Monday, March 16, 2026

अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर प्रभाव

दुनिया एक नए युद्ध की चपेट में है जो न केवल मध्य पूर्व को हिला रहा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति को भी प्रभावित कर रहा है। 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हवाई हमलों ने इस संघर्ष को एक पूर्ण युद्ध का रूप दे दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों और नौसेना को नष्ट करने का ऐलान किया है, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी ठिकानों और इज़राइल पर मिसाइलें दागी हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने से तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है। 


सवाल उठता है कि क्या यह युद्ध केवल अमेरिका की अहंकारपूर्ण कूटनीति का परिणाम है, जहां वह वैश्विक प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है और तेल तथा खनिज बाजार पर कब्जा जमाना चाहता है? या यह एक आवश्यक रक्षात्मक कदम है जो ईरान के परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए उठाया गया है? एक स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखें तो यह युद्ध अमेरिकी कूटनीति की विफलता का प्रतीक है, जहां वार्ता के बजाय सैन्य शक्ति पर जोर दिया गया। ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर अधिकतम दबाव की नीति अपनाई, लेकिन इससे ईरान और अधिक आक्रामक हो गया। रक्षा विशेषज्ञ जो कोस्टा का कहना है कि यह युद्ध अमेरिकी सैन्य तैयारियों को कमजोर कर रहा है, खासकर चीन के खिलाफ। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह तेल बाजार पर कब्जे की लड़ाई है, लेकिन इससे अमेरिका की वैश्विक स्थिति कमजोर हो सकती है।


भारत, जो अपनी 90% से अधिक कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, इस युद्ध से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल की आपूर्ति बाधित हो गई है, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ गया है। टीएस लोम्बार्ड की अर्थशास्त्री शुमिता देवेश्वर कहती हैं कि लंबे समय तक चलने वाला युद्ध भारत की रसद लागत और प्रेषण को प्रभावित करेगा। ऐसे में भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है, और मुद्रास्फीति बढ़ने से आम आदमी पर बोझ पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें पहले ही बढ़ी हुई हैं, जिससे परिवहन और कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।



रणनीतिक रूप से यह युद्ध भारत की विदेश नीति को जटिल बना रहा है। भारत ने ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह परियोजना में निवेश किया है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है। लेकिन युद्ध से यह परियोजना खतरे में आ गई है। वहीं, भारत-अरब-इज़राइल-यूरोप गलियारा (आईएमईसी) अब अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि ईरान की अस्थिरता से चाबहार का विकल्प सीमित हो गया है। रैंड के अर्थशास्त्री रफीक दोसानी कहते हैं कि अगर अमेरिका और इज़राइल जीतते हैं, तो आईएमईसी इज़राइल की प्राथमिकता बनेगा। 


इसके अलावा, मध्य पूर्व में रहने वाले लाखों प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ गई है। प्रेषण, जो भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, प्रभावित हो सकता है। हाल ही में ‘द हिंदू’ के एक संपादकीय में कहा गया है कि यह युद्ध भारत पर अपेक्षा से अधिक प्रभाव डालेगा और पड़ोसी क्षेत्र को और जटिल बनाएगा। भारत को अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते हुए ईरान के साथ संतुलन बनाना होगा, जो एक कूटनीतिक चुनौती है।


यह युद्ध अमेरिका की वैश्विक स्थिति को दोधारी तलवार की तरह प्रभावित कर रहा है। एक ओर, अमेरिका ने ईरान की नौसेना और मिसाइल क्षमताओं को काफी नुकसान पहुंचाया है, जो उसके सैन्य प्रभुत्व को दर्शाता है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि हमलों ने ईरान की नौसेना को ‘लड़ाई अक्षम’ बना दिया है। लेकिन लंबे समय में, यह युद्ध अमेरिकी संसाधनों को खींच सकता है। चैथम हाउस के विशेषज्ञों के अनुसार, लंबा युद्ध वैश्विक जीडीपी पर सीमित प्रभाव डालेगा, लेकिन उभरती अर्थव्यवस्थाओं को ऊर्जा कीमतों से नुकसान होगा। 


वैश्विक स्तर पर, यह युद्ध अमेरिका की कूटनीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है। यूरोप और एशिया में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जैसे एथेंस में हजारों लोगों का अमेरिकी दूतावास की ओर मार्च। चीन और रूस ईरान का समर्थन कर रहे हैं, जो बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत कर रहा है। अटलांटिक काउंसिल के विशेषज्ञों का कहना है कि चीन इस संघर्ष से फायदा उठा रहा है, क्योंकि ईरान उसका रणनीतिक साझेदार है। 


आर्थिक रूप से, अमेरिका ऊर्जा निर्यातक होने से कम प्रभावित है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान से मंदी का खतरा है। जेपी मॉर्गन के अर्थशास्त्री जोसेफ लुप्टन कहते हैं कि यह संघर्ष व्यापार युद्ध पर और दबाव डालेगा। अगर युद्ध क्षेत्रीय हो गया, तो तेल कीमतें 120 डॉलर तक पहुंच सकती हैं, जिससे अमेरिकी विकास दर नकारात्मक हो सकती है।


दुनिया भर के अधिकतर जानकारों का यह मत है कि यह युद्ध मुख्य रूप से अमेरिकी कूटनीति की विफलता है। ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते से बाहर निकालकर दबाव बढ़ाया, लेकिन इससे ईरान की आक्रामकता बढ़ी। तेल और खनिज बाजार पर कब्जे की महत्वाकांक्षा साफ दिखती है, क्योंकि होर्मुज का नियंत्रण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को नियंत्रित करता है। लेकिन यह अहंकारपूर्ण दृष्टिकोण है, क्योंकि हवाई हमले सरकार नहीं गिरा सकते। रक्षा विशेषज्ञ रॉब जॉनसन कहते हैं कि अमेरिका ईरान की वायु रक्षा को नष्ट कर सकता है, लेकिन लंबी अवधि में वैश्विक ऊर्जा स्थिरता प्रभावित होगी। 


कूटनीतिक विशेषज्ञ जेफरी फेल्टमैन और माइकल ओ'हैनलॉन का मानना है कि इस युद्ध के प्रभाव ईरान, मध्य पूर्व और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ेंगे। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुश्ताक हामी ने होर्मुज को बंद रखने की धमकी दी है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकती है। 

यह युद्ध न केवल ईरान की संप्रभुता का मुद्दा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का भी। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी चाहिए, जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान देना। अमेरिका को वार्ता की ओर लौटना चाहिए, वरना यह संघर्ष विश्व युद्ध का रूप ले सकता है। स्वतंत्र रूप से देखा जय तो, यह युद्ध अनावश्यक है और इससे सभी पक्ष हारेंगे। वैश्विक नेताओं को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि शांति बहाल हो सके। 

Monday, March 9, 2026

अमेरिका की कूटनीति नहीं दादागिरी!

आज दुनिया में हर ओर युद्ध, तबाही और अराजकता का दौर है। विकास की गति रुक रही है। अनिश्चितता का वातावरण है। अनेक देशों के नेता ही मवालियों की तरह बर्ताव कर रहे हैं। जबकि विश्व के लोग हमेशा शांति और विकास चाहते हैं। कोई भी युद्ध नहीं चाहता। हर कोई यह चाहता है कि दुनिया के हर मुल्क में स्थिरता का माहौल बना रहे। इसी उठा-पटक में अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सबसे आगे हैं। ट्रम्प ही क्यों, अमरीका की तो फ़ितरत ही रही है कि कोई बहाना ढूँढ कर कमजोर देशों को दबाना और उनके संसाधनों पर क़ब्ज़ा करना। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट ने अमेरिका की कूटनीति और युद्ध रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। 

सोशल मीडिया पर @sankofa360 से एक पोस्ट काफ़ी वायरल हुई जिसमें लिखा है कि, प्रिय दुनिया, क्या तुम अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा झूठ बोलने से थक नहीं गए हो? क्या तुम उस साम्राज्य से थक नहीं गए हो जो खून और मौत की तलाश में नहीं रुकता? उन्होंने कोरिया (1950–1953) के बारे में झूठ बोला, ग्वाटेमाला (1954) के बारे में, इंडोनेशिया (1958), क्यूबा (1961), वियतनाम (1961–1975), लाओस (1964–1973), कांगो (1964), डोमिनिकन रिपब्लिक (1965), कंबोडिया (1969–1970), ग्रेनाडा (1983), लेबनान (1983–1984), लीबिया (1986), ईरान (1987–1988), पनामा (1989), इराक (1991, 1998, 2003), सोमालिया (1992–1994, 2007–वर्तमान), बोस्निया (1994–1995), सूडान (1998), अफगानिस्तान (1998, 2001), यूगोस्लाविया (1999), यमन (2002–वर्तमान), पाकिस्तान (2004), सीरिया (2014), लीबिया (2011), वेनेजुएला (2026), क्यूबा (2026), ईरान (2026) के बारे में झूठ बोला। अमेरिका या उसके सहयोगी कभी किसी बात पर सच्चे रहे हैं? दुनिया कब इनके झूठ से ऊब जाएगी? अब तो हमें पता होना चाहिए कि वैश्विक अशांति, मौत, अराजकता और विनाश के जिम्मेदार कौन हैं? जो दुनिया की स्थिरता के खिलाफ हैं? जो विश्व शांति के विचार से डरते हैं? तुम्हारी चुप्पी सहयोग है! अमेरिका वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाला है। मौत और विनाश की मशीन! अमेरिकी साम्राज्य की तानाशाही के खिलाफ बोलो!!!



यह पोस्ट न केवल अमेरिका की ऐतिहासिक गलतियों को उजागर करती है बल्कि दुनिया को जगाने का प्रयास भी करती है। आज, जब हम वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान जैसे देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप की नई लहर देख रहे हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका के फैसले गलत साबित हो चुके हैं। इन युद्धों ने न केवल लाखों जानें लीं बल्कि दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेला। अमेरिका की इन गलतियों से यह पता चलता है कि वैश्विक समुदाय अब युद्धों से कितना ऊब चुका है?



अमेरिका की विदेश नीति का इतिहास झूठ, हस्तक्षेप और युद्धों से भरा पड़ा है। 1950 के दशक से शुरू करें तो कोरियाई युद्ध (1950-1953) में अमेरिका ने उत्तर कोरिया के आक्रमण का बहाना बनाकर हस्तक्षेप किया, लेकिन वास्तविकता यह थी कि यह शीत युद्ध की रणनीति का हिस्सा था। लाखों कोरियाई मारे गए, लेकिन क्या अमेरिका की जीत हुई? नहीं, यह युद्ध आज भी कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव का कारण बना हुआ है। इसी तरह, 1954 में ग्वाटेमाला में अमेरिका ने लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को उखाड़ फेंका, क्योंकि वहां की भूमि सुधार नीतियां अमेरिकी कंपनियों को पसंद नहीं आईं। सीआईए के ऑपरेशन ने देश को दशकों की अस्थिरता में डाल दिया। क्या यह फैसला सही साबित हुआ? नहीं, ग्वाटेमाला आज भी गरीबी और हिंसा से जूझ रहा है।



1950-60 के दशक से अमेरिका के झूठ की फेहरिस्त लंबी है। इंडोनेशिया (1958) में सीआईए ने विद्रोहियों को समर्थन दिया, लेकिन असफल रहा। क्यूबा (1961) में ‘बे ऑफ पिग्स’ हमला एक बड़ी असफलता थी, जहां अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो को हटाने की कोशिश की लेकिन खुद की किरकिरी हुई। वियतनाम युद्ध (1961-1975) तो अमेरिकी इतिहास का सबसे काला अध्याय है। अमेरिका ने 'टोंकिन की खाड़ी घटना' को बहाना बनाकर युद्ध शुरू किया, जो बाद में झूठ साबित हुआ। 58,000 अमेरिकी सैनिक और लाखों वियतनामी मारे गए। अमेरिका हारकर लौटा, और वियतनाम आज एक मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश है। क्या अमेरिका का फैसला सही था? नहीं, यह युद्ध अमेरिकी समाज को भी बांट गया। लाओस (1964-1973) और कंबोडिया (1969-1970) में गुप्त बमबारी ने लाखों लोगों को मार डाला और खमेर रूज जैसे आतंक को जन्म दिया। कांगो (1964) में अमेरिका ने वहाँ प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा की हत्या में भूमिका निभाई, जो अफ्रीका की आजादी के प्रतीक थे। डोमिनिकन रिपब्लिक (1965) में हस्तक्षेप ने लोकतंत्र को कुचला।



1980 के दशक में भी यह सिलसिला जारी रहा। ग्रेनाडा (1983) में अमेरिका ने मेडिकल छात्रों की सुरक्षा का बहाना बनाकर आक्रमण किया, लेकिन यह छोटे देश पर साम्राज्यवादी कब्जा था। लेबनान (1983-1984) में अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई, लेकिन कोई स्थायी शांति नहीं आई। लीबिया (1986) में कद्दाफी पर हमला, ईरान (1987-1988) में नौसेना संघर्ष, पनामा (1989) में नोरिएगा को हटाना – ये सभी फैसले अमेरिका की ताकत दिखाने के लिए थे, लेकिन उन्होंने क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाई। इराक के खिलाफ 1991 का गल्फ वॉर, 1998 की बमबारी और 2003 का आक्रमण 'महाविनाश के हथियारों' के झूठ पर आधारित था। सद्दाम हुसैन को हटाया गया, लेकिन इराक आज भी अराजकता में डूबा है, आईएसआईएस जैसे समूह पैदा हुए। सोमालिया (1992-1994, 2007-वर्तमान) में अमेरिकी हस्तक्षेप ने समुद्री डकैती और आतंकवाद बढ़ाया। बोस्निया (1994-1995) में नाटो हमले, सूडान (1998) में दूतावास बमबारी, अफगानिस्तान (1998, 2001) में तालिबान के खिलाफ युद्ध – ये सभी अमेरिका की ‘आतंकवाद विरोधी’ नीति के नाम पर थे, लेकिन अफगानिस्तान से 2021 की शर्मनाक वापसी ने साबित किया कि 20 साल का युद्ध व्यर्थ था।


यूगोस्लाविया (1999) में नाटो बमबारी ने कोसोवो को अलग किया, लेकिन जातीय तनाव आज भी हैं। यमन (2002-वर्तमान) में ड्रोन हमलों ने नागरिकों को मार डाला, पाकिस्तान (2004) में भी यही हुआ। सीरिया (2014) में आईएसआईएस के खिलाफ हस्तक्षेप ने देश को बर्बाद कर दिया। लीबिया (2011) में कद्दाफी को हटाने के बाद देश गृहयुद्ध में फंस गया। और अब 2026 में वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान पर झूठ। वेनेजुएला में अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए और विपक्ष को समर्थन दिया, दावा किया कि मदुरो तानाशाह है, लेकिन यह तेल संसाधनों पर कब्जे की कोशिश है। क्यूबा पर दशकों से प्रतिबंध, लेकिन 2026 में नए आरोप लगाकर दबाव बढ़ाया जा रहा है। ईरान पर परमाणु कार्यक्रम के बहाने हमले की धमकी, जबकि ईरान शांति समझौते चाहता है। ये सभी फैसले गलत साबित हो चुके हैं क्योंकि उन्होंने न केवल लक्षित देशों को नुकसान पहुंचाया बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। 


संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स बताती हैं कि युद्धों से करोड़ों लोग विस्थापित हुए, अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गईं। यूक्रेन-रूस संघर्ष और इजराइल-फिलिस्तीन विवाद में अमेरिका की भूमिका ने दिखाया कि वह शांति दलाल नहीं, बल्कि युद्ध उकसाने वाला है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश अब चीन और रूस जैसे भागीदारों की ओर मुड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये देश शांति और विकास पर जोर देते हैं। ब्रिक्स जैसे संगठन अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर #NoMoreWars जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। प्यू रिसर्च के सर्वे बताते हैं कि 70% से ज्यादा वैश्विक नागरिक युद्ध विरोधी हैं। कोरोना महामारी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने साबित किया कि दुनिया को सहयोग चाहिए, न कि संघर्ष।

अमेरिका की ये गलतियां साबित करती हैं कि उसकी कूटनीति स्वार्थ पर आधारित है। वह लोकतंत्र और मानवाधिकारों का ढोंग रचता है, लेकिन वास्तव में संसाधनों और वर्चस्व की तलाश करता है। अब समय आ गया है कि दुनिया जागे। जैसे पोस्ट कहती है, चुप्पी सहयोग है। हमें अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में सुधार, बहुपक्षीय समझौते और शांति वार्ताएं ही रास्ता हैं। भारत जैसे देश, जो अहिंसा का संदेश देते हैं, वैश्विक शांति के लिए आगे आएं। दुनिया शांति चाहती है, कोई युद्ध नहीं। अमेरिका को अपनी गलतियों से सीखना चाहिए, अन्यथा इतिहास उसे वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाले के रूप में याद रखेगा। 

Monday, March 2, 2026

काठमांडू बनाम दिल्ली !

काठमांडू उस देश की राजधानी है जो आर्थिक प्रगति में भारत से कहीं पीछे है। पर हर मायने में भारत की राजधानी दिल्ली से कहीं आगे है। सारे शहर की सड़के और फुटपाथ बिल्कुल साफ़ हैं, जहाँ हर वक्त सफ़ाईकर्मी मुस्तैदी से डटे रहते हैं। ऐसा लगता है कि मोदी जी का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ भारत के लिए नहीं बल्कि नेपाल के लिए था। क्योंकि भारत की राजधानी दिल्ली में तो जहाँ निगाह डालिये वहीं कूड़े के अंबार लगे पड़े हैं। 


यही हाल काठमांडू शहर के सार्वजनिक शौचालयों का भी है। जो इतने साफ़ रहते हैं कि आश्चर्य होता है कि मानो किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के शौचालय हों। दूसरी ओर दिल्ली के ज़्यादातर सार्वजनिक शौचालयों की हालत इतनी खराब है कि आसानी से घुसने की हिम्मत नहीं पड़ती। काठमांडू की एक और ख़ासियत ने पिछले तीन दिनों में मेरा ध्यान आकर्षित किया। वो है यहाँ की ट्रैफ़िक व्यवस्था। सभी व्यस्त सड़कों पर महिला और पुरुष पुलिसकर्मी सतर्क और सक्रिय रह कर ट्रैफ़िक नियंत्रित करते हैं। इतना ही नहीं यहाँ के नागरिक भी ट्रैफ़िक नियमों का ज़िम्मेदारी से पालन करते हैं। सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली बात तो यह थी कि काठमांडू की सड़कों पर गाड़ियों के हॉर्न का कर्कश शोर बिल्कुल भी सुनाई नहीं देता। यहाँ के ट्रैफ़िक नियमों के अनुसार आपातकालीन स्थिति को छोड़ कर, सामान्य स्थिति में हॉर्न बजाना वर्जित है और इस नियम को न मानने पर जुर्माना ठोक दिया जाता है। इससे काठमांडू में ध्वनि प्रदूषण की कोई समस्या नहीं है। इसके साथ ही वायु प्रदूषण की तो यहाँ कोई समस्या ही नहीं है। जहाँ दिल्ली में AQI की मात्रा 400 तक पहुँच जाती है वहाँ काठमांडू का AQI नगण्य है। हालांकि इसके कई कारण हैं, एक तो कठमाड़ू एक घाटी में बसा है और चारों ओर पहाड़ों से घिरा है। दूसरा यहाँ की आबादी बहुत कम है और कारख़ानों की संख्या भी उतनी ज़्यादा नहीं। इसलिए वायु प्रदूषण की दिल्ली के साथ तुलना को छोड़ा भी जा सकता है। 



परंतु ऐसे कई अन्य कारण भी हैं जो काठमांडू को दिल्ली से बेहतर बनाते हैं। मिसाल के तौर पर यहाँ क़ानून व्यवस्था, दिल्ली की तुलना में काफ़ी व्यवस्थित है। यहाँ के नागरिक बताते हैं कि आधी रात को भी यहाँ महिलाएँ बेझिझक अकेली निकल सकती हैं। किसी भी तरह की छीना-झपटी नहीं होती। न ही महिलाओं के साथ किसी भी तरह की छेड़-छाड़ होती है। काठमांडू और नेपाल में कई विश्व प्रसिद्ध मंदिर भी हैं और पर्यटन की भी अनेकों जगह हैं। यहाँ जाने पर भी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के साथ किसी भी तरह का छल-कपट और नाजायज़ उगाही नहीं की जाती। प्रशासन की तरफ़ से जो भी कर्मचारी तैनात किए जाते हैं वो पर्यटकों की हर संभव सहायता करते दिखाई देते हैं। 



‘स्वच्छ भारत अभियान’ हो या कोई अन्य अभियान, किसी भी अभियान को प्रचारित करना आसान होता है, जो कि अखबारों और टीवी विज्ञापनों के ज़रिए किया जा सकता है। पर उस अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि देश की जनता ने उसे किस सीमा तक आत्मसात किया। अब मोदी जी के ‘स्वच्छ भारत अभियान’ को ही ले लीजिए। जितना इस अभियान का शोर मचा और प्रचार हुआ उसका 5 फ़ीसदी भी धरातल पर नहीं उतरा। भारत के किसी भी छोटे बड़े शहर, गांव या कस्बे में चले जाइए तो आपको गंदगी के अंबार पड़े दिखाई देंगे। इसलिए इस अभियान का निकट भविष्य में भी सफल होना संभव नहीं लगता। क्योंकि जमीनी चुनौतियां ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। स्वदेशी अभियान की सफलता भी जन-जागरण, सतत् निगरानी और व्यवहार परिवर्तन पर निर्भर करती है। अगर आम नागरिक इसमें सक्रिय भूमिका निभाएँ तभी यह आंदोलन सफल होगा। 



निसंदेह ‘स्वच्छ भारत अभियान’ मोदी जी की एक प्रशंसनीय पहल थी। पहली बार किसी प्रधान मंत्री ने हमारे चारों ओर दिनों-दिन जमा होते जा रहे कूड़े के ढेरों की बढ़ती समस्या के निस्तारण का एक देश व्यापी अभियान छेड़ा था। उस समय बहुत से नेताओं, फिल्मी सितारों, मशहूर खिलाड़ियों व उद्योगपतियों तक ने हाथ में झाड़ू पकड़ कर फ़ोटो खिंचवा कर इस अभियान का श्रीगणेश किया था। पर सोचें आज हम कहाँ खड़े हैं? 


शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी सफाई व्यवस्था बनाना अब भी एक बड़ी चुनौती है। कचरा पृथक्करण, पुनः उपयोग और रीसायक्लिंग की जागरूकता में अपेक्षाकृत कमी दिखती है। कुछ जगहों पर शौचालयों के रख-रखाव, जल आपूर्ति और व्यवहार परिवर्तन को लेकर समस्याएं बनी हुई हैं। इसलिए अभियान के उद्देश्य और जमीनी सच्चाई में अंतर बना हुआ है और अनेक स्थानों पर पुराने तरीकों का पालन अब भी हो रहा है।


दिल्ली हो या देश का कोई अन्य शहर यदि कहीं भी एक औचक निरीक्षण किया जाए तो स्वच्छ भारत अभियान की सफलता का पता चल जाएगा। यदि इतने बड़े स्तर शुरू किए गए अभियान की सफलता अगर काफ़ी कम पाई जाती है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? निसंदेह स्थानीय निकाय जिम्मेदार हैं। किंतु हम सब नागरिक भी कम जिम्मेदार नहीं है। उल्लेखनीय है कि यदि हम नागरिक किसी साफ़ सुथरे मॉल या अन्य स्थान पर जाते हैं तो सभी नियमों का पालन करते हैं। कचरे को केवल कूड़ेदान में ही डालते हैं। इस तरह हम एक साफ़ सुथरी जगह को साफ़ रखने में सहयोग अवश्य देते हैं। लेकिन ऐसा क्या कारण है कि जहाँ किसी नियम को सख़्ती से लागू किया जाता है तो हम पूरा सहयोग देते हैं। परंतु जहाँ कहीं भी किसी नियम को लागू करने में एजेंसियां ढिलाई बरतती हैं या हमारे विवेक पर छोड़ देती हैं तो आम नागरिक भी उसे हल्के में ले लेता है। भाजपा या अन्य दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं, स्थानीय निकायों और हम सब आम नागरिकों को भी भारत को कचरा मुक्त देश बनाने के लिए अब कमर कसनी होगी। क्योंकि ये कार्य केवल नारों और विज्ञापनों से नहीं हो पाएगा।


आश्चर्य की बात तो यह है कि हम सब जानते हैं कि लगातार कचरे के ढेरों का, हमारे परिवेश में चारों तरफ़ बढ़ते जाना, हमारे व हमारी आनेवाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए कितना ख़तरनाक है? फिर भी हम सब निष्क्रिय बैठे हैं। हमें जागना होगा और इस समस्या से निपटने के लिए सक्रिय होना होगा। इसलिए नारे चाहे ‘स्वच्छता’ के लगें या ‘स्वदेशी’ के, जनता की भागीदारी के बिना, नारे नारे ही रहेंगे।