Friday, February 9, 2001

आपद प्रबंधन प्रधानमंत्री की कागजी घोषणाएं


गुजरात के भूकंप की भयावहता व जान व माल की भारी हानि से आतंकित सरकार और अधिकारी एक बार फिर देश को सुहाने सपने दिखाकर गुमराह करने में जुटे हैं। दिल्ली जैसे दूसरे महानगरों में रहने वालों को  आश्वस्त किया जा रहा है कि उन्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है, सरकार और उसकी एजेंसियां यह सुनिश्चित करेंगी कि इन नगरों के भवन भूकंप से निपटने में कितने सक्षम हैं ? पर पिछले बीस साल का सरकारी इतिहास इस बात का गवाह है कि सरकार ने आपद स्थिति से निपटने के प्रबंधन के नाम पर केवल झूठे वायदे और नाटक किए हैं। यह कितने दुख की बात है कि जापान में कोबे नगर में 7.2 रिचर स्केल की तीव्रता के भूकंप के बावजूद केवल 5000 लोग मरे थे जबकि गुजरात में 6.9 रिचर स्केल की तीव्रता के भूकंप में मरने वालों की संख्या एक लाख के करीब बताई जा रही है। ऐसा जनसंख्या दबाव, खराब भवन निर्माण व राहत में समन्वय की कमी के कारण हुआ। पर फिर भी हम अपनी गलतियों से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं हैं। हमारे नौकरशाह जानते सब हैं पर उसे लागू करने में केंचुए की गति से चलते हैं। क्या भारत नहीं जानता कि 1997 में डा. ए.एस. आर्या को संयुक्त राष्ट्र का प्रतिष्ठित पुरस्कार डीएचए ससकोवा एवार्ड दिया गया था क्योंकि उन्होंने स्कूलों को भूचाल से सुरक्षित रखने के उपायइस पुस्तक में सुझाए थे। पर उनके सुझावों की उपेक्षा कर दी गई। आज से बीस वर्ष पहले 1980 में ज्वाइंट असिस्टेंस सेंटर ने ए गाइड टू रिलिफ वकर््र्सनाम से एक पुस्तक तैयार की थी ताकि आपदा के समय राहतकर्मी सलीके से काम कर सकें। पर तत्कालीन केंद्रीय राहत आयुक्त श्री आर.एन मुखर्जी ने तीन महीने तक किताब रख कर बिना कुछ किए सेंटर को लौटा दिया। हमारी नौकरशाही 1980 से 90 के दशक तक इसी तरह उदासीनता बरतती रही।

1977 के आंध्र प्रदेश के समुद्री तूफान के बाद केंद्र सरकार ने एक डिस्ट्रेस मिटिगेशन कमेटीकी स्थापना की थी। विज्ञान व तकनीकी मंत्रालय के अधीन इसे काम करना था। पर कुछ नहीं हुआ। 1980 में शहरी विकास मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय भवन संगठन (एनबीओ) के अधीन एक टास्क फोर्सका भी गठन किया गया। ऐसी ही तमाम और भी समितियां और प्रयास कागजों पर किए जाते रहे। जिनकी रिपोर्ट धूल खा रहीं हैं। जबकि आए दिन देश किसी न किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार होता रहता है।

भारत सरकार व स्वयंसेवी संगठनों के समन्वय के लिए भी एक समिति बहुत समय से बनी हुई है। पर इसे कभी सक्रिय नहीं किया गया, इस भूचाल में भी। यह समिति भी नौकरशाही की शिकार हो गई है, जो नौकशाही अपनी गलतियों से सबक सीखने को तैयार नहीं है। 1995 में भारी मशक्कत के बाद केयर इंडियाने सरकार को विस्तृत अध्ययन के बाद एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें बाढ़, तूफान या भूचाल जैसी आपातस्थिति में तैयार रहने के लिए प्रशिक्षण का तरीका सुझाया गया था। इस सार्थक रिपोर्ट पर चर्चा करने के लिए पहली बैठक बुलाने में ही संबंधित नौकरशाहों ने एक वर्ष गंवा दिया। फिर भी जो फैसले लिए गए उन पर आज तक अमल नहीं किया गया।

यह दुख की बात है कि भारत सरकार प्रशिक्षण व शिक्षा को प्राथमिकता की सूची मे काफी नीचे रखती है। 1980 के दशक में योजना आयोग ने आपातस्थिति में राहत के लिए स्वयं सेवी संस्थाओं की भूमिका के महत्व को स्वीकार किया था। उसी दौरान विश्व युवक केंद्र, दिल्ली में जेएसीने एक सेमिनार करके आपद प्रबंधन के विभिन्न आयामों पर रोशनी डाली थी। ऐसे ही संस्थान की प्रयासों के बाद योजना आयोग ने छठी पंचवर्षीय योजना में आपद प्रबंधन संस्थान की स्थापना के लिए 15 करोड़ रूपए का प्रावधान रखा था। इस संस्थान की स्थापना की तैयार के दिशा में काफी काम किया गया। 1986 में इस संबंध में एक नोट कैबिनेट कमेटी को भेजा गया। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस पर विचार तो किया पर कोई फैसला नहीं लिया। जबकि 1986 में बंग्लौर में इस संस्थान की स्थापना की घोषणा भी कर दी गई थी, पर कुछ नहीं हुआ। इसकी स्थापना सातवीं योजना में करने की बात कह कर टाल दी गई। बाद में तो इसके लिए योजना में प्रावधान ही नहीं छोड़ा गया। मानो आपद प्रबंधन की इस देश को जरूरत ही न हो। फिर अचानक क्या हुआ कि मार्च 1994 में नौकशाही ने भारतीय जनप्रबंधन संस्थानदिल्ली के झंडे तले एक सेंटर फार डिजास्टर मैंनेजमेंटखोल दिया। मजाक देखिए कि अफसरों को प्रशासनिक प्रशिक्षण देने वाले संस्थान में ही आपद प्रबंधन जैसे अतिविशिष्ट क्षेत्र के प्रशिक्षण का इंतजाम कर दिया गया। यह सब खानापूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं था। भोपाल गैस कांड के बाद भी दो वर्ष के भीतर दस करोड़ रूपए की लागत से एक संस्थान खोलने की बात की गई थी जिसे बाद में राज्य अकादमी का हिस्सा बना कर ठंडा कर दिया गया। ये नए केंद्र स्वयंसेवी संगठनों से जानकारी लेकर अपना काम चलाते रहे हैं फिर भी सरकार इस विशिष्ट क्षेत्र में अनुभवी लोगों की मदद लेने से हिचक रही है।
उत्तर काशी का भूचाल हो या बिहार की बाढ़, राजस्थान का सूखा हो या उड़ीसा का समुद्री तूफान बार-बार लगातार सरकार को आपद प्रबंधन के जरूरी कदम उठाने की मांग करने वाले शोध पत्र, रिपोर्ट व प्रस्ताव दिए जाते रहे हैं। पर अपने को तीसमारखां समझने वाली नौकशाही ने एक न चलने दी। आज राहत के नाम पर गुजरात में जो अफरा-तफरी मची है उसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार वे नौकरशाह हैं जिन्होंने पिछले बीस वर्ष में ऐसे सभी प्रयासों के रास्ते में रोड़े अटकाने का काम किया है। इसलिए आपद प्रबंधन के लिए प्रधानमंत्री ने जो हाल ही में स्पेशल सेलगठित की है उससे बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती। क्योंकि यह सेल भी भारत सरकार की परंपरा अनुरूप नाटकीय घोषणाएं करके और तात्कालिक तत्परता दिखा कर जल्दी ही ठंडी पड़ जाएगी। तब तक कोई हरकत नहीं होगी जब तक कोई दूसरी विपदा न आन पड़े।

11वंे वित्त आयोग ने एक नेशनल सेंटर फार केलेमिटी मैंनेजमेंटकी सिफारिश की है और यह भी कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय को हर साल 31 दिसंबर तक प्राकृतिक विपदाओं पर सालाना रिपोर्ट तैयार करके जनता के बीच जारी करनी चाहिए। वित्त आयोग की ये सिफारिशें जुलाई 2000 में संसदीय के सामने पेश की गई थीं। क्या नौकरशाही बताएगी कि उसने इस दिशा में आज तक क्या किया ? होना तो यह चाहिए था कि रेलवे बोर्ड की तरह आपद प्रबंधन के विशेषज्ञों का एक राष्ट्रीय संगठन या बोर्ड गठित कर दिया जाता जिसे इस दिशा में काम करने की छूट, अधिकार व साधन मुहैया करा दिए जाते। पर भारत की निखट्ठू नौकरशाही ऐसा कभी नहीं होने देगी। दरअसल, पर्दे के पीछे सक्रिय रह कर, राजनेताओं की आलोचना करवाने में माहिर नौकरशाही, इस देश में काहिली, बदहाली और बदइंतजामी के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है। जब तक आम लोग, पत्रकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता व बुद्धिजीवी नौकरशाही को उसका फर्ज याद दिलाने के लिए ललकारेंगे नहीं, ये जमात देश में कुछ नहीं होने देगी। पिछले दस वर्षों में सरकार ने आपद प्रबंधन के बारे में जनजागृति पैदा करने के लिए दस करोड़ रूपया तो केवल अखबारों में विज्ञापन पर ही खर्च कर दिया है। पर जब गुजरात जैसी आपदा आती है तब सरकार के इन चोचलों की कलई खुलती है। 1944 में संयुक्त राष्ट्र ने आपद प्रबंधन पर एक विश्व सम्मेलन किया था। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने 1990 में इस विषय पर सेमिनार किया था। महाराष्ट्र सरकार ने 1980 में इस संबंध में कदम उठाने की घोषणा की थी। पर 1993 के लाटूर के भूकंप में सब कागजी सिर्फ हुआ। दिल्ली के उप राज्यपाल ने दिल्ली के लिए एक ऐसा मास्टर प्लान बनाने की घोषणा की थी जो सिद्ध कागजों पर रही। कर्नाटक ने भी अपने हर जिले के लिए आपद प्रबंधन योजना तैयार कने की घोषणा की थी, उसका क्या हुआ, नहीं पता ?

इसलिए यह बात निसंकोच कही जा सकती है कि आपद प्रबंधन के नाम पर प्रधानमंत्री ने जो कुछ घोषणाएं की हैं उनसे धरातल पर कुछ होने नहीं जा रहा है। देश के करोड़ों लोगों की जिंदगी पर मंडराने वाले अप्रत्याशित खतरे को देखते हुए इस गंभीर मुद्दे पर एक राष्ट्र व्यापी बहस की जरूरत है। जिसके बाद एक राष्ट्रीय नीति की घोषणा की जाए और आपद प्रबंधन के काम को एक अलग मंत्रालय या राष्ट्रीय बोर्ड बना कर युद्ध स्तर पर खड़ा किया जाए। इसका काम सरकार और निजी क्षेत्र के बीच समन्वय स्थापित कर आपद प्रबंधन की समुचित व्यवस्था करना हो। इसमें नौकरशाही का दखल जितना कम होगा उतने ही सार्थक नतीजे सामने आएंगे। संसद का अधिवेशन 19 फरवरी को शुरू होने जा रहा है। हर संसदीय क्षेत्र के नागरिकों को अपने सांसद पर यह दबाव डालना चाहिए कि वे आगामी सत्र में पारस्परिक दोषारोपणों से ऊपर उठकर इस मुद्दे पर गंभीर चिंतन करें ताकि इस दिशा में वांछित कदम उठाने की  जमीन तैयार हो सके।

Friday, February 2, 2001

गुजरात के भूचाल से सबक


किसी भी प्राकृतिक विपदा पर इंसान का बस नहीं है। इन आपदाओं को ना तो हम नियंत्रित कर सकते हैं और ना ही किसी को दोष दिया जा सकता है। हां विज्ञान और तकनीक का प्रयोग करके कई बार थोड़ा बहुत पूर्वानुमान कई विकसित देशों में लगा लिया जाता है। इससे जान व माल दोनों की सुरक्षा करने में आसानी हो जाती है। हालांकि भारत को बाढ़, भूकंप, तूफान, सूखा जैसी प्राकृतिक विपदाओं का सामना लगभग हर वर्ष ही करना पड़ता है फिर भी राहत कार्य नियोजित ढंग से नहीं हो पाते। ऐसी आपात स्थिति पैदा होते ही अफरा-तफरी सी मच जाती है। जैसा आज गुजरात में हो रहा है या पहले उड़ीसा में आए समुद्री तूफान के बाद हुआ था।

यूं तो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, गृहमंत्री आदि भूचाल के आने के बाद से ही लगातार सक्रिय हैं और राहत कार्यों को अपनी निगरानी में करवा रहे हैं। सेना के जवान और अफसर रातदिन जुट कर राहत कार्य पूरा करने में लगे हैं। उधर गुजरात के आम नागरिक भारी तादाद में राहत कार्य में हाथ बंटाने सड़कों पर उतर आए हैं। विदेशों से भी मदद पहुंचनी शुरू हो गई है फिर भी यह जरूरत से बहुत कम है। इतने बड़े क्षेत्र में इतने सारे भवन अगर अचानक भूचाल से ध्वस्त हो जाएं तो कोई भी सरकारी मशीनरी एकदम राहत नहीं पहुंचा सकती। इसलिए तीन दिन बाद तक भी हजारों लोग जिंदा या मुर्दा मलबे के नीचे दबे रहे। अस्पतालों में डाक्टरी सेवाओं की भारी कमी महससू की जाती रही। जो डाक्टर वहां मौजूद है वे रातदिन घायलांे की तीमारदारी में जुटे हैं। पर अब वे भी थकने लगे हैं। श्मशानघाटों में चिता के लिए लाइनें लगी हैं। अपने प्रियजनों को कई-कई  के ढेर में भी जलाने को लोग मजबूर हुए। पीने के पानी की भारी किल्लत भी महससू की गई। यह सारी स्थिति भयावह तो है ही पर कुछ सोचने पर मजबूर करती है। एक तरफ तो हम सूचना क्रांति और आईटी जैसे न जाने कितने लंबे-चैड़े दावे करते हैं और दूसरी तरफ आपात स्थिति में फंसते ही हमारे हाथ-पांव फूल जाते हैं। डिजास्टर मैनेजमेंटया आपदा प्रबंधन एक विशिष्ट क्षेत्र है जिसकी तरफ हमारे देश में कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। इस क्षेत्र के विशेषज्ञ पिछले 25-30 वर्षो से सरकार के पीछे पड़े हैं कि भारत आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में गंभीरता से रूचि ले। इसलिए कि भारत पर प्राकृतिक आपदा की मार अक्सर पड़ती रहती है और इसलिए भी कि भारत में आज भी आधी आबादी अशिक्षित है व नितांत गरीबी में जी रही है। ऐसे में प्राकृतिक आपदा की मार उन पर और ज्यादा पड़ती है।

जिनके घर और कारोबार ही नहीं बच्चे और परिवारजन भी गुजरात के भूचाल की बलि चढ़ गए, वे करें तो क्या करें ? जाएं तो कहां जाएं ? कैसे करें नई जिंदगी की शुरूआत ? ऐसे तमाम सवाल उनके मन में हैं जिनके समाधन देने वाले लोग उनके ईर्द-गिर्द नहीं है। यह बड़ी दुख की बात है कि सौ करोड़ की आबादी वाले मुल्क में जहां चालीस करोड़ नौजवान हैं और उनमें भी ज्यादातार बेरोजगार, फिर क्यों ऐसी आपदा के समय हम इस नौजवान सेना की मदद नहीं ले पाते ? उत्तर साफ है कि आज तक इस युवा ऊर्जा को ठीक दिशा में प्रशिक्षित करने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया। न तो समाज की तरफ से न तो सरकार की तरफ से। जो थोड़े-बहुत सरकारी या निजी स्तर पर प्रयास हुए भी हैं, उनसे इतने बड़े देश के हर हिस्से की सेवा करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए यह और भी जरूरी है कि व्यापक स्तर पर आपात प्रबंधन के प्रशिक्षण की मुहिम चलाई जाए। मसलन, हर शहर में नौकरी या निजी प्रेक्टिस करने वाले डाक्टरों में से उन डाक्टरों की सूची तैयार की जा सकती है जो हर आपदा के समय अपनी सेवाएं देने को तैयार हैं। यदि ऐसा हुआ होता तो गुजरात का भूचाल आने के कुछ घंटों के भीतर ही देश के कोने-कोने से योग्य डाक्टरों को वायुयानों में बैठाकर गुजरात ले जाया जा सकता था। इसी तरह स्वयं सेवी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं का भी प्रशिक्षित करने की जरूरत है। ताकि विपदा के समय वे कुशलता से राहत कार्य को अंजाम दे सकें। अभी हाल में गुजरात में क्या हुआ ? स्वयंसेवी तो हजारों की तादाद में सड़कों पर राहत कार्य करने उतर आए पर किसी प्रशिक्षण के अभाव में वे घायलों की सही देखभाल नहीं कर पाए। ऐसे में उत्साह से ज्यादा जरूरत संगठन और प्रशिक्षण की जरूरत होती है। मलबों के ढेर से घायलों को खींचकर बाहर निकालने वाले प्रशिक्षण के अभाव में यह नहीं समझ सके कि उनके इस सद्प्रयास से उन घायलों को कितना कष्ट हो रहा था ? जिसका प्रमाण उनकी लगातार बढ़ती चीखें थी। अंदर फंसा व्यक्ति किसी अवस्था में है ? उसे कितनी चोट आई है ? उसकी आयु क्या है ? यह सब जाने बिना एक ही लाठी से सब भैंसे नहीं हाॅकी जा सकती। लोग यह देखकर आश्चर्य चकित रह गए कि विदेश से आई एक राहत टीम ने किस तरह खोजी कुत्तों का और सेंसर उपकरणों का प्रयोग करके यह बताना शुरू कर दिया कि किस मलवे के नीचे जिंदा लोग दबे पड़े हैं। क्या इस तरह कुत्तों को भारत में प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता ? अगर देश भर के अनुभवी लोग, विशेषज्ञ और युवा आपात प्रबंधन के मामले में एक राष्ट्रीय स्तर का नेटवर्क तैयार कर लें तो हर ऐसी प्राकृत विपदा से जूझने वालों की एक बड़ी फौज देश में हर समय उपलब्ध रहेगी और देश के किसी भी हिस्से में आपदा आने पर इस फौज के जवान तुरंत राहत कार्य करने पहुंच सकते हैं। 

इसके साथ ही कुछ बुनियादी सवाल भी खड़े हो गए हैं। सबसे अहम सवाल है कि भवन निर्माण में पूरी सावधानी का न बरता जाना। गढ़वाल के भूचाल के बाद कुछ वास्तुकारों ने वहां जाकर जब अध्ययन किया तो उन्हें इस बात पर भारी अचरज हुआ कि भूचाल में ध्वस्त होने वाले ज्यादातर भवन वे थे जिनका निर्माण पिछले बीस-तीस वर्षों में हुआ था और ये भवन आधुनिक तकनीकी से बने थे। जबकि गारे, पत्थर और लकड़ी के संयोग से बने पारंपरिक मकान यथावत खड़े रहे। अगर गिरे भी तो इस भयावह तरीके से नहीं कि जानोमाल की भारी तबाही हो। जबकि गुजरात में बनी आधुनिक बहुखंड़ी इमारतें ताश के घारों की तरह चरमरा कर गिर पड़ी। जाहिरन इनमें न सिर्फ सही मात्रा में लोहा व अन्य भवन निर्माण सामग्री लगाई गई थी और ना ही इनका बनाते वक्त भूचाल से निपटने के लिए समुचित सावधानियां बरती गई। जहां भूचाल की गति असामान्य रूप से तेज होती है वहां तो न अमीर का महल बचता है और न गरीब की झोपड़ी। पर जहां बचाव हो सकता था वहां भी नहीं हुआ, यह चिंता की बात है। जापान जैसे तमाम देश जो भूकंप के नियमित झटके झेलने के आदि हैं उन देशों ने भूचाल रोधी भवनों का निर्माण किया है। दिल्ली में हुए उपहार सिनेमा के अग्नि कांड से यह बात खुल कर सामने आई कि भवन निर्माता बिना पूरी सावधानी बर्ते ही स्थानीय प्रशासन से नोआबजेक्शनप्रमाण पत्र प्राप्त कर लेते हैं। जिसका खामियाजा भुगतना पड़ता है निरीह जनता को। गुजरात के इस भूचाल के साथ ही बड़े बांधों का विरोध करने वाले भी फिर सक्रिय हो गए हैं। वे यह आगाह कर देना चाहते हैं कि अगर समय रहते चेता नहीं गया तो कभी ये बड़े बांध भूचाल का शिकार होकर भारी तबाही मचाएंगे। इस सब जद्दोजहद के बीच फिलहाल गुजरात के लोगों को सिर्फ राहत की जरूरत है। जिसे अपनी क्षमतानुसार वहां पहुंचाना हम सबका राष्ट्रधर्म है।

Friday, January 26, 2001

मांसाहार खाने वालों सावधान !

किसी शादी की दावत या नए साल के दावत में अगर चिकन न हो तो यार दोस्त कहते हैं क्या घास-कूड़ा खिला दिया। औसत दर्जंे के लोग बटन चिकन, कढ़ाई चिकन, बोनलैस चिकन, चिकन कोफता, मुर्गा दो प्याजा या मटन की तमाम किस्में खाते हैं। वरना भुना मुर्गा लार टपका कर निगल जाते हैं। जो जरा ज्यादा फैशनेबल हैं उनको सुबह नाश्ते में सासेज, सलामी या बेकन खाने की आदत पड़ जाती है, लंच में चिकन, लैम्ब सूप या प्राॅन (समुद्री जानवर) वगैरह। डिनर में लाॅब्सटर, फिश या कोई और चीनी या समुद्री खाना।

भारत के सभी महानगरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों में यह देखकर आश्चर्य होता है कि किस ललचाई नजरों से लोग मांसाहार के लिए आतुर रहते हैं। जिनके पास साधन हैं वो यह सारी वस्तुएं आयातित मांस से पकाते हैं या पांच सितारा होटलों में ही खाते हैं। वरना क्नाॅट पैलेस में जैसा होटल ‘‘काके दी हट्टी’’ है वैसे ढाबे हर शहर और राजमार्ग पर बिखरे पड़े हैं जहां सलाखों में मुर्गों की मसाला लगी टांगे टंगी रहती हैं।

पर अब जरा दूसरी तरफ देखिए अगर आप देश के बहुत ही संपन्न लोगों की संगति में बैठे हों तो आप पाएंगे कि बहुत से बड़े लोग मांसाहार छोड़ते जा रहे हैं। और तो और अमरीका और यूरोप के देश जहां दस वर्ष पहले तक शाकाहार का नाम तक नहीं जानते थे। लेकिन आज काफी तादाद में मांसाहार पूरी तरह छोड़ चुके हैं। जानते हैं क्यांे ? पहली बात तो यह कि मानव शरीर शाकाहार के लिए बना है मांसाहार के लिए नहीं। यह बात हम अपनी तुलना शाकाहारी और मांसाहारी पशुओं से करने पर समझ सकते हैं। शेर, कुत्ता, घडि़याल व भेडि़या मांसाहारी हैं। गाय, बकरी, बंदर व खरगोश शाकाहारी हैं। मांसाहारी पशुओं को कुदरत ने दोनों जबड़ों में तेज नुकीले कीलनुमा दांत और खतरनाक पंजे दिए हैं। जिनसे ये शिकार करके उसमें से मांस नोच कर खा सकें। पर गाय और बंदर की ही तरह मानव को कुदरत ने ऐसे दांतों और पंजों से वंचित रखा है, क्यों ?

मांसाहारी पशु जैसे कुत्ता जीभ से पसीना टपकाता है। इसलिए हाॅफता रहता है। शाकाहारी पशुओं और मानव के बदन से पसीना टपकता है। मांसाहारी पशुओं की आंते काफी छोटी होती है ताकि मांस जल्दी ही पाखाने के रास्ते बाहर निकल जाए जबकि शाकाहारी जानवरों और मानव की आंते अनुपात में तीन गुनी बड़ी और ज्यादा घुमावदार होती है ताकि अन्न, फल, सब्जियों का रसा अच्छी तरह सोख ले। यदि आप मांसाहारी है तो आपने नोट किया होगा कि रेफ्रिजरेटर के निचले खाने में इतनी ठंडक होने के बावजूद मांस कुछ ही घंटों में सड़ने लगता है। फिर मानव शरीर की गर्मी में मांस के आंत में अटक-अटक चलने में इसकी क्या गति होती होगी, कभी सोचा आपने ? आपने कभी सड़क पर कुचला कुत्ता देखा है कितनी सी देर में उसमें से बदबू आने लगती है तो क्या हमारी आंत में पड़ा मांस तरो-ताजा बना रहता है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मांसाहारी पशुओं के आमाशय में जो तेजाब रिसता है वह शाकाहारी पशुओं और मानव के आमाशय में रिसने वाले तेजाब से बीस गुना ज्यादा तीखा होता है, ताकि मांस जल्दी गला सके। ऐसे तेजाब के अभाव में हमारे आमाशय में पड़े मांस की क्या हालत होती होेगी ?

भारत जैसे देश में, बहुसंख्यक आबादी किसी न किसी रोग से ग्रस्त है। हमारे शरीर में तरह-तरह की बीमारियां पल रही हैं, तो जो जानवर काटे जा रहे हैं उनके वातावरण, भोजन और रख-रखाव में जो नर्क से बदतर जिंदगी होती है, उससे कैसा मांस आप तक पहुंचता है ? फिर आप तो जानते हैं कि भारत में कितना भ्रष्टाचार है। जिन भी इंस्पेक्टरों की ड्यूटी कसाईखानों में लगी होती है उनसे क्या आप राजा हरिशचन्द्र होने की उम्मीद कर सकते हैं ? या वक्त के साथ-साथ चलने वाला होशियार आदमी। मतलब ये हुआ जो हाकिम यह देखने के लिए तैनात किए जाते हैं कि भयानक बीमारियों से घिरे हुए घायल या गंदे पशु मांस के लिए न काटे जाएं वो निरीक्षक ही अगर आंख बंद किए हुए हों तो आपकी क्या हालत हो रही है, आपको क्या पता ?

कई बरस पहले मैं एक अखबार में संवाददाता था तो दिल्ली के पांच सितारा होटल में पोषण विशेषज्ञों के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन को कवर करने गया। वहां दोपहर के भोजन के समय शोर मच गया। दुनिया भर से आए पोषण विशेषज्ञ डाक्टरों ने कहा कि ंलंच में जो मुर्गे परोसे गए वे सड़े हुए हैं। होटल के महाप्रबंधक तक खबर पहुंची। फौरन दौड़े-दोड़े बैंक्वट हाॅल में आए। आयोजकों से माफी मांगी। सरकारी नौकरी चले जाने का हवाला देकर खुशामद की । समझौता हुआ कि लंच का जो बीस-तीस हजार रूपया का बिल बना था वो माफ हो जाएगा। तभी होटल वालों को पता चला कि वहां डाक्टरों की भीड़ में एक संवाददाता भी मौजूद था। घबड़ाए हुए मेरे पास आए और गिड़गिड़ा कर कहने लगे कि ये खबर मत छापिएगा। लालच देने लगे कि आपके शादी में पचास फीसदी बिल माफ कर देंगे। मैं काफी कम उम्र का दिखता था। मैंने कहा मेरी शादी हो चुकी है तो बोले अपने बच्चों का जन्मदिन पार्टी कराइएगा, हम बहुत कम पैसे में करवा देंगे। खैर मैं वहां से चला आया। जम कर तहकीकात की। पता चला कि आमतौर पर कमीशन के चक्कर में सबसे सड़े, बासी और बेकार मुर्गे वहां और कई बड़े होटले में खरीदे जाते हैं। अगले दिन मैंने खबर छाप दी। पोषण विशेषज्ञों को अशोका होटल वालों ने सड़े मुर्गे परोसे।यह पांच सितारा होटल की कहानी है तो बाकी की बात आप खुद ही समझ लीजिए।

अक्सर तर्क दिया जाता है कि लोग मांसाहार नहीं करेंगे तो दुनिया में खाने की कमी पड़ जाएगी। पर क्या कभी सोचा आपने कि व्हेल मछली, हाथी, ऊॅट व जिराफ से बड़े कोई जानवर हैं? ये कभी भूखे पेट नहीं सोते।

अमरीका के अर्थशास्त्रियों ने आंकड़ों से सिद्ध कर दिया है कि एक बकरा कटने से पहले जितना अन्न व सब्जी खाता है उससे एक परिवार का महीने भर का भोजन पूरा हो सकता है। जबकि काटने के बाद एक बकरे को एक परिवार दो-तीन वक्त में खा-पीकर निपटा लेता है। दुनिया भर में मांसाहारियों के लिए जानवरों को खिला-पिला कर मोटा किया जाता है और फिर काट दिया जाता है। यह तो आपको पता ही होगा कि विकसित देशों में गेंहू, सब्जियां, मक्खन, पनीर, पानी के जहाजों में भर कर दूर समुद्र में फेंका जाता है ताकि दुनिया में इनके दाम नीचे न गिरें। कहावत है कि दुनिया में सबके लिए काफी अन्न है पर लालचियों के लिए फिर भी कम है।

अब आते हैं शुद्ध विज्ञान पर। विज्ञान में एक सिद्धांत है कि हर क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। एवेरी एक्शन हैज इक्वल एंड अपोजित रिएक्शन। याद रखिए एक्शनयानी हर क्रिया की, तो पशु बद्ध करने की भी समान और विपरीत प्रतिक्रिया होगी। सनातन धर्म के शास्त्रों में लिखा है कि जीव हत्या करने वाले को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। शिकागो दुनियां की सबसे बड़ी मांस की कटाई और बिक्री वाला शहर है और दुनिया में सबसे ज्यादा मानव हत्याएंचाकूबाजी और बलात्कार की वारदातें भी वहीं होते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण गीता का उपदेश देते हुए अर्जुन से कहते हैं-

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपह्तमश्नाति प्रयतात्मनः।।

नौवें अध्याय के इस 26वें श्लोक में भगवान् अपने शुद्ध भक्त और सखा अर्जुन से ये कहते हैं कि यदि कोई प्रेम तथा भक्ति से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल प्रदान करता है तो मैं उसे स्वीकार करता हूं। याद रखिए भगवान् अन्न, फल ही स्वीकार करते हैं। पर आपको ऐसे तमाम लोग मिलेंगे जो कृष्ण, महावीर की अराधना का दावा करेंगे और जम कर मांसाहार करेंगे। यह जानते हुए भी कि हिंदु शास्त्रों में इसके भयंकर परिणाम बताए गए हैं।

ईसाई-धर्म की पवित्र-पुस्तक बाईबिल में ईसामसीह जीवों पर करूणा करने का आदेश देते हैं और मांसाहार को मना करते हैं। हर धर्म में दूसरे को कष्ट पहुंचाना पाप कर्म बताया गया है। तो जिस जीव को भोजन के लिए काटा जाए उसे क्या चाकू की धार गर्दन पर चलवाने में आनंद आता होगा ? फिर मांस का उत्पादन कितना महंगा है उसका एक उदाहरण है कि एक किलो मांस बनकर तैयार होने में कुदरत का पचास हजार लीटर पानी खर्च होता है और एक किलो गेंहू कुल आठ लीटर पानी में ही उपज जाता है।

अमेरिकन मैडिकल एसोसिएशन के जर्नल ने यह छापा था कि अमरीका में दिल के दौरों से ग्रस्त होने वालों में 97 फीसदी मांसाहारी हैं। यानी शाकाहारी लोगों को दिल की बीमारी काफी कम होने की संभावना है। एक और मशहूर वैज्ञानिक शेलों रसेल ने 25 देशों के अध्ययन के बाद बताया कि इनमें से 19 देशों में कैंसर की मात्रा बहुत ज्यादा थी। यह सभी देश वो हैं जिनमें मांसाहार का प्रतिशत काफी ऊंचा है। एक भ्रांति है कि मांसाहार से ज्यादा ताकत मिलती है। हकीकत यह है कि मांस आधारित भोजन को पचाने में शरीर की बहुत ऊर्जा बेकार चली जाती है।

गुरू ग्रंथ साहिब में सच्चे गुरू श्री नानक देव कहते हैं कि यदि किसी घायल लाश के खून का छींटा तुम्हारे कपड़ों पर पड़ जाता है तो तुम कपड़ा बदल लेते हो। पर जब लाश को अपने शरीर के अंदर ले जाते हो तो तुम्हारा शरीर कितना गंदा हो जाता है, कभी सोचा सिंह साहब ?

Friday, January 19, 2001

क्यों न राजनैतिक दलों के नाम बदल दें !

लोकशक्ति पार्टी नाम से एक और राजनैतिक दल का जन्म हो गया। केंद्रीय संचार मंत्री श्री रामविलास पासवान इसके संस्थापक प्रणेता हैं। उनका दावा है कि उनका नया दल गरीबों के हक के लिए लड़ाई लड़ेगा। श्री पासवान सभी पत्रकारों के मित्र हैं इसलिए उन्हें पत्रकारों की चुटकी झेलने की आदत है। पर असलियत यह है कि अब रोजाना इतने नए दल बनने लगे हैं कि जनता में किसी भी दल के प्रति उत्साह पैदा नहीं होता। किसी भी दल के नेता के आश्वासनों पर जनता को विश्वास नहीं होता। वेैसे भी आज दलों की स्थिति है क्या ? कौन सा दल ऐसा है जो इस बात का दावा कर सकता है कि उनके दल में पूरी तरह लोकतंत्र है। जवाब होगा कोई दल ऐसा नहीं है। प्रायः हर दल में विभिन्न स्तरों पर पदों के लिए चुनाव नहीं बल्कि मनोनयन होता है। जिसको चुनाव की रस्म अदायगी करके पूरा कर दिया जाता है। पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में एक पोस्टर लगा कि इंका नेता श्रीमती सोनिया गांधी को दिल्ली प्रदेश इंका अध्यक्ष पद के लिए श्री सुभाष चैपड़ा के चुने जाने के लिए बधाई ! पोस्टर छापने वाला भ्रमित था। कहना तो वह यह चाहता था कि सुभाष चैपड़ा को अध्यक्ष चुने जाने पर बधाई पर साथ ही उसे पता था कि यह चुनाव नहीं श्रीमती गांधी द्वारा किया गया

मनोनयन है इसीलिए उसके पोस्टर की भाषा में मनोनयन और चुनाव दोनों के बीच दुविधा की भाषा झलकती है। प्रायः हर दल का नेता यह अपेक्षा करता है कि उसके दल के लोगों की पूरी निष्ठा केवल उसी नेता के प्रति हो, उसी दल के किसी अन्य नेता के प्रति नहीं। इसीलिए आए दिन सुनते रहते हैं कि फलां नेता वाजपेयी खेमे का है तो फलां नेता आडवाणी खेमे का। फलां नेता अर्जुन सिंह खेमे का है तो फलां नेता वीसी शुक्ला खेमे का। कोई नेता किसी गुट का तो कोई किसी गुट का। हर गुट का नेता अपने बाकी साथियों के सिर पर पैर रखकर अपने लिए राजनैतिक पद का जुगाड़ करता है। इसीलिए आए दिन एक ही दल के विभिन्न नेताओं के बीच सिर फूटते रहते हैं, उनके अह्म टकराते रहते हैं। बात बात पर नए राजनैतिक दल खड़े हो जाते है। हर नया दल खुद को दूसरे से ज्यादा जुझारू बता कर आम जनता को मीठे सपने दिखाता है। इस तरह चुनावों में और उसके बाद जुगाड़ करके सत्ता में शामिल होने का जुगाड़ करता है। सत्ता में पहुंचने के लिए और उसके बाद उसके मन में विचारधारा को लेकर कोई दुविधा नहीं होती। सत्ता हथियाने के लिए हर तरह के नापाक गठबंधन किए जाते हंै। आए दिन इन नए दलों के नेताओं के खिलाफ विद्रोह होते हैं, वे टूटते हैं और फिर नए दलों का गठन होता है। इतने सारे नेता हैं और इतने सारे दल हैं कि देशवासियों को यह याद करना भी संभव नहीं होता कि प्रमुख दलों के नाम क्या है और उन दलों के नेता कौन है ?

इतना ही नहीं लोकतंत्र की रक्षा की मांग करने वाले ये तमाम नेता नहीं चाहते कि इनके कार्यकर्ताओं की अपनी अलग पहचान बने। ये नेता ऐसे कार्यकर्ताओं को दल में पनपने नहीं देते जिनमें नेतृत्व की क्षमता होती है। दलों के भीतर चुनाव का नाटक करने बाद भी ऐसा कैसे होता है कि सारे सदस्य अपने नेता के भाई बेटा या बेटी को ही नया नेता चुन लेते हैं ? इस किस्म का एक महत्वपूर्ण चुनाव 31 दिसंवर 1984 को किया गया जब श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बेटे और राजनीति में नौसिखिए श्री राजीव गांधी को बिना दिल्ली पहुंचे ही दल का नेता चुन लिया गया। इतना ही नहीं उन्हें बिना सांसद हुए संसदीय दल का नेता भी चुन लिया गया और इस तरह हवाई अड्डे से सीधे राष्ट्रपति भवन ले जाकर उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवा दी गई। 1967 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ था और वरिष्ठ कांग्रेसी श्री कामराज व श्री मोरारजी देसाई आदि ने कांग्रेस सिंडिकेट बनाई थी तब श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नाम के आगे इंदिरा जुड़ गया था। शायद दल की जगह व्यक्ति को महत्व देने की यहीं से शुरूआत हुई। सिख धर्म की सेवा के लिए बने अकाली दल का भी नाम अब गुरू गोविन्द सिंह के नाम पर नहीं बल्कि प्रकाश सिंह बादल और सिमरनजीत सिंह मान के नाम पर अकाली दल (बादल) और अकाली दल (मान) है।

चुनाव आयोग के पास आज सैकड़ों दलों के नाम पंजीकृत हैं। ज्यादातर दल केवल कागजों पर ही हैं। पर सक्रिय दलों की भी कमी नहीं। समाजवादी के नाम पर ही कितने दल हैं। श्री मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, श्री चन्द्रशेखर का समाजवादी दल (राष्ट्रीय) व तमाम और। हकीकत यह है कि कोई भी दल न तो किसी विचारधारा के प्रति समर्पित है और न किसी विचारधारा का विरोधी है। जब जिसे जैसी सुविधा होती है वैसा गठबंधन कर लेता है और सत्ता का सुख भोगता है। राजग में ही आज वे तमाम दल हैं जो कल तक मंचों पर एकदूसरे को जम कर कोसते थे। दरअसल विचारधारा का मुखौटा पहनने के दिन अब लद गए। हर दल बेनकाब हो चुका है जनता जानती है कि जो कहा जा रहा है वह सच नहीं है। फिर भी इतने सारे दल हैं कि उनके नामों को याद रखना भी मुश्किल होता है। इस समस्या का एक सरल समाधान हो सकता है वह यह कि नए दलों के नाम भाषा या विचारधारा के शब्दकोशों में ढूंढ़ने के बजाए उन्हें दल के संस्थापक व नेता के नाम पर ही रख दिया जाए। जैसे, श्री रामविलास पासवान पार्टी, श्री चन्द्रशेखर पार्टी, श्री सुब्रमणयम स्वामी पार्टी, श्रीमती सोनिया गांधी पार्टी, श्री लालू यादव पार्टी, सुश्री जयललिता पार्टी, श्री शरद पंवार पार्टी, श्री ओम प्रकाश चैटाला पार्टी व श्री कांशी राम पार्टी। हंसिए मत यह मजाक नहीं है अगर ऐसा हो जाए तो न सिर्फ राजनैतिक कार्यकर्ताओं को सुविधा हो जाएगी बल्कि पत्रकारों को भी भारी राहत मिलेगी। क्योंकि उन्हें खबर लिखते वक्त यह आश्वस्त होने की चिंता नहीं रहेगी कि जिस दल का वह नाम लिख रहे हैं वह सही है या नहीं।

आज आमतौर पर राजनैतिक कार्यकर्ता किसी दल में देश की सेवा करने तो आते नहीं। आते हैं तो राजनीति को निजी लाभ का जरिया बनाने। इसलिए जिसका पलड़ा भारी दिखता है उधर ही दौड़ पड़ते हैं। हमारे पुराने मित्र श्री संजय सिंह राजनीति में आए इंका की मार्फत। जब श्री वीपी सिंह का पलड़ा भारी हुआ तो भाग कर उनके साथ चले गए। साल भर में जब श्री वीपी सिंह की सरकार गिरने लगी तो वे चन्द्रशेखर के दल के नेता हो गए। बाद में जब राम लहर बही तो भाजपा में आ गए। ऐसे ही तमाम दूसरे लोग भी हैं। यदि दलों के नाम व्यक्ति आधारित हों जाए तो ऐसे सभी राजनेताओं को और कार्यकर्ताओं को बड़ी सुविधा होगी। फिर इंका के सदस्य यह नहीं कहेंगे कि हम अपनी पार्टी के नेता से नाराज हैं और इसलिए तिवारी कांग्रेस में जा रहे हैं। फिर वे कहेंगे कि हम नरसिंह राव पार्टी से नाराज हैं इसलिए नारायणदत्त तिवारी पार्टी में जा रहे हैं। जरा सोचिए सबके लिए कितना सुलभ होगा दलों का नाम याद रखना ? हर नेता के नाम पर एक अलग पार्टी होगी जिसका घोषणा पत्र कहेगा, ‘हम इस दल के संस्थापक श्री क,ख,ग के विचारों के प्रति आस्था रखते हैं। इसलिए उनके श्रीचरणों में अपना राजनैतिक जीवन समर्पित करते हैं। हम शपथ लेते हैं कि हम पूरी निष्ठा ओर स्वामिभक्ति से अपने दल के नेता श्री क,ख, ग के आदेशों का पालन करंेगे। उनके स्वार्थ और अह्म के रास्तों में रोड़ा नहीं बनेंगे। उनके बेटी, बेटों, भतीजों और दामादों की सेवा उन्हें युवराज मानकर पूरी निष्ठा से करेंगे और उन्हें भी अपने सम्मानीय नेता का दर्जा देंगे।’ ऐसे घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद ही कोई राजनैतिक कार्यकर्ता किसी दल में शामिल हो पाएगा। यह बात दूसरी है कि जब उसे लगेगा कि उसके दल के नेता श्री क,ख,ग उसकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। यानी उसे उसकी अपेक्षा अनुरूप आर्थिक लाभ या सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिली तो उसे टिका पाना मुश्किल होगा। ऐसी स्थिति में यह कार्यकर्ता इस बात के लिए स्वतंत्र होगा कि वह श्री क,ख,ग के प्रति समर्पित अपनी स्वामिभक्ति को वापिस लेकर श्री अ,ब,स के चरणों में समर्पित कर दे, जैसा आज भी हो रहा है। इसी तरह जब श्री क,ख,ग के दाहिने हाथ श्री य,र,ल को लगेगा कि उसका नेता उसके साथ ना-इंसाफी कर रहा है तो वह भी झट से य,र,ल नाम से एक नए दल का गठन कर लेगा। अभी हाल ही में समता पार्टी में जोे कुछ हुआ वह ऐसी संभावनाओं की ताजा मिसाल है। इस व्यवस्था में किसी को कोई समस्या नहीं आएगी। जो लोग राम मंदिर बनाने की वायदा करके भाजपा में आए थे उन्हें फिर यह दिक्कत नहीं आएगी कि लोग उनसे पूछे कि सरकार में तो आप आ गए अब मंदिर का क्या होगा ?ऐसा कार्यकर्ता तपाक से कहेगा कि हमें मंदिर से क्या देना-देना हमने तो अपने नेता के प्रति समर्पण किया था और आज भी हम अपने नेता का ही राग अलप रहे हैं, मंदिर जाए भाड़ में। इस तरह एक नई परंपरा की शुरूआत होगी। कालवश जब उस राजनेता का निधन होगा तो दल का नाम पुनः बदल कर युवराज बेटे या बेटी के नाम पर रख दिया जाएगा। इस तरह भारत के लोकतंत्र में एक नया अध्याय जुड़ जाएगा। लोगों को भी किसी राजनैतिक कार्यकर्ता से कोई उम्मीद न रहेगी और दल के संस्थापक और नेता को भी अपनी गद्दी खिसकने की चिंता नहीं रहेगी क्योंकि वह आश्वस्त होगा कि उसका दल उसकी निजी जागीर है और कोई भी सदस्य उसके निर्देशन के बिना काम कर ही नहीं सकता। वैसे हो तो आज भी यही रहा है पर पर्दे की ओट में

Friday, January 12, 2001

जुझारू पत्रकारों की कमर तोड दी जाती है पंजाब में

मुल्क के गलत निजाम और बिगड़े हालात के विरूद्ध जाने तथा इन्हें बदलने की कोशिश करने का साहस बहुत ही कम व्यक्तियों मे होता है। आजादी से पहले ऐसे हिम्मतवाले कारनामें करने वालों को विद्रोही करार दिया जाता था और पत्रकार भी विद्रोही की श्रेणी में ही आते थे। अंग्रेज जानते थे कि विद्रोही उनके लिए अत्यंत खतरनाक हैं क्यांेकि वे आग पैदा कर रहे हैं, विद्रोह को हवा दे रहे हैं। इसलिए वे शुरू से ही इस चिंगारी को कुचल डालने की कोशिश मे लगे रहते थे। आजादी के बाद परिस्थितियांे में कुछ बदलाव जरूर आया है तथा पत्रकारिता के मायने व उद्देश्य भी बदल गए हैं मगर दुव्र्यवस्थाओं का विरोध करने वाले को विद्रोही करार देकर दबाने के प्रयासों में आज भी कोई कमी नहीं आई है, खासकर देश के छोटे शहरों और पिछड़े इलाकों में। परिस्थितियों तथा दुव्र्यवस्थाओं का विरोध करने की हिम्मत जुटाने वाले पत्रकार को धमकियां मिलना अथवा जानलेवा हमलों का शिकार होना हर इलाके में भले ही आम बात न हो मगर पंजाब में समझौता न करने तथा समाजहित को महत्व देने वाले पत्रकारों की स्थिति कुछ ज्यादा ही बदत्तर नजर आ रही है।

पंजाब के ही कुछ जुझारू पत्रकार यह देख कर काफी दुखी हैं कि उनके सूबे में बहुत से पत्रकार केवल सरकार के जनसंपर्क का जरिया बनते जा रहे हैं। कुछ अन्य राज्यों की तरह ही पंजाब में भी जो पत्रकार मंत्रियों के बयान तथा तारीफें बढ़-चढ़ कर छापते हंै उन्हें तमाम तरह की सरकारी एवं गैर सरकारी नियामतें बख्शी जाती है। जबकि सरकार की कुनीतियों तथा मंत्रियों व विधायकों की घपलेबाजियों का भंडाफोड़ करने वाले पत्रकारों को प्रायः तरह-तरह की मुसीबतों से गुजरना पड़ता है। पंजाब पुलिस भी सरकार की पिट्ठू बन कर ऐसे जुझारू पत्रकारों को प्रताडि़त करने का काम बेखौफ करती है। अभी हाल ही में एक ऐसे ही नौजवान पत्रकार के साथ घटे हादसों को सुनकर बहुत तकलीफ हुई। कहते हैं कि इंसान की आंखें उसके दिल का आइना होती हैं। इस नौजवान पत्रकार की आंखों में इस मुल्क के तेजी से बिगड़ते निजाम को लेकर तमाम सवाल तैर रहे हैं। उसके दिल में तमन्ना है कि वो हालात सुधारने का जरिया बने।  शहीदे आजम भगत सिंह की सरजमी पर पैदा होने वाला यह नौजवान जानता है कि मुल्क की खिदमत और इबादत का रास्ता फूलों से नहीं कांटों से भरा होता है। फिर भी वह इस रास्ते पर ही चलना चाहता है। उसकी इसी जिद ने उसे न सिर्फ कई बार जानलेवा हमलों का शिकार बनाया बल्कि कई महीनों के लिए जेल के सींखचों के पीछे बंद करवा दिया।

पंजाब के एक छोटे से नगर के इस युवा पत्रकार से मेरा संपर्क जब खतों की मार्फत हुआ तब वह 18 वर्ष का था आज 26 वर्ष का है। पर इतनी कम उम्र में ही उसमें कुछ कर गुजरने का जज्बा था। बाद के वर्षों में इधर-उधर से खबर मिलती रही कि इस नौजवान ने पत्रकारिता के क्षेत्र में छोटी उम्र में ही नाम कमा लिया। इसकी भावुकता व अपने पेशे के प्रति ईमानदारी का उदाहरण देने के लिए एक घटना का जिक्र करना ही काफी होगा । पंजाब के जिस छोटे से समाचार पत्र के माध्यम से इसने पत्रकारिता में कदम रखा था उससे उसने जल्दी ही इसलिए इस्तीफा दे दिया क्योंकि अखबार के संपादक ने एक तत्कालीन राज्यमंत्री के भ्रष्टाचार को उजागर करने वाला उसका एक तथ्यपरख व मयसबूत समाचार प्रकाशित करने से इंकार कर दिया। अपनी ऐसी जिद के चलते वह ज्यादा देर तक एक अखबार में टिक नहीं सका। कुछ समय विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता करने के बाद जल्दी ही फिर एक अन्य हिंदी दैनिक के जरिए पत्रकारिता में अपना नाम रोशन करने लगा।

 समाज के लिए कुछ करने की भावनाएं इसकी कलम में स्पष्ट झलकती थी। जबकि पंजाब पुलिस की गुंडागर्दी तथा भ्रष्टाचार इस पत्रकार का प्रमुख निशाना रहे। वर्दी में शराब पीते पुलिसकर्मियों के चित्र खींचकर प्रकाशित करवाना, पुलिस थानों में विभिन्न केसों के लिए निश्चित रिश्वत की सूची छापना तथा स्वास्थ्य एवं अन्य विभागों के भ्रष्टाचार के विरूद्ध भी खुलकर लिखना इसे भारी पड़ा। लिहाजा पुलिस के साथ-साथ कुछ एक ताकतवर सफेदपोशों को भी इसने अपना दुश्मन बना लिया। उस पर कुल चार बार हमले हुए। एक बार तो मौत के मुंह में जाते-जाते बचा और एक बार इसके पूरे परिवार को जान से मारने की कोशिश की गई। मगर तमाम घटनाक्रम की जांच करने के बाद भी हमलावरों के विरूद्ध पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। जैसा आमतौर पर होता है कि जब कोई व्यक्ति बिकने, झुकने या डरने से मना कर देता है तो उसका चरित्रहनन करना ही हुकमरानों की कोशिश होती है। उसे विदेशी खुफिया एजेंसी का एजेंट बता दो, देशद्रोही बता दो, किसी झूठे मुकदमें में फंसा दो या उस पर चरित्रहीनता का आरोप लगा कर उसे बदनाम कर दो।  शायद ऐसा ही कुछ इस नौजवान के साथ हुआ। जब उसके इलाके के ताकतवर लोग उसे खरीद नहीं पाए तो इस युवा पत्रकार के विरूद्ध एक औरत को छेड़ने के आरोप में केस दर्ज कर दिया गया। जबकि पुलिस अच्छी तरह से जानती थी कि यह औरत इस पत्रकार पर हमला करने वालों में से ही एक की पत्नी थी। हमलावरों को बचाने में जुटी पुलिस का ऐसा भ्रष्ट रवैया देखकर इस पत्रकार ने अपने परिवार पर हुए हमले के संबंध में अदालत में केस दायर कर दिए। इससे बौखलाई पुलिस और वहां के हुक्मरानों ने इस जुझारू पत्रकार को फंसाने का एक और तरीका ईजाद किया। 23 वर्षीय इस पत्रकार के खिलाफ 48 वर्षीय यानी इसकी मां से भी ज्यादा उम्र की एक अन्य औरत से अदालत में याचिका दायर करवाई गई जिसमें उसने शिकायत की कि इस पत्रकार ने उसके साथ बलात्कार करने की कोशिश की थी। ऐसा नहीं है कि 23 वर्ष का नौजवान 48 वर्ष की महिला के साथ बलात्कार नहीं कर सकता। पर माना जाता है कि कानून की आंख और कान ज्यादा चैकन्ने होते हैं। कानूनविद और पुलिस अगर ईमानदारी से पूरे हालात की सिलसिलेवार जांच करें तो यह पता चल जाता है कि आरोपी ने वास्तव में जुर्म किया है या उसे झूठे ही फंसाया जा रहा है। पर शायद ऐसी किस्मत इस नौजवान पत्रकार की नहीं थी। उसे इस छोटी सी उम्र में भरपूर यातनाएं दी गई पर इसकी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि इस पत्रकार ने इन सबके बावजूद भी हार नहीं मानी। शायद उसे विश्वास था कि अदालत से उसे एक दिन इंसाफ जरूर मिलेगा।

इसी बीच पता चला कि इस नौजवान को निचली अदालत ने एक वर्ष की कैद की सजा सुना दी। इतना ही कहर काफी न था कि एक और लड़की का अपहरण और बलात्कार करने के आरोप में इसे ही नहीं बल्कि इसके पूरे परिवार को भी फंसा दिया गया हैे। ऐसा यह नहीं कि कोई नौजवान गलत नहीं हो सकता मगर तथ्यों को नजरंदाज करना नाइंसाफी होगी। भुक्तभोगी यह जानते हैं कि पत्रकारिता के महंत बन कर बैठे दलाल किसी छोकरे पत्रकार की जाबांजी को बर्दाश्त नहीं कर पाते। उसे न सिर्फ हतोत्साहित करते हैं बल्कि अपने गाॅड-फादरों के इशारांे पर बदनाम करने से भी बाज नहीं आते। ऐसे दलालनुमा पत्रकार  जुझारू पत्रकारों को अक्सर ब्लैकमेलर कह कर बदनाम करने की कोशिश करते हैं। पर सूरज को बादल हमेशा ढक कर नहीं रख सकते। सच्चाई सामने आ ही जाती है। इस पत्रकार का परिवार आज भी एक किराए के मकान में रह रहा है। औरत को छेड़ने के जिस आरोप में इसे एक वर्ष की सजा सुनाई गई है उसके बारे में मात्र इतनी टिप्पणी काफी है कि इस केस मे कोई स्वतंत्र गवाही नहीं है। दोनों गवाहियां उक्त औरत के रिश्तेदारों यानी पति और भाभी ने ही दीं थीं। यह आश्चर्यजनक बात है कि उसी औरत के पति के विरूद्ध, इसी पत्रकार के परिवार पर हमले के आरोप में चल रहे अदालती केसों को भी नजरंदाज किया गया।

मानवाधिकारों व पत्रकारों की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले पंजाब के वकीलों, पत्रकारों, समाजकर्मियों व बुद्धिजीवियों के लिए इस पत्रकार की कहानी एक चुनौती है। अगर उनके सीने में इंसानी दिल धड़कता है तो उन्हें इस मामले की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। यदि उनकी जांच से यह सिद्ध हो जाए कि इस नौजवान पत्रकार के साथ वाकई नाइंसाफी की गई है या आज भी की जा रही है तो उन्हें इसकी रिपोर्ट छापकर इस पर हल्ला मचाना चाहिए। इस पत्रकार के साथ ही नहीं बल्कि पंजाब के कई शहरों में ऐसे हादसे हुए हैं, जरूरत उन सबकी जांच करने की है। ताकि न सिर्फ बेवजह यातना भोग रहे ये नौजवान पत्रकार चैन से जी सकें बल्कि भविष्य में ईमानदार और जुझारू पत्रकारों का हौसला न टूटे। शहादत और वतनपरस्ती के लिए मशहूर और हम सबके आदरणीय सिख गुरूओं के रास्ते पर चलने वालों और शहीदाने वतन भगत सिंह की हिम्मत और कुर्बानी की दाद देने वालों का यह नैतिक फर्ज है कि वे पंजाब की पाक जमीन को ऐसी नाइ्रंसाफी का ग्रहण न लगने दें। खासतौर पर समर्पित पत्रकारों की  हौसला आफजाई करना उनका धर्म है क्योंकि पत्रकारिता लोकतंत्र का चैथा स्तंभ है और आज इसे तोड़ने की गहरी साजिश की जा रही है।

Friday, December 22, 2000

प्यासा जाड़ा दुनिया में अब युद्ध पानी के कारण लड़े जाएंगे

बाकी देश की छोडि़ए, भारत का दिल और देश की राजधानी दिल्ली दिसंबर के जाड़े में भी पानी के संकट से जूझ रही है। दिल्ली प्रदेश के अभिजात्य इलाके दक्षिणी दिल्ली के रहने वाले रोजाना पानी खरीद कर इस्तेमाल कर रहे हैं। जब जाड़े में ये हाल है तो गर्मी में क्या होगा ? दरअसल पानी का संकट भारत ही नहीं पूरी दुनिया में गहराता जा रहा है। अमरीका की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी मोंसान्टो अभी से भारत के जल संकट का फायदा उठा कर करोडों डालर कमाने की तैयारी कर रही है। इस कंपनी का एक गोपनीय दस्तावेज हाल ही में भारत की पर्यावरण विशेषज्ञ डा. वंदना शिवा के हाथ लगा तो यह चैकाने वाली बात सामने आई।

संघलोक सेवा आयोग द्वारा संचालित आईएएस की परीक्षा में आज से 20 वर्ष पहले दिल्ली की एक आधुनिक महिला उम्मीदार से साक्षात्कार के दौरान कहा गया कि, ‘परमाणु बम भले ही दुनिया का विनाश न करे किंतु फलश की लैट्रिंन व्यवस्था जरूर विश्व का सर्वनाश कर देगी- इस पर टिप्पणी कीजिए। बेचारी आधुनिक महिला उम्मीदवार तब यह सोच भी न सकी थी कि फलश की लैट्रिंन विश्व का सर्वनाश कैसे कर पाएगी ? पर आज यह सच हो रहा है। मशहूर लेखक जोसेफ जैनकस पूरी दुनिया के समाजों को दो श्रेणियों में बांटते हैं। वो समाज जो अपना मल (शौच) पीने के पानी में मिला कर बहा देते हैं और वो समाज जो ऐसा नहीं करते। जाहिर है कि सभी विकसित या पश्चिमी देश पहली श्रेणी में आते हैं जबकि भारत जैसे कृषि प्रधान देश दूसरी श्रेणी में आते हैं। भारत में खेत में जाकर शौच करने की जिस पारंपरिक प्रथा का आधुनिकता वादियों ने पिछले दशकों में मजाक उड़ाया था, आज उन्ह भी कुछ इसी किस्म की शौच व्यवस्था की ओर लौटने पर मजबूर होना पड़ रहा है। क्योंकि उनकी तथाकथित आधुनिक शौच व्यवस्था में साफ पानी की इतनी भारी बर्बादी हो रही है कि अब इन देशों में भी पानी का संकट पैदा होने लगा है। बदलते मौसम के कारण लंदन में बहने वाली टेम्स नदी के भूतल का जल स्तर पिछले 100 वर्षों में घटते-घटते आज न्यूनतम स्तर तक पहुंच गया है। जबकि इंग्लैंड में पानी की खपत पिछले 30 वर्षों में दुगनी हो गई है। अमरीका में भी साफ पानी की आपूर्ति से कई गुना ज्यादा पानी फलश की लैट्रिनों में बहाए जाने के कारण समस्या खड़ी होती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के एक अध्ययन के अनुसार एक टन मानवीय मल को बहाने के लिए 2000 टन शुद्ध जल बर्बाद किया जाता है। इसलिए जिन पारंपरिक समाजों में खेत में शौच जाने की प्रथा है वे समाज ज्यादा वैज्ञानिक व व्यवहारिक दृष्टि वाले हैं बमुकाबले उनके जो रंग-बिरंगे टाॅयल्स लगा कर, सोने की पोलिश वाली नल की टोटियां लगा कर अपने आधुनकि होने का स्वांग रचते हैं। इसलिए लगातार दोहन के कारण जब भूमिगत जल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है और राजधानी के आधुनिक इलाकों में भी लोगों को पानी के टैंकरों से पानी खरीद कर पीना और नहाना पड़ रहा है तो बाकी शहरों की तो दुर्दशा का मात्रा अंदाजा लगाया जा सकता है।

बीबीसी के पर्यावरण संवाददाता एलक्स किरबी का कहना है कि दुनिया में अब उससे ज्यादा मात्रा में साफ पानी नहीं है जितना कि 2000 वर्ष पहले था। पर तब दुनिया की आबादी आज के मुकाबले मात्रा तीन फीसदी थी। यानी 97 फीसदी बढ़ी हुई आबादी के लिए जल की मात्रा पहले जितनी ही स्थिर है। पर्यावरण विशेषज्ञ श्री गार स्मिथ कहते हैं कि जल दुनिया का सबसे मूल्यवान संसाधन है एक औसत व्यक्ति तीन दिन से ज्यादा प्यासा नहीं रह सकता। वे चेतावनी देते हैं कि हमारे अविवेकपूर्ण दोहन के कारण भूमिगत जल का स्तर पूरी दुनिया में हर वर्ष औसतन दस फुट गिरता जा रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि दुनिया का चालीस फीसदी भोजन सिंचित भूमि से मिलता है। यानी जल संकट से भोजन का संकट भी सीधा जुड़ा है। संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम प्रमुख इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हैं कि जल्दी ही दुनिया के देशों के बीच पीने के पानी के संकट को लेकर युद्ध शुरू हो जाएंगे। यह कोरी कल्पना नहीं, हकीकत है। आज भी दुनिया के तमाम देश पीने के पानी का आयात कर रहे हैं। सउदी अरेबिया अपनी आवश्यकता का आधा पानी विदेशों से मंगाता है। इजराइल 87 फीसदी जल का आयात करता है और जोर्डन मात्रा 9 फीसदी जल ही जुटा पाता है शेष 91 फीसदी पेय जल का उसे भी आयात करना पड़ता है। इस तरह मध्य पूर्वी एशिया व अफ्रीका के 31 देश भारी जल संकट के दौर से गुजर रहे हैं । अगले 25 वर्षों में 48 देश जल संकट की चपेट में आ जाएंगे। इस तरह 25 वर्ष के भीतर दुनिया की एक तिहाई आबादी रोजमर्रा की जरूरत का पानी जुटाने के लिए त्राहि-त्राहि कर रही होगी।

जल के इस संकट को भुनाने के लिए दुनिया की कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां तैयार बैठी हैं। अकेले इंग्लैंड में पिछले 10 वर्षों में निजी कंपनियों ने पेय जल की कीमत 44 फीसदी तक बढ़ा दी है। पानी एक ऐसी वस्तु है जिसके बिना जिंदा नहीं रहा जा सकता। लोगों की इस मजबूरी का फायदा उठाने के लिए कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी भावी रणनीति बनाने में लगी हैं। अभी हाल में अमरीका की एक ऐसी ही कंपनी ने कनाडा के प्राकृतिक जल स्रोतों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। जब कनाडा की सरकार जागी और इसका विरोध किया तो यह कंपनी एनएएफटीए करार के तहत अदालत में चली गई और इसे जीतने की पूरी उम्मीद है। इसलिए जल स्रोतों के संरक्षण के लिए समर्पित अमरीका व कनाडा के संयुक्त आयोग ने कनाडा की साफ पानी की झीलों के निजीकरण का विरोध किया है। जबकि कैर्लिफोनिया की कंपनी सन बैल्ट वॅटर ने कनाडा की सरकार पर दावा ठोक दिया है। इस कंपनी को विश्वास है कि अदालत में मुकदमा जीत कर यह कंपनी कनाडा के जल स्रोतों पर कब्जा कर लेगी। कोई आश्चर्य न होगी जब आने वाले वर्षो में कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी पतित पावनी गंगा और यमफंद काटने वाली यमुना के उद्गम स्थल पर ही कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी ताला लगा कर बैठ जाएगी और लोक कल्याण के लिए समर्पित भागीरथी के जल की एक एक बूंद की कीमत मांगेगी।

पानी के वर्तमान संकट और भविष्य की भयावह स्थिति से निपटने के लिए जीवन जीने के तरीकों में व्यापक बदलाव लाना होगा। वर्षा के जल का संग्रह मकानों की छतों पर और खाली पड़ी जमीनों में करने से धरती के नीचे के जल का स्तर बढ़ाया जा सकता है। इस दिशा में गुजरात के सूखाग्रस्त इलाके राजकोट के नागरिकों ने अच्छी पहल की और कामयाबी हासिल की। उन्होंने स्थानीय उत्साही प्रशासनिक अधिकारियों की मदद से जगह-जगह ‘चैक-डैम‘ बना कर वर्षा के पानी का समुचित मात्रा में संग्रह कर लिया। बाकी देश को भी इससे सबक सीखना चाहिए। भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय को चाहिए कि बड़ी-बड़ी योजनाओं के मकड़ जाल में न फंस कर ऐसी स्थानीय उपलब्धियों को दूरदर्शन की मदद से लोकप्रिय बनाएं। आज टोकियो से टैक्सास तक इस दिशा में पारंपरिक ज्ञान पर आधारित प्रयोग दोहराए जा रहे हैं। जबकि हम भारतवासी अंधे होकर पश्चिमी जीवन पद्धति की तरफ दौड़ रहे हैं।

यह बहुत जरूरी है कि हम संडास की व्यवस्था को इस तरह बनाएं कि वह हमारे लिए अभिशाप न होकर वरदान बन जाए। ऐसे संडास बने जिनमें पानी का इस्तेमाल कम से कम हो और मल से विद्युत ऊर्जा व जैविकी खाद बन सके। ऐसे संडास के सफल माॅडल उपलब्ध हैं और देश के कई इलाकों में लोकप्रिय भी । किंतु निहित स्वार्थों के कारण इनका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं किया जा रहा है। इस मामले में भी पहल नागरिको को ही करनी चाहिए। महात्मा गांधी ने इस समस्या को बहुत पहले ही भांप लिया था। इसलिए उन्होंने इसी किस्म के संडास बनाने और विकसित करने पर काफी जोर दिया। हर शहर में गांधीवाद के अवशेषों के रूप में बचे इक्के-दुक्के बुर्जुग गांधीवादी आज भी मौजूद हैं। इनकी सहायता से इस किस्म के संडास बनाने की विधि पर बेहद कम कीमत की लघु पुस्तिकाएं प्राप्त की जा सकती हैं। बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है। ज्ञानी वह नहीं जो स्वार्थवश परमार्थ को भूल जाए। परमार्थ के लिए स्वार्थ को भूलने वाले तो बिरले ही होते हैं। पर स्वार्थ के लिए परमार्थ करना पड़े तो किसे बुरा लगेगा ? जल के संकट से सामुहिक रूप से निपटना ऐसा ही परमार्थ है जिसमें हम सबका स्वार्थ निहित है।

Friday, December 15, 2000

अयोध्या कांड वाजपेयी जी ने क्या गलत कह दिया ?


अयोध्या मुद्दे पर विपक्षी दलों का संसद में इतना तूफान मचाना क्यों जरूरी थाक्या इसलिए कि विपक्षी दलों के सदस्य  ने इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी माना ? या फिर इसलिए कि उनकी धर्मनिरपेक्षता में आस्था है ? या इसलिए कि उन्हें मुस्लिम समुदाय के वोटों की राजनीति करनी है ? या फिर इसलिए कि उनके पास सरकार का विरोध करने के लिए कुछ ठोस मुद्दे उपलब्ध नहीं हैं ? या फिर इसलिए कि इस तरह का शोर मचाकर जनता से जुड़े असली सवालों पर से ध्यान हटाया जा सके। उधर प्रधानमंत्रh अटल बिहारी वाजपेयी का बयान उनकी पारंपरिक छवि के विपरीत अवश्य लगा पर इस बयान से अयोध्या मसले पर सरकार का रूख साफ ही हुआ है। खासकर तब जब राजग के सदस्यों ने भी उस पर कोई उल्लेखनीय विरोध प्रकट नहीं किया।
जहां तक विपक्षी दलों के सांसदों की नैतिक जिम्मेदारी का सवाल है तो यह सही ही है कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हर उस मुद्दे पर संसद में विरोध प्रकट करें जिससे उन्हें लगता है कि समाज के लिए या राष्ट्र के लिए खतरा पैदा हो रहा है। पर साथ ही यह बहुत जरूरी है कि शोर मचाने वाले दल या सांसद अधूरी नैतिकता का प्रदर्शन न करें। ऐसा न हो कि निजी हित और दलीय हित उनके फर्ज के सामने आड़े आए। ऐसे तमाम उदाहरण है जहां सांसदों की भूमिका लोगों को विस्मय में डालती है। कई महत्वपूर्ण सवालों पर सांसदों का चुप रह जाना जनता की समझ में नहीं आता।
सब जानते हैं कि करोडों मुकदमों में देश के करोडों निरीह लोग फंसे हुए हैं और अपने उत्पादक कामधंधों को छोड़कर वर्षों से कचहरियों में धक्के खा रहे हैं।  न्याय व्यवस्था भी भ्रष्टाचार के आरोप से मुक्त नहीं है। जिससे देशवासियों को भारी नाराजगी है। भारत के मुख्य न्यायधीश डा. ए.एस. आनंद ने इसी वर्ष के शुरू में कहा था कि न्यायधीशों के लिए एक आचार संहिता होना चाहिए। इससे यह स्पष्ट होता है कि देश की विभिन्न अदालतों में कुछ न्यायधीश ऐसे हैं जो अपेक्षित आचरण नहीं कर रहें या उनका आचरण पारदर्शी नहीं है। तभी तो भारत के मुख्य न्यायधीश को ये कहना पड़ा। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि हमने सoksZच्च न्यायलय के तीन न्यायधीशों के गैर पारदर्शी आचरण पर कुछ तथ्य देश के सामने रखे थे। इनमें से एक तो अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में कार्यरत हैं। जो सवाल हमने उठाए थे उनसे संबंधित प्रमाण भी देश के सामने रखे थे। पिछले नौ महीनों से मैं खुद जाकर दर्जनों सांसदों से मिला और उन्हें इन न्यायधीशों के गैर पारदर्शी आचरण के प्रमाण दिए। इस उम्मीद में कि माननीय सांसदगण देश की जनता की तकलीफो को देखते हुए इन न्यायधीशों के विरूद्ध संसद में अपनी आवाज बुलंद करेंगे। इस तरह अपने नैतिक व लोकतांत्रिक फर्ज का निर्वाह करेंगे। पर बड़े आश्चर्य और दुख की बात है कि न्यायधीशों पर इतने गंभीर आरोपों के बावजूद माननीय सांसदाs ने चुप्पी साध रखी है। क्या उन्हें देश के सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा की चिंता नहीं है ? यह जानते हुए भी कि न्यायधीशों के आचरण की समीक्षा करने या अविश्वास प्रस्ताव लाकर उन्हें हटाने का काम केवल संसद कर सकती है, फिर भी माननीय सांसदों ने इन गंभीर सवालों को जानबूूझ कर अनदेखा कर दिया। क्या इन माननीय सांसदों को इस गंभीर मुद्दे पर अपना नैतिक फर्ज याद नहीं रहा
राजनीति के अपराधीकरण को रोकने और बड़े पदों पर बैठे भ्रष्ट लोगों को सजा दिलवाने संबंधी कानून आज तक नहीं बन पाए। जबकि इन मुद्दों पर तमाम सिफारिशें धूल खा रही हैं। देश की करोड़ों जनता राजनीति में आई इस गंदगी से बुरी तरह त्रास्त है। वह इन बुराइयों से निजात पाना चाहती है। पर क्या वजह है कि अयोध्या के मुद्दे से भी ज्यादा महत्वपूर्ण इन मुद्दों पर सांसदों ने कभी ऐसा शोर नहीं मचाया जैसा अयोध्या के सवाल पर मचाते हैं ? क्या इसलिए कि यदि राजनीति की गंदगी साफ करने वाले सवालों पर शोर मचेगा तो बहुत सारी किश्तियां डूब जाएंगी ?
सारा देश जानता कि जैन हवाला कांड कश्मीर के आतंकवादियों से जुड़ा है और यह भी कि इस खतरनाक कांड की सीबीआई ने आज तक ठीक से जांच भी शुरू नहीं की। देश की राजनीति में अभूतपूर्व तूफान मचा देने वाले इस कांड की ईमानदार जांच की मांग को लेकर माननीय सांसदों ने पिछले सात वर्षों में एक बार भी वैसा तूफान नहीं मचाया जैसा अयोध्या कांड पर मचाया। शोर मचाना तो दूर 10 सांसदों ने एक जुट होकर कभी सरकार से इस कांड की जांच में कोताही करने वालों को सजा देने तक की मांग नहीं की, क्यों ? क्या वह उनका नैतिक फर्ज नहीं था ? क्या कश्मीर के आतंकवादियों को अवैध धन पहंुचाना उनकी नजर में जुर्म नहीं है ? क्या वजह है कि माननीय सांसदों को देश और देशवासियों की सुरक्षा की जरा भी चिंता नहीं है ? होती तो वे हवाला कांड पर इस तरह चुप्पी साध कर न बैठे रहते।
अयोध्या मुद्दे पर शोर मचाने वाले माननीय सांसदों को अगर धर्मनिरपेक्षता की ही रक्षा करनी है तो ऐसा क्यों है कि उनकी धर्मनिरपेक्षतासे मुस्लिम सांप्रदायिकता की दुर्गंध आती है ? धर्म के आधार पर चुनावों में टिकटों का बंटवारा करने में कोई पीछे नहीं रहता, शोर मचाने वाले दल भी। क्या इससे धर्मनिरपेक्षता पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता ? क्या वजह है कि कभी भी इन सांसदों ने इस बात पर शोर नहीं मचाया कि चुनावों में धर्म और जाति के आधार पर टिकटों का बंटवारा करने पर रोक लगाई जाए। शायद ही कोई सांसद ऐसा होगा जो अपने चुनाव में सांप्रदायिकता का सहारा लेकर वोट न मांगता हो। फिर ये हाथी के दांत खाने के और व दिखाने के और क्यों?
अगर शोरमचाने वाले माननीय सांसदों को अल्पसंख्यक वोटों की ही राजनीति करनी है तो फिर धर्मनिरपेक्षता का आडंबर क्यों? क्यों नहीं स्वयं को साफ-साफ तौर पर मुस्लिम सांप्रदायिकता के संरक्षक राजनैतकि दल के रूप में मान्यता ले लेते हैं ? कम से कम फिर मुस्लिम समुदाय को तो यह पता चल ही जाएगा कि उनके हितैषी मुस्लिम लीग ही नहीं तमाम दूसरे दल भी हैं। जाहिर है कि शोर मचाने वाले सांसदों के दल इस बात से सहमत नहीं होंगे। क्योंकि सब जानते हैं कि केवल मुस्लिम वोटों की मदद से ही चुनाव नहीं जीते जा सकते। हर चुनाव में जीतने के लिए दूसरे संप्रदायों के वोटों की भी भारी कीमत होती है। फिर क्या वजह है कि पिछले पचास वर्षेंा में धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले राजनैतकि दलों ने एक बार भी बहुसंख्यक हिंदू समाज की भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं की। समझना तो दूर इन मुद्दों पर बात करने वालों को ही सांप्रदायिकत करार दे दिया। उनकी इस नासमझी का सीधा लाभ भाजपा को मिला जो यह बताने में कामयाब हो गई कि केवल वही एक दल है जो हिंदुओं के धार्मिक हितों की चिंता करता है। विपक्षी दल आज फिर वही गलती दोहरा रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करवाना कोई भाजपा का एकाधिकार नहीं है। यह तो पूरे देश के बहुसंख्यकों की दबाई गई भावनाओं को सम्मान देने का सवाल है। जब तक अयोध्या, काशी और मथुरा के पवित्रा तीर्थस्थलों पर बनें भव्य मंदिरों को ध्वस्त करके जबरन बनाई गई मस्जिदें खड़ी रहेंगी तब तक हिंदुस्तान के हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दीवार खड़ी रहेगी।
मथुरा, अयोध्या व काशी में हिंदुओं के धर्मस्थालों पर बनी मस्जिदें दुनियां में बनी हजारों मस्जिदों की तरह ही तीन मस्जिदें हैं। जो मक्का मदीना, वेटिकन सिटी व हरमंदिर साहिब की तरह विशेष अहमियत नहीं रखतीं।  पर ये तीनां स्थान इस देश के सनातनधर्मियों को जान से भी ज्यादा प्यारे हैं। हर रोज लाखों तीर्थ यात्राी, दुनियां भर से, इन स्थानों पर अपनी आस्था के फूल चढ़ाने आते हैं। वहां खड़ी ये तीनों मस्जिदें उन्हें बार-बार उस घिनौने इतिहास की याद दिलाती हैं जब चंद लुटेरों ने इसलाम के नाम पर यहां खड़े मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था। इससे उनके जख्म फिर हरे हो जाते हैं। बचपन से जो नफरत पैदा होती है वह सारी उम्र बनी रहती है। इसलिए इस समस्या का शीघ्र और स्थायी समाधान निकाला जाना चाहिए । दोनों समुदायों को साथ बिठाकर प्रेम और सह अस्तित्व की बात करनी चाहिए ना कि  भावनाओं को भड़काने की। हर सवाल को वोट के तराजू में तौलना देश के लिए बहुत घातक सिद्ध हो रहा है। अच्छी बात यह है कि मुस्लिम समाज में भी बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो इस बात से इत्तफाक नहीं रखते कि विवादित स्थलों पर नमाज अदा की जाए। धर्मनिरपेक्षता का ढोंग रचने वाले अगर मुस्लिम समुदाय को भड़काएं न तो उनमें भी ज्यादातर लोग संजीदगी से इस समस्या का हल चाहते हैं। अयोध्या विवाद के शिखर के दौर में भी  देश के अनेक आम मुसलमानों ने खुल कर ये राय व्यक्त की थी कि थी अयोध्या में विवादित स्थल पर मस्जिद बनाने की जिद छोड़ देनी चाहिए। दुनिया के तमाम मुसलमान देशों में पुरानी मस्जिदों को बाइज्जत उठाकर दूसरी जगह ले जाया गया है। फिर यह भारत में क्यों नहीं हो सकता ? तेा फिर श्री वाजपेयी ने ऐसा कया कह दिया जो कि विपक्ष पर आसमान टूट पड़ा ?