Monday, August 17, 2026

अपना शहर स्वच्छ रखने की ज़िम्मेदारी हमारी!

बरसात शुरू होते ही शहरों की गलियों-मोहल्लों में पानी जमा होना शुरू हो जाता है। मौसम विभाग अगर सही अनुमान लगाता है तो मूसलाधार बारिश के अनुमान के बावजूद देश के हर शहर में बरसात के गंदे पानी के तालाबों के बीच नारकीय जिंदगी जीने को मजबूर क्यों हो जाते हैं? हर साल यही कहानी दोहराई जाती है। लेकिन इसकी ज़िम्मेदारी क्या केवल सरकार की है? क्या नागरिकों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं? क्या कारण हैं कि हर साल मानसून में देश के कई शहर नदी नालों में तब्दील हो जाते हैं?  

सरकार की बात करें तो इसके तीन बड़े कारण हैं। पहला, बिना योजना के बसी कॉलोनियाँ और प्रशासन की आँख मूँदकर दी गई अनुमति। सड़क, नाली, सीवर... कुछ भी सही न हो तो भी कॉलोनी पास। दूसरा, नालियों और सीवर में ठोस कचरा जमा होना, क्योंकि स्थानीय निकाय अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाते। तीसरा और सबसे खतरनाक, हर दो-तीन साल में सड़कों की ऊँचाई बढ़ा देना। जिससे आसपास के मकानों का तल हमेशा नीचे होता जाता है और पानी भराव की मुख्य वजह बन जाता है।



पहले दो कारणों पर तो हर साल मीडिया में शोर मचता रहता है। लेकिन सड़क का बार-बार ऊँचा होना कोई नहीं पूछता। क्यों? क्योंकि जितनी मोटी सड़क बिछाई जाएगी, ठेकेदार और इंजीनियरों का मुनाफा उतना ही बढ़ेगा। पहली बार अच्छी गुणवत्ता की सड़क बना दी जाए तो बार-बार बनाने की जरूरत ही न पड़े। थोड़े-बहुत पैचवर्क से काम चल सकता है, वहाँ भी पूरी नई सड़क डाल दी जाती है। बिना इस बात का लिहाज किए कि सड़क के दोनों तरफ रहने वाले आम लोगों की इतनी हैसियत नहीं होती कि वे हर दो साल में अपने घर का फर्श ऊँचा करा लें।



यदि विदेशों से तुलना की जाए तो एक बार भी ऐसा नहीं देखा कि विदेशों की किसी कॉलोनी की सड़क अचानक ऊँची हो गई हो या किसी मकान का फर्श सड़क से नीचे हो गया हो। सौ साल पुराने मकानों में भी यह समस्या नहीं है। न सड़क का स्तर बढ़ा, न घर का फर्श नीचा हुआ। तो हमारे इंजीनियरों की अक्ल पर क्या पत्थर पड़ गए हैं? या समझते तो हैं, लेकिन रिश्वत की हवस में करोड़ों लोगों की जिंदगी में हर दो-चार साल मुसीबत खड़ी कर देते हैं।


लेकिन सिर्फ सरकार को कोसना काफी नहीं। हमें खुद को भी आईना दिखाना होगा। अवैध निर्माण, मानकों से ज्यादा मंजिलें, नालियों में कचरा फेंकना, ये सब हम खुद करते हैं। ग्रामीण जीवन में जो सामूहिक जिम्मेदारी की भावना थी, शहर आकर हम भूल गए। कहने को शहरी हैं, लेकिन व्यवहार जंगली जैसा।



आजकल सोशल मीडिया पर कुछ रील्स वायरल हो रही हैं। उनमें आम नागरिक दिखते हैं जो हाथ में फावड़ा-झाड़ू लेकर सड़क पर खड़े हैं। ये लोग जल भराव वाली सड़कों पर नालियों से प्लास्टिक, पॉलीथीन, गंदगी निकालते हुए देखें जाते हैं। कोई सरकारी विभाग का इंतजार नहीं कर रहा। खुद अपना इलाका साफ कर रहे हैं ताकि बारिश का पानी रुक न जाए। ये छोटी-छोटी कोशिशें ही असल बदलाव ला सकती हैं।


ज़रूरत है तो संगठित होने की। हम संबंधित अधिकारियों से सवाल पूछें। उनसे पूछें कि सड़क का स्तर हर दो साल में क्यों बढ़ाया जाता है। और अगर वे जवाब न दे पाएँ तो दबाव बनाएँ कि सड़क को उसके मूल स्तर पर लाया जाए।



आज जरूरत है कि हम उन वायरल रील्स वाले नागरिकों से सीखें। ज़रूरत पड़ने पर खुद निकलकर नालियाँ साफ करें, कचरा न फेंकें, और साथ मिलकर प्रशासन पर दबाव बनाएँ। समस्या तभी घटेगी, जब हम अपनी उदासीनता छोड़कर खुद आगे बढ़ेंगे।


सोचिए, अगर हर मोहल्ले में सिर्फ दस-बारह लोग नियमित रूप से नालियों की सफाई करें या सरकारी विभाग पर साफ़-सफ़ाई का दबाव बनाएं तो क्या होगा? पानी का बहाव खुला रहेगा, मच्छर कम पैदा होंगे, बीमारियाँ घटेंगी और सबसे बड़ा फायदा, घरों में पानी घुसने का खतरा काफी हद तक कम हो जाएगा। वायरल रील्स में जो लोग दिख रहे हैं, वे कोई सुपरहीरो नहीं हैं। वे सामान्य नौकरीपेशा, दुकानदार, छात्र हैं। उन्होंने सिर्फ यह तय किया कि इंतजार करने से बेहतर है खुद काम करना। यही रवैया हमें अपनाना होगा।


एक और महत्वपूर्ण बात। सड़क की ऊँचाई बढ़ाने की समस्या सिर्फ पानी भराव तक सीमित नहीं है। जब सड़क ऊँची हो जाती है तो घर के दरवाजे-खिड़कियाँ सड़क के स्तर से नीचे आ जाते हैं। इससे घर में नमी बढ़ती है, दीवारें गीली रहती हैं, बिजली के तार खतरे में पड़ जाते हैं और बच्चों-बुजुर्गों के लिए घर से निकलना भी मुश्किल हो जाता है। कई परिवारों को मजबूरन घर का फर्श ऊँचा करवाना पड़ता है, जिसमें लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं। यह खर्च आम आदमी की जेब पर भारी पड़ता है, जबकि जिम्मेदार ठेकेदार और अधिकारी मजे से मुनाफा कमाते रहते हैं।


सोशल मीडिया आज सबसे ताकतवर हथियार है। अपने इलाके की सड़क की ऊँचाई का फोटो-वीडियो लें, पुराने और नए स्तर की तुलना दिखाएँ, और पोस्ट करें। स्थानीय विधायक, पार्षद और नगर निगम के अधिकारियों को टैग करें। जब सैकड़ों लोग एक साथ आवाज उठाएँगे तो प्रशासन को जवाब देना ही पड़ेगा। साथ ही, मोहल्ला स्तर पर सफाई अभियान शुरू करें। रविवार की सुबह दो घंटे निकालकर नालियाँ साफ करना कोई बड़ी बात नहीं। यह छोटी सी मेहनत साल भर की परेशानी बचा सकती है।


याद रखें, सरकार और प्रशासन तभी जागते हैं जब नागरिक जाग जाते हैं। अगर हम सिर्फ कोसते रहे और खुद कुछ न किया, तो अगले साल फिर वही पानी, वही गंदगी और वही शिकायतें होंगी। लेकिन अगर हमने उन वायरल रील्स वाले नागरिकों की तरह जिम्मेदारी संभाली, तो बदलाव जरूर आएगा। नाली साफ करना शर्म की बात नहीं, बल्कि गर्व की बात है। क्योंकि यही असली देशभक्ति है, अपने आसपास को साफ और सुरक्षित रखना। समय आ गया है कि हम सिर्फ शिकायत न करें, बल्कि समाधान का हिस्सा बनें।

Monday, August 10, 2026

लोकतंत्र में प्रदर्शन, विरोध और सरकार की ज़िम्मेदारी !

लोकतंत्र में प्रदर्शन केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ को सत्ता तक पहुँचाने का संवैधानिक अधिकार है। भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(ए) और (बी) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है। यह अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है। जब व्यवस्था में असंतोष बढ़ता है, नौकरियाँ नहीं मिलतीं, परीक्षाओं में गड़बड़ी होती है या भ्रष्टाचार पनपता है, तो युवा सड़कों पर उतरते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब शांतिपूर्ण प्रदर्शन में असामाजिक तत्व घुसपैठ कर लेते हैं और हिंसा भड़काते हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह असली प्रदर्शनकारियों की रक्षा करे और तोड़फोड़ करने वालों को अलग करे। लेकिन अक्सर प्रशासन या तो अत्यधिक बल का इस्तेमाल करता है या फिर पूरी तरह लापरवाह रहता है। परिणामस्वरूप, शांतिपूर्ण आवाज़ दब जाती है और असामाजिक तत्व हावी हो जाते हैं।



2026 में भारत में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में जेन-ज़ी प्रदर्शन ने इस पूरे समीकरण को नया रूप दिया। यह आंदोलन सोशल मीडिया की एक व्यंग्यात्मक पोस्ट से शुरू हुआ। जब भारत के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवाओं को ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ कहा, तो अभिजीत दिपके नाम के युवक ने ‘अगर सारे कॉकरोच इकट्ठा हो जाएँ’ जैसी पोस्ट डाली, जिससे हजारों युवा जुड़ गए। जल्द ही यह आंदोलन नीट परीक्षा लीक और शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं के खिलाफ राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन बन गया। दिल्ली के जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन धरना, संसद की ओर मार्च, मीम्स, रील और इंस्टाग्राम की भाषा ने पारंपरिक विरोध को चुनौती दी। पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, सैकड़ों घायल हुए, लेकिन युवा शांति बनाए रखने पर अड़े रहे। अंत में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। यह मोदी सरकार के 12 वर्षों में दूसरी बार सार्वजनिक दबाव से किसी कैबिनेट मंत्री का इस्तीफा था।



गौरतलब है कि इस नई प्रवृत्ति के चलते अब प्रदर्शन सिर्फ झंडे और नारे नहीं, बल्कि डिजिटल संगठित प्रतिरोध हैं। जेन-ज़ी ने व्हाट्सऐप के बजाय इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स और वायरल वीडियो का इस्तेमाल किया। वे पारंपरिक राजनीतिक दलों से दूरी बनाए रखते हुए भी बड़े पैमाने पर जुट सके। यह आंदोलन बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों और भविष्य की अनिश्चितता का प्रतीक बन गया। दक्षिण एशिया में बांग्लादेश, नेपाल जैसे देशों में जेन-ज़ी आंदोलनों ने सरकारें गिराईं, लेकिन भारत में यह अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। फिर भी, पुलिस कार्रवाई की तस्वीरें वायरल होकर आंदोलन को और ताकत दे गईं। यह साबित करता है कि आज की युवा पीढ़ी अब चुपचाप नहीं बैठेगी।



प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को सुरक्षित रखना है। ऐसे में जब असामाजिक तत्व प्रदर्शन में घुसते हैं तो वो पत्थरबाजी करते हैं, वाहन जलाते हैं या दुकानों को लूटते हैं। जिससे पूरा आंदोलन बदनाम हो जाता है। प्रशासन अक्सर असली प्रदर्शनकारियों और तोड़फोड़ करने वालों में फर्क नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है कि लाठीचार्ज सब पर होता है, निर्दोष युवा घायल होते हैं और मीडिया में हिंसा का प्रचार हो जाता है। ऐसे में प्रशासन को पहले से खुफिया जानकारी जुटाकर असामाजिक तत्वों को अलग करना चाहिए था। पुलिस को यह समझना होगा कि बल का अत्यधिक इस्तेमाल सिर्फ नाराजगी बढ़ाता है।



सवाल है कि सरकार को प्रदर्शनों से कैसे निपटना चाहिए? सबसे पहले, संवाद। सरकार को प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत करनी चाहिए। उनकी माँगें सुननी चाहिए और जहाँ संभव हो, समाधान निकालना चाहिए। दूसरा, शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति और सुरक्षा सुनिश्चित करना। जंतर मंतर जैसे स्थानों को प्रदर्शन स्थल के रूप में संरक्षित रखना। तीसरा, असामाजिक तत्वों की तुरंत पहचान कर अलग कार्रवाई हो। सीसीटीवी, ड्रोन और खुफिया तंत्र का इस्तेमाल कर हिंसा फैलाने वालों को पकड़ना, लेकिन निर्दोषों को परेशान न करना। चौथा, सोशल मीडिया पर सकारात्मक संवाद। युवाओं की भाषा में जवाब देना। पाँचवाँ, दीर्घकालिक सुधार। जिस भी समस्या को लेकर प्रदर्शन किया जाता है उसकी व्यवस्था में पारदर्शिता लाना। अगर सरकार सिर्फ दमन करती है तो असंतोष और गहरा होता है। अगर वह सुनती है तो लोकतंत्र मजबूत होता है।


भारत का इतिहास प्रदर्शनों से भरा पड़ा है, जिन प्रदर्शनों से बड़े बदलाव आए हैं। 1974-75 का जेपी आंदोलन भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ था। जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति’ के नारे ने इंदिरा गांधी सरकार को चुनौती दी। आपातकाल लगा, लेकिन 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी। 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था। जंतर मंतर पर अनशन ने लोकपाल कानून बनवाया और आम आदमी पार्टी जैसी नई राजनीति को जन्म दिया। 2012 का निर्भया आंदोलन महिलाओं के खिलाफ अपराध पर कानून बदलने का कारण बना। आपराधिक कानून में बड़े संशोधन हुए। 2020-21 का किसान आंदोलन तीन कृषि कानूनों को रद्द कराने में सफल रहा। ये आंदोलन साबित करते हैं कि जब जनता एकजुट होती है तो सत्ता को झुकना पड़ता है।


विश्व भर में ऐसे अनेक उदाहरण हैं। 1789 में फ्रांसीसी क्रांति में बैस्टिल का गिरना आधुनिक लोकतंत्र की नींव बना। 1963 में अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग का ‘आई हैव अ ड्रीम’ भाषण नागरिक अधिकार आंदोलन का प्रतीक बना। 1989 में बर्लिन दीवार गिरने वाले प्रदर्शनों ने पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का अंत किया। दक्षिण कोरिया में 2016-17 का कैंडललाइट आंदोलन राष्ट्रपति को हटाने में सफल रहा। अर्मेनिया में 2018 की वेलवेट क्रांति ने भ्रष्ट शासन को उखाड़ फेंका। ये उदाहरण बताते हैं कि शांतिपूर्ण और संगठित प्रदर्शन लोकतंत्र की रक्षा करते हैं, जबकि हिंसा उसे कमजोर करती है।

आज की चुनौती यह है कि असामाजिक तत्व और राजनीतिक स्वार्थ प्रदर्शनों को अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल न करें। सरकार को भी यह समझना होगा कि युवाओं की आवाज़ को दबाना नहीं, बल्कि सुनना है। सीजेपी आंदोलन ने साबित कर दिया कि जेन-ज़ी अब सिर्फ रील्स नहीं बनाता, वह प्रतिरोध भी करता है। लोकतंत्र में प्रदर्शन अपरिहार्य हैं। प्रशासन की सफलता इस बात में है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की रक्षा करे और असामाजिक तत्वों को अलग करे। अगर सरकार संवाद, पारदर्शिता और सुधार का रास्ता अपनाती है तो प्रदर्शन सहयोग का माध्यम बन सकते हैं। अन्यथा, असंतोष की आग और भड़केगी। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को युवाओं की ऊर्जा को रचनात्मक दिशा देनी होगी, न कि उसे कुचलना। यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है। 

विदेशी फंडिंग के नियमन में एक अहम मोड़!

संसद के मानसून सत्र में विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 एक बार फिर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यह संशोधन विधेयक एफसीआरए 2010 में बड़े बदलाव ला सकता है। सरकार इसे विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और नागरिक समाज संगठन इसे गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ), ट्रस्ट और धार्मिक संस्थाओं पर राज्य के नियंत्रण का विस्तार मान रहे हैं। देखना यह है कि इसके प्रावधानों, पक्ष-विपक्ष, सरकारी तर्क, विपक्षी आलोचना और विशेषज्ञों राय के अनुसार, इस विधेयक में ऐसा क्या है?


एफसीआरए विदेशी दान को विनियमित करने वाला कानून है। इसके तहत एनजीओ, ट्रस्ट, शैक्षणिक और धार्मिक संस्थाओं को विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए पंजीकरण कराना पड़ता है, जो पांच साल के लिए वैध होता है और नवीनीकरण की जरूरत होती है। आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 तक करीब 14,449 सक्रिय एफसीआरए पंजीकरण थे, जबकि 22,498 रद्द हो चुके थे और 15,212 समाप्त माने गए। 2019-2022 के बीच पंजीकृत संगठनों को लगभग 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला। कई रद्द या समाप्त पंजीकरणों के बाद विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के प्रबंधन का स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं था। नया विधेयक इसी खामी को भरने का दावा करता है।


विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान एक ‘नामित प्राधिकरण’ (डेज़ीग्नेटेड अथॉरिटी) का निर्माण है। इसके अनुसार जब किसी संगठन का एफसीआरए प्रमाणपत्र रद्द, सरेंडर या नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो जाता है, तो विदेशी योगदान और उससे बनी संपत्तियां अस्थायी रूप से इस प्राधिकरण में निहित हो जाएंगी। यदि निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल नहीं होता, तो वे स्थायी रूप से निहित हो सकती हैं और सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल या बिक्री भी हो सकती है। बिक्री की राशि भारत की समेकित निधि में जाएगी। इसके साथ ही धार्मिक चरित्र वाली संपत्तियों के संरक्षण का प्रावधान भी है। प्राधिकरण पूजा स्थलों को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकता। प्रभावित संगठन 90 दिनों में पुनरीक्षण और जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील कर सकते हैं। इसके अलावा, नवीनीकरण के लिए पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये के विदेशी योगदान के उपयोग की शर्त लगाई गई है। कुछ उल्लंघनों के लिए अधिकतम कारावास पांच साल से घटाकर एक साल किया गया है और जांच शुरू करने से पहले केंद्र की पूर्व अनुमति जरूरी होगी।


सरकार का तर्क है कि यह विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए आवश्यक है। सरकार चाहे किसी भी दल की क्यों न हो, वो विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकना चाहेगी। सरकार का कहना है कि रद्द या समाप्त पंजीकरणों के बाद हजारों करोड़ की संपत्तियां अधर में लटकी रह जाती थीं; राज्य सरकारें उन्हें न तो कब्जे में ले सकती थीं और न प्रबंधित कर सकती थीं। नया ढांचा इन संपत्तियों की सुरक्षा, प्रबंधन और उचित उपयोग सुनिश्चित करेगा। न्यूनतम उपयोग सीमा निष्क्रिय संगठनों को लाइसेंस धारण करने से रोकेगी। दंड का युक्तिकरण और जांच में केंद्र की अनुमति मनमाने कार्रवाई को सीमित करेगी। सरकार का तर्क है कि यह सिविल सोसायटी को कमजोर नहीं करता, बल्कि विदेशी योगदान को वैध प्रयोजनों तक सीमित रखता है और शासन को मजबूत बनाता है।


वहीं विपक्ष इसे ‘दमनकारी’ और सिविल सोसायटी पर हमला मानता है। उनका तर्क है कि नामित प्राधिकरण को व्यापक शक्तियां मिलने से सरकार एनजीओ की संपत्तियों पर कब्जा कर सकती है। पंजीकरण का स्वतः समापन प्रक्रियात्मक देरी से भी हो सकता है। नवीनीकरण आवेदन लंबित रहने या समय पर न लगाने पर संगठन पंगु हो जाएंगे। यह विशेष रूप से छोटे संगठनों, धार्मिक संस्थाओं (खासकर ईसाई चर्चों और अल्पसंख्यक समूहों से जुड़े ट्रस्ट) और आलोचनात्मक आवाजों को निशाना बना सकता है। अमेरिका के कुछ सांसदों ने भी इसे ईसाइयों के खिलाफ हमला बताया है और भारत-अमेरिका संबंधों पर असर पड़ने की चेतावनी दी है। विपक्ष का कहना है कि 2020 के संशोधनों के बाद पहले ही हजारों लाइसेंस रद्द हो चुके हैं; नया विधेयक कार्यपालिका की शक्ति को और बढ़ाता है, न्यायिक समीक्षा को कमजोर करता है और लोकतांत्रिक स्थान को संकुचित करता है। केरल जैसे राज्यों में विदेशी फंड पर निर्भर स्कूल, अस्पताल और कल्याणकारी संस्थाएं प्रभावित हो सकती हैं।


इस विधेयक के फायदे देखे जाएँ तो इसमें पारदर्शिता, जवाबदेही और संपत्ति प्रबंधन की स्पष्टता है। विदेशी फंड का दुरुपयोग (यदि कोई हो) रोका जा सकता है। निष्क्रिय संगठनों को फिल्टर करने से सक्रिय और उद्देश्यपूर्ण काम करने वाले संगठनों को प्राथमिकता मिलेगी। इसके साथ ही दंड में नरमी और अपील का प्रावधान कुछ सुरक्षा देता है। यदि इस विधेयक के नुकसान की बात करें तो सरकार का अत्यधिक नियंत्रण, छोटी और स्थानीय संस्थाओं पर अनुपालन का बोझ, प्रक्रियात्मक जोखिम और संभावित चयनात्मक कार्रवाई शामिल हैं। उद्देश्य और भूगोल-विशिष्ट पंजीकरण लचीलापन कम कर सकता है। धार्मिक गतिविधियों पर स्पष्ट प्रतिबंध (धर्मांतरण) विवाद बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे मौजूदा खामियों को भरने वाला व्यावहारिक कदम मानता है, जबकि दूसरे वर्ग का कहना है कि यह एफसीआरए को विनियमन से आगे ले जाकर सिविल सोसायटी पर व्यापक राज्य नियंत्रण का औजार बना रहा है। कुछ कानूनी विश्लेषक कहते हैं कि संपत्तियों का निहित होना और स्थायी वेस्टिंग संवैधानिक सवाल उठा सकते हैं, खासकर बिना पर्याप्त न्यायिक निगरानी के।


कुल मिलाकर देखा जाए तो एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 विदेशी फंडिंग के नियमन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। सरकार की मंशा राष्ट्रीय हित और पारदर्शिता की है, लेकिन प्रावधानों में कार्यपालिका की शक्ति का विस्तार विपक्ष और नागरिक समाज की चिंताओं को जायज ठहराता है। सच्चा लोकतंत्र पारदर्शिता और स्वतंत्र सिविल सोसायटी दोनों की मांग करता है। ऐसे में विधेयक पर विस्तृत संसदीय चर्चा, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और छोटे संगठनों के लिए राहत के बिना इसे पारित करना अनुचित होगा। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि अपील प्रक्रिया को मजबूत किया जाए, स्वतः समापन के प्रावधानों में सुरक्षा जोड़ी जाए और धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों के लिए स्पष्ट, निष्पक्ष दिशानिर्देश हों। अंततः कानून का उद्देश्य विदेशी योगदान को नियंत्रित करना होना चाहिए, न कि वैध सामाजिक कार्यों को बाधित करना। संसद को इस संतुलन को साधना चाहिए, ताकि पारदर्शिता के नाम पर स्वतंत्रता का गला न घोंटा जाए। 

Monday, August 3, 2026

आंदोलन के नाम पर हद की बेशर्मी !

नीट पेपर लीक पर ‘जेन-ज़ी’ का जंतर मंतर पर हुआ धरना पिछले हफ्तों में पूरी दुनिया के मीडिया में चर्चा में रहा। धरने का उद्देश्य ग़लत नहीं था। इतनी बड़ी परीक्षा का पेपर लीक होना मामूली बात नहीं है। लाखों छात्रों के जीवन और सपनों से खिलवाड़ करने वाले चाहे जो भी हों उन्हें बख्शा नहीं जाना चाहिए। आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिस की जो दमनकारी लाठियां चलीं उसकी कतई ज़रूरत नहीं थी। दिल्ली के पुलिस आयुक्त लोकतांत्रिक मर्यादा की सीमाओं में रह कर कूट नीति से भी समस्या का समाधान कर सकते थे। कहीं ऐसा तो नहीं है कि क़ानून और व्यवस्था संभालने की अनुभव शून्यता के कारण उन्होंने ऐसा कदम उठाया? कोई पुलिस अधिकारी हो या प्रशासनिक अधिकारी, छात्र जीवन में सभी क्रांतिकारी होते हैं। इसलिए हताश छात्रों पर हिंसक हमला करने से पहले उन्हें दस बार सोचना चाहिए। आख़िर उनके घर में भी तो युवा विद्यार्थी होंगे। 



बावजूद इसके इस आंदोलन को जो कुछ सफलता मिली, उसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। अब तक इस मुद्दे पर काफ़ी कुछ लिखा और कहा जा चुका है। संसद में भी इस पर तीखी झड़पें हो रही हैं। अब तो सरकार ने पेपर लीक के खिलाफ संशोधन बिल भी पेश कर दिया है। इसलिए आंदोलन के उन पक्षों पर नया कुछ नहीं लिख रहा। पर इस आंदोलन की जिस बात ने मुझे बहुत विचलित किया है, वो है भाषा की अभद्रता। जिसने शालीनता की सारी हदें पार कर लीं। अगर मुझ पर लिंगभेद का आरोप न लगे तो मैं ये खुल कर कहना चाहूँगा कि जिस तरह की गंदी गालियाँ, अश्लील भंगिमाएँ और नारेबाजी आंदोलन में शामिल कुछ लड़कियों ने की वो एक सभ्य समाज में क़तई स्वीकार नहीं की जा सकती। लड़कियों का मैं खासतौर पर इसलिए उल्लेख कर रहा हूँ क्योंकि अब तक भारतीय समाज में लड़कियों को कभी ऐसी अश्लील भाषा का प्रयोग करते नहीं देखा गया था। लड़के तो प्रायः गाली-गलौज की भाषा में बात करते ही हैं। पर सब लड़के ऐसे नहीं होते। ज़्यादातर मर्यादित भाषा का ही प्रयोग करते हैं। चूँकि मैं पिछले 50 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता से जुड़ा रहा हूँ इसलिए अक्सर मेरे मुंह से ‘साला’ गाली निकल जाती है। मेरे बेटे जो अब 40 वर्ष के आस-पास हैं, बचपन से ही मुझे इस पर टोकते आए हैं, आप कैसी भाषा बोलते हैं? इसलिए मैं ये सावधानी बरतता हूँ कि अपने परिवार के सामने, ‘साला’ जैसी गाली का भी प्रयोग न करूँ। 



हमारा परिवार कोई अनूठा नहीं हैं। भारत के करोड़ों परिवारों में भाषा की मर्यादा और व्यवहार में शालीनता का पाठ बचपन से ही पढ़ाया जाता है। यही हमारे सनातन संस्कार हैं। जंतर-मंतर के प्रदर्शन में कुछ छात्रों ने जिस अभद्र भाषा का प्रयोग किया वो सोशल मीडिया के माध्यम से घर-घर और गाँव-गाँव तक पहुँचा। जरा सोचिए कि शालीनता के दायरे में रहने वाले करोड़ों युवक-युवतियों पर इसका क्या असर पड़ा होगा? अभिजात्य वर्ग के या पढ़े-लिखे समाज के युवाओं के इस निकृष्ट व्यवहार को देख कर हो सकता है कि गाँवों में रहने वाले लड़के-लड़कियां भी आधुनिक दिखने की ललक में इस तरह की अशिष्ट भाषा का प्रयोग करने लगें। दूसरी तरफ़ दिल्ली की झुग्गियों में पला बढ़ा एक निर्धन नौजवान मोहम्मद इरफान इसी आंदोलन में रातों-रात पूरे देश के युवाओं के लिए एक मिसाल बन कर सामने आया है। ग़रीब परिवार में पैदा हुए इरफ़ान के पास औपचारिक शिक्षा की डिग्रियाँ नहीं हैं। पर जिस संयत भाषा में उसने इस आंदोलन के मुद्दों को मीडिया के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया, वो क़ाबिले तारीफ़ है। संविधान से लेकर, देश के राजनैतिक इतिहास, सामाजिक आर्थिक बदहाली और सनातन धर्म की गहराइयों तक जिस ज्ञान का प्रदर्शन उसने किया वो आश्चर्यचकित करने वाला है। इरफान का व्यक्तित्व इस आंदोलन के उन उद्दंड और संस्कारहीन युवाओं के गाल पर सीधा तमाचा है।      



इसी क्रम में यहाँ मैं एक और चिंतनीय प्रवृत्ति की ओर इशारा करना चाहूँगा। पिछले कुछ वर्षों से महानगरों में ‘स्टैंड-अप कॉमेडी’ का एक नया चलन शुरू हुआ है। लोकतंत्र में समाज और सरकार पर कटाक्ष करने के अनेक माध्यम होते हैं। प्राचीन काल से ये कार्य विदूषक करते आए हैं। आज के दौर में वही ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन हैं। तनाव भरे जीवन में हँसना-हँसना सबको राहत देता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो कॉर्पोरेट जगत में कम उम्र में ही बुलंदियों को छूने वाले युवा, आज सबसे ज़्यादा तनाव ग्रस्त हैं। चाहे उनकी आमदनी शेष युवाओं की तुलना में कई गुना ज़्यादा हो, पर कॉर्पोरेट जगत की संस्कृति ही ऐसी है कि ये युवा लगातार मानसिक तनाव में जीते हैं। इसलिए बेंगलुरु, मुंबई, गुरुग्राम जैसे शहरों में अचानक ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन की बाढ़ आ गई है। इनमें अधिकतर कॉमेडियन ऐसे हैं जो अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, सामाजिक-राजनैतिक समझ और अपने इर्द-गिर्द की दुनिया पर पैनी नज़र रख कर जो कुछ प्रस्तुत करते हैं वो न सिर्फ़ श्रोताओं को हँसी से लोटपोट कर देता है, बल्कि सरकार और समाज की कमज़ोरियों को सहज ही उजागर कर देता है। 


इन्हीं ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियनों में कुछ पुरुष और महिला ऐसे भी हैं जो अत्यंत निम्न कोटि की भाषा का प्रयोग करके कामुकता और अश्लीलता का ‘फूहड़ मनोरंजन’ प्रस्तुत करते हैं। जिस श्रोता समूह के सामने ये लोग इस तरह की प्रस्तुतियां करते हैं वो पढ़ा-लिखा, संपन्न और कैरियर में सफल व्यक्ति होता है। इसलिए उसमें इतना विवेक होता है कि वो ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडी हॉल के बाहर निकल कर उस माहौल को भूल जाता है और अपने कार्य-क्षेत्र, समाज और परिवार में अनुशासित जीवन जीता है। पर सोशल मीडिया के माध्यम से जब ऐसे ‘शो’ घर-घर पहुँच जाते हैं तो उन युवाओं के दिमाग पर ग़लत असर डालते हैं जो अपने परिवार की कमज़ोर आर्थिक स्थिति में रहकर अपने कैरियर को बनाने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। ऐसी भाषा प्रयोग करने वाले ‘स्टैंड-अप’ कॉमेडियन को सरकार कानून की मदद से अनुशासित या दंडित करे तो यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला माना जाएगा। पर अभिव्यक्त की आज़ादी का अधिकार हमें समाज में गंदगी फैलाने की छूट नहीं देता। इसके लिए आत्मसंयम बहुत ज़रूरी है। फिर वो चाहे कॉमेडियन हों या किसी राजनैतिक दल के कार्यकर्ता।