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Monday, January 9, 2017

कहां चली गयी सिविल सोसाइटी



भ्रष्टाचार के विरूद्ध कुछ वर्ष पहले पूरे हिंदुस्तान में तूफान खड़ा करने वाली सिविल सोसाईटी अचानक कहां गायब हो गई। यह एक नई बात यह दिख रही है कि स्वयंसेवी सामाजिक संगठन अचानक निष्क्रिय हो गये हैं। यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि ये निष्क्रियता अस्थायी  है या किसी थकान का नतीजा है। दोनों स्थितियां एक साथ भी हो सकती हैं। क्योंकि देश में सामाजिक क्षेत्र में काम कर रही तमाम गैर सरकारी संस्थाएं पिछले दो दशकों से वाकई जबर्दस्त हलचल मचाए हुए थीं। आजकल वह हलचल लगभग ठप है। चाहे भ्रष्टाचार हो, चाहे पर्यावरण हो या दूसरी सामाजिक समस्याएं उन्हें लेकर आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और विचार विमर्शो के आयोजन अब दुर्लभ हो गए हैं।

महंगाई, बेरोजगारी, बंधुआ मजदूरी, महिलाओं पर अत्याचार, प्रदूषण, भ्रष्टाचार को लेकर जंतर मंतर पर होने वाले प्रतीकात्मक धरनों प्रदर्शनों की संख्या में आश्चर्यजनक कमी आयी है। क्या ये सोच विचार का एक मुददा नहीं होना चाहिए। और अगर सोचना शुरू करेंगे तो देश में राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में आए बदलावों को सामने रखकर ही सोचना पड़ेगा। खासतौर पर इसलिए क्योंकि दो-तीन साल में एक बड़ा बदलाव केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ है। उसके पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लंबा जन जागरण अभियान चलाया गया था। ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषक मानते ही हैं कि पूर्व सरकार की छवि नाश करने में उस अभियान ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी। वह सामाजिक आंदोलन या जन आंदोलन सिर्फ विरोध करने के लिए भी नहीं था। उस आंदोलन में बाकायदा एक मांग थी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल का कानून बनाया जाए। यानी सामाजिक संस्थाओं ने बाकायदा एक विशेषज्ञ के किरदार में आते हुए लोकपाल को सबसे कारगर हथियार साबित कर दिया था।

बहरहाल सत्ता बदल गई। नए माहौल में वह आंदोलन भी ठंडा पड़ गया। दूसरे छुटपुट आंदोलन जो चला करते थे वे भी बंद से हो गए। और तो और मीडिया का मिजाज भी बदल गया। यानी लोकपाल को लेकर बात आई गई हो गई।

इन तथ्यों के आधार पर क्या हम यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि सामातिक संस्थाएं और मीडिया इतना असरदार होता है कि वह जब चाहे जिस समस्या को जितना बड़ा बनाना चाहे उतना बड़ा बना सकता है। और जब चाहे उसी समस्या को उतना ही छोटा भी बना सकता है। इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि बिना लोकपाल का गठन हुए ही भ्रष्टाचार कम या खत्म हो गया है। इसीलिए शायद सामाजिक संगठनों ने अब आंदोलन करना बंद कर दिया है। पर ऐसा नहीं है। फिर इस निष्क्रियता से क्या सिविल सोसाइटी की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न नहीं लग जाता है। लेकिन मौजूदा माहौल ही कुछ इस तरह का है कि इन मुद्दों पर बात नहीं हो रही है।

लेकिन इतना तय है कि भ्रष्टाचार और कालेधन पर जितना कारगर आंदोलन तीन-चार साल पहले चला था, उस दौरान हम विरोध के नए और कारगर तरीके जान गए थे। अभी भले न सही लेकिन जब भी माहौल बनेगा वे तरीके काम में लाए जा सकते हैं। यह भी हो सकता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उन तरीकों को एक बार अपनाए जाने के बाद उनकी धार कुंद पड़ गई हो। लेकिन दूसरे और मुददों के खिलाफ वैसे आंदोलन और हलचल पैदा करना सीखा जा चुका है। अब देखना यह होगा कि सामाजिक संगठन भविष्य में अगर फिर कभी सक्रिय होते हैं तो वे किस मुददे पर उठेंगे।

सामाजिक संगठनों के लिए बेरोजगारी और महंगाई और प्रदूषण जैसे मुददे आज भी कारगर हो सकते थे। लेकिन देश में पिछले दो महीने से नोटबंदी ने कामधंधे और खेती किसानी के अलावा और कोई बात करने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी है। देश में उत्पादन बढ़ाने के काम में सामाजिक संगठन ज्यादा कुछ कर नहीं सकते। कुछ भी करने के लिए अगर कुछ करना हो तो स्वयंसेवी संस्थाएं आर्थिक क्षेत्र में सरकारी नीतियों और कार्यक्रम बनवाने में हस्तक्षेप की भूमिका भर ही निभा सकती हैं। लेकिन यह काम इतनी विशेषज्ञता का काम है कि अपने देश में सामाजिक क्षेत्र की गैर सरकारी संस्थाएं ऐसे विशेषज्ञ कार्य में ज्यादा सक्षम नहीं हो पाई हैं। वैसे भी इस तरह के कामों में सामजस्यपूर्ण व्यवहार की दरकार होती है। जबकि पिछले दो दशकों में हमने अपनी स्वयंसेवी संस्थाओं को सिर्फ विरोध और संघर्ष के व्यवहार में अपना ही विकास करते देखा है।

देश के मौजूदा हालात में जब मीडिया ही अपने लिए सुरक्षित खबरों और चर्चाओं को ढूंढने में लगा हो तो इस मामले में स्वयंसेवी संस्थाओं के सामने तो और भी बड़ा संकट है। ये संस्थाएं अब प्रदूषण जैसी समस्या पर भी अपनी सक्रियता बढ़ाने से परहेज कर रही हैं। दरअसल नदियों की साफ-सफाई का काम शहर-कस्बों में गंदगी कम करने के काम से जुड़ा है। यानी प्रदूषण की बात करेंगे तो देश में चालू स्वच्छता अभियान में मीनमेख निकालने पड़ेंगे और किसी भी मामले में मीनमेख निकालने का ये माकूल वक्त नहीं है।

कुल मिलाकर स्वयंसेवी संस्थाओं को काम करने की गुंजाइश पैदा करना हो तो उन्हें उन क्षेत्रों की पहचान करनी होगी जिनमें मौजूदा सरकार से संघर्ष की स्थिति न बनती हो। आज की स्थिति यह है कि जो भी संघर्ष के किरदार में दिखता है वह सरकार के राष्ट्र निर्माण के काम में विघ्नकारी माना जाने लगा है। एक बार फिर दोहराया जा सकता है कि सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के सामने मुददों का संकट खड़ा हो गया है।

Monday, January 19, 2015

किरण बेदी बनाम केजरीवाल



जिसका अंदाजा था वही हुआ | आखिर किरण बेदी भाजपा में शामिल हो ही गई | अब विरोधी हमला कर रहे हैं कि कल तक भाजपा पर आम आदमी पार्टी कि नेता बन कर भाजपा पर हमला बोलने वाली किरण बेदी ने उसी भाजपा का दामन क्यों थाम लिया ? यह हमला बेमानी है | अन्ना हजारे के आंदोलन के दौर से ही किरण बेदी भाजपा की तरफ अपना झुकाव दिखाती आ रही थी | नरेंद्र मोदी की प्रधानमन्त्री पद कि उम्मीदवारी की घोषणा के बाद तो किरण ने उनका खुल कर समर्थन किया | ज़रूरी नहीं कि पूरी जिंदगी एक व्यक्ति एक विचार और एक मूड को लेकर बैठा रहे | जिन शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेश मूल को लेकर पार्टी छोड़ी थी वे ही 10 बरस तक सोनिया गांधी के नेतृत्व में सप्रग की सरकार चलवाते रहे |

किरण बेदी के भाजपा में शामिल होते ही कई मीडिया कर्मियों ने मुझसे फोन पर इस घटना की प्रतिक्रिया पूछी | मेरा मानना है कि किरण बेदी जैसी कार्यकुशल अधिकारी की सक्रीय भूमिकाओं से दिल्ली की आम जनता हमेशा प्रभावित रही है | मुझे 1980 का वो दौर याद है जब किरण बेदी उत्तर पश्चिम दिल्ली की डीसीपी थी | तब मैंने दिल्ली दूरदर्शन के लिए एक टीवी सीरीज ‘पुलिस और लोग’ प्रस्तुत की थी | उन दिनों किरण युवा महिला होने के बावजूद आधी रात को घोड़े पर गश्त करती थी | बाद में दिल्ली की ट्रैफिक पुलिस में रहते हुए उन्होंने वीआइपी गाड़ियों को गलत पार्किंग से उठवा कर ‘क्रेन बेदी’ होने का खिताब हासिल किया |

जिन दिनों 1993 – 96 में मैंने जैन हवाला काण्ड उजागर किया और भ्रष्टाचार के विरुद्ध भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषण और मैं देश भर में जन सभाएं सम्भोदित कर रहे थे उन्ही दिनों 1996 में किरण बेदी, के जे एल्फोंज़ और जी आर खैरनार भी हमारे साथ जुड़े और हमने कई जनसभाएं साथ साथ संबोधित करी | तब किरण के साथी अधिकारी किरण से बहुत जलते थे | वे कहते थे कि किरण जैसे लोग अपने छोटे से काम का बहुत ढिंढोरा पीटते हैं | दूसरी तरफ ये लोग बहुत महत्वाकांक्षी हैं सरकारी नौकरी में रह कर राजनैतिक भविष्य तैयार कर रहे है | पर महत्वाकांक्षी होना कोई गलत बात नहीं है | अनेक उदाहरण हैं जब अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी राजनीति में भी कुशल प्रशासक सिद्ध हुए हैं | दूसरी तरफ मुकाबले में केजरीवाल जैसा व्यक्ति है जिसकी कथनी कुछ और - करनी कुछ और | इसी कॉलम में पिछले 4 वर्षों में बेहत हैं केजरीवाल के झूठ, फरेब और राजनैतिक महत्वाकांक्षा पर मैंने दर्जनों लेख लिखे हैं | तब भी जब अन्ना और केजरीवाल का भ्रष्टाचार के विरुद्ध तथाकथित जन आंदोलन अरबों रूपए की आर्थिक मदद से अपने शिखर पर था, मैंने राजघाट पर इनके खिलाफ खुले पर्चे तक बटवाए थे | क्योंकि मैं इनकी गद्दारी का धोखा खा चुका था और मुझे इन पर कटाई भरोसा नहीं था | किरण बेदी जाहिरान केजरीवाल से कई मामलों में बेहतर हैं | केजरीवाल तो हल्ला मचा कर, करोड़ों रुपया प्रचार में खर्च करके, एक मुद्दा उठाते हैं और फिर बड़ी बेहयाई से उसे छोड़ कर भाग जाते हैं | फिर वो चाहे बनारस का संसदीय क्षेत्र हो, जंतर मंतर का धरना, जनता दरबार या मुख्यमंत्री का पद | कहीं भी ठहर कर कोई भी काम नहीं किया | ऐसा ही मानना उनके टाटा स्टील व आयकर  विभाग के सहयोगियों का भी है | अब दिल्ली की जनता तय करेगी कि वो काम करने वाली किरण बेदी को चुनेगी या भगोड़े केजरीवाल को |

हो सकता है कि भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं में अमित भाई शाह के इस निर्णय को लेकर कुछ रोष हो | वे जाहिरान किरण बेदी को बाहरी उम्मीदवार मानते होंगे | पर उन्हें यह याद रखना चाहिए कि आज की भाजपा आडवानी जी की भाजपा से भिन्न है | आज नरेंद्र भाई मोदी एक मिशन लेकर देश बनाने निकले हैं | उन्हें हर उस कर्मठ व्यक्ति की ज़रूरत है जो उनके इस मिशन में सहयोग कर सके | अगर केवल संघ और भाजपा से जुड़ने का पुराना इतिहास मांगेगें तो वे देश के लाखों योग्य लोगों की सेवाएँ लेने से वंचित रह जायेंगे | उधर अमित भाई शाह उस नेपोलियन की तरह हैं जो फ़्रांस की सेना के सिपाही से उठ कर फ़्रांस का राजा बना | जिसके शब्दकोष में असंभव नाम का शब्द ही नहीं था | जो सोता भी घोड़े पर ही था | अमित भाई चुनाव के हर युद्ध को जीतने के लिए लड़ रहे हैं | वे श्रीराम के लक्ष्मण हैं जो अग्रज की सेवा में 14 वर्ष तक वनवास में खड़े रहे | अपना सुख त्यागा ताकि बड़े भईया को सुख दे सके | जब श्रीराम अवध के राजा बने तब भी लक्ष्मण उसी तरह से सेवा में जुटे रहे | अब नरेंद्र भाई को देश बनाने के लिए जो समय चाहिए वह तभी मिल पायेगा जब संगठन और चुनाव की समस्याओं से अमित भाई शाह उन्हें दूर रखें और खुद ही इनसे जूझते रहें | ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने दल के नेता के निर्णय में पूर्ण विश्वास होना चाहिए, तभी लड़ाई जीती जायेगी |

Monday, February 17, 2014

केजरीवाल के रवैये से लोकतांत्रिक ढांचे को चोट पहुंची

केजरीवाल ने आखिरकार अपनी जिम्मेदारियों से पिण्ड छुड़ा लिया | दिल्ली में सरकार चला पाने में बुरी तरह से नाकामी के बाद केजरीवाल इतनी मुश्किल में फंस गए थे कि उन्हें किसी भी तरह के बहानों की सख्त ज़रूरत पड़ गई थी | और उन्होंने ऐसा बहाना ढूँढ ही लिया | और उन्होंने ऐसा ऐलान कर दिया जो किसी भी तरह से पूरा हो ही नहीं सकता था | अपने ऐलान में उनहोंने यह जोड़ दिया था कि अगर यह काम मैं नहीं कर पाया तो स्तीफा दे दूंगा | उनहोंने बहाना मिलाया था कि दिल्ली सरकार जन लोकपाल बिल लाएगी | यही ऐसा एलान था कि छोटी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को भी पता था कि केन्द्र शासित राज्य दिल्ली की सरकार कानूनी तौर पर यह प्रस्ताव ला ही नहीं सकती और वही हुआ और उसके बाद उन्होंने स्तीफा देकर अपनी बाकी सारी जिम्मेदारियों से पिण्ड छुड़ा लिया | अब वे प्रचार में लग गए हैं कि सारे दल सारे मौजूदा नेता भ्रष्ट हैं इसीलिए उन्होंने जन लोकपाल बिल नहीं लाने दिया|

सच तो यह है कि केजरीवाल कि छवि दिन पर दिन खराब होती जा रही थी | दिल्ली का चुनाव लड़ने से पहले उनके किये सारे वादों कि एक-एक करके पोल खुलती जा रही थी | ऐसे में उनके पास इसे इलावा कोई विकल्प नहीं था की पूरी कि पूरी पोल खुल जाये उसके पहले ही वे किसी तरहर से मुख्यमंत्री की कुर्सी से उठ कर भाग लें|

शुक्रवार की रात जब उनका ड्रामा चल रहा था तब कमोवेश सारे टी वी चैनल बता रहे थे कि केजरीवाल जल्द ही कुर्सी छोड़ कर भागने वाले हैं | लेकिन केजरीवाल बैठकों का दौर चला रहे थे और अपने समर्थकों को एस.एम.एस भिजवा कर कह रहे थे कि पार्टी के दफ्तर के बाहर जमा हो जाओ | उन्हों ने दो – तीन घंटे हरचंद कोशिश की कि किसी तरह अच्छी खासी भीड़ जमा हो जाये और यह दिखाते हुए स्तीफे का ऐलान करें कि जनता उनके साथ है और जनता के कहने पर ही स्तीफा दे रहें हैं | उन्हें उम्मीद थी कि लोकसभा चुनावों के लिए गली-गली से उन्होंने जो टिकटार्थियों की लिस्ट बना ली है वे लोग अपने अपने समर्थकों के साथ दफ्तर के बाहर जमा हो जायेंगे | लेकिन जब भीड़ जमा नहीं हुई और ऐसे कोई आसार भी नहीं दिखे तो उन्होंने रात 9:30 बजे स्तीफे का एलान कर दिया | और बड़े वीराने माहौल में मुख्यमंत्री की कुर्सी बलिदान करने वाली मुद्रा में अपनी जिम्मेदारियों से पिण्ड छुड़ा लिया |

लेकिन यह पिण्ड इतनी आसानी से छूटने वाला नहीं है | पिछले चार महीनों में दिल्ली में जो तमाशा हुआ है उसमे लाखों लोगों को शामिल कराया गया था | उन्हें सपने दिखाए गए थे | कुछ भोले भाले लोगों को उम्मीदें बंधाई गयी थीं | कुछ चश्मदीद भी इस खेल में स्वभावतः शामिल हो गए थे | यानी तरह तरह के इन लोगों की नज़रों में नाकाम साबित हो जाने के बाद और इन लोगों की नज़रों में गिर जाने की चिंता केजरीवाल को सता रही होगी | वैसे वे इतने चतुर हैं कि इस स्तिथि से निपटने का भी कोई इंतज़ाम उन्होंने और उनकी चतुर मंडली ने सोच लिया होगा | पर यह इतना आसान नहीं है |

अब उनके पास एक ही विकल्प बचा है लोकसभा चुनावों में उतरने कि तय्यारियों के नाम पर अपने दर्शकों और श्रोताओं को कुछ महीने और उलझाये रखें | चर्चा में बने रहने के हुनर में पाटू हो चुके केजरीवाल को बड़े गजब का यकीन हैं कि वे एक ही मुद्दे पर और एक ही प्रकार से बार बार बातें बना सकते हैं | लेकिंग इस पर सवाल उठाने के पीछे तर्क यह है कि इतिहास में ऐसा बार बार होने का कोई उदहारण मिलता नहीं है | या तो मुद्दे बदले गए हैं या लोग | इस दलील के पक्ष में यह अनुमान लगाये जा सकता है कि लोकसभा चुनाव आते आते या तो मुद्दे बदले जाएंगे या केजरीवाल अपने बीच से कोई विकल्प या मुखौटा खड़ा कर देंगे | वैसे उनके पास एक विकल्प यह भी है कि कुछ महीनों बाद वे राजनीति का मैदान छोड़ कर अन्नानुमा किसी सामाजिक आंदोलन पर वापिस लौट जायें |


राजनीति में केजरीवाल काण्ड की समीक्षा करते समय हमें यह भी सोचना होगा कि इससे नफा नुक्सान क्या हुआ | पहली नज़र में दीखता है की आन्दोलनों के प्रति समाज की निष्ठा दिन प्रतिदिन कम होती चली गयी और लोकतान्त्रिक राजनीति के ढांचे को चोट ज़रूर पहुंची | यह कहने का आधार यह है कि लोकतांत्रिक राजनीति की जितनी कमजोरियां थी उनको तो समझ बूझ कर ही हमने यानी विश्व ने अपना रखा था | भले ही लोकतंत्र की सीमायें हम भूल गए हों बस यहीं पर इस उठापटक के पक्ष में बात जाती है कि उसने हमें याद दिलाया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था कोई पूर्णतः निरापद व्यवस्था नहीं है और विचित्र स्तिथ्ती यह है कि इससे बेहतर कोई विकल्प भी हम सोच नहीं पाते | 

Monday, January 13, 2014

आम आदमी को निराश कर रहे हैं केजरीवाल

पहले तो इतनी हड़बड़ी थी कि शपथ लेने से पहले ही केजरीवाल ने जनता दरबार लगा लिया। फिर शपथ लेने के बाद जब नहीं संभला तो हड़बड़ाकर 10 दिन की मोहलत मांगी। 10 की बजाय 14 दिन बाद, खूब प्रचार-प्रसार के बाद, 11 जनवरी को जब दोबारा जनता दरबार शुरू किया तो फिर भगदड़ मच गई। मुख्यमंत्री को पुलिस के संरक्षण में जान बचाकर भागना पड़ा। यह एक नमूना है केजरीवाल की अधीरता और अपरिपक्वता का। जनता दरबार का इतिहास अगर आम आदमी पार्टी के नेताओं को पता होता, तो ऐसा बचपना न करते। देश के कई प्रधानमंत्रियों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने जब जब जनता दरबार लगाए हैं, वे बुरी तरह विफल हुए हैं। कारण करोड़ों के इस देश में करोड़ों लोगों की हर समस्या का हल जनता दरबार नहीं हुआ करता। इसके लिए प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त और जिम्मेदार बनाना होता है। जिसके लिए अनुभव की जरूरत होती है। पर सस्ती लोकप्रियता पाने की हड़बड़ी में आम आदमी पार्टी के नेता एक के बाद एक ऐसे ही अपरिपक्व फैसले ले रहे हैं, जिससे दिल्ली की आम जनता के बीच तेजी से निराशा फैल रही है।

शपथ के लिए मैट्रो में आना। मैट्रो के सारे कायदे कानून तोड़कर उसमें अव्यवस्था फैलाना। फिर टैंपो और बसों में दफ्तर आना और विश्वास मत प्राप्त होते ही बड़ी-बड़ी गाड़ियों को लपक लेना ऐसे ही बचकाने फैसले रहे हैं। गाड़ी लेनी ही थी तो पहले ही दिन क्यों नहीं ले ली ? सुरक्षा न लेने की जिद और सादी वर्दी में सुरक्षा के कवच, ये विरोधाभास कब तक चलेगा ? ऐसा नहीं है कि आम आदमी पार्टी से पहले देश में राजनेताओं ने अत्यंत सादगी और सच्चाई का जीवन न जिया हो। ऐसे तमाम उदाहरण हैं। भारत के गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्ता तक छोटे से फ्लैट में रहते रहे। कई मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री आज भी बिना लालबत्ती की गाड़ी के और बिना सुरक्षा के घर से दफ्तर पैदल आते-जाते हैं, जिसका कोई प्रचार नहीं करते। पर अनेक दूसरे झूठे दावों की तरह आम आदमी पार्टी के नेता इन मामलों में भी ऐसे ही झूठे दावे करते आ रहे हैं कि उन्होंने यह काम पहली बार किया।
अरविन्द केजरीवाल को याद होगा कि उन्होंने दिल्ली के आर्य समाज के कार्यालय में जनलोकपाल कानून पर चर्चा करने के लिए उन्होंने एक बैठक बुलाई थी। जिसमें हमने इस कानून की व्यवहारिकता पर सवाल उठाये थे। यह तब की बात है जब इनका जन लोकपाल आंदोलन ठीक से शुरू भी नहीं हुआ था। हमने कहा था कि आपके बनाए जनलोकपाल कानून को लागू करने के लिए कम से कम 2 लाख नए कर्मचारियों की भर्ती करनी पड़ेगी। इस पर कम से कम 50 हजार करोड़ रूपया खर्चा आएगा। फिर ये गारंटी कैसे होगी कि ये 2 लाख कर्मचारी दूध के धुले हों और बने रहें। इसलिए हमने शुरू से अखबारों में अपने लेखों के माध्यम से और टी.वी. चैनलों में केजरीवाल, प्रशांत भूषण, अन्ना हजारे और इनके साथियों के साथ हर बहस में जनलोकपाल कानून की पूरी कल्पना का बार-बार बड़ी मजबूती से विश्लेषण करके इसकी अव्यवहारिकता को रेखांकित किया था। ये वो दौर था जब केजरीवाल की पहल पर दुनियाभर में इनके समर्थक ‘मैं अन्ना हूं’ की टोपी लगाकर घूम रहे थे। उस वक्त इनसे जूझना ऐसा था मानो मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया जाए। अतीत से बेखबर युवा पीढ़ी को भ्रमित करके केजरीवाल एंड पार्टी ने इतने सब्जबाग दिखा दिए हैं कि उन्हें इनके विरूद्ध सही बात सुनना भी उन्हें गंवारा नहीं होता। पर हम हमेशा वेगवती लहरों से जूझते आए हैं और बाद में समय ने यह सिद्ध किया कि हम सही थे और भीड़ की सोच गलत।
यह बात यहां इसलिए जरूरी है कि भ्रष्टाचारविहीन शासन का दावा करने वाले केजरीवाल के गत 3 सप्ताह के शासन में भ्रष्टाचार के विरूद्ध सिवाय बयानबाजी और नारेबाजी के कुछ ठोस नहीं हुआ। अब जनता को अगर स्टिंग ही करना पड़ेगा, तो जनता अपना काम कब करेगी और फिर मोटे वेतन लेने वाला प्रशासन क्या काम करेगा? जबकि केजरीवाल का दावा था कि वे 48 घंटे में शासन को जनता की शिकायतों के प्रति उत्तरदायी बना देंगे। जबकि हालत यह है कि वे शिकायतियों की भीड़ को संभालने की भी व्यवस्था भी नहीं बना पाए। सोचो अगर 122 करोड़ लोग जनलोकपाल को शिकायत भेजेंगे तो उन शिकायतों को जांचने और परखने और उनकी गंभीरता का मूल्यांकन करने में कितना लम्बा समय लगेगा ? कितनी दिक्कत आएगी ? इससे कितनी निराशा फैलेगी, इसका अंदाजा केजरीवाल को नहीं है। इस सबके बावजूद भी शिकायतों के मुकाबले समाधान नगण्य रहेंगे। यह पूरी सोच ही केवल आम जनता की दुखती नब्ज पर हाथ रखकर, उसे छलावे में डालकर, सब्जबाग दिखाकर अपना उल्लू सीधा करने की है, जो आज हो रहा है। हालात इससे और बदतर होंगे, क्योंकि शिकायत करने वालों का जनसैलाब जब बढ़ेगा, तो केजरीवाल प्रशासन के लिए हर शिकायत को जांचना, समझना और समाधान देना दुश्कर होता जाएगा और इससे जनता में और हताशा फैलेगी।
माना कि आम आदमी पार्टी के नेता लोकसभा चुनाव पर दृष्टि रखकर हड़बड़ी में लोक लुभावने काम करने का माहौल बना रहे हैं। पर उससे जो हताशा फैल रही है, उसकी तरफ उनका कोई ध्यान नहीं है। आज आम आदमी और कांग्रेस के समर्थन ने केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाया है। दो हफ्ते के भीतर ही दिल्ली के आम आदमी की छोटी-छोटी और जायज शिकायतें सुनने का प्रबंध भी नहीं हो पाया। जरा सोचिये कि उस आम आदमी की क्या मानसिक स्थिति होगी, जिसने अपनी भावनाएं आम आदमी पार्टी पर न्यौछावर कर दी थीं। दुख और चिंता इस बात की है कि आम आदमी का जो मोहभंग इतनी जल्दी हो गया है, तो अब उसके पास किसी पर विश्वास करने का कौन सा मौका बचेगा ? बीसियों साल से समाज की जटिल समस्याओं को समझने और उनके समाधान में जुटे सामाजिक कार्यकर्ताओं और विद्वानों के लिए क्या अब अपना काम करने में बड़ी मुश्किल खड़ी नहीं हो गई है ?
वक्त अभी भी नहीं गुजरा। अभी भी केजरीवाल अपने काम का तरीका सुधार सकते हैं। बशर्ते कि भावनाओं के आवेग को छोड़कर सबसे पहले राजनीतिक इतिहास और अब तक के राजनीतिक ज्ञान पर एक बार गौर कर लें और फिर जो भी घोषणा प्रेस के सामने करें उसका आगापीछा सोचकर करें। सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए नहीं।

Monday, January 6, 2014

हताशा नहीं उत्साह की जरूरत

पिछले कुछ वर्षों से देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, मानो भारत गड्ढे में जा रहा हो। हर ओर केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला, गरीबों से हमदर्दी का नाटक और राहत, सब्सिडी, बेरोजगारी भत्ते जैसे झुनझुने थमाकर देश को नाकारा बनाया जा रहा है। जबकि जमीनी हकीकत कुछ और है। 1947 में जब देश आजाद हुआ, तब वाकई हमारे पास न तो संसाधन थे, न आधारभूत ढांचा, न इतना योग्य युवा वर्ग और न ही बहुत सारे उद्यमी। औपनिवेशिक साम्राज्य के शिकंजे में जकड़ा भारत मध्ययुगीन जीवन जी रहा था। लेकिन आज आजादी के 66 साल बाद भारत दुनिया के खास देशों की कतार में खड़ा है। आज हमारे पास आधारभूत ढांचा है, विज्ञान और तकनीकि की समझ और एक से एक काबिल लोगों का भंडार है। उद्योगपतियों की एक लंबी कतार है, जो दुनिया के दूसरे देशों में भी निवेश कर रही है और पढ़ा-लिखा उत्साही युवा वर्ग ऊर्जा से भरपूर है। ऐसे में अब सोचने की जरूरत है कि हम केवल कमियां खोजते रहे या समाज में आगे बढ़ने की ललक पैदा करें। 

जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है, इससे सब दुखी हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि हम दूसरे के भ्रष्टाचार को देखकर दुखी होते हैं, लेकिन जब अपनी बारी आती है, तो अपनी सुविधा का त्याग करने की कीमत पर भ्रष्टाचार से परहेज नहीं करते। दो दशक तक सत्ता के शिखर पर भ्रष्टाचार से लड़ते हुए मैंने अनुभव किया कि समाज का कोई वर्ग, मीडिया और न्यायपालिका तक, इससे अछूते नहीं हैं। इसके साथ ही यह भी जानकर आश्चर्य हुआ कि दुनिया का शायद ही कोई देश हो, जो भ्रष्टाचार से पूरी तरह अछूता हो। जिस साम्यवादी चीन की प्रशंसा करते बुद्धिजीवियों के मुंह नहीं थकते, उसी चीन में सत्ता के शीर्ष पर भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। इसलिए यह समझ बनीं कि जहां एक ओर भ्रष्टाचार से लड़ाई जारी रखी जाए। वहीं कुछ सकारात्मक करके भी दिखा जाए। आज इसी बात की सबसे ज्यादा जरूरत है। 

इस लेख के पाठकों से मैं यह प्रश्न पूछना चाहता हूं कि वे अखबार पढ़ते हैं, टीवी समाचार देखते हैं और फिर व्यवस्था की बुराई करते हैं। पर आपमें से कितने लोग ऐसे हैं, जो अपने घर के दरवाजे के बाहर से लेकर देश के बाकी हिस्सों तक अपनी क्षमता के अनुसार बिगड़ी व्यवस्थाओं को सुधारने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं ? हमारे घर में कूड़ा हो, तो पड़ोसी साफ करने नहीं आता। हमें ही करना होता हैै। तो हमारे समाज और देश में कहीं कुछ गलत हो रहा है तो उसे ठीक करने कोई पाकिस्तान से तो आयेगा नहीं ? मुझे लगता है कि जहां देश में उंगली उठाने वाले ज्यादा आक्रामक और भड़काऊ हो रहे हैं। वहीं व्यवस्थाओं को सुधारने वालों को भी एकजुट होकर एक वैकल्पिक मंच तैयार करना चाहिए और सार्थक समाधानों को लागू करवाने के लिए व्यवस्था और अपने परिवेश पर दवाब बनाना चाहिए। इसके दो लाभ होंगे एक तो हमारी इच्छा के अनुरूप हमारे परिवेश में बदलाव का माहौल बनेगा, दूसरा हमारी अतिरिक्त ऊर्जा का सदुपयोग राष्ट्र के निर्माण में होगा। जिससे समस्याएं भी घटेंगी और हमारा जीवन भी और सुखी होगा। 
यह जिम्मेदारी गम्भीर मीडियाकर्मियों की, बुद्धजीवियों की, अधिकारियों की और राजनेताओं की है कि वे उंगली उठाना छोड़कर समाधानों को लेकर शोर मचाएं और अपनी बात मनमाने के लिए दवाब बनाएं। ऐसा करने से एक हवा बनेगी, माहौल गर्म होगा और व्यवस्था पर भी दवाब बनेगा। ऐसा दवाब जिसमें बिना लागत के निरंतरता की संभावना होगी। जिससे स्थायी समाधान खोजे जा सकते हैं। 

कभी हम लोकनायक जयप्रकाश नारायण से देश के हालात सुधारने की उम्मीद करते हैं। कभी हम वीपी सिंह के लिए कहते हैं ‘‘राजा नहीं फकीर है, भारत की तकरीर है’’, कभी हम टीएन शेषन को देश का मसीहा मान बैठते हैं और बार हमारा मोहभंग होता है, फिर निराशा होती है। 10-20 वर्ष फिर एक मसीहा के इंतजार में गुजर जाते हैं। अब हम सोच रहे हैं कि केजरीवाल जादू की छड़ी घुमा देंगे। जबकि वे शपथ ग्रहण में खुद ही कह चुके हैं कि मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। यह हमें तय करना है कि हम सुबह से रात तक अपनी ऊर्जा का कैसा उपयोग करते हैं। रोजी रोटी के लिए तो सभी दौड़ते हैं। पर अपने परिवेश को सुधारने के लिए जो भी प्रयास हम करते हैं, उससे पूरे समाज को एक शुभ संकेत मिलता है, प्रेरणा मिलती है और आगे का मार्ग दिखायी देता है। दुख की बात यह है कि आज यह काम न तो हमारा राजनैतिक नेतृत्व कर रहा है और न ही बौद्धिक नेतृत्व। टेलीविजन चैनलों पर सारा समय गाली-गलौज देने में निकल जाता है, मानो देश में कुछ शुभ घट ही न रहा हो। यह आत्मघाती रवैया है। इससे बचना चाहिए और हमें अपने देश को, अपने समाज को, अपने परिवार को आगे बढ़ाने के लिए एक सकारात्मक सोच को अपनाना चाहिए। इसी में हम सब का भला है। 

Monday, December 30, 2013

अब होगी केजरीवाल की असली परीक्षा

अरविन्द केजरीवाल ने जिस रामलीला मैदान से देशव्यापी भ्रष्टाचार के विरूद्ध दो बरस पहले बिगुल बजाया था। वहीं दो बरस बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पानी मुफ्त मिले या न मिले, बिजली के दाम घटें या न घटें, ये तो ऐसे वायदे हैं जो हर राजनेता चुनाव के पहले करता है। कुछ पूरे होते हैं, कुछ नहीं होते। तमिलनाडु में जयललिता टीवी और सोना बांटतीं हैं, अखिलेश यादव लैपटॉप और हरियाणा सरकार किसानों को पानी व बिजली। दिल्ली में जल की सीमित उपलब्धता को देखते हुए हो सकता है कि अरविन्द 700 लीटर मुफ्त जल हर परिवार को न दे पाएं। पर जिस मुद्दे पर वे चर्चा में आए और आज यहां तक पहुंचे, वही मुद्दा सबसे अहम है और वह है भ्रष्टाचार का। शपथ लेने के बाद भाषण में अरविन्द ने दिल्ली की जनता का आह्वान किया कि वो रिश्वत मांगने वालों को उनसे शिकायत करके पकड़वायें। अब यह नारा बहुत लुभावना है, पर हकीकत क्या है। एक मुख्यमंत्री और उसका सचिवालय दिनभर में भ्रष्टाचार की कितनी शिकायतें सुन सकता है और उन्हें निपटा सकता है। शिकायत दर्ज कराना, जांच करना और दोषी को सजा देना यह प्रतीकात्मक रूप से तो हो सकता है, लेकिन व्यापक रूप से करने के लिए जितनी बड़ी मशीनरी की जरूरत होगी, वो अभी दिखायी नहीं देती।
 डेढ़ करोड़ की दिल्ली की आबादी 70 विधानसभा क्षेत्रों में बंटी है और अगर हर विधानसभा क्षेत्र के सरकारी कर्मचारियों की रिश्वतखोरी बंद करनी है तो एक विधानसभा क्षेत्र में कम से कम एक हजार सतर्क निगहबान लोग चाहिए। ऐसे लोग जो किसी कीमत पर भ्रष्ट न हों और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कमर कस लें। यानि आम आदमी पार्टी को 70 हजार ऐसे स्वयंसेवक चाहिए, जो दिल्ली की डेढ़ करोड़ जनता की शिकायतों को फौरन सुनें और उनको हल कराने में जुट जाएं। ऐसे लोग कहां से आएंगे और बिना वेतन के कब तक काम कर पाएंगे ? अगर ऐसा हो जाता है कि तो वह वास्तव में जनक्रांति होगी।
जहां तक दिल्ली के मुख्यमंत्री के अधिकारों का सवाल है, तो पुलिस और दिल्ली विकास प्राधिकरण जैसे महत्वपूर्ण विभाग मुख्यमंत्री के अधीन नहीं हैं। पर जल, बिजली और वित्त विभाग तो हैं ही, जिन्हें केजरीवाल ने अपने अधीन रखा है।
अब वित्त विभाग के दायरे में बिक्री कर विभाग आता है। जो दिल्ली का सबसे भ्रष्ट विभाग है। उल्लेखनीय है कि चांदनी चैक के कटरों में ही पूरे उत्तर भारत का व्यापारी रोज आता है और अरबों रूपये की खरीद रोज होती है। ये सारी खरीद दो नंबर के खाते में होती है। चाहें सोने हों, चाहें कपड़ों, बिजली का सामान हो, मेवा हो, किराना हो, प्रसाधन सामिग्री हो या फिर अन्य उपभोग की वस्तुएं। ये माल अवैध तरीके से बसों, ट्रेनों, कारों के माध्यम से रोज दिल्ली से उत्तर भारत के शहरों और कस्बों में भेजा जाता है। जिस पर कोई बिक्री कर नहीं दिया जाता है। इस तरह दिल्ली सरकार के अधिकारियों एवं पुलिस वालों की मिलीभगत से अरबों रूपये के राजस्व की हानि होती है। चूंकि यह विभाग सीधे केजरीवाल के अधीन है, तो इसे दुरूस्त करना उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इससे दो लाभ होंगे, एक तो इस बात की परीक्षा हो जाएगी, अरविंद केजरीवाल के आह्वान पर दिल्ली की जनता न रिश्वत देगी, न लेगी, न सेल्स टैक्स चोरी करेगी, बल्कि हर सामान पर बिक्री कर चुकाकर पक्की रसीद लेगी। दूसरा लाभ ये होगा, इससे दिल्ली सरकार के कोष में एकदम से आमदनी कई गुना बढ़ जाएगी। फिर उस आमदनी से केजरीवाल गरीब वर्ग को सब्सिडी भी दे सकते हैं। हां, एक नुकसान जरूर होगा कि जैसे ही दिल्ली के बाजारों में अवैध कारोबार बन्द होगा और कर देकर क्रय और विक्रय किया जाएगा, वैसे ही महंगाई तेजी से बढ़ जाएगी। पर भ्रष्टाचार से लड़ने की यह कीमत तो केजरीवाल और दिल्ली की जनता को चुकानी होगी।
केजरीवाल के अब तक के वक्तव्यों में दो बातों पर लगातार जोर रहा है कि देश की बर्बादी के लिए भ्रष्टाचार मूल कारण है। वे और उनकी सरकार भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकेगे और दोषियों को फौरन जेल में डाल देंगे। ऐसी घोषणाएं अरविंद ने खुले मंचों से बार-बार की हैं। अब उनकी परीक्षा का समय आ गया है। दिल्ली की जनता, मीडिया और विपक्षीय दल उत्सुकता से इंतजार कर रहे हैं कि केजरीवाल सरकार कितने भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं को आने वाले दिनों में जेल पहुंचाती है। विश्वासमत पारित हो या न हो केजरीवाल की टीम को इसकी परवाह नहीं है। उन्होंने जनता की अपेक्षाओं को इस तरह पकड़ा है कि अभी कुछ महीनों तक इसी प्रवाह में गाड़ी खिच जाएगी और लोकसभा चुनाव आ जाएगा। अरविंद के कॉलेज के साथी यह बताने में संकोच नहीं करते कि अरविंद का बचपन से सपना प्रधानमंत्री बनने का रहा है। आज जो हवा चल रही है और दिल्ली से अरविंद जो संदेश दे रहे हैं, उससे यह असंभव नहीं लगता कि आगामी लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी महानगरों और अन्य नगरों से इतने सांसद चुनकर ले आए कि अगली सरकार वे एक निर्णायक भूमिका निभा सकें। ऐसी स्थिति में जब चंद्रशेखर, आई0के0 गुजराल व देवगौड़ा जैसे प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो अरविंद केजरीवाल क्यों नहीं ? पर सवाल है कि जनलोकपाल विधेयक की लड़ाई और ये सारा तेवर क्या प्रधानमंत्री पद की प्राप्ति तक ही सिमट कर रह जाएगा या भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने के केजरीवाल के दावे और बयान उन्हें अपना फर्ज बार-बार याद दिलाते रहेंगे और वे इसके लिए एक दिन भी इंतजार नहीं करेंगे। अगर केजरीवाल मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए पहले दिन से भ्रष्टाचार पर प्रभावी लगाम कस पाते हैं और जनता उनसे प्रेरणा लेकर भ्रष्टाचार न करने का संकल्प ले लेती है, तो वास्तव में भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक एतिहासिक उपलब्धि होगी। पर असल में क्या होता है यह आने वाले कुछ हफ्तों में साफ हो जाएगा।

Monday, December 16, 2013

केजरीवाल जी, जिम्मेदारी से मत भागिए

सरकार न बनाने का केजरीवाल जो भी कारण बतायें या सरकार बनाने कि जो भी शर्तें रखें, एक बात तो साफ़ दीख रही है कि उनकी टीम ज़िम्मेदारी लेने से भाग रही है | दरअसल किसी कि आलोचना करना और उस पर ऊँगली उठाना सबसे सरल काम है | पर कुछ करके दिखाना बहुत मुश्किल होता है | ऊँगली उठाने वाले को केवल सामने वाले कि गलतियाँ ढूंढने का हुनर आना चाहिये, फिर वो टीवी चैनल पर शोर मचा सकता है, अख़बारों में लेख लिख सकता है और मौहल्लों कि जन सभाओं में जा कर ताली या वोट बटोर सकता है | पर काम करने वाले को हजारों मुश्किलों का सामना करना पड़ता है | फिर भी अगर वो हिम्मत नहीं हारता और काम करके दिखने में जुटा रहता है तो भी उसके आलोचक कम नहीं होते | उसे सफलता मिले या न मिले वो बाद कि बात है | पर कहावत है कि ‘गिरते हैं शै सवार ही मैदान ए जंग में, वो क्या लड़ेंगे जो घुटनों के बल चले’ | अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव लड़ने का झोखिम तो बहादुरी से उठाया और अपेक्षा से ज्यादा सफलता भी हासिल की पर सरकार बनाने में वे जोखिम लेने से डर रहे हैं |
कारण साफ़ है | चुनाव लड़ते वक्त रणनीति होती है कि विरोधियों पर हमला बोलो और मतदाताओं को बड़े-बड़े सपने दिखाओ | केजरीवाल ने ये दोनों काम बड़ी कुशलता से करे हैं | पर अब परीक्षा कि घड़ी है| सरकार बना लेते हैं और वायदे पूरे नहीं कर पाते तो मतदाता इन्हें दौड़ा लेगा | अपने वायदे पूरे करना गधे के सिर पर सींग उगाने जैसा है | इसलिए कांग्रेस और भाजपा आआपा को बिना शर्त समर्थन देने को तैयार हैं | इन्हें विश्वास है कि केजरीवाल सरकार बना कर जल्दी ही विफल हो जाएंगे | पर ऐसा हो यह ज़रूरी नहीं | अगर केजरीवाल सफल हो गए तो पूरे उत्तर भारत में पुराने दलों को चुनौती देंगे | अगर विफल हो गए तो एक बुलबुले कि तरह फूट जाएंगे |
आआपा का यह कहना गलत नहीं है कि ये दल कुछ समय बाद छल करके उसकी सरकार गिरा देंगे | पर योद्धा ऐसी आशंकाओं से डरा नहीं करते | अगर सरकार गिरने कि नौबत आ भी जायेगी तो केजरीवाल तब तक अपने जितने वायदे पूरे कर पाएंगे उन्ही के आधार पर संसदीय चुनाव लड़ सकते हैं | पर केजरीवाल को मालूम है कि बंद मुठ्ठी लाख की खुल गयी तो खाक  की | इसलिए वे अपनी लोकप्रियता के घोड़े पर चढ़ कर संसद में प्रवेश करना चाहते हैं | वे संसदीय चुनाव तक अपनी मुठ्ठी खोलना नहीं चाहते | इस सबसे न सिर्फ दिल्ली के मतदाताओं में असमंजस बना हुआ है बल्कि राजनैतिक पारिदृश्य में भी अनिश्चितता है |
इससे तो यही लगता है कि टीम केजरीवाल का मकसद केवल हंगामा खड़ा करना है | लोकतंत्र के इतिहास में ऐसे तमाम उदहारण है जब व्यवस्था पर हमला करने वाले अपनी इसी भूमिका का मज़ा लेते हैं और अपनी आक्रामक शैली के कारण चर्चा में बने रहते हैं | पर वे समाज को कभी कुछ ठोस दे नहीं पाते, सिवाए सपने दिखने के | ऐसे लोग समाज का बड़ा अहित करते हैं| हाल के वर्षों में भारत और दुनियां के कई देशों में जहाँ-जहाँ ऐसे समूह वाचाल हुए वहां वहां सुधरा तो कुछ नहीं, जो चल रहा था वह भी पटरी से उतर गया | उन समाजों में हिंसा, अपराध, बेरोज़गारी व आर्थिक अस्थिरता पैदा हो गयी है | हालात बद से बदतर हो गए हैं| दरअसल हंगामा करने वाले समूह अंत में केवल अपना भला ही करते हैं | चाहे दावे वो कितने भी बड़े करें | अब लोकपाल विधेयक को ही ले लें, अन्ना सरकारी विधेयक से संतुष्ट हैं मगर आआपा इसे जोकपाल बता रही है | जबकि हम पिछले तीन वर्षों से डंके की चोट पर कहते आ रहे हैं कि केजरीवाल का जनलोकपाल भी देश में  भ्रष्टाचार कतई नहीं रोक पायेगा | क्यूंकि उनके इस विधेयक को बनाने वाले ही न केवल भ्रष्ट हैं बल्कि उन्होंने आज से २० वर्ष पहले भ्रष्टाचार के विरुद्ध भारत के सबसे बड़े संघर्ष को सफलता की अंतिम सीढ़ी से नीचे गिराने की गद्दारी की थी | गाँधी की समाधी पर शपथ ले कर धरने देने वाले केजरीवाल को यह नहीं भूलना चाहिए कि दोहरे चरित्र के लोग अशुद्ध साधन जैसे हैं उनसे शुद्ध साध्य प्राप्त नहीं कर सकते |
पूरी दिल्ली उनके साथ न हो पर तिहाही दिल्ली का समर्थन जुटा कर अब जब केजरीवाल ने चुनावी मैदान में बाजी मार ही ली है तो सरकार बना कर अपने वायदे पूरे करने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिए | जब प्यार किया तो डरना क्या | जनता समाधान चाहती है – कोरे वायदे और सपने नहीं | वह बहुत दिन तक धीरज नहीं रख पाती |