Friday, March 15, 2002

धर्मनिरपेक्षता की नई परिभाषा की जरूरत

हर ओर धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता पर बहस छिड़ी है। टीवी चैनल भी इसी बहस में उलझे हैं। जहां इंकाई, साम्यवादी, समाजवादी व दूसरे दल भाजपा को सांप्रदायिक सिद्ध करने पर तुले हैं वहीं भाजपा के प्रतिनिधि अपनी रक्षा में जुटे हैं। हालात की मार कहिए या फिर इन टीवी बहसों में आ रहे हिंदुवादियों की वाक्पटुता की कमी, वे इन बहसों में लगातार पिट रहे हैं। आश्चर्य की बात है कि भाजपा, विहिप व संघ इन बहसों में अपने सर्वश्रेष्ठ प्रवक्ताओं को नहीं भेज पा रहे हैं। ऐसे में गांेविंदाचार्य जैसे लोगों की कमी सभी भाजपाइयों को खल रही है। वे इन बहसों के माकूल उत्तर देने में सक्षम होते। पर उनके जैसे लोगों को तो भाजपा के नेतष्त्व ने कब का दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया। उन्हें ही क्यों तमाम ऐसे लोग जो राम लहर से आकृष्ट होकर भाजपा में आए थे, निराश होकर घर बैठ गए। कोई उनसे पूछने भी नहीं गया कि उनकी नाराजगी की वजह क्या है ? ये भाजपा में सत्ता सुख भोगने नहीं आए थे। ये तो वो लोग थे जो वर्षों से यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि जब वैदिक धर्म और मातष्भूमि के प्रति समर्पित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से निकले लोगों की सरकार बनेगी तो देश की शासन व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा। जनहित में दिए गए उनके उपयोगी सुझावों को माना जाएगा। शासन व्यवस्था आत्मकेंद्रित न होकर जनोन्मुख होगी। भारत की गौरवमयी सांस्कष्तिक विरासत का संरक्षण व संवर्धन होगा। पर उन्हें यह देख कर भारी पीड़ा हुई कि भाजपा की सरकारें न सिर्फ नाकारा और अकुशल सिद्ध हुईं बल्कि उसके नेताओं ने अपने अहंकारी और स्वार्थी आचरण से यह सिद्ध कर दिया कि भाजपाई शासन चलाने के योग्य नहीं हैं। इन लोगों को ही नहीं बल्कि करोड़ों उन लोगों को भी भाजपा के शासन और व्यवहार से बहुत चोट पहुंची जो भाजपा को मन ही मन पसंद करते थे। पिछले 50 वर्ष में संघ के स्वयंसेवकों ने व रामरथ यात्रा के दौरान आडवाणी जी ने, हिंदू समाज की अपेक्षाओं को बहुत बढ़ा दिया था। पर ये अपेक्षाएं ज्यों की त्यों धरी रह गई। अब लोग आसानी से न तो भाजपा पर यकीन करेंगे और न ही धर्म आधारित किसी और नए राजनैतिक दल पर।

पर सोचने वाली बात है कि पारंपरिक रूप से अपने दृष्टिकोण में धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत मानने वाले भारतीय समाज का धर्म आधारित ऐसा ध्रुविकरण पहले कभी नहीं हुआ था। इसलिए धर्मनिरपेक्षता की बात करते वक्त हमें इस ध्रुविकरण की तह में जाना होगा। आखिर क्या वजह थी जो लोग धर्मनिरपेक्षतावादियों से इतने नाराज हो गए ? दरअसल पिछले बीस वर्षों से हिंदुओं को यह लगने लगा था कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमानों का तुष्टिकरण किया जा रहा है। वोटों के लालच में उन्हें बिना वजह अहमियत दी जा रही है और इस प्रक्रिया में बहुसंख्यक हिंदू समाज के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। जबकि सच्चाई तो यह है कि अपनी अशिक्षा और कठमुल्लेपन के कारण मुसलमान वैसे ही समाज में पिछड़े हुए हैं और ऊपर से उन्हें नौकरियों में बराबरी का व्यवहार नहीं मिलता। फिर मुस्लिम तुष्टिकरण का क्या प्रमाण हैं ? हिंदुवादियों की शिकायत रही है कि शाहबानों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को न मानना। बनारस में जबरन कब्जाए गए कब्रिस्तान को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद खाली न करना। परिवार नियोजन कार्यक्रम का डट कर विरोध करना व समान नागरिक संहिता की जरूरत को न मानना। क्रिकेट मैचो में पाकिस्तान की जीत पर खुशी और भारत की जीत पर गम प्रकट करना। मस्जिदों के आगे से जाने वाले दशहरा के जुलूसों पर पथराव करना व उनके भजन-कीर्तनों पर पाबंदी लगाना। हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का सम्मान न करते हुए गौ-मांस खाना। ऐसी तमाम बातों से हिंदू नाराज थे। उन्हें इस बात पर भी क्रोध आता था कि अपने ही देश में हिंदुओं को अपने   सर्वाधिक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थालों पर पूजा-अर्चना नहीं करने दी जाती या वहां मस्जिदें बना दी गई है। ऐसे तमाम कारणों से हिंदू समाज के मन में धर्मनिरपेक्षतावादियों और मुसलमानों के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा था। जिसे भाजपा ने भुना लिया। पर काठ की हांडी रोज-रोज नहीं चढ़ा करती। भाजपा की सरकार ऐसा कुछ भी नहीं कर पाई जिससे वह हिंदुओं की दबी हुए आकांक्षाओं को पूरा कर पाती। कई दलों की मिलीजुली सरकार होने के कारण भाजपा के लिए सभी को खुश रखना सरल नहीं था। इसलिए उसे अपने धार्मिक मुद्दे छोड़ देने पड़े। धर्मनिरपेक्षता दिखाने चक्कर में भाजपा न तो मुसलमानों को आकर्षित कर पाई और न ही उसका अपना वोट बैंक ही सलामत रहा।

अब जब भाजपा से हिंदू समाज का मोहभंग हो चुका है तो लोगांे सामने सवाल है कि वे किस दल की शरण में जाएं ? ऐसे में इंका सहज ही जांचे-परखे और आसानी से उपलब्ध विकल्प के रूप में एक बार फिर सामने आई है। अपनी  इस नई उपलब्धि से प्रसन्न होने की बजाए इंका को धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर पुनः विचार करना चाहिए। वरना रास्ता इतना सरल नहीं होगा। उसे अपना स्वरूप और आचरण ऐसा करना चाहिए जिससे यह संकेत जाए कि उसकी धर्मनिरपेक्षता मुसलमानों के तुष्टिकरण का आवरण नहीं है। बल्कि इंका की धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सभी धर्मों को समान आदर देना और साथ ही धर्महीनता की बात नहीं करना। इंका को यह मानना चाहिए कि धर्मनिरपेक्ष दिखने के उत्साह में इंका ने हिंदू समाज को नाराज किया था। अगर वह चाहती है कि उसका पारंपरिक वोट बैंक भी लौट आए और उसका धर्मनिरपेक्ष स्वरूप भी बना रहे तो उसे अपने रवैए में बदलाव करना ही होगा। उसे समान नागरिक कानून, परिवार नियोजन, मुसलमान बच्चों के लिए भी अनिवार्य रूप से आधुनिक शिक्षा की व्यवस्था जैसे मुद्दे भी उठाने होंगे। उसे यह संदेश देना होना होगा कि वह धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण नहीं करेगी। साथ ही उसे हिंदुओं के पारंपरिक धार्मिक विश्वासों का सम्मान करना भी सीखना होगा। उसे मुसलमानों को यह समझाना होगा कि उनके कठमुल्लेपन  के कारण ही हिंदू सांप्रदायिकता फैलती है। जब हिंदुओं को लगेगा कि इंका के शासन में हिंदू और मुसलमान दोनों को ही समान व्यवहार व न्याय मिलता है तो वे स्वयं ही शांत हो जाएंगे। फिर वे भावना से नहीं विवेक से काम लेंगे। यदि ऐसे हालात पैदा किए गए तो फिर इंका को टक्कर देने की स्थिति में कोई नहीं होगा। अगर इंका वर्तमान नाजुक दौर की मांग को नहीं समझती और अपनी पारंपरिक समझ के अनुसार धर्मनिरपेक्षता का राग तो अलापती है पर करती है उल्टा ही, तो उसे भारी नुकसान हो सकता है। आज स्वतः उसकी तरफ खिंचे आ रहे वोट ठिठक सकते हैं।

समय आ गया है कि धर्मनिरपेक्षतावादी हर धर्म को सम्मान देते हुए किसी एक धर्म के प्रति विशेष झुकाव न रखें। इससे समाज में तेजी से बढ़ता हुआ विघटन रूक जाएगा। तब लोगों को लगेगा कि इंका जैसे दल पुनः भारत पर शासन करने के योग्य हैं। मुसलमानों को भी लगेगा कि अगर उन्होंने अपना कठमुल्लापन नहीं छोड़ा तो फिर विहिप जैसे संगठन मजबूत बनेंगे और देश में शांति नहीं रह पाएगी। नाहक खून-खराबा होगा। देश में शांति और सौहार्द बढ़ सके इसके लिए प्रमुख धर्मों के धार्मिक नेताओं को भी अपना रवैया बदलना होगा। आज देश में किसी भी सड़क पर बीचोबीच में कोई कब्र मिल जाती है या फुटपातों पर अवैध रूप से बने मंदिर। यहां तक की हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशनों की पटरियों के बीच भी अक्सर मस्जिद या मंदिर खड़े पाए जाते हैं। यह न तो व्यवस्था चलाने के लिए उचित है और न ही इन प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के हित में। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले दलों को यह हिम्मत दिखानी चाहिए कि वे सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह बने मस्जिदों, कब्रों, मंदिरों, चर्चों और गुरूद्वारा को हटाने का कानून पास करें और उन्हें सख्ती से हटाएं। कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि जो कोई भी धर्मनिरपेक्षता का दावा करे उसे अपने आचरण और नीतियों में इसका प्रदर्शन करना होगा। तभी वह दोनों पक्षों का विश्वास जीत सकेगा। पहले जो हो गया अब नहीं हो सकता। धर्मनिरपेक्षता के बारे में नई सोच और नई दृष्टि होना आज समय की मांग हैं।

Friday, March 8, 2002

धर्म की राजनीति अब बंद होनी चाहिए

विहिप का श्रीराम मंदिर आंदोलन और गुजरात के दंगे, इन दो मुद्दों पर अटकी है फिलहाल देश की राजनीति। राजनीतिज्ञ ही नहीं अपने को बुद्धिजीवी मानने वाले भी खेमों में बंट गए हैं। जिसको जिस खेमे से फायदा मिलता है वह वैसी ही बोली बोल रहा है। समस्याओं के हल के लिए वैसे ही समाधान सुझा रहा है। दोनों ही खेमों की कोशिश या तो इस स्थिति से राजनैतिक लाभ कमाने की है या अपने राजनैतिक आकाओं से कुछ खैरात बटोरने की। समस्या के सही और ईमानदार हल में किसी की रूचि नहीं। होती तो हल कब का निकल जाता। पर राजनीति समस्याओं के हल खोजने के लिए नहीं की जाती, समस्याएं पैदा करके उलझाने के लिए की जाती हैं। ताकि फिर उसे सुलझाने की राजनीति चलती रहे। बयान दिए जाएं। टेलीविजन के पर्दे पर समस्या की गंभीरता पर उत्तेजित होने का नाटक कर अपनी संजीदगी का इश्तहार लगाया जाए। धर्मनिरपेक्षता या धर्म की रक्षा के नाम पर सेमिनार किए जाएं। फिल्में और टीवी शो बनाने के ठेके लिए जाएं। यह सब भी तभी तक जब तक आम लोगों के बीच उत्तेजना फैली है।

सब कुछ शांत होते ही सत्ताधीशों और कुलीन कहे जाने वाले लोगों के ‘सोशल सर्किल’ में फिर जाम छलकने लगते हैं। भड़काऊ वस्त्रों और जेवरों की नुमाइश लगने लगती है। अर्धनग्न महिलाओं के गलबहियां डाले आत्मघोषित बुद्धिजीवी भी अपने बड़े और ‘ग्लैमरस’ होने के गुमान में मगन हो जाते हैं। फिर सब भूल जाते हैं उन सवालों को जिन पर कल तक ये उत्तेजित होने का नाटक कर रहे थे। दरअसल इनकी उत्तेजना सिर्फ नाटक ही नहीं होती। उसका कुछ वास्तविक आधार भी होता है। अपने राजनैतिक संपर्कों का फायदा उठाकर मोटी कमाई में खेलने वाले लोग सामाजिक हिंसा या जनआक्रोश के विस्फोट से भयाक्रांत हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि अगर ये आग यूं ही फैलती गई तो उनकी दुकानदारी फिर कैसे चल पाएगी। इसलिए वे ऐसे सुझाव देते हैं जिनसे फिलहाल बला टल जाए। अयोध्या के मामले पर भी ऐसा ही हो रहा है। शांति स्थापना के लिए अयोध्या मसले को दो वर्ष के लिए टालने की सलाह दी जा रही है। पर सोचने वाली बात है कि इस बेसिरपैर के सुझाव से क्या कोई हल निकल सकता है? ये तो वही बात हुई कि बिल्ली को आता देख कबूतर से कहो कि आंख बंद कर ले।

इसमें शक नहीं कि विहिप ने पिछले कुछ महीनों से श्रीराम मंदिर निर्माण का जो आंदोलन फिर से खड़ा करने की कोशिश की उसके पीछे छिपा एजेंडा भाजपा का वोट बैंक बढ़ाना था। यही कारण है कि इस कार्यक्रम की रूपरेखा विधानसभा के चुनावों के साथ तालमेल बैठाते हुए रखी गई। ऐसा कहने का पर्याप्त आधार है। क्योंकि इससे पहले भी जब-जब चुनाव आए तब-तब ही विहिप ने श्रीराम मंदिर का मुद्दा उठाया। चुनाव समाप्त होते ही मंदिर का यह बुखार बड़ी होशियारी से उतार दिया गया। जनता ये बात अच्छी तरह समझ चुकी है। इसलिए इस बार विहिप और भाजपा की यह साझी रणनीति नाकाम रही। भाजपा को चुनावों में मुंह की खानी पड़ी। ऐसे में विहिप अपने ही चक्रव्यूह में फंस गई। अगर वह श्रीराम मंदिर के मुद्दे पर अड़ी रहती है तो भाजपा की गुजरात और केंद्र में रही-सही गद्दी भी छिन जाएगी और अगर इस मुद्दों को छोड़ देती है तो भाजपा का रहा-सहा वोट बैंक भी निबट लेगा। इसलिए विहिप, संघ और भाजपा के लिए फिलहाल यह मुद्दा न उगलते बन रहा है और न निगलते बन रहा है। पर अंततोगत्वा भगवान् श्रीराम की भक्ति से ज्यादा कुर्सी का मोह उन्हें इस आंदोलन को ठंडा करने को मजबूर कर देगा। यह सोचकर कि ये मुद्दा तो भविष्य में फिर कभी जिंदा किया जा सकता है विहिप कोई न कोई रास्ता ढूंढकर बच निकलेगी। यह बड़े दुख की बात है कि श्री लाल कृष्ण आडवाणी की रामरथ यात्रा से हिंदू स्वाभिमान की जो जागृति दुनिया भर के हिंदुओं के बीच हुई थी उसे धर्म और संस्कृति की रक्षा में किसी रचनात्मक दिशा के की ओर मोड़ा नहीं गया। जिस तरह लोकनायक जय प्रकाश नारायण के प्रयासों से पूरे देश में जनजागरण के बावजूद सारा प्रयास जनता पार्टी के निर्माण के साथ ही ध्वस्त हो गया। उसी प्रकार अयोध्या मंदिर से उठा हिंदू नवजागरण का उफान भाजपा की केंद्र में सरकार बनते ही ठंडा कर दिया गया। लोगों में यह संदेश गया कि भाजपा ने कुर्सी के लिए लोगों की धार्मिक आस्थाओं का दुरूपयोग किया। यदि विहिप वास्तव में हिंदू धर्म के उत्थान की उत्प्रेरक बनना ही चाहती है तो उसे सत्ता की राजनीति से स्वयं को तुरंत अलग करना होगा। अपने नेतृत्व में नई उर्जा और नए रक्त का संचार करना होगा। उसे हेडगेवार जी का यह उद्घोष याद रखना होगा कि व्यक्ति से संगठन बड़ा है और संगठन से राष्ट्र। उसे यह भी याद रखना होगा कि हमारे शास्त्रों में धर्म को अर्थ, काम और मोक्ष का आधार माना गया है। दुर्भाग्यवश धर्म की सेवा का व्रत लेने वाली विहिप ने अर्थ यानी राजनीति को धर्म का आधार मान लिया है। इसीलिए वह अपने कार्यक्रमों में लगातार विफल होती जा रही है और अपना जनाधार खोती जा रही है।

जहां तक बात अयोध्या की है तो यह बड़ा हास्यादपद है कि बड़े-बड़े संपादक टीवी पर आकर सुझाव देते हैं कि अयोध्या मसले को दो वर्ष के लिए टाल दिया जाए। दो वर्ष बाद क्या हालात बदल जाएंगे ? जो सवाल पिछली कई दशाब्दियों से भारतीय समाज को उद्वेलित करता रहा है। जिसके कारण बार-बार हिंसा में जान-माल की हानि होती रही है, उस सवाल को टालने से तनाव और विद्वेष बना ही रहेगा। आवश्यकता उसके फौरी हल की है। सर्वोच्च अदालत से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि मामले की नाजुकता को देखते हुए वह प्रतिदिन इस मामले की सुनवाई करके अपना फैसला जल्दी से जल्दी सुना दे। सब जानते हैं कि अदालती फैसले के बाद भी बात सुलझने वाली नहीं है। हारने वाला पक्ष फिर चुप नहीं बैठेगा। इस समस्या का हल दोनों संप्रदायों के समझदार और धर्मप्रेमी लोग बैठकर ही सुलझा सकते हैं। धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनने वालों की सलाह हिंदुओं को स्वीकार्य नहीं होगी। क्योंकि उनकी धर्मनिरपेक्षता में मुस्लिम तुष्टिकरण छिपा है। दोनों पक्षों की तरफ से धर्म की राजनीति करने वाले भी इसका हल नहीं निकाल पाएंगे, क्योंकि तब सांप्रदायिकता की उनकी ही दुकान बंद हो जाएगी। इसका हल केवल रूहानी लोग निकाल सकते हैं, आध्यात्मिक लोग निकाल सकते हैं। जिनके दिल की लौ उस परवरदिगार से जुड़ी है जो खुद तकलीफ उठा कर दूसरे को सुकून देने की हिदायत देता है। मुसलमानों को यह समझना होगा कि भगवान् श्रीराम, श्रीकष्ष्ण व भोलेशंकर से जुड़े अयोध्या, मथुरा और काशी में जब तक मस्जिदें खड़ी रहेंगी तब तक हिंदुओं के मन में नासूर की तरह चुभती रहेंगी, क्यांेंकि ये तीनों स्थान हिंदू समाज की आस्था के शिखर हैं। क्या कोई भी मुसलमान काबे शरीफ के प्रांगण में किसी हिंदू मंदिर की इमारत को बर्दाश्त कर सकता हैं ? इसलिए उन्हें अगर वास्तव में ये मुल्क और इसमें अमन-चैन प्यारा है तो इन तीन स्थानों पर से मस्जिदें बाइज्जत दूसरी जगह ले जाने की पहल करनी होगी। ऐसा तमाम मुस्लिम मुल्कों में भी हुआ है। यह सच है कि देश में सैकड़ों मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाई गई हैं। पर इस तरह गड़े मुर्दे उखाड़ कर देश तरक्की नहीं कर सकता। इसलिए हिंदू संगठनों को भी इस बात पर तसल्ली करनी होगी कि अयोध्या, मथुरा और काशी के बाद और किसी भी मस्जिद को हटाने की बात वे सोचेंगे भी नहीं। जिन्हें हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं की राजनीति करनी है वे इस पर कभी राजी नहीं होंगे। पर जिन्हें मुल्क और आवाम की चिंता है वे इससे इत्तफाक रखेंगे। इस वक्त राजनीति में एक ताकतवर महिला ऐसी हैं जो जाति और धर्म के बंधनों से मुक्त रहकर भी पूरी तरह भारतीय बन चुकी हैं। देश के सबसे ताकतवर राजनैतिक दल इंका की नेता होने के नाते श्रीमती सोनिया गांधी को ही इस पहल के लिए सामने आना चाहिए। साथ ही उन्हें यह भी घोषणा करनी चाहिए कि उनका दल ईमानदारी से जातिवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ कठोर कदम उठाएगा। समान नागरिक संहिता लागू करना ऐसा ही एक कदम होगा। यदि वे ऐसा करती हैं तो जातिवादी और सांप्रदायिक दलों की दलदल में फंसा बहुसंख्यक हिंदू समाज का वोट तो इंका की तरफ लौट ही आएगा, अमन-चैन और तरक्की चाहने वाले मुसलमान भी इंका की रहनुमाई में खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे।

रही बात गुजरात की तो इसमें शक नहीं कि वहां हुए दंगे रोके जा सकते थे। आश्चर्य की बात यह है कि अपने सत्ता के पूरे कार्यकाल में भाजपा ने कहीं दंगे नहीं होने दिए। क्या वजह है कि जब उसका वोट बैंक हाथों से फिसला जा रहा है तभी उसके राज्य में दंगे भड़के ? पर इसके साथ ही इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि गोदरा के नृशंस हत्या कांड पर धर्मनिरपेक्षवादियों की प्रतिक्रिया असामान्य रूप से ठंडी और बेदम थी। जिससे बहुसंख्यकों का दुखी और क्रोधित होना स्वाभाविक है। मानवीय संवेदनाओं को इस तरह अगर राजनैतिक लाभ-हानी से जोड़कर व्यक्त किया जाएगा तो दो दर्जन नहीं, चार दर्जन राजनैतिक दलों को सरकार चलाने पर मजबूर होना पड़ेगा। क्योंकि जनता किसी पर विश्वास नहीं करेगी। अयोध्या और सांप्रदायिकता के सवालों पर अब राजनीति बंद होनी चाहिए। अगर हम निरीह लोगों की ऐसी नृशंस हत्याएं भविष्य में वाकई रोकना चाहते है तो इन समस्याओं के ईमानदाराना हल खोजना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्हे टालने से काम नहीं चलेगा।

Friday, March 1, 2002

उत्तर प्रदेष में कांग्रेस अब क्या करे ?


उत्तर प्रदेष के मतदाताओं की मनःस्थिति पंजाब और उत्तराखंड के मतदाताओं से भिन्न नहीं थी। वहां भी कांग्रेस भारी मतों से जीत सकती थी, बषर्तें उसने दीवार पर लिखी इबारत को समय रहते पढ़ा होता। उ.प्र. में पिछले पांच सालों के भाजपा कुषासन से जनता त्रस्त थी। इन पांच सालों में भाजपा ने तीन बार तो मुख्यमंत्री बदले और पूरे समय कलराज मिश्र जैसे उसके नेता अपने ही मुख्यमंत्रियों की जड़ें खोदते रहे। संघ के प्रचारक अपने आदर्षों और उद्देष्यों को भूल कर सत्ता के मोहजाल में फंस गए और जनता से उनका संवाद समाप्त हो गया। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि पारंपरिक रूप से भाजपा का गढ़ माने जाने वाले मथुरा से भाजपा का पूरी तरह सफाया हो गया। हिंदू धर्म के संरक्षण और संवद्धन के जिन घोशित उद्देष्यों को लेकर भाजपा की उन्नति हुई थी उन्हें उसने पूरी तरह भुला दिया। राम मंदिर निर्माण का नारा महज एक चुनावी स्टंट बन कर रह गया। केंद्र में राजग सरकार की सीमाओं में चलते अगर भाजपा के लिए धर्म संबंधी मामलों में कड़े तेवर अपनाना राजनैतिक रूप से व्यवहारिक और संभव नहीं था तो भी ऐसा बहुत कुछ था जो भाजपा के उ.प्र. में पारंपरिक वोट बैंक को संतुश्ट करने के लिए किया जा सकता था। मसलन, तीर्थ स्थलों की देखभाल और साजसंवार को सुव्यवस्थित करना। पर ऐसा करने की बजाए भाजपा के छुटभैए से लेकर केंद्रिय नेता तक लालबत्ती की गाडि़यों में साॅयरन बजाते हुए तीर्थ स्थलों पर अपने लाव-लष्कर के साथ दर्षनों को आते रहे और वहां मौजूद आम दर्षनार्थियों की दिक्कते बढ़ाते रहे। इससे उनके प्रति जनता के मन में आक्रोष बढ़ा। जनता को लगा कि ये मंदिर भी आते है तो केवल अपने सत्ता सुख और संपत्ति की वष्द्धि की कामना लेकर। धर्म की सेवा करने का इनका कोई एजेंडा नहीं है।
धर्म की बात छोड़ भी दे तो प्रषासनिक स्तर पर भी उ.प्र.में भाजपा की सरकार पूरी तरह नाकारा साबित हुई। जनता को लगा ही नहीं कि इस सरकार में उसकी भी सुनी जाती है। बिजली, सड़क और पानी की आपूर्ति का आधारभूत ढांचा भाजपा के षासन में बुरी तरह चरमरा कर टूट गया। भय, भूख और भ्रश्टाचार से मुक्ति दिलाने का वायदा करके सत्ता में आई भाजपा के हर स्तर के नेताओं ने उ.प्र. में भ्रश्टाचार के नए कीर्तिमान स्थापित किए। पारंपरिक रूप से भाजपा को अपने हितों का संरक्षक मानने वाला प्रदेष का व्यापारी वर्ग भाजपा नेताओं के भ्रश्ट आचरण और अहंकार से न सिर्फ आहत हुआ बल्कि यह कहते सुना गया कि इनसे तो कांग्रेसी ही कहीं अच्छे थे जो बात भी सुनते थे और काम भी कर देते थे।
पिछले दो वर्शों से कमोबेष यही विचार पूरे प्रदेष की जनता का था। हर जगह यही बात होती थी कि षासन चलाना तो सिर्फ कांग्रेस को आता है। पर उ.प्र. के मतदाताओं की मजबूरी ये थी कि कांग्रेस ने उनकी इस नब्ज को नहीं पकड़ा। न तो कांग्रेस ने सजग विपक्ष की ही भूमिका निभाई और न ही प्रदेष में कोई प्रभावषाली नेतृत्व ही दे पाई। कांग्रेस को चाहिए था कि वह इन वर्शों में पूरे प्रदेष के स्तर पर भाजपा के कुषासन के विरूद्ध लगातार जनांदोलन चलाती रहती। इससे एक तो उसका संगठन मजबूत होता और दूसरा जनता के बीच यह संदेष जाता कि कांग्रेस  ही प्रदेष को जिम्मेदार सरकार दे सकती है। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। कांग्रेस के वरिश्ठ नेता इन वर्शों में उ.प्र. की आम जनता से कटे रहे। नतीजतन जिले स्तर का कार्यकर्ता दिषाहीन हो गया। पूरी पार्टी में हताषा और ऊर्जाहीनता व्याप्त रहीं। पता नहीं किंन लोगों ने हाईकमान को सलाह दी जो वे प्रदेष के एक सषक्त नेता नहीं दे पाई। अगर किसी जुझारू, ओजस्वी, पारदर्षी व ऊर्जावान नए चेहरे को प्रदेष का नेतृत्व दिया जाता तो उ.प्र. में मृतप्राय पड़ी इंका को पुर्नजीवित किया जा सकता था। यदि ऐसा होता तो कोई वजह नहीं है कि इन हालातों में उ.प्र. की विधानसभा के चुनावों के नतीजे भी पंजाब और उत्तरांचल की तर्ज पर ही इंका के पक्ष में आते।
सपा के जुझारू नेता मुलायम सिंह यादव ने इस कमी को कुछ हद तक पूरा किया। पिछले वर्शों में उन्होंने पूरे प्रदेष में काफी भागदौड़ की और लगातार किसी न किसी रूप में अपने दल की उपस्थिति का अहसास कराया। हालांकि संगठन के स्तर पर उनका दल भी कुछ सुधर नहीं सका। उधर सपा के षिखर नेतष्त्व पर कुछ लोगों के हावी होने व दल के दूसरे नेताओं की उपेक्षा करने के आरोप लगते रहे और कुछ विवाद भी खड़े हुए। पर भाजपा से जनता की नाराजगी इतनी ज्यादा थी कि जहां भी उसे ठीक लगा उसने सपा का साथ दिया। बावजूद इसके में अच्छे नेताओं और प्रभवषाली चेहरों की कमी के कारण सपा जनता का पूर्ण विष्वास नहीं जीत सकी और उसे खंडित जनादेष मिला। अब उसकी स्थिति भी सांप, छछुंदर वाली होगी। जोड़तोड़ से अगर उसकी सरकार बन जाती है तो यह जरूरी नहीं कि वह उ.प्र. की खस्ता हाल अर्थव्यवस्था को आसानी से सुधार सके। जिसे सुधारे बिना जनता में पैठ बनाना संभव न होगा। साफ छवि के योग्य लोगों की कमी के कारण उसकी सरकार के मंत्रियों का आचरण भाजपा से भिन्न होगा, ऐसा मानने का कोई आधार नहीं है। इसलिए अगर मुलायम सिंह यादव सरकार बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो उन्हें दुधारू तलवार पर चलना होगा। एक तरफ दल से जुड़े लोगों के स्वार्थ और दूसरी ओर प्रदेष की जनता को संतुश्ट करने की चुनौती उनके सामने होगी। दूसरी तरफ अगर भाजपा पर्दे के पीछे कुछ खेल खेलकर सपा को सत्ता को बाहर रखने में कामयाब हो जाती है तो भी उसे इसका कोई राजनैतिक लाभ नहीं मिलेगा। क्योंकि जब उसकी पिछली सरकार ही कुछ नहीं कर पाई तो मौजूदा हालात में बनाई जाने वाली लूली-लंगड़ी सरकार क्या कर पाएगी ? इससे तो उसका रहा-सहा आधार भी टूटेगा।
उ.प्र. में किसकी सरकार बने यह प्रक्रिया चल ही रही है। पर अब सबकी निगाहें सन् 2004 के लोकसभा चुनावों पर है। जिनमें केंद्र की नई सरकार का स्वरूप निर्धारित होगा। आज पूरे देष में माना जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी विजय मिलने की संभावना है। केंद्र में उसकी सरकार बने इसके लिए उसे उ.प्र. में अपनी स्थिति को बेहद मजबूत करना होगा। इसलिए अब इंका हाईकमान के सामने तस्वीर बिलकुल साफ है। या तो उ.प्र. इंका में आमूलचूल परिवर्तन कर उसे नए कलेवर और तेवर में पेष करे या फिर उसे इसी तरह रामभरोसे छोड़कर बैठी रहे। राजस्थान में इंका मुख्यमंत्री अषोक गहलोत के क्रांतिकारी कदमों को मिल रहे जनसमर्थन ने यह सिद्ध कर दिया है कि कांग्रेस में खुद को समय के अनुसार सुधारने और संवारने की क्षमता मौजूद है। इंका षासित प्रदेषों में जिस तरह सोनिया गांधी ने नए और युवा चेहरों को वरियता देकर खुली छूट दी है उसकेे ठोस परिणाम उनके सामने आ रहे है। इसलिए इसे मानने के पर्याप्त आधार हैं कि उ.प्र. में भी इंका पुनःजीवित हो सकती है। बषर्ते वहां संगठन और उसके नेतृत्व पर ध्यान दिया जाए। इंका आलाकमान को उ.प्र. में कुछ क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे। जिससे प्रदेष में संगठन स्तर पर नए रक्त का संचार हो और नए विचारों से युक्त ऊर्जावान नया नेतृत्व उ.प्र. की इंका को नई दिषा दे।
आर्थिक मंदी, बेराजगारी और भ्रश्टाचार से त्रस्त भारत की जनता राजनीति की नई संस्कष्ति की अपेक्षा रखती है। जैसे तैसे, चुनावी हथकंडे अपना कर चुनाव जीतने और सत्ता सुख भोगने के पुराने ढर्रे से हर राजनैतिक दल को निकलना होगा वर्ना देष अराजकता और जन आक्रोष की ओर बढ़ता जाएगा। जिसका फायदा आतंकवादी मानसिकता के लोग उठाएंगे, जिससे और अस्थिरता ही फैलेगी। देष के मौजूदा हालात में भी राजनीति की नई संस्कष्ति अपनाना संभव है यह राजस्थान के मुख्यमंत्री ने कर दिखाया है। तमाम सीमाओं के बावजूद उन्होंने जिस किस्म की अनुषासित, जनोन्मुख और पारदर्षी सरकार दी है उससे यह विष्वास दष्ढ़ होता है कि दलों के नेता अगर माफियाओं, दलालों और चाटुकारों की चैकड़ी से निकल कर योग्य और समर्पित युवाओं को अपने दलों का नेतष्त्व सौंपे तो जनता उनके परचम तले आ खड़ी होगी।
आज देष की जनता मंडल और कमंडल की स्वार्थी राजनीति को खूब समझ गई है। यह सही है कि देष का लोकतंत्र निहित स्वार्थों की साजिष के चलते जातिवाद में फंसता जा रहा है। पर यह कोई ऐसी स्थिति नहीं जिससे उबरा न जा सके। अगर इंका जैसा राश्ट्रीय स्तर का बड़ा दल अपने तौर-तरीके में बुनियादी बदलाव लाता है तो जनता के बीच इसका सही संदेष जाएगा। यह रोचक और आष्चर्यजनक बात है कि राजनीति के, आज क,े पतनषील दौर में अपनी तमाम ऐतिहासिक भूलों के बावजूद इंका ने ही समय की इस मांग को पहचाना है और कुछ नया कर दिखाने का बीड़ा उठाया है। हालांकि अभी तो इसकी षुरूआत ही हुई है और मंजिल बहुत दूर है। पर आगाज से अंजाम का पता चलने लगा है। इसलिए यह माना जाना चाहिए कि उ.प्र. के विधानसभा के चुनावों में मिले नतीजों से इंका नेतृत्व कुछ सोचने समझने पर मजबूर होगा। कुछ ऐसा करेगा जिससे दल तो मजबूत हो ही जनता को भी राहत मिले। वैसे हर चुनाव के नतीजों के बाद यह बात हर दल पर लागू होती है कि वह आत्मावलोकन करे। नामचारे को सभी दल ऐसा करते भी है पर रहते हैं वहीं ढाक के तीन पात। अगली लोकसभा के चुनाव में अगर इंका सत्ता की प्रमुख बनना चाहती है तो उसे उ.प्र. के चुनावों के परिणामों को ज्यादा गंभीरता से लेेना होगा। जहां तक उ.प्र. की नई सरकार की बात है, ऐसा नहीं लगता कि बैसाखियों पर चलने वाली कोई भी सरकार जनता की आकांक्षाओं पर खरी उतर पाएगी। बाकी वक्त बताएगा।

Friday, February 15, 2002

अब गोपनीय नहीं रह पाएंगे स्विसबैंकों के खाते

दुनिया भर के भ्रश्ट तानाषाह, सेनाध्यक्ष, राजनेता, नषीली दवाओं के तस्कर, हथियारों के सौदागर, बड़े नौकरषाह और उद्योगपति भी लंबे अर्से से अपनी अवैध अकूत दौतल स्विसबैंकों में जमा करते आए हैं। क्योंकि इन बैंकों में जमा की गई दौलत की थाह नहीं पाई जा सकती थी। दूसरे देषों की सरकारें तो दूर स्वीट्जरलैंड की सरकार भी इन खातों का पता नहीं लगा सकती। इसलिए दुनिया के किसी भी हिस्से में धन क्यों न कमाया जाए उसे स्विसबैंकों के खातों में ही जमा किया जाता था। एक अनुमान के अनुसार दुनिया की 40 फीसदी से ज्यादा दौलत स्वीट्जरलैंड में जमा है। षेश 60 फीसदी दौलत दुनिया के बाकी देषों में है। इतनी सारी दौलत को सहेज कर रखने में स्विस नागरिकों को कतई दिक्कत नहीं आती। दरअसल, बैंकिंग व्यवसाय उनके रक्त और संस्कारों में बसा है। वे इसे राश्ट्रीय गौरव मानते हैं। अनेक परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इन बैंको में काम करते आए हैं। ये लोग अपने काम के बारे में इतने गोपनीय होते हैं और समाज में इतने सिमटे रहते हैं कि इनसे कुछ भी उगलवाना संभव नहीं होता। यही कारण है कि पिछली सदियों के राजे-महाराजे भी अपना धन इन बैंकों में जमा करते थे। कई बार ऐसा भी होता है कि धन जमा करने वाला अचानक चल बसा और उसके स्विसबैंक में चल रहे गोपनीय खाते की जानकारी उसके साथ ही चली गई। नतीजतन उसके वारिसों को भी यह धन नसीब नहीं हुआ। ऐसे तमाम लोगों का लावारिस धन स्विसबैंक के खातों और लाॅकरों में पड़ा है।

स्विसबैंक में खाता खोलने का तरीका भी बड़ा जटिल और गोपनीय है। बैंक के मैनेजर और कर्मचारियों तक को नहीं पता होता कि किस खाते में किस व्यक्ति की रकम है। इस व्यवसाय के जानकार बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति अपनी अकूत दौलत स्विसबैंक में जमा करने आता है तो वह बैंक के मैनेजर से संपर्क करता है। यदि मैनेजर को लगता है कि यह ग्राहक ठीक-ठाक है तो वह उसे बैंक के दो ऐसे अधिकारियों से मिलवा देता है जो उस व्यक्ति का खाता खुलवाने का काम करते हैं। ये दो या तीन व्यक्ति उन अधिकारियों में से होते हैं जिनकी विष्वसनीयता पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। इन्हें नए खाताधारी का बैंकिंग सचिव कहा जाता है। खाता खोलने की सब औपचारिकताएं ये ही पूरी करवाते हैं और सब कागजात पूरे हो जाने के बाद खाताधारी को स्विसबैंक का एकाउंट नंबर दे देते हैं। किंतु अपनी फाइल में असली खाता नंबर न डालकर एक कोड नाम डाल देते हैं। मसलन अगर खाता खोलने वाले का नाम राजकुमार लालवानी है तो उसके खाते का नंबर हो सकता है प्रिंस रेड 98। खाते का नंबर ग्राहक को बताने के बाद उसका कोड फिर बदल दिया जाता है और अब संबंधित बैंकिंग सचिव इस खाते से संबंधित फाइल को बंद करके एक ऐसे कक्ष में ले जाते हैं जहां काउंटर के ऊपर धुंधले कांच की दीवार बनी होती है। इस दीवार की तली में जो बारीक-सी झिरि होती है उसमें से होकर नए खातेदार की यह गोपनीय फाइल दूसरी तरफ सरका दी जाती है। दूसरी तरफ जो व्यक्ति उस फाइल को लेता है उसे यह नहीं पता होता कि यह फाइल किसकी है और षीषे के बाहर से फाइल देने वाले बैंकिंग सचिवों को यह नहीं पता होता कि षीषे के दीवार के पीछे इस फाइल को किसने लेकर लाॅकर में रखा है। इस तरह नए खातेदार के खाते से संबंधित जो पांच-छह लोग होते हैं उनमें से किसी को भी पूरी जानकारी नहीं होती।

इस काम में जो कर्मचारी लगे होते हैं वे बैंक के विष्वसनीय अधिकारी होते हैं और इस बात के प्रति आष्वस्त हुआ जा सकता है कि गोपनीय जानकारी बाहर नहीं जाएगी। ऐसी घटनाएं इक्का-दुक्का ही हुई हैं। मजे की बात तो यह है कि स्विसबैंक में धन जमा करने वालों को ब्याज मिलना तो दूर इस धन के संरक्षण के लिए उन्हें नियमित फीस देनी होती है। इस तरह स्वीट्जरलैंड में अथाह धन जमा हो गया है। आबादी थोड़ी सी, जीवन स्तर में ज्यादा तड़क-भड़क की गुंजाइष नहीं इसलिए उनकी जरूरत से कहीं ज्यादा धन उनके लिए उपलब्ध है। स्विस नागरिक अब तक यह मानते आए थे कि धन कहां से आ रहा है इसका उनसे कोई सारोकार नहीं। उनके लिए हर तरह के धन का रंग समान था और वे किसी का भी धन लेने में संकोच नहीं करते थे। वे बैंकिंग को षुद्ध आर्थिक व्यवसाय के रूप में देखते थे। पर अब स्थिति बदल रही है।

अब उन्हें भी पता है कि दुनिया भर मे गरीबी, कुपोशण व भूख बढ़ती जा रही है। दुनिया के तमाम देषों के भ्रश्ट नेता और नौकरषाह अपने भ्रश्ट आचरण के कारण जनता को दुख दे रहे हैं। नषीली दवाओं के सेवन से समाज और बचपन प्रदूशित हो रहे हैं। ऐसे माहौल में स्वीट्जरलैंड दुनिया के प्रति सारोकार से उदासीन होकर नहीं रह सकता। मानवीय संवेदनाओं से षून्य होकर भी नहीं रह सकता। जब दुनिया भर के अपराधी स्वीट्जरलैंड में चोरी का धन छुपाएंगे तो स्वीट्जरलैंड इस अनैतिकता के पाप का भागीगार बने बिना नहीं रह सकता। ऐसे विचारों ने स्वीट्जरलैंड के नागरिकों को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया। इसके साथ ही दुनियाभर में स्विसबैंकों के खातों के प्रति जागरूकता और उनमें अवैध रूप से जमा अपने देष का धन वापस देष में लाने की मांग कई देषों में उठने लगी। इस सबका नतीजा यह हुआ कि स्विस नागरिकों ने अपने संविधान में संषोधन किया। चूंकि स्वीट्जरलैंड दुनिया का सबसे परिपक्व लोकतंत्र है इसलिए वहां हर कानून बनने के पहले जनता का आम मतदान कराया जाता है। बहुमत मिलने पर ही कानून बन पाता है। इसलिए जब स्विस नागरिकों को नैतिक दायित्व का एहसास हुआ तो उन्होंने एक कानून बनाया जिसके अनुसार अब स्विसबैंकों में खोले गए खाते गोपनीय नहीं रहेंगे। स्वीट्जरलैंड की या अन्य किसी भी देष की सरकारें इन खातों की जानकारी प्राप्त कर सकती हंै। इसके लिए करना सिर्फ यह होगा कि संबंधित देष को उस व्यक्ति के खिलाफ, जिसके स्विस खाता होने का संदेह है, एक आपराधिक मामला दर्ज करना होगा। इसके बाद उस देष की सरकार स्वीट्जरलैंड की सरकार को आधिकारिक पत्र लिखेगी जिसमें उस व्यक्ति के विरूद्ध दर्ज आपराधिक मामले का हवाला देते हुए स्वीट्जरलैंड की सरकार से अनुरोध करेगी कि वह पता करके बताए कि उस व्यक्ति का कोई गोपनीय खाता स्वीट्जरलैंड के बैंकों में तो नहीं है ? इस पत्र के प्राप्त हो जाने के बाद स्वीट्जरलैंड की सरकार सभी बैंकों इस पत्र की प्रतिलिपियां भेजेगी और उन बैंकों से यह जानकारी मांगेगी। अगर किसी बैंक में संबंधित व्यक्ति का गोपनीय खाता चल रहा होगा तो बैंक को उसकी पूरी जानकारी अपनी सरकार को देनी होगी। स्वीट्जरलैंड की सरकार यह जानकारी संबंधित देष में भेज देगी। आवष्यकता पड़ने पर वह गोपनीय खाते में जमा रकम को भी उस देष को लौटा देगी। ऐसा कई मामलों में हो चुका है। इसलिए अब स्विसबैंकों में जमा अवैध धन गोपनीय नहीं रह सकता। बषर्तें कि खाताधारक के विरूद्ध आपराधिक मामला दर्ज हो।

स्वीट्जरलैंड में इस नए कानून के बन जाने से दुनिया के उन देषों की सरकारों को बहुत सहुलियत होगी जिन देषों का अवैध धन इन बैंकों में जमा है। अब तो बस किसी भी सरकार को इतना सा करना है कि वह ऐसे व्यक्तियों के विरूद्ध, चाहे वे कितने ही ऊंचे पद पर क्यों न बैंठे हों, केस दर्ज कराए और स्वीट्जरलैंड के बैंको में उनके खातों की जांच करवाए। जो भी सरकार अपनी साफ छवि होने का दावा करती है या जो प्रधानमंत्री भी यह दावा करते हैं कि देष को भ्रश्टाचार मुक्त प्रषासन देंगे उनका यह नैतिक दायित्व है कि वे ऐसे लोगों के विरूद्ध कार्रवाही करें जिन पर जनता की अकूत दौलत होने के संदेह हैं। ऐसे लोगों को चिराग लेकर ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ेगी। उन्हें सब जानते हैं। यहां तक कि उनके इलाके के आम नागरिक भी। हां अगर गरीब देषों की सरकारें ही अपने देष का धन वापिस अपने देष में न लाना चाहें तो कोई क्या कर सकता है ?

पुरानी कहावत है कि तू डाल-डाल तो मैं पात-पात। जबसे स्वीट्जरलैंड में यह कानून बना है तब से ही इससे निपटने के नए तरीके ईजाद कर लिए गए हैं। अब माॅरीषस जैसे तमाम देषों में नकली कंपनियां रजिस्टर कराई जाती हैं। जिनके षेयर पूरी दुनिया में जारी किए जाते हैं। अवैध रूप से अर्जित धन के स्वामी इन षेयरों को छद्म नामों से खरीद लेते हैं। इस तरह वे अपनी अवैध दौलत कंपनी के खाते में जमा करवा देते हैं। ये कंपनियां फिर स्वीट्जरलैंड के बैंकों में कंपनी के नाम से खाते खोल लेती हैं। इस तरह स्वीट्जरलैंड के नए कानून को भी धता बता कर अवैध धन को जमा करने का सिलसिला जारी हैं। पर जब कभी स्वीट्जरलैंड के जागरूक नागरिकों की तरह ही अन्य देषों के नागरिक भी इस गोपनीय व्यवस्था के विरूद्ध उठ खेड़े होंगे तो स्विजबैंकों में जमा अवैध रकम के अपने-अपने देष में वापस लाने के रास्ते खुल जाएंगे।

अब यह दारोमदार तो तीसरी दुनिया के देषों के नागरिकों और उनकी सरकारों पर है। यदि वे स्वीट्जरलैंड में जमा अपने देष का धन वापिस देष में लाना चाहते हैं तो उन्हें सक्रिय होना ही पड़ेगा। स्वीट्जरलैंड के नागरिकों ने अपने संविधान में संषोधन करके यह बता दिया कि वे षेश दुनिया के सारोकार के प्रति उदासीन नहीं हैं। अब तो गेंद बाकी देषों के नागरिकों और सरकारों के पाले में है। फैसला उन्हें ही करना है।

Friday, February 1, 2002

संत चेतावनी यात्रा कितनी सफल ?


अयोध्या में श्री राम मंदिर के निर्माण की मांग को लेकर विश्व हिंदू परिषद की चेतावनी यात्रा उत्तर प्रदेश से जब दिल्ली पहुंची तो जनता में इसे लेकर कहीं भी उत्साह दिखाई नही दिया। यात्रा के मार्ग में पड़ने वाले नगरों और गांवों में आम जनता में यात्रा को कौतुहलवश देख भले ही लिया हो पर किसी के मन में यात्रा के प्रति न तो आकर्षण था और न सम्मान। हर आदमी यही कह रहा था कि ये यात्रा महज स्टंट बाजी है और उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा को मदद करने का विहिप का एक शगूफा। देहात के लोगों ने तो संत चेतावनी यात्रा को ढोंग तक बताया और साफ कहा कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ा करती। लोगों का कहना था कि भाजपा हिंदू धर्म का कार्ड खेलकर अब हिंदुओं को और मूर्ख नहीं बना सकती। हर आदमी को पता चल चुका है कि भाजपा हिंदू धर्म के सवालों को उठाकर लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करती आई है। पर सत्ता में आने के बाद उसके तमाम वरिष्ठ नेताओं ने हिंदू धर्म के मुद्दों से पल्ला झाड़ लिया। जय श्रीरामके गगनभेदी नारे लगाने वाले भाजपाइयों ने सत्ता में आते ही इस नारे को भुला दिया। कई वर्ष बाद जब संत चेतावनी यात्रा में ये नारे फिर से लगाए गए तो जनता ने इन्हें नहीं दोहराया। इससे पहले भी विहिप के कई कार्यक्रम असफल हो चुके हैं। श्री कृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए मथुरा में विहिप द्वारा बुलाया गया सम्मेलन और यज्ञ अनुष्ठान का कार्यक्रम फ्लाप ही रहा था।
पिछले दिनों दिल्ली के देहाती इलाकों में आयोजित जनसभाओं में संघ के प्रचारकों को धार्मिक प्रवचनकरते हुए देखा जा सकता था। ये जनसभाएं स्थानीय आबादी को धर्म के नाम पर आकर्षित करके 27 जनवरी के कार्यक्रम में भेजने को प्रेरित करने के लिए थीं। इन जनसभाओं में संघ के प्रचारकों ने जनता को अयोध्या के महत्व, मंदिर निर्माण की आवश्यकता और भक्ति में शक्ति के संकेत दिए। इस सभा में आई हुई साधारण महिलाओं को यह कह कर लुभाने की कोशिश की गई कि वे 27 जनवरी को दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में ज्यादा से ज्यादा तादाद में पहुंच कर संतों का आशीर्वाद प्राप्त करें। महिलाएं स्वभाव से ही धार्मिक और भावुक होती हैं। हर किसी को जीवन की समस्याओं ने घेर रखा है। इसीलिए लोग धर्म स्थानों और साधु संतों की शरण में जाते हैं। ताकि उन्हें आशीर्वाद मिल सके और उनके जीवन के कष्ट कुछ कम हो सके। इसलिए संघ के प्रचारकों ने विशेषकर महिलाओं को लुभाने की कोशिश की। पर यहां भी उन्हें कामयाबी नहीं मिली। इस तरह विहिप द्वारा आयोजित संत चेतावनी यात्रा अपने उद्देश्य में असफल रही। मीडिया ने भी इस यात्रा को विशेष तरजीह नहीं दी। यात्रा के दौरान जिन नगरों में इसका स्वागत, सत्कार हुआ भी उनमें भी केवल वहीं लोग शामिल थे जो भाजपा के पदाधिकारी थे या उसके कार्यकर्ता। जिन्हें इस यात्रा से राजनैतिक लाभ कमाने की उम्मीद थी। संत चेतावनी यात्रा की इस असफलता के कारण भाजपा के खेमों में चिंता व्याप्त है। सार्वजनिक रूप से भाजपाई नेता भले ही उत्तर प्रदेश चुनाव में अपनी सफलता की घोषणाएं कर रहे हों पर वे भी जानते हैं कि मंदिर के सवाल पर अब उत्तर प्रदेश के हिंदुओं को बरगलाया नहीं जा सकता। वैसे ंिहंदुओं के मन में अपने धर्म और संस्कृति के प्रति राजनैतिक चेतना जागृत करने में विहिप व भाजपा नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। वैदिक संस्कृति के शाश्वत ज्ञान को समसामयिक संदर्भ में सार्थक उपयोग करने के लिए यह जरूरी है कि सत्ता में बैठे लोग धर्म निरपेक्षता के नाम पर वैदिक संस्कृति के बहुमूल्य खजाने की उपेक्षा न करें। भाजपा से ऐसी उम्मीद थी जो पूरी नहीं हो रही है। इसलिए विहिप और आडवाणी जी को भी इस विषय पर मंथन करना होगा ताकि बहुजनहिताय गाड़ी फिर से ढर्रे पर चल सके।
दरअसल पिछले तीन वर्षों में, जबसे केंद्र में राजग की सरकार बनी है, तब से इसके प्रमुख घटक भाजपा का हिंदुओं के प्रति रवैया बड़ा विचित्र रहा है। भाजपा के जो बड़े नेता अयोध्या आंदोलन के दौरान पूरे देश में घूम-घूम कर जनसभाओं में सिंह गर्जना करते थे कि, ‘सौगंध राम की खाते हैं हम मंदिर वहीं बनाएंगे।या बच्चा बच्चा राम का जन्मभूमि के काम का’, वही नेता सत्ता में आने के बाद यह कहने लगे कि मंदिर हमारा मुद्दा नहीं है। इससे पूरे देश में बहुत गलत संदेश गया। हिंदुओं को लगा कि भाजपा ने उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया। कहां तो राम रथ यात्रा, अयोध्या कार सेवा और शिलान्यास के लिए हर हिंदू के घर से सहयोग लिया गया था। राम राज्य लाने के सपने दिखाए गए थे। हर गांव से शिलापूजन करके अयोध्या भेजी गई थी। कहां अब ये हाल हो गया कि अयोध्या का नाम तक लेने में भाजपा के नेता बचने लगे। जिस समय अयोध्या आंदोलन की शुरूआत हुई उस समय आम जनता में भाजपा के नेताओं की अच्छी छवि थी। भाजपा को अनुशासित, राष्ट्रनिर्माण के लिए समर्पित और भ्रष्टाचार मुक्त राजनैतिक दल माना जाता था। कई दशकों तक भाजपा ने विपक्ष में रह कर सड़कों पर लड़ाई लड़ी थी। इसलिए जनता में उसकी जुझारू छवि भी थी। इसलिए जनता को बड़ी उम्मीद थी कि भाजपा जब सत्ता में आएगी तो एक नए किस्म की शासन व्यवस्था देखने को मिलेगी। पर ऐसा नहीं हुआ। इससे भी लोगों के दिल टूट गए। चूंकी एक एक करके सभी दल सत्ता में आ चुके हैं और किसी ने भी ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे वह दूसरे से बेहतर सिद्ध होता इसलिए अब जनता के मन में किसी भी दल के प्रति आकर्षण या सम्मान नहीं बचा है। बेचारी जनता मजबूरी में ताश के पत्तों की तरह दलों को फंेटती रहती है। इसके चलते जातिवाद और तेजी से बढ़ रहा है। आम लोगों के मन में ये बात बैठ रही है कि फायदा तो उन्हें किसी भी दल से नहीं मिलना तो क्यों न अपने ही जाति वाले को वोट दो ? नतीजतन उत्तर प्रदेश के चुनाव में अलग-अलग जातियों के प्रभुत्व के अनुसार दर्जनों दल सक्रिय हैं। चुनाव के बाद का परिदृश्य बहुत लुभावना नहीं होगा। विधायकों की खरीद-फरोख्त सब्जी मंडी की तरह होगी। जिससे प्रशासन में और भी भ्रष्टाचार और लूट-खसोट बढ़ेगी। इसलिए कुछ चुनाव विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि उत्तर प्रदेश की जनता ऐसी परिस्थिति में किसी एक दल को बहुमत देकर सबको चैंका न दे। वह दल कांग्रेस भी हो सकता है। ठीक वैसे ही जैसे मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में सबने कांग्रेस को साफ कर दिया था और भाजपा की सरकार बनने के दावे बढ़-चढ़ कर टीवी चर्चाओं में किए जा रहे थे। दावा करने वाले भाजपाई नेता नहीं बल्कि टीवी के मशहूर चेहरे थे। पर जब मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणाम आए तो हर आदमी भौचक्का रह गया। वहां की जनता ने दुबारा सत्ता कांग्रेस के हाथ में सौप दी। ऐसा उत्तर प्रदेश में भी अगर होता है तो कोई अजीब बात नहीं होगी अलबत्ता यह जरूर है कि जनता कांग्रेस से आकर्षित होकर कम और दर्जनों दलों कि साझी सरकार बनने की संभावना से डर कर ज्यादा कांग्रेस को वोट दे सकती है। राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता। प्रियंका के आने पर इसकी संभावना बढ़ जाएगी।
जहां उत्तर प्रदेश में भाजपा को पांच वर्ष के शासन में चार बार मुख्यमंत्री बदले पड़े। गुजरात में केशूभाई पटेल और नरेन्द्र मोदी के बीच लगातार युद्ध होता रहा। आखिरकार केशूभाई पटेल को जाना पड़ा। वहीं केरल में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हों या मध्य प्रदेश, दिल्ली या राजस्थान में, बेखटक लगातार राज भी कर रहे हैं और कुछ नया करने की कोशिश भी कर रहे हैं। इससे देश की जनता में यह संदेश जा रहा है कि कांगे्रस ही देश को सुगमता से चला सकती है। जबकि दूसरे सभी दल सत्ता में आते ही सिर फुटव्वल शुरू कर देते हैं। जिससे जनता का भला होना तो दूर  राजनैतिक अनिश्चितता बनी रहती हैं। इसके साथ ही यह बात भी महत्वपूर्ण है कि इंका की प्रांतीय सरकार भी चालू व्यवस्था में कोई बहुत क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं ला पा रहीं हैं। इतना जरूर है कि उसके कई मुख्यमंत्रियों की कार्यशैली और छवि भाजपा के मुख्यमंत्रियों के मुकाबले कहीं बेहतर है।
जहां तक भाजपा के हिंदू वोट बैंक के भाजपा से निराश होने का सवाल है तो इस पर भाजपा नेतृत्व का स्पष्टीकरण बड़ा रोचक है। वे कहते हैं कि बहुमत के अभाव में हम संघ और भाजपा के मूल एजेंडा को लागू करने में असमर्थ हैं। फिर भी जो कर सकते हैं कर रहे हैं। इसके लिए वे जनता से पूर्ण बहुमत देने की मांग करते हैं। पर इस बात का भाजपा नेतृत्व के पास कोई उत्तर नहीं कि गोविन्दाचार्या सरीखे समर्पित स्वयं सेवकों को दरकिनार कर  व मल्टीनेशनल्स् के दलालों को अपना नेता बना कर उनका दल क्यों दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहा है? क्या भाजपा के पास इससे बेहतर लोग नहीं हैं ? या फिर भाजपा भी सत्ता के माया जाल में फंस चुकी है और उन लोगों के इशारे पर नाच रही है जो स्वार्थपूर्ति के लिए देश और समाज के हित का बलिदान देने को भी हमेशा तैयार रहते हैं। हो सकता है कि ऐसे लोगों से दल को वित्तीय मदद मिलती हो, पर क्या यह इतनी बड़ी उपलब्धि है कि इसके लिए संघ के लोगों की भावनाओं का भी तिरस्कार कर दिया जाए ? उन लोगों का जो दशकों से त्याग, तपस्या का जीवन जीकर संगठन को खड़ा करते आए हैं। अगर भाजपा का तर्क यह है कि अल्पमत में होने के बाद, सत्ता चलाने के लिए अनेक तरह के दबावों में काम करना पड़ता है तो प्रश्न उठेगा कि फिर भाजपा दूसरे दलों से बेहतर दल कहां रहा ? इस पर अगर भाजपा यह स्वीकार भी कर लेती है कि उसका दल दूसरे दलों से गुणात्मक रूप में बेहतर नहीं तो फिर उसे समर्थन ही क्यों दिया जाए ? फिर तो सभी दल एक से हैं। ऐसे तमाम सवाल आज उत्तर प्रदेश की जनता के मन में उठ रहे हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश के चुनावों को लेकर कोई भी तस्वीर साफ नहीं है।
दलों में आंतरिक लोकतंत्र का लोप होना, एक व्यक्ति का दो पद स्वीकारना, दलों में नैतिक नेतृत्व को दरकिनार करना, बिना आम आदमी को राहत दिए दुनिया विकसित देशों से होड़ करना, कुछ ऐसे काम हैं जिन्हें सत्ता में आने के बाद हर दल करता है। यही उसके पतन का कारण बनते हैं। चुनाव जीतने और सत्ता पर काबिज होने के लिए कुछ जोड़-तोड़ करना या कुछ अनैतिक काम करना अगर दलों की मजबूरी है, तो उससे बचा नहीं जा सकता। पर इसके साथ यह भी जरूरी है कि दल के समर्पित लोगों को पूरा सम्मान और महत्व दिया जाए और सत्ता का अधिक से अधिक विक्रेंद्रीकरण किया जाए। यदि ऐसा होता है तो पारस्परिक दबाव और अंकुश से कोई भी दल अपनी गरिमा बचाए रख सकता है और जनता को भी फायदा पहुंचा सकता है, चाहे भाजपा हो या इंका या सपा। कहने को तो हमारे यहां लोकतंत्र है पर दुर्भाग्य से हमारे राजनैतिक दल प्राइवेट लि. कंपनी की तरह काम कर रहे हैं। ऐसे में इस देश का लोक और तंत्र दोनों राम भरोसे ही है।

Friday, January 25, 2002

सिर्फ कानून बनाने से नहीं मिलेगी सबको शिक्षा

एक तरफ तो दुनिया में आगे बढ़ने की होड़ लगी है। वैश्वीकरण की आंधी चल रही है। हम दुनिया के विकसित देशों से मुकाबला करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि फास्ट ट्रक हाईवे पर जब 140 कि.मी. प्रति घंटा की रफ्तार से गाडियां दौड़े तो कोई जाहिल गंवार आदमी रास्ते में न आ जाए। हम चाहते हैं कि हर गांव में कंप्यूटर लगा हो और पूरा देश उस कंप्यूटर के जरिए गांव से जुड़ा हो। हम चाहते हैं कि हमारे देश का आम आदमी अपने कर्तव्यों और अधिकारांे को समझे और दकियानूसी जिंदगी से निकलकर प्रगतिशील बने। हम यह भी चाहते हैं कि महिलाओं के हक, नशाबंदी, एड्स, मतदान के अधिकार जैसी सूचनाओं को हर आदमी समझें। पर ये सब होगा कब और कैसे ? जब देश का हर नागरिक शिक्षित होगा। इसी उद्देश्य से हाल ही में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने शिक्षा को मूलभूत अधिकार बना दिया है। ऐसा संविधान में संशोधन करने के बाद हुआ है। नए कानून के मुताबिक 6 से 14 वर्ष के हर बच्चे को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा देना, सरकार की जिम्मेदारी है। साथ ही हर माता-पिता का यह कर्तव्य घोषित कर दिया गया है कि वे अपने बच्चों को मुफ्त शिक्षा के लिए भेजें।



आजादी के 52 वर्ष बाद ही सही पर इस कदम के लिए सत्ता और विपक्ष की तारीफ की जानी चाहिए। दरअसल संयुक्त मोर्चा की सरकार ने 1997 में यह बिल पेश किया था। जिसके तुरंत बाद इन्द्र कुमार गुजराल की सरकार गिर जाने के कारण बिल पास नहीं हो सका। पर जिस रूप में मौजूदा कानून बना है उसमें न सिर्फ बहुत सी खामियां हैं बल्कि इस बात में भी संदेह है कि इस कानून के बाद भारत के करोड़ों बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था हो पाएगी।



सबसे पहली बात तो यह है कि यह कानून सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की अवहेलना करता है। 1993 में दिए गए एक आदेश के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने 14 वर्ष तक के हर बच्चे के लिए मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था करना सरकार की जिम्मेदारी बताया था। मौजूदा कानून में इस बात की अनदेखी करके केवल 6 से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा का ही जिम्मा लेने की बात की गई है। 6 वर्ष तक के बच्चे कहां धक्के खाएंगे इसकी चिंता किसी को नहीं।



इस कानून की दूसरी सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें माता-पिता पर बच्चों को शिक्षा दिलाने की जिम्मेदारी को एक अनिवार्य कर्तव्य के रूप में स्थापित कर दिया गया है। इससे स्थानीय प्रशासन के हाथ में एक अतिरिक्त हथियार आ गया है जिसका दुरूपयोग करके वे देहातों में रहने वाले गरीब और निरक्षर लोगों को प्रताडि़त कर सकता है। बच्चों को स्कूल न भेजने के जुर्म में देश भर में 17 हजार गरीब माँ-बाप पर मुकदमें कायम हो चुके हैं। गरीब और बेराजगार माँ-बाप पर इस तरह का कानून थोपना न सिर्फ अमानवीय है बल्कि कानून बनाने वालों के मानसिक दिवालियापन का सूचक है। मुफ्त शिक्षा से सरकार का क्या मतलब ? क्या इतना ही कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की फीस नहीं देनी पड़ेगी ? पर इतने से कैसे काम चलेगा? गरीब माँ-बाप के लिए अपने बच्चों को मुफ्त शिक्षा दिलाना भी सरल नहीं। वो कैसे कपड़े पहन कर स्कूल जाएगा ? उनके बस्ते एवं किताबों की कीमत की भरपाई कहां से होगी ? उसे स्कूल जाने-आने में कितना खर्चा लगेगा ? वो स्कूल में दिनभर क्या खाएगा ? अगर वो स्कूल न जाता तो माँ-बाप की कमाई में कुछ योगदान करता। अब उसकी भरपाई कौन करेगा ? ऐसे तमाम सवालों के जवाब खोजे बिना ही कानून निर्माताओं ने माँ-बाप पर ये भार डाल दिया है। कानून के इस मकड़जाल को खत्म किया जाना चाहिए वरना लाखों गरीब लोग स्थानीय प्रशासन की उदंडता का शिकार बनेंगे।



जिस मुफ्त शिक्षा की बात सरकार कर रही है उसके स्वरूप को लेकर भी तमाम सवाल जनता के मन में हैं। देश में 4 लाख स्कूलों और 40 लाख शिक्षकों की जरूरत हैं। जब तक इनकी व्यवस्था नहीं होती शिक्षा को मूलभूत अधिकार बनाना बेमानी है। जो स्कूल आज हैं भी उनकी दुर्दशा पर पिछले 52 वर्षों में तमाम रपट प्रकाशित हो चुकी है। उन पर फिल्में भी बन चुकी हैं। सैकड़ों किताबें लिखी जा चुकी है। हजारों सेमिनार हो चुके हैं। दर्जनों आयोग अपनी सिफारिशें सरकार को दे चुके हैं। पर गांवों के स्कूलों की दशा सुधरी नहीं। कहीं स्कूल के भवन ही नहीं हैं, तो कहीं शिक्षक नहीं। कहीं जाड़े, गर्मी, और बरसात में पेड़ों के नीचे स्कूल चलते हैं, तो कहीं एक ही कमरे में पांच कक्षाओं के बच्चे बैठते हैं। कहीं एक ही टीचर पूरे स्कूल को संभालता है और कहीं आठवीं फेल टीचर पांचवीं के बच्चों को पढ़ाता है। शिक्षा के आधुनिक साजो-सामान, नई सोच, शिक्षकों का प्रशिक्षण, पुस्तकालय और खेल की सुविधाएं हैं ही नहीं। इन हालातों में देश के गरीब बच्चों को शिक्षा ने नाम पर क्या मिल रहा है उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसी शिक्षा के होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है ?



अक्सर सरकारें साधनों की कमी का रोना रोती आई हैं। जबकि हकीकत में ये है कि अपने शिक्षा बजट में कुल सकल राष्ट्रीय उत्पादन का मात्र 0.7 फीसदी इजाफा करके सरकार अपने फर्ज को पूरा कर सकती है। इतने बड़े राष्ट्र के विकास के लिए पूरे समाज का शिक्षित होना अनिवार्य शर्त है। शिक्षा हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। दूसरी योजनाएं और काम इंतजार कर सकते हैं लेकिन हम दुनिया की सबसे बड़ी अशिक्षित आबादी के भारी बोझ को लेकर विकास के रास्ते पर नहीं बढ़ सकते। यह आश्चर्य की बात है कि साधनों का रोना रोने वाली सरकारें जो करना चाहती हैं उसके लिए साधनों की कमी आड़े नहीं आती। सरकार को लोगों में कंप्यूटर को लोकप्रिय बनाना था तो आज गली-गली कंप्यूटर पहुंच गया। यही हाल एसटीडी बूथ और अब इंटरनेट सर्विस का भी हो रहा है। इसलिए शिक्षाविद्ों को लगता है कि सरकार चाहती ही नहीं कि लोग शिक्षित बनें। शायद उन्हें डर है कि यदि सारा समाज शिक्षित हो गया तो लोग अपना हक मांगने लगेंगे और तब सरकारी ठाट-बाट और फिजूलखर्ची पर उंगलियां उठने लगेंगी। लोगों के जाहिल बने रहते में ही सरकार का फायदा है। जाहिल लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बहका कर चुनाव जीते जा सकते है। उन्हें समझदार बनाकर नहीं। इसीलिए आजादी के 52 वर्ष बाद भी भारत में औपचारिक शिक्षा अभी तक लोगों को नहीं मिली। 



नेशनल एलाइंस फाॅर फंडामेन्टल राईट्स टू एजुकेशनके संयोजक संजीव कौरा फिर भी हताश नहीं हैं। मल्टीनेशलन कंपनी में चार्टेड एकाउंटेन्सी की शानदार नौकरी छोड़कर इस काम में जुटे हैं। उनके युवा मन में उत्साह है। पिछले डेढ वर्षों में इस एलाइन्स के साथ देश भर की 2400 से ज्यादा स्वयं सेवी संस्थाएं जुड़ गई हैं। 28 नवंबर 2001 को जब संसद में शिक्षा को मूलभूत अधिकार बनाए जाने के बिल पर बहस हो रही थी तब दिल्ली की सड़कों पर देश भर से आए 50 हजार माँ-बाप प्रदर्शन कर रहे थे। जिन्हें जागृत और संगठित करने का काम इस एलाइन्स ने किया था। संजीव को इस बात का एहसास है कि 100 करोड के इस देश में सबको शिक्षा दिलाने का लक्ष्य तो शायद 30 वर्ष में भी पूरा न हो पर वे इस कानून के आ जाने को भी एक उपलब्धि मानते हैं। उनका कहना है कि, ‘‘आज 52 वर्ष के बाद कानून तो बना। आने वाले दिनों में इस कानून के लागू करने में हो रही खामियों को भी दूर किया जाएगा।’’ जबकि पिछले 52 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में अपना जीवन लगा देने वाले अनेक सुप्रसिद्ध शिक्षविद बहुत उत्साही नहीं हैं। ये सब वे लोग हैं जो संजीव की तरह ही देश-विदेशों में उच्च पदों को त्याग कर सबको शिक्षादिलाने के काम में जुटे थे। इन्होंने आम आदमी के लिए सस्ती, सुलभ और वैज्ञानिक शिक्षा प्रदान करने के अनेक प्रयोग भी किए और नए माॅडल भी विकसित किए। ये व्यवस्था से दूर देहातों में भी रहे और व्यवस्था में सलाहकार बनकर उसे सुधारने के प्रयास भी किए। इन्हें सफलता, कीर्ति और प्रोत्साहन भी मिला और विरोध भी। पर तीन-चार दशकों तक त्यागमय जीवन जीने के बाद भी इनका अनुभव यही रहा है कि नौकरशाही और राजनेता देश को जाहिल ही रखना चाहते हैं और साधन और सक्षम लोग होने के बावजूद शिक्षा को सबके लिए सुलभ नहीं करना चाहते।



ऐसे लोग यह मानने को तैयार नहीं है कि कोई भी सरकार इस देश के सौ करोड लोगों को साक्षर और शिक्षित बनाने का काम ईमानदारी से करेगी। इसीलिए ये सब हताश बैठे हैं। इनकी हताशा जायज है। पर जहां चाह वहां राह। हो सकता है कि पिछली सदी इस काम के लिए ठीक न रही हो। पर अब संचार और सूचना के फैलते जाल के बाद लोगों को मुख्य धारा से अलग-थलग रखना सरल न होगा। जनआकांक्षाएं इतनी बढ़जाएंगी कि शिक्षा का महत्व सबकी समझ में आ जाएगा। इसी उम्मीद के साथ व्यवस्था के अंदर और बाहर रहने वाले सभी जागरूक और कर्तव्यनिष्ठ लोगों को शिक्षा के वितरण का पुण्य कार्य यथाशक्ति करना चाहिए। इसमें ही हमारे राष्ट्र का कल्याण निहित है।

Friday, January 18, 2002

दिल्ली में लगी टिकटों की बोली

पिछले दिनों विधान सभा चुनावों के लिए टिकटार्थियों का दिल्ली में मेला लगा रहा। इंका, सपा, भाजपा व बसपा के पार्टी मुख्यालय व नेताओं के घर टिकट की हसरत लिए हजारों लोग डेरा डाले बैठे रहे। इसमें कोई नई बात नहीं थी। हमेशा से ऐसा होता आया है। किसी भी पार्टी में आन्तरिक लोकतंत्र तो है नहीं, जो उम्मीदवारों का फैसला स्थानीय स्तर पर हो जाये। हर पार्टी निजी जागीर की तरह चलती है। इसलिए स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं की भावनाओं और उम्मीदवारों की योग्यता का विशेष महत्व नहीं रहता। यही कारण है कि समाज के प्रति समर्पित, निष्ठावान, विचारधारा से जुड़े और अनुभवी लोगों को दरकिनार करके प्रापर्टी डीलरों, अपराधियों, माफियाओं को आसानी से टिकट मिल जाते हैं। चुनाव जीतने की सम्भावना जिसकी ज्यादा होती है उसे अक्सर वरियता मिलती है बशर्ते वह अन्य शर्तें भी पूरी करता हो। मसलन टिकट बांटने के लिए निर्धारित समिति के सदस्यों को उसनें प्रसन्न रखा हो या फिर उनको मुँह मांगी कीमत देने को तैयार हो। जिसे टिकट मिल जाती है वह कभी नहीं कहता कि पैसे देकर टिकट ली है। पर जिसे नहीं मिलती वह जरूर आरोप लगाता है कि टिकट बेची गई। हकीकत दोनों के बीच में है। चुनाव जीतने की योग्यता, दल के वरिष्ठ नेताओं से व्यक्तिगत सम्बन्ध और धन-बल तीनों ही मिलकर किसी व्यक्ति की उम्मीदवारी पर दल का अधिकृत उम्मीदवार होने की मुहर लगाते हैं। पिछले दिनों सभी दलों को लेकर यही शिकायत मिली। जब धुंआ उठता है तो कहीं आग भी लगी होती है। आगामी विधान सभा चुनावों के लिए टिकट बांटते वक्त हर दल के खेमे में अपने दल के नेताओं के विरुद्ध ऐसे आरोप सुनाई दिए। राष्ट्र और समाज हित को छोड़ भी दें तो भी यह किसी राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती स्थिति है।

इस तरह तो पूरी राजनीति का व्यावसायीकरण हो जायेगा। जब कोई उम्मीदवार पैसे देकर पार्टी का टिकट लेगा तो जीतने के बाद उसे पैसे लेकर दल बदलने में कोई संकोच न होगा। क्योंकि उसका उस दल से कोई वैचारिक सम्बन्ध तो होगा नहीं। मौका परस्ती की शादी वक्त से पहले ही टूट जाती है। पिछले वर्षों में देश की विधानसभाओं में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। जब किसी स्थानीय दल के 10-20 विधायक रातों-रात पाला बदल लेते हैं तो सरकारें बनती बिगड़ती रहती हैं। इससे न सिर्फ राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती है बल्कि ब्लैकमेलिंग और भ्रष्टाचार बढ़ जाता है। छोटे-छोटे दल अपने जा-बेजा काम सरकार से करवाते रहते हैं। काम न होने पर रूठ कर सरकार विरोधी गतिविधियों में लग जाते हैं। इतना ही नहीं इस तरह की ब्लैकमेलिंग से घिरे मुख्यमंत्री चाह कर भी कड़े कदम नहीं उठा पाते। क्योंकि उन्हें हरदम अपनी कुर्सी चले जाने का भय रहता है। पारस्परिक आर्थिक हितों से जुड़ा यह समूह समाज के लिए कुछ भी ठोस नहीं करता। इससे निराशा फैलती है। सरकारों के प्रति जनता में नाराजगी फैलती है। इतना ही नहीं जब कोई माफिया बिना योग्यता के टिकट पाने में सफल हो जाता है तो उस दल के स्थानीय कार्यकर्ताओं में कुन्ठा भर जाती है। उन्हें अपने दल के नेताआंे पर विश्वास नहीं रहता। दल में रह कर भी उनमें निरन्तर असुरक्षा की भावना बढ़ती जाती है। ऐसी मानसिकता और खरीद-फरोक्त से टिकट पाये उम्मीदवार से समाज और राष्ट्र का कोई भला नहीं होता। फिर तो ये लोग चाहे चुनाव जीतें या न जीतें। यही कारण है कि अब हर राजनीतिक दल से जनता का मोह भंग हो चुका है। वह मजबूरी में वोट तो देती है पर उसका वोट उसकी भावनाओं के अनुरूप नहीं होता। इसीलिए हर राजनैतिक दल चुनाव के पहले अपने उम्मीदवारों के चयन को लेकर सशंकित रहता है। टिकटों की सौदेबाजी घटने के बजाय और ज्यादा बढ़ रही है। एक-एक टिकट पर टिकट मांगने वालों में हजारों प्रत्याशी तक हो सकते हैं। जाहिर है कि टिकट हजारों में से किसी एक को मिलती है। बाकी के लोग हताशा में अपने क्षेत्र लौट जाते हैं। वहां जाकर वे अपने ही दल के प्रत्याशी के विरुद्ध प्रचार और तोड़-फोड़ की कार्यवाही में लग जाते हैं ताकि अपने ही दल के प्रत्याशी को हराकर हाई कमान को ये संदेश दे सकें कि उनके चयन में दोष था।

किसी भी देश के लोकतंत्र के लिए यह सब बहुत शर्मनाक बात है। टिकटार्थियों के चयन में सबके लिए एक-सी आवेदन फीस निर्धारित की जा सकती है ताकि जितने ज्यादा उम्मीदवार आवेदन दें उतना ही उस दल के कोष मे धन जमा हो जाये जो बाद में दल के काम आये। पर उम्मीदवारों से पैसे लेकर टिकट देना तो बहुत ही घातक बात है। इससे तो पूरी चुनाव प्रक्रिया की वैधता पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। अफसोस की बात तो यह है कि हमारे लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। इससे हर दल का नुकसान हो रहा है। हर दल के वरिष्ठ नेताओं को इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने चाहिए। आज तो पैसे देकर आये ये लोग मुख्यमंत्रियों को ही नचाते है। पर इस दुश्प्रवृत्ति पर यहीं रोक न लगाई गई तो आने वाले दिनों में केन्द्रीय स्तर के नेता भी गाँव कस्बे के नेताओं की तरह ऐसे अनुशासनहीन प्रत्याशियों की सार्वजनिक आलोचना और तिरस्कार का शिकार बनेंगे।

आवश्यकता इस बात की है कि हर दल अपनी स्थानीय इकाईयों को न सिर्फ सशक्त करे बल्कि उनमें आन्तरिक लोकतंत्र को बढ़ावा दे। स्थानीय स्तर पर पार्टी का काम करने वालों और पार्टी के लिए उम्मीदवारों का चयन करने वालों के अलग-अलग समूहों की स्थापना करे। हर विधानसभाई और संसदीय क्षेत्र में पार्टी का संगठन कार्य उसके कार्यकर्ता संभालें। लेकिन ये कार्यकर्ता टिकट के लिए अपनी उम्मीदवारी पेश न करें या उसके लिए दिल्ली आकर समर्थन न जुटायें। उम्मीदवारी का आवेदन करना ही आवेदक की कुपात्रता का प्रमाण माना जाए। उम्मीदवार का चयन करने के लिए दल का राष्ट्रीय या प्रान्तीय नेतृत्व स्थानीय स्तर पर संभ्रांत, अनुभवी, प्रतिष्ठित और लोकप्रिय लोगों की समितियाँ बनायें। जिस तरह सरकारी नौकरी में हर कर्मचारी की गोपनीय आख्या केन्द्र को भेजी जाती है, उसी तरह इस चयन समिति के सदस्य बिना प्रचार किये खामोशी से दल के हर कार्यकर्ता के काम पर नज़र रखें। यह काम केवल चुनाव के पहले नहीं बल्कि एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच के दौर में निरन्तर चलता रहे ताकि चुनाव आने से पहले इस समिति की सिफारिश पर उम्मीदवार का चयन किया जाए। इससे दिल्ली की खामखाह भागदौड़ खत्म होगी। कार्यकर्ता अपना काम मन से करेंगे और दल का उम्मीदवार योग्यता और पात्रता लिए हुए होगा। बाकी के कार्यकर्ताओं के लिए ऐसे उम्मीदवार का चुनाव में सहयोग करना और उसके लिए चुनाव प्रचार करना अनिवार्य और सहज हो जायेगा। शुरू में यह अटपटा जरूर लगेगा पर बाद में इस प्रक्रिया से हर दल की राजनैतिक संस्कृति में व्यापक सुधार आयेगा। आजादी के बाद के सालों में ऐसा ही माहौल हुआ करता था जबकि तब आज के मुकाबले लोगों की जानकारी काफी कम होती थी। पर क्रमशः सब कुछ हाईकमान के नाम पर होता चला गया। चाहे एक नेता का दल हो या सौ बड़े नेताओं वाला दल। सब में हाईकमान के नाम पर ही ये सब होने लगा है।

यहां सवाल उठ सकता है कि जब राजनीति जन-सेवा का माध्यम है तो उम्मीदवार एक-एक टिकट के लिए पचासों लाख रूपये तक खर्च करने को क्यों आतुर रहते हैं ? साफ जाहिर है कि राजनीति अब समाज की सेवा का नहीं बल्कि राजनेताओं के आत्मपोषण का माध्यम बन गई है। न तो इसमें किसी योग्यता की जरूरत बची है न इसमें आने के लिए कोई प्रवेश परीक्षा पास करनी होती है न इसमें सरकारी नौकरी की तरह किसी चरित्र-प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है, न इसमें कोई सेवा-निवृत्ति की अधिकतम आयु सीमा होती है। इसमें तो जो कुछ धन टिकट प्राप्त करने और चुनाव लड़ने में खर्च होता है उसका कई गुना चुनाव जीतने के बाद तमाम तरीकों से लौटकर उम्मीदवार के पास आ जाता है। चाहे वह रिश्वत के तौर पर हो या कमीशन के तौर पर। दरअसल आज राजनीति से अच्छा व्यापार दूसरा नहीं। जिसमें पैसा लगाते ही लाभ सुनिश्चत होता है और पैसा डूबने का तो कोई जोखिम होता ही नहीं। इसलिए टिकट पाने की होड़ में वही लोग भागते हैं जिनके पास धन-साधन काफी हैं, पर वे राजनीति में आकर अपनी धन लिप्सा को पूरी तरह संतुष्ट कर लेना चाहते हैं। ऐसे लोग भला समाज या प्रान्त या फिर राष्ट्र का क्या भला करेंगे ? ये लोग कैसे अपने मतदाताओं की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे। यही कारण है कि भारत का मतदाता क्रमशः हर दल से विमुख होता जा रहा है। वोट बैंक की बातें चाहे जितनी हों कोई गारन्टी से नहीं कह सकता कि इतने वोट उसकी मुट्ठी में बंद हैं। लोकतंत्र में ऐसी अनिश्चतता का होना देश के विकास के लिए शुभ लक्षण नहीं हैं। समस्या यह है कि हर दल किसी न किसी तरह सत्ता पर काबिज होना चाहता है। राजनीति में आई गिरावट को सुधारना किसी के भी एजेन्डे में नहीं है। सब मतदाताओं को सुहावने सपने दिखाकर और भ्रमित करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। इसीलिए कुछ बदलता नहीं। चुनाव से भी नहीं।