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Monday, August 3, 2026

आंदोलन के नाम पर हद की बेशर्मी !

नीट पेपर लीक पर ‘जेन-ज़ी’ का जंतर मंतर पर हुआ धरना पिछले हफ्तों में पूरी दुनिया के मीडिया में चर्चा में रहा। धरने का उद्देश्य ग़लत नहीं था। इतनी बड़ी परीक्षा का पेपर लीक होना मामूली बात नहीं है। लाखों छात्रों के जीवन और सपनों से खिलवाड़ करने वाले चाहे जो भी हों उन्हें बख्शा नहीं जाना चाहिए। आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिस की जो दमनकारी लाठियां चलीं उसकी कतई ज़रूरत नहीं थी। दिल्ली के पुलिस आयुक्त लोकतांत्रिक मर्यादा की सीमाओं में रह कर कूट नीति से भी समस्या का समाधान कर सकते थे। कहीं ऐसा तो नहीं है कि क़ानून और व्यवस्था संभालने की अनुभव शून्यता के कारण उन्होंने ऐसा कदम उठाया? कोई पुलिस अधिकारी हो या प्रशासनिक अधिकारी, छात्र जीवन में सभी क्रांतिकारी होते हैं। इसलिए हताश छात्रों पर हिंसक हमला करने से पहले उन्हें दस बार सोचना चाहिए। आख़िर उनके घर में भी तो युवा विद्यार्थी होंगे। 



बावजूद इसके इस आंदोलन को जो कुछ सफलता मिली, उसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। अब तक इस मुद्दे पर काफ़ी कुछ लिखा और कहा जा चुका है। संसद में भी इस पर तीखी झड़पें हो रही हैं। अब तो सरकार ने पेपर लीक के खिलाफ संशोधन बिल भी पेश कर दिया है। इसलिए आंदोलन के उन पक्षों पर नया कुछ नहीं लिख रहा। पर इस आंदोलन की जिस बात ने मुझे बहुत विचलित किया है, वो है भाषा की अभद्रता। जिसने शालीनता की सारी हदें पार कर लीं। अगर मुझ पर लिंगभेद का आरोप न लगे तो मैं ये खुल कर कहना चाहूँगा कि जिस तरह की गंदी गालियाँ, अश्लील भंगिमाएँ और नारेबाजी आंदोलन में शामिल कुछ लड़कियों ने की वो एक सभ्य समाज में क़तई स्वीकार नहीं की जा सकती। लड़कियों का मैं खासतौर पर इसलिए उल्लेख कर रहा हूँ क्योंकि अब तक भारतीय समाज में लड़कियों को कभी ऐसी अश्लील भाषा का प्रयोग करते नहीं देखा गया था। लड़के तो प्रायः गाली-गलौज की भाषा में बात करते ही हैं। पर सब लड़के ऐसे नहीं होते। ज़्यादातर मर्यादित भाषा का ही प्रयोग करते हैं। चूँकि मैं पिछले 50 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूँ इसलिए अक्सर मेरे मुंह से ‘साला’ गाली निकल जाती है। मेरे बेटे जो अब 40 वर्ष के आस-पास हैं, बचपन से ही मुझे इस पर टोकते आए हैं, आप कैसी भाषा बोलते हैं? इसलिए मैं ये सावधानी बरतता हूँ कि अपने परिवार के सामने, ‘साला’ जैसी गाली का भी प्रयोग न करूँ। 



हमारा परिवार कोई अनूठा नहीं हैं। भारत के करोड़ों परिवारों में भाषा की मर्यादा और व्यवहार में शालीनता का पाठ बचपन से ही पढ़ाया जाता है। यही हमारे सनातन संस्कार हैं। जंतर-मंतर के प्रदर्शन में कुछ छात्रों ने जिस अभद्र भाषा का प्रयोग किया वो सोशल मीडिया के माध्यम से घर-घर और गाँव-गाँव तक पहुँचा। जरा सोचिए कि शालीनता के दायरे में रहने वाले करोड़ों युवक-युवतियों पर इसका क्या असर पड़ा होगा? अभिजात्य वर्ग के या पढ़े-लिखे समाज के युवाओं के इस निकृष्ट व्यवहार को देख कर हो सकता है कि गाँवों में रहने वाले लड़के-लड़कियां भी आधुनिक दिखने की ललक में इस तरह की अशिष्ट भाषा का प्रयोग करने लगें। दूसरी तरफ़ दिल्ली की झुग्गियों में पला बढ़ा एक निर्धन नौजवान मोहम्मद इरफान इसी आंदोलन में रातों-रात पूरे देश के युवाओं के लिए एक मिसाल बन कर सामने आया है। ग़रीब परिवार में पैदा हुए इरफ़ान के पास औपचारिक शिक्षा की डिग्रियाँ नहीं हैं। पर जिस संयत भाषा में उसने इस आंदोलन के मुद्दों को मीडिया के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया, वो क़ाबिले तारीफ़ है। संविधान से लेकर, देश के राजनैतिक इतिहास, सामाजिक आर्थिक बदहाली और सनातन धर्म की गहराइयों तक जिस ज्ञान का प्रदर्शन उसने किया वो आश्चर्यचकित करने वाला है। इरफान का व्यक्तित्व इस आंदोलन के उन उद्दंड और संस्कारहीन युवाओं के गाल पर सीधा तमाचा है।      



इसी क्रम में यहाँ मैं एक और चिंतनीय प्रवृत्ति की ओर इशारा करना चाहूँगा। पिछले कुछ वर्षों से महानगरों में ‘स्टैंड-अप कॉमेडी’ का एक नया चलन शुरू हुआ है। लोकतंत्र में समाज और सरकार पर कटाक्ष करने के अनेक माध्यम होते हैं। प्राचीन काल से ये कार्य विदूषक करते आए हैं। आज के दौर में वही ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन हैं। तनाव भरे जीवन में हँसना-हँसना सबको राहत देता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो कॉर्पोरेट जगत में कम उम्र में ही बुलंदियों को छूने वाले युवा, आज सबसे ज़्यादा तनाव ग्रस्त हैं। चाहे उनकी आमदनी शेष युवाओं की तुलना में कई गुना ज़्यादा हो, पर कॉर्पोरेट जगत की संस्कृति ही ऐसी है कि ये युवा लगातार मानसिक तनाव में जीते हैं। इसलिए बेंगलुरु, मुंबई, गुरुग्राम जैसे शहरों में अचानक ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन की बाढ़ आ गई है। इनमें अधिकतर कॉमेडियन ऐसे हैं जो अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, सामाजिक-राजनैतिक समझ और अपने इर्द-गिर्द की दुनिया पर पैनी नज़र रख कर जो कुछ प्रस्तुत करते हैं वो न सिर्फ़ श्रोताओं को हँसी से लोटपोट कर देता है, बल्कि सरकार और समाज की कमज़ोरियों को सहज ही उजागर कर देता है। 


इन्हीं ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियनों में कुछ पुरुष और महिला ऐसे भी हैं जो अत्यंत निम्न कोटि की भाषा का प्रयोग करके कामुकता और अश्लीलता का ‘फूहड़ मनोरंजन’ प्रस्तुत करते हैं। जिस श्रोता समूह के सामने ये लोग इस तरह की प्रस्तुतियां करते हैं वो पढ़ा-लिखा, संपन्न और कैरियर में सफल व्यक्ति होता है। इसलिए उसमें इतना विवेक होता है कि वो ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडी हॉल के बाहर निकल कर उस माहौल को भूल जाता है और अपने कार्य-क्षेत्र, समाज और परिवार में अनुशासित जीवन जीता है। पर सोशल मीडिया के माध्यम से जब ऐसे ‘शो’ घर-घर पहुँच जाते हैं तो उन युवाओं के दिमाग पर ग़लत असर डालते हैं जो अपने परिवार की कमज़ोर आर्थिक स्थिति में रहकर अपने कैरियर को बनाने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। ऐसी भाषा प्रयोग करने वाले ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन को सरकार कानून की मदद से अनुशासित या दंडित करे तो यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला माना जाएगा। पर अभिव्यक्त की आज़ादी का अधिकार हमें समाज में गंदगी फैलाने की छूट नहीं देता। इसके लिए आत्मसंयम बहुत ज़रूरी है। फिर वो चाहे कॉमेडियन हों या किसी राजनैतिक दल के कार्यकर्ता।  

Monday, June 10, 2019

विश्व में तेल और गैस के अकूत भंडार उपलब्ध हैं

एक महीना पहले पेट्रोल मंत्रालय ने नोटिफिकेशन निकालकर भारत में तेल और गैस निकालने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर छूट और सुविधाओं की घोषणा करते हुए देशी और विदेशी कंपनियों को आमंत्रित किया। उसके फलस्वरूप एक सप्ताह पहले देश के 85 प्रतिशत तेल और गैस के बचे-खुचे भंडारों का ठेका अनेक कंपनियो को दे दिया गया और अभी हाल ही  में पश्चिमी उ0प्र0 के बागपत क्षेत्र से तेल की खुदाई के लिए काम भी शुरू हो गया। स्मरण रहे कि सेटेलाइट द्वारा ‘हाईपर स्पैक्ट्रल इमिजिंग’ की तकनीक के माध्यम से पूरे धरती की 35 किमी. तक गहरी ^crustal layers* की ‘सिग्नेचर फाइल्स’ कई साल पहले विश्व के कई देशों ने पहले से ही तैयार कर रखीं है। इन फाइल्स के अंदर धरती माता के गर्भ में कहाँ-कहाँ तेल और गैस के कितने भंडार हैं, सोने-चाँदी के कितने भंडार हैं, हीरे-रत्नों के कितने भंडार हैं, तांबे-लोहे के कितने भंडार है, आदि को चिन्ह्ति किये जा चुका है। दुर्भाग्यवश कुछ देश अभी तक इस सूचना से वंचित हैं।
अगर इन फाइलों को विश्व कल्याण हेतु सार्वजनिक कर दिया जाए, तो विश्व के 771 करोड़ लोगों की गरीबी, भुखमरी, बदहाली 3 महीने के अंदर दूर हो सकती है। ये बहुत महत्वपूर्णं ‘कम्युनिकेशन गैप’ है, जिसके कारण पूरे विश्व में एक अनिश्चितता और घबराहट का वातावरण छाया हुआ है। चूंकि ये युग परिवर्तन की शुभ और पवित्र बेला है, इसलिए पिछले दिनों ‘ईलौन मस्क’ जैसे उदारशील महापुरूष ने अपनी ‘टेस्ला कार’ का पेटेंट ‘पब्लिक इंट्रस्ट’ में मुफ्त में देने की घोषणा कर दी। उधर बिल गेट्स और स्टीव जॉब जैसे ‘इंटरप्रन्यार्स’ ने जनहित में अपनी फाउंडेशंस के माध्यम से धन के भंडार दान में दे दिये। हम आशा करते हैं अगर अमेरिका भारत को तेल और गैस बेचने के लिए ऑफर कर सकता है, तो वो विश्व कल्याण हेतु जो ‘हाईपर स्पैक्ट्रल इमिजिंग’ की जो सिग्नेचर फाइल्स हैं, उनको भी मुफ्त में सार्वजनिक कर दे। ऐसा करने से विश्व के जितने विकासशील देश हैं, उनके प्राकृतिक संसाधन ‘पब्लिक डोमेन’ में आ जाने से डिमांड और सप्लाई की रस्साकशी खत्म हो जाएगी। धरती माता जिसको वेदों में कामधेनु और वसुंधरा के नाम से अलंकृत किया गया है, उसके 771 करोड़ बच्चे खुशहाल और संपन्न हो जाऐंगे।
पैट्रोलियम मंत्रालय ने पिछले महीने तेल और गैस की नीति सुधारने के लिए जब अधिसूचना जारी की, तो उसमें ‘सिस्मिक सर्वे’ को तो 20 प्रतिशत ‘वेटेज’ दिया गया। मगर ‘हाईपर स्पैक्ट्रल इमिजिंग’ की ‘सिग्नेचर फाईल्स’ की चर्चा नहीं की गई। अगर भारत को ‘सुपर पॉवर’ बनना है, तो ईसरो के सेटेलाईट के माध्यम से अपनी ‘पर्सनल सिग्नेचर फाईल्स’ तुरंत तैयार करके अपने देश के प्राकृतिक संसाधानों का नियोजित दोहन करना शुरू करना होगा। इस देव भूमि भारत में प्राकृतिक संसाधनों के अकूत भंडार विद्यमान हैं। मगर ‘कम्युनिकेशन गैप’ होने की बजह से हम अपने देश का 10 लाख करोड़ रूपया हर साल तेल और गैस के आयात में फिजूल में बर्बाद कर देते हैं। अगर ये पैसा बच जाऐ, तो देश विकसित देशों की श्रेणी में आ जाऐगा।
सर्वविदित है कि छत्तीसगढ़ में हीरों की विश्व की सबसे कीमती और महत्वपूर्णं खान का ‘हाईपर स्पैक्ट्रल इमिजिंग’ की तकनीक के द्वारा ही पता लगा है। हमें अब ‘सिस्मिक सर्वे’ जैसी कमजोर और अधूरी तकनीक के भरोसे नहीं रहना चाहिए। याद रहे कि सर्जिकल स्ट्राइक और ओसामा के ऊपर हमले में भी इसी ‘हाईपर स्पैक्ट्रल इमिजिंग’ की तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। अर्थर्वेद के भूमि सूक्त के बारहवें मंत्र (यत्ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जस्तन्वः संबभूवुः। तासु नो धेह्यभि नः पवस्व माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः।।)  की दूसरी लाईन में अथर्वाऋषि ने धरती की नाभि से निकलने वाली ‘इंफ्रा रैड रेडिएशंस’ के उद्गम स्थल के महत्व को सारगर्भित कहकर प्रशंसा की है। यही ‘इंफ्रा रैड रेडिएशंस’ धरती की नाभि से चलते हुए धरती की सतह को क्रॉस करके सेटेलाइट के कैमरे में पहुंचकर ‘हाईपर स्पैक्ट्रल इमिजिंग’ को अमलीय जामा पहनाती हैं। इसलिए अर्थवा ऋषि ने धरती की नाभि के ऊपर सभी विद्वानों को अपना ध्यान केंद्रित करने के लिए वाहरवें मंत्र में उपदेश दिया है। याद रहे इसी धरती की नाभि से ^magnetosphere’ का उद्गम होता है। जोकि धरती की सतह से 70000 किमी की ऊँचाईं पर जाकर एक महत्वपूर्णं छाता तैयार करता है। इस छाते की मदद से सूर्य से आने वाली घातक सोलर विंड’ के ‘इलैक्ट्रिकली चार्ज पार्टिकल्र्स’ धरती के उत्तरी और दक्षिणी धु्रवों की तरफ डाईवर्ट हो जाते हैं। अगर ये ‘मैग्नेटो सफियर’ छाता न हो, तो धरती के ऊपर बसने वाले 771 करोड़ आदमी एक दिन में चनों की तरह भुन जाऐंगे और धरती पर बसी हुई सारी सृष्टि जलकर राख हो जाऐगी। इसलिए अथर्वा ऋषि ने भूमि सूक्त के वारहवें मंत्र में धरती की नाभि से निकलने वाली ऊर्जा को धरती के अस्तित्व के लिए और धरती पर बसने वाले धरतीवासियों के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्णं बताया है।
अब आगे पाठकों को हम हम बता दें कि इन्हीं ‘इंफ्रा रैड रेडिएशंस’ से धरती की सतह जो है, वो पवित्र (स्टेरेलाईज) होती है। नहीं तो धरती के ऊपर बहुत सारी काई जम जाती और धरतीवासी महामारियों से मर जाते। तो कुल मिलाकर भूमि का सबसे महत्वूपूर्णं अंग उसकी नाभि और उससे निकलने वाली अनेक प्रकार की ऊर्जा ही है और साथ ही साथ यह जो धरती फुटबॉल की तरह फूली हुई है, उसको फुलाऐ रखने में इसी ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्णं योगदान है। नहीं तो यह धरती जो फुटबॉल की तरह फूली हुई है, ये सिकुड़कर टेबिल टेनिस का बॉल बन जाती और पूरे के पूरे विश्व के देश 6500 किमी. नीचे धंस जाते। इसी तथ्य को भगवान श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को उपदेश देते हुए श्रीमद्भगवतगीता के 15वें अध्याय के 13 वें श्लोक की प्रथम पंक्ति में कहा है ‘गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा’। इसी पंक्ति का सरलार्थ करते हुए आदि शंकराचार्य ने लिखा है कि ये ऊर्जा की मात्रा संतुलित है। अगर ये ऊर्जा की मात्रा कम हो जाऐ, तो यह धरती नीचे धंस जाएगी और यदि ऊर्जा की मात्रा अधिक हो जाऐ, तो धरती जरूरत से ज्यादा फूलकर गुब्बारे की तरह फट जाऐगी। ये संतुलन सातवें आसमान में स्थित अमृत पुंज द्वारा किया जाता है। जिसकी चर्चा अथर्वा ऋषि ने भूमि सूक्त के आंठवें मंत्र की दूसरी पंक्ति ‘यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः’ में की है। इन सूचनाओं के स्रोत वैदिक वैज्ञानिक सूर्यप्रकाश कपूर इस गुप्त रहस्य या पृथ्वी के अमृत पुंज से, जिसको श्रीमद्भगवत्गीता में घन परमेश्वर कहा गया है, प्रार्थना करते हैं कि वो विश्व के कल्याण हेतु विकसित देशों को ‘सिग्नेचर फाइल्स’ को सार्वजनिक करने की सद्बुद्धि प्रदान करें।