Monday, July 18, 2011

आतंकवाद ने फिर उगला जहर

Punjab Kesari 18 July

मुम्बई में हुए धमाकों ने फिर याद दिला दिया कि आतंकवादी कुछ दिन चुप भले ही बैठ जाएं, पर अपनी नापाक करतूतों से बाज आने वाले नहीं हैं। ऐसे धमाकों के बाद हमेशा ही आरोप की अंगुलियाँ स्थानीय पुलिस और आई.बी. की तरफ उठायी जाती है। बेशक इन दो विभागों पर ही ज्यादा जिम्मेदारी होती है आम आदमी की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की। इसलिए धमाके होते ही टी.वी. के ऐंकर पर्सन इन दोनों एजेंसियों की तरफ अंगुलियाँ उठाने लगते हैं। बेशक अगर ये एजेंसियाँ मुस्तैद रहें तो ऐसी वारदातों को काफी हद तक रोका जा सकता है। पर क्या केवल यही दो एजेंसियाँ 121 करोड़ लोगों के मुल्क में हर कस्बे, हर नगर, हर स्टेशन, हर बाजार पर इतनी कड़ी नजर रख सकती है? सम्भव ही नहीं है। 

दरअसल हर बार जब आतंकवादी घटना घटित होती है और मृतकों और घायलों के दिल दहला देने वाले दृश्य दिखाए जाते हैं, तो सभी बैचेन हो जाते हैं। राजनेता बयानबाजी में जुट जाते हैं और पत्रकार घटना का विश्लेषण करने में। पर आतंकवाद की जड़ पर कोई प्रहार नहीं करता। इस काॅलम में हमने बार-बार उन बुनियादी समस्याओं का जिक्र किया है, जिनका हल ढंूढे बिना आतंकवाद पर काबू नहीं पाया जा सकता। जरूरत है इन समस्याओं का हल ढूंढने की। पहली समस्या है आतंकवादियों को मिल रहा स्थानीय संरक्षण। दूसरी उन्हंे मिल रहा अवैध धन, जो हवाला कारोबारियों की मार्फत मुहैया कराया जाता है। तीसरा कारण है, आतंकवाद में पकड़े गए अपराधियों के खिलाफ लम्बी कानूनी प्रक्रिया। जिससे सजा का असर नहीं पड़ता। चैथी समस्या है, आतंकवाद से निपटने के लिए स्थानीय पुलिस को खुली छूट न देना, बल्कि आतंकवादियों को राजनैतिक संरक्षण देना।  

आतंकवादियों को मिल रहे स्थानीय प्राश्रय पर आज तक चोट नहीं की गई है। भारत के कई सौ छोट-बड़े शहरों में धर्म स्थलों और तंग गलियों में रहने वाले लोगों के पास अवैध जखीरा भरा पड़ा है। भारत की खुफिया ऐजेंसियाँ सरकार को बार-बार चेतावनी देती रहीं है। इस जखीरे को बाहर निकालने के लिए राजनैतिक इच्छा शक्ति चाहिए। जो किसी भी राजनैतिक दल के नेताओं में दिखाई नहीं देती। देश के कस्बों और धर्म स्थलों से अवैध जखीरा निकालने का जिम्मा यदि भारत की सशस्त्र सेनाओं को सौंप दिया जाए तो काफी बड़ी सफलता हाथ लग सकती है। यह एक कारगर पहल होगी। पर राजनैतिक दखलअंदाजी ऐसा होने नहीं देगी। अगर ऐसा हो तो साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आतंकवाद से निपटने वाले सैन्य बलों और पुलिस बलों को मानवाधिकार आयोग के दायरे से मुक्त रखा जाए। वरना होगा यह कि जान पर खेल कर आतंकवादियों से लड़ने वाले जांबाज बाद में अदालतों में धक्के खाते नजर आएंगे। 

इसके साथ ही यह बात भी बहुत महत्वपूर्ण है कि आतंकवादियों को वित्तीय मदद पहुँचाने का काम हवाला कारोबारियों द्वारा किया जाता है। देश में हवाला कारोबार से जुड़े कई खतरनाक कांड सी.बी.आई. की निगाह में आए हैं। पर शर्म की बात है कि इन कांडों की पूरी तहकीकात करने के बजाय सी.बी.आई. लगातार इन्हें दबाने का काम करती आई है। ऐसा क्यों होता है? लोकतंत्र में जनता को यह हक है कि वह जाने कि जिन खुफिया या जाँच एजेंसियों को आतंकवाद की जड़ें खोजने का काम करना चाहिए, वे आतंकवादियों को गैर कानूनी संरक्षण देने का काम क्यों करती आईं हैं? उन्हें सजा क्यों नहीं दिलवा पाती? क्या इसके लिए राजनेता जिम्मेदार हैं? जो खुद भी हवाला कारोबारियों से जुडें हैं और डरते हैं कि अगर हवाला काण्डों की जाँच हुई तो उनका राजनैतिक भविष्य दांव पर लग जाएगा। 

देश की संसद पर आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार ठहराये गए अफजल गुरू का मामला हो या मुम्बई हमलों के एकमात्र जिंदा बचे आतंकी हमलावर अजमल कसाब का मामला। हमारी अदालतों में कानून की इतनी धीमी और लम्बी प्रक्रिया चलती है कि अपराधिकयों को या तो सजा ही नहीं मिलती और अगर मिलती भी है तो इतनी देर के बाद कि उस सजा का कोई असर समाज पर नहीं पड़ता। जरूरत इस बात की है कि आतंकवाद से जुड़े हर मामले को निपटाने के लिए अलग से तेज अदालतों का गठन हो और हर आतंकवादी के मुकदमें की सुनवाई 6 महीने की समयसीमा के भीतर समाप्त कर दी जाए। जिसके बाद उसे सजा सुना दी जाए।  

इसके साथ ही जरूरत इस बात की भी है कि स्थानीय पुलिस अधिकारियों को आतंकवाद से निपटने की पूरी छूट दी जाए। उनके निर्णयों को रोका न जाए। अगर हर जिले का पुलिस अधीक्षक यह ठान ले कि मुझे अपने जिले से आतंकवाद का सफाया करना है तो वह ऐसे अभियान चलाएगा जिनमें उसे जनता का भारी सहयोग मिलेगा। आतंकवादियों को संरक्षण देने वाले बेनकाब होगें। जिले में जमा अवैध जखीरे के भंडार पकड़े जाएंगे। पर कोई भी प्रांतीय सरकार अपने पुलिस अधिकारियों को ऐसी छूट नहीं देती। पंजाब में आतंकवाद से निपटने के लिए जब के. पी.एस. गिल को पंजाब के मुख्य मंत्री बेअंत सिंह ने तलब किया तो गिल की शर्त थी कि वे अपने काम में सीएम और पीएम दोनों का दखल बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्हें छूट मिली और दुनिया ने देखा कि पंजाब से आतंकवाद कैसे गायब हो गया। मानव अधिकार की बात करने वाले ये भूल जाते हैं कि हजारों लोगों की जिंदगी नाहक तबाह करने वाले के भीतर मानवीयता है ही नहीं। घोर पाश्विकता है। ऐसे अपराधी के संग क्या सहानुभूति की जाए? 

अगर इन चारों समस्याओं का हल ईमानदारी से लागू किया जाए, तो काफी हद तक आतंकवाद पर काबू पाया जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि देश के जागरूक नागरिक, मीडिया और वकील मिलकर सरकार पर दबाव डालें कि वे इन कदमों को उठाने में हिचक महसूस न करें। अगर हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो हमें कभी भी, कहीं भी आतंकी हमले के शिकार बनने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा।

1 comment:

  1. आदरणीय विनीत जी
    आज के आप के सशक्त लेख में आतंकवाद की समस्या के समाधान के सभी आवश्यक,महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए गए हैं.
    सिक्यूरिटी फोर्सेस यदि कमजोर होती तो करकरे साहब,शर्मा जी (बतला हॉउस ) पंजाब में गिल साहब के समय हजारों पुलिष कर्मी शहीद न होते.उन्हें और आवश्यक आधुनिक शस्त्र मुहैया करवाने के साथ उनके हाथ खोल देने अत्यंत आवश्यक हैं.

    आतंकवाद से निपटने के लिये गली मोहल्ले में जहाँ भी पनाहगाह और सपोर्ट है ,को नस्ट करने के लिए स्पेस्लिस्ट प्रोफेसनल्स ( सुरक्षा अजेंसीस,कानूनी प्रक्रिया ) की आवश्यकता है,politesians का इन्हें खुली छोट न देना एकमात्र समस्या है और इसके अलावा इनका और क्या काम.
    दूसरी बात जैसे की समस्त कानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर सुप्रीम कोर्ट से अफजल गुरु की फांसी की सजा को कानूनी प्रक्रिया के नाम पर लटका देना,कस्साब को पुलिस कार्यवाही के दौरान जिन्दा पकड़ लेने के अलावा और क्या शाक्छ्या चाहिए (इससे तो यही लगता है की हमारे देश में आतंकवादी,घोटालेबाज आदि तो सुरक्छित हैं और जनता अशुरक्छित) देश के साथ गद्दारी है और ऐसे कामों के लिए समय सीमा क्यों तय नहीं होती?
    समाज के ढुलमुल रवैये के कारण नेताओं में डर नहीं है.

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