Sunday, June 12, 2011

आन्दोलन से उठे सवाल

Rajasthan Patrika 12 June11
कौन नहीं चाहता कि देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो व कौन नहीं चाहता कि जनता के धन को लूटने वालों को सख्त सजा मिले? सभी राजनैतिक दल अगर ईमानदारी से प्रयास करते तो इन समस्याओं से निज़ात मिल सकती थी। राजनेताओं की इस कोताही से पैदा हुए शून्य को भरने का काम सिविल सोसाइटी के सदस्य करते रहे हैं। हर प्रांत में और लगभग हर मुद्दे पर। चाहें जंगल और पहाड़ काटने का सवाल हो या नदियाँ प्रदूषित करने का या किसानों की भूमि अधिग्रहण का या महिलाओं पर बड़े लोगों के अत्याचार का या पुलिसिया जुल्म का या न्यायपालिका के निकम्मेपन का। अनेक नामों से, अनेक विचारधाराओं के बैनरतले, देश के अलग-अलग हिस्सों के जागरूक नागरिक व्यवस्था के खिलाफ हमेशा से आवाज उठाते रहे हैं। इसलिए यह सोचना कि जो अब हो रहा है, वह अनूठा है या यह सोचना कि जिन पाँच लोगों ने देश के 122 करोड़ लोगों के भविष्य के लिए लोकपाल विधेयक तैयार करने का जिम्मा लिया है, वही सिविल सोसाइटी है-ठीक नहीं होगा। वैसे भी पिछले दिनों की घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि वो चाहें बाबा रामदेव हों या अन्ना हजारे वाली सिविल सोसाइटी, दोनों ही गुटों के कई कार्यकलापों और भाषणों ने समाज में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। जबकि दावा यह किया जा रहा है कि देश की विशेषकर भ्रष्टाचार की हर बीमारी का इलाज इनके पास है। 

1970 से आज तक देश में भ्रष्टाचार के विरूद्ध लगातार कई जनान्दोलन हुए और लड़ाईयाँ लड़ी गयीं। पर इन दोनों गुटों ने मीडिया का पूरा उपयोग करके देशभर में उम्मीद जगा दी कि देश से भ्रष्टाचार को ये मिटा देंगे और विदेशों में जमा धन वापस ले आयेंगे। इसके लिए इन्हें बधाई दी जानी चाहिए। 27 फरवरी, 2011 को दिल्ली के रामलीला मैदान में इन सबने मिलकर एक ऐतिहासिक रैली की। जिससे यह सन्देश गया कि अब देश उठ खड़ा होगा और इन लोगों के सद्प्रयास से देशवासियों को इन बुराईयों से मुक्ति मिलेगी।

आश्चर्य की बात है कि अन्ना हजारे ने 27 फरवरी को उसी मंच से जन्तर मन्तर पर अपने उपवास और धरने की कोई घोषणा नहीं की। जबकि उन्होंने उसी समय में अपने करीबी लोगों से दिल्ली में अपने भावी उपवास की चर्चा की थी। अगर उसी मंच पर यह घोषणा भी की होती तो सबके साझे प्रयास से देश में बड़ा भारी माहौल बनता। यह चर्चा नहीं होती कि अन्ना हज़ारे और रामदेव अलग-अलग चल रहे हैं और स्वार्थी तत्व इस स्थिति का फायदा नहीं उठा पाते। अपने इस आचरण के लिए अन्ना हजारे देश की जनता के प्रति जबावदेह हैं। बाबा रामदेव के धरने वाले दिन और उसके बाद राजघाट के अपने धरने के दिनों में बाबा रामदेव को लेकर अन्ना हजारे गुट ने बार-बार विरोधाभाषी बयान दिये हैं। जिससे यह मुहिम कमजोर पड़ी है।

इनके धरने की उपलब्धि यही रही कि इन लोगों ने सरकार के साथ मिलकर लोकपाल विधेयक को समयबद्ध कार्यक्रम के तहत बनाना तय किया। इनका समूह यह दावा करता रहा है कि जनलोकपाल विधेयक को इन लोगों ने कई वर्षों की कड़ी मेहनत से, गहरी कानूनी समझ से, दूरदृष्टि से, सभी सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए तैयार कर रखा था। जिसे इन लोगों ने देश के सामने भी प्रस्तुत किया। यह बात दूसरी है कि देश के अनेक न्यायविद्, संविधान विशेषज्ञ, व्यवस्था को समझने वाले ईमानदार अधिकारी और भ्रष्टाचार से लम्बी लड़ाई लड़ चुके जागरूक लोग नहीं मानते कि लोकपाल बिल भ्रष्टाचार के हर मर्ज की दवा है।

जो भी हो, अपने विधेयक को सरकारी समिति के सामने प्रस्तुत करने के बाद अब इन पाँचों की इस समिति में कोई भूमिका नहीं बचती। फिर ये बार-बार मीटिंग का नाटक क्यों किया जा रहा है? क्यों मीडिया का इस्तेमाल करके, मुद्दे से हटा जा रहा है? आखिर इनका एजेण्डा क्या है? हमारा सुझाव है कि अब इन पाँच लोगों को सरकारी मीटिंगों का सिलसिला यहीं खत्म कर देना चाहिए। अगर सरकार में इनका विश्वास है तो यह इनके विधेयक को गम्भीरता से लेगी और अगर विश्वास नहीं है तो ये लोग बैठक से कुछ नहीं कर सकते। अन्ना हज़ारे और उनकी टीम बार-बार सरकार के मंत्रियों की कड़ी शब्दों में भत्र्सना कर रही है। फिर क्यों बैठक में जाना चाहती है?

हाँ, इनके विधेयक के सम्बन्ध में कुछ सुझाव हैं जिनके बिना भ्रष्टाचार से लड़ाई में कामयाबी नहीं मिल सकती। मसलन (1) लोकपाल अगर भ्रष्ट आचरण करे तो उसके लिए इसी विधेयक में अनुकरणीय सख्त सजा का प्रावधान कर देना चाहिए। (2) सिविल सोसाइटी को भी लोकपाल के दायरे में लाया जाए। क्योंकि सिविल सोसाइटी के अधिकतम लोग विदेशी पैसे से और विदेशी नीतियों के अनुसार काम करते हैं। जो प्रायः हमारे देश के हित में नहीं होतीं। (3) संयुक्त राष्ट्र संगठन की इकाईयाँ, विश्व बैंक, विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और विदेशी बहुराष्ट्रीय बैंकों के भारत में कार्यकलापों को भी लोकपाल के दायरे में लाना अत्यंत आवश्यक है। नौकरशाही व राजनेताओं पर अनुचित दबाव डालकर ये संस्थाऐं हमारे देश में नीतिगत परिवर्तन करवाती हैं। जिसके कारण कई बड़े घोटालों में इनकीे गम्भीर भूमिका पायी गयी है।

उधर बाबा रामदेव बिना सबूत के कहते हैं कि चार सौ लाख करोड़ रूपया विदेशों में जमा है। ऐसा दावा करने से पहले उसके सबूत जनता के सामने प्रस्तुत करने चाहिऐं। अगर वे इन तथ्यों को प्रकाशित नहीं करना चाहते तो कम से कम यह आश्वासन देश को जरूर दें कि इस दावे के समर्थन में उनके पास समस्त प्रमाण उपलब्ध हैं। अन्यथा यह बयान गैर जिम्मेदाराना माना जाएगा और देश की आम जनता के लिए बहुत घातक होगा, जिसे वे सुनहरा सपना दिखा रहे हैं।

विदेशों में जमा धन देश में लाकर गरीबी दूर करने का बयान देकर बाबा रामदेव जो सपना दिखा रहे हैं, वैसा होने वाला नहीं है। पहली बात यह धन वे नहीं सरकार लायेगी, चाहें वह किसी भी दल की हो और उसे खर्च भी वही सरकार करेगी। तो बाबा कैसे उस पैसे से गरीबी दूर करने का दावा करते हैं? बाबा रामदेव कहते हैं कि विदेशों से यह धन लाकर देश में विकास कार्यों की रफ्तार तेज करेंगे। शायद वे जानते ही होंगे कि इस तरह के अंधाधुंध व जनविरोधी विकास कार्यों से ही ज्यादा भ्रष्टाचार पनपता रहा है। फिर वे देश की जमीनी हकीकत को अनदेखा क्यों करना चाहते हैं? वे गरीबी दूर करने की बात करते हैं और खुद का एजेण्डा तो योग व आयुर्वेद को भी व्यापार की तरह चलाने का है। फिर गाँव और गरीब को वे कैसे आत्मनिर्भर बनायेंगे? वे तो भारत की सनातन संस्कृति का ही निगमीकरण कर रहे हैं और धन का केन्द्रीयकरण कर रहे हैं। इससे गरीबी कैसे मिटेगी? उन्हें देश को समझाना चाहिए। जिससे कोई भ्रम न रहे।

रामदेव जी अनेक मुद्दों पर आपके अनेक बयान बिना गहरी समझ के, जाने-अनजाने देते रहे हैं जिससे जनता की भावनाऐं भड़की हैं। इससे आम जनता में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। उन्हें इससे बचना चाहिए। रामलीला मैदान में जो कुछ हुआ उसकी जितनी भत्र्सना की जाए कम है। पर जिस तरह बाबा रामदेव ने उस माहौल से बचकर भागने की नाकाम कोशिश की, उससे यह सिद्ध हो गया कि जनान्दोलन का उन्हें न तो कोई अनुभव है और न कोई तैयारी। हम इन्हीं लेखों के माध्यम से बाबा को गत् 2 वर्षों से चेतावनी देते आये हैं कि देश की राजनैतिक जटिलताओं को समझे बिना परिवर्तन की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। पर उन्होंने इस चेतावनी को गम्भीरता से नहीं लिया। ताजा घटनाक्रम इसका प्रमाण है।

हम अन्ना हजारे जी और बाबा रामदेव को एकसाथ मानते हैं और इसलिए उनको यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि आतंकवादी ताकतें, माओवादी ताकतें और साम्प्रदायिक ताकतें विदेशी ताकतों के हाथ में खेलकर इस देश में ‘सिविल वाॅर’ की जमीन तैयार कर चुकी हैं। जरा सी अराजकता से चिंगारी भड़क सकती है। इन ताकतों से जुड़े कुछ लोग इनके खेमों में भी चालाकी से घुस रहे हैं। इसलिए इनको भारी सावधानी बरतनी होगी। कहीं ऐसा न हो कि इनकी असफलता जनता में हताशा और आक्रोश को भड़का दे और उसका फायदा ये देशद्रोही ताकतें उठा लें। इन परिणामों को ध्यान में रखकर ही अगर ये लोग अपनी रणनीति बनायें तो देश और समाज के लिए अच्छा रहेगा। 

Monday, June 6, 2011

पर्यावरण का विनाश

Punjab Kesari 6 June 2011
पर्यावरण के विनाश से सबसे ज्यादा असर जल की आपूर्ति पर पड़ रहा है। इससे पेयजल का संकट गहराता जा रहा है। पिछले 15 वर्षों में भारत सरकार ने तीन बार यह लक्ष्य निर्धारित किया कि हर घर को पेयजल मिलेगा। तीनों बार यह लक्ष्य पूरा न हो सका। इतना ही नहीं, जिन गाँवों को पहले पेयजल की आपूर्ति के मामले में आत्मनिर्भर माना गया था, उनमें से भी काफी बड़ी तादाद में गाँवों फिसलकर ‘पेयजल संकट’ वाली श्रेणी में आते जा रहे हैं। सरकार ने पेयजल आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए ‘राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना’ शुरू की है। जो कई राज्यों में केवल कागजों में सीमित है। इस योजना के तहत राज्यों के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग का दायित्व है कि वे हर गाँवों में जल आपूर्ति की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय लोगों को प्रेरित करें। उनकी समिति गठित करें और उन्हें आत्मनिर्भर बनायंे। यह आसान काम नहीं है। एक जिले के अधिकारी के अधीन औसतन 500 से अधिक गाँव रहते हैं। जिनमें विभिन्न जातियों के समूह अपने-अपने खेमों में बंटे हैं। इन विषम परिस्थिति में एक अधिकारी कितने गाँवों को प्रेरित कर सकता है? मुठ्ठीभर भी नहीं। इसलिए सरकार की योजना विफल हो रही है। आज से तीस बरस पहले सरकार ने हैडपम्प लगाने का लक्ष्य रखा था। फिर चैकडैम की योजना शुरू की गयी और पानी की टंकियाँ बनायी गयीं। पर तेजी से गिरते भूजल स्तर ने इन योजनाओं को विफल कर दिया। आज हालत यह है कि अनेक राज्यों के अनेक गाँवों में कुंए सूख गये हैं। कई सौ फुट गहरा बोर करने के बावजूद पानी नहीं मिलता। पोखर और तालाब तो पहले ही उपेक्षा का शिकार हो चुके हैं। उनके कैचमेंट ऐरिया पर अंधाधुन्ध निर्माण हो गया और उनमें गाँव की गन्दी नालियाँ और कूड़ा डालने का काम खुलेआम किया जाने लगा। अब ‘महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार योजना’ के तहत कुण्डों और पोखरों के दोबारा जीर्णोद्धार की योजना लागू की गयी है। पर अब तक इसमें राज्य सरकारें विफल रही हैं। बहुत कम क्षेत्र है जहाँ नरेगा के अन्र्तगत कुण्डों का जीर्णोद्धार हुआ है और उनमें जल संचय हुआ है। वह भी पीने के योग्य नहीं।

दूसरी तरफ पेयजल की योजना हो या कुण्डों के जीर्णोद्धार की, दोनों ही क्षेत्रों में देश के अनेक हिस्सों में अनेक स्वंयसेवी संस्थाओं ने प्रभावशाली सफलता प्राप्त की है। कारण स्पष्ट है। जहाँ सेवा और त्याग की भावना है, वहाँ सफलता मिलती ही है, चाहे समय भले ही लग जाए। पर जहाँ नौकरी ही जीवन का लक्ष्य है, वहाँ बेगार टाली जाती है। देश की आर्थिक प्रगति के हम कितने ही दावे क्यों न करें, पर्यावरण मंत्रालय पर्यावरण की रक्षा के लिए सतर्क रहने का कितना ही दावा क्यों न करे, पर सच्चाई तो यह है कि जमीन, हवा, वनस्पति जैसे तत्वों की रक्षा तो बाद की बात है, पानी जैसे मूलभूत आवश्यक तत्व को भी हम बचा नहीं पा रहे हैं। दुख की बात तो यह है कि देश में पानी की आपूर्ति की कोई कमी नहीं है, वर्षाकाल में जितना जल इन्द्र देव इस धरती को देते हैं, वह भारत के 122 करोड़ लोगों और अरबों पशु-पक्षियांे व वनस्पतियों को तृप्त करने के लिए काफी है। पर अरबों रूपया बड़े बांधों व नहरों पर खर्च करने के बावजूद हम वर्षा के जल का संचयन तक नहीं कर पाते हैं। नतीज़तन बाढ़ की त्रासदी तो भोगते ही हैं, वर्षा का मीठा जल नदी-नालों के रास्ते बहकर समुद्र में मिल जाता है। हम घर आयी सौगात को संभालकर भी नहीं रख पाते।

पर्वतों पर खनन, वृक्षों का भारी मात्रा में कटान, औद्योगिक प्रतिष्ठानों से होने वाला जहरीला उत्सर्जन और अविवेकपूर्ण तरीके से जल के प्रयोग की हमारी आदत ने हमारे सामने पेयजल यानि ‘जीवनदायिनी शक्ति’ की उपलब्धता का संकट खड़ा कर दिया है।

पाठकों को जानकर आश्चर्य होगा कि आजादी से आज तक हम पेयजल और सेनिटेशन के मद पर एक लाख करोड़ रूपया खर्च कर चुके हैं। बावजूद इसके हम पेयजल की आपूर्ति नहीं कर पा रहे। खेतों में अंधाधुंध रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग भूजल में फ्लोराइड और आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ा चुका है। जिसका मानवीय स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। सबको सबकुछ मालूम है। पर कोई कुछ ठोस नहीं करता। जिस देश में नदियों, पर्वतों, वृक्षों, पशु-पक्षियों, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, सूर्य व चंद्रमा की हजारों साल से पूजा होती आयी हो, वहाँ पर्यावरण का इतना विनाश समझ में न आने वाली बात है। सरकार और लोग, दोनों बराबर जिम्मेदार हैं। सरकार की नियत साफ नहीं होती और लोग समस्या का कारण बनते हैं, समाधान नहीं। हम विषम चक्र में फंस चुके हैं। पर्यावरण बचाने के लिए एक देशव्यापी क्रांति की आवश्यकता है। वरना हम अंधे होकर आत्मघाती सुरंग में फिसलते जा रहे हैं। जब जागेंगे, तब बहुत देर हो चुकी होगी।

पर्यावरण के विषय में देश में चर्चा और उत्सुकता तो बड़ी है। पर उसका असर हमारे आचरण में दिखायी नहीं देता। शायद अभी हम इसकी भयावहता को समझे नहीं। शायद हमें लगता है कि पर्यावरण के प्रति हमारे दुराचरण से इतने बड़े देश में क्या असर पड़ेगा? इसलिए हम कुंए, कुण्डों और नदियों को जहरीला बनाते हैं। वायु में जहरीला धुंआ छोड़ते हैं। वृक्षों को बेदर्दी से काट डालते हैं। अपने मकान, भवन, सड़कें और प्रतिष्ठान बनाने के लिए पर्वतों को डायनामाईट से तोड़ डालते हैं और अपराधबोध तक पैदा नहीं होता। जब प्रकृति अपना रौद्ररूप दिखाती है, तब हम कुछ समय के लिए विचलित हो जाते हैं। संकट टल जाने के बाद हम फिर वही विनाश शुरू कर देते हैं। हमारे पर्यावरण की रक्षा करने कोई पड़ोसी देश कभी नहीं आयेगा। यह पहल तो हमें ही करनी होगी। हम जहाँ भी, जिस रूप में भी कर सकें, हमें प्रकृति के पंचतत्वों का शोधन करना चाहिए। पर्यावरण को फिर आस्था से जोड़ना चाहिए। तब कहीं यह विनाश रूक पायेगा। अन्यथा जापान के सुनामी की तरह हम कभी भी प्रकृति के रौद्र रूप का शिकार हो सकते हैं।

Thursday, June 2, 2011

बदलाव का दौर

Amar Ujala 2 June 2011
आमतौर पर बजट सत्र के बाद दिल्ली के बाबू राहत की साँस लेते हैं, पर गर्मी शुरू होते ही मंत्री से संतरी तक, सब पहाड़ या विदेशी दौरे पर निकल जाते हैं। पर इस बार दिल्ली कुछ हिली हुयी है। कनिमोझी से लेकर कलमाणी तक और 2जी स्पैक्ट्रम के उद्योग जगत के सितारों तक, सबका तिहाड़ जाना सत्ता के गलियारों में कौतुहल और आशंका का विषय बना हुआ है। विकीलीक्स हो या सर्वोच्च न्यायालय में पी.आई.एल. की सख्त सुनवाई, टी.वी. शो में छीछालेदर हो या जगह-जगह होने वाली गोष्ठियाँ, सब ओर भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया हुआ है। सभी दलों के राजनेता थोड़े विचलित हैं। पता नहीं कब किसकी धोती चैराहे पर खोल दी जाए। इस बार उठापटक में औद्योगिक घरानों की भूमिका भी विगत वर्षों के मुकाबले काफी बढ़ गयी है। वे टी.वी. चैनलों से लेकर और धरने प्रदर्शनों तक में रूचि ले रहे हैं और साधन मुहैया करा रहे हैं। जानकारों का मानना है कि जबसे देश के जाने-माने उद्योगपतियों को संसदीय जाँच समिति के आगे पेश होना पड़ा है, तबसे उद्योग जगत में हलचल है और इसीलिए सामने आये बिना शायद बहुत से लोग राजनेताओं को शीशा दिखाने के काम में जुट गये हैं। इस रस्सा खिंचाई के बीच अटकलों का बाजार भी गर्म हो गया है। एक बार फिर से प्रधानमंत्री बदले जाने की बात चल पड़ी है। सुशील शिन्दे का नाम इसमें टाॅप पर चल रहा है। हालांकि इसकी कोई आधिकारिक सूचना उपलब्ध नहीं है। उधर भट्टा गाँव की घटनाओं से यह स्पष्ट है कि काँग्रेस और उसके युवा नेता राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश पर आक्रामक हमला कर रहे हैं। यह सारी कवायद अगले साल होने वाले विधानसभा के चुनावों को ध्यान में रखकर की जा रही है।

इधर दिल्ली में भ्रष्टाचार के विरूद्ध सम्मेलनों और गोष्ठियों की बाढ़ आ गयी है। देश के कोने-कोने से लोग दिल्ली आकर इन सम्मेलनों में भ्रष्टाचार से निपटने के कारगर तरीके सुझा रहे हैं। उधर आगामी 4 जून से बाबा रामदेव के प्रस्तावित धरने से निपटने के लिए सरकार अपनी तैयारी में जुटी है। बाबा रामदेव का लक्ष्य अपने 5 लाख अनुयायियों को 40 दिन तक दिल्ली के रामलीला ग्राउण्ड में बिठाने का है। 80 शहरों में ऐसे ही धरने किये जाने की बात वे कह रहे हैं। साथ ही यह भी कि एक दिन छोड़कर एक दिन अलग-अलग शहरों से 5 हजार लोगों का दस्ता रामलीला ग्राउण्ड में आता रहे। जिससे धरने में बैठे लोगों को राहत मिलती रहे। सब तैयारियाँ पूरी हैं। अब तो 4 जून का इंतजार है। उधर सत्ता के गलियारों में यह भी चर्चा चल पड़ी है कि बाबा रामदेव का विशाल आर्थिक साम्राज्य सहारा गु्रप के मालिक देख रहे हैं। इसकी सच्चाई किसी ने परखी नहीं है। पर यदि ऐसा है तो माना जा रहा है कि सरकार के लिए बाबा रामदेव के आन्दोलन की कलाई मरोड़ना और भी आसान हो जायेगा। बाबा की माँगे ऐसी नहीं हैं कि उनपर फौरन अमल किया जा सके। जैसे कालाधन बाहर से लाना या 5सौ-हजार के नोट बन्द करना या काले धन को जब्त करना और राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित करना। फिर भी बाबा रामदेव के अनुयायियों में भारी उत्साह है और वे मानकर चल रहे हैं कि इस धरने के निर्णायक परिणाम आयेंगे। दूसरी तरफ जानकारों का कहना है कि जिस तरह अन्ना हज़ारे का धरना किन्हीं खास कारणों से इतना मीडिया पर छा गया, वैसा बाबा के धरने के साथ शायद नहीं होगा। अलबत्ता उनका चैनल इसका जरूर सीधा प्रसारण करता रहेगा। दूसरी चर्चा यह भी सुनने में आयी है कि सरकार इस धरने को बहुत दिन तक नहीं चलने देना चाहती, इसलिए दो-चार दिन के नाटक-नौटंकी के बाद ही किसी समिति की घोषणा कर दी जायेगी और बाबा रामदेव से धरना समाप्त करवा दिया जायेगा। क्या होगा अभी कहना मुश्किल है? क्योंकि इस पूरे अफरा-तफरी के माहौल में बड़े-बड़े खेल परदे के पीछे खेले जा रहे हैं।

देशभर से आये कुछ दर्जन भाजपाई मानसिकता के युवा इस माहौल को लेकर अतिउत्साहित हैं। उनका विश्वास है कि इस सबसे काँग्रेस लगातार कमजोर हो रही है और सरकार गिरने की संभावना बन रही है। इनका आंकलन है कि अगर बाबा रामदेव का धरना सफल हो जाता है तो 15 दिन में वे सरकार गिरा देंगे। वे संविधान को भी पूरी तरह बदलना चाहते हैं। पर जब इन लोगों से इस विषय पर गहराई से चर्चा की जाती है तो पता चलता है कि न तो इनके पास वैकल्पिक संविधान उपलब्ध है और न ही वैकल्पिक राजनैतिक नेतृत्व। अगर कुछ गोपनीय रखा गया है तो वह फिलहाल जनता के सामने नहीं है। उधर ये लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि अन्ना हजारे की टीम सरकार द्वारा प्रायोजित टीम है और उसी के इशारे पर काम कर रही है। ऐसे माहौल में गम्भीर लोगों के लिए असलियत को जान पाना मुश्किल हो रहा है। भ्रम की सी स्थिति बन रही है। ऐसा लग रहा है कि तमाम शुभेच्छा होने के बावजूद, काले धन से निपटने और सरकार में सुधार लाने का आन्दोलन अभी अपने लक्ष्य और रणनीति को स्पष्ट नहीं कर पाया है। जिसकी आज सख्त जरूरत है। ऐसे में देशवासी उत्सुकता से इस धरने का आगाज और अंजाम देखना चाहेंगे।

Sunday, May 29, 2011

अब एक और अनशन

Panjab kesari 30-05-2011
दिल्ली में भ्रष्टाचार के विरूद्ध सम्मेलनों और गोष्ठियों की बाढ़ आ गयी है। देश के कोने-कोने से लोग दिल्ली आकर इन सम्मेलनों में भ्रष्टाचार से निपटने के कारगर तरीके सुझा रहे हैं। उधर आगामी 4 जून से बाबा रामदेव के प्रस्तावित धरने से निपटने के लिए सरकार अपनी तैयारी में जुटी है। बाबा रामदेव का लक्ष्य अपने 5 लाख अनुयायियों को 40 दिन तक दिल्ली के रामलीला ग्राउण्ड में बिठाने का है। 80 शहरों में ऐसे ही धरने किये जाने की बात वे कह रहे हैं। साथ ही यह भी कि एक दिन छोड़कर एक दिन अलग-अलग शहरों से 5 हजार लोगों का दस्ता रामलीला ग्राउण्ड में आता रहे। जिससे धरने में बैठे लोगों को राहत मिलती रहे। सब तैयारियाँ पूरी हैं। अब तो 4 जून का इंतजार है। उधर lŸkk के गलियारों में यह भी चर्चा चल पड़ी है कि बाबा रामदेव का विशाल आर्थिक साम्राज्य सहारा गु्रप के मालिक देख रहे हैं। इसकी सच्चाई किसी ने परखी नहीं है। पर यदि ऐसा है तो माना जा रहा है कि सरकार के लिए बाबा रामदेव के आन्दोलन की कलाई मरोड़ना और भी आसान हो जायेगा। बाबा की माँगे ऐसी नहीं हैं कि उनपर फौरन अमल किया जा सके। जैसे कालाधन बाहर से लाना या 5सौ-हजार के नोट बन्द करना या काले धन को जब्त करना और राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित करना। फिर भी बाबा रामदेव के अनुयायियों में भारी उत्साह है और वे मानकर चल रहे हैं कि इस धरने के निर्णायक परिणाम आयेंगे। दूसरी तरफ जानकारों का कहना है कि जिस तरह अन्ना हज़ारे का धरना किन्हीं खास कारणों से इतना मीडिया पर छा गया, वैसा बाबा के धरने के साथ शायद नहीं होगा। vycŸkk उनका चैनल इसका जरूर सीधा प्रसारण करता रहेगा। दूसरी चर्चा यह भी सुनने में आयी है कि सरकार इस धरने को बहुत दिन तक नहीं चलने देना चाहती, इसलिए दो-चार दिन के नाटक-नौटंकी के बाद ही किसी समिति की घोषणा कर दी जायेगी और बाबा रामदेव से धरना समाप्त करवा दिया जायेगा। क्या होगा अभी कहना मुश्किल है? क्योंकि इस पूरे अफरा-तफरी के माहौल में बड़े-बड़े खेल परदे के पीछे खेले जा रहे हैं।

Rajasthan Patirka 29-05-2011
देशभर से आये कुछ दर्जन भाजपाई मानसिकता के युवा इस माहौल को लेकर अतिउत्साहित हैं। उनका विश्वास है कि इस सबसे काँग्रेस लगातार कमजोर हो रही है और सरकार गिरने की संभावना बन रही है। इनका आंकलन है कि अगर बाबा रामदेव का धरना सफल हो जाता है तो 15 दिन में वे सरकार गिरा देंगे। वे संविधान को भी पूरी तरह बदलना चाहते हैं। पर जब इन लोगों से इस विषय पर गहराई से चर्चा की जाती है तो पता चलता है कि न तो इनके पास वैकल्पिक संविधान उपलब्ध है और न ही वैकल्पिक राजनैतिक नेतृत्व। अगर कुछ गोपनीय रखा गया है तो वह फिलहाल जनता के सामने नहीं है। उधर ये लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि अन्ना हजारे की टीम सरकार द्वारा प्रायोजित टीम है और उसी के इशारे पर काम कर रही है। ऐसे माहौल में गम्भीर लोगों के लिए असलियत को जान पाना मुश्किल हो रहा है। भ्रम की सी स्थिति बन रही है। ऐसा लग रहा है कि तमाम शुभेच्छा होने के बावजूद, काले धन से निपटने और सरकार में सुधार लाने का आन्दोलन अभी अपने लक्ष्य और रणनीति को स्पष्ट नहीं कर पाया है। जिसकी आज सख्त जरूरत है। ऐसे में देशवासी उत्सुकता से इस धरने का आगाज और अंजाम देखना चाहेंगे।

उधर आमतौर पर बजट सत्र के बाद दिल्ली के बाबू राहत की साँस लेते हैं, पर गर्मी शुरू होते ही मंत्री से संतरी तक, सब पहाड़ या विदेशी दौरे पर निकल जाते हैं। पर इस बार दिल्ली कुछ हिली हुयी है। कनिमोझी से लेकर कलमाणी तक और 2जी स्पैक्ट्रम के उद्योग जगत के सितारों तक, सबका तिहाड़ जाना सŸाा के गलियारों में कौतुहल और आशंका का विषय बना हुआ है। विकीलीक्स हो या सर्वोच्च न्यायालय में पी.आई.एल. की सख्त सुनवाई, टी.वी. शो में छीछालेदर हो या जगह-जगह होने वाली गोष्ठियाँ, सब ओर भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया हुआ है। सभी दलों के राजनेता थोड़े विचलित हैं। पता नहीं कब किसकी धोती चैराहे पर खोल दी जाए। इस बार उठापटक में औद्योगिक घरानों की भूमिका भी विगत वर्षों के मुकाबले काफी बढ़ गयी है। वे टी.वी. चैनलों से लेकर और धरने प्रदर्शनों तक में रूचि ले रहे हैं और साधन मुहैया करा रहे हैं। जानकारों का मानना है कि जबसे देश के जाने-माने उद्योगपतियों को संसदीय जाँच समिति के आगे पेश होना पड़ा है, तबसे उद्योग जगत में हलचल है और इसीलिए सामने आये बिना शायद बहुत से लोग राजनेताओं को शीशा दिखाने के काम में जुट गये हैं। इस रस्सा खिंचाई के बीच अटकलों का बाजार भी गर्म हो गया है। एक बार फिर से प्रधानमंत्री बदले जाने की बात चल पड़ी है। सुशील शिन्दे का नाम इसमें VkWi पर चल रहा है। हालांकि इसकी कोई आधिकारिक सूचना उपलब्ध नहीं है। उधर भट्टा गाँव की घटनाओं से यह स्पष्ट है कि काँग्रेस और उसके युवा नेता राहुल गाँधी उत्तर प्रदेश पर आक्रामक हमला कर रहे हैं। यह सारी कवायद अगले साल होने वाले विधानसभा के चुनावों को ध्यान में रखकर की जा रही है।

Thursday, May 26, 2011

पुलिस का निकम्मापन

नोएडा के आरूषि हत्या कांड की जांच उत्तर प्रदेश पुलिस ने जिस तरह की गलतियां की हैं उन्हें लापरवाही नही माना जा सकता। साफ लगता है कि शुरूआती जांच में पुलिस ने हत्यारों को बचाने की कोशिश की। अखबारों में और टीवी चैनलों पर अनेक तथ्य सामने आ चुके हैं जिनसे इस आरोप की पुष्टि होती है। नोएडा के थानेदार ने आरूषि के कमरे में दीवार पर लगे खून के निशान और उसके सिर के बाल का नमूना क्यों नहीं लिया। आरूषि के माता पिता के असमान्य व्यवहार पर पुलिस ने कोई जांच क्यों नहीं की। पुलिस ने आरूषि का पोस्टमार्टम परंपरा से हटकर जल्दीबाजी में क्यों करवाया। जांच टीम ने घटना स्थल से ऊपर जा रहे जीने की रेलिंग पर और छत के दरवाजे पर लगे खून के निशान क्यों नहीं देखे। ऐसे तमाम कारण है जो ये सिद्ध करते हैं कि पुलिस ने जांच के नाम पर नाटक किया।

ऐसा पहली बार नही हुआ। निठारी कांड ने भी उ. प्र. पुलिस की ऐसी ही मिली भगत सामने आयी थी। आमतौर पर महत्वपूर्ण लोगों या पैसे वाले लोगों से जुड़े अपराधों में उप्र.पुलिस अक्सर अपराधियों को संरक्षण देने का काम करती आयी है। लखनऊ में मशहूरबैडमिंटन खिलाड़ी सैयद मोदी की हत्या की जांच में भी इसी तरह पुलिस ने सबूतों को मिटाने का काम किया। अपराधियों की स्वाकारोक्ति के बाद भी उन्हें सजा नहीं मिल
पायी। क्योंकि उनके विरुद्ध सबूतों को पुलिस ने ही गायब कर दिया था।

फूलन देवी की हत्या दिल्ली के पौश इलाके अशोक रोड स्थित अपनी कोठी के पास हुई। फूलन देवी के सुरक्षा गार्डों ने न तो उसे बचाने की कोशिश की और न हीं हत्यारों को पकड़ने की। दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी दावा करते हैं कि दिल्ली में सुरक्षा के तीन अभेद घेरे हैं। कोई अपराधी अगर अपराध करके भागता है तो उसे इन घेरों में तुरंत पकड़ा जा सकता है। फिर क्या वजह थी कि फूलन देवी के हत्यारे इन तीनों सुरक्षा घेरों को आसानी से पार करके दिल्ली की सरहदों के बाहर निकल गये। इतना ही काफी नही था जब हत्यारे को पश्चिमी उ. प्र. से पकड़ कर लाया गया और ऐशिया की सबसे बड़ी और सुरक्षित मानी जाने वाली तिहाड़ जेल में कैद करके रखा गया तो आश्चर्य देखिए कि हत्यारे के मित्र फर्जी वारंट दिखाकर उसे तिहाड़ जेल से छुड़ा ले गये।

जैन हवाला कांड में 1991 में सीबीआई ने छापा डाला और मार्च 1995 तक जैन बंधु स्वतंत्र घूमते रहे। जनहित याचिका की सुनवायी के दौरान जब सीबीआई ने सर्वोच्च अदालत में झूठा शपथ पत्र दाखिल किया कि जैन बंधु फरार है और उनको ढ़ूंढने के लिए नोटिस चस्पा किये गये हैं तो जनहित याचिकाकर्ता ने अदालत को दिल्ली के प्रतिष्ठित अंगे्रजी दैनिक के पहले पेज पर छपी एक प्रमुख खबर दिखाई जिसमें लिखा था कि गत सप्ताह जैन बंधुओं ने अपने फार्म हाऊस पर एक शानदार दावत की जिसमे कई नामी हस्तियां मौजूद थीं। ये कैसे हो सकता है कि खुलेआम शानदार दावतें देने वाले व्यक्ति को ढूंढने में सीबीआई तो नाकाम रही और पत्रकारों को उनके क्रिया कलापों की जानकारी सहजता से उपलब्ध थी। साफ जाहिर है कि सीबीआई ने इस कांड में ऐसी ही तमाम साजिशें करके अपराधियों को निकल भागने के दर्जनों मौके दिये। जिनका प्रमाण सर्वोच्च न्यायालय की केस फाइल में दर्ज है। ठीक ऐसे ही बोफोर्स से लेकर स्टैंप घोटाले तक की जांच में होता आया है।

उत्तर पूर्वी राज्य के एक बड़े नेता के सपूत ने एक शिक्षक की बेटी के साथ बलात्कार कर उसे झील में फेंक दिया। उसे डूब कर मरा बता दिया गया। जब विरोधी दलों ने शोर मचाया तो जांच सीबीआई को सौंपी गयी। मजे की बात यह है कि इस हत्या की जांच भी हो गयी। पर उस अभागी लड़की के विसरा के नमूनों की सील तक नहीं टूटी। यानी बिना कीकात के रिपोर्ट बना दी गयी। ये सपूत सबूत के अभाव में बरी हो गया। सारे देश में खोजने चले तो ऐसे हजारों उदाहरण मिलेगें जहां पुलिस जांच में जानबूझ कर निकम्मापन करती हैं। ज्यादातर मामले न तो प्रकाश में आते हैं और न ही मीडिया की उन पर नजर पड़ती है।

दरअसल राज्यों की पुलिस का बहुत तेजी से राजनैतिककरण हुआ है। आज उत्तर प्रदेश में ऊपर से नीचे तक पुलिस राजनैतिक दलों के बीच बट गयी है। कम्प्यूटर में बाकायदा बसपा व सपा से जुड़े पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों की सूचियां दर्ज हैं। जिन्हें ध्यान में रखकर ही उनकी तैनाती की जाती है। ऐसे मे पुलिस से सही और निष्पक्ष जांच की उम्मीद करना मूर्खता होगी।

आज पुलिस व्यवस्था का राजनैतिककरण समाज के लिए बहुत घातक होता जा रहा है। इसे रोकने के ठोस प्रयास किये जाने चाहिए। ऐसे दर्जनों सुझाव है जिन पर अमल किया जा सकता है। बशर्तें कि राज्यों के मुख्यमंत्री और केन्द्र की सरकार पुलिस व्यवस्था में सुधार कर इसे प्रभावशाली, निष्पक्ष और जनउपयोगी बनाना चाहें। जरूरत इस बात की है कि सर्वोच्च न्यायालय और प्रांतों के उच्च न्यायालयों के अधीन आपराधिक जांच के लिए योग्य पुलिसकर्मियों की इकाइयां गठित की जायें। जो अदालत के निर्देश पर निडर होकर जांच करें। उन्हें सत्तारूढ़ दलों की नाराजगी का डर न हों। ये ऐजेंसियां महत्वपूर्ण मामलों की समयबद्ध जांच करें और निडर होकर अपनी जांच अदालत को सौंप दें। तभी अपराधी पकड़े जाऐंगे। वरना अपराधी ही नहीं आतंकवादी भी छूटते रहेंगे और जनता तबाह होती रहेगी क्यों आज तो हमारी पुलिस काफी निकम्मी हो चुकी है। एक शेर माकूल रहेगा- रात का अंदेशा था, लुट गए उजाले में।

हम तो हैं परदेस देस में निकला होगा चांद

Wednesday, May 25, 2011

कैसे बचें भारत की धरोहरों


पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश के अखबारों में खबर छपी कि ताजमहल की दरारों में भद्दी तरीके से प्लास्टर आ¡फ पेरिस भरकर लीपापोती की जा रही है। उसके फर्शों पर पान की पीक के दाग हैं और तमाम दावों के बावजूद उसका रंग पीला पड़ रहा है। इस खबर के छपते ही राष्ट्रकुल खेलों की तैयारी में जुटे देश के कर्णधारों में हड़कम्प मचा और आनन-फानन में एक मोटी रकम ताज की सफाई के लिए पुरातत्व विभाग में आवण्टित कर दी गई। ऐसी हड़बड़ाहट और फौरी कार्यवाहियों से धरोहरों की रक्षा नहीं हुआ करती। धरोहरों की रक्षा और उनकी प्रस्तुति करने के लिए जिस जज्बे और समझ की जरूरत है, वह हमारे हाकिमों में नहीं है। पर हाकिमों की क्या कहें, जनता भी धरोहरों की कीमत नहीं समझती। तभी तो उनकी इतनी दुर्दशा है।

बचपन से सुनते आये थे कि ‘‘यूनान, मिस्त्र और रोमा सब मिट गये जहाँ से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’’। अल्लामा इकबाल की यह नज्म हर हिन्दुस्तानी की जुबान पर है। बेशक हमारी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत विश्व में अनूठी है और उसमें निरन्तरता है। जबकि पश्चिमी देशों की संस्कृति भौतिकतावादी होने के कारण इतनी गहराई तक नहीं गयी है। पर रूहानियत को छोड़ दें और सांस्कृतिक अवशेषों की बात करें तो शायद हमारा यह दावा सही नहीं बैठेगा।

पिछले हफ्ते रोमन साम्राज्य की भूमि इटली के तीन शहरों में दो-दो, तीन-तीन दिन रहा। फ्लोरेंस, वेनिस व रोम में जो धरोहरों की रक्षा, संरक्षण, प्रस्तुतिकरण, व्यवसायिकरण देखा, वह हैरतअंगेज था। रोम में इक्कीस सौ साल पुराना स्टेडियम है जिसे कोलोजियम कहते हैं। यह कोलोजियम 187 मीटर लम्बा और 155 मीटर चैड़ा है, जिसमें 80 मेहराबें हैं। जिसमें दर्शकों के बैठने की 19 पंक्तियाँ हैं और एक बार में लगभग 40 हजार दर्शक बैठकर खेलों का आनन्द ले सकते हैं। कोलोजियम के महत्व और इतिहास को किसी भी बेवसाईट पर देखा जा सकता है। जो बात यहाँ महत्वपूर्ण है, वह यह है कि इस धरोहर को इटली के लोगों ने बड़ी नफासत से सहेज कर रखा है। इसमें प्रवेश के लिए बारह सौ रूपये की टिकट है। आ¡डियो गाईड है, जिन्हें कान पर लगाकर आप स्टेडियम के किसी भी कोने पर खड़े होकर उसके इतिहास की कमेंट्री सुन सकते हैं। यह तो एक उदाहरण है। पूरे इटली और फ्रांस में ऐसे हजारों उदाहरण हैं जहाँ ऐतिहासिक भवनों, चित्रों, मूर्तियों, फव्वारों, पुलों, फर्नीचर, सजावट का साजो-सामान बड़े करीने से सजाकर रखा गया है। दो हजार से पाँच सौ साल पुरानी इन धरोहरों की चमक-दमक देखकर लगता नहीं कि ये इतनी पुरानी हैं। इतना ही नहीं, इन देशों के आम नागरिक अपनी इन धरोहरों की बड़ाई करते और उन पर गर्व करते थकते नहीं हैं। दुनियाभर का सैलानी मीलों लम्बी कतार में खड़े होकर इन धरोहरों को देखने आता है और दाँतो तले उँगली दबा लेता है। इन सैलानियों के कारण इन देशों में खूब पैसा आता है। 

दूसरी तरफ हम हिन्दुस्तानी हैं, जो सारे जहाँ से अच्छा होने का दावा तो करते हैं, पर धरोहरों को तोड़कर उन पर मकान बनाने, काॅलोनी काटने, व्यवसायिक भवन खड़ा करने में कोई कोताही नहीं बरतते। जो ऐतिहासिक इमारत सदियों की मार झेले खड़ी होती है, वह भूमाफिया की कृपा से शुक्रवार के दिन से सोमवार की सुबह तक धूल में मिल जाती है। क्योंकि शनिवार को प्रायः अदालतें बन्द होती हैं। इसलिए स्थगन प्रस्ताव आना सम्भव नहीं होता। ब्रज क्षेत्र में ऐसा विनाश हर दिन गत् 7 वर्षों से देख रहा हूँ। एक टीस मन में उठती है। पर बहुत कुछ कर नहीं पाता। क्योंकि एक-एक इमारत को बचाने के लिए महीनों संघर्ष करना पड़ता है। लोग भण्डारों और फूल बंगलों पर तो लाखों लुटा देते हैं। भागवत कथाओं के पण्डाल करोड़ों में बनवाते हैं। पर भगवत लीलाभूमि में व्यापार की सम्भावनाऐं तलाशते रहते हैं। भगवान की लीलास्थलियों को लीलने को तैयार रहते हैं। इनके जीर्णोद्धार के लिए उनके मन में न कभी विचार आता है, न वे कोई प्रयास करते हैं। वृन्दावन में तो ऐसे श्रीमन्त महन्त हैं जो वृन्दावन की रक्षा का वर्षों से झण्डा बुलन्द किये हैं, पर एक वर्गफुट धरोहर भी बचा नहीं पाये। इतना ही नहीं स्वंय धरोहरों पर कब्जा कर अपने लिए महल बना लिए। साधन सम्पन्न भक्त ऐसे महंतों के आगे उनकी भव्यता देख नतमस्तक हो जाते हैं। जिन्हें बरगला कर ये निरर्थक कामों में और अपने वैभव को बढ़ाने में पैसा बर्बाद करवाते रहते हैं। अगर वृन्दावन की इतनी ही चिन्ता है तो उन्हें सभी धरोहर भवनों को खाली करवाकर उनका जीर्णोद्धार करवाना चाहिए और उनमें ब्रज की संस्कृति व साहित्य और चित्रों की प्रदर्शनियाँ और कार्यक्रम आयोजित किये जाने चाहिऐं।

ब्रज ही क्यों दिल्ली के हौजखास जैसे ऐतिहासिक भवन में पुरातत्व विभाग के नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर और इन भवनों से छेड़-छाड़ कर ऐसे व्यवसायिक प्रतिष्ठान चलाये जा रहे हैं, जिनका इन भवनों के इतिहास से कोई लेना-देना नहीं है। कमोबेश यही हालत देश की बाकी धरोहरों की भी हो रही है। राष्ट्रकुल खेलों की तैयारी की हड़बड़ी में देश की राजधानी के निकटवर्ती क्षेत्रों में धरोहरों के संरक्षण का जो कार्य अब रात-दिन किया जा रहा है, वह तसल्ली से, सुनियोजित तरीके से, समय से क्यों नहीं किया जा सकता था? इस तरह हड़बड़ी में किये जा रहे कार्यों में गुणवत्ता को सुनिश्चित करना असम्भव होगा। भवन छोड़, भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत की प्राणदायिनी धरोहर गंगा और जमुना तक को हम नहीं बचा पाये। 

पुरातत्व विभाग तो धरोहरों की ठीक सूची तक नहीं बनाता है। उनका व्यापक लेखा-जोखा तक उसके पास नहीं है। संरक्षण के लिए धन अभाव का रोना हमेशा रोया जाता है। पर उनका डाॅक्यूमेंटेशन करना और उनके संरक्षण के लिए स्थानीय जनता को प्रेरित करना और उसके साथ साझी समितियाँ बनाकर जीर्णोद्धार और संरक्षण के प्रयास करना तो सम्भव हो ही सकता है। अब जबकि भारत में पर्यटन कई नई ऊँचाईयाँ छू रहा है, जैसे सांस्कृति पर्यटन, मेडिकल पर्यटन, व्यापारिक पर्यटन, धार्मिक पर्यटन आदि, तब इस बात पर गहरा चिन्तन और मंथन किया जाना चाहिए कि अपनी धरोहरों को बचाने, सजाने और उन्हें पर्यटन के बाजार में सुसंस्कृत रूप में प्रस्तुत करने के लिए हमे क्या करना चाहिए? वर्ना भविष्य में हम अपनी सांस्कृतिक धरोहरों के अवशेषों को देखने से वंचित रह जायेंगे।