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Monday, January 5, 2026

नेताओं की भाषा का गिरता स्तर चिंताजनक 

भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसके नेताओं की गरिमा और संवाद की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। लेकिन हाल के वर्षों में, राजनीतिक भाषणों व बयानों में अभद्र टिप्पणियां व असंसदीय भाषा, गाली-गलौज का बढ़ता प्रयोग एक गंभीर मुद्दा बन गया है। यह न केवल संसद और विधानसभाओं तक सीमित है, बल्कि चुनावी रैलियों, मीडिया इंटरव्यू और सोशल मीडिया पर भी फैल चुका है। यह मुद्दा इतना संवेदनशील बन चुका है कि राजनीतिक दल चाहे कोई भी क्यों न हो उनके बिगड़े बोल, आम नागरिकों, पार्टी कार्यकर्ताओं और मीडिया पर एक नकारात्मक प्रभाव  डालते हैं। साथ ही, महिलाओं, विपक्षी दलों और पत्रकारों के प्रति नेताओं के दुर्व्यवहार भी आजकल चर्चा में है जो कि इन अमर्यादित नेताओं के सच्चे चरित्र को सामने लाता है।


संसदीय परंपराओं में, असंसदीय भाषा वह होती है जो अपमानजनक, अभद्र या व्यक्तिगत हमला करने वाली होती है। भारतीय संसद में, स्पीकर अक्सर ऐसी भाषा को हटाने का आदेश देते हैं, लेकिन संसद के बाहर ऐसे बयानों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता। राजनीतिक नेता अक्सर विपक्षी नेताओं को 'चोर', 'गद्दार' या इससे भी बदतर शब्दों से संबोधित करते हैं। चुनावी मौसम में यह और तीव्र हो जाता है, जहां व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की जगह ले लेते हैं। गौरतलब है कि कुछ नेताओं की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के युग में यह वायरल होकर लाखों लोगों तक पहुंच जाती है, जिससे समाज पर इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।


भारतीय वोटर या नागरिक अपनी पसंद अनुसार राजनीतिक दलों का समर्थन करते हैं और उन दलों के नेताओं को अपना आदर्श भी मानते हैं। जब नेता सार्वजनिक मंचों पर गाली-गलौज करते हैं, तो यह नागरिकों में नेतृत्व के प्रति सम्मान की भावना को कमजोर करता है। विशेषकर युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है, इससे प्रभावित होती है। वे सोचते हैं कि अगर देश के लोकप्रिय नेता खुले मंचों पर ही ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं, तो सामान्य जीवन में क्या करते होंगे? इससे समाज में असहिष्णुता और हिंसा की संस्कृति पनपती है। उदाहरणस्वरूप, जब कोई नेता विपक्षी को 'कुत्ता' या 'सुअर' जैसे शब्दों से नवाजता है, तो यह न केवल उस व्यक्ति का अपमान है, बल्कि पूरे लोकतंत्र का मजाक उड़ाता है। नागरिकों में यह धारणा बनती है कि राजनीति एक गंदा खेल है, जहां नैतिकता की कोई जगह नहीं। परिणामस्वरूप, मतदान में उदासीनता बढ़ती है और लोग राजनीति से दूर होते जाते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार, कई नागरिकों का मानना है कि ऐसी भाषा से राजनीति की विश्वसनीयता घटती है, जिससे लोकतंत्र कमजोर होता है।


राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अपने नेताओं को आदर्श मानकर उनका अनुसरण करते हैं। जब शीर्ष नेता असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो यह कार्यकर्ताओं में भी वैसी ही प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है। चुनावी रैलियों में कार्यकर्ता विपक्षी दलों के खिलाफ नारे लगाते समय अक्सर अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जो कभी-कभी हिंसक झड़पों में बदल जाता है। इससे दल के अंदर अनुशासनहीनता बढ़ती है और कार्यकर्ता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा में उलझ जाते हैं। इसके अलावा, जब कोई नेता अपनी ही पार्टी के सदस्यों के खिलाफ ऐसी भाषा इस्तेमाल करता है (जैसे असंतोषी सदस्यों को 'गद्दार' कहना), तो यह आंतरिक कलह को जन्म देता है। पार्टी कार्यकर्ता निराश होते हैं और उनका मनोबल गिरता है। लंबे समय में, यह दलों की एकजुटता को प्रभावित करता है और राजनीतिक स्थिरता को खतरे में डालता है। कार्यकर्ता सोचते हैं कि अगर नेता ही सम्मान नहीं रखते, तो वे क्यों रखें? इससे राजनीतिक संस्कृति में गिरावट आती है।

वहीं मीडिया पर इसका प्रभाव सबसे अधिक चिंताजनक है। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो नेताओं से सवाल पूछकर जवाबदेही सुनिश्चित करती है। लेकिन जब पत्रकार तीखे सवाल पूछते हैं, तो कई नेता उन पर व्यक्तिगत हमला करते हैं या अभद्र व्यवहार करते हैं। उदाहरण के तौर पर, प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेता पत्रकारों को 'पेड मीडिया' या 'दलाल' कहकर अपमानित करते हैं। कभी-कभी यह शारीरिक धमकी तक पहुंच जाता है, जैसे कैमरा छीनना या बाहर निकालना। इससे मीडिया की स्वतंत्रता पर खतरा मंडराता है। पत्रकार डर के मारे सवाल पूछने से हिचकिचाते हैं, जिससे जनता को सच्ची जानकारी नहीं मिलती। सोशल मीडिया पर नेता पत्रकारों के खिलाफ ट्रोल आर्मी को सक्रिय करते हैं, जो अभद्र टिप्पणियों से उन्हें परेशान करते हैं। यह न केवल मीडिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है, बल्कि पत्रकारों की सुरक्षा को भी खतरे में डालता है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भारत में पत्रकारों पर हमलों की संख्या बढ़ने का उल्लेख है, और असंसदीय भाषा इसका एक प्रमुख कारण है।

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन उनके खिलाफ लिंगभेदी टिप्पणियां एक बड़ी समस्या हैं। नेता अक्सर महिला विपक्षी नेताओं की शारीरिक बनावट, कपड़ों या व्यक्तिगत जीवन पर अभद्र टिप्पणियां करते हैं। जैसे 'आइटम' या 'डांस करने वाली' जैसे शब्दों का प्रयोग। यह न केवल महिलाओं का अपमान है, बल्कि पूरे समाज में लिंग असमानता को बढ़ावा देता है। इससे महिला कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है और वे राजनीति में आने से हिचकिचाती हैं। विपक्षी दलों के प्रति भी ऐसी भाषा का प्रयोग आम है। नीतिगत मतभेदों की बजाय, नेता व्यक्तिगत हमलों में उलझ जाते हैं, जैसे परिवार को निशाना बनाना या जाति-धर्म पर टिप्पणियां। इससे राजनीतिक बहस का स्तर गिरता है और समाज में विभाजन बढ़ता है। पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार का जिक्र पहले हो चुका है, लेकिन महिलाओं पत्रकारों के साथ यह और गंभीर होता है, जहां लिंगभेदी टिप्पणियां जोड़ी जाती हैं।

यह सब देखकर लगता है कि भारतीय राजनीति में सभ्यता की कमी एक बड़ी चुनौती है। लेकिन इसका समाधान क्या है? सबसे पहले, नेताओं को स्वयं अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में सख्त नियम लागू करने चाहिए और बाहर के मंचों पर भी नैतिक दिशानिर्देश। मीडिया को ऐसी भाषा को बढ़ावा न देकर, जिम्मेदारी से रिपोर्टिंग करनी चाहिए। नागरिकों को भी सोशल मीडिया पर ऐसी सामग्री को शेयर न करके, विरोध जताना चाहिए। राजनीतिक दलों को अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना चाहिए कि बहस नीतियों पर हो, न कि व्यक्तिगत हमलों पर। महिलाओं के प्रति सम्मान बढ़ाने के लिए जेंडर सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम चलाए जा सकते हैं। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून सख्त किए जाएं।

लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असंसदीय भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। अगर हम एक मजबूत भारत चाहते हैं, तो राजनीतिक बयानों व भाषणों को सभ्य बनाना होगा। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया सब मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी हमारा लोकतंत्र सच्चे अर्थों में चमकेगा। 

Monday, September 15, 2025

टीवी बहसों का गिरता स्तर चिंतनीय

भारत, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां संवाद और विमर्श लोकतंत्र की रीढ़ माने जाते हैं । वहां आज टीवी बहसें एक ऐसा मंच बन चुकी हैं जहां तर्क की जगह एक दूसरे का अपमान, चीख-पुकार और राजनीतिक दुष्प्रचार हावी हो गया है। प्राइम टाइम के इन शो में विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ता एक-दूसरे पर व्यक्तिगत हमले करते नजर आते हैं, जिससे बहसें निष्कर्षहीन हो जाती हैं। यह न केवल दर्शकों के समय की बर्बादी है, बल्कि समाज में ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाला एक खतरनाक माध्यम भी बन गया है। प्रवक्ताओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली अपमानजनक भाषा ने टीवी डिबेट्स को एक सर्कस का रूप दे दिया है। चैनल और एंकर ऐसे निरर्थक बहसों को क्यों बढ़ावा देते हैं? क्या यह टीआरपी की होड़ है या राजनीतिक दबाव?



टीवी बहसों का इतिहास भारत में 1990 के दशक से जुड़ा है , जब निजी चैनलों का आगमन हुआ। शुरू में ये बहसें मुद्दों पर तथ्यपरक चर्चा का माध्यम थीं, लेकिन आज वे एक शोरगुल भरी जंग बन चुकी हैं। विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्टों से स्पष्ट है कि भारतीय टीवी डिबेट्स में आक्रामकता और विषाक्त भाषा का स्तर चिंताजनक रूप से बढ़ा है। एक शोध के अनुसार, बहसों में एंकरों द्वारा आक्रामक लहजे का इस्तेमाल 80 प्रतिशत से अधिक होता है, जो दर्शकों पर नकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालता है। ये आंकड़े बताते हैं कि बहसें अब सूचना का स्रोत नहीं, बल्कि प्रचार का हथियार बन चुकी हैं। 


राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं द्वारा अपमानजनक भाषा का उपयोग इस समस्या का केंद्रीय बिंदु है। एक बहस के दौरान एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रवक्ता को दूसरी पार्टी के प्रवक्ता द्वारा ‘जयचंद’ और ‘गद्दार’ कहा गया, जिसे सुनकर  उस प्रवक्ता को हार्ट अटैक हुआ और उनकी मृत्यु हो गई। यह घटना टीवी डिबेट्स की विषाक्तता का जीता-जागता उदाहरण है। इसी तरह अन्य प्रवक्ता ने एक दूसरे प्रवक्ता को ‘नाली का कीड़ा’, ‘दादी मां’, ‘वैंप’ कहा या ‘उल्टा टाँग दूंगा’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते पाए गए हैं। एक प्रवक्ता ने तो बहस के दौरान दूसरे प्रवक्ता पर हाथ भी उठा दिया।



यह समस्या बढ़ रही है कम नहीं हुई। मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में एक टीवी बहस के दौरान एक नेता पर कुर्सी फेंकी गई, जिसके बाद एफआईआर भी दर्ज हुई। नवंबर 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक टीवी चैनल को एक प्रवक्ता के खिलाफ अपमानजनक क्लिप हटाने का आदेश दिया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि अपमान अब शारीरिक हिंसा तक पहुंच गया है। राजनीतिक दलों द्वारा ऐसे प्रवक्ताओं को चुना जाना भी एक चिंताजनक बात है। अधिकांश प्रवक्ता राजनीतिक अनुभव की कमी रखते हैं और केवल टीवी पर चिल्लाने के लिए नियुक्त होते हैं। यदि राजनैतिक दल  द्वारा योग्य प्रवक्ताओं को चुना गया होता, तो बहसें अधिक सभ्य और उत्पादक होतीं। लेकिन वर्तमान में, ये प्रवक्ता दलों के चेहरे बन चुके हैं, जो विचारधारा के बजाय व्यक्तिगत हमलों पर निर्भर हैं।



ऐसे स्तरहीन प्रवक्ताओं को चैनल क्यों आमंत्रित करते हैं? इसका मुख्य कारण टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट) है। शोरगुल भरी बहसें दर्शकों को आकर्षित करती रही हैं, क्योंकि वे मनोरंजन का रूप ले लेती हैं। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि आर्थिक दबावों के कारण ग्राउंड रिपोर्टिंग कम हो गई है और स्टूडियो डिबेट्स ही मुख्य सामग्री बन गई हैं। चैनल जानते हैं कि तर्कपूर्ण चर्चा से दर्शक भागते हैं, लेकिन चीख-पुकार उन्हें बांधे रखती है।


दूसरा कारण राजनीतिक दबाव का उदय है। टाइम मैगजीन के अनुसार, राज्य और पार्टी के विज्ञापन बजट चैनलों को नियंत्रित करते हैं। परिणामस्वरूप, बहसें सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने वाली बन जाती हैं। विपक्षी प्रवक्ताओं को अपमानित किया जाता है, जबकि सत्ताधारी प्रवक्ताओं को खुली छूट मिलती है। 2022 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने चैनलों को सलाह दी कि वे उत्तेजक भाषा वाली बहसें न दिखाएं। लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। चैनल जानबूझकर ऐसे प्रवक्ताओं को बुलाते हैं जो विवाद पैदा करें, क्योंकि यह सोशल मीडिया पर वायरल होता है और चैनल की पहुंच बढ़ाता है।


ऐसी बहसों के सामाजिक प्रभाव गंभीर हैं। वे समाज को ध्रुवीकृत करती हैं, विशेषकर हिंदू-मुस्लिम मुद्दों पर। एक शोध के अनुसार, बहसें 'फिक्स्ड मैच' की तरह होती हैं, जहां अपमान और झगड़े पूर्वनियोजित होते हैं। मुस्लिम पैनलिस्टों को 'एंटी-नेशनल' कहा जाता है, जो सांप्रदायिक हिंसा को भड़काता है। ‘गल्फ न्यूज’ की एक रिपोर्ट में कहा गया कि भारत के चैनल मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैला रहे हैं। युवाओं का एक वर्ग, जो रोजगार और शिक्षा चाहता है, इन बहसों से प्रभावित होकर हिंसक हो रहा है। लोकतंत्र में संवाद आवश्यक है, लेकिन यह विषाक्त संवाद समाज को कमजोर कर रहा है।


चैनल और एंकरों की जिम्मेदारी यहां महत्वपूर्ण है। वे मॉडरेटर हैं, न कि भागीदार। लेकिन अधिकांश एंकर, खुद अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। रेडिफ की एक रिपोर्ट में कहा गया कि बहसें 'विषैली' हो चुकी हैं। एंकर विपक्ष को बोलने न देकर, मात्र समय काटते हैं। यदि चैनल सख्त कोड ऑफ कंडक्ट लागू करें, तो स्थिति सुधर सकती है। लेकिन टीआरपी और राजनीतिक लाभ के लालच में वे अनदेखी करते हैं।


समाधान के लिए बहुआयामी प्रयास जरूरी हैं। सबसे पहले, राजनैतिक दलों को प्रवक्ताओं के चयन में सुधार करना चाहिए। केवल अनुभवी और सभ्य व्यक्तियों को ही टीवी पर भेजा जाए। दूसरा, ‘ट्राई’ और सूचना मंत्रालय को सख्त नियम लागू करने चाहिए, जैसे अपमानजनक भाषा पर तत्काल जुर्माना लगे। तीसरा, दर्शकों को जागरूक होना चाहिए; वे ऐसे चैनलों का बहिष्कार करें जो सनसनी फैलाते हैं। चौथा, स्वतंत्र मीडिया वॉचडॉग को मजबूत बनाना चाहिए। अंत में, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स जैसे यूट्यूब पर तथ्यपरक बहसें बढ़ावा दें, जहां सोशल मीडिया इंगेजमेंट सकारात्मक हो।


भारत की टीवी बहसें लोकतंत्र का मजाक बन चुकी हैं। अपमानजनक प्रवक्ताओं का बोलबाला न केवल बहसों को निरर्थक बनाता है, बल्कि समाज को विभाजित करता है। चैनल और एंकरों को यदि वास्तव में पत्रकारिता का सम्मान करना है, तो उन्हें टीआरपी के पीछे भागना छोड़कर जिम्मेदार संवाद को प्राथमिकता देनी चाहिए। अन्यथा, ये बहसें लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करती रहेंगी। समय आ गया है कि हम एक ऐसे मीडिया की मांग करें जहां तर्क जीते, न कि अपमान। केवल तभी भारत का लोकतंत्र मजबूत होगा।