहिर है कि कुछ ठोस कर नहीं सकते तो क्यों न ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ दिया जाए। पर महाराज गलत फंस गए। नौटंकी का सच सामने आ गया। कल तक जो लोग बड़े उत्साह से इस नई राजनीति के दावेदारों के लोक-लुभावने झूठे दावों से आकर्षित होकर इनकी तरफ बिना सोचे समझे भाग रहे थे, वे ठिठक गए। अब तो दिल्ली में चर्चा यह है कि ऐसा व्यक्ति अगर प्रधानमंत्री बन जायेगा, तो वह राष्ट्रपति भवन के सामने धरने पर बैठकर मांग करेगा कि देश की तीनों सशस्त्र सेनाओं को मेरे आधीन कर दो, वरना मैं सरकार इण्डिया गेट से चलाऊंगा। ऐसे देश का शासन नहीं चला करता। बदलाव के लिए क्रान्तिकारी राजनीति का दंभ भरने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन और रूस की क्रान्ति के बाद भी बड़े भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर वहां के समाज में भी कोई बदलाव नहीं आया।
उधर आम आदमी पार्टी का एक भी नेता ऐसा नहीं जिसने गत 10 वर्षों में बड़े भ्रष्टाचार के विरूद्ध कोई प्रभावशाली संघर्ष किया हो। इनका एक ही काम है, सबको गाली देना, सबके प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना, सबको चोर बताना और अपने को सबसे ज्यादा साफ और ईमानदार। पर एक कहावत है ‘घर घर चूल्हे माटी के’। आम आदमी पार्टी के तौर तरीके और इनके आत्मघोषित नेताओं के अहंकार और राजनैतिक अपरिपक्वता को देखकर अब इनके शुभचिंतकों का भी इनसे मोह भंग हो रहा है। उन्हें दिख रहा है कि राजनीति के आतंकवादियों की तरह व्यवहार करने वाली यह पार्टी देश में अराजकता और अस्थिरता पैदा कर देगी।यह मानने वालों की भी कमी नहीं कि आम आदमी पार्टी भारतीय राजनीति को एक ऐसे मुकाम पर ले जाएगी, जब न तो केंद्र में मजबूत सरकार बनेगी और न ही देश की समस्याओं का कोई हल निकलेगा। चूंकि हमें इनके चाल-चलन का बहुत लम्बा अनुभव रहा है, इसलिए हम शुरू से इनके दावों और असलियत के बीच के अंतर को जानते हैं। इसलिए हमने इन्हें कभी भी गंभीरता से नहीं लिया। ये पूरे देश में चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं। पर क्या इससे भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा ? ऐसा कुछ नहीं होगा। केवल इनके संगठन का थोड़ा बहुत विस्तार होगा, जिसकी कीमत आम जनता को एक बार और धोखा खाकर चुकानी पड़ेगी। क्योंकि नारों से आगे बढ़कर ये जनता का कोई भला नहीं कर पाएंगे। उसे कुंए से निकालकर खाई में पटक देंगे। इसलिए राष्ट्रपति ने पहली बार इसी खतरे की ओर ध्यान दिलाया है और ऐसे लोगों को समझदारी से संघर्ष करने की नसीहत दी है।

Monday, January 13, 2014

आम आदमी को निराश कर रहे हैं केजरीवाल

पहले तो इतनी हड़बड़ी थी कि शपथ लेने से पहले ही केजरीवाल ने जनता दरबार लगा लिया। फिर शपथ लेने के बाद जब नहीं संभला तो हड़बड़ाकर 10 दिन की मोहलत मांगी। 10 की बजाय 14 दिन बाद, खूब प्रचार-प्रसार के बाद, 11 जनवरी को जब दोबारा जनता दरबार शुरू किया तो फिर भगदड़ मच गई। मुख्यमंत्री को पुलिस के संरक्षण में जान बचाकर भागना पड़ा। यह एक नमूना है केजरीवाल की अधीरता और अपरिपक्वता का। जनता दरबार का इतिहास अगर आम आदमी पार्टी के नेताओं को पता होता, तो ऐसा बचपना न करते। देश के कई प्रधानमंत्रियों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने जब जब जनता दरबार लगाए हैं, वे बुरी तरह विफल हुए हैं। कारण करोड़ों के इस देश में करोड़ों लोगों की हर समस्या का हल जनता दरबार नहीं हुआ करता। इसके लिए प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त और जिम्मेदार बनाना होता है। जिसके लिए अनुभव की जरूरत होती है। पर सस्ती लोकप्रियता पाने की हड़बड़ी में आम आदमी पार्टी के नेता एक के बाद एक ऐसे ही अपरिपक्व फैसले ले रहे हैं, जिससे दिल्ली की आम जनता के बीच तेजी से निराशा फैल रही है।

शपथ के लिए मैट्रो में आना। मैट्रो के सारे कायदे कानून तोड़कर उसमें अव्यवस्था फैलाना। फिर टैंपो और बसों में दफ्तर आना और विश्वास मत प्राप्त होते ही बड़ी-बड़ी गाड़ियों को लपक लेना ऐसे ही बचकाने फैसले रहे हैं। गाड़ी लेनी ही थी तो पहले ही दिन क्यों नहीं ले ली ? सुरक्षा न लेने की जिद और सादी वर्दी में सुरक्षा के कवच, ये विरोधाभास कब तक चलेगा ? ऐसा नहीं है कि आम आदमी पार्टी से पहले देश में राजनेताओं ने अत्यंत सादगी और सच्चाई का जीवन न जिया हो। ऐसे तमाम उदाहरण हैं। भारत के गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्ता तक छोटे से फ्लैट में रहते रहे। कई मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री आज भी बिना लालबत्ती की गाड़ी के और बिना सुरक्षा के घर से दफ्तर पैदल आते-जाते हैं, जिसका कोई प्रचार नहीं करते। पर अनेक दूसरे झूठे दावों की तरह आम आदमी पार्टी के नेता इन मामलों में भी ऐसे ही झूठे दावे करते आ रहे हैं कि उन्होंने यह काम पहली बार किया।
अरविन्द केजरीवाल को याद होगा कि उन्होंने दिल्ली के आर्य समाज के कार्यालय में जनलोकपाल कानून पर चर्चा करने के लिए उन्होंने एक बैठक बुलाई थी। जिसमें हमने इस कानून की व्यवहारिकता पर सवाल उठाये थे। यह तब की बात है जब इनका जन लोकपाल आंदोलन ठीक से शुरू भी नहीं हुआ था। हमने कहा था कि आपके बनाए जनलोकपाल कानून को लागू करने के लिए कम से कम 2 लाख नए कर्मचारियों की भर्ती करनी पड़ेगी। इस पर कम से कम 50 हजार करोड़ रूपया खर्चा आएगा। फिर ये गारंटी कैसे होगी कि ये 2 लाख कर्मचारी दूध के धुले हों और बने रहें। इसलिए हमने शुरू से अखबारों में अपने लेखों के माध्यम से और टी.वी. चैनलों में केजरीवाल, प्रशांत भूषण, अन्ना हजारे और इनके साथियों के साथ हर बहस में जनलोकपाल कानून की पूरी कल्पना का बार-बार बड़ी मजबूती से विश्लेषण करके इसकी अव्यवहारिकता को रेखांकित किया था। ये वो दौर था जब केजरीवाल की पहल पर दुनियाभर में इनके समर्थक ‘मैं अन्ना हूं’ की टोपी लगाकर घूम रहे थे। उस वक्त इनसे जूझना ऐसा था मानो मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया जाए। अतीत से बेखबर युवा पीढ़ी को भ्रमित करके केजरीवाल एंड पार्टी ने इतने सब्जबाग दिखा दिए हैं कि उन्हें इनके विरूद्ध सही बात सुनना भी उन्हें गंवारा नहीं होता। पर हम हमेशा वेगवती लहरों से जूझते आए हैं और बाद में समय ने यह सिद्ध किया कि हम सही थे और भीड़ की सोच गलत।
यह बात यहां इसलिए जरूरी है कि भ्रष्टाचारविहीन शासन का दावा करने वाले केजरीवाल के गत 3 सप्ताह के शासन में भ्रष्टाचार के विरूद्ध सिवाय बयानबाजी और नारेबाजी के कुछ ठोस नहीं हुआ। अब जनता को अगर स्टिंग ही करना पड़ेगा, तो जनता अपना काम कब करेगी और फिर मोटे वेतन लेने वाला प्रशासन क्या काम करेगा? जबकि केजरीवाल का दावा था कि वे 48 घंटे में शासन को जनता की शिकायतों के प्रति उत्तरदायी बना देंगे। जबकि हालत यह है कि वे शिकायतियों की भीड़ को संभालने की भी व्यवस्था भी नहीं बना पाए। सोचो अगर 122 करोड़ लोग जनलोकपाल को शिकायत भेजेंगे तो उन शिकायतों को जांचने और परखने और उनकी गंभीरता का मूल्यांकन करने में कितना लम्बा समय लगेगा ? कितनी दिक्कत आएगी ? इससे कितनी निराशा फैलेगी, इसका अंदाजा केजरीवाल को नहीं है। इस सबके बावजूद भी शिकायतों के मुकाबले समाधान नगण्य रहेंगे। यह पूरी सोच ही केवल आम जनता की दुखती नब्ज पर हाथ रखकर, उसे छलावे में डालकर, सब्जबाग दिखाकर अपना उल्लू सीधा करने की है, जो आज हो रहा है। हालात इससे और बदतर होंगे, क्योंकि शिकायत करने वालों का जनसैलाब जब बढ़ेगा, तो केजरीवाल प्रशासन के लिए हर शिकायत को जांचना, समझना और समाधान देना दुश्कर होता जाएगा और इससे जनता में और हताशा फैलेगी।
माना कि आम आदमी पार्टी के नेता लोकसभा चुनाव पर दृष्टि रखकर हड़बड़ी में लोक लुभावने काम करने का माहौल बना रहे हैं। पर उससे जो हताशा फैल रही है, उसकी तरफ उनका कोई ध्यान नहीं है। आज आम आदमी और कांग्रेस के समर्थन ने केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाया है। दो हफ्ते के भीतर ही दिल्ली के आम आदमी की छोटी-छोटी और जायज शिकायतें सुनने का प्रबंध भी नहीं हो पाया। जरा सोचिये कि उस आम आदमी की क्या मानसिक स्थिति होगी, जिसने अपनी भावनाएं आम आदमी पार्टी पर न्यौछावर कर दी थीं। दुख और चिंता इस बात की है कि आम आदमी का जो मोहभंग इतनी जल्दी हो गया है, तो अब उसके पास किसी पर विश्वास करने का कौन सा मौका बचेगा ? बीसियों साल से समाज की जटिल समस्याओं को समझने और उनके समाधान में जुटे सामाजिक कार्यकर्ताओं और विद्वानों के लिए क्या अब अपना काम करने में बड़ी मुश्किल खड़ी नहीं हो गई है ?
वक्त अभी भी नहीं गुजरा। अभी भी केजरीवाल अपने काम का तरीका सुधार सकते हैं। बशर्ते कि भावनाओं के आवेग को छोड़कर सबसे पहले राजनीतिक इतिहास और अब तक के राजनीतिक ज्ञान पर एक बार गौर कर लें और फिर जो भी घोषणा प्रेस के सामने करें उसका आगापीछा सोचकर करें। सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए नहीं।

Monday, January 6, 2014

हताशा नहीं उत्साह की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों से देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, मानो भारत गड्ढे में जा रहा हो। हर ओर केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला, गरीबों से हमदर्दी का नाटक और राहत, सब्सिडी, बेरोजगारी भत्ते जैसे झुनझुने थमाकर देश को नाकारा बनाया जा रहा है। जबकि जमीनी हकीकत कुछ और है। 1947 में जब देश आजाद हुआ, तब वाकई हमारे पास न तो संसाधन थे, न आधारभूत ढांचा, न इतना योग्य युवा वर्ग और न ही बहुत सारे उद्यमी। औपनिवेशिक साम्राज्य के शिकंजे में जकड़ा भारत मध्ययुगीन जीवन जी रहा था। लेकिन आज आजादी के 66 साल बाद भारत दुनिया के खास देशों की कतार में खड़ा है। आज हमारे पास आधारभूत ढांचा है, विज्ञान और तकनीकि की समझ और एक से एक काबिल लोगों का भंडार है। उद्योगपतियों की एक लंबी कतार है, जो दुनिया के दूसरे देशों में भी निवेश कर रही है और पढ़ा-लिखा उत्साही युवा वर्ग ऊर्जा से भरपूर है। ऐसे में अब सोचने की जरूरत है कि हम केवल कमियां खोजते रहे या समाज में आगे बढ़ने की ललक पैदा करें। 

जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है, इससे सब दुखी हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि हम दूसरे के भ्रष्टाचार को देखकर दुखी होते हैं, लेकिन जब अपनी बारी आती है, तो अपनी सुविधा का त्याग करने की कीमत पर भ्रष्टाचार से परहेज नहीं करते। दो दशक तक सत्ता के शिखर पर भ्रष्टाचार से लड़ते हुए मैंने अनुभव किया कि समाज का कोई वर्ग, मीडिया और न्यायपालिका तक, इससे अछूते नहीं हैं। इसके साथ ही यह भी जानकर आश्चर्य हुआ कि दुनिया का शायद ही कोई देश हो, जो भ्रष्टाचार से पूरी तरह अछूता हो। जिस साम्यवादी चीन की प्रशंसा करते बुद्धिजीवियों के मुंह नहीं थकते, उसी चीन में सत्ता के शीर्ष पर भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। इसलिए यह समझ बनीं कि जहां एक ओर भ्रष्टाचार से लड़ाई जारी रखी जाए। वहीं कुछ सकारात्मक करके भी दिखा जाए। आज इसी बात की सबसे ज्यादा जरूरत है। 

इस लेख के पाठकों से मैं यह प्रश्न पूछना चाहता हूं कि वे अखबार पढ़ते हैं, टीवी समाचार देखते हैं और फिर व्यवस्था की बुराई करते हैं। पर आपमें से कितने लोग ऐसे हैं, जो अपने घर के दरवाजे के बाहर से लेकर देश के बाकी हिस्सों तक अपनी क्षमता के अनुसार बिगड़ी व्यवस्थाओं को सुधारने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं ? हमारे घर में कूड़ा हो, तो पड़ोसी साफ करने नहीं आता। हमें ही करना होता हैै। तो हमारे समाज और देश में कहीं कुछ गलत हो रहा है तो उसे ठीक करने कोई पाकिस्तान से तो आयेगा नहीं ? मुझे लगता है कि जहां देश में उंगली उठाने वाले ज्यादा आक्रामक और भड़काऊ हो रहे हैं। वहीं व्यवस्थाओं को सुधारने वालों को भी एकजुट होकर एक वैकल्पिक मंच तैयार करना चाहिए और सार्थक समाधानों को लागू करवाने के लिए व्यवस्था और अपने परिवेश पर दवाब बनाना चाहिए। इसके दो लाभ होंगे एक तो हमारी इच्छा के अनुरूप हमारे परिवेश में बदलाव का माहौल बनेगा, दूसरा हमारी अतिरिक्त ऊर्जा का सदुपयोग राष्ट्र के निर्माण में होगा। जिससे समस्याएं भी घटेंगी और हमारा जीवन भी और सुखी होगा। 
यह जिम्मेदारी गम्भीर मीडियाकर्मियों की, बुद्धजीवियों की, अधिकारियों की और राजनेताओं की है कि वे उंगली उठाना छोड़कर समाधानों को लेकर शोर मचाएं और अपनी बात मनमाने के लिए दवाब बनाएं। ऐसा करने से एक हवा बनेगी, माहौल गर्म होगा और व्यवस्था पर भी दवाब बनेगा। ऐसा दवाब जिसमें बिना लागत के निरंतरता की संभावना होगी। जिससे स्थायी समाधान खोजे जा सकते हैं। 

कभी हम लोकनायक जयप्रकाश नारायण से देश के हालात सुधारने की उम्मीद करते हैं। कभी हम वीपी सिंह के लिए कहते हैं ‘‘राजा नहीं फकीर है, भारत की तकरीर है’’, कभी हम टीएन शेषन को देश का मसीहा मान बैठते हैं और बार हमारा मोहभंग होता है, फिर निराशा होती है। 10-20 वर्ष फिर एक मसीहा के इंतजार में गुजर जाते हैं। अब हम सोच रहे हैं कि केजरीवाल जादू की छड़ी घुमा देंगे। जबकि वे शपथ ग्रहण में खुद ही कह चुके हैं कि मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। यह हमें तय करना है कि हम सुबह से रात तक अपनी ऊर्जा का कैसा उपयोग करते हैं। रोजी रोटी के लिए तो सभी दौड़ते हैं। पर अपने परिवेश को सुधारने के लिए जो भी प्रयास हम करते हैं, उससे पूरे समाज को एक शुभ संकेत मिलता है, प्रेरणा मिलती है और आगे का मार्ग दिखायी देता है। दुख की बात यह है कि आज यह काम न तो हमारा राजनैतिक नेतृत्व कर रहा है और न ही बौद्धिक नेतृत्व। टेलीविजन चैनलों पर सारा समय गाली-गलौज देने में निकल जाता है, मानो देश में कुछ शुभ घट ही न रहा हो। यह आत्मघाती रवैया है। इससे बचना चाहिए और हमें अपने देश को, अपने समाज को, अपने परिवार को आगे बढ़ाने के लिए एक सकारात्मक सोच को अपनाना चाहिए। इसी में हम सब का भला है। 

Monday, December 30, 2013

अब होगी केजरीवाल की असली परीक्षा

अरविन्द केजरीवाल ने जिस रामलीला मैदान से देशव्यापी भ्रष्टाचार के विरूद्ध दो बरस पहले बिगुल बजाया था। वहीं दो बरस बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पानी मुफ्त मिले या न मिले, बिजली के दाम घटें या न घटें, ये तो ऐसे वायदे हैं जो हर राजनेता चुनाव के पहले करता है। कुछ पूरे होते हैं, कुछ नहीं होते। तमिलनाडु में जयललिता टीवी और सोना बांटतीं हैं, अखिलेश यादव लैपटॉप और हरियाणा सरकार किसानों को पानी व बिजली। दिल्ली में जल की सीमित उपलब्धता को देखते हुए हो सकता है कि अरविन्द 700 लीटर मुफ्त जल हर परिवार को न दे पाएं। पर जिस मुद्दे पर वे चर्चा में आए और आज यहां तक पहुंचे, वही मुद्दा सबसे अहम है और वह है भ्रष्टाचार का। शपथ लेने के बाद भाषण में अरविन्द ने दिल्ली की जनता का आह्वान किया कि वो रिश्वत मांगने वालों को उनसे शिकायत करके पकड़वायें। अब यह नारा बहुत लुभावना है, पर हकीकत क्या है। एक मुख्यमंत्री और उसका सचिवालय दिनभर में भ्रष्टाचार की कितनी शिकायतें सुन सकता है और उन्हें निपटा सकता है। शिकायत दर्ज कराना, जांच करना और दोषी को सजा देना यह प्रतीकात्मक रूप से तो हो सकता है, लेकिन व्यापक रूप से करने के लिए जितनी बड़ी मशीनरी की जरूरत होगी, वो अभी दिखायी नहीं देती।
 डेढ़ करोड़ की दिल्ली की आबादी 70 विधानसभा क्षेत्रों में बंटी है और अगर हर विधानसभा क्षेत्र के सरकारी कर्मचारियों की रिश्वतखोरी बंद करनी है तो एक विधानसभा क्षेत्र में कम से कम एक हजार सतर्क निगहबान लोग चाहिए। ऐसे लोग जो किसी कीमत पर भ्रष्ट न हों और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कमर कस लें। यानि आम आदमी पार्टी को 70 हजार ऐसे स्वयंसेवक चाहिए, जो दिल्ली की डेढ़ करोड़ जनता की शिकायतों को फौरन सुनें और उनको हल कराने में जुट जाएं। ऐसे लोग कहां से आएंगे और बिना वेतन के कब तक काम कर पाएंगे ? अगर ऐसा हो जाता है कि तो वह वास्तव में जनक्रांति होगी।
जहां तक दिल्ली के मुख्यमंत्री के अधिकारों का सवाल है, तो पुलिस और दिल्ली विकास प्राधिकरण जैसे महत्वपूर्ण विभाग मुख्यमंत्री के अधीन नहीं हैं। पर जल, बिजली और वित्त विभाग तो हैं ही, जिन्हें केजरीवाल ने अपने अधीन रखा है।
अब वित्त विभाग के दायरे में बिक्री कर विभाग आता है। जो दिल्ली का सबसे भ्रष्ट विभाग है। उल्लेखनीय है कि चांदनी चैक के कटरों में ही पूरे उत्तर भारत का व्यापारी रोज आता है और अरबों रूपये की खरीद रोज होती है। ये सारी खरीद दो नंबर के खाते में होती है। चाहें सोने हों, चाहें कपड़ों, बिजली का सामान हो, मेवा हो, किराना हो, प्रसाधन सामिग्री हो या फिर अन्य उपभोग की वस्तुएं। ये माल अवैध तरीके से बसों, ट्रेनों, कारों के माध्यम से रोज दिल्ली से उत्तर भारत के शहरों और कस्बों में भेजा जाता है। जिस पर कोई बिक्री कर नहीं दिया जाता है। इस तरह दिल्ली सरकार के अधिकारियों एवं पुलिस वालों की मिलीभगत से अरबों रूपये के राजस्व की हानि होती है। चूंकि यह विभाग सीधे केजरीवाल के अधीन है, तो इसे दुरूस्त करना उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इससे दो लाभ होंगे, एक तो इस बात की परीक्षा हो जाएगी, अरविंद केजरीवाल के आह्वान पर दिल्ली की जनता न रिश्वत देगी, न लेगी, न सेल्स टैक्स चोरी करेगी, बल्कि हर सामान पर बिक्री कर चुकाकर पक्की रसीद लेगी। दूसरा लाभ ये होगा, इससे दिल्ली सरकार के कोष में एकदम से आमदनी कई गुना बढ़ जाएगी। फिर उस आमदनी से केजरीवाल गरीब वर्ग को सब्सिडी भी दे सकते हैं। हां, एक नुकसान जरूर होगा कि जैसे ही दिल्ली के बाजारों में अवैध कारोबार बन्द होगा और कर देकर क्रय और विक्रय किया जाएगा, वैसे ही महंगाई तेजी से बढ़ जाएगी। पर भ्रष्टाचार से लड़ने की यह कीमत तो केजरीवाल और दिल्ली की जनता को चुकानी होगी।
केजरीवाल के अब तक के वक्तव्यों में दो बातों पर लगातार जोर रहा है कि देश की बर्बादी के लिए भ्रष्टाचार मूल कारण है। वे और उनकी सरकार भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकेगे और दोषियों को फौरन जेल में डाल देंगे। ऐसी घोषणाएं अरविंद ने खुले मंचों से बार-बार की हैं। अब उनकी परीक्षा का समय आ गया है। दिल्ली की जनता, मीडिया और विपक्षीय दल उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं कि केजरीवाल सरकार कितने भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं को आने वाले दिनों में जेल पहुंचाती है। विश्वासमत पारित हो या न हो केजरीवाल की टीम को इसकी परवाह नहीं है। उन्होंने जनता की अपेक्षाओं को इस तरह पकड़ा है कि अभी कुछ महीनों तक इसी प्रवाह में गाड़ी खिच जाएगी और लोकसभा चुनाव आ जाएगा। अरविंद के कॉलेज के साथी यह बताने में संकोच नहीं करते कि अरविंद का बचपन से सपना प्रधानमंत्री बनने का रहा है। आज जो हवा चल रही है और दिल्ली से अरविंद जो संदेश दे रहे हैं, उससे यह असंभव नहीं लगता कि आगामी लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी महानगरों और अन्य नगरों से इतने सांसद चुनकर ले आए कि अगली सरकार वे एक निर्णायक भूमिका निभा सकें। ऐसी स्थिति में जब चंद्रशेखर, आई0के0 गुजराल व देवगौड़ा जैसे प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो अरविंद केजरीवाल क्यों नहीं ? पर सवाल है कि जनलोकपाल विधेयक की लड़ाई और ये सारा तेवर क्या प्रधानमंत्री पद की प्राप्ति तक ही सिमट कर रह जाएगा या भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने के केजरीवाल के दावे और बयान उन्हें अपना फर्ज बार-बार याद दिलाते रहेंगे और वे इसके लिए एक दिन भी इंतजार नहीं करेंगे। अगर केजरीवाल मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए पहले दिन से भ्रष्टाचार पर प्रभावी लगाम कस पाते हैं और जनता उनसे प्रेरणा लेकर भ्रष्टाचार न करने का संकल्प ले लेती है, तो वास्तव में भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक एतिहासिक उपलब्धि होगी। पर असल में क्या होता है यह आने वाले कुछ हफ्तों में साफ हो जाएगा।

Monday, December 23, 2013

अनूठा रहेगा केजरीवाल का प्रयोग

अगर जनमत संग्रह की बात मानें तो केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन रहे हैं, जिसके लिए उन्हें बधाई। क्योंकि एक ही साल में राजनैतिक दल बनाकर इस सफलता को पाना कोई सरल काम न था। पत्रकारों की छोड़िये राजनैतिक दल तक आम आदमी पार्टी (आ.आ.पा.) की दिल्ली में आम लोगों के बीच लोकप्रियता का पूर्वानुमान नहीं लगा सके। दरअसल केजरीवाल लोगों को यह बात समझाने में सफल रहे कि कांग्रेस और बीजेपी एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। इसलिए चाहे उन्होंने असंभव को संभव बनाने के दावे किए हों या बढ़ चढ़कर अपनी उपलब्धियों के दावे किए हों, कुल मिलाकर यह साफ है कि वे आम आदमी को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। अब जब काफी उधेड़बुन के बाद केजरीवाल दिल्ली में सरकार गठन का निर्णय लेने जा रहे हैं, तब भी लोगों के मन में आशंका है कि वे कितने सफल हो पाएंगे ? कांग्रेस और भाजपा कुछ ज्यादा ही आक्रामक तेवर अपना रहे हैं। वे ये सिद्ध करना चाहते हैं कि केजरीवाल सरकार चलाने में विफल हो जाएंगे। जबकि केजरीवाल का यह पलटवार कि वे न सिर्फ सरकार बनाएंगे, बल्कि उसे अच्छी तरह चलाकर भी सिखाएंगे, इन राजनेताओं के मन में अपनी स्थिति को लेकर संशय पैदा कर रहा है। 

केजरीवाल यह अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वे विफल हुए तो जमे हुए राजनैतिक दल उनकी बोटी नोंच लेंगे और अगर वे सफल हुए तो कई महानगरों में इनके प्रत्याशी लोकसभा का चुनाव जीत सकते हैं। इसलिए उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार कर ठीक किया है। हमने पिछले हफ्ते इसी कॉलम में लिखा था कि अगर केजरीवाल सरकार बनाते हैं और कुछ महीने के लिए ही सही कुछ अनूठा कर दिखाते हैं, तो उनको आगे बढ़ने के रास्ते खुलते जाएंगे। हो सकता है कि वे बिजली और पानी की कीमतों को लेकर अपने दावे निकट भविष्य में पूरे न कर पाएं, पर लोकप्रिय चाल चलन से नायक फिल्म के अनिल कपूर की तरह दिल्ली की गलियों और झुग्गियों में हड़कंप तो मचा ही सकते हैं। हमारे हुक्मरानों ने आजादी के बाद अपने को आम आदमी से इतना दूर कर लिया है कि केजरीवाल के छोटे-छोटे कदम भी उसे प्रभावित करेंगे, जैसे बिना लालबत्ती की गाड़ी में चलना। अगर मीडिया पहले की तरह केजरीवाल को प्रोत्साहित करता रहा, तो इन कदमों की चर्चा देशभर में होगी। जिससे पूरी राजनैतिक जमात में हड़कंप मचेगा। क्योंकि राजनेताओं की वीआईपी संस्कृति देश के हर हिस्से में आम लोगों की आंखों में किरकिरी की तरह चुभती है। पर वे इसे बदलने में असहाय हैं। यह पहल तो राजनेताओं को ही करनी चाहिए थी। वे चूक गए। अब केजरीवाल उन्हें नयी राह दिखाएंगे। 

जब से दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे आए हैं, कांग्रेस और भाजपा दोनों के नेता दबी जुबान से यह स्वीकार करते हैं कि केजरीवाल के तौर तरीकों ने पारंपरिक राजनीति की संस्कृति को एक झटका दिया है। विधायकों की खुली खरीद न होना इसका एक प्रमाण है। अलबत्ता वे यह कहने में नहीं चूक रहे कि आलोचना करना और सपने दिखाना आसान है बमुकाबले कुछ करके दिखाने के। इसलिए वे तमाम तरह की संभावित समस्याओं का हौवा खड़ा कर रहे हैं। केजरीवाल की यह बात सही है कि अगर मन में ईमानदारी हो और कुछ नया करने का जुनून तो सरकार चलाना कोई मुश्किल काम नहीं। खैर यह तो समय ही बताएगा कि वे अपने इस दावे में कहा तक सफल होते हैं। 

आजादी के बाद आज तक किसी भी दल का घोषणा पत्र उठाकर देख लो तो साफ हो जाएगा कि उसमें चैथाई वायदे भी पहले तीन चार साल में पूरे नहीं किए जाते। फिर ये राजनेता केजरीवाल से क्यों उम्मीद कर रहे हैं कि वे मुख्यमंत्री की शपथ लेते ही जादू की छड़ी घुमा देंगे। शायद इसका कारण खुद आम आदमी पार्टी (आ.आ.पा.) के नेतृत्व की वह बयानबाजी है, जिसमें कई बार शालीनता की सीमाओं को लांघकर अहंकारिक वक्तव्यों ने अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ा। उनके बड़बोलेपन ने ही आज उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है, क्योंकि उन्होंने न सिर्फ दिल्ली की आम जनता को सपने दिखाए, बल्कि उसे अति अल्प समय में पूरा करने का भी वायदा किया। इसलिए उन पर दवाब ज्यादा है। भ्रष्टाचार के विरूद्ध आम आदमी पार्टी (आ.आ.पा.) इतना शोर मचाने के बावजूद अभी तक कुछ भी हासिल न कर पायी है। पर इतना जरूर है कि एक नौजवान ने हिम्मत करके पूरी राजनैतिक व्यवस्था के सामने एक विकल्प तो खड़ा करके दिखा ही दिया है। हमें इस नौजवान का उत्साहवर्धन करना चाहिए और आशा करनी चाहिए कि वह हिन्दुस्तान की तस्वीर भले ही न बदल पाए, राजनेताओं को उनके तौर तरीके बदलने पर मजबूर जरूर करेगा। 

Monday, December 16, 2013

केजरीवाल जी, जिम्मेदारी से मत भागिए

सरकार न बनाने का केजरीवाल जो भी कारण बतायें या सरकार बनाने कि जो भी शर्तें रखें, एक बात तो साफ़ दीख रही है कि उनकी टीम ज़िम्मेदारी लेने से भाग रही है | दरअसल किसी कि आलोचना करना और उस पर ऊँगली उठाना सबसे सरल काम है | पर कुछ करके दिखाना बहुत मुश्किल होता है | ऊँगली उठाने वाले को केवल सामने वाले कि गलतियाँ ढूंढने का हुनर आना चाहिये, फिर वो टीवी चैनल पर शोर मचा सकता है, अख़बारों में लेख लिख सकता है और मौहल्लों कि जन सभाओं में जा कर ताली या वोट बटोर सकता है | पर काम करने वाले को हजारों मुश्किलों का सामना करना पड़ता है | फिर भी अगर वो हिम्मत नहीं हारता और काम करके दिखने में जुटा रहता है तो भी उसके आलोचक कम नहीं होते | उसे सफलता मिले या न मिले वो बाद कि बात है | पर कहावत है कि ‘गिरते हैं शै सवार ही मैदान ए जंग में, वो क्या लड़ेंगे जो घुटनों के बल चले’ | अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव लड़ने का झोखिम तो बहादुरी से उठाया और अपेक्षा से ज्यादा सफलता भी हासिल की पर सरकार बनाने में वे जोखिम लेने से डर रहे हैं |
कारण साफ़ है | चुनाव लड़ते वक्त रणनीति होती है कि विरोधियों पर हमला बोलो और मतदाताओं को बड़े-बड़े सपने दिखाओ | केजरीवाल ने ये दोनों काम बड़ी कुशलता से करे हैं | पर अब परीक्षा कि घड़ी है| सरकार बना लेते हैं और वायदे पूरे नहीं कर पाते तो मतदाता इन्हें दौड़ा लेगा | अपने वायदे पूरे करना गधे के सिर पर सींग उगाने जैसा है | इसलिए कांग्रेस और भाजपा आआपा को बिना शर्त समर्थन देने को तैयार हैं | इन्हें विश्वास है कि केजरीवाल सरकार बना कर जल्दी ही विफल हो जाएंगे | पर ऐसा हो यह ज़रूरी नहीं | अगर केजरीवाल सफल हो गए तो पूरे उत्तर भारत में पुराने दलों को चुनौती देंगे | अगर विफल हो गए तो एक बुलबुले कि तरह फूट जाएंगे |
आआपा का यह कहना गलत नहीं है कि ये दल कुछ समय बाद छल करके उसकी सरकार गिरा देंगे | पर योद्धा ऐसी आशंकाओं से डरा नहीं करते | अगर सरकार गिरने कि नौबत आ भी जायेगी तो केजरीवाल तब तक अपने जितने वायदे पूरे कर पाएंगे उन्ही के आधार पर संसदीय चुनाव लड़ सकते हैं | पर केजरीवाल को मालूम है कि बंद मुठ्ठी लाख की खुल गयी तो खाक  की | इसलिए वे अपनी लोकप्रियता के घोड़े पर चढ़ कर संसद में प्रवेश करना चाहते हैं | वे संसदीय चुनाव तक अपनी मुठ्ठी खोलना नहीं चाहते | इस सबसे न सिर्फ दिल्ली के मतदाताओं में असमंजस बना हुआ है बल्कि राजनैतिक पारिदृश्य में भी अनिश्चितता है |
इससे तो यही लगता है कि टीम केजरीवाल का मकसद केवल हंगामा खड़ा करना है | लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे तमाम उदहारण है जब व्यवस्था पर हमला करने वाले अपनी इसी भूमिका का मज़ा लेते हैं और अपनी आक्रामक शैली के कारण चर्चा में बने रहते हैं | पर वे समाज को कभी कुछ ठोस दे नहीं पाते, सिवाए सपने दिखने के | ऐसे लोग समाज का बड़ा अहित करते हैं| हाल के वर्षों में भारत और दुनियां के कई देशों में जहाँ-जहाँ ऐसे समूह वाचाल हुए वहां वहां सुधरा तो कुछ नहीं, जो चल रहा था वह भी पटरी से उतर गया | उन समाजों में हिंसा, अपराध, बेरोज़गारी व आर्थिक अस्थिरता पैदा हो गयी है | हालात बद से बदतर हो गए हैं| दरअसल हंगामा करने वाले समूह अंत में केवल अपना भला ही करते हैं | चाहे दावे वो कितने भी बड़े करें | अब लोकपाल विधेयक को ही ले लें, अन्ना सरकारी विधेयक से संतुष्ट हैं मगर आआपा इसे जोकपाल बता रही है | जबकि हम पिछले तीन वर्षों से डंके की चोट पर कहते आ रहे हैं कि केजरीवाल का जनलोकपाल भी देश में  भ्रष्टाचार कतई नहीं रोक पायेगा | क्यूंकि उनके इस विधेयक को बनाने वाले ही न केवल भ्रष्ट हैं बल्कि उन्होंने आज से २० वर्ष पहले भ्रष्टाचार के विरुद्ध भारत के सबसे बड़े संघर्ष को सफलता की अंतिम सीढ़ी से नीचे गिराने की गद्दारी की थी | गाँधी की समाधी पर शपथ ले कर धरने देने वाले केजरीवाल को यह नहीं भूलना चाहिए कि दोहरे चरित्र के लोग अशुद्ध साधन जैसे हैं उनसे शुद्ध साध्य प्राप्त नहीं कर सकते |
पूरी दिल्ली उनके साथ न हो पर तिहाही दिल्ली का समर्थन जुटा कर अब जब केजरीवाल ने चुनावी मैदान में बाजी मार ही ली है तो सरकार बना कर अपने वायदे पूरे करने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिए | जब प्यार किया तो डरना क्या | जनता समाधान चाहती है – कोरे वायदे और सपने नहीं | वह बहुत दिन तक धीरज नहीं रख पाती |

Monday, November 25, 2013

झूठे दावे क्यों कर रहे हैं केजरीवाल ?

पुरानी कहावत है कि, ‘पूत के पांव पालने में’। केजरीवाल की आआपा अपने चुनाव प्रचार में झूठे दावे करने वाले एसएमएस भेज कर युवा पीढ़ी को गुमराह कर रही है। 13 नवंबर 2013 को ऐसा ही एक एसएमएस दिल्ली के  मतदाताओं को भेजा गया। जिसमें दावा किया गया कि आआपा ने भारत के इतिहास में पहली बार सीबीआई की स्वायत्तता का मुद्दा उठाया। पहली बार राजनैतिक चंदे में पारदर्शिता का मुद्दा उठाया। पहली बार राजनीति के अपराधिकरण के खिलाफ आवाज उठाई और पहली बार चुने हुए उम्मीदावारों को मतदाता द्वारा वापिस बुलाने की मांग उठाई। आआपा के ये सभी दावे 101 फीसदी झूठे हैं। युवा पीढ़ी आधुनिक भारत का इतिहास नहीं जानती। इसलिए केजरीवाल और उनके साथी इस पीढ़ी को गुमराह कर रहे हैं जिससे उनकी छवि देश में एक महान क्रांतिकारी की बन सके। जबकि सच्चाई यह है कि सीबीआई की स्वायत्त्ता का मामला 1993 से लगातार हम उठाते आ रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय से लेकर मीडिया और संसद तक सीबीआई की स्वायत्तता का जिक्र सर्वोच्च न्यायालय के ‘विनीत नारायण बनाम भारत सरकार’ फैसले के साथ ही अदालतों, संसद व मीडिया में किया जाता है।  यह बात पूरा देश जानता है। फिर केजरीवाल का यह झूठा दावा क्यों ? सबसे जोर-शोर से 1994 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने राजनैतिक दलों की आमदनी और खर्चे की पारदर्शिता के लिए कठोर कदम उठाए थे जिनकी चर्चा उसके बाद लगातार होती रही है। 1994 में ही दिल्ली के आईएएस अधिकारी के.जे. एलफांस की एनजीओ जनशक्ति ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर यह मांग की थी कि हर चुनावी दल को अपनी आमदनी-खर्चे का आडिट करवाकर चुनाव आयोग व आयकर विभाग को देना चाहिए। ऐसा न करने वाले दलों की मान्यता निरस्त कर दी जानी चाहिए। तब इस मामले पर देश में भारी शोर मचा था। फिर केजरीवाल इन मुद्दों को पहली बार उठाने का झूठा दावा क्यों कर रहे हैं ?

राजनीति में अपराधीकरण को रोकने की मांग पिछले 3 दशक में अनेक बार जोर-शोर से उठाई गई है। इस पर संसद के विशेष सत्र भी बुलाए गए हैं। फिर केजरीवाल क्यो झूठा दावा कर रहे हैं ? इसी तरह चुने हुए प्रत्याशियों को मतदाताओं द्वारा वापिस बुलाने के अधिकार की मांग 1975 में लोक नायक जयप्रकाश नारायण ने उठाई थी। तब से अनेके संगठन और जागरूक नागरिक यह मांग अलग-अलग स्तर पर उठाते रहे हैं। फिर केजरीवाल झूठा दावा क्यों कर रहे हैं ?

भारतीय आयकर अधिकारियों के संघ ने एक खुला पत्र भेजकर केजरीवाल से पूछा है कि वे यह झूठा दावा क्यों कर रहे हैं कि वे आयकर विभाग में आयुक्त थे और करोड़ों कमा सकते थे। जबकि वे कभी भी आयुक्त पद पर नहीं रहे और ना ही उनके बैच का कोई व्यक्ति अभी तक आयुक्त बन पाया है। इतने ऐतिहासिक तथ्यों को छिपा कर और खुलेआम झूठे दावे करके केजरीवाल इतिहास के साथ छेड़छाड़ और भारत की जनता के साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं। इतना ही नहीं जहां उन्हें लगता है कि उनसे भी बड़े संघर्ष उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार के खिलाफ हो चुके हैं तो वे उसका जिक्र तक नहीं करना चाहते। इंडिया अगेन्स्ट करप्शन ने यू-ट्यूब पर 2010 में एक फिल्म डाली जिसमें आजाद भारत के सभी घोटालों का संबंधित वर्ष के साथ उल्लेख किया गया है। पर आश्चर्य की बात यह है कि इस फिल्म में 1996 का देश का सबसे बड़ा घोटाला हवाला कांड गायब है। जिसमें देश के 115 राजनेताओं और अफसरों को आजाद भारत के इतिहास में पहली बार भ्रष्टाचार के मामले में चार्जशीट किया गया। शायद केजरीवाल और डा0 योगेन्द्र यादव जैसे उनके साथी आत्मसम्मोहित हैं कि कहीं उनके आंदोलन की तुलना हमारे हवाला संघर्ष से हो गई तो उन्हें जवाब देना भारी पड़ जाएगा। केजरीबाल ने पिछले 36 महीने में भ्रष्टाचार से लड़ने के नाम पर करोड़ा रूपया खर्च कर दिया। टीवी चैनलों पर हजारों घंटे अपना राग अलाप लिया। देश के हजारों युवाओं को इस आंदोलन में झोंक दिया और फिर भी उनका दल भ्रष्टाचार के नाम पर एक चूहे तक को नहीं पकड़ सका। जबकि बिना टीवी चैनलों के हुए, बिना पैसा खर्च किए, बिना बड़े-बड़े दावे किए, बिना लोकपाल कानून बने और बिना सीबीआई को स्वायत्तता मिले हमने 28 महीने में ही देश के 115 ताकतवर नेताओं को पकड़ावा दिया था।

साफ जाहिर है कि केजरीवाल और उनकी टीम का इरादा येन-केन-प्रकारेण अपना प्रचार करना और राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी करना रहा है। हाल में हुए स्टिंग आॅपरेशन ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। कुल मिलाकर केजरीवाल का आंदोलन अपनी अति महत्वाकांक्षओं को पूरा करने के लिए रहा है। इससे जनता को आज तक कोई लाभ नहीं मिला। केवल हताशा और निराशा फैली है। जब केजरीवाल और उनकी टीम इतनी भी ईमानदारी नहीं  िकवे ऐतिहासिक तथ्यों को बिना तोड़े-मरोड़े प्रस्तुत कर सकें तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि सत्ता में आने के बाद उनकी कथनी और करनी में भेद नहीं होगा। असम गण परिषद के छात्र नेताओं आसाम की जनता को सपने दिखा कर आसाम का चुनाव जीता था। पर बाद में वहां लूट का तांडव शुरू हो गया। ऐसी ही दशा आआपा की भी हो सकती है, इसकी संभावना से कौन इंकार कर सकता है ?

यह दुःख की बात है कि इतना बड़ा आंदोलन खड़ा करके केजरीवाल ने अपने समर्थकों को निराश और हताश किया है।
 

Monday, October 28, 2013

दिशा से भटक गए केजरीवाल

जब दिल्ली प्रदेश भाजपा ने डा. हर्षवर्धन गुप्त को दिल्ली के विधानसभा चुनावों के लिए अपना मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित त किया तो अरविन्द केजरीवाल का कहना था कि डा.हर्षवर्धन एक भ्रष्ट नेता हैं, चूंकि उन्होंने कभी भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज नहीं उठाई। केजरीवाल यह बयान न सिर्फ हास्यापद है, बल्कि आम आदमी पार्टी के मानसिक दिवालियापन का परिचायक भी। दिल्ली की राजनीति में थोड़ी भी रूचि रखने वाले पत्रकार और आम लोग यह जानते हैं कि डा.हर्षवर्धन की छवि एक भले इंसान की है। दरअसल उनकी जैसी छवि वाले राजनेताओं का भारत की राजनीति में काफी टोटा है। अगर केजरीवाल का यह तर्क मान लिया जाए तो आम आदमी पार्टी की बुनियाद ही अनैतिक आचरण वालों के हाथों से हुई है। यह बात केजरीवाल अच्छी तरह जानते हैं कि 20 वर्ष पहले 1993 में देश की पूरी राजनैतिक व्यवस्था के खिलाफ भ्रष्टाचार और आतंकवाद को लेकर हवाला कांड की जो लड़ाई लड़ी गई, उसमें केजरीवाल के अहम सहयोगियों ने अनैतिक भूमिका निभाकर इस लड़ाई को विफल करने का घिनौना कार्य किया था। यह बात केजरीवाल के लोकपाल बिल के आंदोलन से पहले ही मैंने उन्हें एक निजी वार्ता में समझायी थी। पर वे अपने उन साथियों की रक्षा में इतने रक्षात्मक हो गए कि मेरे सप्रमाण तर्क भी उन्हें अपना निर्णय बदलने पर बाध्य नहीं कर पाए। इसलिए मुझे उनके आंदोलन को लेकर शुरू से ही शंका रही, जो बाद में सही साबित हुई।

    केजरीवाल दावा करते हैं कि उन्होंने 20 वर्ष से भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई लड़ी है। लोकपाल बिल बनवाकर वे देश से भ्रष्टाचार खत्म करना चाहते थ। पर उनका तरीका और मांगें इतनी अव्यवहारिक थीं कि उनके मकसद को लेकर शुरू से ही जनता के मन में शक पैदा हो गया था। जो बाद में सच साबित हुआ। लोकपाल बिल आज कहां अंधेरे में खो गया वह केजरीवाल को भी पता नहीं। अन्ना हजारे को मोहरा बनाकर धरने पर बैठाने वाले केजरीवाल का अब अन्ना से कोई नाता नहीं बचा। उनका यह दावा कि देश की आमजनता भ्रष्टाचार के खिलाफ क्रान्ति करने को तैयार बैठी है, एक मजाक है। क्योंकि न तो देश से भ्रष्टाचार खत्म हुआ है और न ही अन्ना हजारे और केजरीवाल हिमालय की कंद्राओं में जाकर छिप गए हैं। अगर गायब हो गई है, तो वह भीड़, जो रामलीला मैदान में जुटी थी। साफ जाहिर है कि अगर वह आत्मप्रेरित भीड़ थी, तो आज इनके साथ क्यों नहीं है ? क्योंकि वह प्रायोजित भीड़ थी और जो लोग उसमें गंभीरता से जुड़े थे, उन्हें इण्डिया अगेनस्ट करप्शन के नेतृत्व के बचकानेपन और अति महत्वाकांक्षी स्वभाव को देखकर मोहभंग हो गया। इसीलिए वे आज केजरीवाल या अन्ना के साथ नहीं खड़े हैं।

    केजरीवाल की पार्टी 47 फीसदी वोट लाने का दावा कर रही है, पर जिस सर्वेक्षण को आधार पर बनाकर यह दावा किया जा रहा है, उसे करने वाले योगेन्द्र यादव खुद आम आदमी पार्टी के एक कार्यकर्ता हैं। किसी भी सर्वेक्षण के बुनियादी सिद्धांतों के विरूद्ध है कि उसे करने वाले स्वयं लाभार्थी हों। निष्पक्ष सर्वेक्षण के लिए जो कोटा प्रणाली सैफोलाजी के लिए आवशयक होती है, उसका तो योगेन्द्र यादव ने कहीं प्रयोग ही नहीं किया। अपने ही दल का कार्यकर्ता सर्वेक्षण करे और भारी जीत का दावा करे, तो इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है।

    दरअसल केजरीवाल ने आज तक जो कुछ किया है, उसमें मकसद की ईमानदारी, गंभीरता और परिपक्वता का नितांत अभाव रहा है। हड़बड़ी में जल्दी से जल्दी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं पूरी करना उनके आचरण का दुखद पक्ष हैं। दिल्ली में जहां गुजरात की तरह लोगों को लगातार बिजली मिल रही हो, वहां मीटर जोड़ने का नाटक करके अरविन्द केजरीवाल ने क्या सिद्ध किया ? अगर उनकी बात में दम था तो दिल्ली के हजारों उपभोक्ताओं ने उनके आह्वान पर अपनी बिजली क्यों नहीं कट जाने दी ? क्योंकि दिल्ली के मतदाताओं को शीला दीक्षित सरकार से बिजली को लेकर कोई शिकायत नहीं है।

    कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि आम आदमी पार्टी लोकपाल आंदोलन की तरह एक बुलबुला है, जिसका सही स्वरूप चुनावों के बाद सामने आ जाएगा। लोकतंत्र के लिए एक दुखद अनुभव होता है कि जब भी कोई व्यक्ति या समूह सामाजिक सरोकार के मुद्दे उठाकर आगे बढ़ता है, तो समाज को धोखा ही मिलता है। अगर केजरीवाल भ्रष्टाचार के विरूद्ध मुहिम में जुटे रहते और इस तरह की गैरजिम्मेदाराना बयानबाजियां करके मीडिया की सुर्खियों में रहने का लोभ संवहरण कर पाते, तो उनकी भूमिका ऐतिहासिक बन सकती थी। पर अब तो भगवान ही मालिक है, उनका और उनके दल का। चुनाव लड़ने में कोई बुराई नहीं, पर जैसे दूसरे राजनेता सपने दिखाते हैं, वैसे ही केजरीवाल हवाई सपने दिखा रहे हैं और सोच रहे हैं कि दिल्ली का मतदाता मूर्ख है जो उनकी बातों में आ जाएगा।

Monday, October 8, 2012

क्या होगा रॉबर्ट वाड्रा के खुलासे का असर

पिछले दो सालों से एसएमएस और इंटरनेट पर यह संदेश बार-बार प्रसारित किये जा रहे थे कि रॉबर्ट वाड्रा ने डीएलएफ के मालिक, हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हूडा व अन्य भवन निर्माताओं से मिलकर दो लाख करोड़ रुपये की सम्पत्ति अर्जित कर ली है। पर जो खुलासा शुक्रवार को दिल्ली में किया गया उसमें मात्र 300 करोड़ रुपये की सम्पत्ति का ही प्रमाण प्रस्तुत किया गया। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में बाकी की सम्पत्ति का भी खुलासा होगा। अगर नहीं होता है तो यह चिन्ता की बात है कि बिना प्रमाणों के आरोपों को इस तरह पूरी दुनिया में प्रचारित कर दिया जाता है। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि अगर राबर्ट वाड्रा ने अपनी सास श्रीमती सोनिया गांधी के सम्बंधों का दुरुपयोग करके अवैध सम्पत्ति अर्जित की है तो उसकी जांच होनी चाहिए। पर यहां कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं जिनपर ध्यान दिया जाना जरूरी है। पहली बात, पिछले दस सालों में हर शहर में प्रापर्टी डीलरों की हैसियत खाक से उठकर सैंकड़ों करोड की हो चुकी है। दूसरी बात यह है कि राजनेता ही नहीं हर नागरिक कर चोरी के लिए अपनी सम्पत्ति का पंजीकरण बाजार मूल्य से कहीं कम कीमत पर करवाता है। इस तरह सम्पत्ति के कारोबार में भारी मात्रा में कालेधन का प्रयोग हो रहा है। तीसरी बात रोबर्ट वाड्रा इस धंधे में अकेले नहीं। किसी भी राज्य के किसी भी राजनैतिक दल के नेता के परिवारजन प्रायः सम्पत्ति के कारोबार में पाये जायेंगे। अरबों रुपयों की अकूत दौलत नेता अफसर और पूँजीपति बनाकर बैठे हैं। सम्पत्ति का कारोबार कालेधन का सबसे बडा माध्यम बन गया है। इसलिए इसका राजनीति में दखल बढ़ गया है। इसलिए एक रॉबर्ट वाड्रा का खुलासा करके समस्या का कोई हल निकलने नहीं जा रहा।

दरअसल पिछले बीस वर्षों में भ्रष्टाचार के इतने काण्ड उजागर हुए हैं कि जनता में इससे भारी हताशा फैल गई है। इस हताशा की परिणिति अराजकता और सिविल वार के रूप में हो सकती है। क्योंकि सनसनी तो खूब फैलायी जा रही है पर समाधान की तरफ किसी का ध्यान नहीं। अन्ना के आन्दोलन ने समाधान की तरफ बढने का कुछ माहौल बनाया था। पर उनकी कोर टीम की व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं ने सारे आन्दोलन को भटका दिया।

अरविन्द केजरीवाल जो अब कर रहे हैं वो एक राजनैतिक दल के रूप में शोहरत पाने का अच्छा नुस्खा है। पर इससे भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान नहीं होगा। बल्कि हताशा और भी बढ़ेगी। दरअसल अरविन्द केजरीवाल जो कर रहे हैं वो काम अब तक मीडिया का हुआ करता था। घोटाले उजागर करना और आगे बढ़ जाना। समाधान की तरफ कुछ नहीं करना। अब जब मीडिया टीआरपी के चक्कर में या औद्योगिक घरानों के दबाव में जोखिम भरे कदम उठाने से संकोच करता है तो उस खाई को पाटने का काम केजरीवाल जैसे लोग कर रहे हैं। मगर यहीं इस टीम का विरोधाभास सामने आ जाता है। अगर सनसनी फैलाना मकसद है तो समाज को क्या मिलेगा और अगर समाज को फायदा पहुंचाना है तो इस सनसनी के आगे का कदम क्या होगा घ् आप हर हफ्ते एक घोटाला उजागर कर दीजिए और भ्रष्टाचार के कारणों को समझे बिना जनलोकपाल बिल का ढिढ़ोरा पीटते रहिए। तो आप जाने अजनाने कुछ राजनैतिक दलों या लोगों को फायदा पहुंचाते रहेंगे। पर देश के हालात नहीं बदलेंगे। क्योंकि जिन्हें आप फायदा पहंुचायेंगे वे भी कोई बेहतर विकल्प नहीं दे पायेंगे।

तो ऐसे में क्या किया जाए ? भ्रष्टाचार कोई नया सवाल नहीं है। सैकड़ों सालों से यह सिलसिला चला आ रहा है। सोचा भी गया है प्रयोग भी किये गये हैं पर हल नहीं निकले। अब नये हालात में फिर से सोचने की ज़रूरत है और सोचे कौन यह भी तय करने की जरूरत है। भ्रष्टाचार को नैतिकता का प्रश्न माना जाये या अपराध का। अगर हम नैतिकता का प्रश्न मानते हैं तो समाधान होगा सदाचार की या अध्यात्म की शिक्षा देना। व्यक्ति के सात्विक गुणों को प्रोत्साहित करना और तामसी गुणों को दबाना। अगर भ्रष्टाचार को हम अपराध मानते हैं तो उसका समाधान कौन देगा ? इतिहास बताता है कि अपराध के विरूद्ध जब-जब कोई व्यवस्था बनाई गई है तब-तब उसको बनाने वाला अपराधी से भी बडा खौफनाक तानाशाह सिद्ध हुआ है। दरअसल भ्रष्टाचार का मामला नैतिकता के और अपराध के बीच का है। इतिहास यह भी बताता है कि कोई एक जनलोकपाल या उससे भी कड़ा कानून इसका समाधान नहीं कर सकता। इसके लिए जरूरत है कि इन क्षेत्रों के विशेषज्ञ बैठकर अध्ययन करें और समाधान खोजें। उदाहरण के तौर पर ऐसा कैसे होता है कि त्याग, बलिदान और सादगी की शिक्षा देने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता जब भाजपा में मंत्री बनते हैं तो नैतिकता के सारे पाठ भूल जाते हैं। इसी तरह महात्मा गांधी के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेकर कांग्रेस में घुसने वाले मंत्री पद पाकर गांधी की आत्मा को दुःख पहुंचाते हैं। मजदूरों के हक की लडाई लडने वाले साम्यवादी नेता चीन और रूस में सत्ता पाने के बाद भ्रष्टाचार करते हैं। इसलिए बिखरी टीम अन्ना मीडिया में छाये रहने के लिए हर हफ्ते जो नये शगूफे छोड़ रही है या छोड़ने वाली है उससे हंगामा तो बरपाये रखा जा सकता है पर भ्रष्टाचार का इलाज नहीं कर पायेंगे। नतीजतन रही-सही व्यवस्था भी ध्वस्त हो जायेगी। ऐसे विचारों को पढ़कर या टीवी चैनल पर सुनकर कुछ भावुक पाठक नाराज हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि मैं इन लोगों के प्रयासों का विरोध कर रहा हूं। जबकि हकीकत यह है कि शान्ति भूषण और प्रशान्त भूषण जैसे लोगों ने बीस वर्ष पहले भ्रष्टाचार के विरूद्ध सबसे बड़ी लडाई में अगर गद्दारी न की होती तो शायद हालात आज इतने न बिगडते। इसलिए इनकी कमजोरियों को समझकर और यथार्थ को देखते हुए परिस्थितयों का मूल्यांकन करने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि भावना में बहकर हम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लें।