Friday, October 17, 2003

फर्जी संेसर प्रमाण पत्रों पर चल रही हैं अश्लील फिल्में


पिछले एक दशक से देश भर में अश्लील फिल्मों के प्रदर्शन की बाढ़ सी आ गई हैं। चाहे गांव का वीडियों थिएटर हो या शहरों के सिनेमाघर। बड़ी भारी तादात में ये अश्लील फिल्में दिखाई जा रही हैं। दरअसल अश्लील शब्द इनके लिए हल्का पड़ता है। बाकायदा ब्लू फिल्में ही हैं जो देश भर के थिएटरों में खुलेआम धड़ल्ले से चल रही हैं। इनमें वो सब कुछ दिखाया जाता है जिसको ब्लू फिल्म के दायरे में रखा जाता है यानी संभोग और विकृत सेक्स की सभी मुद्राएं खुलेआम सिनेमाहाॅलों में दिखाई जा रही हैं। इन फिल्मों के पोस्टर भी कम उत्तेजक नहीं होते। उन पर बड़ा-बड़ा लिखा होता है, ‘अंगे्रजी फिल्म का हिन्दी रूपांतरण।पोस्टर इतने भड़काऊ होते हैं कि किशोर और किशोरियों को भी सिनेमाहाॅल तक खींच लाते हैं जिससे इन सिनेमाघरों का कारोबार बढि़यां चल रहा हैं। केबल टीवी के आ जाने से जहां साफ सुथरी फिल्मों के दर्शकों की संख्या थिएटर में घटी है वहीं वयस्क फिल्मों के नाम पर चलने वाली इन ब्लू फिल्मों के दर्शकों की तादाद अच्छी-खासी बढ़ गई है। मजे की बात ये है कि जब इन फिल्मों का प्रदर्शन होता है तो पर्दे पर सबसे पहले फिल्म सेंसर बोर्ड का प्रमाण पत्र दिखाया जाता है। पर जब फिल्म में कामुक दृश्यों का खुला प्रदर्शन होता है तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर फिल्म सेंसर बोर्ड ऐसी फिल्मों को प्रमाण पत्र कैसे दे देता है ? ऐसी 59 फिल्मों की एक सूची जब मुरादाबाद के एडवोकेट श्री संजय कुमार बंसल ने सेंसर बोर्ड को भेजी और उनसे पूछा कि क्या ये सभी फिल्में आपके द्वारा प्रमाणित की गई हैं तो उन्हें जवाब मिला कि उनमें से मात्र 18 फिल्मों को ही सेंसर बोर्ड ने प्रमाण पत्र जारी किया था। साफ था कि 41 फिल्में बिना प्रमाण पत्र के सिनेमाघरों में दिखाई जा रही हैं। इनमें दिखाया जाने वाला सेंसर का प्रमाण पत्र फर्जी था। श्री बंसल ने इसके बाद स्थानीय पुलिस प्रशासन व तत्कालीन केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज को लिखा और उनसे कड़े कदम उठाने की मांग की। पर नतीजा शून्य ही रहा किसी ने कोई कार्यवाही नहीं की।

अक्सर अखबारों में खबर छपती है कि वीसीडी निर्माता के कारखाने में छापा’, ‘भारी मात्रा में ब्लू फिल्में पकड़ी गईं।खबर पढ़कर लगता है कि पुलिस ने वाकई प्रशंसनीय कार्य किया। दरअसल ये धर पकड़ केवल प्रतीकात्मक होती है। अगर पुलिस वास्तव में ब्लू फिल्मों के प्रदर्शन को रोकना चाहती है जिसके लिए वह सक्षम भी है और उसके लिए उसके पास कानूनी अधिकार भी है तो ऐसा कैसे होता है कि उसकी नाक तले शहर के थिएटरों में खुलेआम ब्लू फिल्म चलती रहती है?  ऐसा कैसे होता है कि जब कोई जागरूक नागरिक पुलिस से ऐसी फिल्मों के प्रदर्शन को रोकने की गुहार करता है तो पुलिस उसे अनदेखा कर देती है ? ऐसा कैसे हो सकता है कि देश के चप्पे-चप्पे पर नजर रखने वाली भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्री को इसकी खबर तक न हो कि देश में अश्लीलता का खुला नंगा नाच हो रहा है ? साफ जाहिर है कि अश्लील फिल्मों का प्रदर्शन भारी मुनाफे का सौदा है और इस मुनाफे में जिम्मेदार लोगों की हिस्सेदारियां बटीं हैं। एक लंबी फेहरिस्त है ऐसी फिल्मों की जिनके पोस्टर खुलेआम देश में लग रहे हैं। जिनके शीर्षक भी बड़े उत्तेजक होते हैं। जैसे बेवफा आशिक’, ‘खूनी कातिल’, ‘नशीली आंखें’, ‘प्यार की तलाशया जोशीली लैला।ऐसे पोस्टरों को देखकर स्थानीय पुलिस फौरन सक्रिय हो सकती है। पर नहीं होती और सेंसरशिप के कानूनों का खुला उल्लंघन होता है। 

चलचित्र अधिनियम 1952 के दंड प्रावधानों को लागू करना राज्य सरकार का कार्य है क्योंकि फिल्मों का प्रदर्शन करने का विषय राज्य से संबंधित है। लोगों के मन को आंदोलित करने वाले मुख्य उल्लंघन कई हैं। यानी व्यस्यक प्रमाण पत्र वाली फिल्म का प्रदर्शन नाबालिगों के लिए करना या एसप्रमाण पत्र वाली फिल्मों का प्रदर्शन स्वीकृत वर्ग की बजाय अन्य वर्ग के लिए करना या प्रमाण पत्र के मिलने के बाद फिल्म के काटे हुए अंशों को पुनः फिल्म में जोड़कर दिखाना। इस तरह के तमाम कानूनी उल्लंघन इन फिल्मों के निर्माताओं व वितरकों द्वारा रोज़ाना किए जा रहे हैं। देश कल्याण समितिनाम के एक जागरूक संगठन ने पिछले महीने 62 फिल्म निर्माताओं और वितरकों के नाम-पतों की सूची भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी है। जिन्होंने इस तरह की अश्लील फिल्म का निर्माण या वितरण किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री इस मामले में कोई ठोस पहल करेंगे। जहां तक सेंसर बोर्ड का प्रश्न है उसका कहना है कि अगर किसी जागरूक नागरिक को  ऐसी जानकारी मिलती है कि ब्लू फिल्म किसी सिनेमा हाॅल में दिखाई जा रही है तो उसे तुरंत पुलिस को सूचित करना चाहिए और छापा डलवाकर उस फिल्म की रील जब्त कर लेनी चाहिए। फिर उसे सील बंद डिब्बे में सेंसर बोर्ड के पास भेज दिया जानी चाहिए। ताकि ये जांच की जा सके कि फिल्म में काटा गया हिस्सा जोड़ा गया है या नहीं। पर सेंसर बोर्ड को ये कौन समझाए कि सिनेमाहाॅलों से नियमित भत्ता लेकर पुलिस अपनी आंखें बद कर लेती है। छापा डालना तो दूर वो ऐसे सिनेमाघरों की तरफ रूख भी नहीं करेगी। एक बात और जिन फिल्मों को प्रमाण पत्र दिया ही नहीं गया उनको सेंसर बोर्ड कैसे परखेगा? इसलिए जनता असहाय है और सिनेमा मालिकों और स्थानीय पुलिस व प्रशासन दोनो की चांदी कट रही है। मजे की बात ये है कि भारत की प्राचीन संस्कृति, हिन्दू धर्म और नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा की प्रांतीय और केन्द्रीय सरकारों के बावजूद भी उत्तर प्रदेश तक में ऐसा होता आ रहा था। वहां श्री बंसल की गुहार की परवाह नहीं की गई। वैसे कोई भी राज्य इससे अछूता नहीं है और यह सभी जागरूक माता-पिता के लिए चिंता की बात होनी चाहिए। 

1989 में जब हमने देश में पहली बार हिन्दी में स्वतंत्र टीवी पत्रकारिता की शुरूआत की तो हमारी वीडियों मैगजीन कालचक्रको संेसर बोर्ड ने बार-बार रोका और हमसे महत्वपूर्ण राजनैतिक रिपोर्टों के वे अंश काटने को कहा जो न सिर्फ तथ्यात्मक थे बल्कि देश के राजनैतिक पतन का स्पष्ट प्रमाण देते थे। उस वक्त हमने दो काम किए एक तो समाचारों को सेंसर करने की उसकी नीति को अदालत में चुनौती दी और दूसरा एक रिपोर्ट उसी के कारनामों पर बनाई जिसमें ऐसी फिल्मों के अंश दिखाए जो सेंसर बोर्ड की परिभाषा में प्रदर्शन के योग्य नहीं थे। फिर भी उन्हें पास किया गया। सेटलाइट चैनलों के आ जाने के बाद वीडियों या टीवी समाचारों को सेंसर करना तो कोई मुद्दा ही नहीं रहा पर अश्लील फिल्मों या ब्लू फिल्मों के प्रदर्शन पर नियंत्रण कर पाने की  सेंसर बोर्ड की नाकामी उसके अस्तित्व और उसकी सार्थकता पर प्रश्नचिंह लगा देती है। आश्चर्य की बात है कि जो सरकार, पुलिस और प्रशासन जनहित में सवाल खड़े करने वालों को बेरहमी से कुचल देता है वहीं पुलिस और प्रशासन ब्लू फिल्म दिखाने वालों की कमर क्यों नहीं तोड़ पाता? कहीं ऐसा तो नहीं कि सत्ताधीशों की मन्शा यही हो कि जनता और खासकर किशोर, ऐसे भौंडे मनोरंजन के मोहजाल में फंसे रहे और अपना हक न मांगे। जिस तरह चीन के लोगों को अफीम के नशें की लत डालकर विदेशियों ने चीन का आर्थिक दोहन किया उसी प्रकार भारत के आम लोगों को ऐसी फिल्मों की लत डालकर गुमराह किया जा रहा है। जो भी हो यह चिंता का विषय है और जागरूक माता-पिता इसे अनदेखा करके चुप नहीं बैठ सकते।

Friday, October 10, 2003

दिल्ली प्रदेश चुनाव वायदों पर कौन कितना खरा


पिछले दिनों मैं उत्तरी दिल्ली के व्यावसायिक क्षेत्र में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सम्भाषण करने गया। जिज्ञासावश वहां उपस्थित लोगों से दिल्ली के भावी चुनाव पर कुछ सवाल किए। जब ये पूछा कि उनकी दृष्टि में श्रीमती शीला दीक्षित और श्री मदनलाल खुराना में क्या अंतर है तो बहुत ही रोचक उत्तर मिले जो पाठकों को दिल्ली की नब्ज का कुछ एहसास करा सकते हैं। 

इन लोगों का कहना था कि श्री मदनलाल खुराना जनता को प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं। जबकि सारी दिल्ली श्री खुराना के पोस्टरों और होर्डिंगों से पटी पड़ी है। एक से एक आकर्षक रंगीन इश्तहारों के मार्फत श्री खुराना को परिवर्तन का मसीहा बताया जा रहा है। उनकी परिवर्तन यात्रा दिल्ली के हर इलाके से बड़ी शान-शौकत से गुजर रही है। भड़काऊ और सत्ता विरोधी भाषण हो रहे हैं। प्रायोजित भीड़ भी जुटाई जा रही है। जिस इलाके से यात्रा गुजरती है उसे झंडियों और पोस्टरों से लाद दिया जाता है। अगर यही सब सफलता का मापदंड होता तो श्री खुराना की परिवर्तन यात्रा दिल्ली में आने वाले राजनैतिक तूफान का संकेत देती पर वास्तविकता कुछ और है। 

लोगों का मानना है कि श्री खुराना केवल गाल बजाते हैं ठोस कुछ भी नहीं करते। जिन समस्याओं को लेकर आज वो दिल्ली की जनता को जगाने निकले हैं उनका कोई हल उनके पास नहीं है। जब वे खुद मुख्यमंत्री थे तब भी ये समस्याएं यूं ही बरकरार थीं। वे श्रीमती शीला दीक्षित पर दिल्लीवासियों के लिए कुछ भी नहीं कर पाने का आरोप लगाते हैं पर दिल्ली के नागरिक इतने भोले नहीं कि सच्चाई को इतनी आसानी से अनदेखा कर दें। इन नागरिको का कहना है कि श्रीमती शीला दीक्षित धीर-गंभीर और प्रशासनिक रूप से सक्षम महिला हैं। वे ना तो खुराना जी या भाजपा के विरूद्ध किसी मंच पर जहर उगल रहीं हैं और ना ही अपने भाषणों में किसी भी तरह का हलकापन आने दे रही हैं। दिल्ली के नागरिकों का मनना है कि नागरिकों की सुविधा के लिए मेट्रो रेल का निर्माण करवा कर श्रीमती दीक्षित ने राजधानी वासियों की बहुत बड़ी सेवा की है। अभी मेट्रो रेल पूरी तरह से चालू नहीं हुई। इसलिए ज्यादा लोग इसका उपयोग नहीं कर रहे हैं पर भविष्य में यही मेट्रो दिल्ली की परिवहन व्यवस्था में रक्त धमनियों की तरह काम करेगी। श्रीमती दीक्षित के कार्यकाल में दिल्ली में सबसे ज्यादा फ्लाइओवरों का निर्माण हुआ है। जिनसे दिल्ली में परिवहन व्यवस्था में काफी सुधार आया है। अब दिल्ली के प्रमुख चैराहों, खासकर रिंग रोड पर ट्रैफिक जाम बहुत कम होता है और यातायात सुचारू रूप से चलता रहता है। एक ही चैराहे पर अगर बहुत देर तक डीजल की गाडि़यां खड़ी रहें तो सारा शहर प्रदूषित हो जाएगा पर फ्लाइओवरों के बनने से रिंग रोड जैसी व्यस्ततम सड़क पर भी अब प्रायः ट्रैफिक रूकता नहीं है। 

श्रीमती दीक्षित इतने बड़े काम के लिए कोई बहुत गर्व में नहीं हैं। वे हर जनसभा में विनम्रता से अपने कामों का लेखाजोखा पेश कर देती हैं और जनता से अपने विवेक का इस्तेमाल करके  फैसला करने को कहती हैं। उनके उद्बोधनों में आत्म-विश्वास भरपूर झलकता है। श्रीमती दीक्षित की सबसे बड़ी उपलब्धि तो भागीदारीकार्यक्रम है। जिसके तहत उन्होंने सरकारी मशीनरी और संसाधानों को जनता के लिए उपलब्ध करा दिया। इस उम्मीद में कि जनता अपने फायदे के कार्यक्रमों को पूरा करने में सहयोग करेगी और अफसरशाही ये समझ जाएगी कि उसे जनता पर हुकूमत नहीं बल्कि उसकी सेवा करनी है। इसलिए प्रशासन पहले की तुलना में कहीं ज्यादा चुस्त, दुरूस्थ्त और जवाबदेह बन गया है। उन्होंने भागीदारी कार्यक्रम के तहत दिल्ली के स्कूलों में जा-जाकर छात्रों को सामुदायिक कार्यों में सहयोग देने के लिए आमंत्रित किया, इससे जनता की निगरानी समितियां बन गईं और विकास के कार्य काफी हद तक निष्ठापूर्वक किए गए। इसका दिल्ली की जनता पर बहुत अच्छा असर पड़ा। वैसे ऐसी ही एक स्कीम आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री चन्द्रबाबू नायडु ने मातृभूमिनाम से आंध्र प्रदेश में चलाई थीं। इसका उन्हें काफी लाभ मिला। 

लोकतंत्र का मतलब ही ये है कि लोकयानी आम जनता, ‘तंत्रयानी सरकारी व्यवस्था, दोनों का आपसी मिलन और वे एक दूसरे के विरोधी नहीं पूरक होकर काम करें। इस पहल के लिए श्रीमती शीला दीक्षित ने राजधानी के सभी जागरूक नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं का सहयोग लिया। दिल्ली के निवासियों के लिए यह बड़े संतोष की बात है कि अब सरकार चलाने में उनकी भी हिस्सेदारी है। इससे सरकार और जनता के बीच की खाई पटी है और विकास का कार्य आगे बढ़ा है। 

दिल्लीवालों का कहना है कि मुकाबला भाजपा या कांग्रेस की विचाधारा के बीच नहीं है बल्कि ठोस काम करने वालों और गाल बजाने वालों के बीच है। जनता ठोस काम चाहती है और उसे लगता है कि श्रीमती शीला दीक्षित ने बिना वायदे तोड़े काम करके दिखाया है और उम्मीद है कि आगे भी वे इसी गति से दिल्लीवासियों की सेवा करती रहेंगी। इसलिए दिल्ली के वो लोग भी जो पारंपरिक रूप से भाजपा के लिए समर्पित रहे हैं, श्रीमती दीक्षित को एक कर्मठ मुख्यमंत्री के रूप में देखते है और इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक भाजपा से छूट कर इंका की गोद में आ जाए।
चाहे अस्पताल हो या थाने, बस स्टाप हो या बगीचे और स्टेशन हो या बाजार हर जगह या तो व्यवस्था सुधरी हुई मिलेगी या सुधार के लिए गंभीर प्रयास चल रहे होंगे। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि श्रीमती दीक्षित ने तमाम तूफानों को झेलते हुए भी अपनी मशाल जलाए रखी है। वे अपने काम में लगी रहीं और विरोधियों पर न पहले कोई हमला किया न अब कोई कर रही हैं। उनकी यह शैली दिल्लीवासियों को भा गई है। जबकि भाजपा कि छवि वायदा करके मुकर जाने वालों की बन रही है। इन हालातों में यह कोई आश्चर्यजनक बात न होगी यदि दिल्ली की जनता एक बार फिर ताज श्रीमती शीला दीक्षित के सिर पर रख दे। 

वैसे भी दिल्ली में भाजपा का प्रशासनिक रिकार्ड कोई बहुत प्रभावशाली नहीं रहा है। अपने कार्यकाल में भाजपा ने तीन-तीन मुख्यमंत्री बदले हैं। पहले श्री मदनलाल खुराना जिन्हें जैन हवाला कांडमें आरोपित होने के बाद इस्तीफा देना पड़ा। दूसरे श्री साहिब सिंह वर्मा जो भाजपा के अंदरूनी कलह के कारण बदले गए। तीसरी श्रीमती सुषमा स्वराज जिनके नेतृत्व में भाजपा ने दिल्ली प्रदेश की चुनाव का बिगुल बजाया और उसे मुंह की खानी पड़ी। जबकि इंका नेतृत्व ने अंदरूनी गुटबाजी को हवा न देकर दिल्ली की बागडोर श्रीमती शीला दीक्षित को ही सौंपे रखी जिसके अच्छे परिणाम आए। दिल्ली वाले ये जानते हैं कि अगर इंका चुनाव जीतती है तो श्रीमती शीला दीक्षित ही उनकी सरपरस्ती करेंगी। जबकि भाजपा आज भले ही श्री खुराना को भावी मुख्यमंत्री बना कर पेश कर रही हो पर कोई जरूरी नहीं कि वो ऐसा ही करे। उसकी अंदरूनी गुटबाजी को भाजपा नेतृत्व में हवा देने वाले कई खेमें हैं इसलिए वहां निर्माण कम और सिर-फुटव्वल की संभावना ज्यादा रहेगी। बाकी आगे समय ही बताएगा कि कौन जीतता है ?

Friday, September 26, 2003

विहिप का कहना गलत है



अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में हुए विहिप के संत सम्मेलन में प्रस्ताव पास किया गया कि यदि सरकारें मंदिरों का अधिग्रहण करती हैं तो विहिप इसका खुलकर विरोध करेगी। विहिप के इस बयान के पीछे शायद यह आशंका है कि इस तरह के कदम से सरकारों की धर्म के क्षेत्र में दखलंदाजी बढ़ जाएगी। कायदे से तो धर्म का क्षेत्र सरकार के नियंत्रण के बाहर ही होना चाहिए, क्योंकि धर्म आस्था का सवाल है। आत्मा के परमात्मा का संबंध का सवाल है। परमात्मा तक जाने के अनेक मार्ग हैं चाहे वो हिन्दू धर्म के विभिन्न संप्रदायों के मार्ग से हों या फिर अन्य धर्मों के। धर्म निरपेक्ष देश की सरकार से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हर धर्म की भावनाओं के अनुरूप काम करे। यदि सरकारें मंदिरों का अधिग्रहण करती हैं और सरकार द्वारा तैनात अधिकारी या व्यक्ति धर्म प्रेमियों की भावनाओं की कद्र नहीं करते तो हालत और भी बिगड़ सकती है। विहिप के इस तर्क से कोई असहमत नहीं होगा। पर सोचने वाली बात ये है कि धर्म स्थलों के अधिग्रहण की जरूरत ही क्यों पड़ती है

पिछले ही दिनों जम्मू कश्मीर की धर्म निरपेक्ष सरकार के मुसलमान मुख्यमंत्री ने एक अध्यादेश जारी करवाकर जम्मू कश्मीर की सारी मस्जिदों का अधिग्रहण कर लिया। कारण साफ है, इनमें से अनेक मस्जिदें पिछले बहुत वर्षों से आतंकवादियों का अड्डा बनी हुई थीं। भय और आतंक से आतंकवादियों ने इन्हें अपने कब्जे में कर रखा था। यहां से हिंसक कार्रवाईयां संचालित होती थीं। जब पानी से सिर से गुजर गया तो जम्मू कश्मीर की सरकार को यह कदम उठाना पड़ा। यह कोई अकेला मामला नहीं है। धर्म स्थलों का दुरुपयोग राजनीतिक हितों को साधने के लिए या वहां से समाज विरोधी गतिविधि चलाने के लिए अक्सर होता रहा है और आज भी हो रहा है। पूर्वी उत्तर भारत के सीमांत राज्यों में ऐसे तमाम धर्मस्थल हैं जहां भारत के विरुद्ध रात दिन जहर उगला जाता है और हिंसक गतिविधियां संचालित होती हैं। ऐसे धर्म स्थलों का नियंत्रण यदि सरकार अपने हाथ में नहीं लेती है तो राज्य के अस्तित्व को खतरा हो सकता है। इसलिए विहिप का तर्क उचित नहीं है। पहले भी अमृतसर में ऐसा कटु अनुभव हो चुका है। जब पवित्र स्वर्ण मंदिर  पर भिंडरावाला ने कब्जा जमाकर हिन्दू और सिख समाज के बीच खाई पैदा कर दी। बड़ी दुखद हिंसक कार्रवाई के बाद गुरूद्वारा साहिब की मुक्ति हुई और उसके बाद उसके चारों ओर विकास और सौन्दर्यीकरण का काम तेजी से हुआ। 

जब धर्म स्थल भ्रष्टाचार या दुराचार के केन्द्र बन जाएं, तो उन्हें स्वतंत्र नहीं छोड़ा जा सकता। कभी-कभी प्रबंधकीय व्यवस्था को सुधारने के लिए भी यह करना जरूरी होता है। वैष्णो देवी का उदाहरण सबके सामने है। सरकार के अधिग्रहण से पहले यहां अव्यवस्था और अराजकता का बोलबाला था। चढ़ावे का सारा पैसा बारीदारों की जेब में जाता था। विकास अवरुद्ध था। तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं था। बहुत कुछ ऐसा होता था, जिसका उल्लेख करना भी शोभनीय नहीं। जम्मू के नागरिक जो कुछ बताते हैं उसे सुनकर मन में धर्म के प्रति श्रद्धा नहीं, अश्रद्धा उत्पन्न होती है। ऐसे हालातों में जब जम्मू कश्मीर के तत्कालीन उपराज्यपाल श्री जगमोहन ने वैष्णो देवी भवन व आसपास के पहाड़ी क्षेत्र का अधिग्रहण किया तो बारीदारों यानी पंडों ने उनका महीनों विरोध किया। आखिर में श्री जगमोहन सफल रहे और उसी का परिणाम है कि आज वैष्णो माता की यात्रा का स्वरूप ही बदल गया। अब हर आदमी वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के विकास कार्यों की महिमा गाते नहीं थकता। इतना ही नहीं, चढ़ावे के धन से तमाम तरह के जनहित के कार्य भी हो रहे हैं। कभी-कभी तो जम्मू कश्मीर की सरकार तक को श्राइन बोर्ड से कर्जा मांगने की नौबत आ जाती है। 

ऐसा ही दूसरा उदाहरण तिरुपति बालाजी का है। जहां दर्शनों की सुन्दर व्यवस्था से लेकर तीर्थयात्रियों के ठहरने, भोजन और आराम आदि की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था रहती है। यह अचानक नहीं हुआ। इस मंदिर का भी बुरा हाल था। पर अधिग्रहण होने के बाद से करोड़ों रुपया मंदिर के खाते में जमा होने लगा और ट्रस्टियों ने उसका सदुपयोग करना शुरू कर दिया। आज तिरुपति एक सुव्यवस्थित धर्म स्थल का प्रत्यक्ष प्रमाण है। जहां न सिर्फ आने वाले तीर्थयात्रियों को सुख मिलता है बल्कि स्थानीय जनता भी लाभान्वित हो रही है। तिरुपति के चढ़ावे से विश्वविद्यालय, स्कूल, मेडिकल और इंजीनियरिंग काॅलेज, अस्पताल व तीर्थयात्रियों के ठहरने की तमाम व्यवस्थाएं की गई हैं। 

जबकि दूसरी ओर देश के तमाम मंदिर, गुरुद्वारे और मस्जिद हैं। जो आज भी ऐसे हैं कि उनमें आने वाला दान का करोड़ों रुपया पंडे, मौलवियों के पेट में चला जाता है। दर्शनार्थियों या श्रद्धालुओं के लिए कोई सुविधाएं नहीं है। हर पंडा उन्हें लूटने को तैयार रहता है। शांति की खोज में आने वाले लुट पिट कर जाते हैं। कुछ तो तय कर लेते हैं कि फिर कभी लौटकर नहीं आएंगे। भगवान को चढ़ाए गए धन की लूट करना और उससे मौज मस्ती करना आम बात है। इसके प्रमाण खोजने की जरूरत नहीं। किसी भी तीर्थस्थल में चले जाइए। प्रमाण आंखों के सामने दिखाई दे जाएगा। ठाकुर जी के धन का सदुपयोग हो और उससे तीर्थयात्रियों की सुविधाएं बढ़े, ऐसा शायद ही कहीं होता है। भेंट चढ़ाने वाले यह सोच सोचकर परेशान होते हैं कि हम तो अपने गोस्वामी को इतनी मोटी रकम देकर आए थे, इस उम्मीद में कि वह सारी रकम ठाकुरजी की सेवा में जमा हो जाएगी, पर असलियत ये है कि गोस्वामियों के हाथ में दी गई रकम शायद ही कभी ठाकुर जी की गुल्लक में पहंुचती हो। दर्शनार्थी तो अपनी भेंट को ठाकुर जी तक पहंुचाने के लिए इन पंडों को पकड़ाते हैं। उन्हें क्या पता कि उनके द्वारा अर्पित धन ठाकुर जी तक नहीं पहंुंचेगा। वे बार बार इन पंडों के दुव्र्यवहार की शिकायत करते हैं, पर इनका आपसी गठबंधन इतना मजबूत है कि वे कोई भी सुधार होने ही नहीं देते। दर्शनार्थियों को लगता है कि मंदिर का प्रबंधन कमजोर है। जबकि प्रबंधन को लगता है कि कैसे इन पंडों को नियंत्रित किया जाए और दर्शनार्थियों के लिए सुविधाओं का विस्तार किया जाए। ऐसे तमाम विवादास्पद मंदिरों को यदि सरकार अपने कब्जे में ले ले तो उनकी व्यवस्था सुधर सकती है। बशर्ते कि सरकार के द्वारा इन बोर्डों में उन व्यक्तियों को ही नामित किया जाए जिनकी भक्ति और उस धाम के प्रति आस्था में कोई कमी न हो। नास्तिक, भ्रष्ट, विधर्मी व्यक्ति कभी भी उस देवालय या उसके श्रद्धालुओं के प्रति न्याय नहीं कर पाएगा। इसलिए बहुत देखभाल कर लोगों को चुनना चाहिए। यदि राज्य सरकारें मंदिरों या मस्जिदों का अधिग्रहण करने के बाद उनमें अपने राजनैतिक कार्यकर्ताओं या चाटुकारों को फिट करती हैं तो इनकी दशा सुधरने के बजाए और भी बिगड़ जाएगी। तब इन सरकारों को भलाई के बजाए बुराई ही मिलेगी, जिसका खामियाजा उसे चुनावों में उठाना पड़ सकता है। इसलिए प्रतिष्ठित, साधन संपन्न, चरित्रवान, भक्त व निष्कलंक व्यक्तियों को ही ऐसे न्यासों का सदस्य बनाया जाना चाहिए। ठाकुर जी के धन का दुरुपयोग न हो और उसके खर्चे की व्यवस्था पारदर्शी हो। वैष्णो देवी और तिरुपति बालाजी की तरह मंदिर और मंदिर से जुड़े सभी क्षेत्रों के कलात्मक निर्माण की छूट दी जाए ताकि कम समय में ही ठोस परिणाम दिखाई देने लगें। हां यह बात जरूर है कि सरकार केवल उन्हीं मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारों का अधिग्रहण करे जिनमें या तो देशद्रोही गतिविधियों का संचालन होता हो या भ्रष्टाचार का बोलबाला हो। जिन मंदिरों मस्जिदों, गुरुद्वारों या चर्चों के न्यासी खुद ही व्यवस्था अच्छी चला रहे हों, या ठाकुरजी के धन से तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए अच्छे कदम उठा रहे हों, वैसे न्यासों को छेड़ने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह जरूरी नहीं कि सरकार द्वारा नामित सदस्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से ही कार्य करे। यदि इन सावधानियों को बरतते हुए धर्मस्थलों का अधिग्रहण किया जाता है तो विहिप या दूसरे धार्मिक संगठनों को उसका विरोध नहीं करना चाहिए। विरोध केवल विरोध के लिए न हो, हर केस में वस्तुस्थिति का मूल्यांकन करने के बाद हो तो विरोध करने वालों की गरिमा बढ़ती है अन्यथा यह महज चुनावी स्टंटबाजी लगता है।

Friday, September 12, 2003

मायावती की दुविधा


सुश्री मायावती ने ये सोचा भी न होगा कि उनकी सत्ता इतनी आसानी से हाथ से छीन जाएगी। सत्ता जाने के सदमे में तो वो थीं ही अब उन्हें एक और झटका लगा कि उनके दर्जनों विधायक साथ छोड़ भागे और श्री मुलायम सिंह के हाथ मजबूत कर दिए। अब सुश्री मायावती के पास हाथ मलने के सिवाय कोई दूसरा चारा नहीं है। अगर श्री मुलायम सिंह यादव व उनके सहयोगी श्री अमर सिंह व अन्य नेता ये तय कर लें कि उन्हें सुश्री मायावती को मुह तोड़ जवाब देना है तो वे आसानी से ऐसा करने की स्थिति में हैं। वे चाहे तो उत्तर प्रदेश में बसपा कार्यकताओं को कचहरी और थानों में दौड़ा-दौड़ा कर मारें। हालांकि सत्ता में आने के बाद हर राजनेता यही कहता है कि उसकी सरकार बदले की भावना से काम नहीं करेगी। पर मानव का स्वभाव है कि वो जैसे को तैसा जवाब देना चाहता है। इसलिए अगर श्री यादव सुश्री मायावती और उनके कार्यकर्ताओं पर कानूनी शिकंजा कसते हैं तो कोई नई बात नहीं होगी। हां, सुश्री मायावती की उलझनें जरूर बढ़ जाएंगी। पर एक बात ऐसी है जो सुश्री मायावती के पक्ष में जाती है। अपनी जाति वाले वोटों पर उनकी पकड़ मजबूत है। बसपा जिस दल के साथ भी चुनाव में कूद पड़े उसी को जिताने की स्थिति रखती है क्योंकि उनके समर्थकों के वोट एकजुट होकर पड़ते हैं। अपने इस जनाधार के कारण ही सुश्री मायावती इतनी आत्मविश्वास से भरी रहती हैं और शायद यही कारण है कि वे राजनीति की मैदान में किसी को भी पटकनी देने को तैयार रहती हैं। पर उनके इसी आक्रामक तेवर ने उन्हें काफी विवादास्पद बना दिया है। कोई भी दल उन पर विश्वास नहीं करता। मजबूरी में ही भाजपा ने सुश्री मायावती का हाथ थामा था और शायद यही मजबूरी कांग्रेस को मजबूर करे कि वो सुश्री मायावती से हाथ मिला कर आगामी विधानसभा चुनावों में चुनाव लड़े। यदि ऐसा होता है तो यह समीकरण भाजपा को बहुत भारी पड़ेगा। शायद यही कारण है कि भाजपा नेतृत्व सुश्री मायावती के साथ दोहरा खेल खेल रहा है। एक गुट ने मायावती सरकार गिराने की कार्यवाही को अंजाम दिया और दूसरा गुट उनसे अभी भी संबंध बनाए रखे है। इस का एक ही उद्देश्य है कि किसी भी तरह से सुश्री मायावती और कांग्रेस का समझौता नहीं हो पाए, क्योंकि वह एक मजबूत गठबंधन होगा।

सब कुछ सुश्री मायावती को ही सोचना और तय करना है। शुरू-शुरू में सभी नेता सत्ता के मद में कुछ ऐसे काम कर बैठते हैं जिससे उनका घाटा ही होता है पर समय सब सिखा देता है। श्री अटल बिहारी वाजपेयी के विश्वास मत के दौरान श्री मुलायम सिंह यादव के जो तेवर थे वे आज नहीं है। अब वे ज्यादा परिपक्व हो गए हैं और दूर की राजनीति करने लगे हैं। पिछले अनुभवों से सुश्री मायावती को भी सबक लेना चाहिए। यूं राजनीति में कोई संबंध स्थायी नहीं हुआ करते। मौका और समय देखकर ये बनते और टूटते रहते हैं। लेकिन अगर विचारधारा के स्तर पर देखा जाए तो सुश्री मायावती का भाजपा से तालमेल कभी नहीं बैठ सकता क्योंकि दोनों की विचारधारा में भारी विरोधाभास है। जबकि कांग्रेस और बसपा की विचारधारा में काफी साम्य है और अगर ये दो दल साथ आ जाते हैं तो हिन्दुस्तान के प्रजातंत्र में राजनीति के धु्रविकरण का एक नया अध्याय शुरू होगा जिसमें एक तरफ होंगे समाजवादी, वामपंथी या यूं कहिए कि धर्मनिरपेक्ष ताकतों का खेमा और दूसरी तरफ होंगे दक्षिणपंथी दल। तब शायद आया-राम, गया-राम और ब्लैक मेलिंग की राजनीति से भी देश को राहत मिल पाएगी।

इसके लिए यह बहुत जरूरी है कि सुश्री मायावती अपनी सोच में बदलाव करें। राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिए शुरू में सभी आक्रामक तेवर अपनाते हैं। बाद में धीरे-धीरे हालात उन्हें शांत कर देते हैं। सुश्री मायावती ने शुरू के दौर में कहा था, ’तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार।बाद में खुद ही ठाकुर, ब्राह्मण और बनियों को टिकट बांटे। अब उन्हें ये समझ लेना चाहिए कि काठ की हाड़ी रोज-रोज नहीं चढ़ा करती। जिस तेजी से वे सहयोगी दलों को झटका देती आई हैं उस तेजी से वे राजनीति में लंबे समय तक शायद कामयाब न हो पाएं। उन्हें कुछ स्थायी संबंध तो बनाने ही होंगे। ऐसा नहीं है कि दलितों के वोट सदा के लिए सुश्री मायावती के झोली में पड़े रहेंगे। सपने दिखा कर कुछ समय तक लोगों को मूर्ख बनाया जा सकता है- हमेशा नहीं। आज वे दलितों की निर्विवाद नेता हैं लेकिन जब दलित देखेंगे कि उनकी आर्थिक प्रगति में और बसपा के नेताओं की आर्थिक प्रगति में जमीन-आसमान का अंतर है तो उनमें असंतोष फैलेगा और फिर सुश्री मायावती का ही कोई दाहिना या बाॅया हाथ उनके विरूद्ध बगावत का झंडा लेकर खड़ा हो जाएगा और एक नई बसपा बना लेगा। तब उनमें न वो ऊर्जा रहेगी न वो तेवर और तब नए खून वाले दलितों का मोर्चा ले उड़ेंगे। पिछले बीस सालों में दलितों के जो नेता ऊभरे आज उनके जनाधार सिकुड़ कर बहुत सीमित हो गए हैं। इस बात का ध्यान सुश्री मायावती को हमेशा रखना चाहिए।

जहां तक दलितों का प्रश्न हैं इस विषय में भी नई सोच की जरूरत है। ये सही है कि देहातों में जातिवाद की जड़े अभी भी बहुत गहरी हैं और दलितों के साथ सहज, सामान्य व्यवहार नहीं किया जाता। लेकिन यह भी सही है कि नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के कारण कम से कम शहरों में तो काफी बदलाव आया है। अब अपने को ऊंची जाति का मानने वाले भी दलित अधिकारी के सामने नतमस्तक रहते हैं। पर इस प्रक्रिया में सामाजिक सद्भाव बढ़ने की बजाए वैमनस्य और द्वेष बढ़ रहा है। दलितों की बात करने वाले अब महात्मा गांधी और विनोवा भावे जैसे संत तो हैं नहीं। ज्यादातर लोग सत्ता लोलुप हैं और दलित वोट को भुनाना चाहते हैं इसलिए सामाजिक वैमनस्य बढ़े ये उनके हित में जाता है। सुश्री मायावती अगर दलितों की सच्ची हमदर्द हैं तो सत्ता से बाहर रहने का जो समय उन्हें मिला हैं उसका इस्तेमाल उन्हें दलित समाज को जागृत करने में करना चाहिए। भक्ति युग के अनेक ऐसे संत हुए हैं जिन्होंने दलित उत्थान के लिए ठोस काम किया। जैसे कबीर दास जी, श्री चैतन्य महाप्रभु, संत रैदास, गुरूनानक देव आदि इन संतों ने दलितों को शेष समाज के साथ जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। इनके द्वारा किए गए प्रचार कार्य में सामाजिक सौहार्द बढ़ा, वैमनस्य नहीं क्योंकि इनकी भावना लोक कल्याण की थी, जनता को मूर्ख बना कर कुर्सी हथियाने की नहीं।

पर आज दलितों के नेतृत्व करने वालों की न तो चेतना का विस्तार हुआ है न उन्हें आध्यात्मिक रूचि है। आग उगल कर लोगों की भावनाए भड़काना और उसे वोटों में बदल देना फिर सत्ता में बने रहने के लिए नौकरियां और खैरात के टुकड़े बांट देना ही दलित राजनीति का निचोड़ बन कर रह गया है। यह दुखःद स्थिति है। दलित समाज को इससे निकलने की जरूरत है। तभी दलितों के बच्चे भविष्य में शेष समाज के साथ सौहार्दपूर्ण जीवन जी पाएंगे। सत्ता में रहने वालों को कुछ नया और ठोस सोचने की फुर्सत ही नहीं मिलती पर सत्ता छीन जाने के बाद ऐसे शुभ कार्य करने के लिए काफी समय मिलता है। वैसे भी श्री मुलायम सिंह की सरकार अब जल्दी गिरने वाली नहीं है। इसलिए सुश्री मायावती के आगे तीन विकल्प हैं या तो आराम से बैठें और सैर-सपाटें करें जो उनकी उम्र का कोई राजनेता कभी करना नहीं चाहेगा। दूसरा विकल्प है कि दलितांे की बैठकों में जाकर श्री मुलायम सिंह के खिलाफ जहर उगलें और तीसरा विकल्प हैं कि कुछ दिन के लिए उठापठक की राजनीति से बच कर वैचारिक स्तर पर कुछ ठोस करें जिससे दलित समाज के प्रति एक दीर्घकालिक उपलब्धि प्रस्तुत कर सकें। ऐसे ही लोग इतिहास के पन्नों में अपनी जगह आरक्षित कराते हैं। सत्ता में आने और जाने का क्रम तो चलता रहता है पर समाज को हम क्या दे कर जाते हैं, समाज उसे ही याद रखता है। सुश्री मायावती को आत्ममंथन की आवश्यकता है। उन्हें दुविधा छोड़ कर दलितों के लिए रचनात्मक और ठोस करना होगा और राजनीति को समझने का अपना नजरिया व्यवहारिक बनाना होगा।