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Monday, July 13, 2026

डिजिटल डिटॉक्स: परिवारों के लिए एक अनिवार्य कदम

आधुनिक युग में स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, OTT और इंटरनेट आदि हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुके हैं। सुबह उठते ही पहला काम स्क्रीन चेक करना, रात सोने से पहले आखिरी काम भी स्क्रीन देखना, यह एक सामान्य सी बात हो गई है। लेकिन इस डिजिटल निर्भरता ने हमारे मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक फिटनेस, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ऐसे में कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox) यानी डिजिटल उपकरणों से कुछ समय के लिए पूरी तरह दूर रहना, आज हर परिवार के लिए आवश्यकता बन गया है। यह न सिर्फ व्यक्तिगत विकास के लिए बल्कि पूरे परिवार की खुशहाली के लिए महत्वपूर्ण है। आज हम डिजिटल लत के दुष्परिणामों तथा परिवारों द्वारा डिटॉक्स अपनाने की जरूरत पर चर्चा करेंगे।



गौरतलब है कि डिजिटल माध्यमों की लत अब एक महामारी का रूप ले चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, औसत व्यक्ति दिन में 7-8 घंटे से अधिक स्क्रीन पर बिताता है। बच्चों और किशोरों में यह आंकड़ा और भी अधिक है। इस लत के कई खतरनाक प्रभाव हैं। सबसे अहम है मानसिक स्वास्थ्य पर असर। हर समय नोटिफिकेशन्स, लाइक्स और कमेंट्स आदि की तलाश में हमारा मस्तिष्क डोपामाइन की लगातार खोज में रहता है। इससे चिंता, अवसाद, नींद की समस्या और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी आती है। ‘डिजिटल डिप्रेशन’ या ‘सोशल मीडिया एंग्जायटी’ अब आम शब्द बन गए हैं। युवा पीढ़ी में आत्म-सम्मान कम होना, दूसरों से तुलना करना और वास्तविक दुनिया से कटाव बढ़ रहा है।



इसके साथ ही शारीरिक स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा है। आंखों की थकान, गर्दन-पीठ दर्द, मोटापा, कमजोर इम्यूनिटी,ये सब भी अधिक स्क्रीन टाइम के सीधे परिणाम हैं। बच्चों में शारीरिक गतिविधियों की कमी से विकास प्रभावित हो रहा है। परिवारों में बातचीत कम हो गई है। खाने की मेज़ पर सभी अपना फोन देखते हैं, बच्चे माँ-बाप से कम और यूट्यूब आदि से ज्यादा सीखते हैं। ऐसे में रिश्तों में गहराई कम हो रही है।


इतना ही नहीं इस बुरी लत का सामाजिक स्तर पर भी नुकसान है। फेक न्यूज, साइबर बुलिंग, प्राइवेसी का हनन और समय की बर्बादी के आंकड़ों में भी बढ़ौतरी हो रही है। काम की उत्पादकता घट रही है क्योंकि मल्टी-टास्किंग के नाम पर हम एक काम पर भी ध्यान नहीं दे पाते। अध्ययनों से पता चलता है कि सोशल मीडिया यूजर्स की याददाश्त और गहरी सोचने की क्षमता कम हो रही है।



सोशल मीडिया क्रांति (लगभग 2004-2006 के बाद फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि) से पहले की दुनिया याद कीजिए। सूचना और मनोरंजन के साधन अलग थे, लेकिन उनके लाभ आज के डिजिटल माध्यमों से कहीं अधिक गहरे थे। लोग किताबें पढ़ते थे। एक उपन्यास पढ़ने में पूरा ध्यान लगता था। इससे शब्दावली बढ़ती थी, कल्पनाशक्ति विकसित होती थी और धैर्य आता था। समाचार पत्र पढ़ना परिवार का सामूहिक कार्य होता था। सुबह चाय के साथ अखबार पढ़ना, चर्चा करने से बौद्धिक विकास और पारिवारिक बंधन दोनों बढ़ते थे। आज की तुलना में उस समय जानकारी कम लेकिन गहरी और विश्वसनीय होती थी।


हर घर के बच्चे मैदान में खेलते थे। क्रिकेट, कबड्डी, फुटबाल आदि शारीरिक व्यायाम के साथ सामाजिक कौशल भी विकसित होते थे। पड़ोसियों से बातें होती थी, त्योहारों पर सामूहिक उत्सव मनाए जाते थे, बच्चों का बड़ो से कहानियां सुनना, ये सब भावनात्मक बुद्धिमत्ता बढ़ाते थे। लेकिन आज के बच्चों में ये कौशल कम हो रहे हैं।


वहीं रेडियो पर समाचार और गाने सुनना परिवार को एक साथ लाता था। दूरदर्शन पर सीरियल देखना साप्ताहिक कार्यक्रम होता था, न कि 24 घंटे स्क्रीन पर डेट रहना। इससे अपेक्षा और संतोष का संतुलन बना रहता था।


दादा-दादी से कहानियां सुनना, लोकगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना, ये सब स्मृति और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते थे। जानकारी का प्रसार धीमा लेकिन प्रभावशाली होता था। लोग गहरी बातचीत करते थे, बहसें होती थीं और रिश्ते मजबूत होते थे। उस युग में ध्यान भटकाने वाले तत्व कम थे। परिणामस्वरूप लोग ज्यादा रचनात्मक, धैर्यवान और खुश रहते थे। अध्ययनों से साबित होता है कि स्क्रीन-फ्री पीढ़ी की याददाश्त, समस्या-समाधान क्षमता और रचनात्मकता आज की पीढ़ी से बेहतर थी।


परिवार समाज की मूल इकाई है। अगर परिवार डिजिटल लत से ग्रस्त है तो पूरा समाज प्रभावित होता है। ऐसे में डिजिटल डिटॉक्स अपनाने के कई लाभ हैं। बिना फोन के डिनर, बाहर घूमना, बोर्ड गेम्स खेलना, ये छोटी-छोटी आदतें रिश्तों में गर्माहट लाती हैं। इससे बच्चे अपने बड़ों से ज्यादा जुड़ते हैं। स्क्रीन से दूर रहने से नींद बेहतर होती है, चिंता कम होती है और खुशी बढ़ती है। जिससे मस्तिष्क को आराम मिलता है। पढ़ाई, खेलकूद, कलात्मक गतिविधियों में वृद्धि होती है। स्क्रीन टाइम सीमित करने से एकाग्रता और रचनात्मकता बढ़ती है। ज्यादा चलना-फिरना, व्यायाम, स्वस्थ भोजन की आदतें पड़ती हैं।


जानकर मानते हैं कि डिजिटल डिटॉक्स एकदम से नहीं, धीरे-धीरे अपनाना चाहिए। इसके लिए हम अपने परिवार स्तर पर कुछ नियम बनाएं तो डिजिटल डिटॉक्स से कई लाभ होंगे। घर में स्क्रीन-फ्री जोन बनाए जाएँ। जैसे कि  भोजन कक्ष, बेडरूम में फोन प्रतिबंधित हो। डिटॉक्स टाइम तय किया जाए। मिसाल के तौर पर हर दिन कम से कम 2 घंटे और वीकेंड पर पूरा दिन स्क्रीन-फ्री बनाने की कोशिश करें। परिवारिक गतिविधियां बढ़ाएँ। जैसे कि किताब पढ़ना, पिकनिक पर जाना, खुले में खेलना, संगीत सुनना आदि। ऐसे में माता-पिता खुद उदाहरण पेश करें तो बच्चे उसका पालन करेंगे। इसके साथ ही स्कूलों, कार्यालयों और सरकार को भी इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।


यह सत्य है कि डिजिटल तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इसका दुरुपयोग हमारी खुशहाली छीन रहा है। डिजिटल डिटॉक्स पीछे लौटना नहीं, बल्कि संतुलित जीवन की ओर बढ़ना है। हर परिवार को इसे अपनाना चाहिए ताकि हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों, पारिवारिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बचाकर रख सकें। पहले का युग हमें याद दिलाता है कि खुशी स्क्रीन्स में नहीं, बल्कि रिश्तों, प्रकृति और सृजनशीलता में है। हमें प्रयास  करना चाहिए कि डिजिटल डिटॉक्स की डिश में छोटे-छोटे कदम उठाएं। फोन को थोड़ी देर दूर रखें, परिवार के साथ समय बिताएं और वास्तविक जीवन का आनंद लें। डिजिटल डिटॉक्स न सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। स्वस्थ परिवार ही स्वस्थ राष्ट्र की नींव है। 

Monday, September 17, 2018

छात्रों की किसे चिन्ता है ?

पिछले दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रा संघ के चुनाव भारी विवादों के बीच संम्पन्न हुए है। छात्र समुदाय दो खेमों में बटा हुआ था। एक तरफ भाजपा समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और दूसरी तरफ वामपंथी, कांग्रेस और बाकी के दल थे। टक्कर कांटे की थी। वातावरण उत्तेजना से भरा हुआ था और मतगणना को लेकर दोनो जगह काफी विवाद हुआ। विश्वविद्यालय के चुनाव आयोग पर आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चला।
छात्र राजनीति में उत्तेजना,हिंसा और हुडदंग कोई नई बात नहीं है। पर चिन्ता की बात यह है कि राष्ट्रीय राजनैतिक दलों ने जबसे विश्वविद्यालयों की राजनीति में खुलकर दखल देना शुरू किया है तब से धनबल और सत्ताबल का खुलकर प्रयोग छात्र संघ के चुनावों में होने लगा है, जिससे छात्रों के बीच अनावश्यक उत्तेजना और विद्वेष फैलता है।
अगर समर्थन देने वाले राष्ट्रीय राजनैतिक दल इन छात्रों के भविष्य और रोजगार के प्रति भी इतने भी गंभीर और तत्पर होते तो भी इन्हें माफ किया जा सकता था । पर ऐसा कुछ भी नहीं है। दल कोई भी हो छात्रों को केवल मोहरा बना कर अपना खेल खेला जाता है। जवानी की गर्मी और उत्साह में हमारे युवा भावना में बह जाते हैं और एक दिशाहीन राजनीति में फंसकर अपना काफी समय और ऊर्जा बर्बाद कर देते हैं, यह चिन्ता की बात है।
इसका मतलब यह नहीं कि विश्वविद्यालय के परिसरों में छात्र राजनीति को प्रतिबंधित कर दिया जाए। वह तो युवाओं के व्यक्तित्व के विकास में अवरोधक होगा । क्योंकि छात्र राजनीति से युवाओं में अपनी बात कहने, तर्क करने, संगठित होने और नेतृत्व देने की क्षमता विकसित होती है। जिस तरह शिक्षा के साथ खेलकूद जरूरी है, वैसे ही युवाओं के संगठनों का बनना और उनमें आपस में प्रतिस्पर्धा होना स्वस्थ्य परंपरा है। मेरे पिता जो उत्तर प्रदेश के एक सम्मानीत शिक्षाविद् और कुलपति रहे, कहा करते थे, "छात्रों में बजरंगबली की सी ऊर्जा होती है, यह उनके शिक्षकों पर है कि वे उस ऊर्जा को किस दिशा में मोड़ते हैं।"
जरूरत इस बात की है कि भारत के चुनाव आयोग के अधीनस्थ हर राज्य में एक स्थायी चुनाव आयोगों का गठन किया जाए।  जिनका दायित्व ग्राम सभा के चुनाव से लेकर , नगर-निकायों के चुनाव और छात्रों और हो सके तो किसानों और मजदूर संगठनों के चुनाव यह आयोग करवाए। ये चुनाव आयोग ऐसी नियमावली बनाए कि इन चुनावों में धांधली और गुडागर्दी की संभावना ना रहे। प्रत्याशियों के चयन से लेकर प्रचार और मतदान तक का काम व्यवस्थित और पारदर्शित प्रक्रिया के तहत हो और उसका संचालन इन चुनाव आयोगों द्वारा किया जाए। लोकतंत्र के शुद्धिकरण के लिए यह एक ठोस और स्थायी कदम होगा। इस पर अच्छी तरह देशव्यापी बहस होनी चाहिए।
इस छात्र संघ के चुनावों में दिल्ली विश्वविद्यालय के ईवीएम मशीनों के संबंध में छात्रों द्वारा जो आरोप लगाए गए हैं, वह चिन्ता की बात है। प्रश्न यह उठ रहा है कि जब इतने छोटे चुनाव में ईवीएम मशीनें संतोषजनक परिणाम की बजाए शंकाएं उत्पन्न कर रही हैं, तो 2019 के आम चुनावों में ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता पर जिस प्रकार राजनैतिक पार्टियां अभी से आरोप-प्रत्यारोप लगा रही हैं, इससे क्या उनकी आशंकाओं को बल मिलता नहीं दिख रहा है? मजे कि बात यह है कि ईवीएम की बात आते ही चुनाव आयोग द्वारा मीडिया के सामने आकर सफाई दी गई कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव के लिए ईवीएम मशीनें मुहैया नहीं करवाई गईं  थी। छात्र संघ के चुनाव के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय ने स्वयं ईवीएम मशीनों का इत्जाम किया था।
बात यह नहीं है कि ईवीएम मशीनें कहां से आई, कौन लाया, पर आनन-फानन में जिस प्रकार जब चुनाव आयोग पर दिल्ली छात्र संघ के चुनावों में ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगने लगे तो उसे सामने आकर सफाई देनी पड़ी। यह कौनसी बात हुई, कोई चुनाव आयोग पर तो आरोप लगा नहीं रहा था पर चुनाव आयोग प्रकट होता है और दिल्ली चुनाव में ईवीएम पर सफाई दे देता है। यानी चुनावा आयोग अभी से बचाव की मुद्रा में दिखने लगा है।
चुनाव कोई हो पर लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती में पारदर्शिता प्रथम बिन्दु हैं और जब चुनावों में धांधली के आरोप जोर-शोर से लगने लगे तो यह लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक है। समय रहते छोटे चुनाव हों या बड़े स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव के लिए आशंकाओं का समाधान कर लेना सबसे विश्व के बड़े लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण कदम होगा। देश की राजधानी दिल्ली में हुए इन छात्र संघ के चुनावों के परिणाम देश की राजनीति में अभी से दूरगामी परिणाम परिलक्षित कर रहे हैं इसलिए हर किसी को अपनी जिम्मेदारियों को निष्पक्षता के साथ वहन कर इस महान् लोकतंक को और मजबूत बनाना चाहिए।

Monday, August 31, 2015

इन्द्राणी मुखर्जी: हमारी रोल मॉडल नहीं

ऐसी शोहरत, ग्लैमर व ताकत की चमक-दमक वाली दुनिया के सितारे भारतीय समाज के आदर्श नहीं हो सकते। क्योंकि इन्होंने जिस उपभोक्तावादी पाश्चात्य संस्कृति का रास्ता अपनाया है उससे भारतीय समाज की हजारों साल पुरानी परंपरांओं को भारी खतरा पैदा हो गया है। खासकर उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग उन्हें अपना आदर्श मानकर फुहड़पन की भौडी संस्कृति को तेजी से अपनाता जा रहा है। फिर चाहे वो ताश के पत्तों की तरह पति या पत्नियां को बदलना हो, चाहे लिव-इन-रिश्ते में रहना हो या फिर मुक्त सैक्स का आनंद लेना हो। घर टूट रहे हैं। रिश्ते टूट रहें हैं। तनाव और घुटन बढ़ रही है। हत्याएं और आत्महत्याएं हो रही हैं। नशीली दवाओं का सेवन बढ़ रहा है। यह सब देन है टीवी सीरियलों, फिल्मों और पेज-3 संस्कृति की। जो जबरदस्ती हमारे घरों में घुसती जा रही है।

आधुनिक और मुक्त विचारों का हामी बुद्धिजीवी वर्ग इस संस्कृति पर किसी भी तरह के नियंत्रण को मानवाधिकारों का हनन मानता है। ऐसे प्रयासों को कट्टरवादी कह कर उसके विरोध में उठ खड़ा होता है। चूंकि इस वर्ग की पकड़ और पहुंच मीडिया में गहरी और व्यापक हैए इसलिए इनकी ही बात सुनी जाती है। जबकि बहुसंख्यक समाज आज भी इस संस्कृति से बचा हुआ है और इसे पसंद नहीं करता। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि यह बुद्धिजीवी वर्ग आज हिन्दुस्तान के बहुसंख्यक वर्ग पर हावी होता जा रहा है। जिसका दुष्परिणाम हम सबके सामने इस रूप में आ रहा है। यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा।

मुक्त विचारों के समर्थक इन बुद्धिजीवियों से कोई पूछे कि इंद्राणी जैसी औरत को क्या कहेंगे ? जो अपनी बेटी की हत्या करती है, अपने पुराने पति के सहयोग से। नए पति से यह राज छुपाती है कि शीना उसकी बेटी थी और हत्या करके भी नए पति के साथ आराम से सामान्य जिंदगी जीती हैं। अपनी पिछली शादी से पैदा लड़की को, उसके बाप से अलग रखकर नए पति की दत्तक पुत्री बनवा देती है ताकि उसकी दौलत इस दत्तक पुत्री को मिल सके। इन्द्राणी अकेली नहीं हैं। ऐसी ताकतवर, मशहूर और हाई सोसायटी वाली महिलाएं देश की राजधानी दिल्ली से लेकर हर बड़े शहर के कुलीन माने जाने वाले समाज की ‘शोभा’ बढ़ाती हैं और तब तक गुलछर्रे उड़ाती हैं जब तक कोई हिम्मती उनका भांड़ा न फोड़ दे। पर हमारे कुलीन समाज को क्या हो गया है? ये समाज किस रास्ते पर बढ़ चला है ? कहां इस प्रकार के घिनौने कृत्यों पर विराम लगेगा, यह चिंतनीय है।

ऐसा नहीं है कि भारतीय समाज में अवैध संबंधों का इतिहास न रहा हो। वैदिक काल से आज तक ऐसे संबंधों के अनेक उदाहरण पुराणों तक में उल्लेखित हैं द्य पर उनका समाज में आदर्श की तरह यशगान नहीं किया जाता था। उन्हें सह लिया जाता थाए  महिमामंडित नहीं किया जाता था। अगर कड़ी शासन व्यवस्था हुई तो उन पर नियंत्रण भी किया जाता था।

लेकिन आज जो यह संस्कृति निर्लज्जता से साजिशन पनपाई जा रही है, इसके पीछे हैं वो बाजारू ताकतें जो अपने उत्पादनों को हमारे बाजारों में थोपने के लिए हमारी सामाजिक परिस्थिति को बदल देना चाहती हैं। जिसे हम आज आधुनिक मान रहे हैं द्य दरअसल यह संस्कृति पश्चिमी देशों में अपना खोखलापन सिद्ध कर चुकी है। इसलिए वहां के समाजों ने अब इस संस्कृतिक से काफी हद तक मुंह मोड़ लिया हैं और पारिवारिक बंधनों की ओर फिर से लौटने लगे हैं ।

जबकि हम हर आयातित चीज को अपनाने की भूख में अपने अस्तित्व की जड़ों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं। छोटे-छोटे काम ही हमें आगे चलकर बड़े पतन की ओर ले जाएंगे। आज भारत के किसी भी गांव, कस्बें में चले जाइएए फेरों बिना शादी हो जाएगी पर डीजे बिना नहीं होगी। डीजे में फटता कानफाडू शोर, अभद्र गानें और उनपर थिरकतें हमारे परिवारिजन शादी का सारा मजा किरकिरा कर देते हैं। न कोई बात सुनपाता है और न मंत्रों का उच्चारण। जबकि शादी जैसे पवित्र समारोह भारतीय संस्कृति और परंपरा के उन उच्च आदर्शों का नमूना है जिन्हें अपनाने आज बड़े-बड़े मशहूर गोरे लोग तक भारत आ रहे हैं।

पारंपरिक त्यौहार जिनका संबंध हमारे मौसम और कृषि से था उन्हें भूलकर हम वेलेनटाइन-डे जैसे वाहियात नए त्यौहारों को अपना कर अपनी जड़ों से कट रहे हैं। इकबाल ने कहा था, ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।‘ हजारों साल भारत ने विदेशी हमलों को झेला मगर हमारी संस्कृति की जड़े इतनी गहरी थी कि कोई उन्हें हिला नहीं पाया। पर बाजार की इस संस्कृति ने जो हमला किया है, उसने हमारे गांवों तक अपनी पकड़ बना ली है। इसे रोकना होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विरोधी लाख तानाशाह कहें, पर उन्हें ऐसी तानाशाही दिखानी होगी ताकि टीवी और इंटरनेट से ऐसी संस्कृति को रोकने का माहौल बन सके। इसलिए इस तरह के तथाकथित ग्लैमर, शोहरत और ताकत के बल पर अति महत्वाकांक्षी आधुनिक संस्कृति का पटाक्षेप हो सके द्य जो आने वाली हमारी पीढ़ियों के लिए जरूरी है।